मैथिली लघुकथा
- दिनेश यादव
अही बेरक तिला संक्राति मे हम झापा जिला के माईधार स सप्तरीक अप्पन गाम फकिरा होयत मधुवनी फुरफरास नजिक सांगी के यात्रा करैत दरभंगा के मिर्जापुर तक पहुँचलौं । एतबे नय मधुवनी के सहारघाट नजिक बसबरिया गाम मे सेहो हम पहुँचलौ । एक्के दिन मे एतेक यात्रा कोना सम्भव होयत । मुद्दा हम सम्भव बनेलौ, अप्पन मन दौडा क , स्मृति के पन्ना पलटा के । स्कुलिया जीवन स कलेज होइत अखनी धरि उपर देल गेल स्थान स हम जुडल छि । सन् १९८४ के जाड मे कन्काई माई धार मे स्नान करबाक प्रतियोगिता होय या अप्पन जन्मस्थल फकिरा के पुरैनी पोखरी मे भफियाइत पानी मे हेलबाक बाजी होय , सबटा बुझायत अछि जेना काइल्हे भेल छल । दरभंगा के टावर चोक के टेला पर के घिउवरी मिठाई, नजदीक रहल लस्सी के दोकन पे रंगीन लस्सी पिबाक बात आ एक्के दिन उमा टाकिज आ लहेरियासरायक लाइटहाउस मे देखल गेल सिनेमा खुब मोन पडल, आजु । एतह, काठमाडौस्थित निवास मे २०१२ के तिलासंक्राति मे बासमति, चननचुर आ कान्छी मन्सुली चउरक छनौट मे हमरा कनियाँ के बड परेशानी भेल । बौआ कहैत छल बासमति, हम कहैत छलौह चननचुर मुद्दा हमर ननकिरबा भतिजक जिद छल कान्छी मन्सुली । फजगज जारी छल , ओही बीच स कनिया कहली जे ‘खिचडी त छी , जायछी हम तीनु चाउर फेट क बनाबैले । ’ हुनक यी छनौट हमरा उत्तम लागल । ओ खिचडी पकौलैति, बड टेस्टी बनल , मुद्दा खिचडी मे घि , पापड , कसौनी आ आमक आचार जौ नय होयत त कि मज्जा ? अही सब चीजबीजक खोजी भेल । हमरा मालुम छल घि त हमर स्वास्थ्य के कारण कनिया कहत नय अछि । मुद्दा आन परिकार स हम सेहो बञ्चित भ गेलौ । दीर्घकालिन रोग से ग्रस्त यी शरीर आ दु दिन स पछाडि रहल सर्दी जुकाम आ बोकार के कारण हमरा फकिरा, दरभंगा, मधुवनी आ फुलपरास धरि पहुँचा देलक । दरभंगा के तिलासंक्राति मे झन्झारपुर नजिक खैरा तिलैय के विश्वनाथ मामा, मधुवनी घोघडीयाहा #हुलासपट्टी के राजकुमार आ रोशन भैया के साथ विशेष छल । करीब दु दशक भ गेल मुद्दा आइयौ नय ओ तिला संक्राति हम विसरी रहल छी । ओतबे काहा मधुवनी पिपरौन के मनोजकुमार झा के घर से आएल तिल, मुरही आ चुराक लाय अखनो मोन पडैए । सहर्सा के संगी जितेन्द्र चौधरी के तिलकौरक चटनी आ दरभंगा मनहरणलाल मोहल्ला के मिथलेश भैया के कनियाक हात के तिलवा मिठाई जी स पानी निकबाक लेल काफी अछि । ओ दिन छल बिना मिठाई हम रही नय सकैत छलौ, आजुक दिन अछि , हम मिठा छु नय सकैत छि । चिनिया मिमारी जे भ गेल हमरा । तिलबा लाय त हमरा लेल सपना बनल अछि , मिठा के त बाते छोडी दिऔ । बस देख के सन्तोष मानबाक स्थिति मे हम पहुँच गेल छि । घि खेला चारी बरिष भ गेल , सख्खर के नजिक त जेबाक वर्जित अछि । धन्य हमर ननकिरबा भतिज जे हमर कनिया से चोरा के एकटा मुरही के लाय हमरा देलक । मुद्दा ओ बात खोलि देलक, बाल स्वभाव जे छल । कनिया हमरा पर बरसी ऊठल हम मोहनविक्रम सिंह के एक पोथि ‘नेपाली राष्ट्रियता, विगत, वर्तमान र भविष्य’ ल के कोठा पे चली गेलौ । कान्तिपुर एबाक काल मात्र निचा उतरौ आ कपडा पहिन अफिस दिस प्रस्थान भेलौ । राति ११ बजे लौटब ताबे धरि खिचडी, लाय सब समाप्त भ चुलक रहत ...।( स्न २०१२ जनवरी १५ मेँ लिखल गेल ई लघुकथा ।)
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