भाषाक विद्यार्थीक लेल ‘कन्फ्युजन’, व्याकरणीय शैलीमे कून सही ?
गोरखापत्रमें मैथिली भाषामे प्रकाशित पृष्ठमे बारम्बार दोहराओल गेल अक्षम्य त्रुटिसँ भाषाक विद्यार्थी लोकनिके ‘कन्फ्युजन’ उत्पन्न करैत अछि । व्याकरणीय शैलीमे कून रुप सही अछि, दोधार सेहो उत्पन्न होएत आएल अछि । २०८३ वैशाख २ गते प्रकाशित पृष्ठमे ओहे पुरनके त्रुटि सबके पुनारावृत्ति भेल अछि । एकर सुधार कोनाके होएत ? जिम्मेवार के ? गोरखापत्र किंवा पृष्ठक सम्पादक/संयोजक ?
एहि पृष्ठमे पुनरार्वत्ति भेल त्रुटि सब एतेह उल्लेख अछि । पृष्ठ एक, शैली अनेकसँ मैथिली भाषा सिकैवालाके लेल समस्या सृर्जित करैत अछि । एहिमे सुधार अपरिहार्य छैक, नै त एहि पृष्ठके बन्द कराओल जाए । पृष्ठमे कतौहू ‘सँ’ के जोडल गेल अछि, कतौहू अलग कएल गेल अछि । कतौहू ‘सँगहि’ आ कतौहू ‘संगहि’, कतौहू देवनागरीमे लिखल संख्याके जोडल गेल अछि, कतौहू अलग राखल अछि (उदाहरण : दूगोट, पाँच गोट) , एहिमे कून सहि अछि ? लेखनमे एकरुपता आवश्यक छैक । गोरखापत्र मानक मानल जाएछ, जौ मानक पत्रिकामे फराक–फराक शैली होएत त विद्यार्थी आ पाठकक लेल ‘कन्फ्युजन’ मे राखब बाहेक आउर किछु नहि भए सकैत अछि । ‘डाँ.’ या ‘डा.’ ठीक ? सामान्यता अनुस्वार , विसर्ग वा अन्य चिन्ह संक्षिप्त रुपमे रखबाक प्रचलन नहि छैक । प्रकाशित पृष्ठमे अनुस्वार संगहि बिंदू सेहो राखल गेल अछि (उदाहरण: डाँ.), जे गलत अछि , होबाक चाही ‘डा.’ । एतेह स्मरणीय विषय अछि जे लेखनमे कून भाषा शैली (हिन्दी किंवा नेपाली) के प्रयोग कएल जाए, एकर निश्चितता वा निर्धारण जरुरी छैक । एकैहि पृष्ठमे दू भाषाक शैली अनुचित अछि । भाषा शैलीमे एकरुपता अनिवार्य आ अपरिहार्य होबाक चाही।
गोरखापत्रके मैथिली पृष्ठमे एकैहि लेखकद्वारा दूगोट शैली हस्यास्पद थिक, एहिमे सुधार जरुरी अछि । आगन्तुक शब्द सबके ‘कोट इन कोट’ किंवा ‘इटालिक’ वा ‘बोल्ड’ करबाक चाही । एहन अवस्थामे सामान्यतय ‘कोट इन कोट’ (‘ ’) राखल जाएछ । तहिना मैथिली भाषामे ‘सब’ निर्जिवके लेल आ ‘सभ’ जीवित संज्ञाके लेल लेखल जेबाक प्रचलन भेटैत अछि । प्रस्तुत् पृष्ठमे एहि शैलीके नजरअन्दाज कएल जेल अछि ।
पृष्ठमे कतौहू ‘के’, कतौहू ‘केँ’ लिखल अछि, कतौहू जोडल त कतौह अलग अछि । तहिना ‘मे’ कतौहू जोडल त कतौह अलग अछि । ‘एहि’ वा ‘एही’ दू गोट शैली पृष्ठमे भेटैत अछि । ‘लोकसाहित्यक अध्ययन’ शीर्षकके आलेखमे लेखक स्वयं अपन नाम आ पोथी उल्लेख कएने छथि , एहि तरहे प्रस्तुति कतौहू नहि भेटैत अछि । एतह लेखक अपन नामके पुनरावृत्ति नहि ककें ‘ई स्तम्भकार’ किंवा ‘एहि आलेखके लेखक’ जेहन शैलीके प्रयोग करबाक चाही छल ।
गोरखापत्र मैथिली पृष्ठ मानक मानल जाएछ । यदि ओतहि फराक–फराक शैली प्रयोग होएत अछि, त पाठक आ विद्यार्थी भ्रमित होएत अछि । एहिमे सुधारक जिम्मेवारी सम्पादक/संयोजकके होएत अछि । एकरुपता सुनिश्चित करब, मानक व्याकरणीय नियम पालन करब, आ त्रुटि पुनरावृत्ति रोकब जरुरी अछि । मैथिली भाषाक पृष्ठमे एकरुपता अनिवार्य छैक ।
किछु उदाहरणीय मुख्य बिन्दु
1.
संक्षिप्त रूप (अभिव्यक्ति)
o मानक नियम: पहिलो अक्षर + आवश्यक ध्वनि + पूर्णविराम
o उदाहरण: डॉक्टर → डा.
o अनुस्वार वा अन्य चिह्न ( डाँ.) संक्षिप्त रूपमे प्रयोग गलत ।
2.
‘सँ’ प्रयोग
o मैथिलीमे ‘सँ’ पृथक राखब मानक मानल जाएछ ।
o उदाहरण: सुरक्षा सँ सम्बन्धित (सही) ।
o जोडिके लिखल (सँ) अस्वाभाविक आ कम प्रचलित ।
3.
‘संगहि’ बनाम ‘सँगहि’
o मैथिलीमे ‘संगहि’ नैसर्गिक रूप; ‘सँगहि’ नेपाली शैलीक प्रभाव ।
o एकरुपता लेल ‘संगहि’ प्रयोग करब उचित ।
4.
संख्या लेखन
o देवनागरी संख्याके अलग राखब मानक: दू गोट, पाँच गोट ।
o जोडिके लिखल (दूगोट) अस्वाभाविक ।
5.
‘सब’ बनाम ‘सभ’
o निर्जीव वस्तु लेल → सब
o जीवित प्राणी लेल → सभ
o उदाहरण: पुस्तक सब (सही), विद्यार्थी सभ (सही)।
6. आगन्तुक शब्द
o सामान्यत: ‘कोट इन कोट’ (‘ ’) प्रयोग करब मानक।
o वैकल्पिक रूपेँ इटालिक वा बोल्ड सेहो प्रयोग भ’ सकैत अछि, मुदा एकरुपता जरुरी।
✍ जिम्मेवारी
गोरखापत्र मैथिली पृष्ठ मानक मानल जाएछ। यदि ओतहि फराक–फराक शैली प्रयोग होएत अछि, त पाठक आ विद्यार्थी भ्रमित होएत अछि ।
सुधार जिम्मेवारी:
सम्पादक/संयोजकके होएत अछि ।
उपाय:
एकरुपता सुनिश्चित करब, मानक व्याकरणीय नियम पालन करब, आ त्रुटि पुनरावृत्ति रोकब ।