Saturday, 25 January 2014

मधेस, घोटाला और भ्रष्टाचार


Dinesh Yadav

मधेस आन्दोलन से पहले मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल और उसके बाद बने मधेस के राजनीतिक दलों मे अब मिशन वाली भावना नहीं हैं । इन दलो मे बहुत कम लोग बचे हैं जो मिशनरी भावना से राजनीति में काम करते हैं । यहां पर नेता से कार्यकर्ता तक सभी अपने करियर के बारे मे सोच रहे हैं, और आदमी का अपना निजी एजेंडा अपनी पार्टी और देश, मधेस, क्षेत्र और भूगोल के बासिन्दाओं का एजेंडे से बडा हो रहा है । 
राजनीति में सबका मकसद महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण्ँ यानी आखिरी पंक्ति पर पडे व्यक्ति की भलाई ही रहा हैं । हमारे देश के अन्तरिम संविधान की लक्ष्य भी समाज के आखिरी छोर पर स्थित इंसान की ही भलाई है । लेकिन संविधान के नाम पर या अधिकार प्राप्ति के लडाई में जीत हासिल करने के लिए सरकार में सामेल होने वाले राजनीतिक दल हों या उनके विरोध में उभरीं राजनीतिक ताकतें, सत्ता तंत्र में शामिल होते ही दरिद्र नारायण्ँ की सेवा भूल जाती हैं । अब ऐसी नही होनी चाहिए । देश और मधेस के सभी झुग्गीवालों को ध्यान मे रखकर ठोस, परिपक्व और दृढ संकल्पित नीति बना कर आगे बढ्ना जरुरी है । विकास और निर्माण के नाम पर देश और मधेस मे हो रहा भ्रष्टाचार के ताण्डव नृत्य के अब दर्शक भर बनने से काम नही चलेगा, पहरेदार बनना होगा ।
 
 संविधान के नाम पर या अधिकार प्राप्ति के लडाई में जीत हासिल करने के लिए सरकार में सामेल होने वाले राजनीतिक दल हों या उनके विरोध में उभरीं राजनीतिक ताकतें, सत्ता तंत्र में शामिल होते ही दरिद्र नारायण्ँ की सेवा भूल जाती हैं ।
 भ्रष्ट, पतित, कामचोर, जाली, बदमास, बलशाली, दबंग, बाहुबली और झुठ के खेति मे लिप्त लोगों को एक के बाद दुसरे फिर तीसरे करते पर्दाफास करने मे चुकने से परहेज रहना होगा, मधेसी नेताओं को । मधेस क्षेत्र में, स्थानीय निकाय मे हो रहे घोटाला और भ्रष्टाचार को समूल उखाड फेकने को अब मधेस के सभी दलों को एक जूट होना ही चाहिए । परन्तु यह एक कठीन डगर हो सक्ते है । क्योकीं अब कोई संत भी अपने विरोधी का साथ नहीं देता । फिर तो गैर–मधेसवादी दल क्यों इसके लिए अपने ही विरोधी का साथ देने लगेगी ?
हा“, नेताएं जन–जन से रायशुमारी को बढावा दे तो इस मे सफलता मिल सकती हैं । साथ ही, इससे उसकी भावी रण्ँनीति तय करने मे भी आशान होगा । जनता मे बढा राजनीतिक जागरूकता का फाइदा वह सतप्रतिशत लेने के लिए सदैव तत्वर रहे ।


 मधेसी पार्टी की चुनौतयां जितना बाहरी है, उतना ही आंतरिक चुनौतियों से भी , उन्हें जूझना हैं । दल अपने कार्यकर्ताओं के अन्तरविरोध को न्यून बनावे और वादा करे सत्ता और भत्ता से दुर रहेगें ।

अपने मतदाता, शुभचिन्तक और जनता की उम्मीदों को परवान वह कभी चढ्ने न दें, इसके लिए सजग रहे । अगर कोइ दल गलती करती है तो उस पर नजर रखें । यह नजर आखिर न बने इस पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करे । इस अभियान मे ‘खुदा न खास्ता’  कोइ उसके साथ छोड दे व कित्ता परिवर्तन कर दे, इससे तनिक भी विचलित होना नही हैं । अपना ठोस एजेण्डा को जनता समक्ष ले जाए, जनता को बतलाए कि हम आप के दुख और सुख मे साथ है, मुद्दाप्रति हम निष्ठावान और दृढसंकल्पित है । वैसे तो यह सब कहने मे जितना आसान है करने मे उतना ही चुनौतिपूर्ण है । क्योकिं मधेसी पार्टी की चुनौतयां जितना बाहरी है, उतना ही आंतरिक चुनौतियों से भी , उन्हें जूझना हैं । दल अपने कार्यकर्ताओं के अन्तरविरोध को न्यून बनावे और वादा करे सत्ता और भत्ता से दुर रहेगें । अपने सभासद को सुविधाभोगी बनाने के बजाय सम्भव हो तो सभासद भत्ता जनता के चाहना अनुरुप खर्च करें । जैसे ही सत्ता हाथ मे आने का समय आए, दूर रहे । क्योकिं सत्ता से लिप्साएं जागने लगती हैं । पिछले चुनाव में मधेसी दलों के पराजय के सब से बडा कारण यही रहा । मधेसी दलों के लिए यह बडी चुनौती है ।  सत्ता के चस्का लगे लोगो को अपने अधिकार और अपने जनता के भावना, वादा और आकाक्षाओं का याद दिलाए , ताकी वह सत्ता के लिए पार्टी फोडने से बचे ।
 

 तराई–मधेस के मानव विकास सुचकांक और देश को विचार देने वाला व्यक्तियों के पैदायिस करने के लिए परिचित भूभाग, जिल्ला, क्षेत्र, भूगोल से भी समानुपातिक वोट में भी गैर–मधेसी पार्टीको ज्यादा मत मिला, जनताओं ने इस धार वालो कों खुल कर मतदान किया ।

मधेस में राजनीतिकर्मीयों मे चार धार व वादी ः निशस्त्रवादी,  सशस्त्रवादी, यथास्थितिवादी और दोगलेबादी हावी हैं । पहले धार ‘डेमोक्रेटिक’ और ‘लेफ्टीस्ट’ के रुप मे मधेस के राजनीति मे सक्रिय हैं । ये दो धार बाले फरक ‘स्कूलिङ’ के नेताओं के नेतृत्व में अपना–अपना एजेण्डा के साथ जनता को ‘कन्भिन्स’ करने में जुटा हुआ है । इसमे अब ‘फ्युजन’ जरुरी हो गया है । खास कर के मधेसी जनता के हित के लिए तो ये दोनो खेमा को एक जूट होना ही होगा । जहां तक दुसरे धार की बात है, इसमे भी ‘अल्ट्रा’ और ‘लिबरल’ दो गुट हैं । एक चाहता है, रातो रात मधेसियों के सभी समस्याओं का समाधान हो और इसके लिए काटमार को वह अपना ध्येय मानते है । दुसरे गुट सैद्धान्तिक बहस के साथ मधेसी जनता को विश्वास मे लेकर आगे बढ्ने की सोच रखते हैं । परन्तु दोनो का एक ही मार्ग है, तराई–मधेस स्वतन्त्र, जिसे मधेसी जनता तत्काल खारेज कर रहा हैं । हां, राजनीति मे अपना अंश खोज्ने वक्त मधेस के नेता इसे बार–बार ‘बार्गेनिङ टुल्स’ भी बनाया है , इसि के बदौलत राज्य पक्ष को ललकारा भी है । परन्तु स्वार्थ पूर्ति होते ही विगत मे नेता के अंगारभरी यह चुनौति धिमि सी होता गया । इसिप्रकार यथास्थितिबादी को दक्षिणपन्थ के रुप मे जाना जाता है । ये भी मधेस मे उतना ही सक्रिय हैं । इसिलिए तो, तराई–मधेस के मानव विकास सुचकांक और देश को विचार देने वाला व्यक्तियों के पैदायिस करने के लिए परिचित भूभाग, जिल्ला, क्षेत्र, भूगोल से भी समानुपातिक वोट में भी गैर–मधेसी पार्टीको ज्यादा मत मिला, जनताओं ने इस धार वालो कों खुल कर मतदान किया । तराई–मधेस के इन जिल्लो से गैर–मधेसवादी दल (कांग्रेस और एमाले) को प्रत्यक्ष मे तथा राजाबादी दल (राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी) को समानुपातिक तरफ भारी मत मिला । और, अन्तिम धार के रुप मे मधेस मे ‘दोगलेवादीओ’ का आता है । जिसमे पंचायतकाल से लेकर संविधान सभा के पहले निर्वाचन के बाद बने हरेक सरकार मे सामिल हुए नेता लोक पड्ते है । इन सबों का एक ही मकसद सदैब रहा है कि मधेस की राजनीति को भाड मे पहु“चाए, अस्तव्यस्त बनावे । ऐसे धार ‘पोलिटिकल डिस्ट्रक्टिभ फोर्स’ के रुप मे मधेस मे क्रियाशिल हैं । उसके प्रति आस्था रखने वाले सिर्फ ऊंगीओं मे गिन्ति किया जा सकता हैं । इसिलिए इन सभी चुनौतिओ को सही ढंग से सामना करते हुए आगे बढ्ना ही मधेसी दलो के लिए सब से बढी अग्नी परीक्षा है । इस मे उत्तीर्ण होने वाला दल और नेता ही सच्चा मधेसी नेतृत्वहारी बन सकते है । 
  
क्रान्ति और अतिवाद दोनो बीच झीना पर्दा होता है । इसिलिए हर कदम पर क्रान्ति और अतिवाद को समझते हुए उसे कभी ‘फेसिलेटर’ , कभी ‘मेडिएटर’ तो कभी ‘स्टेट्समेन लिडर’ बनते हुए आगे बढने होंगे, सही समय मे सही फैसले लेने होंगे । 

वैसे क्रान्ति और अतिवाद दोनो बीच झीना पर्दा होता है । इसिलिए हर कदम पर क्रान्ति और अतिवाद को समझते हुए उसे कभी ‘फेसिलेटर’ , कभी ‘मेडिएटर’ तो कभी ‘स्टेट्समेन लिडर’ बनते हुए आगे बढने होंगे, सही समय मे सही फैसले लेने होंगे ।
मधेसी दलों मे एक और बडी चुनौती एमाओवादी के साथ आगे बढ्ना. यह मधेसी दलो के नैतिक आभा को कमजोर करने के लिए काफी है । मधेस विद्रोह को छापामार माओवादी लडाकू और नेपाल के सेना को एक साथ परिचालन कर के दमन करने की उद्घोष और कोइ नही एमाओवादी के सुप्रिमो ही किया था । इसिलिए ऐसे पार्टी के ‘मनचले’ नेतृत्व से दुर रहकर अपना नीति, सिद्धान्त, कार्ययोजना को आगे बढना ही सर्वोत्तम विकल्प हो सकते है । एमाओवादी के सत्ता मोह के जाल मे फसकर विगत में कमजोर हुए और मलिन पडती आभा की दीप्ति बनाए रखने के लिए नया“ सोच के साथ जनता के परिवर्तन के उत्कट अभिलाषा को पुरा करने मे मधेसी नेतृत्वको एक सूत्र मे बंध कर आगे बढना हैं । इसके लिए लोगों के बीच जाकर रायशुमारी एक उत्प्रेरक की काम कर सकती है । मधेसी दल एकिकरण मे जाए, यह असम्भव है तो गठबन्धन या मोर्चाबन्दी बनाए, मधेस के साझा मुद्दाओं का पहचान करे और एक छतरी तले सभी समाहित होने के लिए नियमित रुप से गन्थन, मन्थन और चिन्तन करें । वैसे तो इस के लिए कुछ राजनीतिक पार्टीया बहुत पहले से क्रियाशिल है, परन्तु अब एक दृढ संकल्पसहित के सपथ के साथ आगे बढने का समय आ गया है । जिससे, अलग–अलग धडों में बंटे मधेसी राजनीतिक दलों को आप एक मंच, एक प्वाइंट पर आम राय बनाने में कामयाब हो सके । यह कठिन जरुर है पर नामुमकिन नही ।
बचपन मे जब हम लोग विद्यार्थी हुआ करते थे तो हमें बताया जाता था कि जब पर्चा हल करने जाओ तो सबसे सरल प्रश्न को पहले हल करो, और जो सबसे कठिन प्रश्न हो उसको सबसे अंत में छोड दो, ये फॉर्मूला मधेसी दलो को प्रयोग मे लाना होगा , यह बडा काम देने वाला है । सब बैठकर पहले मधेस के हरेक सवाल पर गंभीरता से चिंतन करे और निस्कर्ष के साथ जनता मे जाए , जनता आप के साथ है और रहेंगे । इससे जनताओं का विश्वास तो बढेगा ही, आप के कारवा“ मे सामेल भी वह होगा । 

आज समूची की समूची राजनीतिक जमात की विश्वसनीयता पर मधेस के लोगों की नजर है, वैसे भी इस विश्वसनीयता को काफी आघात लग चुके हैं ।  
क्या मधेसी दल तैयार हैं, लोगों की नजर मे पूरी तरह अविश्वसनीय हो जाने के लिए ? ये सवाल किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं हैं, राजनीतिक जमात की विश्वसनीयता का मतलब लोकतंत्र की विश्वसनीयता हैं । क्या देश और मधेस में लोकतंत्र अविश्वसनीय हो जाए, नेता के प्रति विश्वास उठ जाए, राजनीतिक दलों के प्रति, व्यवस्थाओं के प्रति लोगों की आस्था उठ जाए ? ये बहुत बडा प्रश्न हैं, इससे अपना मार्गदर्शन बना कर कदम बढाना होगा । मधेसी पॉलिटीशियन की क्रेडिबिलिटी को फिर से उगाना होगा । क्योकिं यह खत्म हो जाएगी तो लोकतंत्र और मधेस÷मधेसी के अधिकार प्राप्ति आन्दोलन की ‘क्रेडिबिलिटी’ भी खत्म हो जाएगी ।
हमें कुछ निणर््ँय समय पर लेने चाहिएं, अच्छे से अच्छा निणर््ँय अगर गलत समय पर लिया जाए तो उसका प्रभाव भी गलत  होगा । दुसरी बात, मधेस आन्दोलन से पहले मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल और उसके बाद बने मधेस के राजनीतिक दलों मे अब मिशन वाली भावना नहीं हैं । इन दलो मे बहुत कम लोग बचे हैं जो मिशनरी भावना से राजनीति में काम करते हैं । यहां पर नेता से कार्यकर्ता तक सभी अपने करियर के बारे मे सोच रहे हैं, और आदमी का अपना निजी एजेंडा अपनी पार्टी और देश, मधेस, क्षेत्र और भूगोल के बासिन्दाओं का एजेंडे से बडा हो रहा है । यही तो दुर्भाग्य है, मधेस और मधेसियो का । इसि तरह कुछ नेता जब पार्टी से लंबा कद अपना मानने लगे और राजनीतिक अहंकार मे डुब जाए तो आम जनता उसे कैसे स्वीकारेगा । किसी ने कहा भी है, राजनीति में जनता एक बार भ्रष्ट आदमी को स्वीकार कर लेगी लेकिन अहंकारी आदमी को कभी स्वीकार नहीं करती । इसमे मधेसी दल के नेतृत्ववर्ग बदलाव नहीं किया तो उनके भविष्य नहीं है ।
अन्त्यमें, मधेसी दल के नेताओं को जो बात पार्टी फोरम मे कहनी चाहिए वो ‘पब्लिक’ में बोलने से बचे ।  सार्वजनिक तौर पर अपने ही विरादर को गलत कहेगें या पार्टी के निर्णय के खिलाप पर्चार करेगें तो दूसरो को खेलने के लिए ‘स्पेस’ मिल जाती है । पार्टी आलाकमान के खामियों को, कमजोरियों को, दूर करने के लिए सीरियस रहे, पार्टी के भितर । सभी को आत्मचिंतन, आत्म निरीÔण्ँ करते हुए आगे बढे । अब केवल ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से काम नहीं चलेगा, अब तो ‘कार्डिएक सर्जरी’ करनी पडेगी सभीको । आत्मसम्मान से समझौता कभी न करे । तत्त क्षणिक रुप से सरकार की गण्ँेश परिक्रमाको तिलाञ्जली दे तो बेहतर । इसि से तो दुसरे संविधानसभा के निर्वाचन मे मधेसी दलो की दुर्दशा हुई है, इसे सम्झे । मधेसी दलों के जो पुरानी नीतियां है, उसमें अब काफी

बदलाव की जरुरत है ।  महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सुशासन, कुशासन को मुद्दा बनाए न कि जाति, संप्रदाय, Ôेत्रियता को । इस तथ्य को कभी नही भूलना चाहिए कि किसी भी क्षेत्र÷विद्या में वे नायक खास होते हैं, जो अपनी पहचान हरफनमौला और बिंदास रवैये के लिए बनाते हैं । हर दौर के अपने मायने होते हैं, अलग चुनौतियां होती हैं, अलग मापदंड होते हैं. जाहिर तौर पर हर दौर में अलग–अलग नायक अपनी पहचान बनाते हैं और अलग–अलग दौर के नायकों की तुलना बेमानी है. परन्तु मधेसी दलों मे से किसी एक नेताको अब अपने मे कुछ परिवर्तन के साथ नायक बनना होगा, नही तो शहिद और मधेसी जनता के साथ बेइमानी होगी ।Published in  The Public , Hindi monthly, January 2014.
www.madheshinepali.blogspot.com

Thursday, 23 January 2014

नाजुक मोडमा संघियतावादी



दिनेश यादव ------
विषय प्रवेश ः दोस्रो संविधानसभा निर्वाचनको अभूतपूर्व परिणामहरूले मधेस क्षेत्रमा लगभग स्थापित भइसकेको राजनीतिक दलहरूलाई तगडा झटका मात्रै दिएको छैन, राजनीतिक विश्लेषकहरूलाई मधेसको राजनीतिको दशा–दिशामाथि पनि पुर्नविचार गर्न वाध्य पारेको छ । मधेसमा कांग्रेस, एमाले र एमाओवादी पुच्छ«ेतारा (धूमकेतू) झै छाउनु या मधेसी बहुल क्षेत्रमा समेत गैरमधेसवादी दलको जीत हुनुले मधेसी दलहरुमाथि अनेकौ प्रश्न समेत खडा गरिदिएको छ । ती मध्येका केही प्रश्नहरु हुन ः के निर्वाचन परिणामले मधेस र देशको राजनीतिका लागि केही संदेश दिनै खोजेकै हो ? के मुलुकमा संघियताको मुद्दा पछिल्लो जनादेशले खारेज गरिदिएको हो ? या एमाओवादी र मधेसबादी दलहरुले चाहे जस्तोको संघियता, समावेशिकता र विभिन्न जातजातिको पहिचानसहितको प्रान्तका मुद्दाहरुको विपक्षमा सा“च्चै नै जनादेश आएको हो ? किन र कसरी पहिचानसहितको संघीयता र संघियतासहितको संविधानका पक्षधरहरू निर्वाचनपछि सांगुरिए ? के यसो हुनुमा यसका पक्षधरहरुले निर्वाचन परिणाम सार्वजनिक भएलगतै शुरु गरेको ‘धा“धलीपूर्ण निर्वाचन’ को आरोप सही हो या उनीहरुले भनेजस्तै यसमा देशी÷विदेशी
क्रियावादी÷प्रतिक्रियाबादी शक्तिको सा“च्चिकै हात छ ? अर्थात के यी सब आरोपका लागि आरोप लगाउने ज्यावल मात्रै हुन त ? यसमा यो पनि हुनसक्छ कि निर्वाचनमा ‘ऐतिहासिक’ पराजय बेहोरेका दलहरु (हाल १८ पार्टी) ले जनताको ध्यान अन्यत्र मोड्न र आफ्नो पराजयमाथि  मलहम लाउन मात्रै विरोधको बाटो रोजेका हुन् ? त्यसैले चुनाव परिणामको निर्मम समिक्षा र सुक्ष्म विश्लेषण अपरिहार्य तथा अनिवार्य विषयबस्तु बनाइनुपर्ने आबाज पनि उठेको छ । विरोधका लागि विरोध गर्नुको साटो यी सवालहरुमा सम्बन्धित र सरोकारवाला पक्षले अब ‘सब्जेक्टिभ’ होइन ‘अब्जेक्टिभ’ विश्लेषण गर्नै पर्छ ।
चुनावका सन्देश ः हुनत, चुनावमा पराजय बेहोरेका दलहरूले भावी दिनहरूमा आ–आफ्ना कमी कमजोरीबारे गर्ने समिक्षाले जे जस्तो निष्कर्ष निकाले पनि कांग्रेस र एमालेले मधेस क्षेत्रबाट पाएको अभूतपूर्व जीतले मधेसी जनता मधेसी दल र त्यसको नेतृत्वको कार्यशैलीको विपक्षमा रहेको टड्कारो सन्देश चाही पक्कै दिएको छ । धनबल र बाहुबलसंगै जातिगत राजनीतिमा जकडेको मधेसको राजनीति विरुद्धमा पनि सन्देश संचार भएको छ । हुनत, यसलाई मधेसी दल र त्यसका नेताहरुमाथि जातियता गरेको अरोप लगाउनेहरुका लागि यो तर्क हजम नहुन सक्छ । तर मधेसका एक्का÷दुक्का नेता बाहेक अन्यले जातियताका आधारमा मत भने पाएका छैनन, यो नै यथार्थ हो । यसैगरि केही दबंग, बदनाम, भ्रष्टचारी , कातिल र कालो छविको आरोप झेलेकाहरुले पनि यो निर्वाचनमा विजय हासिल गर्नुले इरादा नेक, नियतमा इमान्दारिता भए जनताको विश्वास प्राप्त हुदो रै’छ भन्ने अर्को सन्देश पनि चुनावले दिएको छ । 
त्यस्तै, मिडिया, कानून–व्यवस्थाको पहु“च अपेक्षाकृत बढी र जनता धेरै जागरुक भएको क्षेत्रमा समेत मधेसी दलका नेताहरूले चुनाव जित्न नसक्नुले मधेसका जनता अब ‘झुठको खेति’ गर्नेहरुलाई सबक सिकाउन समेत सचेत भइसकेको देखिन्छ । यसले मधेसी नेताहरु आ–आफ्नै क्षेत्रमा अलोकप्रिय बनेको सन्देश पनि संचार गरेको छ । यसैगरि, सोसल मीडिया–फेसबुक, ट्विटर, एसएमएसको सकारात्मक उपयोग सफलतापूर्वक गर्न नजान्नुले पनि समस्या खडा गर्दो रै’छ भन्ने अर्को संदेश दिएको छ । केही मधेसवादी पार्टीले दिनहू“जसो
हजारौको संख्यामा पार्टी प्रवेश र नेताहरूको सम्मिलित राजनीतिक सभाको सूचना यी माध्यमहरु मार्फत गरेकै थिए । तर पनि परिणाम विपक्षमै आयो । अझ धनुषाका एक नेतामाथि त केहीले ‘मिथिला राज्यको मांग गर्ने आन्दोलनकारीको हत्यारा भएको’ दुस्प्रचार गर्दा समेत ती नेताले जितेका छन् । अन्य नेताहरुमाथि पनि जातियताको धङधङ्गी बोक्नेहरुले चरित्रै हत्या गर्ने सामग्री समेत ती सञ्जालहरुमा सम्प्रेषण गरेपनि निर्वाचनमा त्यसको असर कमै देखियो ।

पराजयका कारणहरु ः आफूहरूलाई संघियताको पक्षपाति भएको दाबी गर्ने दलहरू खासगरि एमाओवादी र मधेसवादीको पराजयका आ–आफ्नै कारणहरू छन् । एमाओवादीको पराजय सत्ता लिप्सा, प्रभुशक्तिहरूप्रति नतमस्तक, पार्टी विभाजन, बैद्य समूहको चुनाव वहिष्कार रणनीति, विदेशी गुप्तचर संस्था र दातृ राष्ट्रहरूको चुनावप्रतिको गलत ठम्याई, १० वर्षे जनयुद्धका पात्र र पीडितको वेवास्तालगायतका कारणहरू प्रमुख हुन् । पार्टीको नेतृत्वपंक्तिमा देखिएको अहम र दम्भ तथा अपराधीहरुलाई बचाउनमा बढी समय खर्चिनुलाई पनि धेरैले एमाओवादीको पराजयको कारण मानेका छन् । यसैगरि, भू–राजनीतिक शक्ति केन्द्रहरुका प्रस्तावलाई आ“खा चिम्लेर शिरोधार्य गर्दै गैर–दलिय सरकार निर्माण, व्यवस्थापिका र न्यायपालिकाको नेतृत्व एउटै व्यक्तिबाट गराउन सहमत हुनु, माओवादी जनसेनालाई ‘नेपाली सेना’ का रुपमा होइन ‘शाही नेपाली सेना’ कै संरचनामा समाहित गराउनु पर्ने अडान राख्ने सेनापतिकै नेतृत्वमा रहेको सेनालाई निर्वाचनमा परिचालन गर्न विश्वास गर्नुले पनि एमाओवादीको पराजय भएको विश्लेषण पनि केहीको छ । आफ्नो विपक्षमा रहेको संसदवादी पार्टीहरूले जुनसुकै बेलापनि उल्टो प्रहार गर्न सक्ने ठम्याईमा चुक्नु पनि उसको पराजयको अर्को कारण हो । तत्कालै चुनावमा जान नहुने केही केन्द्रिय र प्रभावशाली नेताहरुको भनाईलाई नजरअन्दाज गरेर अघि बढ्दा एमाओवादी यो स्थितिमा पुगेको कसैबाट अब लुकेको विषय रहेन, छैन । मिडियाहरूमा आएको रिपोर्टहरूमा कृष्णबहादुर महरालगायतले पार्टीका मित्रशक्तिहरुले यो निर्वाचनमा एमाओवादी तेस्रो शक्ति बन्दैछ भन्ने जानकारी आएको जनाउ दिंदा समेत पार्टी सुप्रिमोले त्यसलाई अस्वीकार गर्नुलाइ पनि उसको पराजयको कारणका रुपमा लिइएको छ । जहा“सम्म मधेसवादी दलको संविधानसभा–२ निर्वाचनमा पराजयको कुरो छ , उनीहरुको पराजयमा चार ‘एम’ ः मिडिया, मधेसवाद, माइनरिटी र मोर्चा नै प्रमुख कारण हो । नेपालका मिडियाहरूमा मधेसी दल र त्यसका नेताविरुद्धको गलत प्रचार र विश्लेषणहरूले उनीहरुको शाख गिराएकै हो । हुनत, यसलाई धेरैले मधेसीहरुको मिडियामा पहू“च नभएको रुपमा व्याख्या गरिरहेका छन् । केहीको तर्क भने मधेसीहरूले ‘पत्रिका नै पढ्दैनन , त्यसैले नेपाली मिडियाले लेखेको कुरो मधेसीसम्म पुग्दैन’ भन्ने थियो । तर त्यस्तो होइन रै’छ भन्ने देखियो । प्रमुख राष्ट्रिय अखबारहरुले दिनहू“ प्रकाशित गर्ने समाचार
सामग्रीहरुलाई नेपालका अधिकांश रेडियोहरुले जस्ताको त्यस्तै पस्कने गर्छन , त्यसको व्यापकता र पहूू“च मधेसीजनसम्म पनि पुग्ने गरेको विषयलाई मधेसी नेताहरुले नजरअन्दाज गर्नुले पराजय बेहोरेको हो । अर्को कुरो, मधेसवादको खोल मात्रै ओढेर राजनीति गर्ने तर मधेसवादबारे व्याख्या गर्न नसक्नु मधेसी दलको पराजयको अर्को प्रमुख चुरो विषय भएको भनाई पनि केहीको छ । अब यसलाई मधेसी राष्ट्रियतासंग जोडेर व्याख्या गर्नुपर्ने बेला आएको छ । यसैगरि मधेसी दलहरु ‘एलिट क्लास’ को वरपर मात्रै घुम्ने ‘माइनरीटी’ को पक्षमा खासै प्रतिबद्ध नहुनुले पनि उनीहरुको स्थिति चुनावमा नाजुक बनेको हो । मधेसका दलित, अल्पसंख्यक, सीमान्तकृतहरुको वेवास्ता गरिएको आरोप धेरै पहिलेदेखि मधेसी दलहरुले झेलिरहेपनि यो प्रति सचेत भएको भने कहिले देखिएन । जह“ासम्म मोर्चाको कुरो छ, सत्तामा जानका लागि मधेसी नेताहरुले मोर्चाबन्दी गर्न सक्ने तर निर्वाचनमा उनीहरु मोर्चा बनाएर जान नसक्नुले पनि उनीहरुको प्रदर्शन फितलो देखिएको हो ।  यी बाहेक पद, सत्ता, भत्ता र फूटपनि उनीहरुको विजयपथमा ठूलो चट्टानकै रुपमा रहयो । किनभने यसलाई उछिन्ने सामथ्र्य उनीहरुसंग थिएन , अनि पराजित भए ।   

सत्तामा पुगेर केही गर्न नसक्ने अवस्थाले कार्यकर्ताहरु निरुत्साहित थिए, जनता त निराश हुनेनै भए । नेताहरुले जन–गण–मनलाई बुझ्न सकेनन्, संवोधन गर्ने त कुरै भएन । त्यसैले त पराजयको पिडा ‘हार्ट अट्याक’ भन्दा पनि गहिरो छ, मधेसी दलका नेताका लागि । मंहगी र भ्रष्टाचार पनि पराजयको अर्को कारण हो । चुनावमा एउटा नेता अर्कोमाथि आक्रमणकारी र झापामार शैलीको स्थितिमा देखिनुले पनि जनताको मोहभंग मधेसी दलबाट भएको हो ।  मंहगीले मधेसी जनताको सत्यानाश गरेको छ, यो विषय उनीहरुको चर्चाको विषयबस्तु कहिले बनेन । कांग्रेस
र एमालेलाई संघियता विरोधी भएको आरोप त उनीहरुले लगाए तर प्रमुख तीन दलीय ‘सिण्डिकेट’ प्रथाका साक्षी भएर मात्र बसे, मधेसी दल । चार दलीय राजनीति संयन्त्रमा मधेसी दलका नेताहरु मोर्चाका तर्फबाट प्रतिनिधित्व गरेपनि उनीहरुको हैसियत एउटा ‘एस म्यान’ को जस्तै रहयो विगतमा । कांग्रेस, एमाले र एमाओवादीको सबै निर्णयहरूका अगाडि मधेसी मोर्चाका नेताहरु नतमस्तक हुने गरेका थिए, यसले पनि समस्या खडा गरेकै हो । अझ रमाइलो कुरो त के छ भने मधेस आन्दोलन जारी रहेको बेला आफ्ना जनसेना र लडाकु समेत लगाएर आन्दोलनको दमन गर्नुपर्ने भनाई राख्ने एमाओवादीप्रति बढी आशक्त देखिए, उनीहरु  । अर्थात् सत्ता उन्मादमा उनीहरु चुर्लुम्म डुबे । सत्ता साझेदारीका प्रमुख शक्तिका रुपमा एमाओवादीलाई स्वीकार गर्नु मधेसी दलहरुको भूल थियो । त्यो भूल अझैपनि केही मधेसी दलहरुले गरिरहेका छन् । यसरी मधेस र मधेसीको हकअधिकारको पक्षमा ‘ननसेन्स’ को स्थितिमा थिए, नेताहरू । यसले पनि उनीहरु पराजयको मुखसम्म पुगे ।
मधेसी दलको संगठन ः भनिन्छ, लोकतान्त्रिक राजनीतिमा संगठनको कुनै विकल्प छैन, ह“ुदैन । तर मधेसी दलका नेताहरुको यता ध्यानै गएन, पुगेन । मधेसका कुनैपनि पार्टीमा अनुशासन छैन । नीति, सिद्धान्त र अनुशासनबारे बोल्ने र पालना गर्ने नेता तथा कार्यकर्ताको अभाव छ, ती दलहरुमा । विमति राख्नेको आदर गरि“दैन, शत्रु ठान्छन । लोकतन्त्र त ती पार्टीहरुभित्र एकादेशको कथा जस्तै बनेको अवस्था थियो, छ । त्यस्तै, अन्य दलहरूको लोकप्रियताको भय नहुनेहरुका लागि राजनीति अभिसाप बन्ने गर्छ, त्यही भयो । अर्थात यसले पनि मधेसी दलहरुलाई रक्तमय बनायो । यसैगरि, जनअभियानकर्ताको अभाव यी दलहरुमा थियो, छ । आफूहरुमाथि लाग्ने गरेको जातियताको आरोपलाई समेत उनीहरुले छिछोल्न सकेनन, सकेका छैनन । विकास र सुशासनलाई महत्व दिने कुरो त धेरै परका विषय थिए, उनीहरुका लागि । अझ लाख रुपैयाको प्रश्न त यो छ कि एउटा नेताले अर्को नेतृत्वलाई स्वीकार नगरी आ–आफैलाई मधेसको मसिहा बन्ने दौडमा सहभागी थिए, छन् । यसले पनि उनीहरू अपेक्षाकृत सफल हुन नसकेका हुन् ।
त्यसैले त, सबैले भरोषा गरेका महन्थ ठाकुर , उपेन्द्र यादव र राजेन्द्र महतोलगायतका नेताहरू आ–आफ्नै अकर्मण्यतामा ‘इतिहास पुरुष’ मात्र बने । यी तीन नेताबाहेक अन्यको कुनै प्रभाव थिएन, छैन जनतामा । यी दलहरुसंग कुनै लोकप्रिय नेतानै थिएन , लोकप्रिय बन्ने अवसर पनि ती पार्टीले अन्यलाई दिनै चाहेन, चाहदैन । यति मात्रै भए त हुन्थ्यो, लोकप्रियता, सुशासन र विकासको उडान भर्न कसैले प्रयाससम्म गरेनन््, सत्ताभोगी र धनकमाउने अभियानमा मात्रै लागे नेताहरु । त्यसैले त उनीहरुको नेतृत्व संकटमा छ, सिद्धान्तनिष्ट कार्यकर्ताहरुको अभाव उनीहरुसंग छ । यसलाई यसरी भन्न सकिन्छ, जनतालाई सपना देखाउने नेताको अभाव छ मधेसमा । केहीले यसो गरेपनि उनीहरुको कथनी र करनी एउटै हुनै सकेको छैन ।  केहीले मधेसवाद र केहीले भने मधेसी राष्ट्रियता(पछिल्लो समयको प्रस्ताव) को फुटेको मादललाई किनारामा राखेर गैर–मधेसवादीलाई समर्थन गर्दै विगतमा उनीहरु सरकारमा सहभागी जसरी भए, त्यो गलत थियो, जनताले त्यसको बदला लिन विपक्षमा मतदान गरे, यो एउटा तीतो यथार्थ हो । यसैगरि, मधेसी मोर्चाको नाममा पटक–पटक सरकार निर्माणका लागि सम्झौता गरे तर जनतालाई राहत दिने काम कहिले पनि उनीहरुबाट भएन । अझ, भ्रष्टाचारमा लिप्त एमाओवादीका नेताहरुको बुईं चढेर उनीहरुको नेतृत्वमा रहेको सरकारको पालकी खुशी–खुशी बोक्दै हिडे मधेसी नेताहरु । बीच–बीचमा तत्कालिन सत्ताधारी मधेसी नेताहरुले मधेसवादको नारा लगाउदै संघियता पक्षधरसंगै हिड्नुपर्ने समेत भन्दै हिड्नुले उनीहरुको दोहोरो चरित्रलाई जनताले राम्ररी बुझें, अनि विपक्षमा मतदान गर्न बाध्य भए । फेरी अक्षम नेताहरुकै कारण विगतमा मधेसवाद एउटा यस्तो छाता झै बन्यो, जसलाई ओढेर हरेक किसिमका अनैतिक कर्म गर्न सक्ने नेताहरू जन्मिए । त्यसलाई धेरैले ‘मधेसीहरुको नेतृत्व विकास’ भने पनि जनताका नजरमा दण्डनीयनै ठहरियो । त्यसैले त उनीहरु जातिवादी, अवसरवादी र भ्रष्ट भएपनि मधेसवादको फुटेको मादल बजाउदै हिड्नुलाई आफ्नो धर्म ठाने । यी र यस्तै कारणहरुले मधेसी दलहरु पराजयको स्थितिमा पुगे । तर, यसलाई सकारात्मक रुपमा लि“दै, पाठ सिक्दै अघि बढे मधेसी दलहरुको भविष्य उज्जवल छ । जनताले प्रत्यक्षमा कम उम्मेदबार जिताए पनि समानुपातिकमा पहिलेकै हाराहारीमा मत दिएर उनीहरुलाई सचेत मात्र गराएको हो ।  
 
सुधारका टड्कारो विषयहरू ः मधेसी दलहरु पराजय भएदेखि नै आन्तरिक रुपमा पार्टीभित्रै आरोप–प्रत्यारोपको सामना गरिरहेका छन् । यसलाई तत्कालै परित्याग गर्दै संगठन सुदृढ बनाउनतर्फ उन्मुख हुनुपर्छ । आफ्नो मुद्दाहरुलाई जनता माझ पु¥याउने भगिरथ प्रयास अति आवश्यक छ । तर, यो भने जस्तो सजिलो छैन, धेरै मेहनतको खा“चो छ । आफ्ना गल्तिहरुलाई दुरुस्त गर्न आजैबाट कम्मर कसेर लाग्नु पर्छ । अर्को कुरो, कुनै एक व्यक्तिमाथि पराजयको जिम्मेवारी थोप्नु अन्याय हुनेछ । मधेसी दल संटकमा भएको जस्तो देखिएपनि यसबाट धेरै निराश हुनु जरुरी छैन । जे होस्, चुनाव परिणाम मधेसी दललाई सचेत गराउने खालको छ, पाठ सिक्न सक्नु पर्छ । तर, प्रत्यक्ष साक्ष्य त यही छ कि मधेसी दल अझै पनि आत्म निरीषण गर्न तयार छैन, देखिदैन । यसले अगामी दिन उनीहरुका लागि थप संकटलाई निम्त्याउन सक्छ । दलहरु र त्यसका नेताहरुमा चुलिएको अंतर्कलह घटाउने तर्फ उन्मुख हुनुको विकल्प छैन । आफ्नो नीति–रीतिहरुमा समेत आमूल परिवर्तन गर्दै अघि बढे उनीहरुले अगामि दिनहरुमा आफ्नो क्षतिपूर्ति जनताबाट पाउने निश्चित छ । तर, यसका लागि नेताहरु आत्मनिरिक्षणसंगै प्रायश्चित समेत गर्दै अघि बढ्नै पर्छ । होइन भने डुब्दै गरेको जहाजमा बसेका यात्रुहरु झै विलापसंगै प्रलाप गर्नु बाहेक अरु केही उनीहरुसंग शेष रहने छैन भन्ने हेक्का पनि मधेसी नेताहरुले राख्नै पर्छ । (यो मेरो आलेख युवा डट कम मासिकको मंसिर २०७० मा प्रकाशित छ ।)


Morcha In Madheshi Dal


Data of Castbase Assembly members


Madheshi Journalist In Politics

Madhesh

Complex Unification of Madheshi Party


Tuesday, 21 January 2014

बलिदानी दिवसको सार्थकता


दिनेश यादव ------
                 ०६३ साल माघ ५ मा रमेश महतोको सहादतपछि शुरूभएको २४ दिने मधेस विद्रोहको लप्का अप्यारिलो गरि फैलियो । ०६२÷०६३ को जनआन्दोलनमा मधेसीको सहभागिता अभूतपूर्व रुपमा रहेपनि आन्दोलनको सफलतापछि जारी गरिएको अन्तरिम संविधानमा मधेसीको सवाललाई सम्बोधन नगरिनुले विद्रोहको रुप लिएको हो । वर्षौदेखि थाती रहेको मधेस र मधेसीको संघीयता, समावेशिकता र जनसंख्या आधारमा समानुपातिक प्रतिनिधित्व गराउनु पर्नेलगायतका मागलाई उक्त संविधानमा जानी÷नजानी उल्लेख नगरिनुले आन्दोलनको पृष्ठभूमि तयार पा¥यो । २०६३ को माघ १ मा अन्तरिम संविधान जारी भएको भोली पल्टै उपेन्द्र यादव नेतृत्वमा रहेको तत्कालिन गैरसरकारी संस्था मधेसी जनअधिकार फोरम नेपालका अगुवा÷कार्यकर्ताहरुले संविधानको प्रति जलाएर विरोध गर्नु र राज्यले उक्त कार्यलाई अपराध गरेको श्रेणीमा राखी धडपकडमा उत्रिनु एकै साथ भएको थियो । विरोध स्वरुप संविधानको प्रति जलाएलगतै तत्कालिन सरकारले गृहप्रशासन लगाएर फोरम नेपालका
अगुवा÷कार्यकर्ताहरुलाई पक्राउ गरि कारवाही प्रक्रिया अघि बढाएको थियो । आफ्ना अगुवा नेता÷कार्यकर्ताहरुमाथि प्रहरी दमन भएको र प्रहरी हिरासतमा राखेर मानसिक यातना दिएको भन्दै मधेसमा फोरम नेपालका कार्यकर्ताहरुले बन्दको घोषणा ग¥यो । त्यही क्रममा तत्कालिन माओवादीका एक नेता लहान पुगेर बन्दको अवज्ञा गर्न खोज्यो । उक्त पार्टीका कार्यकर्ताले गोली चलाए, त्यसक्रममा रमेश महतोको निधन भयो । त्यसपछि त आन्दोलन झनै चर्केर गयो । आन्दोलन लम्बिदै गएपनि राज्यपक्षले त्यसको वेवास्ता गरिरहयो । एकपछि अर्को गर्दै मधेसीजनले आफ्नो ज्यानको आहुति दिन अघि बढे । त्यसक्रममा दर्जन भन्दा बढीको ज्यान गयो । सयौ घाइते भए, धेरै अंगभंग भई अस्पतालमा भर्ना गरिए । प्रहरीले आफ्नो दमन आन्दोलनकारीविरुद्ध बढाउ“दै लगे । उता, आन्दोलनकारी पनि पछाडि हट्ने छा“टै देखाएन । एउटा टशलको स्थिति थियो, मधेसमा । केही स्थानमा सम्प्रदायिक हिंसाको स्थिति पनि कायम भएको रिपोर्टहरु विभिन्न मिडियाबाट सार्वजनिक भएको थियो । तर मधेसमा आन्दोलनकारीहरुको सम्वेदनशिल अंगहरुमा टाकी–टाकी गोली हाने प्रहरी प्रशासनलाई रोक्ने निर्देशन कतैबाट आएन । नेपालमा क्रियाशिल दर्जनौ मानवअधिकारवादी संस्थाको ध्यान पनि त्यता जान सकेन । एक रिपोर्टमा त मधेस आन्दोलनताका प्रहरीको गोली लागी मारिएका अधिकांशको पेट, छाती, टाउको, कोखालगायतको अंगमा गहिरो घाउ देखिएको थियो । यो विषयमा आजसम्म पनि सम्बन्धित निकाय मौन नै रहेको छ । तर, त्यही मधेस आन्दोलनका कारण राज्यसत्ताको प्रमुख हिस्सेदार बनेको मधेसी दलहरु पनि यसबारेमा चुक्नुले धेरै प्रश्न उब्जिएको छ । मधेसी जनताले एकिकृत नेपालमा आफ्नो हकअधिकार चाहेका थिए, शान्तिपूर्ण आन्दोलनबाट । तर, तत्कालिन सरकार त्यसको दमनमा यसरी उत्रियो कि मानौं मधेसीहरु गैर–नागरिक हुन् । दमन जति–जति बढ्दै गयो , त्यसको प्रतिकार गर्ने क्रममा पनि बृद्धि हु“दै गयो । आन्दोलनका क्रममा विपक्षीहरुले आन्दोलन नेतृत्वको हातमा रहेन, यसमा बाहिरी शक्ति केन्द्रको संलग्नता छ, भारतीय अतिबादी हिन्दूहरुको उस्काहटमा आन्दोलन भइरहेको भन्ने आरोप लगाइयो । अझ राजाबादीहरुको सहयोग र समर्थनमा मधेसमा आन्दोलन भइरहेको टिप्पनी समेत धेरैबाट भयो । तर, मधेसको त्यो पहिलो आन्दोलन समाप्त भएपछि ती आरोपहरुमा कुनै सत्यता देखिएन, रहेन । पहिलो मधेस आन्दोलनमा जन–जनको समर्थन र प्रमुख राजनीतिक दलका नेताहरु समेत संलग्न हुन थालेर वृहत रुप लिएपछि सरकार आन्दोलनकारी शक्तिसंग वार्ता गर्न बाध्य भयो । त्यसताका सत्तासिन मधेसी नेताहरू समेत मधेस आन्दोलनलाई दबाउनु पर्ने मनस्थितिमा थिए । त्यसैले त उनीहरुबाट त्यसताका आएको अभिव्यक्ति मधेसीहरुको मन कुडिने खालका छन् । ती मध्ये केहीले भने, ‘मधेस आन्दोलन त पानीको पोका हो, यो केही समयपछि आफै हराएर जान्छ, केहीले हावाको झोका भने आन्दोलनलाई । ’ फेरीपनि आन्दोलन रोकिएन, जारी रहयो । बल्ल सरकारसंग वार्तापछि आन्दोलनमा केही शिथिलता आयो । तर, फोरम नेपालकै केही नेता÷अगुवा÷कार्यकर्ताले वार्तालाई धोका र वार्तापछि भएको सहमतिलाई षडयन्त्रको संज्ञा दि“दै छुट्टै समुह समेत खडा गरे । फोरम नेपालका संस्थापन पक्षले सरकारसंग गरेको २४ बू“दे सम्झौताको मसी समेत सुक्न नपाउ“दै सरकारले त्यसको कार्यान्वयनमा कुनै चासो दिएन । त्यसपछि फेरी २०६४ मा बाध्य भई केही मधेसी दलहरुले मोर्चाबन्दी गर्दै मधेसमा दोस्रो आन्दोलन शुरु गरे । उक्त आन्दोलनमा पनि धेरै जनधनको क्षति भयो , सहादत प्राप्त गर्नेहरुको संख्या ५४ नाध्यो । आन्दोलन उत्कर्षमै पुग्नै लागेको बेला, सरकारले फेरी वार्ताका लागि आन्दोलनकारी मधेसी मोर्चालाई निम्तो दियो , आठ बू“दे सहमति भयो । त्यो सहमतिको एउटा पनि बु“दा होलसेलमा कार्यान्वयन हुन सकेन, खुद्रामा भएपनि त्यो अपूरो मात्रै रहे । त्यसपछि संविधानसभाको निर्वाचन भयो, मधेसी दलहरु समेत त्यसमा सहभागिता जनाए । मोर्चा बनाएर आन्दोलनमा होमिएका मधेसी दलहरु फोरम नेपाल, सद्भावना पार्टी, तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टीले पहिलो संविधानसभामा राम्रै प्रतिनिधित्व अवसर पाए , मधेसी जनताले तीनैवटा दललाई पत्याए । तर त्यसपछि शुरु भएको सत्ता रोहणको दाउपेचमा यी तीनै दल यसरी फसे कि उनीहरुमा विभाजनको एउटा कहिले नटुङ्गिने शृंखला शुरु भयो । नेता–नेताबीच टकराव शुरु भयो , अवसरवादीहरु अवसरको खोजीमा एक्लै दल फोड्दै, तोड्दै छुट्टै दल गठन गर्दै आ–आफ्नै नेतृत्वमा पार्टी बनाए, मन्त्री भए । अझ उदेक लाग्दो कुरो त के भयो भने पहिलो मधेस आन्दोलनताका सत्तासिन रहेका व्यक्ति पटक–पटक मन्त्री बने या उसको नेतृत्वमा रहेको दल महत्वपूर्ण मन्त्रालयसहित सरकारमा गए । तर , मधेस र मधेसीको एउटा पनि सवालको संवोधन उनीहरुबाट हुन सकेन । सेनामा मधेसीको सहभागिताको कुरो उत्थानमा मात्रै सीमित रहन पुग्यो । भाषा, संस्कृतिलगायतमा प्रहार हुन थाल्यो, मन्त्रालयमा विरोध जनाएपनि अर्को बाटो अर्थात् सर्वोच्च अदालतबाट मधेसीको विपक्षमा एक पछि अर्को निर्णयहरु ला“ध्ने कार्यको थालनी भयो । सरकारमा सहभागी मन्त्रीहरु आ–आफ्ना लचारी र विवशता प्रकट गर्न थाले तर सरकार छा“ड्न साहस जुटान सकेन । संघियता, समावेशिकता, जनसंख्याका आधार समानुपातिक प्रतिनिधित्व लगायतका मुद्दाहरु शुलीमा चढ्दै गएपनि उनीहरु सत्ताभोगलाई आफ्नो अभिष्ट ठाने । मधेसी जनतामा नेताहरुप्रति वितृष्णानै जाग्ने स्थिति आयो । व्यक्तिपिच्छे दल र व्यक्तिपिच्छे नेता तथा मन्त्री बन्ने होडबाजीले मधेसी जनतामा आक्रोशसंगै कुन्ठा, निराशा, अवसाद र चिन्ता बढ्दै गयो । सरकारमा जान सहमति गर्ने तर त्यहा“ गएपछि झिंगा समेत मार्न नसक्ने हैसियतमा पुग्ने नेताहरु । अन्तरिम संविधानमा संघियताको समावेश गराउन सफल भएको मधेसी दल र त्यसका नेताहरु आफ्नै खुट्टामा आफै बञ्चरो हाने । पहिलो संविधानसभाबाट पहिचानसहितको संघियता र संघियता सहितको संविधान जारी गराउन सकेनन्, उनीहरु । अझ मधेसी विरोधी एकपछि अर्को सरकारी निर्णयको साक्षी बस्दै , ऐतिहासिक संविधानसभालाई मृत्युको शैयामा पु¥याइ दिए । पटक–पटक म्याद थप्ने तर निष्कर्षमा पुग्नै नसक्ने स्थिति सिर्जित भयो, संविधानसभा सभासदहरुबाट अनेकौ विकृतिहरु मौलाउने स्थलको रुपमा परिणत भयो । अघिल्लो संविधानसभामा जे जति गलत गतिविधिहरु भए, त्यसमा अधिकांश मधेसी सभासदहरु नै देखिए । सरकारमा पनि सहभागी मधेसी मन्त्रीहरु अकूत सम्पति कमाउनतिर लागे । स्थिति नकारात्मक बन्दै गयो । फलस्वरुप दोस्रो संविधानसभामा मधेसी जनताले मधेसी नेता र दलहरुको विपक्षमा मतदान गरे । उनीहरुको हैसियत कमजोर बनाइ दियो । अहिले पहिचानसहितको संघियतानै तुहिने अवस्थामा छ । अझै ढिलो भएको छैन । दलहरु पछिल्लो समय
एकिकरणको प्रयास थालेका छन् । तर , त्यो एकिकरण सार्थक र मधेस÷मधेसीको लागि फलदायी होस् भन्ने कामना गर्नुबाहेक जनतासंग अरु कुनै विकल्प रहेन, छैन । तर चौथो शक्ति बन्नका लागि मधेसी दलहरुमा एकिकरण भइरहेको भन्ने सुनिएको छ, यदि शक्ति नै बन्नका लागि एकिकरण हो भने त्यसको कुनै अर्थ छैन, रह“दैन । अन्त्यमा यो माघ ५ अर्थात बलिदानी दिवसमा मधेसी दल र त्यसका नेताहरुले फेरी सपथ खानुपर्ने बेला भएको छ । यो दिनलाई मधेस र मधेसीको हितमा लाग्छु भन्ने सपथ खाएर अघि बढे , मधेस आन्दोलनताका सहादत प्राप्त गरेको सहिदहरुप्रति सच्चा श्रद्धाञ्जली हुनेछ , घाइते वा अंगभंग भएकाहरुप्रति हार्दिक सहानुभूति पनि हुनेछ ।
    Published in Saharatimes Patrika, 2070 Magh 1-15 issue  
 

बलिदानी दिवस

 

 'मधेस आन्दोलनकै देन हो, मुलुकमा संघियता र समावेशिकता । पहिलो पटक मुलुकको मूल कानुनमा संघियता भन्ने शब्द मात्रै थपिएन, मधेसीको पहिचान समेत कायम भयो, सरकारी दस्ताबेजहरुमा मधेसी शब्दले स्थान पायो ।'
दोस्रो जनआन्दोलनको सफलतापछि २०६३ माघ १ मा अन्तरिम संविधान जारी भयो । त्यसप्रति विमति जनाउ“दै उपेन्द्र यादव नेतृत्वमा रहेको तत्कालिन मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल (एउटा गैरसरकारी संस्था) का केही कार्यकर्ताहरूले माघ २ मा राजधानीस्थित माइतीघर मण्डलामा अन्तरिम संविधानको प्रति जलाए । त्यसपछि नेताहरुमाथि प्रहरीले धडपकड ग¥यो । उनीहरुमाथि सार्वजनिक अपराध मुद्दा दायर गर्ने तयारी गर्दै तत्कालिन सरकारले संविधान जलाउने कार्यमा संलग्न आरोपमा झण्डै दर्जन बढी फोरम कार्यकर्ताहरूलाई प्रहरी हिरासतमा राखेर निगरानी बढायो । आफ्ना नेताहरुमाथि प्रहरीले दमन गरेको भन्दै फोरमका कार्यकर्ताहरुले माघ ३ मा तराई–मधेस बन्दको घोषणा ग¥यो । बन्द जारी रहेकै वेला माघ ५ मा सिरहाको लहानमा माओवादी कार्यकर्ताले चलाएको गोली लागेर स्थानीय विद्यार्थी रमेश महतोको मृत्युपछि तराई–मधेसमा आन्दोलनले चर्को रुप लियो । झण्डै २४ दिनसम्म जारी आन्दोलनले दुई दर्जनभन्दा बढीले सहादत प्राप्त गरेपछि तत्कालिन सरकार आन्दोलनरत पक्षसंग वार्ता गर्दै सहमतिमा पुग्यो , त्यसपछि आन्दोलनले विराम लिएको थियो । त्यस्ताका मधेसी बुद्धिजीविहरु भन्थे, ‘पहिलो पटक मधेस आन्दोलनको राप र तापका अगाडि सरकार झुक्न बाध्य भएको हो । ’ धेरैले उक्त आन्दोलनलाई सफल भएको ठानेपनि फोरमकै केही कार्यकर्ताले सरकारसंग आफ्नो संगठनले गरेको सहमतिप्रति असन्तुष्टि जनाउ“दै विद्रोह गरे , संस्थापन फोरमबाटै अलग हुने निर्णय पनि गरे । भाग्यनाथ गुप्ताको नेतृत्वमा छुट्टै संगठनको घोषणा गर्दै केही नेताहरु फेरी पनि आन्दोलनकै मुडमा देखिए । तर, त्यसपछिको आन्दोलनले सही दिशा लिन सकेन । विरोधी र विपक्षीहरुले मधेस आन्दोलन नेतृत्व भन्दा बाहिर गएको, राजाबादीको संलग्नता रहेको , भारतीय अतिबादी हिन्दूहरुको समर्थन रहेको जस्ता आरोप समेत लगाए । तर यसका बावजूद फोरम नेपाल शक्तिशाली नै थियो । तर जब उसले वीरगंज अधिवेशनमा नोर्थ ब्लकका प्रतिनिधिको उपस्थिति गरायो, त्यसपछि उसको अधोगति शुरु भएको मधेसी विश्लेषकहरुको दाबी छ । फोरम नेपालको उक्त कदमबाट चिढिएका केही भूराजनीतिक शक्ति केन्द्रले महन्थ ठाकुरको नेतृत्वमा तराई–मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी नामको अर्को दल गठन गर्न सघाएको भनाइ मधेसी बुद्धिजीविहरुको छ । तर, यसअघि फोरम नेपालको संस्थापन पक्षसंग भएको सहमति कार्यान्वयनमा सरकारी पक्षको ढिलासुस्तीले फेरी अर्को आन्दोलनको माहौल बनाइदियो । तराई–मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी, फोरम नेपाल र सद्भावना पार्टी मोर्चाबन्दी गर्दै फेरी तराई–मधेसमा आन्दोलनको थालनी ग¥यो । जनधनको क्षति रोकिएन, आन्दोलनकारीले सरकारी कार्यालयहरुमा ‘मधेस सरकार’ लेखेर गैरकानुनी कार्य समेत गरे । सरकार फेरी आन्दोलनरत पक्षसंग वार्ताको आह्वान ग¥यो ।  त्यसपछि मधेसी मोर्चा र सरकारबीच आठ बू“दे सहमति भयो । उक्त सहमतिपछि मुलुक संघियतामा गएको हो । मुलुकलाई संघियतातर्फ दो¥याए श्रेय धेरैले मधेस आन्दोलनलाई नै दिने गरेका छन् । हुन पनि हो, मधेस आन्दोलनकै देन हो, मुलुकमा संघियता र समावेशिकता । पहिलो पटक मुलुकको मूल कानुनमा संघियता भन्ने शब्द मात्रै थपिएन, मधेसीको पहिचान समेत कायम भयो, सरकारी दस्ताबेजहरुमा मधेसी शब्दले स्थान पायो ।
रमेश महतोको सहादत प्राप्त गरेको दिन माघ ५ बाट शुरु भएको आन्दोलनले मधेसीको पहिचान र मुलुकलाई संघियतामा लगेको भन्दै यो दिनलाई मधेसी दलहरूले केही वर्षयता ‘बलिदानी दिवस’ का रुपमा केही वर्षयता मनाउदै आएको छ । र, मधेस आन्दोलनलाई धेरै मधेसीले ‘मधेस जनविद्रोह’ भन्न थालेका छन् । केहीले त मधेस जनआन्दोलन पनि भन्ने गरेका छन् । मधेसमा भएको आन्दोलनलाई जसले जे भने पनि वास्वमै मधेसी जनताले पहिलो पटक राज्यसत्तासंग विद्रोह गरेको थियो । वर्षौदेखि मधेसीजनको चाहना संघियता प्राप्त भएकाले त्यो पुरा भएकोमा उनीहरु धेरै हर्षित भए, थिए । अझ समावेशिकता र जनसंख्याका आधारमा समानुपातिक प्रतिनिधित्वको कुरोले मधेसीहरु धेरै हौस्सिएका थिए । तर त्यो धेरै दिन टिक्न सकेन । पहिलो संविधानसभाको चुनावपछि सिंहदरबार र संविधानसभा भवनमा मधेसी दलका नेताहरुको मात्रै होइन सर्वसाधारण मधेसीहरुको उपस्थिति पहिलेको तुलानामा बढ्न पुग्यो । अझ, सहभागिता र प्रतिनिध्वले राम्रै स्पेस पायो । ‘किङ्ग मेकर’ को हैसियतमा पुग्यो मधेसी दल र त्यसका नेताहरु । 


                      पहिलो संविधानसभाअघि विभिन्न गुट, उपगूटका बाबजूद ‘सद्भावना’ ट्रेडमार्कका रुपमा एउटा मात्र मधेसी दल थियो । तर, संविधानसभा पछि तीन वटा दल फोरम नेपाल, तमलोपा र सद्भावना पार्टी । पहिलो संविधानसभाको निर्वाचनमा मधेसी जनताले यी तीन वटा दललाई मात्रै प्रतिनिधित्व गर्ने जिम्मेबादी सुम्पेको थियो । सत्ता खेलका कारण यी तीनै दलहरु धु“जा–धु“जामा बा“डिदै २० को हाराहारीमा पुग्यो ।  

तर, सत्ताको फोहरी खेल शुरु भएपछि मधेसी दलहरुमा संस्थापन पक्षसंग विद्रोह गर्दै नेताहरुको चोइटिने क्रम एकाएक बढेर गयो । अर्थात संस्थापन पक्षविरुद्ध मोर्चाबन्दी गर्दै धेरैले आ–आफ्नै नेतृत्वमा दलहरु गठन गर्न थाले । सद्भावना पार्टीमा बर्षौदेखि जारी गुट र फूटको क्रम मधेस आन्दोलनपछि स्थापित फोरम नेपालमा पनि सरुवा रोग झै स¥यो । पहिलो संविधानसभाअघि विभिन्न गुट, उपगूटका बाबजूद ‘सद्भावना’ ट्रेडमार्कका रुपमा एउटा मात्र मधेसी दल थियो । तर, संविधानसभा पछि तीन वटा दल फोरम नेपाल, तमलोपा र सद्भावना पार्टी । पहिलो संविधानसभाको निर्वाचनमा मधेसी जनताले यी तीन वटा दललाई मात्रै प्रतिनिधित्व गर्ने जिम्मेबादी सुम्पेको थियो । सत्ता खेलका कारण यी तीनै दलहरु धु“जा–धु“जामा बा“डिदै २० को हाराहारीमा पुग्यो ।  मधेसीको नाममा केही नेताहरुले आफ्नै नेतृत्वमा पार्टी खोल्न भ्याए । धेरै नेताहरु मन्त्री बने , कोही त विगत छ वर्षको दौहानमा पटक–पटक मन्त्री पदमै आसिन रहे । इतिहासमै सबैभन्दा बढी मन्त्री मधेस क्षेत्रबाटै बने । अझ मोर्चाबन्दी गर्दै सरकारमा जाने एउटा शृंखलानै शुरु भयो । सरकारमा जाने मधेसी नेताहरुको चस्काले दल र मधेसी जनताबीचको दुरी क्रमिक रुपमा बढ्दै गयो । अझ सबैभन्दा दुखद त के रहयो भने सरकारमा जानकै लागि मधेसी दलका नेताहरुले अन्य पार्टीहरुसंग ब“ुदै–बु“दाको सम्झौता गर्दै हिडे । तर, यो उनीहरुका लागि ‘हात्तिको देखाउने दा“त’ जस्तै बन्न पुग्यो । सरकारमा जा“दा ती बु“दाहरु मध्ये एउटाको पनि कार्यान्वयन गराउन मधेसी दलहरु सकेनन, यसमा उदासिन देखिए , नेताहरुको कुनै इन्ट्रेस्टै रहेन । मधेसीको भनिएको मुलभूत मुद्दाहरु ः सेनामा जनसंख्याका आधारमा प्रनिधित्व, सरकारी सेवामा मधेसीको पहू“च बढाउने समावेशी विधेयक लगायतमाथि एकपछि अर्को गर्दै प्रहार हुन थाल्यो । मधेसी दल र त्यसका नेताहरु भने मूकदर्शक मात्रै बनिरहे , अमूक दलका लागि सरकारको टेकोको रुपमा मात्रै मधेसी नेताहरु देखिए । अझ मधेस आन्दोलनका क्रममा सहादत प्राप्त गरेकाहरूलाई सहिद घोषणा र घाइतेहरुलाई उपचारसहितको राहत दिन समेत मधेसी दल सत्तामा छ“दै विलम्ब हुन गयो । मधेसीहरूले भन्ने गरेको ‘बलिदानी दिवस’ माघ ५ सातौ वर्षमा प्रवेश गरेको छ । तर मधेस र मधेसीका सबाल ज्यू“का त्यू“ छन् । गरिबी, निरक्षरता, बेरोजगारी, युवाहरुको ठूलो जमात विदेश पलायन, महिलामाथि हिंसा, छुवाछुत जस्तो जघंन्य अपराध, दहेजप्रथालगायतको वेथितिबाट मधेस र मधेसी अझै गा“जेकै अवस्था छ । शिक्षा, स्वास्थ्य र विकास–निर्माणलगायतका क्षेत्रमा खासै सुधार हुन सकेको छैन । छ वर्ष भइसक्दा पनि मधेसी जनता अनेकौ वेथितिको सिकार छन् , चौतर्फी समस्या र पीडामा रहेको गुनासो उनीहरुबाट सुनिन्छ , उपचार कतैबाट नपाएको अवस्था छ । छ वर्षअवधिमा केही नेताहरु मोटाएका छन्, धन–कुबेर बनेका छन्, मन्त्री पदमा बसेर अकूत सम्पति कमाएका छन् तर जनता जो जनार्दन हुन्, उनीहरुको अवस्था पहिले भन्दा पनि जर्जर बनेको छ । शायद यही कारणले मधेसी मतदाताहरुले पछिल्लो निर्वाचन संविधानसभा दुईमा मधेसी दल र त्यसका नेताहरुको विरोधमा मतदान गरे । उनीहरुलाई सबक सिकाउन आफूलाई मधेसको धुरन्धर नेता ठान्नेहरु समेत पराजित भए । उनीहरुले निर्वाचनमा लज्यास्पद हारबाट अझै पनि पाठ लिएका छैनन् । त्यसैले त दोस्रो संविधानसभाका लागि समानुपातिक तर्फको सूचीमा मधेसी नेताहरु परिवारवाद, पैसावाद, अपनत्ववादमा लागेर आफ्नै पार्टीको कार्यकर्ताहरुको मात्रै होइन सिंगो मधेसी जनताको मानमर्दन गरेका छन् । अगामी दिनहरुमा समेत उनीहरुको यसप्रकारको मानसिकतामा परिवर्तन नभए, त्यो दिन टाढा छैन, जब सबै मधेसी नेताहरु जनताबाट थप वहिष्कृत हुनेछन् । पछिल्लो समय गुट–गुटमा पार्टी एकिकरणको अभियान नेताहरुबाट थालेको सुनिएको छ । तर ती एकिकरण केका लागि ? त्यसको चिरफार पार्टी एकिकरण हुनु भन्दा अघि नै हुनुपर्ने जनताको माग छ ।  सत्तामा पुग्नकै लागि त्यो हो भने मधेसी जनताको त्यसमा कुनै चासो छैन, रहदैन । 

मधेसी दलहरूका फरक–फरक धारणा

दिनेश यादव -
संविधानसभाको दोस्रो निर्वाचनपछि पनि यहा“का दलहरूमा सुधारको संकेत देखिएको छैन । यहा“को राजनीतिमा अहिले तीन वटा धार÷पक्ष देखा परेका छन् । एउटा पक्ष चुनावमा पुच्छ«ेतार झै फैलिएपछि राजनीतिक बार्गेनिङ गर्दैछ भने अर्को पक्ष उनीहरुलाई अप्ठेरोमा कसरी पार्न सकिन्छ भन्ने रणनीतिका साथ अघि बढेको अवस्था छ । तेस्रो पक्ष चाही“ ‘हेर अनि अघि बढ’ भन्ने मनस्थितिमा देखिएको छ । संविधानसभा गठन, गैर–दलिय सरकारको वर्हिगमन, संविधान निर्माण, मुलुकमा जारी राजनीतिक गतिरोधको अन्त्यलगायतका विषयमा केन्द्रित हुनु पर्ने दलहरू आ–आफ्नै दम्फू बजाउ“दै हिडेका छन् । पछिल्लो निर्वाचनबाट ठूलो दल बनेको र करीब एउटै हाराहारीमा सिट÷जीत हासिल गरेको नेपाली कांग्रेस र एमाले संविधान निर्माण प्रक्रियामा भन्दा अन्यतिर मोडिएको गुनासो जन–जनबाट सुनिन थालिएको छ । यो कुनैपनि दृष्टिकोणले राम्रो होइन । जातिय संघियता, कट्टरवाद, क्षेत्रियबादलगायतका मुद्दाको विपक्षमा नया“ जनादेश आएको भन्दै चुनाव लगतै प्रचार गरेर मतदाताहरु माझ उनीहरु खुशी साटासाट गरेको केही दिन नबित्दै सत्ता, पद र प्रतिष्ठातर्फ उन्मुख भएकोमा जनता फेरी निराश हुन थालेका छन् । यसका विपक्षमा रहेका र थोरै स्थानमा विजय हासिल गरेका एमाओवादी र मधेसकेन्द्रित केही दलसहितले चाही“ कांग्रेस र एमालेलाई अप्ठेरोमा कसरी पार्न सकिन्छ भन्ने ध्याउन्नमा देखिनु पनि राम्रो संकेत होइन । लोकतन्त्रमा विरोध वा समर्थन गर्न सकिने विश्वव्यापी मान्यता विपरित केही दलहरु राजनीतिक कहल बढाउने मनस्थितिमा देखिनुले कसैको भलो हुने देखिदैन । यसलाई सारमा यसरी भन्न सकिन्छ कि दलहरू अहिले जुहारी खेल्ने स्थितिमा छन् ।  त्यसैले त केही दलहरु राष्ट्रपति र उपराष्ट्रपति फेर्नु पर्ने भनिरहेका छन् भने अर्कोले यसो गर्न नमिल्ने भन्दै आपसमा विवाद गरिरहेका छन् । सहमतिको डम्फू पनि बज्न शुरु भएको छ । दलहरु फेरी सहमतिबाटै समस्याको समाधान गर्नु पर्ने भन्दै बैठक र छलफलहरुमा व्यस्त देखिने गरेका छन् । तर, ती बैठकहरु फेरी पनि ‘अनिर्णित’ र ‘गफ गर्ने ज्यावल’ बनाइदैछ ।
यसैबीच, विवादहरूका चाङ पनि बढदै गएका छन् । एमाओवादीसहितका १८ दल निर्वाचनमा ‘धा“धली भएको’ भन्दै स्वतन्त्र छानबिन आयोगको गठन माग तेर्साएको छ । कांग्रेस र एमाले चाही“ निर्वाचनबारे उठेका विषयवस्तु संसदीय समितिबाटै समाधान गर्न सकिने अडान राखेका छन् । फेरी, यी दुई दल आफै पनि शक्तिशाली पदहरू बा“डफा“डमा बल्झिएका छ । विपक्षमा रहेको दलहरु भने आयोग गठन नभएसम्म समानुपातिक तर्फको नाम निर्वाचन आयोगमा नपठाउने अडान दोहराई रहेका छन् । त्यस्तै, कांग्रेस र एमाले निर्वाचनमा विजयी प्रजातान्त्रिक धारहरुलाई आफ्नो कित्तामा ल्याएर सरकार बनाउनु पर्ने विषयमा समेत आ–आफ्नो पार्टीभित्रै आन्तरिक गृहकार्यमा व्यस्त छन् । उता, दल–दलहरु माझ, दलका नेता–नेताहरु माझ पनि आ–आफ्नै भनाईहरु समेत सार्वजनिक भैरहेका छन् । यसले मुलुकको राजनीतिलाई अनिर्णित मात्रै बनाइरहेको छैन, विकास, निर्माण र जनसरोकारका विषयहरु ओझेलमा परिरहेका छन् । दलहरुबीच राजनीतिक सहमति हुन नसक्दा निर्वाचन आयोगलाई समानुपातिकतर्फका संविधानसभाका सदस्यहरूको नामावली प्रकाशनमा कठिनाई भइरहेको छ । उसले पटक–पटक म्याद थप्ने पुरानै गल्ति दोहराउन थालेको छ । पहिले २५ मंसिरसम्म यसका लागि आयोगले तोकेको समयसीमा पुस ३ सम्मका लागि बढाइयो । तर, अब फेरी त्यो म्याद बढाउनुपर्ने माग उठ्न थालेको छ । हुनत, जति समयसीमा बढाएपनि राजनीतिक दलहरु परस्पर सहमतिमा नपुगि समस्याको समाधान हुन सक्तैन ।
यसैबीच, कांग्रेस र एमाले राष्ट्रपति र उपराष्ट्रपति फेर्नेतर्फको विवादमा अल्झिरह“दा एमाओवादीसहितको १८ दलले संयुक्त मोर्चा बनाएर अघि बढ्न सकिने जनाउ दिएको छ । तर उनीहरु ‘खा“टी’ प्रतिपक्ष चाहीं अझै बन्न सकिरहेका छैनन् । फरक–फरक विचार बोकेकाहरूको ‘एउटा समूह’ जस्तो देखिएपनि ती दलहरुबाट आ–आफ्नै धारणा सार्वजनिक भएका छन् । खासगरि राष्ट्रपति फेर्ने विषयमा यी समूहबाट मिश्रित प्रतिक्रिया आएको छ । मधेसकेन्द्रित दलहरु यसमा अग्रस्थानमा छन् । छानबिन आयोग गठन नभएसम्म समानुपातिक तर्फको सूची नपठाउने निर्णयको विपक्षमा पनि ती दलहरुका केही नेताहरु देखिएका छन् । सद्भावना पार्टी संविधानसभामा सहभागी हुने निष्कर्ष निकाल्दै १८ दलमा एक्लो धारणा सार्वजनिक गरेको छ । जहा“सम्म राष्ट्रपति÷उपराष्ट्रपति फेर्ने विषय छ, त्यसमा पनि मधेसी दलहरु विभाजित भएका छन् । अधिकांश मधेस केन्द्रित दल राष्ट्रपति फेर्नेको विपक्षमा देखिएका छन् । यसमा सद्भावना पार्टी, संघिय सद्भावना पार्टी र राष्ट्रिय मधेस समाजवादी पार्टी त खुलेरै राष्ट्रपति फेर्नै नहुने भनेका छन् । तर, तराई–मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी, मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल चाही“ अझैपनि यसबारे मौन छन् । लोकतान्त्रिक फोरम भने यसबारे ‘क्लियर कट’ कुरै गरेको छैन । नया“ जनादेश संविधान निर्माणका लागि भएकाले राष्ट्रपति फेर्ने विषयमा सहमतिबाटै समाधान गर्नु पर्ने भनाई राख्दै उसले पञ्छिन खोजेको जस्तो देखिएको छ । अहिले सबैभन्दा बढी चर्चामा रहेको ‘राष्ट्रपति फेर्ने÷नफेर्नेमा’ विषयमा मधेसका बुद्धिजीविहरुबीच पनि बहस शुरु भएको छ । अधिकांशले उक्त पद चलाउन नहुने धारणा राखिरहेका छन् । उनीहरूले राष्ट्रपति फेर्ने बहस संविधान बन्न नदिने र जनताको ध्यान अन्यत्र मोड्न तथा विषयान्तर गराउने खेल मात्रै भएको प्रतिक्रिया दिएका छन् । एक जना बुद्धिजीविले भने, ‘ पछिल्लो चुनावबाट ठूला दल बनेकाहरु पनि विषयान्तर भएका छन् भने कम स्थानमा विजय भएकाले ‘धा“धली’ को नाममा जनताको ध्यायन अन्यत्र मोड्न खोजेका छन् । यी दुइटै विचार देश र जनताका लागि खतरनाक हुन सक्छ । ’ तत्कालै गतिरोध अन्त्य गरि पहिलो संविधानसभाको बैठक डाकेर सबै विवादित विषयको छिनोफानो संविधानसभाबाटै गर्नुपर्ने माग जनताको छ । त्यसैले यसका थोरैपनि विलम्बले जनता निराश हुनसक्छन् , यसप्रति पनि राजनीतिक दल र त्यसको ध्यान जाने हो कि ?
Kantipur Qutar 19 th dec 2013

मधेसी दलको पराजयका कारणहरु




दिनेश यादव-
संविधानसभा–२ को निर्वाचन परिणामले केही रोचक तथ्यहरु उजागर गरेको छ । ती मध्ये पहिलो तथ्य ः संसदबादी दलहरूको अप्रत्यासित बढत, दोस्रो ः राजावादी तथा सनातन हिन्दू धर्मसहितको राष्ट्रको माग गर्ने दलको सफलता, तेस्रो ः संघियता पक्षधर दलहरुको कमजोर प्रदर्शन र चौथो ः मधेसबादी दलहरुको लज्यास्पद हारसंगै त्यसका प्रमुख नेताहरुको पराजय र जमानत जफत हुनु पनि हो । हुनत, निर्वाचन परिणामबारे केही बुद्धिजीविहरुले आ–आफ्नै खाले अनुमान, दाबी र विश्लेषणहरु पनि गरेका थिए । त्यो केहीको ‘संयोग’ ले मिल्न पुग्यो भने केहीको नमिलेको अवस्था रहयो । खासगरि, कांग्रेस, एमाले र एमाओवादीको सिट संख्याबारे गरिएको आंकलन कमैको मिलेको छ । तर मधेसवादी दलहरुबारे गरिएको अनुमान चाही ‘करीब–करीब’ मेल खाएको छ । किनभने उनीहरु फुट, उपगुट र सत्तालिप्सामा तल्लिन रहेकोले जनताहरु धेरै पहिलेदेखि उनीहरुबाट आक्रोशित बन्दै गएका थिए ।
 कांग्रेस सबैभन्दा ठूलो दल हुने अटकलबाजी उक्त पार्टीका ‘सक्रिय’ कार्यकर्ताबाहेक अरुले गरेकै थिएन भने पनि हुन्छ । यही स्थिति रहयो, एमाले र एमाओवादीमा । फेरी ‘प्रि–एलेक्सन प्रोजेक्सन’ नेपाल जस्तो दलगत रुपमा विभाजित समाजमा मिल्ले स्थिति पक्कै पनि थिएन, छैन । त्यसैले यहा“ सम्पन्न दुईटा संविधानसभाको निर्वाचनमा पनि त्यो मेल खाने कुरै भएन । फलस्वरुप प्रमुख तीन दलहरुको पक्षमा आएको परिणामलाई धेरैले ‘अनअपेक्षित’ भनि प्रतिक्रिया दिइरहेका छन् । यी प्रतिक्रिया दिनेहरुले यो निर्वाचनबाट सार्वजनिक भएको जनमत यहा“का राजनीतिक दलहरुलाई सचेत भई जनचाहना अनुरुप काम गर्न निर्देशित गर्ने खालको भएको बताउ“छन् । अगामी दिनहरु प्रमुख दलहरुका लागि थप चुनौतिपूर्ण रहेको धारणा समेत उनीहरुको छ । निर्वाचनपछिको जनमत वा जनादेशलाई दलहरुले संयमित र सन्तुलित भई प्रदर्शनका लागि दबाब दिने खालको छ । किनभने चौथो शक्तिका रुपमा मतदाताहरुले ‘राजाबादीहरु’ आफ्नो छनौटमा पारेका छन् । यसलाई वेवास्ता गर्न दलहरुले अब चाही“ गल्ति गर्नु हुन्न ।
सिरहाको लहानमा माघ ५ गते सातौ बलिदानी दिवसमा सहिद स्मारकमा मधेस जनविद्रोहका सहिदहरुको शालिकमा मल्र्यापण गर्दै फोरम नेपाल अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ।

पहिलो संविधानसभामा एमाओवादीलाई जनादेश दिएर एमाले र कांग्रेसलाई सुधारोन्मुख बन्नका लागि सन्देश दिन खोजेका थिए भने यो दोस्रो संविधानसभाको निर्वाचनले दुई दलहरुलाई आफ्नो पुरानो गल्ति पुन ः नदोहराउन विकल्पका रुपमा राजाबादीलाई प्रमुख दल समक्ष उभ्याइ दिएका छन् । उता, मधेसवादी दलहरुलाई पनि त्यस्तै सन्देश जनताले दिन खोजेको देखिन्छ । हालै सम्पन्न निर्वाचनले मधेसी दलहरुलाई सुध्रिन आग्रह गरिएको जस्तो देखिएको छ । पहिलेको ‘मदर पार्टी’ बाट मधेसी दलमा आबद्ध भएकाहरु जितेर सत्ता केन्द्रित राजनीति र फुटगुटको गलत संस्कारलाई बढावा दिए । अब त्यसलाई परित्याग गर्न मतदाताले आफ्नो जनमतबाट उनीहरुलाई सचेत पनि गराएको छ ।
२००८ सालपछि ‘तराई कांग्रेस’ र २०४६ पछि ‘नेपाल सद्भावना पार्टी’ मात्रै थियो । २०६४ पछि पहिलेको सद्भावना पार्टी (विभिन्न समूह) सहित मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल र तराई–मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी गरि तीन वटा मात्रै मधेस केन्द्रित दल थिए । पहिलो संविधानमा यिनै तीन दलहरुका पक्षमा मधेसीहरुले मतदान गरेकै हुन । पचास भन्दा बढीको सहादत र दर्जनौको अंगभंगपछि सफल भएको मधेस आन्दोलनले ‘संघियता र समावेशिकता’ को मुद्दालाई नेपालमा स्थापित ग¥यो , त्यसलाई लिपीबद्ध गरि बैधानिकता प्रदान गर्न मधेसी दलहरु चुके । उनीहरु संविधानसभाको गठनसंगै शुरु भएको पद र सत्ता केन्द्रित राजनीतिमा चुर्लुम्म डुबे । यति भए त हुन्थ्यो नि ती मधेसी दलहरुमा कहिले नटुङ्गिने ‘शृंखलाबद्ध’ विभाजनको खेल शुरु भयो । यसले जन–जनमा निराशा, कुन्ठा, हताशा कायम हुन पुग्यो । बेरोजगारी, सुलभ शिक्षा र स्वास्थ्य सेवाको अवसर बञ्चित हुने मधेसीहरुको संख्या बढ्दै गयो । निर्माण र विकास ठप्प हुन पुग्यो । तराई–मधेसका जिल्लाहरुको स्थानीय निकायमा भ्रष्टाचार मौलाउ“दै गयो । मधेसीजनको दैनिकी कष्टप्रद बन्दै गयो । शितहलर, लू, बाढी, सर्पदंश, आगलागि, खडेरी, बाढीलगायतका दैविक प्रकोपमा परेकाहरुलाई सहानुभूति प्रकट गर्न समेत मधेसी दलका नेताहरुले आफ्नो कर्तत्व ठानेनन् । जनतालाई राहत प्रदान गर्ने खालका कुनैपनि नीति ल्याउन उनीहरु चुके , सत्ता खेलमा उनीहरु डुबे । पार्टी विभाजन गर्दै मन्त्री बन्नतिर व्यस्त भए । पार्टीहरुमा विभाजन यसरी भयो कि नेता पिच्छे दल र दल पिच्छे मन्त्री बन्ने शृंखला शुरु भयो । तर, विगतमा भएका यी विभाजनहरुलाई मधेसका बुद्धिजीवि र पेशाकर्मीहरु मात्रै होइन स्वयं चोइटिएर जानेहरुले ‘मधेसीहरुमा नेतृत्व विकास’ को संज्ञा दिएर पंछिन खोजे । मधेसका जनताहरुले त्यो कुरोलाई ठाडै अस्विकार गरेको पुष्टि यो चुनावबाट भएको छ । जनताको चाहना मधेसीहरु एकजूट भएर आऊन भन्नेनै थियो । तर च्याउ झै उम्रिन पुगेका मधेसका दल र नेताहरुले त्यो चाहना र आकांक्षाहरुलाई नजरअन्दाज गरिदिए । त्यसको परिणाम आज उनीहरु भोग्न बाध्य भएका मात्र हुन ।
 झण्डै डेढ दर्जन मधेसी दलमध्ये तीन वटाका अध्यक्षले मात्र निर्वाचनमा जित हासिल गरेका छन् । केहीको जमानत बचेपनि अधिकांशको जफत भएको स्थिति छ । जीत हासिल गर्ने मधेसी दलका नेताहरुमा फोरम लोकतान्त्रिकका विजयकुमार गच्छदार, फोरम नेपालका उपेन्द्र यादव र तराई–मधेस सद्भावना पार्टीका महेन्द्रराय यादव छन् । तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टीका अध्यक्ष महन्थ ठाकुर, सद्भावना पार्टीका राजेन्द्र महतो, राष्ट्रिय मधेस समाजवादी पार्टीका शरदसिं भण्डारी, फोरम गणतान्त्रिकका राजकिशोर यादव, संघिय सद्भावना पार्टीका अनिलकुमार झा, नेपाल सद्भावना पार्टीकी सरिता गिरी, नेपाल सद्भावना पार्टी (गजेन्द्रबादी) का विकास तिवारीलगायतको प्रदर्शन यो निर्वाचनमा कमजोर रहयो । अझ ती दलका ‘भाइटल पोस्ट’ हरुमा रहेकाहरु एकपछि अर्को गर्दै पराजयको मुख मात्रै हेरेका छैनन्, जमानत समेत बचाउन नसक्ने अवस्थामा उनीहरु पुगेका छन् । खासगरि मधेसी दलका प्रभावशाली मानिएका नेताहरु हृदयेश त्रिपाठी,  राजलाल यादव, बृशेषचन्द्र लाललगायतले पराजय बेहोर्नु परेको छ । निर्वाचनमा हारजीत स्वभाविकै प्रक्रिया भएपनि जनतालाई ‘जनार्दन’ नमान्दा समस्या हुने कुरोको सद्बुद्धि अगामी दिनहरुमा यी नेताहरुमा पलाउनेनै छ ।         
 निर्वाचनमा मधेसी दलहरुको कमजोर प्रदर्शनबारे डा.पारसनाथ यादव भन्छन्, ‘पहिलो संविधानसभापछि हरेक सरकारमा सहभागि भएपनि मधेस र मधेसीको मुद्दालाई संवोधन गर्न नसकेपछि जन–जनमा आक्रोश व्याप्त थियो । त्यसको रिभर्समा मधेसीहरुले मतदान भएको हो ।’ उनको यो भनाईमा मधेसका अन्य बुद्धिजीविहरुले सही थाप्दै भन्छन्, ‘नेपाली कांग्रेस र एमालेले राम्रो काम गरे या यी दुई दलका नेताहरु राम्रा छन भनेर मधेसीले मतदान गरेको पटक्कै होइनन् । मधेसी नेताहरूलाई सन्देश दिन र पाठ सिकाउन उनीहरुले विपक्षमा मतदान गरेका हुन् । यो एउटा आक्रोश मात्रै हो । ’ मधेसका विश्लेषकहरुका अनुसार पहिलो संविधानसभाले मधेसी दलहरुलाई सरकारमा जाने जनादेश दिएको थिएन । ‘पहिचान सहितको संघियता र संघियतासहितको संविधान’ निर्माण गर्न धेरै प्रतिनिधि अघिल्लो संविधानसभामा मधेसीले पठाएकै थिए । ‘तर उनीहरुले सत्ताकेन्द्रित राजनीति शुरु गरेपछि जन–जनमा आक्रोश बढ्न गयो । अझ पार्टी फोडेरै सरकारमा जाने होडबाजीमा उत्रे केही नेताहरु ’ डा.यादव भन्छन्, ‘ जनताको निराशा र आक्रोश परिणाम हो, मधेसी दलहरुको कमजोर प्रर्दशन ।’ सप्तरीका मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता इब्राहिम अन्सारीले भने, ‘मधेसका प्रतिनिधि कहलिएकाहरु आकाशमा उक्लेका थिए, उनीहरुको भू“ईमा खुट्टै थिएन, बल्ल सतहमा आएका छन, अब पक्कै चेत खुल्ला । ’उनका अनुसार कांग्रेस र एमालेबाट आएकाहरु ‘मधेसबाद’ को नाममा मधेसीमाथि शासन गर्न खोजेकाले मतदाताहरुले बरु राष्ट्रिय पार्टीहरुनै असल भन्दै मत जाहेर गरेका हुन । 
Kantipur Qutar 28 th Nov 2013

मधेसीको बहसमा सत्ता


दिनेश यादव -
संविधानसभा–२ को निर्वाचन प्रक्रिया नटुङ्गिएदै सत्ताको जोडघटाउ शुरु भएको छ । कुनैपनि दललाई बहुमत नआएपनि ठूलो दलको हैसियतमा पुगेकाहरूले आ–आफनो तर्क र दाबीहरु पेश गरिरहेका छन् । खासगरी प्रमुख दुई ठूला दल नेपाली कांग्रेस र एमालेबीच राष्ट्रपतिको पदलाई लिएर मतभिन्नता देखिएको छ । कांग्रेस अहिलेकै राष्ट्रपतिको पक्षमा जोडदार रुपमा उभेको छ भने एमाले यसको विपक्षमा । पहिलोबाट तेस्रो दलमा सांगुरिन पुगेको एमाओवादीले एमालेकै लाइन समातेको छ । उसले नया“ जनादेशलाई मान्ने हो भने राष्ट्रपतिको पनि छिनोफानो गर्नुपर्ने प्रतिक्रिया दिएको छ । उसको यो प्रतिक्रिया त्यस बेला आएको छ, जब संविधान सभामा जाने÷नजानेबारे पार्टीभित्र बहस जारी छ । संविधान सभाको उपयोगबारे पार्टीभित्र दुईटा धारहरू देखिएका छन् , एउटा धार ‘प्रतिकान्त्रि’(माओवादीकै भाषामा) रोक्न सडक, सदन र सरकार तिनै मोर्चाको उपयोग गर्ने पक्षमा छन् भने अर्को चाही“ प्रतिपक्षमा रहेका केही असन्तुष्ट दलहरू (तत्काल १८ पार्टी) सहितको मोर्चाबन्दी गरेर सडक संघर्षलाई मात्रै विकल्पका रुपमा रोज्नुपर्ने अडान राखिरहेका छन् । यसबाट आफूलाई परिवर्तनको मशाल जलाउने एक्लो पात्रका रुपमा दाबी गर्ने एमाओवादी स्वयं त्यही मशालबाट खरानी बन्ने स्थितिमा पुग्दा समेत उसको चेत नखुलेको पुष्टि हुन्छ ।
मधेस विद्रोहका प्रथम सहिद रमेश महतोलाई माघ ५ मा लहानस्थित सहिद स्मारकमा  मल्र्यापण गर्दै बुबा रइया महतो .

यसैबीच, प्रमुख तीन दलहरु भावी रणनीति र कार्यदिशा तय गर्नतर्फ व्यस्त रहेकै अवस्थामा मधेस केन्द्रित दलहरुमा समेत ‘यो पक्ष वा त्यो पक्षमध्ये कुनमा’ जाने भन्ने अन्यौलता देखिएको छ । ती दलहरूमा पनि तत्काल कांग्रेसलाई समर्थन गर्दै सरकारमा जाने एउटा धार र एमाओवादीको नेतृत्वमा गठबन्धन बनाएर अधिकार प्राप्तिका लागि संघर्ष गर्दै प्रतिपक्षमा बस्ने अर्को धार स्पष्ट रुपमा देखिएका छन् । पहिलो धारमा विजयकुमार गच्छदारको नेतृत्वमा रहेको फोरम लोकतान्त्रिक देखिएको छ । उसले कांग्रेसको नेतृत्वमा सरकार बन्नु पर्ने भनाई सार्वजनिकै गरिसकेको छ । चुनावमा धा“धली भएकोबारे एमाओवादी र मधेसी दलहरुको अडानमा सही थापेको उसले सरकार निर्माणका सम्बन्धमा भने फरक विचार राखेको छ । मधेस आन्दोलनमा खासै भूमिका नरहेपनि उपेन्द्र यादवको नेतृत्वमा रहेको फोरम नेपालमा संविधान सभा(१ को निर्वाचन हुनु केही साताअघि मात्रै प्रवेश गरेको गच्छदार यो चुनावमा सबै मधेसी दललाई उछिन्दै पहिलो बनेको छ । उसको यो उपलब्धि मधेसीहरुको मतबाटै मात्र नभई थारुहरुको मत र समर्थनबाट प्राप्त भएको हो । यो कुरो लोकतान्त्रिक फोरमका पदाधिकारीहरुले बुझैरै होला, अब पार्टीको नामै परिवर्तन गर्ने मनस्थितिमा पुगेको छ । पार्टीका एक युवा नेताले भने, ‘अब पार्टीले मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल लोकतान्त्रिकबाट ‘मधेसी’ शब्द हटाउने तयारी भएको छ , यसबारे औपचारिक निर्णय चाही“ तत्कालै भइ सकेको छैन । ’ यता, फेरी पनि सत्ताको चाहना उक्त पार्टीका नेताहरुको कानमा सुरिलो र कर्णप्रिय सगित बनेर गुञ्जिन थालेको छ । शायद यो यस कारणले पनि भएको हुन सक्छ कि यो चुनावमा भएको खर्च असुल्न सकिन्छ । अन्य मधेस केन्द्रित दलहरूमध्ये एक÷दुईलाई छाडेर कसैको पनि सत्तामा तत्कालै जाने मुड देखिदैन । तर उनीहरुमा अडान नभएकाले जुनसुकै बेला पनि कित्ता परिवर्तन हुने संभावना पनि त्यतिकै छ ।  
सत्ताकै लागि कमजोर भएका मधेसी दलहरु फेरी पनि सत्तामै जान मरिहत्ते गरे उनीहरुको मटियामेट हुने भविष्यवाणी धेरैको छ । किनभने यो चुनावमा मधेसी दललाई सत्तामा जाने जनादेश दिएको छैन । यदि यसो हुने हो भने मधेसी जनता थप निराशा हुने छन् । आज धेरै आम मधेसी, जसले मधेस आन्दोलनपछि आफूले जिताएका नेताहरुबाट आमूल परिवर्तनको अपेक्षा गरेका थिए, उनीहरूको परिवारका एक सदस्य खाडी मुलुकहरूमा, भारतमा तथा मलेसिया, कोरियामा आफ्नो रगतलाई पसीनासंग साट्दै आफ्ना परिवारलाई जिउंदो राख्न संघर्ष गरिरहेका छन् । उनीहरु आफ्नै भूमिमा फर्केर श्रम र पसिना खर्चन चाहेका छन् । त्यसका लागि उचित वातावरण शान्ति, सुरक्षा, रोजगारी र अवसर मात्र जुटाइ दिएपुग्छ ।  मधेसका गाउ“घरमा भेटिनेहरू भन्ने गरेका छन्, ‘ हामीले आन्दोलन त ग¥र्यौ, नेताहरुलाई साथ पनि दियौं तर नेताहरुले धोका दिए । आन्दोलनबाट केहीले लाभ लिएपनि समग्र मधेस र मधेसीले केही पाउन सकेनन् ।’
मधेसी जनताले बिहानी चाहेका छन् । उनीहरुका लागि बिहानीको अर्थ हो, उनीहरुको घरदैलोमा विकासको मूल फुटोस् उनीहरुको जीवन १८ औं शताब्दीको जीवन नभएर २१ औं शताब्दीको जीवन होस, जसका लागि उनीहरु सदैव तयार छन् । लाचारी र बेरोजगारीबाट उनीहरु आजित भएकाले घर दैलोमा परिवर्तन र विकास निर्माण चाहेका हुन् । तर, पुरानै सोच र संस्कार भएका नेताहरुबाट यो असम्भव भएको उनीहरु बताउ“न अलिकति पनि हिच्किचाउ“दैनन् । भन्छन्, ‘ विगतमा मधेसी नेताहरुमाथि आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, बैचारिक विचलन हावी भयो । उनीहरुको आर्थिक हैसियतमा आमूल परिवर्तन भयो । यसबारे धेरै पटक संकेत गरायौ, नेताहरु आलोचित भए, तरपनि सुधार हुन सकेन । अगामी दिनहरुमा यस्तो नहोस् भन्ने चाहन्छौ । ’ जनताहरुको यो चाहनालाई अझैपनि मधेसी नेताहरुले आत्मसात गर्न सकेका छैनन् । त्यसैले त विगतमा भएका कमी कमजोरीको समिक्षा उनीहरुले बस्तुगत रुपमा गर्नु पर्नेमा विषयगतमा गर्न व्यस्त छन् या त्यसैमा अल्झिएका छन् ।
अर्को कुरो, मधेसी दलहरुलाई सभासद वा संसदको सिटहरुको संख्यामा तौलिन थालिएको छ । यो सरासर गलत हो । मधेसी दलहरु यो निर्वाचनमा हारेको यथार्थ हो तर उनीहरुको मुद्दा नहारेको भन्ने मधेसी नेताहरुको भनाईले धेरै कुरोको संकेत गर्छ । हो, विभाजित भएर चुनावमा जा“दा कम स्थानमा जीत हासिल गरे उनीहरुले । तर समानुपातिक सिटको कुरो गर्ने हो भने पहिले चार र अहिले १० वटा मधेसी दल बनेपनि त्यो संख्या कायमै छ । यसले के देखाउछ भने मधेसका मुद्दाहरुलाई एक ढिक्का भएर ती दलहरुले उठाए यहा“ समस्या खडा गर्न सक्छ । मधेसी दलहरुले विगतमा गल्ती गरेकै हो । सबैले आ(आफूलाई शक्तिशाली बनाउनमै जुटिरहे, समग्रमा एउटै शक्ति बन्ने तिर उनीहरु लागेनन् । राज्यसत्ताबाट विदेशीहरुको इशारामा उल्टोप्रहार हुन सक्छ, त्यसलाई कसरी रोक्ने भन्ने विषयमा मधेसी नेताहरुले कहिले सोच्दै सोचेन । सामाजिक कार्यकर्ता कपिलदेव प्रसाद रोहिता भन्छन्,‘ कार्यप्रणाली र न्यायप्रणालीमा एउटै व्यक्तिको नियुक्ति, निर्वाचनमा सेना परिचालनलगायतका विषय जुन विवादित थियो, त्यसलाई पनि त्यसताका सत्तामा रहेका मधेसी दलले स्वीकार ग¥यो । यी दुवैमा मधेसीको पकड छैन । अनि अहिले चुनावमा धा“धली भयो भनेर हिड्नुको तुक छैन । ’ भारत मामिलाका जानकारहरुका अनुसार साउथ ब्लकले नेपालमा जतिसक्दो चाडो आफू अनुकूलको संविधान चाहन्छ । ‘त्यसै अनुरुप खेल भएको हो, भारतका सत्ताधारी वर्ग नेपालमा एउटा यस्तो शक्तिको खोजीमा थियो÷छ जुन निष्पक्षताको आवरणमा योजनाहरुलाई कार्यान्वयन गर्न सकोस् । त्यो खिलराज रेग्मी भन्दा राम्रो अरु कोही थिएनन् ’ एक जना विश्लेषकले भने, ‘मधेसी दललाई च्यापेर एमाओवादी सत्तासिन बनाई जनता माझ अलोकप्रिय बनाउने दाउसंगै बुलेट होइन ब्यालेटबाट उसलाई कमजोर गर्ने रणनीति भारतको थियो । राजाबादीलाई चौथो शक्ति बनाएर शक्ति सन्तुलन गर्न र एमाओवादीका लागि वाध्यात्मक स्थिति सिर्जना गर्नु पनि उसको सोच थियो । ’ यी भनाइहरुबाट अगामी दिनहरु नेपालको राजनीतिमा राम्रो संकेत लिएर आउ“ला जस्तो देखिदैन  । 

Saturday, 18 January 2014

राजनीतिमा मधेसी संचारकर्मी

‘ हाम्रो त कन्तविजोकै भो, न यताको न उताको जस्तोस्थितिमा पुग्यौ । अब पत्रकारिता कसरी गर्ने ? पुरानै पेशामा फर्किदा जनताले अमुक पार्टीको बिल्ला भिडाइ दिने भए '.
दिनेश यादव-



मानव विकास सुचकांक उच्च रहेको र हरेक ऐतिहासिक परिवर्तनमा महत्वपूर्ण योगदान पु¥याउ“दै आएको तराई–मधेसका जिल्लाहरूमा मधेसी दलले पछिल्लो निर्वाचनमा शर्मनाक पराजय बेहोरेको छ । अझ भनौ देशकै नेतृत्व प्रदान गर्ने नेता तथा पटक–पटक मुलुकमा सार्वजनिक विचार निर्माणमा समेत अहम मूमिका निर्वाह गर्दै आएको मधेसका ती जिल्ला÷निर्वाचन क्षेत्र समेत मधेसी दलको किल्ला बन्न सकेन । अर्थात् अघिल्लो निर्वाचनमा ती दलहरुले मतदाताहरुबाट पाएको मतलाई समेत सुरक्षित राख्न चुके । यो प्रत्यक्षतर्फ मात्रै होइन समानुपातिक तर्फ पनि त्यस्तै हविगत बेहोर्न बाध्य भयो , मधेसी दल ।  खासगरि मानव विकास सुचकांक बढी भएको झापा, मोरंग, सुनसरी, मकवानपुर, पर्सा, बांकेलगायतका जिल्लामा राप्रपा नेपालले समानुपातिक तर्फ राम्रो मत ल्यायो । यसैगरि नेपालका चर्चित नेताहरुले प्रतिनिधित्व गर्ने वा गरेको सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौटहट, पर्सागायतका जिल्लाबाट
गैर–मधेसवादी दलका प्रतिनिधिले बाजी मारे । मधेसी बहुल क्षेत्रका रुपमा परिचितमिथिला र भोजपुरालगायतका क्षेत्रबाट समेत मधेसी दल र त्यसका नेताहरु विजय हुन नसक्नुलाई नेतृत्वकै कमजोरी ठान्नेहरु धेरै छन् । अझ निर्वाचनको रोचक प्रसंग त के रहयो भने एउटै जिल्ला सर्लाहीबाट चार दलका अध्यक्षले समेत चुनाव हारे । यसरी निर्वाचन हार्नेहरूमा एमालेका झलनाथ खनाल, तराई–मधेस लोकतान्त्रिक पार्टीका महन्थ ठाकुर, सद्भावना पार्टीका राजेन्द्र महतो, चुरे भावर राष्ट्रिय एकता पार्टीका बद्रीप्रसाद न्यौपाने छन् ।


 एमालेलगायतका पार्टीलाई छाडेर कुरा गर्ने हो भने ठाकुर र महतो मधेस केन्द्रित दलका ‘प्रभाविशाली नेता’ का रुपमा मधेस क्षेत्रमा दरिएका छन् । यी दुई नेताहरू संविधान सभाको पहिलो निर्वाचनअघि सत्तामै थिए । त्यसपछि पनि महतो आफ्नै नेतृत्व र ठाकुर अध्यक्ष रहेको पार्टी पटक–पटक सरकारमा पुग्यो । तर, सरकारमा पुगेरैपनि निर्वाचनमा पराजय बेहोर्नूलाई धेरैले ‘अक्षम नेतृत्वको गलत निर्णयको फल’ भनि प्रतिक्रिया दिएका छन् ।
प्रत्यक्षतर्फको सम्पूर्ण परिणामले मधेसी दलहरूको आकार सानो भएको देखाइसकेको छ । तर, समानुपातिक तर्फ थोरै मत पाएकाले निर्वाचन आयोगमा बुझाएको सूचीबाट प्रतिनिधिहरु छनौट विषय उनीहरुका लागि ‘फलामको च्युरा चपाउने’ जस्तो भएको छ । समानुपातिकबाट सभासद् बन्ने महात्वाकांक्षीहरु धेरै तर सिट संख्या थौरै भएकाले उनीहरु समस्यामा परेका हुन् । समानुपातिकतर्फनै बढी नाम पठाउने दलका अध्यक्षहरुको त रातिको निन्दनै हराम भएको अवस्था छ । उता, निर्वाचन आयोगले सूचीका आधारमा सबै जाति, वर्ग, लिंग, क्षेत्रलगायतको प्रतिनिधित्व गराउनै पर्ने कडा निर्देशन पनि छ । समानुपातिक तर्फ मधेसी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिकले १०, , मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल ८, तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टीले ७, सद्भावना पार्टीले ५, राष्ट्रिय मधेस समाजवादी पार्टीले ३ र तराई–मधेस सद्भावना पार्टीले २ सिट पाएको छ । अन्य मधेसवादी दलहरुमा संघीय सद्भावना पार्टी र मधेसी जनअधिकार फोरम गणतान्त्रिकले एक–एक स्थान समानुपातिक तर्फ पाएको छ । यी सबै दलका अध्यक्षमाथि सबै वर्ग, लिंग, जाति र धर्मको प्रतिनिधित्व गराउनुपर्ने दबाब थेग्नै नसक्ने छ । फेरी, पत्नि, सालीलाई समानुपातिक सूचीमा पार्न पनि त्यतिकै चौतर्फी दबाब झेलिरहेका छन्, मधेसी दलका नेताहरु । यसमा पत्रकारहरुको एउटा झुण्ड पनि सामेल भएका छन् । पत्रकारितालाई तत्कालका लागि विराम दिएर पार्टीको बिल्ला भिडेर राजनीतिमा होमिएका झण्डै दर्जन संचारकर्मीले आ–आफ्नो नाम  विभिन्न पार्टीहरुमा समावेश गराएका छन् । सम्बन्धित दलहरुले समानुपातिकमा थोरै मत ल्याएकाले आफूहरुको ‘हरि विजोक’ भएको पीडित संचारकर्मीहरुले नै बताउन थालेका छन् । उनीहरुले आ–आफ्नो नाम सभासद बन्ने सूचीमा समावेश गरि दिन स्वयंम पार्टी अध्यक्ष, त्यो नहुनेले विभिन्न व्यक्ति मार्फत् दबाब दिइरहेका छन् । यसरी विभिन्न पार्टीको सिफारिसमा परेका मधेसी पत्रकारहरुले आफूहरु ‘घर न घाट’ को भएको प्रतिक्रिया पनि दिन थालेका छन् । आफ्नो नाम नछाप्ने सर्तमा समानुपातिक सूचीमा परेका र लामो समयसम्म पत्रकारिता गर्ने एक जनाले भने, ‘ हाम्रो त कन्तविजोकै भो, न यताको न उताको जस्तोस्थितिमा पुग्यौ । अब पत्रकारिता कसरी गर्ने ? पुरानै पेशामा फर्किदा जनताले अमुक पार्टीको बिल्ला भिडाइ दिने भए , त्यसैले जसरी पनि समानुपातिकमा आफ्नो नाम पार्ने कसरतमा छु , बा“की दैबले जानुन । ’ अमूक राजनीतिक पार्टीको झण्डा बोकेरै हिड्नेहरूमा धर्मेन्द्र झा, अनिल कर्ण, पंकज दास, इजाहारुल हक मिकरानी, भोला पासवान, विणा सिन्हा,  शम्भू झा, प्रियंका पाण्डे, रुपा झा, राकेश मिश्र, प्रविणकुमार चौधरीलगायतका छन् । एक्का÷दुक्का बाहेक कसैको पनि समानुपातिक तर्फबाट सभासद् बन्ने सम्भावना नरहेको सम्बन्धित पार्टीका पदाधिकारीहरु बताउ“छन् । 
राष्ट्रिय मधेसी समाजवादी पार्टीले चुनावअघि प्रवक्ता बनाएको मिकरानीलाई ‘बाइपास’ गर्न चुनावपछि अनिल कर्णलाई पार्टीको प्रचार सचिव बनाएकोमा त्यसपार्टी भित्रै असन्तोष देखिएको छ ।  लामो समयसम्म ‘द काठमाडौं पोस्ट’मा पत्रकारिताको अनुभव संगालेका उनको नाम पनि समानुपातिकतर्फको सूचीमा छ । स्रोतले भन्यो, ‘तर मिकरानीको नाम पार्टीले पठाइरहेको छैन । ’ नेपाली कांग्रेसबाट समानुपातिकमा परेका पत्रकार महासंघका पूर्व सभापति धमेन्द्रको संभावना प्रवल रहेपनि पार्टीभित्रै उनको विरोध भईरहेको स्रोतले बतायो । हिमालीनी हिन्दी मासिकका पंकज दास सद्भावना पार्टीबाट परेका छन् । तर उक्त पार्टीले अपेक्षा अनुरुपको सिट ल्याउन नसकेकाले उनको भविष्यपनि अन्यौल बनेको छ । तराई टेलिभिजनमा क्रियाशिल प्रियंकालाई गणतान्त्रिक फोरमले समानुपातिक तर्फको सूचीमा नाम पठाएपनि उक्त पार्टीले एउटा मात्र सिट आफ्नो भागमा पारेको छ । पार्टी अध्यक्ष राजकिशोर यादवलाई आफ्नै श्रीमतिलाई सभासद बनाउन ससुराली तर्फबाट दबाब परिरहेको एक जना पत्रकारले बताए । लामो समय पत्रकारिताको अनुभव संगालेका भोला पासवानको नाम फोरम नेपालबाट समानुपातिकमा परेको छ । उनीप्रति पार्टी अध्यक्ष उपेन्द्र यादव सकारात्मक रहेका छन् । तर, तत्कालै केही भन्न सक्ने स्थिति नरहेको पासवान स्वयंमले बताए । फोरम नेपालबाटै समानुपातिक सूचीमा परेकी ‘द पब्लिक’ की संपादक÷प्रकाशक विणा सिन्हापनि महिला तर्फबाट आफ्नो नाम सभासदमा पार्न जोडतोडका साथ जुटेकी छन् । तर , उनको नामको टुंगो हुन सकेको छैन । रुपा झाको नाम राष्ट्रिय मधेस समाजवादी पार्टीबाट, राकेश मिश्रको नाम तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टीबाट समानुपातिकतर्फको सूचीमा परेको छ । तर समानुपातिक तर्फ कम सिट भएकाले उनीहरु पनि ढुक्क हुने स्थितिमा छैनन् । प्रविण चौधरी त प्रत्यक्षतर्फ कम्युनिष्ट पाटी संयुक्तबाट उम्मेदबारै भएर चुनाव लडिसकेका छन् । जहा“सम्म शम्भू झाको कुरो छ, उनी आफू समानुपातिकमा नपरेपनि अन्य पत्रकारहरुका लागि लबिंग गर्दै हिडेका छन् । सप्तरीका पत्रकार महासंघका पूर्व सभापति उनी हाल फोरम नेपालका प्रचारप्रसार विभाग प्रमुख हुन । हिमाल दृष्टिका संपादक राकेश मिश्रको नाम भने तमलोपाबाट पर्ने प्रवल संभावना रहेको पार्टीका एक केन्द्रिय नेताले बताए । यसरी सूचीमा परेका अधिकांश युवा छन् । उनीहरुलाई राजनीतिमा किन आएको भन्ने प्रश्न गर्दा खासै तर्कपूर्ण भनाई राख्न सकिरहेका छैनन् । धेरै त निराश मुद्रामा छन भने केही भने अगामी दिन राजनीतिलाई नै आफ्नो लक्ष्य बनाएर बढ्ने मनस्थितिमा छन् । उनीहरूको विचार जे जस्तो भएनी अगामी दिन सूचीमा परेका तर सभासद् बन्न नसकेको अवस्थामा स्थिति कस्टप्रद हुने ठम्याई मधेस क्षेत्रका पत्रकारहरुको छ।  अन्त्यमा, मधेसी दलहरुले सबैलाई समानुपातिकतर्फबाट प्रतिनिधित्व गराउन नसकेपनि प्रभावशाली र विवादरहित निर्णय गरेर अघि बढ्नु पर्ने सुझाब त्यस क्षेत्रका बुद्धिजीविहरुको छ । अन्यथा समानुपातिक सूचीमा परेका संचारकर्मीहरु अगामी दिनहरुमा ठूलौ चुनौति भएर आउन सक्छन् । 
-kantipur Qutar Edition 2070 Dec 14



निर्वाचनमा ‘मिड प्याक’


"फोरम नेपालबाहेक मधेसकेन्द्रित दलहरु मधेसमा दुई प्रदेशको खाका अघि सारेका छन् । त्यसैले यो विषय फेरी पनि मतदाता माझ  बहस गर्ने माध्यम बनेको छ । ‘स्वायत्त’ मधेस प्रदेशका कुरा गर्नेहरु एकाएक नारायणी पारी एउटा र नारायणी वारी अर्को प्रदेश हुनुपर्ने भन्दै सिमांकनसहितको घोषणा पत्रनै सार्वजनिक गरिसकेका छन् । तर ती मध्ये केहीले त राज्य पुनर्सरचना आयोगका मदन परियारको प्रतिवेदनलाई सबैले स्वीकार्नुपर्ने तर्कसहित मतदाता समक्ष पुगिरहेका छन् । यो तर्क दिनेहरुले अघिल्लो संविधानसभामा ४८५ जना सभासदले हस्ताक्षर समेत गरिसकेका अवस्था रह“दा रह“दैपनि संविधान जारी नहुनुलाई प्रमुख दलहरुको दोष भएको भनाई राख्दै मतदाताहरुलाई आफ्नो पक्षमा पार्ने प्रयासमा छन् ।"
 
तराई–मधेसको एउटा मत केन्द्रमा दोस्रो संविधानसभाका लागि मतदान गर्दै मधेसी मतदाता 


दिनेश यादव

निर्वाचन सम्बन्धि गतिविधि ‘क्लामेक्स’ मा पुगेको छ । तर चुनवाको विपक्षमा रहेका वहिष्कारबादीले शुरु गरेको ‘गैर–राजनीतिक’ क्रियाकलापले मतदाता माझ केही संत्रास बढाएको छ । बन्द, हड्ताल र ठाउ“–ठाउ“मा भेटिएका शंकास्पद बस्तुहरूले उनीहरु ढुक्क हुन सक्ने स्थिति छैन । केही दलका कार्यकताहरुबीच निर्वाचन प्रचारका क्रममा भएका भिडन्तहरुले पनि उनीहरुलाई निराश बनाएको छ । सुरक्षाविद्हरुले भने निर्वाचनका बेला भएका यी घटनाहरुलाई सामान्य भन्दै आएका छन् । हुन पनि हो , अघिल्लो संविधानसभा निर्वाचनका तुलनामा गैरराजनीतिक गतिविधिहरु कमै भएका छन् । यी सबका बाबजूद अब निर्वाचन कसैले रोक्नै नसक्ने भनाईहरु पनि दलका शिर्षस्थ नेताहरुबाट आइरहेका छन् ।
यसैबीच, एक साता पनि बा“की नरहेको निर्वाचनमा मतदाताहरुलाई आफ्नो पक्षमा पार्न दलका नेता तथा उम्मेदबारहरुका थरि–थरिका नारा, भाषण र दाबीहरु सार्वजनिक भइरहेका छन् । केहीले आफ्नो दलले बहुमत नल्याए संविधान बन्दैन भनिरहेका छन् । अन्य केहीले भने दुई तिहाई मत आफ्नो पार्टीले नपाए जनताको पक्षमा संविधान नबन्ने फलाक्दै हिडेका छन् । दलहरुबीच आरोप–प्रत्यारोप पनि त्यतिकै चलिरहेको छ । यति मात्रै भए त हुन्थ्यो नि । मतदातालाई लोभ्याउन उम्मेदबारहरुले थरी थरीका अनुनय–विनय समेत थालेका छन् । ती मध्ये केही यसप्रकारका छन ः ‘भोट नही तो मिट्टी दो, महिला–पुरुष होइन तेस्रो लिङ्गीलाई मत देऔं, राष्ट्रपति बन्ने पार्टीलाई मतदान गरौं, प्रधानमन्त्रीको जिल्लाबासी बन्ने अवसर नगुमाऔ । ’ं यसको अर्थ प्रमुख दलका प्रमुख उम्मेदबारहरुले निर्वाचनमा आ–आफ्नो विजयलाई प्रतिष्ठाको विषय बनाएको पुष्टि हुन्छ ।
            उता, यसअघिको संविधानसभामा सत्ताको जोडघटाउ मिलाई दिने भूमिकामा मात्र देखिएको मधेस केन्द्रित दलको साइज घटने आंकलन गर्नेहरु हवात्तै बढेका छन् । ‘पहिचान र सामथ्र्य’ का आधारमा संघियता बनाउनु पर्ने अडान राख्ने दलहरुको प्रतिनिधि अगामी संविधानसभामा घट्ने प्रचारबाट केहीलाइ खुशी तुल्याएकै हुनुपर्छ । खासगरि संघियता र समावेशिकताको विपक्षमा रहेका दलहरुका लागि यो भन्दा हर्षित खबर अरु केही हुनै सक्दैन । तर मधेस प्रदेशबारे मधेसी दलहरुमा समेत ऐक्यमतता नदेखिनुलाई केहीले ‘रणनीतिक’ , धेरैले मधेसी पार्टीहरु ‘लचिलो बनेको’ भनि प्रतिक्रिया दिएका छन् । फोरम नेपालबाहेक मधेसकेन्द्रित दलहरु मधेसमा दुई प्रदेशको खाका अघि सारेका छन् । त्यसैले यो विषय फेरी पनि मतदाता माझ  बहस गर्ने माध्यम बनेको छ । ‘स्वायत्त’ मधेस प्रदेशका कुरा गर्नेहरु एकाएक नारायणी पारी एउटा र नारायणी वारी अर्को प्रदेश हुनुपर्ने भन्दै सिमांकनसहितको घोषणा पत्रनै सार्वजनिक गरिसकेका छन् । तर ती मध्ये केहीले त राज्य पुनर्सरचना आयोगका मदन परियारको प्रतिवेदनलाई सबैले स्वीकार्नुपर्ने तर्कसहित मतदाता समक्ष पुगिरहेका छन् । यो तर्क दिनेहरुले अघिल्लो संविधानसभामा ४८५ जना सभासदले हस्ताक्षर समेत गरिसकेका अवस्था रह“दा रह“दैपनि संविधान जारी नहुनुलाई प्रमुख दलहरुको दोष भएको भनाई राख्दै मतदाताहरुलाई आफ्नो पक्षमा पार्ने प्रयासमा छन् ।
तर उनीहरुले आफ्नो कमजोरीहरु भने लुकाउन छाडेका छैनन् । संविधान बनाउनेबारे मधेसी दलहरु विगतमा सहमत नदेखिएपनि सत्तामा जानका लागि भने ती पार्टीहरु सहमत भएकै थिए । मधेसी नेताहरुबाट भएको यस प्रकारको धोकाधडीलाई मतदाताहरुले विर्सन सकेका छैनन् । कांग्रेस र एमालले सिमाकंन र नामांकन बिनाकै घोषणापत्र जारी गरेको भन्दै ‘मधेसी दलका नेता’ बाट अघि सारिएको तर्कले पनि मधेसी मतदाताको चित्त बुझेको देखिदैन । 
         यी दुई दलहरुले बहुपहिचानसहितको संघियता त भनिरहेको छ तर त्यसलाई भूगोलको आधारमा गर्नुपर्ने अडान राखिरहेको आरोप पनि केहीको छ । यी आरोपलाई कांग्रेस र एमालेका उम्मेदबारहरु केही हदसम्म तराई मधेसमा चिर्न सफल भइरहेको बताएको छ । उता, यी दुई दलका अडानहरुको विरोध गर्दै केहीले यसो भनिरहेका छन, ‘२० प्रतिशत जति काठमाडौं केन्द्रिहरुले ८० प्रतिशतमाथि पुरानै सत्ता कायम गराउन खोजेका छन् । त्यसैले उनीहरु बिना तयारी संविधानसभाको निर्वाचनमा गएका हुन् ।’ यी दलका केही नेताहरुबाट अगामी संविधानसभामा बहुमत नआए पहिले सहमति, त्यो भएन भने बहुमत प्रणाली र अझ कुरा नमिले जनमत संग्रहमा गएर संघियता र प्रदेशको मुद्दा टुंगो लगाउनु पर्ने बताइरह“दा मधेसी जनताहरु केही सशंकित बनेको अवस्था रहेको विश्लेषण गरि“दैछ । यी तर्क राख्ने दलहरुले संविधान निर्माण गर्नेबारे आफूलाई केन्द्रित बनाउनुको साटो विकासे आश्वासन बा“ड्नमा व्यस्त देखिएका छन् । मुलुक ‘संघिय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र’ मा गइसकेको र यो अन्तरिम संविधानमा यो विषय लिपीबद्ध समेत भइसकेको अवस्थामा अगामी संविधानसभाबाट संविधान बनेलगतै मुलुक संघीयतामा जाने निश्चित छ । यसका सीमा, क्षेत्रहरुमा हेरफेर पनि हुने छन् । अनि संविधानसभाको निर्वाचनमा नेताहरुले बा“डेको विकासे बाचाहरुको कुनै अर्थ रहन्न । त्यस्तैले नेताहरुको आश्वासन र चुनावी भाषण भन्दा पनि मुलुकले सर्वमान्य संविधान कसरी प्राप्त गर्न सक्छन् भन्ने विषयमा मात्रै केन्द्रित हुनु पर्ने भनाई धेरैको छ । मतदाताहरुले भनिरहेका छन्, ‘संविधान निर्माणमा केन्द्रित हुने दलहरुलाई मतदान गर्नेछौ । ’
                     तर उनीहरु कुन पार्टीलाई मत दिने भन्नेबारे अझै खुल्न चाहेका छैनन् । खासगरि ग्रामीण क्षेत्रका मतदाता अझैपनि कुन दलका उम्मेदवारलाई मत दिने भनेर निर्णयमा पुगिसेका छैनन । 
पहिलो संविधानसभामा खुलेर उत्साहित भई घर दैलौमा दलका झण्डा झुण्ड्याएका ग्रामीण क्षेत्रका मतदाता यसपटक चुनाव नजिकिसक्दा पनि त्यस्तो देखिएदैनन । दलका गाउ“ तहका कार्यकर्ताहरु भने खुलेरै मत मागि रहेका छन् ।
             भोट माग्न गाउ“ पुगेका उम्मेदवारहरुलाई उनीहरुले सबै उम्मेदवारलाई हुन्छ भन्ने जवाफ मात्रै दिने गरेका छन् । पहिलो पटक मत दिएर पठाएका सभासदहरुले संविधान निर्माण नगरेको, सत्तालिप्सामा लागेको, पद र पैसाका लागि पार्टी विखण्डन गरेको, जनचाहना बमोजिम काम गर्न नसकेको मतदाताहरुले गुनासो रहेपनि उनीहरु मधेसी उम्मेदबारलाई नै आफ्नो क्षेत्रबाट जिताउने भने बताइरहेका छन् । तर उनीहरुले यो वा त्यो दल चाही भनिरहेका छैनन् । 
                    पहिलो संविधान सभा निर्वाचनको संघारमा हरेक घरका छाना, बारमा झण्डा फहरिदा रौनक बेग्लै देखिन्थ्यो । तर यसपटक त्यस्तो रौनक र दृश्य चुनाव नजिकिदासम्म नदेखिनुलाई मतदाताहरु निराश रहेको पुष्टि गर्छ । यसो त कतिपय मतदाताले उम्मेदवार भोट माग्दै आउदा झण्डा गाडिदिएका कारण मात्र ती घरमा झण्डा फहराएको देखिन्छ । त्यसैले झण्डा फहराएको एउटै घरमा चार वटा दल सम्मका झण्डा एकै ठाउ फहराई रहेको भेटिन्छ ।
            मतदाता नखुल्नुमा विगतका सभासदले संविधान निर्माण नगर्दाको नैराश्यता र तराई–मधेसका निर्वाचन क्षेत्रमध्ये कतिपयमा चुनावको अन्तिम घडीमा दल र उम्मेदवार बिच ‘मिड प्याक’ हुने कारण पनि हुन सक्ने दाबी मधेसी बुद्धिजीवीहरुको छ । चुनावको पूर्व संध्यामा वा चुनाव हुने अघिल्लो राति विजय हुन नसक्ने अवस्था भएका उम्मेदवारले अर्को दलको उम्मेदवारलाई मध्य रातमा सहयोग गरेर भोट परिवर्तन गराई प्रमुख दलका उम्मेदवारलाई हराउने रणनीतिलाई  ‘मिड प्याक’ भनिन्छ । ‘मिड प्याक’ हुदा सहयोग गर्ने उम्मेदवारबीच रकमको ठूलो चलखेल समेत हुने गर्छ । यो पटक पनि त्यो संभावनालाई नकार्न नमिल्ले धारणा धेरैको छ । त्यसैले अगामी निर्वाचनमा दलहरुले दाबी गरेको जस्तो परिणाम नआउनसक्ने स्थितिपनि त्यतिकै छ ।   
  • 835977500@facebook.com