Thursday, 21 February 2013

कमजोर बनते मधेश मुद्दे


मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा का उदय भी मुलधार के प्रमुख तीन राजनीतिक दलो के साथ अपना ‘बार्गेनिङ प्वाइन्ट’ बढाने के लिए ही हुआ है, उसके विगत के अडान को देखा जाय तो यही पुष्टि होती है । तभी तो उस के नेताओं के द्वारा सार्वजनिक होते आ रहे अडाने आजतक सम्बोधन नही हो पायी है । मोर्चामे समाहित मधेशकेन्द्रित दल के नेताओं मे भी ‘हम बडे तो हम बडे’ और ‘हम प्रभावशाली तो हम शक्तिशाली’ बनने की होडबाजी शुरु है । 
दिनेश यादव 
नेपाल मे घनिभूत रुप से मधेश के मुद्दा उठा आज बीसौ वार्षिकी मनाने की स्थिति मे पहूँचा है । नेपाल सद्भावना पार्टी के स्थापना के साथ गजेन्द्रबाबु द्वारा उठान किया गया यह मुद्दा अभियान का रुप धारण कर चुका है । पिछले कुछ बर्षो से उस अभियान के नेतृत्व मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के कांध पर आ अटका है । इस में विभाजित होकर बना सद्भावना पार्टी के विभिन्न गुट और तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के दो गुटों का भी अप्रत्यक्ष संलग्नता÷सक्रियता रही हैं । फोरम नेपाल के नेतृत्व मे वि.स. द्दण्टघरटद्ध  में सफल हुआ मधेश जनविद्रोह के बाद इन गुटों का सक्रियता अपेक्षाकृत ज्यादा ही बढा । परन्तु मधेश मुद्दा के सार्थक सम्बोधन आजतक भी नही हो पाई है । इस अवधि मे मधेश के राजनीति ने ढेर सारे उताड–चढाव का समाना किया , आज भी फरक शैली मे यह जारी हैं । कथित कुछ मधेशी नेताओं के ‘ओजपूर्ण’ और ‘लुभावने’ भाषण मे मधेश मुद्दा सीमित होने के कारण स्थिति सुधारोन्मुख होते हुए भी ठीक से गति नही पकड पाई है । फलस्वरुप मधेश केन्द्रित राजनीतिक पार्टीयाँ अपने लक्ष्य और उद्देश्य के प्राप्ति के लिए कोशो मिल दुर देखाई दे रहा है , अपने मुद्दा से भटक जाने की नियती जो बार बार वह दोहरा रहा है । मुद्दा को स्थापित कराने के लिए वह अभियान या मोर्चाबन्दी तो करती है । परन्तु सत्ता चक्रब्यु को तोड नपाने के कारण मोर्चा या अभियान प्रत्युत्पादक बनता आ चला रहा है । इस से मधेशीओं के ताकत सिर्फ कमजोर ही नही हुआ है, उसे निराशा और कुन्ठित भी बनाया है । अब तो मधेश मुद्दा के नाम लेते ही जन–जन मे आक्रोश दिखाई देने लगी है । तमाम मधेशीयों को एकता के सूत्र मे बन्ध नपाने के कारण मधेश मुद्दा के खिचडी यहाँ वर्षो से पकती आ रही है । उधर इसी मुद्दा को पकड कर कथित मधेशी नेतागण अपने–अपने रोटी सेकने मे सफल तो हो ही रहा है । इसी क्रम में जब सत्ता मे जाने की बारी आति है तो मुद्दा को ताक मे रख सत्ता के सिढियाँ चढते हुए स्वर्ग मे पहूँने की स्वप्न नेतागण देख्ने लगता है । तब वह कुर्सी पर आसिन होकर, अपने अगले गधे के जन्म से छुटकारा पाने के लिए ललायित रहते है । इसके बाद तो मधेश और मधेशी के मुद्दा भाड मे जाए, उसे उन्हे कोइ गम , चिन्ता और फिक्र नही रहता ।
जनआन्दोलन और मधेश ः
वि.स. द्दण्टद्दरटघ के जनआन्दोलन के ऐतिहासिक सफलता के बाद प्रमुख तीन पार्टीयाँ मुल्क को संघियता मे ले जाने के लिए विल्कूल ही तयार न होने के कारण मधेश जनविद्रोह का सूत्रपात हुआ । उसी बदौलत मुल्क संघीयता के ओर बढा । परन्तु आज भी संघीयता के विरुद्ध मे षडयन्त्रों का एक शृंखला सी यहाँ चल रही है । मधेश के कुछ दलालों, नोकरशाहों और गुलामों के मिलिभगत से यह सब होता आ रहा है । जनता स्वयंम के नेतृत्व मे हुए आन्दोलन के बाद प्राप्त हुए मधेशियों के पहिचान सहित के संघियता संवोधन के बाद मधेश के राजनीति मे कुछ ‘बहुरुपी नेताओ’ं का भी जन्म हुआ । वर्षो तक मुलधार के राजनीति मे रहे मधेशीमूल के नेताओं मे आश्चर्यजनक रुप से उत्पन्न हुआ आलोकित और अद्भूत ब्रह्मज्ञान के कारण वह मधेशबाद की ओर आकर्षित और केन्द्रित हुआ । जन्म से कम्युनिष्ट पन्थी और कांग्रेस पन्थी राजनीति मे रहे मधेशीमूल के वह नेताएँ मधेशी जनअधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव के द्वारा शुरु किया गया मधेश केन्द्रित आन्दोलन मे ‘षडयन्त्रमूलक’ ढंग से समावेश होकर फिर से मधेशियों का बादशाह बनने के लिए क्रियाशिल हो उठा , आगे बढा । वह इस मे सफल भी हुआ । फोरम नेपाल के संस्थापक नेताओं के गल्तीयों के कारण मधेशीयो के ‘राजा’ बनने के लिए ललायित वह धुर्त और चलाख नेता अपना बर्चस्प पार्टी मे शनैः शनैः बढाया । इसके बाद फिर शुरु हुआ सत्ता के खेल । पहले से ही सत्ता के सात्तिर खिलाडी रह चुके कुछ नेता स्वभाविक रुप से सत्ता केन्द्र के इर्दगिर्द चक्कर काँट्ने लगा ।  सत्ता के इस खेल मे फोरम नेपालको फसा दिया गया । उधर मधेश आन्दोलन के बाद चौथी शक्ति के रुप मे ऊभरे पार्टी के ऊर्जा को देख प्रमुख पार्टीया उसे पचा न पाने की स्थिति मे था ।  इसलिए अन्दर ही अन्दर घुन की तरह वह इसे समाप्त करने मे जुट गया था । और निर्वाचन के बाद संविधानसभा मे मधेश के बढे प्रभाव को छिन्नभिन्न करने की रणनीति के सिकार होता गया फोरम नेपाल । फिर मूलधार के पार्टी मे रहते हुए बारम्बार सत्ता के स्वाद चखते काले धन्दे और कर्तुत करने बाले मधेशीमूल के नेताओं का दबदबा फोरम मे बढता गया । इसि मौके के ताक मे थे वह अवसर वादी नेता । वह अपने ही द्वारा किये गये काले कर्तुत को साफ करने के ताक मे भी था । भ्रष्टाचार और अनैतिक कारनामे के कारण बदनाम हो चुकें मधेशीमूल के ये नेता मधेशी तो थे नही , जो पार्टी को टुक्रा–टुक्रा मे विभाजित करने बचता । उस मे मधेश के शक्ति को कमजोर करने की चाह भी था , जिस मे कुछ हद तक वह सफल भी हुआ । संविधानसभा मे फोरम नेपाल ५२ स्थान के साथ क्षेत्रिय राजनीति के पहला और राष्ट्रीय राजनीति के चौथे सबसे बडा शक्ति आज १२ स्थान मे संकुचन होने को बाध्य है । यह मधेशी मुद्दा स्थापित नहोने के अभियान मे लगे लोगो का चाल के तहत हुआ है । इस अवस्था को देख मधेशविरोधी लोग हंस रहे है, उधर मधेशीजन शर्म से सिर झुकाने को बाध्य हुए हैं ।

मधेशी दल और मोर्चाबन्दी
सरकारी रिपोर्ट को सही माना जाय तो मधेश मे सौ से ज्यादा सशस्त्र समूह है । परन्तु यथार्थ मे वह है नही । प्रचार के लिए और मधेशको बदनाम करने के लिए विगत मे राज्य के द्वारा किया गया अभियान था वह । परन्तु आज निसशस्त्र राजनीतिक पार्टीओं की सख्या भी २० के हाराहारी मे है, मधेश मे । सद्भावना पार्टी और फोरम नेपाल के ही नाम से एक दर्जन से ज्यादा पार्टी मधेश मे आज के तारिक मे क्रियाशिल हैं । तमलोपा के दो घटकसहित अन्य मधेश केन्द्रित दलों को जोडा जाय तो गिन्ती पुरा करने के लिए दोनो हातों का इस्तेमाल करने की स्थिति आएगी ।  मुद्दाहीन राजनीतिक विभाजन और मधेशीमूल के नेताओं के प्रतिशोध राजनीतिक सोच के कारण मधेशकेन्द्रि दलों मे फूट के साथ उसका आकार बढता चला जा रहा है । इसलिए तो भाषण मे मुद्दा एक है परन्तु दल के बीच एकिकृत नही हो पाने के वजह और क्या हो सकती है ? अपने को शक्तिशाली बने दिखावा करने के लिए कुछ नेता अभी भी जी जान से लगा हुआ है । मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा का उदय भी मुलधार के प्रमुख तीन राजनीतिक दलो के साथ अपना ‘बार्गेनिङ प्वाइन्ट’ बढाने के लिए ही हुआ है, उसके विगत के अडान को देखा जाय तो यही पुष्टि होती है । तभी तो उस के नेताओं के द्वारा सार्वजनिक होते आ रहे अडाने आजतक सम्बोधन नही हो पायी है । मोर्चामे समाहित मधेशकेन्द्रित दल के नेताओं मे भी ‘हम बडे तो हम बडे’ और ‘हम प्रभावशाली तो हम शक्तिशाली’ बनने की होडबाजी शुरु है । मोर्चा के एक महामहिम नेता कहते हैः नेपाल मे अगला प्रधानमन्त्री मधेशी को बनने से अब कोई नही रोक सकता  । उधर दुसरे कहते है ः १० हजार मधेशीओं को सेना मे समावेश नकरने के अवस्थामा सशस्त्र विद्रोह भी करने को हम पिछे नही हटेगें । तिसरे कहते है ः तराई के सशस्त्र समूह वार्ता मे आनेको तयार है और उसके साथ मोर्चाबन्दी कर सशस्त्र रुप मे मधेश आन्दोलन चलाने की तयारी चल रही है । चौथे भी भला ‘हम किसी से कम’ क्यो रहेगे सोच कर कहते है ः संविधानसभा से समस्या के समाधान नहोने पर पृथ्थकतावादी आन्दोलन हम कर सकते है । पाँचवे नेताका मुड भी आन्दोलन मे ही दिखाई देती है । मधेशी मोर्चा के मुखिया मे नेपाली कांग्रेस पार्टी के तीन पूर्व केन्द्रिय नेता है, एक एमाले के पूर्व नेता और एक विशुद्ध मधेशवादी है । पाँचो मुखिया बार–बार सत्ता मे आसिन रह चुके व्यक्तित्व है । इन सभी का सत्ता मे आसिन होने की समयावधि की  गणना किया जाय तो न्युनतम तीन बार और अधिकतम दर्जन से ज्यादा बार सत्ता सुख के भोगी है ये मुखिया । शक्ति और सत्ता मे ही जीवन व्यतित करने बाले यिन लोगो से मधेशीको क्या अपेक्षा रहेगी ? सब शक्ति संचय मे लगा हुआ है । मोर्चा के एक घटक तो सशस्त्र समूह को अपने मे समाहित कराकर शक्ति संचय मे अग्रपंक्ति मे दिखाई दिआ है । मोर्चा के अन्य दल भी अपना बार्गेनिङ पावर बढाने हेतु अन्य सशस्त्र समूह से वार्ता जारी रखा है । राजनीतिक जानकार बताते है ः इस तरह के कदम से मधेश और मधेशी को कुछ नही मिलेगा । हाँ एकिकरण मे लगे नेताओं को सत्तासिन बनने के लिए बहुत बडा हैसियत प्रदान यह कर सकता है । परन्तु यह सब ‘रिभोल्युसनरी स्पीच’ सत्ता बाहर रहने तक ही सीमित रहने की बात जनता जानती है ।  इस से पहले मोर्चा के अधिकांश घटक सत्तासिन ही थे । परन्तु मधेश के विपक्ष के शृंखलाबद्ध निर्णय को तो किसी ने नही रोक सका । उस समय वह चुप क्यो थे ? मधेश मे यह एक खोज की विषय बना है ।
इसितरह पार्टी से अलग हुए लोग पार्टी को फोडा नही गया, नये पार्टी बनाने की दलिल भी पेश कर रहा है । जो सरासर गलत तर्क है । पार्टी आन्दोलन के समय या निर्वाचन के समय मे बनाई जाती है परन्तु सत्ता समिकरण हेरफेर के समय मे पार्टी का गठन या निर्माण हो तो उसे पार्टी बनाने के रुप मे नही, षडयन्त्र के तहत लिया जाता है । राजनीतिक दुकानदारी कर आम्दानी के स्रोत जुटाने के लिए ‘मधेश मुद्दा’ के नाम पर खोला गया पार्टी के अस्तित्व ‘सस्टेनेवल’ कभी भी नही हो सकता ।  खास कर के नेपाल के राजनीति मे तो यह सम्भव ही नही है । फिर व्यक्ति के चरित्र भी पार्टी गठन के महत्वपूर्ण पक्ष होते है । भ्रष्टाचारी, रातारात अकूत सम्पति के मालिक बने लोग और समुदाय के उत्थान के नाम पर कालेधन लुटाने बाले व्यक्ति के नेतृत्व मे खोला गया दलों के साथ जनता कभी नही रही है और न रहेगा ।

सीमित कार्यकर्ताबीच तानातान
तराई मे मधेशकेन्द्रित दल के संख्या बढ्ते ही सीमित कार्यकर्ताओं के बीच तानातानी जारी है । खास कर के फोरम मे यह खिचातानी सब से अधिक चल रहा है । पूर्वी क्षेत्र से ज्याद पश्चिम मे कार्यकर्ताओं के बीच मे तानातानी जोरसोर से हो रहा है । जुलुस और कार्यक्रम मे सहभागिता के लिए कार्यकर्ताओं के विभिन्न गुटो से आर्थिक सहयोग भी दिआ जा रहा है । इससे कार्यकर्ताओं को क्षणिक आर्थिक लाभ हो रहा है । उधर राजनीतिक दल के नेता मुर्ख बन रहा है । हाल ही मे संस्थापन फोरम नेपाल से अलग हुए गणतान्त्रिक फोरम के एक कार्यक्रम मे सहभागी कार्यकर्ता फोरम के तीनो विभाजित गुटो मे देखा गया है । यह नेपालगञ्ज के कार्यक्रम मे ही नही राजबिराज मे भी देखने को मिला है । खास करके भाडे के लोगों को एकठा कर किसी स्थान पर कार्यक्रम कर लेना एक वात है परन्तु सचेत कार्यकर्ताओं को पार्टी मे लाना दुसरी बात है । संस्थापन फोरम के कार्यकर्ताओं कि बात माने तो गणतान्त्रिक फोरम के अलग होना और लोकतान्त्रिक फोरम के अलग होने मे बहुत अन्तर है । फिर भी संस्थापन फोरम के छवि आज भी मधेश के जिल्ला मे सम्माजनक ही है । संस्थापन पक्ष मे ही कार्यकर्ता की भीड ज्यादा है । गणतान्त्रिक के एक दो नेता को छोड मधेश मे किसी के पास जनाधार नही हैं । हाँ वह पैसा के बलबुतो से भिड जम्मा कर सकते है , परन्तु प्रतिबद्ध , सिद्धान्तनिष्ट और आस्थावान कार्यकर्ता आज भी संस्थापन पक्ष मे ही है । केन्द्र में बार–बार हुआ विभाजन से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है । इसि कमजोर मनोबल बाले कार्यकर्ता ही क्षणिक स्वार्थ के लिए पलायत होते आ रहे है । सैद्धान्तिक गणित के गुड जानने बाले कार्यकर्ता गुट और फूट मे विल्कूल विश्वास नही रखता है । टुट्ने और नये पार्टी बनने के क्रम मे एक ही व्यक्ति का फेरबदल होता आ रहा है । मधेश के जिल्ला मे तराई केन्द्रित दल के दौडाहा फिलहाल घनीभूत हुआ है । सीमित कार्यकर्ता और दल अधिक होने के कारण नेताओं समस्या पडी है ।
अन्त्यमे,
किसी भी मुल्क, राज्य, समाज और समुदाय राजनीति और राजनीतिकर्मी से बहुत ही प्रभावित होता है । समाज सेवा को सर्वव्यापी और सर्वमान्य बनाना राजनीतिकर्मीका कर्म होनी चाहिए । वैसे तो समाज सेवा अन्य तरिका से भी किया जा सकता है । राजनीति मे मूल्य, मान्यता, आचारसंहिता का अर्थ होता है जनता और अपने समुदायप्रति के प्रति इमान्दारिता के साथ देश और समाज के प्रति वफादारीता निर्वाह करना । मधेश के कुछ नेता अपने मुद्दाको भूला ही नही उस क्षेत्र के विकास और शान्ति सुरक्षा मे भी अपना उत्तरदायी भूमिका निर्वाह नही कर पाने की स्थिति मे है । मधेश मे असल नेता नही है , यस कहना आज के तारिक मे गलत होगा । परन्तु उसे सर्वमान्य बनने ही नही दिया जा रहा है , कुछ तत्वो के द्वारा । इन गलत तत्वो मे व्याप्त सर्वसत्ताबादी सोंच और आर्थिक लाभ प्राप्त गर्ने के ध्यय के कारण मधेश के राजनीतिक अवस्था एक अराजक संस्कार की अवस्था से गुजर रहा है । इसलिए तो मधेशकेन्द्रित दल के कुछ नेता और कार्यकर्ता फ्रि छोडा गया साढ की तरह अनियन्त्रित है । वह चरम महात्वाकांक्षी बना है । इसिलिए उसमे अनुशासनहीनता के सीमा नाघ चुका है ।  मधेश के फिलहाल की आवश्यकता विकास, शान्ति, सुरक्षा और रोजगारी है । मधेशीओं को पहिचान, स्वाभिमान, स्वशासन दिलाने के लिए एकजूट होकर आगे बढ्ने का समय है , यह । इन सब को छोड कुछ मधेशी नेता ‘अन्य मुद्दा’ मे केन्द्रित हो कर मधेशी एजेण्डा को कमजोर बनाने मे लगा हुआ है । ऐसे नेताको जनता वहिष्कार करे । जो इमान्दार है उसे साथ दे और मधेश के अस्तित्व बचाते हुए एकिकृत नेपाल के रक्षार्थ सभी को आगे बढना ही होगा । Tuesday, 5 July, 2011, 1:46 PM THE Public hindi monthly

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