Thursday, 21 February 2013

कमजोर बनते मधेश मुद्दे


मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा का उदय भी मुलधार के प्रमुख तीन राजनीतिक दलो के साथ अपना ‘बार्गेनिङ प्वाइन्ट’ बढाने के लिए ही हुआ है, उसके विगत के अडान को देखा जाय तो यही पुष्टि होती है । तभी तो उस के नेताओं के द्वारा सार्वजनिक होते आ रहे अडाने आजतक सम्बोधन नही हो पायी है । मोर्चामे समाहित मधेशकेन्द्रित दल के नेताओं मे भी ‘हम बडे तो हम बडे’ और ‘हम प्रभावशाली तो हम शक्तिशाली’ बनने की होडबाजी शुरु है । 
दिनेश यादव 
नेपाल मे घनिभूत रुप से मधेश के मुद्दा उठा आज बीसौ वार्षिकी मनाने की स्थिति मे पहूँचा है । नेपाल सद्भावना पार्टी के स्थापना के साथ गजेन्द्रबाबु द्वारा उठान किया गया यह मुद्दा अभियान का रुप धारण कर चुका है । पिछले कुछ बर्षो से उस अभियान के नेतृत्व मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के कांध पर आ अटका है । इस में विभाजित होकर बना सद्भावना पार्टी के विभिन्न गुट और तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के दो गुटों का भी अप्रत्यक्ष संलग्नता÷सक्रियता रही हैं । फोरम नेपाल के नेतृत्व मे वि.स. द्दण्टघरटद्ध  में सफल हुआ मधेश जनविद्रोह के बाद इन गुटों का सक्रियता अपेक्षाकृत ज्यादा ही बढा । परन्तु मधेश मुद्दा के सार्थक सम्बोधन आजतक भी नही हो पाई है । इस अवधि मे मधेश के राजनीति ने ढेर सारे उताड–चढाव का समाना किया , आज भी फरक शैली मे यह जारी हैं । कथित कुछ मधेशी नेताओं के ‘ओजपूर्ण’ और ‘लुभावने’ भाषण मे मधेश मुद्दा सीमित होने के कारण स्थिति सुधारोन्मुख होते हुए भी ठीक से गति नही पकड पाई है । फलस्वरुप मधेश केन्द्रित राजनीतिक पार्टीयाँ अपने लक्ष्य और उद्देश्य के प्राप्ति के लिए कोशो मिल दुर देखाई दे रहा है , अपने मुद्दा से भटक जाने की नियती जो बार बार वह दोहरा रहा है । मुद्दा को स्थापित कराने के लिए वह अभियान या मोर्चाबन्दी तो करती है । परन्तु सत्ता चक्रब्यु को तोड नपाने के कारण मोर्चा या अभियान प्रत्युत्पादक बनता आ चला रहा है । इस से मधेशीओं के ताकत सिर्फ कमजोर ही नही हुआ है, उसे निराशा और कुन्ठित भी बनाया है । अब तो मधेश मुद्दा के नाम लेते ही जन–जन मे आक्रोश दिखाई देने लगी है । तमाम मधेशीयों को एकता के सूत्र मे बन्ध नपाने के कारण मधेश मुद्दा के खिचडी यहाँ वर्षो से पकती आ रही है । उधर इसी मुद्दा को पकड कर कथित मधेशी नेतागण अपने–अपने रोटी सेकने मे सफल तो हो ही रहा है । इसी क्रम में जब सत्ता मे जाने की बारी आति है तो मुद्दा को ताक मे रख सत्ता के सिढियाँ चढते हुए स्वर्ग मे पहूँने की स्वप्न नेतागण देख्ने लगता है । तब वह कुर्सी पर आसिन होकर, अपने अगले गधे के जन्म से छुटकारा पाने के लिए ललायित रहते है । इसके बाद तो मधेश और मधेशी के मुद्दा भाड मे जाए, उसे उन्हे कोइ गम , चिन्ता और फिक्र नही रहता ।
जनआन्दोलन और मधेश ः
वि.स. द्दण्टद्दरटघ के जनआन्दोलन के ऐतिहासिक सफलता के बाद प्रमुख तीन पार्टीयाँ मुल्क को संघियता मे ले जाने के लिए विल्कूल ही तयार न होने के कारण मधेश जनविद्रोह का सूत्रपात हुआ । उसी बदौलत मुल्क संघीयता के ओर बढा । परन्तु आज भी संघीयता के विरुद्ध मे षडयन्त्रों का एक शृंखला सी यहाँ चल रही है । मधेश के कुछ दलालों, नोकरशाहों और गुलामों के मिलिभगत से यह सब होता आ रहा है । जनता स्वयंम के नेतृत्व मे हुए आन्दोलन के बाद प्राप्त हुए मधेशियों के पहिचान सहित के संघियता संवोधन के बाद मधेश के राजनीति मे कुछ ‘बहुरुपी नेताओ’ं का भी जन्म हुआ । वर्षो तक मुलधार के राजनीति मे रहे मधेशीमूल के नेताओं मे आश्चर्यजनक रुप से उत्पन्न हुआ आलोकित और अद्भूत ब्रह्मज्ञान के कारण वह मधेशबाद की ओर आकर्षित और केन्द्रित हुआ । जन्म से कम्युनिष्ट पन्थी और कांग्रेस पन्थी राजनीति मे रहे मधेशीमूल के वह नेताएँ मधेशी जनअधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव के द्वारा शुरु किया गया मधेश केन्द्रित आन्दोलन मे ‘षडयन्त्रमूलक’ ढंग से समावेश होकर फिर से मधेशियों का बादशाह बनने के लिए क्रियाशिल हो उठा , आगे बढा । वह इस मे सफल भी हुआ । फोरम नेपाल के संस्थापक नेताओं के गल्तीयों के कारण मधेशीयो के ‘राजा’ बनने के लिए ललायित वह धुर्त और चलाख नेता अपना बर्चस्प पार्टी मे शनैः शनैः बढाया । इसके बाद फिर शुरु हुआ सत्ता के खेल । पहले से ही सत्ता के सात्तिर खिलाडी रह चुके कुछ नेता स्वभाविक रुप से सत्ता केन्द्र के इर्दगिर्द चक्कर काँट्ने लगा ।  सत्ता के इस खेल मे फोरम नेपालको फसा दिया गया । उधर मधेश आन्दोलन के बाद चौथी शक्ति के रुप मे ऊभरे पार्टी के ऊर्जा को देख प्रमुख पार्टीया उसे पचा न पाने की स्थिति मे था ।  इसलिए अन्दर ही अन्दर घुन की तरह वह इसे समाप्त करने मे जुट गया था । और निर्वाचन के बाद संविधानसभा मे मधेश के बढे प्रभाव को छिन्नभिन्न करने की रणनीति के सिकार होता गया फोरम नेपाल । फिर मूलधार के पार्टी मे रहते हुए बारम्बार सत्ता के स्वाद चखते काले धन्दे और कर्तुत करने बाले मधेशीमूल के नेताओं का दबदबा फोरम मे बढता गया । इसि मौके के ताक मे थे वह अवसर वादी नेता । वह अपने ही द्वारा किये गये काले कर्तुत को साफ करने के ताक मे भी था । भ्रष्टाचार और अनैतिक कारनामे के कारण बदनाम हो चुकें मधेशीमूल के ये नेता मधेशी तो थे नही , जो पार्टी को टुक्रा–टुक्रा मे विभाजित करने बचता । उस मे मधेश के शक्ति को कमजोर करने की चाह भी था , जिस मे कुछ हद तक वह सफल भी हुआ । संविधानसभा मे फोरम नेपाल ५२ स्थान के साथ क्षेत्रिय राजनीति के पहला और राष्ट्रीय राजनीति के चौथे सबसे बडा शक्ति आज १२ स्थान मे संकुचन होने को बाध्य है । यह मधेशी मुद्दा स्थापित नहोने के अभियान मे लगे लोगो का चाल के तहत हुआ है । इस अवस्था को देख मधेशविरोधी लोग हंस रहे है, उधर मधेशीजन शर्म से सिर झुकाने को बाध्य हुए हैं ।

मधेशी दल और मोर्चाबन्दी
सरकारी रिपोर्ट को सही माना जाय तो मधेश मे सौ से ज्यादा सशस्त्र समूह है । परन्तु यथार्थ मे वह है नही । प्रचार के लिए और मधेशको बदनाम करने के लिए विगत मे राज्य के द्वारा किया गया अभियान था वह । परन्तु आज निसशस्त्र राजनीतिक पार्टीओं की सख्या भी २० के हाराहारी मे है, मधेश मे । सद्भावना पार्टी और फोरम नेपाल के ही नाम से एक दर्जन से ज्यादा पार्टी मधेश मे आज के तारिक मे क्रियाशिल हैं । तमलोपा के दो घटकसहित अन्य मधेश केन्द्रित दलों को जोडा जाय तो गिन्ती पुरा करने के लिए दोनो हातों का इस्तेमाल करने की स्थिति आएगी ।  मुद्दाहीन राजनीतिक विभाजन और मधेशीमूल के नेताओं के प्रतिशोध राजनीतिक सोच के कारण मधेशकेन्द्रि दलों मे फूट के साथ उसका आकार बढता चला जा रहा है । इसलिए तो भाषण मे मुद्दा एक है परन्तु दल के बीच एकिकृत नही हो पाने के वजह और क्या हो सकती है ? अपने को शक्तिशाली बने दिखावा करने के लिए कुछ नेता अभी भी जी जान से लगा हुआ है । मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा का उदय भी मुलधार के प्रमुख तीन राजनीतिक दलो के साथ अपना ‘बार्गेनिङ प्वाइन्ट’ बढाने के लिए ही हुआ है, उसके विगत के अडान को देखा जाय तो यही पुष्टि होती है । तभी तो उस के नेताओं के द्वारा सार्वजनिक होते आ रहे अडाने आजतक सम्बोधन नही हो पायी है । मोर्चामे समाहित मधेशकेन्द्रित दल के नेताओं मे भी ‘हम बडे तो हम बडे’ और ‘हम प्रभावशाली तो हम शक्तिशाली’ बनने की होडबाजी शुरु है । मोर्चा के एक महामहिम नेता कहते हैः नेपाल मे अगला प्रधानमन्त्री मधेशी को बनने से अब कोई नही रोक सकता  । उधर दुसरे कहते है ः १० हजार मधेशीओं को सेना मे समावेश नकरने के अवस्थामा सशस्त्र विद्रोह भी करने को हम पिछे नही हटेगें । तिसरे कहते है ः तराई के सशस्त्र समूह वार्ता मे आनेको तयार है और उसके साथ मोर्चाबन्दी कर सशस्त्र रुप मे मधेश आन्दोलन चलाने की तयारी चल रही है । चौथे भी भला ‘हम किसी से कम’ क्यो रहेगे सोच कर कहते है ः संविधानसभा से समस्या के समाधान नहोने पर पृथ्थकतावादी आन्दोलन हम कर सकते है । पाँचवे नेताका मुड भी आन्दोलन मे ही दिखाई देती है । मधेशी मोर्चा के मुखिया मे नेपाली कांग्रेस पार्टी के तीन पूर्व केन्द्रिय नेता है, एक एमाले के पूर्व नेता और एक विशुद्ध मधेशवादी है । पाँचो मुखिया बार–बार सत्ता मे आसिन रह चुके व्यक्तित्व है । इन सभी का सत्ता मे आसिन होने की समयावधि की  गणना किया जाय तो न्युनतम तीन बार और अधिकतम दर्जन से ज्यादा बार सत्ता सुख के भोगी है ये मुखिया । शक्ति और सत्ता मे ही जीवन व्यतित करने बाले यिन लोगो से मधेशीको क्या अपेक्षा रहेगी ? सब शक्ति संचय मे लगा हुआ है । मोर्चा के एक घटक तो सशस्त्र समूह को अपने मे समाहित कराकर शक्ति संचय मे अग्रपंक्ति मे दिखाई दिआ है । मोर्चा के अन्य दल भी अपना बार्गेनिङ पावर बढाने हेतु अन्य सशस्त्र समूह से वार्ता जारी रखा है । राजनीतिक जानकार बताते है ः इस तरह के कदम से मधेश और मधेशी को कुछ नही मिलेगा । हाँ एकिकरण मे लगे नेताओं को सत्तासिन बनने के लिए बहुत बडा हैसियत प्रदान यह कर सकता है । परन्तु यह सब ‘रिभोल्युसनरी स्पीच’ सत्ता बाहर रहने तक ही सीमित रहने की बात जनता जानती है ।  इस से पहले मोर्चा के अधिकांश घटक सत्तासिन ही थे । परन्तु मधेश के विपक्ष के शृंखलाबद्ध निर्णय को तो किसी ने नही रोक सका । उस समय वह चुप क्यो थे ? मधेश मे यह एक खोज की विषय बना है ।
इसितरह पार्टी से अलग हुए लोग पार्टी को फोडा नही गया, नये पार्टी बनाने की दलिल भी पेश कर रहा है । जो सरासर गलत तर्क है । पार्टी आन्दोलन के समय या निर्वाचन के समय मे बनाई जाती है परन्तु सत्ता समिकरण हेरफेर के समय मे पार्टी का गठन या निर्माण हो तो उसे पार्टी बनाने के रुप मे नही, षडयन्त्र के तहत लिया जाता है । राजनीतिक दुकानदारी कर आम्दानी के स्रोत जुटाने के लिए ‘मधेश मुद्दा’ के नाम पर खोला गया पार्टी के अस्तित्व ‘सस्टेनेवल’ कभी भी नही हो सकता ।  खास कर के नेपाल के राजनीति मे तो यह सम्भव ही नही है । फिर व्यक्ति के चरित्र भी पार्टी गठन के महत्वपूर्ण पक्ष होते है । भ्रष्टाचारी, रातारात अकूत सम्पति के मालिक बने लोग और समुदाय के उत्थान के नाम पर कालेधन लुटाने बाले व्यक्ति के नेतृत्व मे खोला गया दलों के साथ जनता कभी नही रही है और न रहेगा ।

सीमित कार्यकर्ताबीच तानातान
तराई मे मधेशकेन्द्रित दल के संख्या बढ्ते ही सीमित कार्यकर्ताओं के बीच तानातानी जारी है । खास कर के फोरम मे यह खिचातानी सब से अधिक चल रहा है । पूर्वी क्षेत्र से ज्याद पश्चिम मे कार्यकर्ताओं के बीच मे तानातानी जोरसोर से हो रहा है । जुलुस और कार्यक्रम मे सहभागिता के लिए कार्यकर्ताओं के विभिन्न गुटो से आर्थिक सहयोग भी दिआ जा रहा है । इससे कार्यकर्ताओं को क्षणिक आर्थिक लाभ हो रहा है । उधर राजनीतिक दल के नेता मुर्ख बन रहा है । हाल ही मे संस्थापन फोरम नेपाल से अलग हुए गणतान्त्रिक फोरम के एक कार्यक्रम मे सहभागी कार्यकर्ता फोरम के तीनो विभाजित गुटो मे देखा गया है । यह नेपालगञ्ज के कार्यक्रम मे ही नही राजबिराज मे भी देखने को मिला है । खास करके भाडे के लोगों को एकठा कर किसी स्थान पर कार्यक्रम कर लेना एक वात है परन्तु सचेत कार्यकर्ताओं को पार्टी मे लाना दुसरी बात है । संस्थापन फोरम के कार्यकर्ताओं कि बात माने तो गणतान्त्रिक फोरम के अलग होना और लोकतान्त्रिक फोरम के अलग होने मे बहुत अन्तर है । फिर भी संस्थापन फोरम के छवि आज भी मधेश के जिल्ला मे सम्माजनक ही है । संस्थापन पक्ष मे ही कार्यकर्ता की भीड ज्यादा है । गणतान्त्रिक के एक दो नेता को छोड मधेश मे किसी के पास जनाधार नही हैं । हाँ वह पैसा के बलबुतो से भिड जम्मा कर सकते है , परन्तु प्रतिबद्ध , सिद्धान्तनिष्ट और आस्थावान कार्यकर्ता आज भी संस्थापन पक्ष मे ही है । केन्द्र में बार–बार हुआ विभाजन से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है । इसि कमजोर मनोबल बाले कार्यकर्ता ही क्षणिक स्वार्थ के लिए पलायत होते आ रहे है । सैद्धान्तिक गणित के गुड जानने बाले कार्यकर्ता गुट और फूट मे विल्कूल विश्वास नही रखता है । टुट्ने और नये पार्टी बनने के क्रम मे एक ही व्यक्ति का फेरबदल होता आ रहा है । मधेश के जिल्ला मे तराई केन्द्रित दल के दौडाहा फिलहाल घनीभूत हुआ है । सीमित कार्यकर्ता और दल अधिक होने के कारण नेताओं समस्या पडी है ।
अन्त्यमे,
किसी भी मुल्क, राज्य, समाज और समुदाय राजनीति और राजनीतिकर्मी से बहुत ही प्रभावित होता है । समाज सेवा को सर्वव्यापी और सर्वमान्य बनाना राजनीतिकर्मीका कर्म होनी चाहिए । वैसे तो समाज सेवा अन्य तरिका से भी किया जा सकता है । राजनीति मे मूल्य, मान्यता, आचारसंहिता का अर्थ होता है जनता और अपने समुदायप्रति के प्रति इमान्दारिता के साथ देश और समाज के प्रति वफादारीता निर्वाह करना । मधेश के कुछ नेता अपने मुद्दाको भूला ही नही उस क्षेत्र के विकास और शान्ति सुरक्षा मे भी अपना उत्तरदायी भूमिका निर्वाह नही कर पाने की स्थिति मे है । मधेश मे असल नेता नही है , यस कहना आज के तारिक मे गलत होगा । परन्तु उसे सर्वमान्य बनने ही नही दिया जा रहा है , कुछ तत्वो के द्वारा । इन गलत तत्वो मे व्याप्त सर्वसत्ताबादी सोंच और आर्थिक लाभ प्राप्त गर्ने के ध्यय के कारण मधेश के राजनीतिक अवस्था एक अराजक संस्कार की अवस्था से गुजर रहा है । इसलिए तो मधेशकेन्द्रित दल के कुछ नेता और कार्यकर्ता फ्रि छोडा गया साढ की तरह अनियन्त्रित है । वह चरम महात्वाकांक्षी बना है । इसिलिए उसमे अनुशासनहीनता के सीमा नाघ चुका है ।  मधेश के फिलहाल की आवश्यकता विकास, शान्ति, सुरक्षा और रोजगारी है । मधेशीओं को पहिचान, स्वाभिमान, स्वशासन दिलाने के लिए एकजूट होकर आगे बढ्ने का समय है , यह । इन सब को छोड कुछ मधेशी नेता ‘अन्य मुद्दा’ मे केन्द्रित हो कर मधेशी एजेण्डा को कमजोर बनाने मे लगा हुआ है । ऐसे नेताको जनता वहिष्कार करे । जो इमान्दार है उसे साथ दे और मधेश के अस्तित्व बचाते हुए एकिकृत नेपाल के रक्षार्थ सभी को आगे बढना ही होगा । Tuesday, 5 July, 2011, 1:46 PM THE Public hindi monthly

सत्ता के गलियारो भटक गए नेता


नेता मे नैतिकता की खडेरी है । उनका चरित्र इस कदर नीच हो आई है कि उपर उठ्ने मे लम्बे तान भरने की जरुरत पडेगी । मधेश के नेता मन्त्री तो बने है, सरकारी सुविधाओं का उपभोग तो वह कर रहे है, करते भी है । लेकिन इसका क्या मतलब जब वह अपना मतदाता और समर्थत खोते चले जा रहे है । मधेश के नेतागण हर रोज अपने जनता और समर्थनको खोते जा रहे है । यह राजनीति करने वाले के लिए बहुत महंगा सौदा है । नेता सुख सयल मे इतने मस्त है की वह अन्धे है, बहरे हो गए है । अब तो अन्धे और बहरे दोनो हो गए है, सत्ता के कारण । जनताओं मे देश और मधेशको बदलने की प्यास और अकुलाहट है , वह कुछ करना चाह रहा हैं । परन्तु नेतागण जनता के लिए मुर्दे बन रहा है ।



दिनेश यादव 

नेपाल के संविधान निर्माण प्रक्रिया फिलहाल बहुत ही गम्भिर और जटिल मोड मे पहुँचा है । विभिन्न दल के नेताओं के गैर–राजनीतिक सोच और सत्ता मोह के कारण यह स्थिति आई है । इस संविधानसभा से जनसंविधान न बनने की स्थिति अब साफ–साफ नजर आने लगी है । जनता मे संशय है, भ्रम, निराशा और ढेर सारे कुन्ठाए भी । प्रमुख तीन पार्टीया ‘पावर कैप्चरिङ’ के दौड मे सामेल है । उसके मुखिया अपने–अपने नेतृत्व मे सरकार निर्माण हो, उसी ताक मे हमेशा दिखाई दे रहा है । परन्तु देशी ÷विदेशी शक्तियों के चलखेल के कारण यह हो नही पा रहा हैं । फिर भी इसके लिए वह ‘अन–नेचुरुल’ मार्गको चुनकर ‘पावर गोल’ तरफ खरगोस की रेस मे जमे है । इसिलिए तो वह ‘संविधान निर्माण या शान्ति प्रक्रिया’ मे से कौन पहले पुरी होनी चाहिए , आज के तिथि तक भी तय नही कर पाया है ।
माओवादी सत्ता मे है इसिलिए वह संविधान निर्माण प्रक्रिया पर जोर दे रहा है । उधर प्रतिपक्ष मे रहे दल नेपाली कंग्रेस और एमाले ही नही सत्तासिन मधेशी लोकतान्त्रिक मोर्चा के पाँच घटक दल भी संविधान से पहले शान्ति प्रक्रिया पर जोर दे रहा है । सत्ता और मोर्चा से बाहर रहा मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल संविधान निर्माण प्रक्रिया को प्राथमिकता मेँ रखा है । बाँकी दलों का स्थिति भी इससे विल्कुल फरक नही । इस तरह देखा जाय तो संविधान निर्माण प्रक्रिया मे यहाँ के राजनीतिक दल दो ध्रुवो मे बँट चुका है । एक चाहता है पहले संविधान बने फिर शान्ति प्रक्रियाको आगे बढाया जाय । दुसरा पक्ष चाहता है , शान्ति प्रक्रिया के बाद संविधान बने । वैसे यह दोनो ‘प्रक्रिया साथ–साथ चलनी चाहिए’  मत रखने वाले भी है, यहाँ ।
‘शान्ति प्रक्रिया पहले’ मत रखने वाले के भित्री आशय संविधान बनाने की नहीं है । वह सेना समायोजन को प्राथमिकता मे रखकर आगे बढ रहा है । इसी पक्षधर लोगो का पलडा अभी भारी होते दिखाई देने लगा है । वह पहले शान्ति प्रक्रिया पर जोर दे कर संविधान निर्माण को अबरुद्ध करना चाहता है । कंग्रेस और एमाले इस मुद्दे पर एक थे ही अब इस मे कथित चौथे शक्ति भी समावेश हो गये है । मोर्चा के नाम पर सिर्फ सत्ता के लिए बना यह चौथा शक्ति आम–नेपाली जनता और आम–मधेशीजन के लिए नही , मोर्चा मे सहभागी कुछ ‘छुछुन्दर चरित्र’ वाले सभासद्, नेता, कार्यकर्ता और बुद्धिजीवि के हित मे यह जरुर हो सकते है । क्योकी जिसका न कोइ लक्ष्य है न सिद्धान्त, न कोइ अडान है न सम्मान, न कोइ सही गोल है न सही बोल । इसिलिए तो वह मन्त्रालय के बखडाबाजी (बाँडफाँड) मे और अपने मन्त्रीओ के चयन के लिए बखेडाबाजी मे फँसता आ रहा है, फँसा हुआ है ।
पेचिंदा राजनीति
स्व–शासनसहित के संघियता मधेशी, दलित, मुस्लिम, आदिवासी÷जनजाति को सब से पहले चाहिए । इन समुह÷समुदायो के लिए ही नव–संविधान की जरुरत है । इसे संघियता चाहिए और आत्मनिर्णय के अधिकार भी । परन्तु इन समूहों÷वर्गो÷ समुदायों के कथित मुखिया सत्ता के गलियारों मे इस कदर भटक और गुल हो गए है कि उसे सिर्फ मालदार मन्त्रालय की धुन लगा हुआ है । ताकी अच्छे माल और मुद्रा कमाया जाय सके । यह उसे फिलहाल परिवर्तित शैली मे मिला भी हैं । खास करके मधेशी मोर्चा मे आबद्ध कुछ नेता लोग अभी भी अपने–अपने पूर्व माउ पार्टी कंग्रेस और एमाले के चरित्र परित्याग नही कर पाया है । जिसका चरित्र सिर्फ सत्ता मे पहुचँना रहा । ऐसे चरित्र बाले के लिए तो सत्ता प्राण और जीवन है न ? धन्य मोर्चा के एक घटक दल के अध्यक्ष जो सरकार मे सामेल नही हुए । उसके इस त्याग से थोडा ही सही राजनीति मे त्याग की भावना है, सन्देश संचार हुआ है । मोर्चा के अन्य दल के अध्यक्ष सत्ता और कुर्सी के भुख मे राजनीति मे ‘त्याग शब्द’ भी होते है, भूला गये है । उस मे यह सुध तो होनी ही चाहिए थी कि सत्ता पर आसिन होने से, प्रमुख और शक्तिशाली मन्त्रालय पर कब्जा जमाने से मधेश और मधेशीयों का उत्थान संभव नही । क्योकी अभी भी यहाँ के शासक, प्रशासक और सत्ता मे रहे लोगोका मानसिकता, नियत, मनोबृत्ति, संस्कार और सोच पुरानी ही है ,सिर्फ व्यवस्था और सत्ता परिवर्तन से कुछ नही होता । इसिलिए तो मधेश के ‘अपने गुलाम नेताओं’ को वे सत्ता के लोभ, लालच मे आसानी से फँसाते चले आ रहे है । और हमारे लालची नेता भी तो उसी के लायक जो है । इसिलिए तो उसके राजनीति सिर्फ उपप्रधानमन्त्री और मन्त्री बनने तक ही सीमट सी गयी है, संकुचित हो गयी है । वह ‘राजनैतिक’ को भूल ‘राजनीति’ मे गुम हो गयें है । वह ‘राज नेता’ नही ‘पार्टी नेता’ मे सीमित हो चुके है । इसिलिए तो वह जन–नेता या जन–नायक बनना नही चाहते है । इसके लिए वह लायक भी तो नही है । मधेश मे जन–नायक की खोजी चल रही , नायक की नही । हमेशा सत्ता के पिच्छे दुम हिलाने वाले जनप्रिय और लोकप्रिय नेता कसै बन सकते है ? किंचित नही बन सकते । इसके लिए त्याग और सिद्धान्त मे अडान आवश्यक सर्त है । हाँ , सत्ता मे पहुँचने के उसके ध्येय और उद्देश्य सिर्फ अकूत सम्पति कमाना ही है तो वह अब पिछे रहे लोग, समुदाय और वर्ग के दुहाई देकर स्वयं अपने को धोका न दे तो बेहतर होगा । वह यह भुल रहा है कि पहले और आज बाली स्थिति, परिस्थिति और राजनीतिक माहौल बदला है । अब लोग जानने लगे है कि क्या सही और क्या गलत है ?
महंगा सौदा
नेताआें मे नैतिकता की खडेरी है । उनका चरित्र इस कदर नीच हो आई है कि उपर उठ्ने मे लम्बे तान भरने की जरुरत पडेगी । मधेश के नेता मन्त्री तो बने है, सरकारी सुविधाओं का उपभोग तो वह कर रहे है, करते भी है । लेकिन इसका क्या मतलब जब वह अपना मतदाता और समर्थत खोते चले जा रहे है । मधेश के नेतागण हर रोज अपने जनता और समर्थनको खोते जा रहे है । यह राजनीति करने वाले के लिए बहुत महंगा सौदा है । नेता सुख सयल मे इतने मस्त है की वह अन्धे है, बहरे हो गए है । अब तो अन्धे और बहरे दोनो हो गए है, सत्ता के कारण । जनताओं मे देश और मधेशको बदलने की प्यास और अकुलाहट है , वह कुछ करना चाह रहा हैं । परन्तु नेतागण जनता के लिए मुर्दे बन रहा है । जनता हताशा और निराशा के कालकोठरी मे दिनप्रति दिन पड्ते जा रहे है ।  जनता के मन को बदलने को, अपने समर्थक के चरित्र बदलने को , कार्यकर्ता मे प्राण प्रतिष्ठा कायम करने को , उसको आत्म देने को मार्ग खोजे जा सकता है, परन्तु यह सब नही हो पा रहा है । कारण नेता सक्षम और कुशल नेतृत्व क्षमता से कोशो दुर जो हो गए है । लोगो मे निराशा घनीभूत होती दिखाई मालुम पडती है । अतः देश और मधेश के राजनीति को गलत रास्तो पर जाने से बचाना होगा, रोकना होगा । अपने को नेता कहलाने बाले इतने जोर से जनता के ऊपर हमला बोल रहा है कि जनता के सारे अंग उसके नीचे दब गए हैं । जैसे राजनीतिज्ञ ही सब कुछ है और शेष कुछ भी नहीं है । यह आत्मघाती सौदा हो सकता है । इसे वह न भुले को बेहतरिन होगा ।
मोर्चा और संविधान
नेपाल के वर्तमान राजनीति परिवेश रजनीश ‘ओसो’ के इस परिभाषा से मिलती जुलती नजर आति है । वे लिखते है ः  राजनीति न तो किसी मुल्क के चरित्र को बनाती है, राजनीति न किसी मुल्क को आत्मा देती है । राजनीति न मुल्क को शान्ति देती है और न आनंद देती है , और न जीवन को अर्थ और मीनिंग देती है । राजनीति केवल दवदवा देती है, संघर्ष देती है और महत्वाकांक्षा देती है । और एंबीशन जितने बढती चली जाती है, उतनी मन को वायलेंस, हिंसा और एक दूसरे के प्रति शत्रु के भाव से भरती चली जाती है । नेता सभी एक ही नाव पर सवार है –धोखे की, बेइमानी की , चरित्रहीनता की, भ्रष्टाचारी की, पावर शो करने की । नेताओं मे महात्वाकांक्षा इतनी बढी है कि वह खुद के एजेण्डे से कोशो दुर हो रहे है । इसिलिए तो संविधानसभा के म्याद मे ‘ग्रेस’ शब्द का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षो से होता आ रहा है । पहले पुष्पकमल दाहाल, फिर माधव नेपालको संविधान सभा के लिए म्याद थपने के ग्रेस अंक मिला । किसीको छ माह तो किसीको तीन माह का यह ग्रेस अंक मिला । पिछले माह बाबुराम भट्टराई को भी ग्रेस मिला है । वह ग्रेस  अन्य प्रधानमन्त्रीयो के तुलना मे ४५ दिन कम है । इसके बाद फिर ४५ दिन के ग्रेस उसे मिलने वाला है । परन्तु संविधान निर्माण प्रक्रिया शुन्य की ओर बढ्त बनाया हुआ है और ‘अनन्त’ मे जाने के मार्ग मे है । इसिलिए अगले कुछ माह के बाद देश मे भयावह स्थिति के संभावाना स्पष्ट होती जा रही है । वर्तमान गठबन्धन को परिवर्तनकारी शक्ति के रुप मे आंकलन किया जा रहा है । परन्तु इसी शक्ति के नेतृत्व मे संविधानसभा के अन्त्येष्टि के तयारी भी जोरो से चल रहा है । माओवादी और मधेशी मोर्चा के नेतृत्व मे रहा यह सरकार के द्वारा ही संविधानसभा भंग करने कि षडयन्त्र भी हो रही है, नेपाल मे । माओवादी सत्ता मे जाने के लिए नामुद भ्रष्ट लोगो को शक्तिशाली मन्त्रालय देकर नेतृत्व लेने को तयार है, यस बात पब्लिक जानने लगी है । अब संविधानसभा भंग हो जाय तो उसे आश्चर्य के रुप मे नही लेनी चाहिए, यस भी वह जानती है । माओवादी और मधेशवादी दल के वर्तमान गठबन्धन दोनो अमुक शक्ति के ‘युज व्याट्री’ बनने के कगार पर है । खास करके मधेशी मोर्चा के प्रमुख पाँच घटक के नेता इसके लिए योग्य भी दिखाई देने लगा है । अतः वह संविधानसभा निर्माण को ‘मुंल्तबी’ मे रख तपसिल के मुद्दे मे अपने को केन्द्रित करने मे क्रियाशिल है । जनता को प्रधानमन्त्री, उपप्रधानमन्त्री और मन्त्री कोई भी बने , नेतृत्व किसी भी दल को मिले , उस से कोइ सरोकार नही है ।  उसे तो सिर्फ संविधान चाहिए । इसिलिए तो जनता धैर्यधारण कर चुप्पी साधे हुआ है । लेकिन धैर्यता के बाँध जब टुटेगी तो उस मे सारा लिन लोने की संभावना को अब नकारा जाना उचित नही होगा, बढी भूल होगी । समय अब भी शेष है, जनता के पक्ष मे काम कर दिखाने के लिए । सम्बन्धित सभी एकजूट होकर समय की माग को पहचानते हुए आगे बढे इसी मे कल्याण है , नही तो सभी का ‘स्वाहये नमः’ होने से कोइ नही रोक सकता । ( Published article in The Public Hinhi monthly at Septeber 2011)

Monday, 19 September, 2011, 3:56 PM

Thursday, 14 February 2013

राजनीतिमा मधेसी महिला

पुरुष मानसिकताका कारणले आधा आकाश ढाकेका महिलाहरू अझै पनि अवसरहरूबाट वञ्चित छन् । खासगरी राजनीतिमा त महिलाको पहुच ‘टिके प्रथा’ मै सीमित छ । वर्षौंयता चुनाव भएको छैनन् । विगतका चुनावहरूलाई हेर्ने हो भने यहाका राजनीतिक दलहरूले महिलाहरूलाई उम्मेदवारै बनाउन कन्जुसाइ गर्छन । यदि उम्मेदवार बनाइ हाले पनि पार्टीले जित्न सक्ने सुरक्षित स्थानबाट उनीहरूलाई टिकट दि“इदैन । फलस्वरूप चुनावी परिणाम महिलाको पक्षमा रहदैन, हुदैन ।

दिनेश यादव 
भनिन्छ, सबै नीतिको माउ नीति नै राजनीति हो । तर, सक्षम र योग्य नेतृत्व क्षमता अभावमा यहा“का राजनीतिक दलहरूले मुलुकलाई सही दिशा निर्देशन गर्न सकिरहेका छैनन् । यहा“ पटक–पटक आन्दोलन भए, सफलता पनि प्राप्त भयो । तर आन्दोलनका उपलब्धिहरू नेताहरूकै ढुलमुल नीति र अदुर्दशिताका कारण अपेक्षाकृत संस्थागत हुन नसकेको अवस्था छ । पछिल्लो समय संविधान बनाउने जिम्मा पाएका दल र त्यसका नेताहरूले संविधानसभाबाट आफ्नो संविधान पाउने जनताको चाहना तुहाइदिए, संविधान बन्न सकेन । मुलुक राजनीतिक अस्थिरताको भु“वरीमा ढकेलिएको छ, संक्रमणकाल लम्बि“दै गएको छ । दलका नेतृत्वपंक्तिको गलत सोच, मानसिकता र सत्ता मोहकै कारण मुलुक अनिर्णयको बन्दी र अराजकताको स्थितिबाट गुज्रिरहेको छ । देशभन्दा पार्टी ठूलो र पार्टीभन्दा व्यक्ति ठूलो बनेपछि मुलुकमा राजनीतिक बेथिति बढ्ने नै भयो । फेरि राजनीतिमा पुरुषहरूको हालीमुहालीले पनि यो स्थिति निम्त्याएको दाबी गर्नेहरूसमेत धेरै भेटिन्छन् ।
पुरुष मानसिकताका कारणले आधा आकाश ढाकेका महिलाहरू अझै पनि अवसरहरूबाट वञ्चित छन् । खासगरी राजनीतिमा त महिलाको पहु“च ‘टिके प्रथा’ मै सीमित छ । वर्षौंयता चुनाव भएको छैनन् । विगतका चुनावहरूलाई हेर्ने हो भने यहा“का राजनीतिक दलहरूले महिलाहरूलाई उम्मेदवारै बनाउन कन्जुसाइ“ गर्छन । यदि उम्मेदवार बनाइ हाले पनि पार्टीले जित्न सक्ने सुरक्षित स्थानबाट उनीहरूलाई टिकट दि“इदैन । फलस्वरूप चुनावी परिणाम महिलाको पक्षमा रह“दैन, हु“दैन ।
 राजनीतिमा महिलाको सहभागिता २०६२÷०६३ को जनआन्दोलनपछि केही बढे पनि सन्तोष मानि हाल्ने स्थिति भने अझै आइनसकेको अवस्था छ । मुलुकका आधा जनसंख्याको प्रतिनिधित्व गर्ने महिलाको राजनीतिमा सहभागिता नभएसम्म मुलुकले गति लिन सक्ने छा“ट अब देखिन छाडिसक्यो । छिमेकी मुलुक भारतको बिहार राज्यमा सबै क्षेत्रमा अस्तव्यस्तता केही वर्षअघिसम्म कायमै थियो । त्यहा“ जंगलराजको स्थिति थियो । तर जब त्यहा“ महिलालाई राजनीतिमा अवसर प्रदान गरियो, सबैखाले बेथिति न्यूनीकरण उन्मुख छ । अहिले बिहारमा एक लाख ३३ हजार ग्राम र नगरपञ्चायतको प्रतिनिधित्व ५५ प्रतिशत महिलाले गरिरहेका छन् । ५० प्रतिशत आरक्षण र ५ प्रतिशत खुला प्रतिस्पर्धाबाट महिलाले चुनाव जितेर नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह गर्दा त्यहा“ भ्रष्टाचार कम हुनुको साथै सरकारी कामकाममा ढिलासुस्तीको लगभग अन्त्य भएको छ । महिला हिंसामा समेत कमी आएको विभिन्न रिपोर्टले पुष्टि गरिसकेको छ । तर नेपालमा महिला नेतृत्वको कुरा गर्ने हो भने पछिल्लो सरकार बनेको आठ महिना भइसक्दा पनि मन्त्रिपरिषद्मा एकजना महिलालाई पनि मन्त्री बनाइएको छैन । पुरुष राजनीतिकर्मीहरू अझै पनि महिलालाई राजनीतिमा अवसर दिनुपर्छ भन्ने मान्यता नराखेको यसले पुष्टि हु“दैन र ?
बियोन्ड बेइजिङ कमिटीले १ हजार १६ जना राजनीतिक महिलाबीच केही समयअघि गरेको अध्ययनले ३१ दशमलव ५ प्रतिशत जनजाति, ७ दशमलव ५८ प्रतिशत दलित, ४ दशमलव ७२ प्रतिशत मधेसी र शून्य दशमलव २० प्रतिशत मुस्लिम समुदायका महिला राजनीतिमा संलग्न रहेको देखाएको थियो । २०६३ सालको अन्तरिम व्यवस्थापिका संसद्मा ३३० जना सांसदमध्ये ५७ जना महिला सांसद जसको कुल संख्याको १८ दशलव ७५ प्रविशत सहभागिता गराइएको थियो । संविधानमा व्यवस्था भएअनुरूप महिलाको ३३ प्रतिशत सहभागिता हुन सकेन । तर, राज्यका सबै निकायमा ३३ प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व गराउने बाध्यकारी व्यवस्थाका कारण २०६४ मा भएको संविधानसभाको निर्वाचनपछि बनेको ६०१ सदस्यीय संविधानसभामा  १९७ महिला सभासद, जुन जम्मा संख्याको ३३ दशमलव ३३ प्रतिशत सहभागिता रहेको थियो । संविधानसभा चुनावमा मिश्रित चुनावी व्यवस्था अपनाइएपछि सविधानसभामा १९७ महिलाले प्रतिनिधित्व गर्न पाए, जसमा ५४ जना मधेसी समुदायबाट आएका थिए । मधेसी महिलाको यो नै ठूलो राजनीतिक विजय थियो । संविधानसभामा प्रत्यक्ष सिटमा २९ र बा“की समानुपातिक महिला सभासद चुनिएर आएका थिए । तर उनीहरूलाई निर्णायक भूमिका प्रदान गरिएन । २०४६ को जनआन्दोलनको सफलतापछि सम्पन्न हरेक चुनावमा औंलामा गन्न सकिने महिलाले मात्रै विजय हासिल गरेका थिए । तर संविधानसभाको चुनावपछि राजनीतिमा महिलाको सहभागिता बढ्यो ।
यसो हु“दाहु“दै राजनीतिमा सक्षम मधेसी महिलाको पहु“च अझै पर्याप्त हुन सकेको छैन । पूर्वी मधेसमा चित्रलेखा यादव, रेणु यादव, सरस्वती चौधरीलगायतका महिलाले राजनीतिमा आफ्नो पहु“च वर्षौंदेखि कायम राखे पनि पछाडि पारिएका, सीमान्तकृत, दलित, मुस्लिम महिलाहरू अझै पनि राजनीतिक अवसरबाट वञ्चित छन्, निर्णायक तहमा छैनन् । पश्चिम नेपालको मधेस क्षेत्रमा पनि मोहम्मदी सिद्धिकीलगायतका महिलाबाहेक अरू समुदायले राजनीतिमा आफ्नो पहु“च बढाउन सकेको छैन । राजनीतिमा महिला सहभागिताबारे बांकेकी नेपाली कांग्रेसकी पूर्वसभासद मोहम्मदी सिद्धिकीले यहा“का पार्टीहरूले महिलाको सशक्तिकरणको कुरा गरे पनि प्रभावकारी नभएको र कार्यान्वयन फितलो भएको बताउ“छिन् । ‘महिलाहरू नेतृत्वका लागि योग्य भए पनि पुरुषवादी सोचकै कारण अवसरबाट वञ्चित छन्,’ उनले भनिन्,  ‘यहा“का सबै पार्टीले आ–आफ्नो घोषणापत्रमै महिलाहरूका लागि पर्याप्त आरक्षणको व्यवस्था गरी कडाइका साथ पालना गर्नुपर्छ ।’ स्नातकोत्तर गरेर उनी मुस्लिम समुदायकी हुन् । फतिमा फाउन्डेनकी अध्यक्ष सिद्धिकी वडाअध्यक्षदेखि सभासदसम्मको हैसियतले काम गरिसकेकी छन् ।
त्यस्तै स्नातकोत्तरसम्मकी अध्ययन गरेकी सिरहाकी चित्रलेखा यादवले उपसभामुखको भूमिका निर्वाह गरिसकेकी महिला नेतृ हुन् । महिलालाई बाहिर निस्कन नदिने मधेसी समुदायको कट्टर परम्परालाई चिर्दै नेपाली कांग्रेसको राजनीतिमा उनी अगंपंक्तिमा रहेकी छन् । यसैगरी सप्तरीकी सरस्वती चौधरी पिछडिएको थारू समुदायबाट महिला आन्दोलनमा सशक्त भूमिका निर्वाह गर्दै आएकी छन् । उनी वामपन्थी राजनीति गर्दै अहिले माओवादीमा सक्रिय छिन् । अर्की नेतृ रेणु यादव विसं २०६० मा महिला बालबालिका तथा समाज कल्याण राज्यमन्त्री हु“दा सबैभन्दा कम उमेरमा मन्त्री हुने महिलाको सूचीमा परेकी थिइन् । रेणु नेपाली कांग्रेस सम्बद्ध नेपाल महिला संघ सप्तरीको अध्यक्ष हुंदै राष्ट्रिय प्रजातन्त्र पार्टीमा प्रवेशपछि मधेस केन्द्रित दलमा सक्रिय छिन् । सप्तरीबाट उनी प्रतिनिधिसभाका सदस्य र संविधानसभामा निर्वाचित भएकी थिइन् । उनी शिक्षामन्त्रीसमेत बन्न सफल भइन् । तर मधेस र सिंगो मुलुकको राजनीतिमा एक÷दुई महिला वा अमुक जातिका महिलाहरूलाई मात्रै प्रतिनिधित्व गरेर पुग्दैन । समग्र रूपमा महिलाको पहु“च र प्रभाव राजनीतिमा देखिनुपर्ने आजको अपरिहार्य विषय बनेको छ । महिला अधिकारकर्मीहरू भन्छन्, ‘महिलालाई नेतृत्व गर्ने अवसर दिए मुलुकमा व्याप्त भ्रष्टाचार, सरकारी निकायमा ढिलासुस्ती र बढ्दो महिला ंिहंसाको अन्त्य हुनेछ ।’ राजनीतिमा महिला सहभागिताबारे मधेसी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रिककी पूर्वसभासद एवं पूर्वमन्त्री कलावती पासवानले मधेसी महिलाहरू निकै पछाडि परेकाले आरक्षणबाटै उनीहरूको नेतृत्व विकास हुने बताउ“छिन् । ‘महिलाहरूले पनि केही गर्न सक्छन् भन्ने विश्वास नभएकै कारण उनीहरू पर्याप्त संख्यामा निर्वाचित हुने अवस्था अझै भइसकेको छैन ’ त्यसैले दलहरूबाट महिलाको उम्मेदबारी परे पनि एक÷दुईजनाले मात्रै जितिन्, महिला आरक्षण नभएको मजस्ता अति पिछडिएकी नारीले संविधानसभामा अवसर पाउने थिइन“ ।’ नेपालको राजनीतिक आन्दोलनहरूमा मधेसी महिलाहरू अग्रस्थानमा रहेर आफ्नो सक्षम भूमिका निर्वाह गरिसकेको उदाहरण धेरै छ । धेरैले आहुति पनि दिएका छन्, प्रजातन्त्र र लोकतन्त्रका लागि । तर समुचित प्रतिनिधित्व नहु“दा महिलाहरू अझै पनि पछाडि नै परेको अवस्था छ । मधेसको मुस्लिम, आदिवासी, जनजाति, सीमान्तकृत, अल्पसंख्यक, दलितलगायतका समुदायको महिलालाई पनि राजनीतिमा ल्याउन राज्यले भगमग्दुर प्रयासको खा“चो छ ।
(३ फागुन २०६९, कान्तिपुरको कतार संस्करणमा प्रकाशित)

Thursday, 7 February 2013

सत्ता टिकाउने दाउमा मधेसी मोर्चा


मुद्दा उही छ, नेता पनि उही छन्, तर मधेस मुद्दाको सम्बोधन हुन सकिरहेको छैन । फेरी मधेसी दलहरु हरेक सरकारमा सत्ताधारी बनेको वर्षौ भईसकेको छ । अहिले त इतिहासकै सर्वाधिक मधेसी दल र त्यसका नेताहरु ‘मालदार’ र महत्वपूर्ण मन्त्रालयमा आसिन छन् । तर, मधेस आन्दोलनलगतै २२ बुँदे र तत्कालिन मोर्चासंग आठ बुँदे, त्यसपछि सात बुँदे र चार बुँदे  सहमतिहरु भएपनि कार्यान्वयन हुनसकेको छैन । 

दिनेश यादव
सरकार निर्माणका बेला होस् या चुनावमा जानुुअघि , सत्ताधारी पार्टी, सरकार र मधेसकेन्द्रित दलहरूबीच पटक–पटक सहमतिहरु भएका छन् । ०४६ को जनआन्दोलनको सफलतापछि गजेन्द्रनारायण सिंहको नेतृत्वमा बनेको नेपाल सद्भावना पार्टीले तत्कालिन सरकारसंग दुई पटक क्रमशः ९ र ११ बुँदे सहमति गरेको थियो । तर, त्यस्ताका सद्भावना पार्टी सरकारमा गएपनि सहमतिको एउटापनि बुँदा राम्ररी कार्यान्वयन हुन सकेन ।  ०६२÷०६३ को जनआन्दोलन सफल भएलगतै उपेन्द्र यादव नेतृत्वको तत्कालिन ‘अधिकारवादी’ संगठन मधेसी जनअधिकार फोरम नेपालले मधेस आन्दोलनपछि सरकारसंग २२ बुँदे सहमति ग¥यो । फोरम नेपाल राजनीतिक दलको हैसियतमा आएपछि सरकारमा सहभागि भयो , तर सहमतिका बुँदाहरूलाई कार्यान्वयन गराउन फोरम चुक्यो । त्यसपछि मधेसकेन्द्रित दलबीच शुरु भएको मोर्चाबन्दीले पनि सरकारसंग धेरै पटक बुँदगत रुपमै सहमति ग¥यो । खासगरि संविधानसभाको चुनावमा जानुअघि मधेसी दलहरूको मोर्चाले सरकारसंग पहिले आठ बुँदे, त्यसपछि सात , अनि चार बुँदे सहमति गर्न भ्यायो । तर, यी सहमतिहरु अहिले एउटा कागजको खोस्टोमा मात्रै सीमित हुन पुगेको भनाई मधेस क्षेत्रका बासिन्दाहरूको छ । मुद्दा उही छ, नेता पनि उही छन्, तर मधेस मुद्दाको सम्बोधन हुन सकिरहेको छैन । फेरी मधेसी दलहरु हरेक सरकारमा सत्ताधारी बनेको वर्षौ भईसक्यो । अहिले त इतिहासकै सर्वाधिक मधेसी दल र त्यसका नेताहरु ‘मालदार’ र महत्वपूर्ण मन्त्रालयमा आसिन छन् । गृह, स्वास्थ्य, उद्योग, जलस्रोत, भौतिक योजनालगायतका मन्त्रालयको नेतृत्व उनीहरुबाटै भइरहेको छ । तर, मधेस क्षेत्रमा न शान्ति छ न त गरीबका लागि विश्वासिलो स्वास्थ्य सेवा । बरु पहिले खोलिएका उद्योग र निर्माण भएका सडक र संरचनाहरु धमाधम जीर्ण बन्दै छन् । ‘मोर्चाकै नाममा मधेसी नेताहरु सरकारमा जान्छन तर आफैले गरेका सहमतिका बुँदाहरु कार्यान्वयनमा निरिहता देखाउँछन् ’ एक मधेसी बुद्धिजीवि भन्छन्, ‘यसले सत्ताधारी मधेसी दलका नेताहरुको नियत, नेतृत्व र नेतागिरीमा गम्भिर प्रश्न समेत खडा गरिदिएको छ ।’ पत्रकार सुरेशकुमार यादवले मधेसी नेताहरु सत्तारोहणमा चुर्लुम्म डुबेकाले उनीहरु जनताप्रतिको जवावदेहिता विर्सदै गएको बताउँछन् । ‘सहमतिहरु त उनीहरुका लागि हात्तिको देखाउने दाँत मात्र बनेको छ ’ उनले भने ।
पछिल्लो समय सरकार परिवर्तन र चुनावको कुरा चलिरहँदा सत्ताधारी मधेसी मोर्चाका मन्त्रीहरुले आफूहरुसंग गरिएका सम्झौताका बुँदाहरु कार्यान्वयनमा दबाब दिएका छन् । पुस १९ गते बसेको मन्त्रिपरिषद्को बैठकमा दलहरूले आफै बसेको सरकारलाई दबाब दिएका हुन् । मोर्चाको दबाबपछि मन्त्रिपरिषदले गृह, आवास, शान्ति, अर्थ र प्रधानमन्त्री कार्यालयका सचिवहरू सम्मिलित एउटा समिति बनाएर अध्ययन प्रतिवेदन तयार गर्न निर्देशन पनि दिइसकेको छ ।
‘सत्तारोहणपछि मधेसी मोर्चाको बैठक समेत नियमित हुन नसकिरहेको अवस्थामा मधेसको मुद्दा सम्बोधन गराउनतर्फ उनीहरु कसरी अग्रसर हुन सक्ला ’ सत्तारुढ तमलोपाका एक नेताले भने , ‘ पछिल्ला समय सबै मधेसी नेताहरु ‘प्रोपागाण्डीस्ट’ बनेका छन् । ’ ११ भदौ २०६८ मा बाबुराम भट्टराई नेतृत्वको सरकारमा समावेश हुनुअघि मोर्चाका नेताहरु एक÷दुई दिन बैठकमा सक्रिय भएपनि सत्तासिन बनेपछि एकाएक सुस्ताए । त्यसपछि बल्ल असोज १५ मा तमलोपाको कार्यालायमा मोर्चाको बैठक बसेको थियो । झण्डै तीन महिनापछि पुस ४ मा लोकतान्त्रिक फोरमको कार्यालयमा मोर्चाको अर्को बैठक सम्पन्न भयो । त्यो बैठकमा मोर्चाका नेताहरुले छलफलको प्रमुख विषय ‘सत्ता परिवर्तन’लाई नै रोजेका थिए ।
थरि–थरिका विचारले मधेसी नेताहरू सत्तारुढ र प्रतिपक्षको कित्तामा मात्रै देखिएका छैनन्,  उनीहरुबाट एकिकृत विचार समेत आउन सकिरहेको छैन । अगामी प्रधानमन्त्रीको उम्मेदबारका लागि सत्तारुढ प्रमुख दल एमाओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहालले मधेसी मोर्चाबाट ‘इमान्दार’ नेताको खोजि गरिरहँदा सद्भावना पार्टीका राजेन्द्र महतो र लोकतान्त्रिक फोरमका विजयकुमार गच्छदार ‘स्वतन्त्र व्यक्ति’ को खोजीमा जुटेका छन् । अझ उद्योगमन्त्री अनिलकुमार झा त मोर्चाका नेता महन्थ ठाकुरको नाममा लविङ गर्दै हिडेका छन् । कांग्रेस उम्मेदबारलाई समर्थन नगर्ने केही सत्तारुढ मधेसी मोर्चाका नेताहरु यही सरकारलाई निरन्तरा दिने होडबाजीमा समेत उत्रेका छन् । एउटाले नयाँ जनादेशको कुरा गरिरहँदा अर्कोले संविधानसभाको पुर्नस्थापनाको मुद्दालाई बहसको विषय बनाइरहेका छन् ।
एमालेका पूर्व सभासद एवं केन्द्रिय नेता अब्दुल कलाम आजादले ‘भोट कलेक्सन’ गरेर राजनीति गर्नका मात्रै बनाइएको मधेसी मोर्चाबाट मधेसले केही नपाउने दाबी गरे । उनले भने,  ‘मोर्चाका नेताहरुले पहिले सत्तामा जान सहमति गरे , अहिले कुर्सी जोगाउने खेलमा लागेका छन् , अनि आफैले गरेको सहमतिको कार्यान्वयन कसरी गर्न सक्लान ?’
सत्तारुढ प्रमुख घटक तराईमधेस लोकतान्त्रिक पार्टीका केन्द्रिय सदस्य एवं पूर्व मन्त्री गणेश नेपाली भने आजादको कुरामा सहमत छैनन । ‘मधेसी मोर्चाले देखाउने लायक केही नगरेपनि मधेस मुद्दालाई बहसको केन्द्रविन्दू चाही पक्कै बनाएको छ ’उनी भन्छन्, ‘मधेसीको हक, अधिकारको रक्षा मोर्चाको मिशन भएपनि त्यसप्रति नेताहरु उदासिन बनेको सत्य हो । ’ उनले सत्तामा जानुअघि र सत्तारोहण भएपछि मोर्चाले केही पनि गर्न नसक्नु चाहीँ नेताहरुमा सत्ताको चस्का नै हो । ‘सत्तालाई मात्रै केन्द्रविन्दू बनाईदा मोर्चाको उद्देश्य धराशायी बन्दै गएको छ ’ पूर्व सभासद् समेत रहेका नेपालीले थपे, ‘मधेस आन्दोलनबाटै संघियता प्राप्त भयो तर त्यसलाई संविधान बनाएर संस्थागत गर्न मधेसी मोर्चाका नेताहरु नसक्नु उनीहरुको कमजोरी हो । ’ उनले संघियताकै कारण संविधानसभाको विघटन भएकाले जे जति सहमति या सम्झौता भएपनि सत्तारुढ भएपछि कामै नलाग्ने भएको बताए । ‘
धनुषाका पूर्व सभासद् एवं एमालेका मधेसी नेता शत्रुधन महतोको मत भने अलिक फरक छ । उनले एउटै पार्टी र एउटै उद्देश्य बोकेका मधेसी दलका नेताहरु सत्ताकै लागि आ–आफ्नै नेतृत्वमा दल गठन गर्नु र पछि सत्तामा जान र त्यहाँ टिकिरहन मोर्चा बनाउनुले मधेसीका नाममा गरिएका सहमतिहरु ठोस रुपमा कार्यान्वयन हुन नसकेको बताए । ‘ त्यसैले त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चाले सरकारमा जानुअघि गरेको सहमतिको एउटा पनि बुँदालाई कार्यान्वयन गर्न सकेका छैन ’ महतो भन्छन्,‘ मधेसी मोर्चाका नेताहरुको उद्देश्य मुद्दाको सम्बोधन गर्नु नभई सरकार र कुर्सीमा मात्रै टिकिरहनु हो । ’
सत्तारुढ एमाओवादीका पूर्व सभासद् एवं मधेसी दलित नेता बाबुलाल पासवानको पनि मधेसी मोर्चाप्रतिको आक्रोश उस्तै छ । उनी भन्छन, ‘मधेसी मोर्चा भनेको तराईका ठीकेदारहरुको गठनबन्धन हो ।’ सत्तामा जानकै लागि मधेसी नेताहरु सहमति गर्ने गरेको उनको आरोप छ । ‘सरकार परिवर्तनका बेला बुँदागत सम्झौता गर्छन तर ती बुँदाहरुलाई कार्यान्वयनमा ल्याउन सक्दैनन’ उनी भन्छन्, ‘ मोर्चाका नेताहरु सत्ताभोगी र भत्तालोभी बनेका छन् । ’ दलित नेता पासवानले ‘तराईका उपेक्षित, शोषित, दमित समुदायको कल्याण गर्नका लागि मधेसी मोर्चा खोलेकै होइन, धर्नाजन गर्नका लागि उनीहरु एकजूट भएको’ दाबी गरे । उनी भन्छन्, ‘सेनामा १० हजार मधेसीको भर्ना गर्ने माग मधेसी नेताले गरेपनि सत्तासिन बनेपछि त्यसलाई चटक्कै विर्सेका छन् । ’
(कान्तिपुरको कतार संस्करण  माघ 26 push ,2069)

कमजोर बन्दै सत्तारुढ मधेसी मोर्चा


सेनामा मधेसीको सामुहिक प्रवेश, नागरिकता मुद्दा , समावेशिकरण विधेयकलगायतका विषयहरु महिनौसम्म सत्तामा बस्दा पनि कार्यान्वयन गराउन नसकेको मोर्चाले अब सडक तताउने बेतुक कुरा गर्न थालेको छ ।

दिनेश यादव –

सरकारमा जानुअघि एमाओवादीसंग गरिएको ४ बूदे सहमति संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चाका लागि महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि थियो । उक्त सहमतिलाई धेरैले मधेसी मोर्चाका घटक दलका नेताहरुका लागि  राजनीति गर्ने शक्तिशाली अस्त्र बन्ने टिप्पणी समेत गर्न भ्याएका थिए । अझ मोर्चाका केही नेताहरुले त आफ्ना कार्यकर्ता मात्रै होइन मधेसका आमजनतामाझ ती सहमतिका बुँदाहरुलाई बाइबल, गीता र कुरान नै भएको भन्दै प्रचार गरेका थिए । तर, ती टिप्पणी र प्रचारहरु सीसाका महल रहेछ भन्ने कुरो अब लगभग पुष्टि नै भइसक्यो । मधेसीहरु भन्छन्, ‘त्यसैले मधेसी मोर्चा यो सरकारमा बस्नुको औचित्य छैन, तुक छैन ।’      
       सहमतिका बूँदाहरु कार्यान्वयन गराउन नसकेपछि मोर्चाका नेताहरु कहिले नौ बुँदे प्रस्ताव त कहिले सात बुँदे निर्णयहरु सार्वजनिक गर्ने शृंखलाको शुरुआत गरेका छन् । यसलाई मधेसीजनले नौटंकीको संज्ञा दिएका छन् । २०६९ पुस ७ र माघ १२ मा सार्वजनिक भएका प्रस्ताव वा निर्णयहरु त्यही शृंखलाको कडी मात्र हुन् । माघ १२ गते मोर्चाका नाममा जारी गरिएको निर्णयहरुमा नेताहरुको निरिहता र लाचारीपन बढी झल्किन्छ । आफै सरकारमा तर अमुक विषय संवोधन गराउन सरकारसंग ‘जोडदार माग’ मोर्चाका नेताहरुले गर्नुबाट उनीहरु असफल भइसकेको प्रमाणित हुन्छ । सरकारमा बसिरहने हैसियत समेत उनीहरुको सकिएको पुष्टि हुन्छ ।
सेनामा मधेसीको सामुहिक प्रवेश, नागरिकता मुद्दा , समावेशिकरण विधेयकलगायतका विषयहरु महिनौसम्म सत्तामा बस्दा पनि कार्यान्वयन गराउन नसकेको मोर्चाले अब सडक तताउने बेतुक कुरा गर्न थालेको छ । उसको यो भनाई एमाओवादीकै शैली र आचरणसंग मिल्दोजुल्दो छ । जहाँसम्म नागरिकता समस्याको समाधानको कुरो छ, त्यसका लागि अन्तरिम संविधानमा संशोधन गर्नुपर्ने हुन्छ । तर सत्ता साझेदारी प्रमुख दल एमाओवादीले यो मुद्दालाई ठाडै अस्वीकार गरेको स्रोतले बतायो । त्यस्तै, समावेशिकरण विधेयकको पनि थन्को लगाइएको छ । सेनामा मधेसीको सामुहिक प्रवेशको विषय अझै अनिर्णित छ । एमाओवादी र मधेसी मोर्चाका मन्त्री तथा नेताहरुबीच यी मुद्दाहरुमा तालमेल मिलिरहेको छैन । एउटा पनि निर्णयहरु मधेसका पक्षमा गराउन नसक्ने नेताहरु अझैपनि एमाओवादीको नेतृत्वमा रहेको सरकारमा कसरी बस्न सकेका होलान् ? मधेसीजन भोक र रोगले आकुल–व्याकुल छन् । यो वर्षपनि सितलहरले धेरैको ज्यान लियो, सुख्खा र खडेरीको पीडा त छदैछ, हिउँदेबाली सप्रिने छाँट टाढा–टाढा देखिदैन । मधेसी नेताहरु सरकारमा छन् , गरिब, निर्धन र असहाय मधेसीहरु अभावै–अभावमा बाच्न विबस छन् ।
 सत्तामा टिकिरहन एमाओवादीले जुन नीति लिएको छ,, त्यसैलाई मोर्चाले पनि पछ्याइरहेको अवस्था छ ।  एमाओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहालले सरकार र सडकबाटै क्रान्ति सफल हुने दाबी गरिरहँदा मधेसी मोर्चाको त्यस्तै निर्णय पछिल्लो समय सार्वजनिक भयो । मोर्चाले काठमाडौंको गोकर्ण रिसोर्समा गरेको दुई दिने बैठकपछि सार्वजनिक सात बुँदे निर्णयको पहिलो बुँदामै त्यस्तै अर्थ लाग्ने आशयसहित सडक संघर्षमा जानका लागि जनपरिचालन गर्ने उल्लेख छ । यसका लागि मोर्चामा आबद्ध पाँच दलहरु लोकतान्त्रिक फोरम, तराईमधेस लोकतान्त्रिक पार्टी, गणतान्त्रिक फोरम, तराईमधेस लोकतान्त्रिक पार्टी नेपाल र सद्भावना पार्टीका एक–एक नेता सम्मिलित समिति समेत बनाएको छ ।
मोर्चाले वर्तमान राजनीतिक द्वन्द्व र गतिरोधको एकमात्र निकास संविधानसभाको निर्वाचनलाई बताएपनि चुनावमा जाने उसको तत्कालै मनस्थिति नरहेको देखिन्छ । उसले भनेको जस्तो गत संविधानसभामा सहमति भएका विषयहरुलाई सहमति भएको रुपमा र विवादित विषयहरुलाई सोही रुपमा ग्रहण गरी निर्वाचनका लागि आवश्यक विषयहरु प्याकेजमा सहमति गरी चुनावमा जाने कुरा कार्यान्वयन नहुने छाँट देखिनुले पनि त्यसको पुष्टि गर्छ । यो निर्णय एमाओवादीकै लाईनमा भएकोले कांग्रेस , एमालेलगायतका दलहरुले स्वीकार गर्ने स्थिति छैन ।
मोर्चाले ४ बुँदे सहमति अनुसार अपेक्षित उपलब्धी हासिल हुन नसेकेको आफैले स्वीकार गरेपनि सरकार छाड्ने उसको कुनै मनस्थिति देखिदैन । मोर्चा आफै सरकारमा छ तर उसले आफ्नो बुँदागत निर्णयबाटै सेनामा मधेशी समुदायको समूहगत प्रवेश, राज्यका सबै निकायहरूमा समावेशी समानुपातिक प्रतिनिधित्वको व्यवस्था गर्न, जन्मसिद्ध तथा अंगीकृत नागरिकहरूका सन्तानहरूको नागरिकता सम्बन्धी समस्याको ४ बुँदे सहमतिअनुसार समाधान र कार्यान्वयनका लागि सरकारसँग जोडदार माग गरिएको सार्वजनिक गर्नुले  पनि उनीहरु हैसियत सरकारमा कमजोर बनेको छर्लङ हुन्छ ।  
यसैगरि मोर्चाले संघीय लोकतान्त्रिक गणतान्त्रिक गठबन्धनको निर्माणलाई ‘पहिचानसहितको संघीयता र संघीयतासहितको संविधान’ प्राप्तिको क्रममा एउटा ठोस उपलब्धी बताएर जनतामा भ्रम सिर्जना गरेको छ । मधेस जनविद्रोहकै उपलब्धि हो, मधेस र मधेसीले पहिचान र संघियता । त्यसलाई संस्थागन गर्न नसकेर संविधानसभाको अवसान गराउने साक्षी मोर्चा पनि बन्न पुग्यो, यो एउटा तीतो यथार्थनै हो । अब त संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चाको पहिचानलाई कायम राख्न माओवादी नेतृत्वमा माघ १७ मा हुने जागरणसभाका लागि ‘युज ब्याट्री’ बन्ने सोच नेताहरुले बनाउनुबाट आफ्नो खुट्टामा आफै बन्चरो हाल्नु जस्तै कुरो भएन र ? अर्को एक निर्णयमा सरकारमा रहेका मोर्चा सम्बद्ध मन्त्रीहरू बीच सरकार संचालनमा अझै बढी प्रभावकारी समन्वय हुनुपर्ने आवश्यकतामाथि बैठकले जोड दिएको उल्लेख हुनुले मोर्चाका घटक दलका नेताहरुबीच खटपट जारी रहेको संकेत गर्छ । त्यसको एउटा उदाहरण गोकर्णमा बैठक जारी रहेकै वेला सद्भावना पार्टी अध्यक्ष राजेन्द्र महतोबाट मधेस मद्दाहरुलाई संवोधन गर्न सरकारलाई समयावधिसहितको अल्टिमेटम दिने र माग पुरा नभए सरकार छाड्ने चेतावनी सार्वजनिक हुनुलाई लिन सकिन्छ । किनभने दलहरुको संयुक्त निर्णय सार्वजनिक हुँदा त्यो शब्दाबली कतै उल्लेख नगरिनुले महतो रुष्ट भएको स्रोतले बतायो । स्रोतले भन्यो, ‘ लोकतान्त्रिक फोरम अध्यक्ष विजयकुमार गच्छदारको निर्देशनमा त्यस प्रकारको निर्णय सार्वजनिक हुनबाट रोकियो । ’ शक्तिकेन्द्रबाट पाएको निर्देशन बमोजिम मोर्चाले आफ्नो निर्णय सच्चाउन बाध्य भएको ठम्याइ धेरैको छ ।
अझ सबैभन्दा उदेक लाग्दो र अचम्मको निर्णय बूँदा ७ मा मोर्चाको संयुक्त बैठकले गरेको छ । निर्णयमा छ ‘ तराई–मधेशका सुक्खाग्रस्त जिल्लाहरूलाई सुक्खाक्षेत्र घोषित गरी राहत प्रदान गर्नु, कृषिक्षेत्रका लागि मल, खाद्य, बीउ तथा सीमावर्ती क्षेत्रमा सटहीका लागि भारतीय मुद्रा उपलब्ध गराउनु अतिआवश्यक भएकोले यी सबैका लागि बजेटसहित आवश्यक अन्य सबै व्यवस्था गर्न यो बैठक जोडदार माग गर्दछ ।’ आफै सरकारमा रहेको मोर्चाका नेताहरुले यस्ता निर्णयहरु गोकर्णमा बसेर होइन क्याबिनेटबाट गर्नु पर्ने हो तर त्यसो गर्न उनीहरुले सकिरहेका छैन्न, यो कमजोरीको ढाकछोप नेताहरुले कहिलेसम्म गर्ने ? जनता अब मुर्ख छैन, रहेन, यो कुरा नेताहरुले किन नबुझेका होलान् ? हात्तीको देखाउने दाँत जस्तै जनतालाई आफूहरुले केही गर्न खोजिरहेको देखाउन अलमल र धुलमुले नीति मोर्चाका नेताका लागि घातक हुन सक्छ ।

(कान्तिपुरको कतार संस्करण माघ २५, २०६९)


‘आन्दोलनका उपलब्धि गुम्दै’



दिनेश यादव –
अन्तरिम संविधान जारी भएलगतै २०६३ माघ २ बाट शुरु भएको ‘मधेस विद्रोह’ २४ दिनसँम्म चल्यो । पचास भन्दा बढीले ज्यान ज्यान गुमाए भने दर्जनौ घाइते भए । तत्कालिन प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइरालाले दुई पटकसम्म राष्ट्रलाई सम्बोधन गर्नु प¥यो । अनि बल्ल मधेस विद्रोह साम्य भएको थियो । आफ्नो पहिचान, राजनीति, नीति निर्माण तह र सुरक्षा निकायमा मधेसीको पहूँच हुनु पर्नेलगायतका मुल मुद्दाका साथ मधेसी सडकमा उर्लेका थिए । केन्द्रिय राजनीतिमा मधेसीले सम्मानजक साझेदारी र क्षेत्रीय स्वायत्ततासहितको स्वशासनको चाहना समेत उनीहरुको थियो । तर मधेस विद्रोहले छैठो बार्षिकी बनाइरहँदा समेत यी मुद्दा र मधेसीजनका ती चाहनाहरुको सहग्र सम्बोधन हुन सकेको छैन । यो अवधिमा संविधानसभाको चुनावसंगै ६०१ सदस्यीय संविधानसभाको गठन र यसैबाटै संविधान बनाउने प्रयास पनि भए । पटक–पटक संविधानसभाको म्याद थपिएपनि जनताले संविधान पाएनन्, संविधानसभाको अवसान हुन पुग्यो । सरकार परिवर्तनको खेलसंगै प्रधानमन्त्री पदका लागि विभिन्न व्यक्तिहरुको दौड यसअवधिमा खुबै चर्चामा रहयो । हुनत, त्यो दौड अझै जारी छ । प्रधामन्त्री पदमा व्यक्ति छनौटका लागि नेताहरु कस्मेटिक परिवर्तन झै अरोरात लागेका छन् । फलस्वरुप समस्या बल्झिदै र अल्झिदै गएको छ । प्रमुख राजनीतिक दलका नेताहरु सहमतिका नाममा पटक–पटक बैठक गरेपनि निकास भने सत्ताको ‘ब्ल्याक होल’ नजिक पुगेपछि अनिर्णित बन्ने गरेको छ । अतः यो अझै महिनौ जारी रहेन छाँट देखिन्छ ।
मुलुकमा विद्यमान राजनीतिक गरिरोध र असंवैधानिक रिक्तताका कारण , खासगरि मधेस, कर्णाली क्षेत्र र वर्षौदेखि एकिकृत शासन र राज्यसत्ताको दोहन, शोषण, उपेक्षा र उत्पीडनको सिकार भएका या पछि पारिएका समुदायको अवस्थामा थप जीर्ण, जटिल र समस्याग्रस्त बन्दै गएको छ । उनीहरुको अवस्थामा खासै परिवर्तन र सुधार हुन सकेको छैन । जनतामा गरीबी, निर्धनता र पर–निर्भरता बढेको बढ्यै छ ।
जहाँसम्म ‘मधेस विद्रोह’ को कुरा छ , मधेसी नेताहरुले धेरै त्यसबाट पाएपनि जनता जनार्दन कुण्ठा र निशासाको सिकार हुन बाध्य छन् । ‘मधेसी विद्रोह’ पछि बनेको हरेक सरकारमा मधेस क्षेत्रका नेताको राम्रो पकड र पहुँच रहँदै आएको छ । अझ राष्ट्रपति र उपराष्ट्रपतिदेखि उपप्रधानमन्त्री, गृह, परराष्ट्र, रक्षा, उद्योग, शिक्षा, वाणिज्य आपुर्ति, निर्माण यातायता, सिंचाईलगायतका मन्त्री पदमा  मधेसी नेताहरुनै पदासिन छन् । तर पनि मधेस क्षेत्रका मुद्दाहरुको सम्बोधन हुन सकिरहेको छैन । मधेस आन्दोलनकै बलमा मधेसीले आफ्नो पहिचान पाएका छन् भने संघियता पनि त्यसैको देन हो । २०६२÷०६३ को आन्दोलनको सफलतासंगै जारी भएको अन्तरिम संविधान २०६३ मा मधेसीलाई सम्बाधेन गर्न छुटेका थियो । तर मधेस आन्दोलनकै कारण अन्तरिम संविधानको प्रथम संशोधनमा मधेस र मधेसी शब्द पहिलो पटक त्यसमा लेखियो । मुलुकमा संघियतालाई संविधानमा लेखाउने जस्तो महत्वपूर्ण कार्यपनि ‘मधेस विद्रोह’ कै एउटा महत्वपूर्ण उपलब्धि रहयो । त्यसपछि शुरु भयो राजनीतिक प्रतिनिधित्व र सामाजिक स्वीकार्यताको चरण । यसमा पनि मधेसी समुदायले राम्रै सफलता पाएको सर्वत्र मशशुश गरियो, गरिँदैछ । २०४६ यता संसदीय निर्वाचनमा २१ प्रतिशत मात्रै उपस्थिति रहेकोमा संविधानसभामा ६०१ मध्ये झण्डै २०० मधेसी अनुहारको बलियो उपस्थिति रहेपनि आन्दोलनबाट प्राप्त अधिकारहरु संस्थापन हुन नसक्नुलाई धेरैले दुर्भाग्य भन्न थालेका छन् । करोडौ खर्चिएर खडा गरिएको संविधानसभालाई केही मधेसी दलले सत्तामा जानका लागि बनाएको मोर्चाका नाममा धराशायी बनाए । त्यसैले त , सिंहदरबारमा मधेसीको उपस्थिति बाक्लिएपनि मधेस क्षेत्र अझै पनि उपेक्षित नै रहेको अनुभव त्यस भेगका जनताहरुले गरिरहेका छन् । यसो हुनुको कारण सत्ताका लोभीपापी केही मधेसी नेता भएको मधेसी जनअधिकार फोरम नेपालका अध्यक्ष उपेन्द्र यादव बताउँछन् । ‘मधेश विद्रोह’को नेतृत्व गर्ने संगठनका प्रमुख समेत रहेका उनी भन्छन्, ‘ मधेसमा जनविद्रोह भईरहँदा कांग्रेस र एमालेका नेताहरुलाई ताबेदारी गर्नेहरु मोर्चाका नाममा पछिल्लो सरकारमा समावेश भई संविधानसभालाई तुहाई दिए । ’ अध्यक्ष यादवका अनुसार माओवादीको सत्ता कब्जा रणनीति र सत्ताकै भोका रहेका केही मधेसी नेताहरुको मोर्चाबन्दीले ‘मधेस विद्रोह’का उपलब्धीहरुलाई मटियामेट हुनेगरि संविधानसभा विघटन गरियो । ‘ मधेस आन्दोलनताका मधेसीको हत्या गर्न अ¥ह्याउनेहरु मधेसीकै नाममा सत्तामा बसेर ब्रह्मलुट र भ्रष्टाचारमा चुर्लुम्म डुबेका छन्’ उनी भन्छन्, ‘मधेसीहरु हरेक सरकारमा समावेश भएपनि मधेसको मुलुकभूत मुद्दाहरु स्वयततासहितको संघियता र आत्मनिर्णयसहितको मधेस प्रदेश आझेलमा प¥यो । ’ अध्यक्ष यादवका यी तर्कहरुलाई रेडियोकर्मी एवं संपादक ह्रदयकान्त झा ठाह्रै अस्विकार गर्छन् । उनी भन्छन्, ‘ धेरै मधेसी दल र त्यसका नेताहरु सत्तामा छन् तर रातारात मधेसको मुद्दाको सम्बोधन असम्भव छ । किनभने २४० वर्षको विभेदकारी नीतिलाई समाप्त पार्न समय लाग्छ नै । ’ उनले सत्ताधारी मधेसी दलका नेताहरु बत्तीस दाँतका बीचमा रहेकाले उनीहरुलाई काम गर्न कठिनाई भइरहेको बताए । ‘ मधेसी मन्त्री भएपनि मन्त्रलायको चारैतिर गैर–मधेसीहरुकै बोलबाला छ , फाइल बढाइन्छ, सचिवले यो कानुन सम्मतः छैन भनेर जबाफ दिन्छन ’ सत्ताधारी तमलोपा अध्यक्ष महन्थ ठाकुरका विश्वासपात्रमध्येका एक रहेका झा भन्छन्, ‘एक दिनमा सय वटा फाइल आउँछ, सबैमा सचिवले अबरोध खडा गरि दिन्छन्, फेरी यहाँका काननमा पनि धेरै दफा उपदफाहरु छन्, ती सबैलाई एक्लो मन्त्रीले पल्टाएर वा अध्ययन गरेर जान सक्तैन, त्यसैले मधेस र मधेसीको काममा कठिनाई भइरहेको हो । ’ उनका अनुसार मधेस आन्दोलनले मधेसीको पहिचान कायम गरेकै कारण आज सिंहदरबारमा मधेसीहरु छाती फुलाएर हिड्न पाएका छन् । ‘यो पनि त एउटा उपलब्धीनै त हो नि ’ उनी थप्छन्, ‘अन्य उपलब्धीहरु हासिल गर्न केही समय लाग्छ । ’
मधेस विद्रोहयता मधेसमा भ्रष्टाचार मौलाएको छ भने मधेसी नेताहरुमा अवसरवादी मनोवृति ह्वातै बढेको छ । केही राजनीतिक दलका अगुवाहरू आफै भ्रष्टाचारमा लिप्त छन भने केही भइरहेको भ्रष्टाचारप्रति मौन छन । त्यस्तै ‘मधेस विद्रोह’लगतै मधेसी–मधेसीबीच कोरिएको जातियताको खाडल पुरिनुको साटो गहिरिदै गएको छ । एउटा जातिले अर्कोलाई, एउटा नेताले अर्को नेतालाई काच्चै चपाएर खानेस्थिति देखिन थालेको छ । आन्दोलनको नेतृत्व गर्ने मधेसी शक्ति अझै सडकमै छ भने मधेस आन्दोलनलाई नौटंकीको संज्ञा दिनेहरु आज सत्ताधीस छन् । फलस्वरुप स्थिति जटिल बनेको छ । पछिल्लो समय मुलुकमा निकासको अबरोध समेत बनेका छन् , उनीहरु । सत्ताधारी बनेयता मधेस र मधेसीलाई केही दिन त सकेनन् तर आन्दोलनबाटै प्राप्त उपलब्धिहरु समेत गुम्नेस्थितिको सिर्जना गर्ने प्रमुख दोषी पनि उनीहरु नै हुन । नेपालको राष्ट्रियतामाथि प्रहार भईरहँदा पनि मुकदर्शक बन्ने सत्ताठीस मोर्चाका नेताहरुबाट यहाँका जनताले कुनै अपेक्षा गर्नु भूल मात्रै हुनेछ । (कान्तिपुरको कतार संस्करमा २०६९ पुसको अन्तिम साता प्रकाशित) 

Tuesday, 5 February 2013

सहमतिको विकल्प छैन, सहमति पनि हुँदैन



दिनेश यादव -
संविधानसभा चुनाव भएको चार वर्ष सात महिना भइसक्यो, मुलुकले अझै न संविधान न त निकासै पाएको छ । पछिल्लो समय राष्ट्रपति रामबरण यादवले दलहरुलाई सहमतिमा पुग्न शृंखलाबद्ध समसीमा तोक्न शुरु गरेका छन् । पुस १४ मा सातौ पटक उनले त्यसका लागि पाँच दिनको म्याद थपेका छन । म्याद थप्ने यो शृंखला अनन्तसम्म चल्न सक्ने दाबी राजनीतिक विश्लेषकहरुको छ । उता, दलहरुमा सहमतिको बातावरण बन्नुको साटो दुरी बढ्दो छ । राजनीतिक पार्टीहरूको एक पछि अर्को अडान र प्रस्तावहरुले राष्ट्रपतिले तोक्दै आएको समयसीमा झारो टार्नका लागि मात्रै भएको भान सर्वत्र हुन थालेको छ ।
सहमति नहुनको कारणबारे एमालेका नेता तथा पूर्व सभासद् रामप्रित पासवानले भन्छन्, ‘मेरो बिचारले राष्ट्रपतिले जतिसुकै पटक म्याद थपेपनि सहमति चाहीँ हुँदैन । प्रमुख दलका नेताहरु बहानाबाजीमा उत्रेकाले पनि सहमति हुन नसकेको हो ।’ उनले सहमतिका लागि मधेसी मोर्चाको भूमिका पनि ठीक नभएको बताउँछन् । ‘मधेस एउटा पीडित क्षेत्र भएकाले मधेसको नेतृत्व गर्नेहरू सहमतिमा पुगेर मधेसी दलित, आदिवासी, जनजाति, मुस्लिम, पिछडावर्ग, अल्पसंख्यकलगायतको अधिकार सुरक्षित गर्न अग्रसर हुनु पर्नेमा त्यसो गर्न सकिरहेका छैनन्’ मधेसका दलित नेता समेत रहेका पासवान भन्छन्, ‘मात्र सत्तामा टिक्ने राजनीतिमा मोर्चा र एमाओवादी उद्दत देखिएका छन । ’ उनी सहमतिका लागि पहिले सरकारको नेतृत्वमा बसेकाहरु हदैसम्म लचिलो बन्नु पर्ने बताउँदै थप्छन, ‘तर अन्य दलहरु पनि सहमतिका लागि आ–आफ्नो अडानलाई केही खुकुलो पार्दै ‘कम्प्रमाइज’मा जानुको विकल्प छैन । सत्तालिप्ताको राजनीतिले जनताको हित गर्दैन, सहमति पनि बन्दैन । ’
दलहरुबीच सहमति नहुनुमा मधेसी जनअधिकार फोरम नेपालका केन्द्रिय सदस्य तथा पूर्व श्रममन्त्री मोहम्मद इस्तियाक राईको धारणा पनि त्यस्तै छ । सहमतिको अड्को थाप्नेमा ठूला दलका नेता तथा मधेसी मोर्चा प्रमुख रहेको बताउँछन् । ‘ सबैले सहमतिको कुरा त गर्छन् तर त्यसको मुल सूत्रमा पुग्न सकिरहेका छैनन, यसका लागि सबै दोषी छन ’ उनी भन्छन्, ‘अहिले सहमतिको प्रमुख बाधक माओवादीनै हो तर कांग्रेस र एमालेको प्रधानमन्त्री परिवर्तन गर्ने सोच पनि त ठीक होइन नि ।’ संविधान पनि नबन्ने, चुनावपनि नहुने स्थितिले गर्दा एमाओवादी सत्ता लम्बाउने खेलमा लागेकोले समस्या बल्झिएको उनी बताउँछन् । ‘प्रधानमन्त्री मात्र फेरिएर चुनाव असम्भव छ । परिवर्तनका लागि लिखित सहमति अहिले अपरिहार्य विषय बनेको छ ’ पूर्व सभासद् समेत रहेका राई थप्छन्, ‘ अहिलेसम्म लिखित सहमतिकै आधारमा मुलुकले निकास पाएको उदाहरण हामी सामु प्रशस्तै छन् । दलहरुले पटक–पटक बोली  फेर्नुले पनि सहमति हुन नसकेको हो । ’ उनले सत्ताधारी मधेसी मोर्चा पनि एमाओवादीसंगै सत्तामा टिकिरहने खेलमा लागेकाले देश र मधेसमा थुप्रै समस्या देखिएको बताए । ‘कांग्रेसलाई एमालेको समर्थन छ,  कांग्रेसले लचकता अप्नाउँदै सहमतिको मार्ग प्रशस्त गर्नुपर्छ ’ फोरम नेता राई भन्छन्, ‘कांग्रेस संघियता, शासकिय स्वरुपलगायतको मुद्दामा संकिर्ण सोच त्यागेर यसबारे स्पष्ट धारणा बनाउन नसक्नुले अविश्वासको बातावरण सिर्जित भएको छ , र सहमित पनि बन्न नसकेको हो । ’ उनले पछिल्लो समय एमाओवादीले अघि सारेको प्याकेजमै सहमतिको प्रस्ताव कांग्रेसले स्वीकारे लगतै सहमति बन्ने बताए । ‘अर्को कुरा एमाओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहालको नियत पनि ठीक छैन , प्रधानमन्त्री बाबुराम भट्टराईलाई समाप्त पार्ने नीति अख्तियार गरेकाले पनि सहमति नभएको हो ’ राई थप्छन, ‘भट्टाईलाई असफल बनाएर आफू सफल हुने दाउँमा दाहाल छन्, पार्टी अध्यक्षको यो चाला बुझेरै प्रधानमन्त्रीले आफ्नो राजीनामा नदिने अडान राखेको देखिन्छ, अनि सहमति कसरी हुन्छ ? ’
नेपाली कांग्रेसका पूर्व केन्द्रिय सदस्य एवं पूर्व मधेसी सभासद शिवचन्द्र मिश्रको भनाई अलिक फरक छ । उनी भन्छन्, ‘कसैले पनि सम्झौता गर्नै चाहेका छैनन् । सहमतिनै गर्नु थियो भने संविधानसभाको विघटन किन गरे ? राज्यको नामाकरण र संख्यामा मात्रै विवाद रहेको अवस्थामा संविधानसभा विघटन गरियो ।’ मिश्रले एमाओवादी सत्ता कब्जातर्फ उन्मुख रहनु सहमतिको अर्को बाधक हो । ‘सहमतिको नुहुनको पहिलो बाधक एमाओवादी र त्यसपछि मधेसी मोर्चा हो ’ उनले थपे, ‘ प्रधानमन्त्री महत्वाकांक्षी बन्नु पनि सहमति नहुनु हो, फेरी कसैले पनि चुनाव चाहेको अवस्था छैन ।’ तत्कालिन माओवादीले १० वर्षे जनयुद्ध गरेर सफल नभएपछि सत्ता कब्जाको सरल मार्गमा मधेसी मोर्चालाई उपयोग गर्दै अग्रसर भएकोले पनि सहमति हुन नसकेको उनी बताउँछन् । उनी भन्छन्, ‘सहमति हुँदैन भने प्रतिपक्षले आन्दोलनकै बलमा यो सरकारलाई ढाल्नु पर्छ ।’
राष्ट्रिय मधेस समाजवादी पार्टीका अध्यक्ष एवं पूर्व मन्त्री शरदसिंह भण्डारीले पनि सहमतिको प्रमुख कारण प्रमुख तीन दलहरुले शुरु गरेको निशेधको राजनीति भएको बताउँछन् । ‘चुनावमा जाने चाहनापनि कसैको नहुनले सहमति बन्न नसकेको हो ’ उनी भन्छन्, ‘प्रमुख तीन दलहरुबीच सहमति हुदैन भने अन्य दलहरुको नेतृत्वमा भएपनि राष्ट्रिय सरकार गठन गरेर देशलाई निकास दिनुपर्छ । अहिलेको संवैधानिक शुन्यताको अवस्थामा सहमतिबाटै अघि बढ्दै अर्को चुनावमा जानैपर्छ ।’
सत्ताधारी गठनबन्धनको सहयोगी सद्भावना पार्टीका महासचिव मनिस सुमनले पार्टीको लाइनमा भन्ने हो भने सहमतिप्रति आफूहरु आशाबादी रहेको बताउँछन् । ‘मधेसी मोर्चाले अघि सारेको १५ बुँदे प्रस्ताव मध्ये अधिकांशमा धेरै दलहरु सहमति नजिक पुगेका छन् , प्रधानमन्त्रीलाई पदमुक्त गर्नुदेखि वैशाखमा चुनाव गराउनु पर्ने मोर्चाको प्रस्तावमा सबैको सहमिति छ ’ उनी भन्छन्, ‘तर सरकार परिवर्तन हुनुअघि पहिले लिखित सहमति जरुरी छ । पहिले सहमति त्यसपछि सरकारको नेतृत्व कसले पाउने भन्ने कुरा आउनु पर्नेमा नेताहरु पहिले सरकार त्यसपछि सहमतिको कुरा गर्दा समस्या भएको हो । ’ महासचिव सुमनले चुनावमा जानुअघि प्रमुख पार्टीहरुले आ–आफ्नो नेतृत्वमा चुनाव गराउन चाहेकाले पनि सहमतिमा बाधाअडचन आएको बताए । ‘सबै पार्टीका नेताहरु सरकारमा भए बुथ क्याप्चर गरेर चुनाव जित्न सकिने मनस्थितिबाट ग्रसित भएकाले पनि सहमतिको बिन्दूसम्म पुग्न नसकिएको हो ’ उनले थपे ।
दलहरुबीच सहमति नहुनुको कारणबारे सह–प्राध्यापक एवं मधेस मामिलाका जानकार मञ्चला झाको भनाई भने यस्तो छ । उनी भन्छिन्, ‘सहमति नहुनुको प्रमुख कारण दलका नेताहरुमा इगो देखिनु र स्वीकारोक्ति नहुनुनै हो ।’ माओवादीप्रति नेपाली कांग्रेस र एमालेको अडानमा अझै परिवर्तन हुन नसक्नु पनि सहमतिको बाधक बनेको उनी बताउँछिन् । ‘यी दलहरुबीच विश्वास , स्वीकारोक्ति र इमानको कमि छ , एउटा पार्टीको नेतृत्व अर्कोले स्वीकार गर्नै चाहेको छैन भने मधेसवादी दलहरु दुविधाग्रस्त मनस्थितिमा छन् ’ झा भन्छिन्, ‘ मधेसी मोर्चा सत्ता छाडेपनि नहुने नछापेपनि नहुने दोधारमा पुगेको छ । सत्ता शक्ति संचय गर्ने उपकरण भएकाले एमाओवादीसंगै बस्नु उसको विवसता पनि हो , यो पनि सहमतिको बाधक हो ।’  उनले मधेसले अहिलेसम्मकै  इतिहासमा सबैभन्दा बढी पावरमा रहेकाले भोली यस्तै पाउनसक्ने स्थिति नरहेको सोचका कारण उसले दृढ चाहनाका साथ सहमतिका लागि पहल नगरेको बताउँछिन । ‘ त्यसैले मोर्चा पनि सहमति होस् भन्ने भित्री मनसायका साथ प्रस्तुत हुन सकेको छैन ’ झा भन्छिन्, ‘ अर्को कुरा संविधानसभाको निर्वाचन एमाओवादी , कांग्रेस, एमाले र मधेसी मोर्चाले कसैले पनि चाहेका छैनन्  किनभने कांग्रेस आन्तरिक रुपमा कमजोर छ, मधेसमा उसको आधार भत्केको अवस्था छ । एमालेमा पनि त्यस्तै छ, वर्षौदेखि पार्टीमा आबद्ध जनजाति नेताहरु टुक्रिएर गएका छन् । यता एमाओवादी पनि मोहन बैद्यको विद्रोहबाट जनतामा जान डराईरहेको छ । मधेसी दलहरुहरु धुँजा–धुँजामा बाँडिएकाले पनि उनीहरु तत्काल चुनावमा जान चाहेका छैनन् , त्यसैले सहमति बन्न नसकेको हो ।’ उनले पछिल्लो समय सत्तारुढ गठबन्धन संविधानसभा व्युउताने कोशिशमा रहनुले पनि सहमतिको बिन्दूमा पुग्न नसकिएको बताइन । ‘जनतालाई सत्ता, संविधान होइन शान्ति र सुरक्षा चाहिएको छ , उनीहरु आ–आफ्नो रोजीरोटी गरेर जीवनयापनमा व्यस्त छन् ’ झा थप्छिन्, ‘जनताको दबाकको अभावले पनि सहमति नभएको हो । नेपाली कांग्रेसका शुशिल कोइरालालाई प्रधानमन्त्री दिए राष्ट्रपति पनि कांग्रेसकै भएकाले चुनावमा आफूहरुको पत्तासाफ हुने डरले एमाओवादी सहमतिमा पुग्न अनेकौ बखेडा झिकिरहेको हो ।’  (कान्तिपुरको कतार संस्करणमा प्रकाशित)

सहमतिका बुँदाहरु मधेसी दलको सत्तामा पुग्ने भ¥याङ


दिनेश यादव
सरकार निर्माणका बेला होस् या चुनावमा जानुुअघि , सत्ताधारी पार्टी, सरकार र मधेसकेन्द्रित दलहरूबीच पटक–पटक सहमति र सम्झौताहरु भएका छन् । ०४६ को जनआन्दोलनको सफलतापछि गजेन्द्रनारायण सिंहको नेतृत्वमा बनेको नेपाल सद्भावना पार्टीले तत्कालिन सरकारसंग दुई पटक क्रमशः ९ र ११ बुँदे सहमति गरेको थियो । तर, त्यस्ताका सद्भावना पार्टी सरकारमा गएपनि सहमतिको एउटा बुँदा पनि राम्ररी कार्यान्वयन हुन सकेन ।  ०६२÷०६३ को जनआन्दोलन सफल भएलगतै उपेन्द्र यादव नेतृत्वको तत्कालिन ‘अधिकारवादी’ संगठन मधेसी जनअधिकार फोरम नेपालले मधेस आन्दोलनपछि सरकारसंग २२ बुँदे सहमति ग¥यो । फोरम नेपाल राजनीतिक दलको हैसियतमा आएपछि सरकारमा सहभागि भयो , तर सहमतिका बुँदाहरूलाई कार्यान्वयन गर्न फोरम चुक्यो । यति मात्रै कहाँ हो र ? त्यसपछि मधेसकेन्द्रित दलहरूबीच शुरु भएको मोर्चाबन्दीले पनि सरकारसंग धेरै पटक बुँदगत रुपमै सहमति ग¥यो । खासगरि संविधानसभाको चुनावमा जानुअघि मधेसी दलहरूको मोर्चाले सरकारसंग पहिले आठ बुँदे, त्यसपछि सात , अनि चार बुँदे सहमति पनि गर्न भ्यायो । तर, यी सहमतिहरु अहिले एउटा कागजको खोस्टोमा मात्रै सीमित हुन पुगेको भनाई मधेस क्षेत्रका बासिन्दाहरूको छ । मुद्दा उही छ, नेता पनि उही छन्, तर मधेस मुद्दाको सम्बोधन हुन सकिरहेको छैन । फेरी मधेसी दलहरु हरेक सरकारमा सत्ताधारी बनेको वर्षौ भईसकेको छ । अहिले त इतिहासकै सर्वाधिक मधेसी दल र त्यसका नेताहरु ‘मालदार’ र महत्वपूर्ण मन्त्रालयमा आसिन छन् । गृह, स्वास्थ्य, उद्योग, जलस्रोत, भौतिक योजनालगायतका मन्त्रालयको नेतृत्व उनीहरुबाटै भइरहेको छ । तर, मधेस क्षेत्रमा न शान्ति छ न त गरीबका लागि विश्वासिलो स्वास्थ्य सेवा । बरु पहिले खोलिएका उद्योग र निर्माण भएका सडक र संरचनाहरु धमाधम जीर्ण बन्दै गएका छन् । ‘मोर्चाकै नाममा मधेसी नेताहरु सरकारमा जान्छन तर आफैले गरेका सहमतिका बुँदाहरु कार्यान्वयनमा निरिहता देखाउँछन् ’ एक मधेसी बुद्धिजीवि भन्छन्, ‘यसले सत्ताधारी मधेसी दलका नेताहरुको नियत, नेतृत्व र नेतागिरीमा गम्भिर प्रश्न खडा समेत खडा गरिदिएको छ ।’ एउटा सरकारी अखबारमा मधेस मामिलाबारे रिपोटिङ गर्दै आएका पत्रकार सुरेशकुमार यादवले मधेसी नेताहरु सत्तारोहणमा चुर्लुम्म डुबेकाले उनीहरु जनताप्रतिको जवावदेहिता विर्सदै गएको बताउँछन् । ‘त्यसैले त मधेस क्षेत्रका दलित, मुस्लिम, पिछडावर्ग, अल्पसंख्यक, उपेक्षित र दमित समुदाय आजसम्म पनि मुलुभूत अधिकारहरुबाट बञ्चित भएका हुन् ’ उनी भन्छन्, ‘हाल मधेस क्षेत्रमा शितलहरको मारले बालबालिका, महिला, बृद्ध, गरीब र निर्धन आकूलव्याकुलको अवस्थामा छन् तर सत्तारुढ मोर्चा घटक दलका नाईकेहरु मन्त्री छन राहत घोषण गर्न सकिरहेका छैनन , त्यसैले सहमतिहरु त उनीहरुका लागि हात्तिको देखाउने दाँत बनेको छ । ’
पछिल्लो समय सरकार परिवर्तन र चुनावको कुरा चलिरहँदा सत्ताधारी मधेसी मोर्चाका मन्त्रीहरुले आफूहरुसंग गरिएका सम्झौताका बुँदाहरु कार्यान्वयनमा दबाब दिएका छन् । ‘निर्वाचनमा जाँदा मुद्दाविहीन अवस्थामा रहेकाले उनीहरुले यो रणनीति अख्तियार गरेको हुनुपर्छ ’ यादव थप्छन् ।  पुस १९ गते बसेको मन्त्रिपरिषद्को बैठकमा दलहरुले आफै बसेको सरकारलाई दबाब दिएका हुन् । मोर्चाको दबाबपछि मन्त्रिपरिषदले गृह, आवास, शान्ति, अर्थ र प्रधानमन्त्री कार्यालयका सचिवहरु सम्मिलित एउटा समिति बनाएर अध्ययन प्रतिवेदन तयार गर्न निर्देशन पनि दिइसकेको छ ।  समितिका पदाधिकारीहरूलाई पाँच दिनको म्याद दिइएपनि काम भने अझै शुरु भइ नसकेको सत्तारुढ दलकै नेताहरु बताउँछन् ।
‘सत्तारोहणपछि मधेसी मोर्चाको बैठक समेत नियमित हुन नसकिरहेको अवस्थामा मधेसको मुद्दा सम्बोधन गराउनतर्फ उनीहरु कसरी अग्रसर हुन सक्ला ’ सत्तारुढ तमलोपाका एक नेताले भने , ‘ मधेसी जनतालाई मुर्ख बनाउनका लागि मात्र क्याबिनेटमा केही गरेको जस्तो देखाउने सोचमा नेताहरु छन, पछिल्ला समय सबै मधेसी नेताहरु ‘प्रोपागाण्डीस्ट’ बनेका छन् । ’ ११ भदौ २०६८ मा बाबुराम भट्टराई नेतृत्वको सरकारमा समावेश हुनुअघि मोर्चाका नेताहरु एक÷दुई दिन बैठकमा सक्रिय भएपनि सत्तासिन बनेपछि एकाएक सुस्ताए । त्यसपछि बल्ल असोज १५ मा तमलोपाको कार्यालायमा मोर्चाको बैठक बसेको थियो । मोर्चाका नेतामा फेरी पुरानै रोग दोहरियो, झण्डै तीन महिनापछि पुस ४ मा लोकतान्त्रिक फोरमको कार्यालयमा बल्ल मोर्चाको अर्को बैठक सम्पन्न भयो । त्यो बैठकमा मोर्चाका नेताहरुले छलफलको प्रमुख विषय ‘सत्ता परिवर्तन’लाई नै रोजेका थिए । त्यसैले त सत्ता परिवर्तनका लागि तीन सर्त उसले अघि सा¥यो । अझ मुलुकको निकासका लागि मोर्चाले सारेको नौ बूँदा ‘अमूर्त’ प्रस्तावले त देशलाई थप अन्यौलग्रस्त बनाउने निश्चित छ ।  मुलुकलाई निकास दिन सत्तारुढ मोर्चा महत्वपूर्ण अवस्थामा रहेपनि त्यसका लागि मोर्चाका नेताहरु अझै मनस्थितिनै बनाएका छैनन् , सत्ताको घेरा वरपरि मात्रै गोलचक्कर लगाइरहेका छन् ।
सरकारमा सामेल हुनुअघिको चार बुँदे सहमति धरापमा परेपछि अत्तालिएका मोर्चाका नेताहरु बैशाखमा चुनावै भई हाल्यो भने मतदाता समक्ष जानका लागि विभिन्न दस्तावेज तयारी गर्नमा जुटेको देखिन्छ । मधेसी माझ सबैभन्दा बढी चर्चामा रहेको समावेशिक विधेयक वा अध्यादेशको पक्षमा मोर्चाका नेताहरुले केही गर्न सकेका छैन । कुरा भने ठूला–ठूला गरिरहेका छन्, उनीहरुले । थरि–थरिका विचारले मधेसी नेताहरू सत्तारुढ र प्रतिपक्षको कित्तामा मात्रै देखिएका छैनन्,  उनीहरुबाट एकिकृत विचार आउन सकिरहेको छैन । मोर्चाभित्रकै नेताहरुमा पनि एक अर्कालाई निशेध गर्ने राजनीति हावी हुँदै गएको छ । अगामी प्रधानमन्त्रीको उम्मेदबारका लागि सत्तारुढ प्रमुख दल एमाओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहालले मधेसी मोर्चाबाट ‘इमान्दार’ नेताको खोजि गरिरहँदा सद्भावना पार्टीका राजेन्द्र महतो र लोकतान्त्रिक फोरमका विजयकुमार गच्छदार ‘स्वतन्त्र व्यक्ति’ को खोजीमा जुटेका छन् । अझ उद्योगमन्त्री अनिलकुमार झा त मोर्चाका नेता महन्थ ठाकुरको नाममा लविङ गर्दै हिडेका छन् । कांग्रेस उम्मेदबारलाई समर्थन नगर्ने केही सत्तारुढ मधेसी मोर्चाका नेताहरु यही सरकारलाई निरन्तरा दिने होडबाजीमा समेत उत्रेका छन् । एउटाले नयाँ जनादेशको कुरा गरिरहँदा अर्कोले संविधानसभाको पुर्नस्थापनाको मुद्दालाई बहसको विषय बनाइरहेका छन् । यी विरोधाभास कुराहरुले सत्ताधारी मोर्चा चुनावमा जान डराई रहेको पुष्टि गर्छ ।
एमालेका पूर्व सभासद एवं केन्द्रिय नेता अब्दुल कलाम आजादले ‘भोट कलेक्सन’ गरेर राजनीति गर्नका लागि मात्रै बनेको मधेसी मोर्चाबाट मधेसले केही नपाउने दाबी गरे । ‘आफ्नै मधेसी समुदायका लागि केही गर्न नसक्नेले राष्ट्रका लागि केही गर्ला भन्ने सोच्नै सकिन्न ’ उनले भने,  ‘मोर्चाका नेताहरुले पहिले सत्तामा जान सहमति गरे , अहिले कुर्सी जोगाउने खेलमा लागेका छन् , अनि आफैले गरेको सहमतिको कार्यान्वयन कसरी गर्न सक्लान ?’ उनले सत्तामा गएर मधेसी मोर्चाले देश र मधेसका लागि केही नगरेको दाबी गरे । उनले थपे, ‘ मधेसी मोर्चाका नेताहरुका लागि सहमति त सत्तामा पुग्ने भ¥याङ मात्रै रै’छ ।’
सत्तारुढ प्रमुख घटक तराईमधेस लोकतान्त्रिक पार्टीका केन्द्रिय सदस्य एवं पूर्व मन्त्री गणेश नेपाली भने आजादको कुरामा सहमत छैनन । ‘मधेसी मोर्चाले देखाउने लायक केही नगरेपनि मधेस मुद्दालाई बहसको केन्द्रविन्दू चाही बनाएको छ ’ उनी भन्छन्, ‘मधेसीको हक, अधिकारको रक्षा मोर्चाको मिशन भएपनि त्यसप्रति नेताहरुको उदासिन बनेको चाही पक्कै हो । ’ उनले सत्तामा जानुअघि र सत्तारोहण भएपछि मोर्चाले केही पनि गर्न नसक्नु चाहीँ नेताहरुमा सत्ताको चस्का नै हो । ‘सत्तालाई मात्रै केन्द्रविन्दू बनाईदा मोर्चाको उद्देश्य धराशायी बन्दै गएको छ , मैले आफ्नो पार्टीमा यसबारे धेरै पटक आबाज उठाएपनि सुनवाई हुन सकिरहेको छैन ’ पूर्व सभासद् समेत रहेका नेपालीले थपे, ‘मधेस आन्दोलनबाटै संघियता प्राप्त भयो तर त्यसलाई संविधान बनाएर संस्थागत गर्न मधेसी मोर्चाका नेताहरु नसक्नु उनीहरुको कमजोरी हो । ’ उनले संघियताकै कारण संविधानसभाको विघटन भएकाले जे जति सहमति या सम्झौता भएपनि सत्तारुढ भएपछि कामै नलाग्ने भएको बताए । ‘ सहमतिका मुलभूत बुँदा मधेसीको समूहगत सेनामा प्रवेश र समावेशिकताको मुद्दा ठोस रुपमा कार्यान्वयन गराउन मोर्चाका नेताहरु लाग्नै पर्छ ’ उनले भने ।
धनुषाका पूर्व सभासद् एवं एमालेका मधेसी नेता शत्रुधन महतोको मत भने अलिक फरक छ । उनले एउटै पार्टी र एउटै उद्देश्य बोकेका मधेसी दलका नेताहरु सत्ताकै लागि आ–आफ्नै नेतृत्वमा दल गठन गर्नु र पछि सत्तामा जान र त्यहाँ टिकिरहन मोर्चा बनाउनुले मधेसीका नाममा गरिएका सहमतिहरु ठोस रुपमा कार्यान्वयन हुन नसकेको बताए । ‘ त्यसैले त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चाले सरकारमा जानुअघि गरेको सहमतिको एउटा पनि बुँदालाई कार्यान्वयन गर्न सकेका छैन ’ महतो भन्छन्, ‘ मधेसी मोर्चाका नेताहरुको उद्देश्य मुद्दाको सम्बोधन गर्नु नभई सरकार र कुर्सीमा मात्रै टिकिरहनु हो । ’ उनले सत्तामा रहँदा मधेश र मधेसीलाई विर्सिदिने ,  सत्ताबाहिर पुग्नेवितिकै मधेस मुद्दाको उठान गर्नेले मधेसी नेताहरुको नियतलाई ठीक नभएको पुष्टि भएको बताए । ‘मधेसी दलहरु जनतालाई ढाँट्न र देखाउन मात्र मुद्दाको उठान गर्छन’ महतोले थपे ।
सत्तारुढ एमाओवादीका पूर्व सभासद् एवं मधेसी दलित नेता बाबुलाल पासवानको पनि मधेसी मोर्चाप्रतिको आक्रोश उस्तै छ । उनी भन्छन, ‘मधेसी मोर्चा भनेको तराईका ठीकेदारहरुको गठनबन्धन हो । सबै मधेसीलाई घुमाएर मन्त्री बन्नकै लागि केही मधेसी नेताहरुले मोर्चा बनाएका हुन् ।’सत्तामा जानकै लागि मधेसी नेताहरु सहमति गर्ने गरेको उनको आरोप छ । ‘सरकार परिवर्तनका बेला बुँदागत सम्झौता गर्छन तर ती बुँदाहरुलाई कार्यान्वयनमा ल्याउन सक्दैनन’ उनी भन्छन्, ‘उनीहरु सत्ताभोगी र भत्तालोभी बनेका छन्, संविधानसभाको विघटन सत्ता लम्ब्याउने सोचकै कारणले भएको हो ।’ दलित नेता पासवानले ‘तराईका उपेक्षित, शोषित, दमित समुदायको कल्याण गर्नका लागि मधेसी मोर्चा खोलेकै होइन, धर्नाजन गर्नका लागि उनीहरु एकजूट भएको’ दाबी गरे । ‘तराईका मुलबासिन्दालाई ठग्नका लागि र सत्तामा टिकिरहन विभिन्न प्रपञ्च गर्दै हिडेका छन् ’ उनी भन्छन्, ‘सेनामा १० हजार मधेसीको भर्ना गर्ने माग मधेसी नेताले गरेपनि सत्तासिन बनेपछि त्यसलाई चटक्कै विर्सेका छन् । ’
(कान्तिपुरको कतार संस्करणमा पुस २६ गते बिहीबार, १० जनवरी २०१३ मा प्रकाशित)