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| Dinesh Yadav |
मधेस आन्दोलन से पहले मधेसी
जनअधिकार फोरम नेपाल और उसके बाद बने मधेस के राजनीतिक दलों मे अब मिशन
वाली भावना नहीं हैं । इन दलो मे बहुत कम लोग बचे हैं जो मिशनरी भावना से
राजनीति में काम करते हैं । यहां पर नेता से कार्यकर्ता
तक सभी अपने करियर के बारे मे सोच रहे हैं, और आदमी का अपना निजी एजेंडा
अपनी पार्टी और देश, मधेस, क्षेत्र और भूगोल के बासिन्दाओं का एजेंडे से
बडा हो रहा है ।
राजनीति
में सबका मकसद महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण्ँ यानी आखिरी पंक्ति पर पडे
व्यक्ति की भलाई ही रहा हैं । हमारे देश के अन्तरिम संविधान की लक्ष्य भी
समाज के आखिरी छोर पर स्थित इंसान की ही भलाई है । लेकिन संविधान के नाम पर
या अधिकार प्राप्ति के लडाई में जीत हासिल करने के लिए सरकार में सामेल
होने वाले राजनीतिक दल हों या उनके विरोध में उभरीं राजनीतिक ताकतें, सत्ता
तंत्र में शामिल होते ही दरिद्र नारायण्ँ की सेवा भूल जाती हैं । अब ऐसी
नही होनी चाहिए । देश और मधेस के सभी झुग्गीवालों को ध्यान मे रखकर ठोस,
परिपक्व और दृढ संकल्पित नीति बना कर आगे बढ्ना जरुरी है । विकास और
निर्माण के नाम पर देश और मधेस मे हो रहा भ्रष्टाचार के ताण्डव नृत्य के अब
दर्शक भर बनने से काम नही चलेगा, पहरेदार बनना होगा ।
संविधान के नाम पर या अधिकार
प्राप्ति के लडाई में जीत हासिल करने के लिए सरकार में सामेल होने वाले
राजनीतिक दल हों या उनके विरोध में उभरीं राजनीतिक ताकतें, सत्ता तंत्र में
शामिल होते ही दरिद्र नारायण्ँ की सेवा भूल जाती हैं ।
भ्रष्ट,
पतित, कामचोर, जाली, बदमास, बलशाली, दबंग, बाहुबली और झुठ के खेति मे
लिप्त लोगों को एक के बाद दुसरे फिर तीसरे करते पर्दाफास करने मे चुकने से
परहेज रहना होगा, मधेसी नेताओं को । मधेस क्षेत्र में, स्थानीय निकाय मे हो
रहे घोटाला और भ्रष्टाचार को समूल उखाड फेकने को अब मधेस के सभी दलों को
एक जूट होना ही चाहिए । परन्तु यह एक कठीन डगर हो सक्ते है । क्योकीं अब
कोई संत भी अपने विरोधी का साथ नहीं देता । फिर तो गैर–मधेसवादी दल क्यों
इसके लिए अपने ही विरोधी का साथ देने लगेगी ?हा“, नेताएं जन–जन से रायशुमारी को बढावा दे तो इस मे सफलता मिल सकती हैं । साथ ही, इससे उसकी भावी रण्ँनीति तय करने मे भी आशान होगा । जनता मे बढा राजनीतिक जागरूकता का फाइदा वह सतप्रतिशत लेने के लिए सदैव तत्वर रहे ।
मधेसी पार्टी की चुनौतयां जितना
बाहरी है, उतना ही आंतरिक चुनौतियों से भी , उन्हें जूझना हैं । दल अपने
कार्यकर्ताओं के अन्तरविरोध को न्यून बनावे और वादा करे सत्ता और भत्ता से
दुर रहेगें ।
तराई–मधेस के मानव विकास सुचकांक
और देश को विचार देने वाला व्यक्तियों के पैदायिस करने के लिए परिचित
भूभाग, जिल्ला, क्षेत्र, भूगोल से भी समानुपातिक वोट में भी गैर–मधेसी
पार्टीको ज्यादा मत मिला, जनताओं ने इस धार वालो कों खुल कर मतदान किया ।
मधेस में राजनीतिकर्मीयों मे चार धार व वादी ः निशस्त्रवादी, सशस्त्रवादी, यथास्थितिवादी और दोगलेबादी हावी हैं । पहले धार ‘डेमोक्रेटिक’ और ‘लेफ्टीस्ट’ के रुप मे मधेस के राजनीति मे सक्रिय हैं । ये दो धार बाले फरक ‘स्कूलिङ’ के नेताओं के नेतृत्व में अपना–अपना एजेण्डा के साथ जनता को ‘कन्भिन्स’ करने में जुटा हुआ है । इसमे अब ‘फ्युजन’ जरुरी हो गया है । खास कर के मधेसी जनता के हित के लिए तो ये दोनो खेमा को एक जूट होना ही होगा । जहां तक दुसरे धार की बात है, इसमे भी ‘अल्ट्रा’ और ‘लिबरल’ दो गुट हैं । एक चाहता है, रातो रात मधेसियों के सभी समस्याओं का समाधान हो और इसके लिए काटमार को वह अपना ध्येय मानते है । दुसरे गुट सैद्धान्तिक बहस के साथ मधेसी जनता को विश्वास मे लेकर आगे बढ्ने की सोच रखते हैं । परन्तु दोनो का एक ही मार्ग है, तराई–मधेस स्वतन्त्र, जिसे मधेसी जनता तत्काल खारेज कर रहा हैं । हां, राजनीति मे अपना अंश खोज्ने वक्त मधेस के नेता इसे बार–बार ‘बार्गेनिङ टुल्स’ भी बनाया है , इसि के बदौलत राज्य पक्ष को ललकारा भी है । परन्तु स्वार्थ पूर्ति होते ही विगत मे नेता के अंगारभरी यह चुनौति धिमि सी होता गया । इसिप्रकार यथास्थितिबादी को दक्षिणपन्थ के रुप मे जाना जाता है । ये भी मधेस मे उतना ही सक्रिय हैं । इसिलिए तो, तराई–मधेस के मानव विकास सुचकांक और देश को विचार देने वाला व्यक्तियों के पैदायिस करने के लिए परिचित भूभाग, जिल्ला, क्षेत्र, भूगोल से भी समानुपातिक वोट में भी गैर–मधेसी पार्टीको ज्यादा मत मिला, जनताओं ने इस धार वालो कों खुल कर मतदान किया । तराई–मधेस के इन जिल्लो से गैर–मधेसवादी दल (कांग्रेस और एमाले) को प्रत्यक्ष मे तथा राजाबादी दल (राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टी) को समानुपातिक तरफ भारी मत मिला । और, अन्तिम धार के रुप मे मधेस मे ‘दोगलेवादीओ’ का आता है । जिसमे पंचायतकाल से लेकर संविधान सभा के पहले निर्वाचन के बाद बने हरेक सरकार मे सामिल हुए नेता लोक पड्ते है । इन सबों का एक ही मकसद सदैब रहा है कि मधेस की राजनीति को भाड मे पहु“चाए, अस्तव्यस्त बनावे । ऐसे धार ‘पोलिटिकल डिस्ट्रक्टिभ फोर्स’ के रुप मे मधेस मे क्रियाशिल हैं । उसके प्रति आस्था रखने वाले सिर्फ ऊंगीओं मे गिन्ति किया जा सकता हैं । इसिलिए इन सभी चुनौतिओ को सही ढंग से सामना करते हुए आगे बढ्ना ही मधेसी दलो के लिए सब से बढी अग्नी परीक्षा है ।
इस मे उत्तीर्ण होने वाला दल और नेता ही सच्चा मधेसी नेतृत्वहारी बन सकते है ।
क्रान्ति और अतिवाद दोनो बीच
झीना पर्दा होता है । इसिलिए हर कदम पर क्रान्ति और अतिवाद को समझते हुए
उसे कभी ‘फेसिलेटर’ , कभी ‘मेडिएटर’ तो कभी ‘स्टेट्समेन लिडर’ बनते हुए आगे
बढने होंगे, सही समय मे सही फैसले लेने होंगे ।
वैसे क्रान्ति और अतिवाद दोनो बीच झीना पर्दा होता है । इसिलिए हर कदम पर क्रान्ति और अतिवाद को समझते हुए उसे कभी ‘फेसिलेटर’ , कभी ‘मेडिएटर’ तो कभी ‘स्टेट्समेन लिडर’ बनते हुए आगे बढने होंगे, सही समय मे सही फैसले लेने होंगे ।
मधेसी दलों मे एक और बडी चुनौती एमाओवादी के साथ आगे बढ्ना. यह मधेसी दलो के नैतिक आभा को कमजोर करने के लिए काफी है । मधेस विद्रोह को छापामार माओवादी लडाकू और नेपाल के सेना को एक साथ परिचालन कर के दमन करने की उद्घोष और कोइ नही एमाओवादी के सुप्रिमो ही किया था । इसिलिए ऐसे पार्टी के ‘मनचले’ नेतृत्व से दुर रहकर अपना नीति, सिद्धान्त, कार्ययोजना को आगे बढना ही सर्वोत्तम विकल्प हो सकते है । एमाओवादी के सत्ता मोह के जाल मे फसकर विगत में कमजोर हुए और मलिन पडती आभा की दीप्ति बनाए रखने के लिए नया“ सोच के साथ जनता के परिवर्तन के उत्कट अभिलाषा को पुरा करने मे मधेसी नेतृत्वको एक सूत्र मे बंध कर आगे बढना हैं । इसके लिए लोगों के बीच जाकर रायशुमारी एक उत्प्रेरक की काम कर सकती है । मधेसी दल एकिकरण मे जाए, यह असम्भव है तो गठबन्धन या मोर्चाबन्दी बनाए, मधेस के साझा मुद्दाओं का पहचान करे और एक छतरी तले सभी समाहित होने के लिए नियमित रुप से गन्थन, मन्थन और चिन्तन करें । वैसे तो इस के लिए कुछ राजनीतिक पार्टीया बहुत पहले से क्रियाशिल है, परन्तु अब एक दृढ संकल्पसहित के सपथ के साथ आगे बढने का समय आ गया है । जिससे, अलग–अलग धडों में बंटे मधेसी राजनीतिक दलों को आप एक मंच, एक प्वाइंट पर आम राय बनाने में कामयाब हो सके । यह कठिन जरुर है पर नामुमकिन नही ।
बचपन मे जब हम लोग विद्यार्थी हुआ करते थे तो हमें बताया जाता था कि जब पर्चा हल करने जाओ तो सबसे सरल प्रश्न को पहले हल करो, और जो सबसे कठिन प्रश्न हो उसको सबसे अंत में छोड दो, ये फॉर्मूला मधेसी दलो को प्रयोग मे लाना होगा , यह बडा काम देने वाला है । सब बैठकर पहले मधेस के हरेक सवाल पर गंभीरता से चिंतन करे और निस्कर्ष के साथ जनता मे जाए , जनता आप के साथ है और रहेंगे । इससे जनताओं का विश्वास तो बढेगा ही, आप के कारवा“ मे सामेल भी वह होगा ।
आज
समूची की समूची राजनीतिक जमात की विश्वसनीयता पर मधेस के लोगों की नजर है, वैसे भी इस विश्वसनीयता को काफी आघात लग चुके हैं । क्या मधेसी दल तैयार हैं, लोगों की नजर मे पूरी तरह अविश्वसनीय हो जाने के लिए ? ये सवाल किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं हैं, राजनीतिक जमात की विश्वसनीयता का मतलब लोकतंत्र की विश्वसनीयता हैं । क्या देश और मधेस में लोकतंत्र अविश्वसनीय हो जाए, नेता के प्रति विश्वास उठ जाए, राजनीतिक दलों के प्रति, व्यवस्थाओं के प्रति लोगों की आस्था उठ जाए ? ये बहुत बडा प्रश्न हैं, इससे अपना मार्गदर्शन बना कर कदम बढाना होगा । मधेसी पॉलिटीशियन की क्रेडिबिलिटी को फिर से उगाना होगा । क्योकिं यह खत्म हो जाएगी तो लोकतंत्र और मधेस÷मधेसी के अधिकार प्राप्ति आन्दोलन की ‘क्रेडिबिलिटी’ भी खत्म हो जाएगी ।
हमें कुछ निणर््ँय समय पर लेने चाहिएं, अच्छे से अच्छा निणर््ँय अगर गलत समय पर लिया जाए तो उसका प्रभाव भी गलत होगा । दुसरी बात, मधेस आन्दोलन से पहले मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल और उसके बाद बने मधेस के राजनीतिक दलों मे अब मिशन वाली भावना नहीं हैं । इन दलो मे बहुत कम लोग बचे हैं जो मिशनरी भावना से राजनीति में काम करते हैं । यहां पर नेता से कार्यकर्ता तक सभी अपने करियर के बारे मे सोच रहे हैं, और आदमी का अपना निजी एजेंडा अपनी पार्टी और देश, मधेस, क्षेत्र और भूगोल के बासिन्दाओं का एजेंडे से बडा हो रहा है । यही तो दुर्भाग्य है, मधेस और मधेसियो का । इसि तरह कुछ नेता जब पार्टी से लंबा कद अपना मानने लगे और राजनीतिक अहंकार मे डुब जाए तो आम जनता उसे कैसे स्वीकारेगा । किसी ने कहा भी है, राजनीति में जनता एक बार भ्रष्ट आदमी को स्वीकार कर लेगी लेकिन अहंकारी आदमी को कभी स्वीकार नहीं करती । इसमे मधेसी दल के नेतृत्ववर्ग बदलाव नहीं किया तो उनके भविष्य नहीं है ।
अन्त्यमें, मधेसी दल के नेताओं को जो बात पार्टी फोरम मे कहनी चाहिए वो ‘पब्लिक’ में बोलने से बचे । सार्वजनिक तौर पर अपने ही विरादर को गलत कहेगें या पार्टी के निर्णय के खिलाप पर्चार करेगें तो दूसरो को खेलने के लिए ‘स्पेस’ मिल जाती है । पार्टी आलाकमान के खामियों को, कमजोरियों को, दूर करने के लिए सीरियस रहे, पार्टी के भितर । सभी को आत्मचिंतन, आत्म निरीÔण्ँ करते हुए आगे बढे । अब केवल ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ से काम नहीं चलेगा, अब तो ‘कार्डिएक सर्जरी’ करनी पडेगी सभीको । आत्मसम्मान से समझौता कभी न करे । तत्त क्षणिक रुप से सरकार की गण्ँेश परिक्रमाको तिलाञ्जली दे तो बेहतर । इसि से तो दुसरे संविधानसभा के निर्वाचन मे मधेसी दलो की दुर्दशा हुई है, इसे सम्झे । मधेसी दलों के जो पुरानी नीतियां है, उसमें अब काफी
बदलाव
की जरुरत है । महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सुशासन, कुशासन को मुद्दा
बनाए न कि जाति, संप्रदाय, Ôेत्रियता को । इस तथ्य को कभी नही भूलना चाहिए
कि किसी भी क्षेत्र÷विद्या में वे नायक खास होते हैं, जो अपनी पहचान
हरफनमौला और बिंदास रवैये के लिए बनाते हैं । हर दौर के अपने मायने होते
हैं, अलग चुनौतियां होती हैं, अलग मापदंड होते हैं. जाहिर तौर पर हर दौर
में अलग–अलग नायक अपनी पहचान बनाते हैं और अलग–अलग दौर के नायकों की तुलना
बेमानी है. परन्तु मधेसी दलों मे से किसी एक नेताको अब अपने मे कुछ
परिवर्तन के साथ नायक बनना होगा, नही तो शहिद और मधेसी जनता के साथ बेइमानी
होगी ।Published in The Public , Hindi monthly, January 2014.
www.madheshinepali.blogspot.com





























