मिथिला मेँ फरक मत
-दिनेश यादव
भाषा केँ सन्दर्भ मेँ मानक आ मानकीकरण फरक होएत छैक, एहीँ दुनुँ केँ उपयोग बर्चस्पवादी जाति, सम्प्रदाय आ लोक सभ करैत छन्हि, राज्य केँ पुर्ण समर्थन एहीँ मेँ रहैत छैक । मुठिभर लोकसभ एहीँ के अपनबैत बाँकी सभ केँ मुर्ख बनबैत छैक । एकटा उदाहरण : बिहार मेँ बिपिएसी केँ परीक्षा मेँ मैथिली भाषा मेँ डिस्टिंक्सन अनिनिहार सभ मात्र बैसबाक बात पूर्व मुख्यमन्त्री जग्गनाथ मिश्र केने रहैत । ओकर लाभ गैर–ब्राह्मण केँ कहियौ नय भेटलय, लालुजी एलाह एही विषय पर अध्ययन भेल, तक्करवाद ओकरा करेक्सन कएल गेल रहैय । कोनो भी भाषा मेँ जन–जिभहक/जनबोली के स्वीकारोक्ति सभ प्रकार के लडाई केँ अन्तय कए दय छैक । मैथिली भाषा केँ सन्दर्भ मेँ सेहोँ एकर प्रयोग होबाक चाही । जौं कथित मिथिला अभियानी सभ हिया केँ चौडा बनबति ई बात स्वीकारी लेत त मानक÷मानकीकरणक विवादे नय रहि जायत । चिनियाँ भाषा मेँ त ब्याकरणेँ नय होयत छैक, तईयो चीन प्रगति के सिखर पर अइछे । भाषा केँ नाम पर अपन–अपन परियोजना कोना केँ चलय तय दिस बहुत लोकन्हि केँ दृष्टि छन्हि, तेँ विवाद अए ।
दोसर बात, ‘मैथिल’ शब्द समग्र मिथिलावासी केँ प्रतिनिधित्व करय बाला शब्द नय छि । गैर–ब्राह्मण जेँ कियो अई शब्दक प्रयोग करैत, छि ओ बलजोरी मात्र अए । एकर करेक्सन करबाक आ होबाक चाही । यी शब्द गैर–ब्राह्मण सँ जुडल पेट वर्ड नय छियै । (उदाहरण :मैथिल ब्राह्मण आ कायस्थ त होएत छैक , मुदा आन जाति केँ साथ ई शब्द नय जोडल जायत छैक ) । जेना ‘कमरेड’ शब्द कम्युनिष्ट सभहक पेट वर्ड छैक, तहिना ‘मैथिल’
शब्द केँ प्रयोग ओही रुप मेँ भँ रहल अए (मैथिल मण्डल, मैथिल यादव, मैथिल पासमान..नए होयत छैक, जौ कियो एकर प्रयोग करैति छथि त बलजोरी, ओना बलजोरी मेँ सभकिछु छुट ?) ‘मैथिल’ न त भाषिक पहचान छि, न त क्षेत्रिय पहचान छि , ई मात्र जातिय पहचान अए । केवल ब्राह्मण आ कायस्थ ‘मैथिल’ थिकैह । ‘मैथिल’ महासभा जे ‘मैथिल’ सबहक सभस ताकवर आ पैघ सभा रहैत छलैय, जकर संरक्षक दरभंगा के महाराज स्वंम छलाह, ओहीं सभा मेँ मात्र ब्राह्मण आ कायस्थ सहभागी केँ अधिकारी रहैत छलाह, ओहीँ में आन जाति केँ प्रवेश निषेध रहैय , कतबो धुरन्धर विद्वान या धनवान रहितौ आन जाति ओही सभा मेँ प्रतिबन्धित रहैय । आब दरभंगा राजा,महाराजा त छैथ नए, त ओ सभ नयाँ नारा केँ अविष्कार केलैथि स्‘हम सभ मैथिल छी’ । तेँ कहिओ ओ सभ जबर्जस्ती ‘पाग’ लगा दैति छैथ त कहियो ‘मैथिल’ के बिल्ला भिडा दैति छैक । (अई विषय पर थप जानकारी केँ लेल संगैह देल गेल सन्दर्भ सामग्री के देखल जाय)
मैथिली संस्कृति स्वयं समृद्ध आ पुरान छै, एहीँ मेँ कोनो दू मत किनको भइये नेँ सकैत अछि । मुद्दा ‘पाग’ समग्र मिथिला के शान कोना के आ कहिया भँ गेलैह, से पत्ता नए । राजस्थान सँ आयातित ‘पाग’ केँ प्रचलन समग्र मैथिली भाषी मेँ नए छैक, छियई । ओना जिनका–जिनका लगेबाक छन्हि लगाऊ । गैर–ब्राह्मणक पुर्खा केँ सान
‘पगडी’ आ ‘मुरेठा’ रहैय, विवाह मेँ मौरक चलन त अइछे, बहुसंख्यक मैथिली भाषी सभहक एहा पहिचान रहैय आ छैक । मुद्दा मिथिला क्षेत्र हरेक कार्यक्रम मे किछु ब्राह्मणवादी सभ ‘खास जाति आ वर्गक’ पहिरन के सभहक शान के रुपमेँ प्रचार मेँ लागल अछि । ई प्रचार शैली अनुचित मात्र नए, भत्र्सनायोग्य छैक । एकरा गैर–ब्राह्मणक ‘संस्कृति पर प्रहार’ आ ‘संस्कृति, पहिरन थोपबाक’ रुप मेँ लेबाक चाहि । एकर विरोध सेहोँ जोडदार रुप सेँ होए । ओहुना नेपालीय मैथिली सभहक लेल आब ई पहिचानक धरोहर नए रहै गेलय । किएक त, भारत मेँ पाग पर डाक टिकट सेँ जारी भँ गेल छैक । कोनो दोसर देशक पहिचान एक आब स्वीकार करी से अनुचित अए, उटपटाङ बात सेहोँ अए । नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र केँ सप्तरी केँ सिडिओ कार्यालय मेँ पाँच टका दकेँ खसवादी टोपी जबर्जस्ती अतित मेँ ओतहुका लोक सभ लगएने रहय, दौरा–सुरुवालक दबाब त ओकरा सभ पर वर्षौं सँ जारी अइछे, पागक भारी सेहो कोना कँे ओ सभ मथा पर ढोहत ? (अई विषय पर थप जानकारी केँ लेल संगैह देल गेल सन्दर्भ सामग्री के देखल जाय) । खेतिहार सँ लकेँ मजदुर सभ केँ पहुँच मेँ रहैबला पगडी के मिथिला केँ धरोहर नए माएन केँ सम्भ्रान्त जाति विशेष केँ पहिरहनक प्रचार मेँ ब्राह्मणवादी सभ किएक छैक ? अई प्रश्न केँ जबाफ विल्कुल सरल आ सहज छैक ः अपन संस्कृति आ पहिरनक अस्तित्व जोगाबी, ताहीँ लेल प्रचार करी ।

२ इलिट एन्ड डेभलपमेन्ट, पृष्ठ २००
3.https://books.google.com.np/books?id=VjKcfqnwZtwC&pg=PA221&dq=elite+and+development&hl=hi&sa=X&ved=0ahUKEwjRxaHTmLTbAhWCV30KHVtpAUkQ6AEIJjAA#v=onepage&q=elite%20and%20development&f=false


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