मैथिली कविता
- दिनेश यादव
बजार प्रशंसाकें छहि,
मोल ओतेह प्रतिभाक नहि,
झुठफूँसकें खेती बन्द करि
चलूँ आजू धनकें बात करि
बताऊ अहाँक मित कई गोट अछि ? ।१।
चारु दिशि पसरल सिन्डिकेट छहि,
स्वतन्त्र लोकक पुछारी नहि,
भाट÷पमरियाक शैली बन्द करि,
चलूँ आजू धनकें बात करि,
बताऊ अहाँक मित कई गोट अछि ? ।२।
आत्मकेन्द्रित लोक मुठिभर छहि,
प्रभाव ओकर कम नहि,
बन्दूक भेटल दरोगाबाजी बन्द करि,
चलूँ आजू धनकें बात करी,
बताऊ अहाँक मित कई गोट अछि ?।३।
फेसबुकियासँ घेरल लोक बेसी छहि,
दियाद÷सहोदरासँ नजदिकि नहि,
लोक–भावनाक बनियाँगिरी बन्द करि,
चलूँ आजू धनकें बात करि,
बताऊ अहाँक मितकई गोट अछि ?।४।
देवतापित्तर अपनेटाकें मानैत छहि,
दोसरकें भजबइवला स्रोतसँ बेसी नहि,
दुनू हातमेँ लडुवला बात बन्द करि,
चलूँ आजू धनकें बात करि,
बताऊ अहाँक मित कई गोट अछि ? ।५।
अन्हरियाक पात्र बनल छहि,
इजोतक संभावना दूर–दूर तक नहि,
भ्रमजाल फेकनाई बन्द करि,
चलूँ आजू धनकें बात करि,
बताऊ अहाँक मित कई गोट अछि ? ।६।
(२०७७ वैशाख ३ गते । शिवनगर, कलंकी, काठमाडौं ।)

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