Wednesday, 24 January 2018

‘मातृभाषा’ के ‘मातृशक्ति’ कहनाए कट्टरबाद थिक


  • दिनेश यादव (DINESH YADAV)
‘मातृभाषा’ आ ‘मातृशक्ति’ दुई पृथ्थक बात होएत छैक । ‘मातृभाषा’ (माय केँ बोली) कोनो भी व्यक्ति केँ लेल संचार केँ प्रथम माध्यम होइत छैक । ‘मातृशक्ति’ (नारी आ देवीभक्ति सँ जुडल) महिमा मण्डन आ स्तुतिगान सँ सम्बन्धित छैक । अंग्रेजी मेँ ‘मातृभाषा’ केँ ‘मदर टङ’ आ ‘मातृशक्ति’ केँ ‘मेटरनल पावर’ के रुप मेँ परिभाषा कयल छैक । हमरा बिचार सँ एतह ‘मदर’ आ ‘मेटरनल’ के अर्थ फरिछाबे पडत से नय बुझाएत अछि । हाँ, ई कही दि जे एकटा माय (मदर) सँ जुडल अछि दोसर मामा (मेटरनल अंकल) सँ जुडल बात छैक । मिथिला मेँ
 ‘माय’ आ ‘मामा’ फरक बात छैक । एशिया केँ विभिन्न भाषा साहित्य मेँ (खास कँके नेपाली, मैथिली, भोजपुरी, हिन्दी लगायत ) ‘मातृशक्ति’ केँ प्रयोग काली/दुर्गा, मातृभूमि आ नारीशक्ति केँ रुप मेँ कएल छैक । लेकिन ‘मातृभाषा’ के ‘मातृशक्ति’ के रुप मेँ कतौह प्रस्तुति नए देखबा मेँ आएल अछि । जौ कियो साहित्यकार ‘मातृभाषा’ के ‘मातृशक्ति’ केँ रुप मेँ व्याख्या करैत छथि, त ओ बलजोरी मात्र कए रहल अछि, बलजोरी मेँ सभकुछ माफ होएत छैक ।

कोनो अमुक भाषा केँ ‘मातृशक्ति’ कहनिहार सभ ‘अतिबादी’ या ‘पृथ्थकतावादी’ मेँ सँ एक भँ सकैत अछि । भाषा मेँ अतिबादी केँ अर्थ– हम जे कहैत छि सेहा होयत आ हम जेना बजैत छी सेहा बजु आ हम जे कहब सेहा सुनु, हम जे प्रयोग करैत छि सेहा उपयोग करु......। एही कोटी मेँ रहनिहार सभ भाषा केँ नाम पर ठिकेदारी, सिण्डिकेट आ दुकानदारी मेँ संलग्न रहैत छैक । तहिना एही कोटी मेँ रहनिहार सभ कोनो अमुक भाषा (जकर प्रयोग ककेँ अपन रोजीरोटी आ गास, बास आ कपासक जोरजाम मे लागल छथि) के ‘कैपिटलिज्म’ के रुप मेँ विस्तारवादी आ साम्राज्यवादी सोच रखैत छथि । किएक त हुनका लोकनि के अमुक भाषा केँ भजन, किर्तन आ स्तुतिगान करबाक लेल टाका भेटैत छहनि । हुनका सभ बाहेक आन केँ एही दिस विल्कुल ध्यान नए रहैत छैक । तेहिना भाषा केँ नाम पर ‘पृथ्थकतावादी’ सोच रखनिहार सभ एक भूगोल, एक क्षेत्र, एक समुदाय, एक वर्ग आ एक कलस्टर केँ तोडबाक फिराक मेँ रहैत छथि ।(उदाहरण के लेल कि मिथिला राज भँजेतैह त मधेस के
रातारात काया पलट भँ जाएत या मैथिली भाषा केँ सभ गोटा स्वीकारी लेताह त, रोजगारी आ विकास उत्कर्ष मेँ पहुँच जेतैह ? दुई अवस्था मेँ कोनो भूगोल मेँ आ समुदाय मेँ खास फरक नए पडत । हाँ किछु मुठीभर लोक सभ केँ चाँदी कटाई के जरिया जरुर बनि सकैत छैक) । आजुके ई ‘ग्लोबल भिलेज’ क युग मेँ मात्र एकैहटा अमुक भाषा केँ प्रचार करबाक अर्थ, आन भाषा केँ अस्तित्व अस्विकार केनाय अछि । ओहूना नेपाल एकटा बहुभाषिक देश अए, एतह एकेटाह भाषा आ संस्कृति लागू केनाए के मतलब आन केँ वहिष्कार केनाए बराबर अछि । 

नेपाल मेँ सभ केँ अपन–अपन मातृभाषा केँ रक्षा करबाक लेल अग्रसर होनाई सकारात्मक बात छैक, ई एकटा अधिकार सेहो अछि । मुदा दीर्घकालिन सोच के गिरबी रखैत कोनो एकैहटा भाषा केँ नाम पर समाज केँ विभाजित आ ध्रुविकृत केनाए दुर्भाग्य आ दुखद बात थिक । भाषा त कोनो एकटा समान भुगोल आ संस्कृति के जोडबाक माध्यम होबाक चाहीँ, तोडबाक बात त शासक आ शोषक करैत छैक । जौ कियो अपने केँ एहीँ कोटी केँ लोक मानैत छि तँ हमर ई बात हुनका लोकनि केँ लेल नए छैक । नेपाल केँ सन्दर्भ मेँ पहाड मेँ ‘नेपाली’ आ मधेस मेँ ‘हिन्दी’ सम्पर्क के भाषा छैक आ रहत (नोटः हमर माय केँ बोली मैथिली रहितौह, हम समग्र समूदाय केँ जोडबाक लेल छाती पर पाथर राखि केँ ई बात लिख रहल छि) । एकर अर्थ ई किन्नौह नय लगाबी जे एही सँ अमुक भातृभाषा(मैथिली,भोजपुरी,मगही,थारु...) केँ अस्तित्व समाप्त भँ जेतैह । जे सभ ई बात कहैत छथि ओ सभटा मातृभाषा प्रेमी नए, मातृभाषा केँ छनछनी कमेबाक फिराक बला सभ छथि । ओहुना शासक सभ कहियो भाषा केँ नाम पर त कहियो संस्कृति केँ नाम पर एकिकृत आ संगठित समाज केँ विभाजित करबाक सोच मेँ हमेशा रहैत छैक । ई बात बुझबाक जरुरी अछि ।

पुनः ‘मातृशक्ति’ तरफ ल चलैत छि । भाषा जौ ‘मातृशक्ति’ रहितिए त मिथिला क्षेत्र मेँ दहेज, डायन, विधवा, एकलनारी आ बेटी केँ नाम पर एतेक बेसी ‘मातृ’ सभ के उत्पीडन आ विभद केँ सामना नए कर पडतिए । भाषा जौ ‘मातृशक्ति’ रहितिए त मिथिलानगरी मेँ पुरनका सत्ता केँ किछु मतियार सभ ओए ‘सत्ताजाति’ के ‘सत्तापुरुष’ जकाँ जबरजस्ती अपन संस्कृति आ पहिरन केँ  ‘मिथिला के कथित शान’ केँ रुप मेँ सभ केँ माथ पर भारी(पाग) नए लाधि देतिअए । जौ भाषा ‘मातृशक्ति’ रहितिअए त कुमरबृज भान, अल्हारुदल,गोपीचन्द,सलेह नाच, कठपुतली नाच,डम्फा बसुली नाच, खदन चिडइया नाच, लोकगाथा, लोकनृत्य.......सभ नई बिला जाइतिए । मातृशक्ति केँ ई अर्थ किन्नौह नए जे, एकैहटा जाति विशेष केँ पहिरन सभ के माथा पर लगा दिअउनि, एकैहटा जाति विशेषक पर्व/तौहार केँ समग्र मिथिला क्षेत्र के नरनारी के मौलिक पर्व केँ रुप मेँ प्रचार कएदिअउनि, होली के नाम पर आयातित संस्कृति(महामुर्ख सम्मेलन) के अपना लिए.....।


अंग्रेजी साहित्य में सेहोँ भाषा केँ रुप मेँ सोह्रेआना ‘मातृ शक्ति’ कँ प्रयोग नए कएल गेल छैक । हाँ, कतौह–कतौह भाषा सँ मिलए बला दुइटा शब्द (सिन्क्रोनिक आ डायक्रोनिक) के प्रयोग कयल गेल भेटैत छैक । ओहो भाषिक विश्लेषण के रुप मेँ मात्र । ‘सिन्क्रोनिक एप्रोच’ मेँ कोनो एकटा भाषा के इतिहास केँ चर्चा नए कए वर्तमान अवस्था केँ जिक्र करबाक बात छैन । एही में वर्तमान समय में कोनो भाषा कें विशिष्ट विन्दू के चर्चा होबाक बात उल्लेख छैक । ‘डाइक्रोनिक एप्रोच’ में ऐतिहासिक भाषिक पर जोड दैति छैक । एही में विभिन्न कालखण्ड मेँ परिवर्तित भाषा केँ केन्द्र मेँ राखल गेल छैक । मुदा ‘मातृभाषा’ के ‘मातृशक्ति’ के रुप मेँ स्पष्ट रुप सँ उल्लेख केल कतौह नए भेटैत छैक । एहीँ विषय केँ हम एकटा अनुशन्धान केँ रुप मेँ लँ रहल छि । जौँ किनको पास एही विषय मेँ थप जानकारी हुए त अबगत कराबी, सदैब अभारी रहब । अखन हम ऐतबे कहब ‘मातृभाषा’ विल्कुले ‘मातृशक्ति’ नए थिक । भाषा केँ कट्टरपन्थी सभ केँ द्वारा अविष्कार कएल गेल ई विश्लेषण थिक ।          

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