Monday, 15 January 2018

तिला संक्रांति

मैथिली लघुकथा 
  • दिनेश यादव 

अही बेरक तिला संक्राति मे हम झापा जिला के माईधार सप्तरीक अप्पन गाम फकिरा होयत  मधुवनी फुरफरास नजिक सांगी के यात्रा करैत दरभंगा के मिर्जापुर तक पहुँचलौं एतबे नय मधुवनी के सहारघाट नजि बसबरिया गाम मे सेहो हम पहुँचलौ एक्के दिन मे एतेक यात्रा कोना सम्भव होयत मुद्दा हम सम्भव बनेलौ, अप्पन मन दौडा , स्मृति के पन्ना पलटा के स्कुलिया जीवन कलेज होइत अखनी धरि उपर देल गेल स्थान हम जुडल छि सन् १९८४ के जाड मे कन्काई माई धार मे स्नान करबाक प्रतियोगिता होय या अप्पन जन्मस्थल फकिरा के पुरैनी पोखरी मे भफियाइत पानी मे हेलबाक बाजी होय , सबटा बुझायत अछि जेना काइल्हे भेल छल  दरभंगा के टावर चोक के टेला पर के घिउवरी मिठाई, नजदीक रहल लस्सी के दोकन पे रंगीन लस्सी पिबाक बात एक्के दिन उमा टाकिज  लहेरियासरायक लाइटहाउस मे देखल गेल सिनेमा खुब मोन पडल, आजु एतह, काठमाडौस्थित निवास मे २०१२ के तिलासंक्राति मे बासमति, चननचुर कान्छी मन्सुली चउरक छनौट मे हमरा कनियाँ के बड परेशानी भेल बौआ कहैत छल बासमति, हम कहैत छलौह चननचुर मुद्दा हमर ननकिरबा भतिजक जिद छल कान्छी मन्सुली फजगज जारी छल , ओही बीच कनिया कहली जे खिचडी छी , जायछी हम तीनु चाउर फेट बनाबैले हुनक यी छनौट हमरा उत्तम लागल खिचडी पकौलैति, बड टेस्टी बनल , मुद्दा खिचडी मे घि , पापड , कसौनी आमक आचार जौ नय होयत कि मज्जा ? अही सब चीजबीजक खोजी भेल हमरा मालुम छल घि हमर स्वास्थ्य के कारण कनिया कहत नय अछि मुद्दा आन परिकार हम सेहो बञ्चित गेलौ दीर्घकालिन रोग से ग्रस्त यी शरीर दु दिन पछाडि रहल सर्दी जुकाम बोकार के कारण हमरा फकिरा, दरभंगा, मधुवनी फुलपरास धरि पहुँचा देलक दरभंगा के तिलासंक्राति मे झन्झारपुर नजिक खैरा तिलैय के विश्वनाथ मामा, मधुवनी घोघडीयाहा #हुलासपट्टी के राजकुमार रोशन भैया के साथ विशेष छल करीब दु दशक गेल मुद्दा आइयौ नय तिला संक्राति हम विसरी रहल छी ओतबे काहा मधुवनी पिपरौन के मनोजकुमार झा के घर से आएल तिल, मुरही चुराक लाय अखनो मोन पडैए सहर्सा के संगी जितेन्द्र चौधरी के तिलकौरक चटनी दरभंगा मनहरणलाल मोहल्ला के मिथलेश भैया के कनियाक हात के तिलवा मिठाई जी पानी निकबाक लेल काफी अछि दिन छल बिना मिठाई हम रही नय सकैत छलौ, आजुक दिन अछि , हम मिठा छु नय सकैत छि चिनिया मिमारी जे गेल हमरा तिलबा लाय हमरा लेल सपना बनल अछि , मिठा के बाते छोडी दिऔ बस देख के सन्तोष मानबाक स्थिति मे हम पहुँच गेल छि घि खेला चारी बरिष गेल , सख्खर के नजिक जेबाक वर्जित अछि धन्य हमर ननकिरबा भतिज जे हमर कनिया से चोरा के एकटा मुरही के लाय हमरा देलक मुद्दा बात खोलि देलक, बाल स्वभाव जे छल कनिया हमरा पर बरसी ऊठल हम मोहनविक्रम सिंह के एक पोथि नेपाली राष्ट्रियता, विगत, वर्तमान भविष्य के कोठा पे चली गेलौ कान्तिपुर एबाक काल मात्र निचा उतरौ कपडा पहिन अफिस दिस प्रस्थान भेलौ राति ११ बजे लौटब ताबे धरि खिचडी, लाय सब समाप्त चुलक रहत ...(स्न २०१२ जनवरी १५ मेँ लिखल गेल ई लघुकथा ।)

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