Monday, 18 May 2026
जनकपुर साहित्य महोत्सव : एक विहंगम दृष्टिकोण (Janakpur Literature Festival: A Panoramic Perspective)
प्राचिन मिथिलामें स्तुतिगान करैवालाके उँच पिढिया पर बैठेबाक चलन छल, ओ अखनोधरि जारी अछि । तईँ एतह व्यक्तिके चालिसा पाठ होएत अछि । पक्षमे घडिघंट बजबैवाला बाहेक दोसरके पुछारी कमे होएत आयल अछि । घंटा बजबैवालाकेँ सम्मान कथित अभियानी सभ कहियो नहि देलक, कियक त ओ वर्चस्प पर चोट कसैत अछि । घडिघंटि डोलके बजैत अछि, मुदा घंटा तानिके वा अपना दिसि खिचके बजाओल जाएत अछि । प्रशंसाके भुखल लोक, स्तुतिगानमें आत्मरतिलिन लोकैन सभ एहि प्रराक्रममें बहुतोंकेँ भविष्यमे गदहा जनम सँ मुक्ति करबाक ध्यानमग्न रहैत छथि ।
✍ दिनेश यादव
जनकपुरधाम धार्मिक, सांस्कृतिक आ भाषिक त्रिवेणी संगम स्थल अछि । आब ई समग्र मधेशीके पहिचान, सम्मान आ संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालक लेल नमुना स्थलके रुपमे सेहो अपन परिचय स्थापित कएने अछि । नेपालक सात प्रदेशमे पहिचानक आधारपर बनल मधेश प्रदेश मात्र अछि । एकर साख, सम्मान आ प्रतिष्ठा बचेबाक जिम्मेवारी सबगोटाके अछि । एहि वर्षक जेठ पहिल साता जनकपुरमे आयोजित तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव पर हमर ई टिप्पणी केन्द्रित अछि । एकटा लोकमैथिली साहित्यक विद्यार्थी होबाक नाता सँ हम अपन विचार पाठक समक्ष जाहेर करबाक प्रयास कए रहल छी । हमर एहि बिचार सँ सभकियो सहमत होएत से जरुरी नहि अछि मुदा मनन करबाक आवश्यक अछि ।
प्राचिन मिथिलामें स्तुतिगान करैवालाके उँच पिढिया पर बैठेबाक चलन छल, ओ अखनोधरि जारी अछि । तईँ एतह व्यक्तिके चालिसा पाठ होएत अछि । पक्षमे घडिघंट बजबैवाला बाहेक दोसरके पुछारी कमे होएत आयल अछि । घंटा बजबैवालाकेँ सम्मान कथित अभियानी सभ कहियो नहि देलक, कियक त ओ वर्चस्प पर चोट कसैत अछि । घडिघंटि डोलके बजैत अछि, मुदा घंटा तानिके वा अपना दिसि खिचके बजाओल जाएत अछि । प्रशंसाके भुखल लोक, स्तुतिगानमें आत्मरतिलिन लोकैन सभ एहि प्रराक्रममें बहुतोंकेँ भविष्यमे गदहा जनम सँ मुक्ति करबाक ध्यानमग्न रहैत छथि । जनकपुरक पिछला महोत्सवमे बहुतोंकेँ गदहा जनम छुटल होएत से हमर अनुमान मात्र अछि, सहभागी लोकैन एकर प्रत्यक्षदर्शी जरुर भेल हेताह । ई विषयकेँ प्रवुद्ध पाठक लोकैनकेँ स्वविवेक आ अनुसन्धान पर छोडि आब महोत्सवकेँ उद्देश्य पर विहंगम दृष्टिगोचर करी ।
सातम् संस्करणकेँ ई महोत्सव पिछला आयोजन सब सँ कनिको भिन्न नहि रहल अछि । जतह आयोजनक उद्देश्य भ्रमपूर्ण होइछ, ओतह निस्कर्षमे पहुँचनाए दुर्लभ होइछ । ओहूमे ४० टा स्पोन्सरके प्रचार लोगो तर रहिकेँ साहित्य, कला, संस्कृति आ भाषा जेहेन गम्भिर विषय पर भेल विमर्श विवादमुक्त आ उद्देश्य अनुरुप होएत उदाहरण कतौहू नहि भेटैत छैक । प्राचिन मिथिलामें समाज आ गाम सँ बेहरी उठाके सांस्कृतिक काज करबाक परम्परा रहलैए । अखनो बहुत रास गाम आ क्षेत्रमे एहि तरहे सांस्कृतिक कार्यक्रम सामूहिक रुप सँ आयोजन होएत आएल अछि । एहि तरहे आयोजनमे समाज आ गामक सभगोटेके अपनत्व रहैत छैक । मुदा जनकपुरधामक महोत्सव सबमे एकर अभाव सदखनि देखल गेल आ भेटैत अछि । एहि तरहे आयोजनमें स्पोन्सरके बाहेक किनको अपनत्व नहि रहि जाएत अछि । ई बात जनकपुरिया आ आयोजक संस्थाके बुझैटा पडतैन ।
‘जनकपुर साहित्य महोत्सव’केँ उद्देश्य सांस्कृतिक आ भाषिक गौरवक उन्नयन रहबाक चाही छल , से नहि भेल । महोत्सव पर सकारात्मकता सँ बेसी नकारात्मकता देखल गेल । सामाजिक संजाल आ जनमानसक प्रतिक्रिया एकर पुष्टि करैत अछि । महोत्सवके प्रमुख कमजोरी सबमे सहभागी संरचना, नाम विवाद, अमुक पार्टीके राजनीतिक वर्चस्प, जातिगत मानसिकता, आर्थिक पारदर्शिता , विवादित व्यक्तिके सहभागिता आदि देखल गेल ।
विविधतायुक्त मधेश प्रदेश आ राजधानी जनकपुरधाम रहितौहू समग्र मधेशक प्रमुख भाषाभाषीकेँ महोत्सवमे सहभागी नहि केनाए, आयोजकके पूर्वाग्रही मानसिकताकेँ पुष्टि करैत अछि । काठमाडौंसँ आयल व्यक्ति सभकेँ दबदबा आ प्राथमिकता एकर प्रमाण अछि । प्रदेशक विभिन्न भाषाभाषी–लोकमैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, महगी, जोलहा आदि के निषेध कयल गेल आरोप महोत्सवके पर्यवेक्षक सभके अछि । ओ सभ कहैत अछि जे–स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्ग महोत्सवमेँ उपेक्षित रहल ।
आयोजनकेँ नाम विवाद सेहो देखल गेल । ‘जनकपुर’ नाम प्रयोग करबाक कारणेँ आलोचना भेल । स्थानीय जनमानसक आग्रह रहैत अछि जे धार्मिक आ सांस्कृतिक महत्त्वक अनुरूप ‘जनकपुरधाम’ नाम प्रयोग होबाक चाही । ओकर सुधारक कोनो गुन्जाईस आयोजक नहि केलक । तहिना साहित्यिक मंचमे राजनीतिक हस्तक्षेप स्पष्ट देखल गेल । महोत्सवक विमर्श साहित्यिक विषयसँ हटि राजनीतिक वर्चस्वक प्रदर्शनमे बदलि गेल , जे पैघ दुर्भाग्य अछि ।
महोत्सवमे सहभागी लोकक चयन सीमित जाति आ पहुँचके आधार पर भेल कहि आरोप लागल । ई आरोप साहित्यिक समावेशी भावनाके कमजोर करैत अछि ।
जनकपुरधामके सम्पदा सूचीमे सूचिकृत करबाक लेल गेरुवावस्त्र धारण कए पैदल मार्च कएल गेल , कि एहि सँ जनकपुरधाम युनेस्कोकेँ सम्पदा सूचिमे समावेश भए जाएत ? ई कदमक औचित्य आ पारदर्शिता प्रश्नमे रहल ।
आयोजक संस्थाक एकटा कमाण्डर जनकपुर जानकी मन्दिरमे चढाओल गेल पैसाक हिसाब सार्वजनिक करबाक मांग उठौलथि । ई विषय महत्वपूर्ण होइतहू, महोत्सवके उद्देश्य अनुरुप नहि रहैक । जे संस्थामें स्वयं आर्थिक पारदर्शिताक अभाव रहलैए, ओ दोसर पर आंगूर उठाएब कतेक उचित ? एतेह कहि दि जे ई स्तम्भकार हरेक क्षेत्र, संस्था वा महोत्सव सबकें आर्थिक पारदर्शिताके पक्षधर सदखनि रहल अछि । महोत्सवके सब सँ दुःखद बात ई रहल जे विवादित व्यक्तिके हालीमुहाली देखल गेल । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार आ विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखल गेल । ई महोत्सवक समावेशी छवि आ जनविश्वासमे आघात पहुँचल ।
हमरा जनितब, शायद, जनकपुर साहित्य महोत्सवक आयोजन साहित्यिक आ सांस्कृतिक उन्नयनक अपेक्षामे भेल छल, मुदा वास्तविकता मे ई आयोजन राजनीतिक वर्चस्व, जातिगत छनौट, नाम विवाद आ पारदर्शिताक अभावक कारणेँ आलोचनाक विषय बनल । स्थानीय भाषाभाषी समुदायक उपेक्षा आ जनकपुरधामक धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक अवहेलना एहि महोत्सवक मूल कमजोरी रहल ।
जनकपुरधामक सांस्कृतिक, धार्मिक आ भाषिक महत्त्वक अनुरूप भविष्यमे महोत्सवकेँ सफल, समावेशी आ विश्वसनीय बनाबय लेल सुधार आवश्यक अछि । खास ककेँ नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, समावेशी छनौट, राजनीतिक हस्तक्षेत्र निरुत्साहितता, विवादित व्यक्ति सँ दूरी कायम, सांस्कृतिक विविधता आदिकेँ जरुरी छैक ।
आयोजनक नाममे ‘जनकपुरधाम’ प्रयोग करबाक चाही, जे धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक सम्मान करैत अछि । स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्गकेँ प्राथमिकता दिओनाइ अनिवार्य छैक । बाहरी सहभागी सेहो रहथि, मुदा स्थानीय आवाजक उपेक्षा नहि होबाक चाही । जाति, पहुँच वा व्यक्तिगत सम्बन्धक आधार पर नहि, स्पष्ट मापदण्ड आ पारदर्शी प्रक्रिया अनुसार सहभागी चयन होबाक जरुरी अछि । साहित्यिक मंचकेँ राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त राखी ।
विमर्शकेँ साहित्य, संस्कृति आ भाषा पर केन्द्रित करबाक व्यवस्था होउक । आयोजनसँ संकलित धनराशिकेँ सार्वजनिक रूपमे हिसाब दिओनाइ अनिवार्य होउक । ई विश्वसनीयता आ जनसमर्थन बढेबाकले नितान्त आवश्यक अछि । सम्पदा सूचीमे सूचिकरण लेल स्पष्ट मापदण्ड, विशेषज्ञ समिति आ सार्वजनिक परामर्श आवश्यक अछि । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार वा विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखबाक परम्परा तोडि, समावेशी आ निष्पक्ष व्यक्तित्वकेँ अग्रता दिओनाइ जरुरी अछि । महोत्सवमे स्थानीय संस्कृति, लोककला, लोकगीत, चित्रकला आ नाट्यक प्रदर्शनक समावेश करबामेँ कोनो कसर नहि छोडनाए आवश्यक अछि । संक्षेपमें एकरा ई कहि सकैत छी जे–जनकपुरधाम साहित्य महोत्सवकेँ भविष्यमे सफल बनाबय लेल नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, पारदर्शिता आ समावेशी दृष्टिकोण अनिवार्य अछि । राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त, सांस्कृतिक विविधता आ आर्थिक पारदर्शितासँ सम्पन्न महोत्सव जनकपुरधामक गौरव बढाबय आ स्थानीय साहित्यक उन्नयन करयमे मिलके पाथर बनौक ।
(लेखकके निजी बिचार)
Thursday, 14 May 2026
विश्वासक बीज (मैथिली लघुकथा )
न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहि, बल्कि विश्वास आ सहकार्यक फल अछि । प्रहरी आ नागरिक मिलिकेँ जखन पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आ सहभागिताक संस्कार गढ़ैत अछि, तखन समाज अपराधमुक्त आ सभ्य बनैत अछि ।
✍ दिनेश यादव
सिम्रौनगढक ऐतिहासिक धरती पर नव भवन बनल । दू तल्ला संरचना, चमकैत रंग आ भित्तिपर टाँसल पोस्टर–गामक लोकसभक नजर खींचि लेने छल । उद्घाटनक दिन भीड़ उमड़ल । महिला, बाल–बालिका आ ज्येष्ठ नागरिकसभक मुंह पर उत्सुकता झलकैत छल ।
प्रहरी महानिरीक्षक दानबहादुर कार्की मंच पर ठाढ़ छलाह । हुनकर आवाज गंभीर मुदा आत्मीय छल ।
‘तराई–मधेशमे एखनहु ‘पञ्चायती’ सोच आ ‘बिचौलियाक’ जालमे पीडÞित न्याय पाबयमे कठिनाइ झेलैत अछि,’ कार्की कहलाह । भीड़मे किछ लोक माथ हिलेलाह, मानू अपन अनुभव याद करैत ।
ओ आगू कहलाह, ‘प्रहरी कार्यालयमे समस्या राखय लेल ककरो सहारा नहि चाही । चिनजानक नाम पर रकम असुलबाक प्रवृत्ति आब सह्य नहि अछि । पीडÞितक गोपनीयता आ सुरक्षाक उच्च प्राथमिकता देल जायत ।’
गामक वृद्धा उर्मिदा देवी नजिके बैसल सुनैत छलि । हुनका लागल–शायद आब प्रहरी लग जायमे डर नहि रहत ।
‘कानूनसँ ऊपर कियो नहि, सुख–दुखमे प्रहरी साथी’–ई नाराक संग वातावरणमे नव आशा फैलि गेल । कार्की भवनक महत्त्व बतौलाह–ई केवल सरकारी संरचना नहि, नागरिकक साझा सम्पत्ति अछि । स्थानीयसभक सक्रिय सहभागिता बिना ई संरचना अधूरा रहत ।
कार्यक्रमक अन्तमे किछ व्यक्तित्वकेँ प्रशंसापत्र देल गेल । भीड़ उत्साहित भेल । मुदा सभसँ पैघ प्रशंसा नगरवासीकेँ मनमे जन्मल–प्रहरी आ नागरिकक बीच विश्वासक बीज रोपल गेल ।
ई बीज केवल शब्द नहि छल, बल्कि प्रहरी प्रमुखक आत्मस्वीकृति आ सुधारक संकल्पक प्रतीक छल । जे दिन प्रहरी स्वयं अपन कमजोरी स्वीकारि ओकरा सुधारबाक वचन दैत अछि, ओहि दिन समाजमे नव भरोसाक जन्म होइत अछि ।
शिक्षा : एहि लघुकथा सँ स्पष्ट संदेश भेटैत अछि जे न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहि, बल्कि विश्वास आ सहकार्यक फल अछि । प्रहरी आ नागरिक मिलिकेँ जखन पारदर्शिता, उत्तरदायित्व आ सहभागिताक संस्कार गढ़ैत अछि, तखन समाज अपराधमुक्त आ सभ्य बनैत अछि ।
Monday, 11 May 2026
मैथिली लघुकथा : मृत्युभोज
आत्माक शांति देखावटी भोज सँ नहि, जीवितक सेवा आ सहारा सँ होइत अछि ।
■दिनेश यादव
मनमोहना ग्वार फकिरा गामक चौरीचाँचरमें भैंस चरबैत छल । नजिक मुतनी नदीके घनघोर झाँकडिमे ओकर नजर गामक बुजुर्ग मैञ्जन जादव पर पड़ल । गामक सभ लोक हुनका ‘दादा’ कहि पुकारैत छल ।
मनमोहना नजिक गेल आ पुछलक—
‘दादा, अहाँ गाम सँ एतेक दूर मुतनी नदीके झाँकडिमे अकेले कियैक ? किछु जड़ी–बूटी चाही छल या कोनो वनस्पति आवश्यक छल तऽ हम आनि दितहुँ ।’
दादा आँखि नम करैत कहलखिन—
‘बौआ, काल्हि सँ एतहि भूखल छी । घरवला निकालि देलक । बुखार लागल छल, पाँच बेटामे सँ कोनो औषधिक लेल पैसा नहि देलक । मोन होइए जे एतैह प्राण तेज देतू । ’
चार दिनक बाद फकिरामे खबर फैलल— मैञ्जन दादा आब एहि संसारमे नहि रहलाह ।
ग्रामिण सभ गामक पोखरि महाड पर दादाके अन्त्येष्टिमे पहुँचल छल, गुमस्ता काका ओतहि दादाके पाँचो बेटाके पुछलक–
‘बौआ, मैञ्जनक भोज कतेह करबहक ? दादा बहुत धन कमाकेँ छोडि गेलौक । दू सभा मृत्युभोज त करै पडतौं । गाम समाजके चाहना एहा छयैक । ’
मैञ्जनक जेठका लडका कहलक–
‘समाज जे जेना कहतै, करबै । हम सभ भरि गाम या एक खपकटी भोज करबार सोच बनौने छियैक ।’
तेरहम दिन हुनकर बेटा सभ 10 कुन्टल बसमतिया चौरक एक सभा मृत्युभोज कएलक । सभा भोजमे रहरि दालि, डल्ना तरकारी, पापड, कुम्रौडि, परवलकेँ भुजिया सहित पाँचटा सब्जी आ सकलौडि एवं दहीचिनीकेँ भरमार व्यवस्था ककेँ सात गम्मा लोककेँ भोजन कराओल गेल ।
मनमोहना मनहि मन सोचैत छल—
‘जखन दादा जीवित छलाह तऽ औषधि उपचार नहि कएल गेल । समाज सेहों बेटा सभ सँ दादाके उपचारक खातिर कोनो पहल नहि कएलक । मुदा लाखों खर्च कऽ मृत्युभोज कएलक अछि । आत्माक शांति देखावटी भोज सँ नहि, जीवितक सेवा आ सहारा सँ होइत अछि ।’
जानकी मन्दिरक वास्तुकला आ मिथिला शैलीक प्रश्न ? (Questions about the architecture of Janaki Temple and Mithila style?)
■ दिनेश यादव मिथिला संस्कृतिकेँ सम्मानित करबाक लेल वास्तुकला आ सांस्कृतिक प्रभावक बीच स्पष्ट भेद बुझब आवश्यक अछि । मिथिला शैलीक वास्तुकलाकेँ ऐतिहासिक रूप सँ सही परिभाषित करब आ जानकी मन्दिरक वास्तविक मिश्रित शैलीकेँ स्वीकार करब, ई सांस्कृतिक ईमानदारीक प्रतीक अछि । मन्दिरक वास्तुकलाकेँ जानकारी अभावमे किछु ‘मिथिला शैली’ कहि प्रचार करैत छथि । नेपालक एकटा राष्ट्रिय दैनिकमे प्रकाशित आलेखमे सेहो ओहे गल्ति दोहराओल गेल अछि । ऐतिहासिक दृष्टिकोण सँ ई विश्लेषण शुद्ध नहि अछि । वास्तुकला विशेषज्ञ आ ऐतिहासिक दस्तावेजक आधार पर ई मन्दिरक निर्माण हिन्दु-राजपूत, मुगल आ राजस्थानी शैलीक मिश्रण अछि ।
प्रमुख वास्तुकला शैलीक तत्व
●हिन्दु-राजपूत शैली: भव्य गुम्बज, विस्तृत आँगन, सजावटी झाल।
●मुगल शैली: रंगीन काँचक प्रयोग, गुम्बजक सौन्दर्य ।
●राजस्थानी शैली: झरोखा (ओभरह्याङ्गिङ बाल्कनी), कलात्मक स्तम्भ ।
ई मिश्रणक कारणे मन्दिरक रूप भव्य आ अद्वितीय बनल अछि ।
परम्परागत मिथिला वास्तुकला माटि, काठ आ स्थानीय कलात्मक ढाँचामे आधारित रहैत अछि । छोट-छोट घर, आँगनक चारिपटि सजावट आ स्थानीय सामग्रीक प्रयोग मिथिला शैलीक मूल विशेषता अछि । जानकी मन्दिरमे ई ढाँचा मूल रूप सँ नहि भेटैत अछि । ऐतिहासिक ‘मुरली चौक’ केँ ‘विद्यापति चौक’ नामकरण करबाक तर्ज पर जानकी मन्दिरके मिथिला शैली कहि देनाई अनुचित अछि।
यद्यपि वास्तुकला दृष्टि सँ ई मन्दिर मिथिला शैलीक उदाहरण नहि अछि, मुदा सांस्कृतिक दृष्टि सँ ई मन्दिर मिथिला क्षेत्रक गहिरा प्रभाव सँ भरल अछि । मन्दिरक भित्तिमे मधुबनी चित्रकला आ मिथिला प्रतीकक प्रयोगके मिथिला शैली कहि देनाई ईतिहासके साथ भद्दा मजाक बाहेक आओर किछु नहि भए सकैत अछि । अन्नपूर्ण पोष्टके आलेखमे ‘जनकपुरधामक ईतिहास’ पुस्तकके हावाला दैत उल्लेख कएल गेल ‘माछक सन्दर्भ’ जानकी मन्दिरके मिथिला शैली होबाक पुष्टि नहि अछि ।
अहि आधार पर जानकी मन्दिरक वास्तुकला केँ "मिथिला शैली" कहल ऐतिहासिक दृष्टि सँ गलत अछि । फेर कहैत छी जे ई मन्दिर हिन्दु-राजपूत, मुगल आ राजस्थानी शैलीक मिश्रण अछि । तथापि, मधुबनी चित्रकला आ सांस्कृतिक प्रतीकक कारणे ई मन्दिर मिथिला संस्कृति सँ गहिरा रूपेँ प्रभावित अछि ।अतः उचित परिभाषा ई होयत—'जानकी मन्दिर मिथिला संस्कृति सँ प्रभावित, मुदा वास्तुकला दृष्टि सँ हिन्दु-राजपूत, मुगल आ राजस्थानी शैलीक मिश्रण अछि।'
अन्तमे, मिथिला संस्कृतिकेँ सम्मानित करबाक लेल वास्तुकला आ सांस्कृतिक प्रभावक बीच स्पष्ट भेद बुझब आवश्यक अछि । मिथिला शैलीक वास्तुकलाकेँ ऐतिहासिक रूप सँ सही परिभाषित करब आ जानकी मन्दिरक वास्तविक मिश्रित शैलीकेँ स्वीकार करब, ई सांस्कृतिक ईमानदारीक प्रतीक अछि । ##दिनेश_यादव##
Thursday, 7 May 2026
मैथिली भाषा : पृष्ठ एक, शैली अनेक (2) (Maithili Language: One Page, Many Styles)
भाषाक विद्यार्थीक लेल ‘कन्फ्युजन’, व्याकरणीय शैलीमे कून सही ?गोरखापत्रमें मैथिली भाषामे प्रकाशित पृष्ठमे बारम्बार दोहराओल गेल अक्षम्य त्रुटिसँ भाषाक विद्यार्थी लोकनिके ‘कन्फ्युजन’ उत्पन्न करैत अछि । व्याकरणीय शैलीमे कून रुप सही अछि, दोधार सेहो उत्पन्न होएत आएल अछि । २०८३ वैशाख २ गते प्रकाशित पृष्ठमे ओहे पुरनके त्रुटि सबके पुनारावृत्ति भेल अछि । एकर सुधार कोनाके होएत ? जिम्मेवार के ? गोरखापत्र किंवा पृष्ठक सम्पादक/संयोजक ? एहि पृष्ठमे पुनरार्वत्ति भेल त्रुटि सब एतेह उल्लेख अछि । पृष्ठ एक, शैली अनेकसँ मैथिली भाषा सिकैवालाके लेल समस्या सृर्जित करैत अछि । एहिमे सुधार अपरिहार्य छैक, नै त एहि पृष्ठके बन्द कराओल जाए । पृष्ठमे कतौहू ‘सँ’ के जोडल गेल अछि, कतौहू अलग कएल गेल अछि । कतौहू ‘सँगहि’ आ कतौहू ‘संगहि’, कतौहू देवनागरीमे लिखल संख्याके जोडल गेल अछि, कतौहू अलग राखल अछि (उदाहरण : दूगोट, पाँच गोट) , एहिमे कून सहि अछि ? लेखनमे एकरुपता आवश्यक छैक । गोरखापत्र मानक मानल जाएछ, जौ मानक पत्रिकामे फराक–फराक शैली होएत त विद्यार्थी आ पाठकक लेल ‘कन्फ्युजन’ मे राखब बाहेक आउर किछु नहि भए सकैत अछि । ‘डाँ.’ या ‘डा.’ ठीक ? सामान्यता अनुस्वार , विसर्ग वा अन्य चिन्ह संक्षिप्त रुपमे रखबाक प्रचलन नहि छैक । प्रकाशित पृष्ठमे अनुस्वार संगहि बिंदू सेहो राखल गेल अछि (उदाहरण: डाँ.), जे गलत अछि , होबाक चाही ‘डा.’ । एतेह स्मरणीय विषय अछि जे लेखनमे कून भाषा शैली (हिन्दी किंवा नेपाली) के प्रयोग कएल जाए, एकर निश्चितता वा निर्धारण जरुरी छैक । एकैहि पृष्ठमे दू भाषाक शैली अनुचित अछि । भाषा शैलीमे एकरुपता अनिवार्य आ अपरिहार्य होबाक चाही। गोरखापत्रके मैथिली पृष्ठमे एकैहि लेखकद्वारा दूगोट शैली हस्यास्पद थिक, एहिमे सुधार जरुरी अछि । आगन्तुक शब्द सबके ‘कोट इन कोट’ किंवा ‘इटालिक’ वा ‘बोल्ड’ करबाक चाही । एहन अवस्थामे सामान्यतय ‘कोट इन कोट’ (‘ ’) राखल जाएछ । तहिना मैथिली भाषामे ‘सब’ निर्जिवके लेल आ ‘सभ’ जीवित संज्ञाके लेल लेखल जेबाक प्रचलन भेटैत अछि । प्रस्तुत् पृष्ठमे एहि शैलीके नजरअन्दाज कएल जेल अछि । पृष्ठमे कतौहू ‘के’, कतौहू ‘केँ’ लिखल अछि, कतौहू जोडल त कतौह अलग अछि । तहिना ‘मे’ कतौहू जोडल त कतौह अलग अछि । ‘एहि’ वा ‘एही’ दू गोट शैली पृष्ठमे भेटैत अछि । ‘लोकसाहित्यक अध्ययन’ शीर्षकके आलेखमे लेखक स्वयं अपन नाम आ पोथी उल्लेख कएने छथि , एहि तरहे प्रस्तुति कतौहू नहि भेटैत अछि । एतह लेखक अपन नामके पुनरावृत्ति नहि ककें ‘ई स्तम्भकार’ किंवा ‘एहि आलेखके लेखक’ जेहन शैलीके प्रयोग करबाक चाही छल । गोरखापत्र मैथिली पृष्ठ मानक मानल जाएछ । यदि ओतहि फराक–फराक शैली प्रयोग होएत अछि, त पाठक आ विद्यार्थी भ्रमित होएत अछि । एहिमे सुधारक जिम्मेवारी सम्पादक/संयोजकके होएत अछि । एकरुपता सुनिश्चित करब, मानक व्याकरणीय नियम पालन करब, आ त्रुटि पुनरावृत्ति रोकब जरुरी अछि । मैथिली भाषाक पृष्ठमे एकरुपता अनिवार्य छैक । किछु उदाहरणीय मुख्य बिन्दु 1. संक्षिप्त रूप (अभिव्यक्ति) o मानक नियम: पहिलो अक्षर + आवश्यक ध्वनि + पूर्णविराम o उदाहरण: डॉक्टर → डा. o अनुस्वार वा अन्य चिह्न ( डाँ.) संक्षिप्त रूपमे प्रयोग गलत । 2.‘सँ’ प्रयोग o मैथिलीमे ‘सँ’ पृथक राखब मानक मानल जाएछ । o उदाहरण: सुरक्षा सँ सम्बन्धित (सही) । o जोडिके लिखल (सँ) अस्वाभाविक आ कम प्रचलित । 3. ‘संगहि’ बनाम ‘सँगहि’ o मैथिलीमे ‘संगहि’ नैसर्गिक रूप; ‘सँगहि’ नेपाली शैलीक प्रभाव । o एकरुपता लेल ‘संगहि’ प्रयोग करब उचित । 4. संख्या लेखन o देवनागरी संख्याके अलग राखब मानक: दू गोट, पाँच गोट । o जोडिके लिखल (दूगोट) अस्वाभाविक । 5. ‘सब’ बनाम ‘सभ’ o निर्जीव वस्तु लेल → सब o जीवित प्राणी लेल → सभ o उदाहरण: पुस्तक सब (सही), विद्यार्थी सभ (सही)। 6. आगन्तुक शब्द o सामान्यत: ‘कोट इन कोट’ (‘ ’) प्रयोग करब मानक। o वैकल्पिक रूपेँ इटालिक वा बोल्ड सेहो प्रयोग भ’ सकैत अछि, मुदा एकरुपता जरुरी। ✍ जिम्मेवारी गोरखापत्र मैथिली पृष्ठ मानक मानल जाएछ। यदि ओतहि फराक–फराक शैली प्रयोग होएत अछि, त पाठक आ विद्यार्थी भ्रमित होएत अछि ।
सुधार जिम्मेवारी:सम्पादक/संयोजकके होएत अछि ।
उपाय:एकरुपता सुनिश्चित करब, मानक व्याकरणीय नियम पालन करब, आ त्रुटि पुनरावृत्ति रोकब ।
Sunday, 11 January 2026
मर्यादा र गोपनीयता
"एक-अर्कालाई एकान्तमा सच्याउनुहोस्, तर सार्वजनिक रूपमा एक-अर्काको बचाउ गर्नुहोस् ।"यो चित्रले स्वस्थ र बलियो सम्बन्धको एउटा निकै महत्त्वपूर्ण आधारलाई प्रस्तुत गरेको छ । यसको मुख्य सन्देश 'एकता र आपसी सम्मान' हो । चित्रको मुख्य अर्थ: "मर्यादा र गोपनीयता" अर्थात् "एक-अर्कालाई एकान्तमा सच्याउनुहोस्, तर सार्वजनिक रूपमा एक-अर्काको बचाउ गर्नुहोस्।"
यसको अर्थ हो—हामी कोही पनि पूर्ण हुँदैनौँ, गल्ती सबैबाट हुन्छ। तर त्यो गल्तीलाई कसरी र कहाँ औँल्याइन्छ भन्ने कुराले सम्बन्धको आयु तय गर्छ ।
एकान्तमा सच्याउनु भनेको एक-अर्काप्रतिको इमानदारी र सुधार गर्ने चाहनालाई प्रदर्शन गर्नु हो । त्यस्तै सार्वजनिक रूपमा बचाउ गर्नु भनेको अरूको अगाडि आफ्नो साथी वा पार्टनरको मान-मर्यादा जोगाउने "एकजुटता" (Unity) लाई प्रर्दशन गर्नु हो ।
१.कुर्सी नै किन ?
यो चित्रमा कुर्सी को प्रयोग गर्नुको पछाडि निकै गहिरो र प्रतीकात्मक (Symbolic) कारणहरू छन् । केवल मानिसको चित्र राख्नु भन्दा कुर्सी राख्नुले सन्देशलाई अझ व्यापक बनाउँछ:
१.१ संवाद र छलफलको प्रतिक (Dialogue and Conversation):- कुर्सीहरू प्रायः संवादका लागि प्रयोग गरिन्छन्। दुईवटा कुर्सी एक-अर्काको आमने-सामने हुनुको अर्थ हो—"यहाँ कुराकानी भइरहेको छ।" यसले "एकान्तमा सच्याउने" (Correcting in private) प्रक्रियालाई झल्काउँछ, जहाँ दुई व्यक्ति बसेर शान्तपूर्वक छलफल गर्छन् ।
१.२ पद, मर्यादा र स्थान (Position & Dignity):-
समाजमा कुर्सीलाई 'पद' वा 'मर्यादा' को प्रतीक मानिन्छ।
जब हामी अरूको अगाडि आफ्नो साथीको रक्षा गर्छौँ, हामी वास्तवमा उसको "कुर्सी" (अर्थात् उसको इज्जत र स्थान) जोगाइरहेका हुन्छौं । कुर्सी खाली हुनुको अर्थ यो पनि हुन सक्छ कि यो कुनै खास व्यक्तिको लागि मात्र नभई, जो कोही (श्रीमान-श्रीमती, साथी, वा सहकर्मी) का लागि पनि लागू हुन्छ ।
१.३ समानता (Equality):-
चित्रमा दुवै कुर्सीहरू एउटै आकार र उचाइका छन् । यसले सम्बन्धमा समानता देखाउँछ। एक-अर्कालाई सच्याउने हक दुवैलाई छ र एक-अर्काको सम्मान जोगाउने जिम्मेवारी पनि दुवैको बराबर छ भन्ने यसले बुझाउँछ ।
१.४ स्थिरता र आराम (Stability & Comfort)-
कुर्सीले स्थिरताको प्रतिनिधित्व गर्छ। एउटा बलियो सम्बन्ध त्यही हो जहाँ व्यक्तिले आफू सुरक्षित र स्थिर महसुस गर्छ। "निजीमा सच्याउने र सार्वजनिकमा बचाउने" व्यवहारले सम्बन्धलाई त्यही स्थिरता (Stability) प्रदान गर्छ।
१.५'अदृश्य' उपस्थिति (Invisible Presence)-
कहिलेकाहीँ वस्तुहरू (जस्तै कुर्सी) मात्र देखाउँदा सन्देश बढी प्रभावशाली हुन्छ। यसले दर्शकलाई आफैँ कल्पना गर्न दिन्छ। ती कुर्सीहरूमा जो पनि हुन सक्छ—तपाईँ र तपाईँको साथी, वा तपाईँ र तपाईँको जीवनसाथी। यसले यो नियमलाई "विश्वव्यापी नियम" को रूपमा प्रस्तुत गर्दछ।
संक्षेपमा भन्नुपर्दा: यी कुर्सीहरूले "सुरक्षित ठाउँ" (Safe Space) लाई जनाउँछन्। यस्तो ठाउँ जहाँ हामी आफ्ना कमजोरीहरूमाथि छलफल गर्न सक्छौँ (निजीमा) र जहाँबाट बाहिर निस्कँदा हामी एक ढिक्का भएर निस्कन्छौँ (सार्वजनिकमा)।
२.कुर्सीको सिद्धान्त :
यो विचार वा धारणा कुनै एउटै विशिष्ट व्यक्ति वा एउटै मात्र पुस्तकबाट आएको भन्दा पनि यो सामाजिक मनोविज्ञान (Social Psychology) र नेतृत्व विकास (Leadership) को क्षेत्रमा एउटा साझा सिद्धान्तको रूपमा प्रचलित छ । यद्यपि, यसलाई विभिन्न क्षेत्रमा फरक-फरक व्यक्ति र सन्दर्भसँग जोडेर हेर्ने गरिन्छ:
२.१ नेतृत्वको सिद्धान्त (Leadership Principle):- व्यवस्थापनको क्षेत्रमा यो धारणालाई "Praise in Public, Correct in Private" (सार्वजनिक रूपमा प्रशंसा गर्नुहोस्, एकान्तमा सच्याउनुहोस्) भनिन्छ । यो भनाइ प्रायः भिन्स लोम्बार्डी (Vince Lombardi) सँग जोडिन्छ, जो एक प्रसिद्ध अमेरिकी फुटबल कोच थिए। उनले आफ्ना खेलाडीहरूको मनोबल उच्च राख्न यो नियम पालना गर्थे । आधुनिक व्यवस्थापनमा केन ब्लान्चर्ड (Ken Blanchard) ले आफ्नो प्रसिद्ध पुस्तक "The One Minute Manager" मा पनि यस्तै खालको पृष्ठपोषण (Feedback) दिने तरिकाबारे चर्चा गरेका छन् ।
२.२ कुटनीतिक र सैन्य सन्दर्भ (Diplomatic & Military Context):- सेना र कुटनीतिमा एउटा पुरानो मान्यता छ: "हाम्रो मतभेद घरभित्रै सुल्झाउनुपर्छ, शत्रु वा बाहिरी संसारको अगाडि हामी सधैँ एक हुनुपर्छ।" यो धारणा धेरै देशका सैन्य आचारसंहिता (Code of Conduct) को हिस्सा बनेको छ।
२.३ धार्मिक र सांस्कृतिक स्रोत:-
धेरै संस्कृति र धर्महरूमा पनि यसको जरा भेटिन्छ:
-इस्लाम धर्म: यसमा 'नसिहा' (परामर्श) को अवधारणा छ, जसमा अरूलाई सच्याउँदा उसको इज्जत नजाओस् भनेर एकान्तमा सम्झाउनु पर्ने कुरामा जोड दिइन्छ । बौद्ध दर्शन: यसले "सत्य र प्रिय वचन" को कुरा गर्छ, जसले अरूको मानमर्दन नगरी सुधार ल्याउन सिकाउँछ।
२.४ डिजिटल आर्ट र आधुनिक भनाइ (Internet/Modern Quote):-
यो विशिष्ट चित्र र भनाइ भने हालैका वर्षहरूमा इन्टरनेट र सामाजिक सञ्जाल (जस्तै Pinterest वा Instagram) मा निकै लोकप्रिय भएको हो। यसलाई कसैले 'Relationship Goals' वा 'True Loyalty' को रूपमा साझा गर्ने गर्छन्।
यसको कुनै एक निश्चित लेखक नभए पनि, यो "Loyalty" (बफादारी) को विश्वव्यापी सिद्धान्त हो ।
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