Wednesday, 15 April 2020

आइगक तरसमें हमर चुल्हा

  • दिनेश यादव 
बहुत दिनसँ एकचुल्हिया ठण्डा छहि,
Dinesh Yadav
आँच पजारैक हिम्मत नहि छहि,
धुवाँ–धुवाँ हमर मोन छहि,
आइगक तरसमें हमर चुल्हा छहि ।१।

दुनू हातमे बन्हईन लागल छहि,
दिनानूदिन गिठ्ठा कसा रहल छहि,
लकडाउनक जुनासँ पेट सेहो बान्हल छहि,
आइगक तरसमें हमर चुल्हा छहि ।२।

हाडि–तसलाक पेनी बहुत दिनसँ उज्जर छहि,
करिया कहियाँ बनत मालूम नहि छहि,
चुल्हीघरक सलाईक काँठि सेहो स्तब्ध छहि,
आइगक तरसमे हमर चुल्हा छहि ।३।

टिनहा बाटिक आबाज सुननाई दूलर्भ छहि,
भन्सिया–म्याँ लग बौआबुच्ची नहि देखाई छहि,
सभटा एक–दोसर दिसि टुकूर–टुकूर ताकि रहल छहि,
आइगक तरसमें हमर चुल्हा छहि ।४।

समाजमें एकभगहाँ लोक बढी गेल छहि,
तईँ गरीब–निसहाय अछाह काटि रहल छहि,
सरकारी सहयोगमे पहूँच वलाक गरदमगोल छहि,
आइगक तरसमे हमर चुल्हा छहि ।५।

मलिकबाक फूलबारीसँ बुच्ची जरनाकाँठि अनैत छहि,
पुरनिक माइटसँ उत्साहित भँ चुल्हिघर निपैत छहि,
आई कहुँ चुल्ही पजरत से आस लगौने बैसल छहि, 
आइगक तरसमे हमर चुल्हा छहि ।६। 

(2077-01-03, Shivnagar, Kalanki Kathmandu)

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