नेता मे नैतिकता की खडेरी है । उनका चरित्र इस कदर नीच हो आई है कि उपर उठ्ने मे लम्बे तान भरने की जरुरत पडेगी । मधेश के नेता मन्त्री तो बने है, सरकारी सुविधाओं का उपभोग तो वह कर रहे है, करते भी है । लेकिन इसका क्या मतलब जब वह अपना मतदाता और समर्थत खोते चले जा रहे है । मधेश के नेतागण हर रोज अपने जनता और समर्थनको खोते जा रहे है । यह राजनीति करने वाले के लिए बहुत महंगा सौदा है । नेता सुख सयल मे इतने मस्त है की वह अन्धे है, बहरे हो गए है । अब तो अन्धे और बहरे दोनो हो गए है, सत्ता के कारण । जनताओं मे देश और मधेशको बदलने की प्यास और अकुलाहट है , वह कुछ करना चाह रहा हैं । परन्तु नेतागण जनता के लिए मुर्दे बन रहा है ।
दिनेश यादव
नेपाल के संविधान निर्माण प्रक्रिया फिलहाल बहुत ही गम्भिर और जटिल मोड मे पहुँचा है । विभिन्न दल के नेताओं के गैर–राजनीतिक सोच और सत्ता मोह के कारण यह स्थिति आई है । इस संविधानसभा से जनसंविधान न बनने की स्थिति अब साफ–साफ नजर आने लगी है । जनता मे संशय है, भ्रम, निराशा और ढेर सारे कुन्ठाए भी । प्रमुख तीन पार्टीया ‘पावर कैप्चरिङ’ के दौड मे सामेल है । उसके मुखिया अपने–अपने नेतृत्व मे सरकार निर्माण हो, उसी ताक मे हमेशा दिखाई दे रहा है । परन्तु देशी ÷विदेशी शक्तियों के चलखेल के कारण यह हो नही पा रहा हैं । फिर भी इसके लिए वह ‘अन–नेचुरुल’ मार्गको चुनकर ‘पावर गोल’ तरफ खरगोस की रेस मे जमे है । इसिलिए तो वह ‘संविधान निर्माण या शान्ति प्रक्रिया’ मे से कौन पहले पुरी होनी चाहिए , आज के तिथि तक भी तय नही कर पाया है ।
माओवादी सत्ता मे है इसिलिए वह संविधान निर्माण प्रक्रिया पर जोर दे रहा है । उधर प्रतिपक्ष मे रहे दल नेपाली कंग्रेस और एमाले ही नही सत्तासिन मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा के पाँच घटक दल भी संविधान से पहले शान्ति प्रक्रिया पर जोर दे रहा है । सत्ता और मोर्चा से बाहर रहा मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल संविधान निर्माण प्रक्रिया को प्राथमिकता मेँ रखा है । बाँकी दलों का स्थिति भी इससे विल्कुल फरक नही । इस तरह देखा जाय तो संविधान निर्माण प्रक्रिया मे यहाँ के राजनीतिक दल दो ध्रुवो मे बँट चुका है । एक चाहता है पहले संविधान बने फिर शान्ति प्रक्रियाको आगे बढाया जाय । दुसरा पक्ष चाहता है , शान्ति प्रक्रिया के बाद संविधान बने । वैसे यह दोनो ‘प्रक्रिया साथ–साथ चलनी चाहिए’ मत रखने वाले भी है, यहाँ ।
‘शान्ति प्रक्रिया पहले’ मत रखने वाले के भित्री आशय संविधान बनाने की नहीं है । वह सेना समायोजन को प्राथमिकता मे रखकर आगे बढ रहा है । इसी पक्षधर लोगो का पलडा अभी भारी होते दिखाई देने लगा है । वह पहले शान्ति प्रक्रिया पर जोर दे कर संविधान निर्माण को अबरुद्ध करना चाहता है । कंग्रेस और एमाले इस मुद्दे पर एक थे ही अब इस मे कथित चौथे शक्ति भी समावेश हो गये है । मोर्चा के नाम पर सिर्फ सत्ता के लिए बना यह चौथा शक्ति आम–नेपाली जनता और आम–मधेशीजन के लिए नही , मोर्चा मे सहभागी कुछ ‘छुछुन्दर चरित्र’ वाले सभासद्, नेता, कार्यकर्ता और बुद्धिजीवि के हित मे यह जरुर हो सकते है । क्योकी जिसका न कोइ लक्ष्य है न सिद्धान्त, न कोइ अडान है न सम्मान, न कोइ सही गोल है न सही बोल । इसिलिए तो वह मन्त्रालय के बखडाबाजी (बाँडफाँड) मे और अपने मन्त्रीओ के चयन के लिए बखेडाबाजी मे फँसता आ रहा है, फँसा हुआ है ।
पेचिंदा राजनीति
स्व–शासनसहित के संघियता मधेशी, दलित, मुस्लिम, आदिवासी÷जनजाति को सब से पहले चाहिए । इन समुह÷समुदायो के लिए ही नव–संविधान की जरुरत है । इसे संघियता चाहिए और आत्मनिर्णय के अधिकार भी । परन्तु इन समूहों÷वर्गो÷ समुदायों के कथित मुखिया सत्ता के गलियारों मे इस कदर भटक और गुल हो गए है कि उसे सिर्फ मालदार मन्त्रालय की धुन लगा हुआ है । ताकी अच्छे माल और मुद्रा कमाया जाय सके । यह उसे फिलहाल परिवर्तित शैली मे मिला भी हैं । खास करके मधेशी मोर्चा मे आबद्ध कुछ नेता लोग अभी भी अपने–अपने पूर्व माउ पार्टी कंग्रेस और एमाले के चरित्र परित्याग नही कर पाया है । जिसका चरित्र सिर्फ सत्ता मे पहुचँना रहा । ऐसे चरित्र बाले के लिए तो सत्ता प्राण और जीवन है न ? धन्य मोर्चा के एक घटक दल के अध्यक्ष जो सरकार मे सामेल नही हुए । उसके इस त्याग से थोडा ही सही राजनीति मे त्याग की भावना है, सन्देश संचार हुआ है । मोर्चा के अन्य दल के अध्यक्ष सत्ता और कुर्सी के भुख मे राजनीति मे ‘त्याग शब्द’ भी होते है, भूला गये है । उस मे यह सुध तो होनी ही चाहिए थी कि सत्ता पर आसिन होने से, प्रमुख और शक्तिशाली मन्त्रालय पर कब्जा जमाने से मधेश और मधेशीयों का उत्थान संभव नही । क्योकी अभी भी यहाँ के शासक, प्रशासक और सत्ता मे रहे लोगोका मानसिकता, नियत, मनोबृत्ति, संस्कार और सोच पुरानी ही है ,सिर्फ व्यवस्था और सत्ता परिवर्तन से कुछ नही होता । इसिलिए तो मधेश के ‘अपने गुलाम नेताओं’ को वे सत्ता के लोभ, लालच मे आसानी से फँसाते चले आ रहे है । और हमारे लालची नेता भी तो उसी के लायक जो है । इसिलिए तो उसके राजनीति सिर्फ उपप्रधानमन्त्री और मन्त्री बनने तक ही सीमट सी गयी है, संकुचित हो गयी है । वह ‘राजनैतिक’ को भूल ‘राजनीति’ मे गुम हो गयें है । वह ‘राज नेता’ नही ‘पार्टी नेता’ मे सीमित हो चुके है । इसिलिए तो वह जन–नेता या जन–नायक बनना नही चाहते है । इसके लिए वह लायक भी तो नही है । मधेश मे जन–नायक की खोजी चल रही , नायक की नही । हमेशा सत्ता के पिच्छे दुम हिलाने वाले जनप्रिय और लोकप्रिय नेता कसै बन सकते है ? किंचित नही बन सकते । इसके लिए त्याग और सिद्धान्त मे अडान आवश्यक सर्त है । हाँ , सत्ता मे पहुँचने के उसके ध्येय और उद्देश्य सिर्फ अकूत सम्पति कमाना ही है तो वह अब पिछे रहे लोग, समुदाय और वर्ग के दुहाई देकर स्वयं अपने को धोका न दे तो बेहतर होगा । वह यह भुल रहा है कि पहले और आज बाली स्थिति, परिस्थिति और राजनीतिक माहौल बदला है । अब लोग जानने लगे है कि क्या सही और क्या गलत है ?
महंगा सौदा
नेताआें मे नैतिकता की खडेरी है । उनका चरित्र इस कदर नीच हो आई है कि उपर उठ्ने मे लम्बे तान भरने की जरुरत पडेगी । मधेश के नेता मन्त्री तो बने है, सरकारी सुविधाओं का उपभोग तो वह कर रहे है, करते भी है । लेकिन इसका क्या मतलब जब वह अपना मतदाता और समर्थत खोते चले जा रहे है । मधेश के नेतागण हर रोज अपने जनता और समर्थनको खोते जा रहे है । यह राजनीति करने वाले के लिए बहुत महंगा सौदा है । नेता सुख सयल मे इतने मस्त है की वह अन्धे है, बहरे हो गए है । अब तो अन्धे और बहरे दोनो हो गए है, सत्ता के कारण । जनताओं मे देश और मधेशको बदलने की प्यास और अकुलाहट है , वह कुछ करना चाह रहा हैं । परन्तु नेतागण जनता के लिए मुर्दे बन रहा है । जनता हताशा और निराशा के कालकोठरी मे दिनप्रति दिन पड्ते जा रहे है । जनता के मन को बदलने को, अपने समर्थक के चरित्र बदलने को , कार्यकर्ता मे प्राण प्रतिष्ठा कायम करने को , उसको आत्म देने को मार्ग खोजे जा सकता है, परन्तु यह सब नही हो पा रहा है । कारण नेता सक्षम और कुशल नेतृत्व क्षमता से कोशो दुर जो हो गए है । लोगो मे निराशा घनीभूत होती दिखाई मालुम पडती है । अतः देश और मधेश के राजनीति को गलत रास्तो पर जाने से बचाना होगा, रोकना होगा । अपने को नेता कहलाने बाले इतने जोर से जनता के ऊपर हमला बोल रहा है कि जनता के सारे अंग उसके नीचे दब गए हैं । जैसे राजनीतिज्ञ ही सब कुछ है और शेष कुछ भी नहीं है । यह आत्मघाती सौदा हो सकता है । इसे वह न भुले को बेहतरिन होगा ।
मोर्चा और संविधान
नेपाल के वर्तमान राजनीति परिवेश रजनीश ‘ओसो’ के इस परिभाषा से मिलती जुलती नजर आति है । वे लिखते है ः राजनीति न तो किसी मुल्क के चरित्र को बनाती है, राजनीति न किसी मुल्क को आत्मा देती है । राजनीति न मुल्क को शान्ति देती है और न आनंद देती है , और न जीवन को अर्थ और मीनिंग देती है । राजनीति केवल दवदवा देती है, संघर्ष देती है और महत्वाकांक्षा देती है । और एंबीशन जितने बढती चली जाती है, उतनी मन को वायलेंस, हिंसा और एक दूसरे के प्रति शत्रु के भाव से भरती चली जाती है । नेता सभी एक ही नाव पर सवार है –धोखे की, बेइमानी की , चरित्रहीनता की, भ्रष्टाचारी की, पावर शो करने की । नेताओं मे महात्वाकांक्षा इतनी बढी है कि वह खुद के एजेण्डे से कोशो दुर हो रहे है । इसिलिए तो संविधानसभा के म्याद मे ‘ग्रेस’ शब्द का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षो से होता आ रहा है । पहले पुष्पकमल दाहाल, फिर माधव नेपालको संविधान सभा के लिए म्याद थपने के ग्रेस अंक मिला । किसीको छ माह तो किसीको तीन माह का यह ग्रेस अंक मिला । पिछले माह बाबुराम भट्टराई को भी ग्रेस मिला है । वह ग्रेस अन्य प्रधानमन्त्रीयो के तुलना मे ४५ दिन कम है । इसके बाद फिर ४५ दिन के ग्रेस उसे मिलने वाला है । परन्तु संविधान निर्माण प्रक्रिया शुन्य की ओर बढ्त बनाया हुआ है और ‘अनन्त’ मे जाने के मार्ग मे है । इसिलिए अगले कुछ माह के बाद देश मे भयावह स्थिति के संभावाना स्पष्ट होती जा रही है । वर्तमान गठबन्धन को परिवर्तनकारी शक्ति के रुप मे आंकलन किया जा रहा है । परन्तु इसी शक्ति के नेतृत्व मे संविधानसभा के अन्त्येष्टि के तयारी भी जोरो से चल रहा है । माओवादी और मधेशी मोर्चा के नेतृत्व मे रहा यह सरकार के द्वारा ही संविधानसभा भंग करने कि षडयन्त्र भी हो रही है, नेपाल मे । माओवादी सत्ता मे जाने के लिए नामुद भ्रष्ट लोगो को शक्तिशाली मन्त्रालय देकर नेतृत्व लेने को तयार है, यस बात पब्लिक जानने लगी है । अब संविधानसभा भंग हो जाय तो उसे आश्चर्य के रुप मे नही लेनी चाहिए, यस भी वह जानती है । माओवादी और मधेशवादी दल के वर्तमान गठबन्धन दोनो अमुक शक्ति के ‘युज व्याट्री’ बनने के कगार पर है । खास करके मधेशी मोर्चा के प्रमुख पाँच घटक के नेता इसके लिए योग्य भी दिखाई देने लगा है । अतः वह संविधानसभा निर्माण को ‘मुंल्तबी’ मे रख तपसिल के मुद्दे मे अपने को केन्द्रित करने मे क्रियाशिल है । जनता को प्रधानमन्त्री, उपप्रधानमन्त्री और मन्त्री कोई भी बने , नेतृत्व किसी भी दल को मिले , उस से कोइ सरोकार नही है । उसे तो सिर्फ संविधान चाहिए । इसिलिए तो जनता धैर्यधारण कर चुप्पी साधे हुआ है । लेकिन धैर्यता के बाँध जब टुटेगी तो उस मे सारा लिन लोने की संभावना को अब नकारा जाना उचित नही होगा, बढी भूल होगी । समय अब भी शेष है, जनता के पक्ष मे काम कर दिखाने के लिए । सम्बन्धित सभी एकजूट होकर समय की माग को पहचानते हुए आगे बढे इसी मे कल्याण है , नही तो सभी का ‘स्वाहये नमः’ होने से कोइ नही रोक सकता । ( Published article in The Public Hinhi monthly at Septeber 2011)
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