Monday, 17 October 2016

आखिर जाति समाज से क्यों नहीं जाती?

मौजूदा दौर का जन्म आधारित जातिवाद और सामाजिक भेदभाव देश के माथे पर कलंक के समान और हमारी प्राचीन संस्कृति की अवधारणाओं के विपरीत है। कुछ लोग कहेंगे कि यह जातिवाद प्रणाली हमारे प्राचीन ग्रंथकारों की ही देन है पर यह सही नहीं है। रोहित वेमूला व इसके बाद के दूसरे प्रकरणों से भारतीय समाज में जातिवाद की समस्या एक बार फिर खुल कर सामने आई है। इस मसले पर निर्मम राजनीतिक शोरगुल से परे हट कर गौर करें तो साफ संकेत मिलते हैं कि भारत में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है। बहुत से गैर पाश्चात्यवादी भारतीय पाश्चात्य देशों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा रचे 'अत्याचार-साहित्यÓ को मानने को तैयार नहीं होंगे।


गहराई से अध्ययन करने पर आप पाएंगे कि सभ्य विश्व में अगर कोई अल्पसंख्यक समुदाय सबसे ज्यादा दबा और पीडि़त है तो वह अफ्रीकी -अमरीकी और यूरोपीय-रोमा है। पाश्चात्य चिंतकों, मीडिया या एनजीओ के निष्कर्षों को नजरंदाज कर भारतीय अपनी विफलताओं पर पर्दा नहीं डाल सकते। डॉ. बी.आर अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में लिखा है- शूद्र कौन थे? भारतीय ग्रंथों और पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने सिद्ध किया कि प्राचीन भारत में शक्तिशाली शूद्र शासक भी हुए हैं।


जन्म आधारित जातिवाद और भेदभाव व दमन संबंधी लेख या इसका उल्लेख काफी बाद में इन ग्रंथों की पाठ्य सामग्री में परिवर्तन कर शामिल किया गया। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने गुणों और कर्मों के आधार पर चार वर्ण बताए हैं, यहां जन्म का उल्लेख नहीं है। प्राचीन भारत में ऋषि- मुनियों को सर्वाधिक उच्च स्तर प्राप्त था। रामायण रचयिता वाल्मिकी शूद्र की और महाभारत के रचनाकार वेदव्यास एक मछुआरन की संतान थे। जबाली उपनिषद् के रचनाकार सत्यकाम जबाली अविवाहित शूद्र मां की संतान थे और उनके पिता के बारे में कोई नहीं जानता। वाल्मिकी रामायण के अनुसार, जबाली भगवान राम के काल में अयोध्या के राजदरबार में आधिकारिक पुजारी और परामर्शदाता थे। ये सब अपने कर्मों से ब्राह्मण बने।


मैक गिल यूनिवर्सिटी में तुलनात्मक धर्म के प्रोफेसर अरविंद शर्मा कहते हैं-जातिगत रूढि़वादिता और भेदभाव स्मृति काल (जीसस क्राइस्ट के जन्म से लेकर 1200 ईस्वी तक) की देन है। बाद में इसे मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने चुनौती दी। इस आंदोलन का नेतृत्व बहुत से गैर उच्चवर्णीय संतों ने किया था। इस दौरान काकतिय जैसे कई शक्तिशाली साम्राज्यों का विलय किया गया, जिन पर शूद्रों का राज था। इसके बाद अंग्रेजों के राज में एक बार फिर जन्म आधारित जातिवाद ने सिर उठाया, जो आज जस का तस है।


अनुवांशिकी शोध पर आधारित वैज्ञानिक प्रमाण भी पुष्टि करते हैं कि प्राचीन काल में जन्म आधारित जातिवाद नहीं था। 'जातिगत शुद्धताÓ बनाए रखने के लिए अंतरजातीय विवाह पर प्रतिबंध लगाना इस जन्म आधारित जातिवाद की मूल पहचान बन गया। अमरीकन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स, नेचर एंड नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस जर्नल जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित विभिन्न वैज्ञानिक पत्रों के अनुसार हजारों वर्ष तक भारत में विभिन्न आनुवांशिक समूहों के बीच अन्त:-प्रजनन आम तौर पर प्रचलित था। यह तो नए युग में सन् 0 से सन् 400 के बीच रुका है ।


(दिलचस्प यह है कि यह अरविंद शर्मा के सुझाए गए उस काल से मिलता है, जब देश के इतिहास में पहली बार जाति व्यवस्था लागू हुई।) यह व्याख्या काफी स्पष्ट लगती है। वर्तमान जन्म आधारित जाति व्यवस्था-जाति और वर्ण का इकतरफा विलय (गुण और कर्म पर आधारित व्यक्तित्व एवं स्वभाव) का उदय 1600-2000 साल पहले हुआ था। इससे पहले यह व्यवस्था अस्तित्व में नहीं थी। भारतीय संविधान के उद्देश्य बने हैं पर आज आरक्षण जैसी सरकारी नीतियों ने फर्क पैदा कर दिया है। यह ठीक नहीं। दलित शिक्षाविद चंद्रभान प्रसाद के कार्यों से पता चलता है कि 1991 के बाद आर्थिक सुधार कार्यक्रमों ने इस मसले को कुछ हद तक हल किया है। 2006-2007 की अखिल भारतीय एमएसएमई जनगणना के अनुसार, देश के कुल उद्यमों का 14 प्रतिशत स्वामित्व अनुसूचित जाति-जनजाति के पास है।


यह आंकड़ा संभवत: आज और बढ़ गया है। बहुत से लोग कहते हैं कि आरक्षण नीति से उच्च जाति के गरीबों ग्रामीण भूमिहीनों की उपेक्षा हुई है। परन्तु इसका कारण पर्याप्त शिक्षा सुविधाओं और नौकरियों का अभाव है। निस्संदेह 1991 के बाद के सुधारों के चलते स्थितियों में परिवर्तन आया है लेकिन इतना पर्याप्त नहीं है। बहुत से लोग यह दलील देते हैं कि सुधारवादी नीतियों से न केवल दलितों बल्कि ग्रामीण और शहरी उच्च जाति के गरीबों का भी भला होगा।


इसलिए, जैसा कि चंद्रभान प्रसाद ने बार-बार दोहराया है कि अन्य सरकारी नीतियों के मुकाबले ज्यादा आर्थिक सुधार और शहरीकरण जातिगत भेदभाव और गरीबी को आम तौर पर उचित ठहराते रहेंगे। हालांकि आर्थिक सुधारों के प्रभाव की परवाह किए बगैर सभी भारतीयों को जातिगत भेदभाव का विरोध करना चाहिए, हमारे देश की आत्मा के लिए ऐसा किया जाना चाहिए।
Source : Patrika, IST



No comments:

Post a Comment