Thursday, 11 December 2025

जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे प्रमाणिकता आ चुनौती (Authenticity and Challenges in Writing the History of Janakpur Dham)

–दिनेश यादव
उपेन्द्र नागवंशीक समीक्षा कठोर भेलाक बाद ई आवश्यक छल । एहि समीक्षा सँ जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे भेल त्रुटि उजागर भेल आ भविष्यमे प्रमाणिक, खोजमूलक आ व्यवस्थित इतिहास लेखनक आवश्यकता स्पष्ट भेल। शशिक पुस्तक आधुनिक जनकपुरधामक सामाजिक–राजनीतिक आयाम केँ जीवन्त बनबैत अछि, मुदा प्राचीन मिथिला–विदेह–तिरहुतक इतिहासमे ठोस साक्ष्यक अभाव आ तथ्याङ्कीय त्रुटि पुस्तक केँ कमजोर बनबैत अछि । जनकपुरधामक इतिहास लेखन आब अनुमान आ किवदन्तीमे सीमित नहि रहि, प्रमाणिक अनुसन्धान पर आधारित होबाक चाही ।
विदेह–मिथिला–तिरहुत क्षेत्रक ऐतिहासिक महत्व अत्यन्त गहिरगर अछि । एहि भूभागक सांस्कृतिक, धार्मिक आ सामाजिक योगदान दक्षिण एशियाक सभ्यताक विकासमे विशेष स्थान रखैत अछि । मुदा एहि क्षेत्रक प्रमाणिक इतिहास लेखनमे आजुक दिन धरि ठोस साक्ष्यक अभाव देखाइत अछि । प्राचीन मिथिला वा जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे श्रुति, ब्राह्मणवादी साहित्य आ किवदन्तीक प्रभाव हावी रहल अछि, जे तथ्यपरक अनुसन्धान केँ कमजोर करैत अछि ।
शशिक पुस्तक आ नागवंशीक समीक्षा:
श्यामसुन्दर शशिद्वारा लिखित जनकपुरधामके इतिहास जनकपुरधामक ऐतिहासिक आयाम केँ समेटबाक प्रयास अछि । प्रयास प्रशंसनीय अछि, मुदा पत्रकार उपेन्द्र नागवंशी जनकपुर टुडेक विचार पृष्ठमे प्रकाशित समीक्षा मे पुस्तकक विभिन्न कमजोरी उजागर कएलनि ।
तथ्याङ्कीय त्रुटि आ विरोधाभासः
जनक वंशक कालावधि (३००–६०० ई.पू. बनाम ७२५ ई.पू.) मे असंगति ।
महाभारत युद्धक समय ई.पू. ९५० उल्लेख, जे ऐतिहासिक दृष्टि सँ असंगत ।
नगर पञ्चायत गठन वर्ष (२०१६ बनाम २०१७) आ रेल्वे सञ्चालन वर्ष (१९८२ बनाम १९९२) मे विरोधाभास ।
शैलीगत कमजोरी :
पत्रकारितामुखी भाषा प्रयोग सँ इतिहास भ्रमित भेल अछि ।
पहिल भागक प्रसंग दोसर भागमे पुनः दोहरायल ।
जनकपुर उपमहानगरपालिकाक प्राचीन स्थलसभक इतिहास पर्याप्त रूपेँ समाविष्ट नहि भेल ।
प्रमाणिक इतिहास लेखनक आवश्यकता:
नागवंशीक टिप्पणी अनुसार, पुरातात्त्विक उत्खनन, अभिलेखीय अध्ययन, मौखिक परम्पराक व्यवस्थित संकलन आ प्रमाणिक स्रोतक पुष्टि बिना लिखल इतिहास अमूर्त भऽ जाइत अछि । कालक्रम, वर्ष, वंशावली आ घटनाक्रम केँ प्रमाणिक स्रोत सँ पुष्टि नगरी प्रस्तुत करब पाठकप्रति अन्याय अछि ।
भविष्यक लेल सुझाव:
विश्वविद्यालय, अनुसन्धान संस्था आ स्थानीय निकाय सँ सहकार्य कए प्रमाणिक इतिहास लेखन केँ प्रोत्साहन देब जरुरी अछि । तथ्याङ्कीय त्रुटि केँ सुधार करतै आगामी संस्करण केँ व्यवस्थित बनाबक आवश्यक अछि । पत्रकारितामुखी शैली सँ अलग, सरल आ खोजमूलक इतिहास लेखन शैली अपनाबक सेहो जरुरी अछि । प्राचीन स्थलसबके इतिहास केँ पर्याप्त रूपेँ समाविष्ट करब अति आवश्यक अछि ।
उपेन्द्र नागवंशीक समीक्षा कठोर भेलाक बाद ई आवश्यक छल । एहि समीक्षा सँ जनकपुरधामक इतिहास लेखनमे भेल त्रुटि उजागर भेल आ भविष्यमे प्रमाणिक, खोजमूलक आ व्यवस्थित इतिहास लेखनक आवश्यकता स्पष्ट भेल। शशिक पुस्तक आधुनिक जनकपुरधामक सामाजिक–राजनीतिक आयाम केँ जीवन्त बनबैत अछि, मुदा प्राचीन मिथिला–विदेह–तिरहुतक इतिहासमे ठोस साक्ष्यक अभाव आ तथ्याङ्कीय त्रुटि पुस्तक केँ कमजोर बनबैत अछि । जनकपुरधामक इतिहास लेखन आब अनुमान आ किवदन्तीमे सीमित नहि रहि, प्रमाणिक अनुसन्धान पर आधारित होबाक चाही । एहिके लेल मिथिला–विदेह–तिरहुत क्षेत्रक गौरवशाली इतिहास केँ विश्वसामु विश्वसनीय रूपेँ प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि ।

Tuesday, 21 October 2025

'हुक्कापाती' वा 'हुक्कालोली' : प्रकृतिको वरदान र समृद्धिको आह्वान

नेपालको मधेश क्षेत्रमा दीपावली (लक्ष्मी पूजा) को अवसरमा एउटा विशिष्ट परम्पराले घर-आँगनलाई सुशोभित गर्छ। यो हो - जुटको डाँठ (संठी) वा रारी (खर/झार) बाट बनाइएको एक विशेष आकृतिलाई घरको छाना वा छतमा राख्ने चलन, जसलाई स्थानीय भाषामा कतै 'हुक्कापाती' त कतै 'हुक्कालोली' भनेर चिनिन्छ। मधेश क्षेत्रको एक विशिष्ट एवं मौलिक परम्परा, जसले प्रकृति र अध्यात्मलाई जोड्छ।
यो आकृति हेर्दा सरल देखिए पनि, यसले हजारौं वर्षदेखि चलिआएको सांस्कृतिक, सामाजिक र धार्मिक विश्वासको धरातल बोकेको छ। खासगरी सनपाट (जूट) कै रेसाले बाँधेर प्राकृतिक वस्तुको प्रयोग गरी बनाइने यस परम्पराले आधुनिक समयमा पनि आफ्नो महत्व कायमै राखेको छ।
दिनेश यादव
'हुक्कापाती' वा 'हुक्कालोली' पूर्ण रूपमा प्राकृतिक सामग्री—जुटको डाँठ, खर र जुटको रेसाबाट बनाइन्छ । यो परम्पराले मानिस र प्रकृतिबीचको गहिरो सम्बन्धलाई दर्शाउँछ । यसले हामीलाई सिकाउँछ कि हाम्रो सुख र समृद्धि प्राकृतिक स्रोतहरूको दिगो उपयोग र संरक्षणमा निर्भर गर्दछ । यो प्रकृतिको सम्मान गर्ने एउटा सुन्दर माध्यम हो । यस प्रकारका हस्तकलाहरू प्राय: परिवारका सदस्यहरू मिलेर बनाउँछन् । यसले पुस्तान्तरणको ज्ञान र सीपलाई जोगाउँछ र परिवार तथा समुदायबीचको सहकार्य र सामूहिकताको भावनालाई प्रवर्द्धन गर्दछ ।
दीपावलीको मुख्य पर्व नै धन, ऐश्वर्य र समृद्धिकी देवी लक्ष्मीको पूजा हो । यो 'हुक्कापाती'लाई घरको सबैभन्दा माथिल्लो भाग (छाना/छत) मा राख्दा, यो एक प्रकारले देवी लक्ष्मीलाई घरमा स्वागत गर्नको लागि तयार पारिएको 'उच्च आसन' वा 'ध्वजा' को रूपमा लिइन्छ ।
जुटको डाँठ र खर जस्ता वस्तुलाई धार्मिक अनुष्ठानहरूमा पवित्र मानिन्छ। यी वस्तुको संयोजनबाट बनेको 'हुक्कापाती' ले घरको वातावरणमा सकारात्मक ऊर्जाको प्रवाह गर्ने, दुष्ट आत्मा वा नकरात्मक शक्तिलाई टाढा राख्ने र घरलाई शुद्ध बनाउने धार्मिक विश्वास छ। परापूर्वकालदेखि यो विश्वास चल्दै आएको छ कि 'हुक्कापाती' ले घरलाई विभिन्न प्राकृतिक विपत्तिबाट बचाउँछ । यसलाई छतमा राख्दा देवी-देवताको कृपाले घर आगलागी, हुरी-बतास वा चट्याङ जस्ता प्रकोपबाट सुरक्षित रहन्छ भन्ने जनविश्वास छ । यो परम्परा केवल भौतिक सुरक्षाका लागि मात्र होइन । यो परिवारमा सुख, शान्ति, आरोग्य र दिगो समृद्धि भित्र्याउने कामनाको प्रतीक पनि हो । यसलाई वर्षभरि घरमा धन, अन्न र खुसीको भण्डार भरिरहोस् भन्ने प्रार्थनाका रूपमा लिइन्छ ।
दीपावलीको उज्यालोमा छतमा राखिएको यो सरल आकृतिले पर्यावरण मैत्री जीवनशैली, पारिवारिक सद्भाव र अटूट धार्मिक आस्थाको सन्देश दिन्छ । यो परम्परा हामी सबैका लागि एउटा प्रेरणा हो, जसले सुख, शान्ति र समृद्धिको कामना गर्दै प्रकृतिसँग एकाकार भएर बाँच्न सिकाउँछ । यो परम्परा केवल घर सजाउने माध्यम मात्र नभई, यो प्रकृति, भक्ति, र सामुहिक उत्सवको एक गहिरो अनुष्ठान हो । यो 'हुक्कापाती' महिनौंसम्म छतमा रहन्छ, जसले वर्षभरि घरलाई दैवी सुरक्षा प्रदान गरोस् भन्ने कामना गर्दछ ।
लक्ष्मी पूजाको साँझ, परिवारका ज्येष्ठ नागरिक वा घरमूलीले विशेष ठूलो आकारको हुक्कापाती (हुक्कालोली) तयार पार्छन् । यसमा आगो बालिन्छ । आगो बालिएको हुक्कालोलीलाई अत्यन्तै श्रद्धाभावका साथ पहिले गृह देउता घर (गोसाईं घर/कुलदेवताको स्थान) मा देखाइन्छ । त्यसपछि त्यो प्रज्वलित हुक्कालोलीलाई घरको प्रत्येक कोठा, भण्डार कक्ष र गाई-बस्तु राखिने गोठ सम्म परिक्रमा गराइन्छ । यो परिक्रमाका क्रममा घरमूलीले भक्तिभावका साथ देवी लक्ष्मीसँग आर्शिवाद माग्दै 'भत्याउने' (स्तुति गर्ने) गर्छन्। उनीहरूको कामना यस्तो हुन्छ:
'घरमा सुख, शान्ति, समृद्धि कायम होस् ।
काल-कष्ट, दु:ख-पीडा हरण होस् ।
कसैकै नजर-गुजर (नकारात्मक दृष्टि) नलागोस्।'
यो अनुष्ठानले भौतिक सम्पत्तिसँगै पारिवारिक स्वास्थ्य, सुरक्षा र मानसिक शान्ति को कामना गर्दछ । यसले घरलाई बाहिरी नकरात्मक शक्ति र दुष्ट नजरबाट जोगाउने एउटा दैवी सुरक्षा घेरा निर्माण गर्छ भन्ने विश्वास छ ।
गृह अनुष्ठान सम्पन्न भएपछि, बालबालिका, केटाकेटी र किशोरकिशोरीहरू एकत्रित भई सार्वजनिक र खुला स्थानमा सामूहिक रूपमा 'हुक्कापाती खेल्ने' चलन सुरु हुन्छ । यो खेलको क्रममा 'हुकापाती शुरू रहे' भन्दै सामूहिक उद्घोष गरिन्छ । यो उद्घोष आफैँमा एक प्रकारको सांस्कृतिक अनुष्ठान हो, जसले उल्लास र ऊर्जाको प्रवाह गर्दछ । नजिकै थरी-थरीका पाटाका पड्काउने र आतिसवाजी (पटाका) गर्ने गरिन्छ, जसले दीपावलीको रौनकतालाई पराकाष्ठामा पुर्‍याउँछ । हुक्कापातीको आगो र पटाकाको प्रकाशले समाजमा नयाँ उमङ्ग र उत्साहको सञ्चार गर्दछ ।
अन्त्यमा, मधेशको ‘हुक्कापाती’ परम्परा केवल दीपावलीको एउटा अनुष्ठान मात्र नभई, यो प्रकृति, भक्ति र सामूहिक जीवनशैलीको एउटा जीवन्त पाठ हो । यसले हामीलाई वास्तविक समृद्धि तब प्राप्त हुन्छ, जब हामी प्रकृतिलाई सम्मान गछौं, हाम्रो घरलाई ऊर्जावान राख्छौं र सबैभन्दा महत्वपूर्ण कुरा, परिवार तथा समुदायमा सुख–शान्ति कायम गर्न सामूहिक रुपमा कामना गर्छौ । सरल जूटको डाँठले बोकेको यो गहिरो अर्थ आजको युगमा पनि उत्तिकै महत्वपूर्ण र प्रेरणादायी छ ।

Sunday, 28 September 2025

नेपालक संदर्भमे 'सर' के स्त्रीलिङ्ग 'सराइन' कतेक उचित वा अनुचित ?

मैथिली भाषाके चर्चित लेखक,साहित्यकार एवं विद्वान प्रा.परमेश्वर कापडी अपन फेसबुक स्टेटसमे 'सर'शब्दक स्त्रीलिङ्ग 'सराइन' लिखने छथि । मैथिलीमे हुनक अही शब्दक प्रस्ताव नेपालीय मैथिली संदर्भमे व्यापक आ फराक अनुमोदन अपेक्षित अछि । मुदा अखुनका परिवेशमे अहि तरहे शब्द 'लैङ्गिक विभेदजन्य'अछि। पहिने हुनकर स्टेटस देखल जाए, ओ लिखैत छथि -
"हमरो घरमे मैथिलीक बड़ मान । क्याम्पसमे अदहास' अधिक अङरेजिए शब्दके बाजि, प्राज्ञिकता झारत । त' ओहि हिसाबे हम 'सर'! सब सरे कहि सम्बोधैत अछि । आब 'सर' के स्त्रीलिङ्ग भेल 'सराइन'! तैं ई हमर सराइन, हमर घरनी! जेना-- मास्टरके स्त्रीलिङ्ग मास्टरनी.। तहिना डागडरके डागडरनी, सिंहके सिंहनी!...."
प्रा.कापडीके ई शब्दक चयन वा अविष्कार वा प्रस्ताव कून भूगोलक लेल ( प्राचीन मिथिला वा विभाजित मिथिला ?) अछि ? से नहि जाइन । मुदा नेपालक संदर्भमे अनुचित अछि ! विशेष रूपसँ नेपालक राष्ट्र भाषा आ सामाजिक प्रयोगके संदर्भमे, लिंग-आधारित शब्द-रचनाक प्रति संवेदनशीलता बढ़लछ, कियाकि लैंगिक विभेद (gender discrimination) कम करबाक लेल लिंग-निरपेक्ष (gender-neutral) शब्दक प्रयोग प्रोत्साहित कएल जाइछ । किछु शब्द जे परंपरागत रूपसँ पुरुष वा स्त्री लिंगक लेल अलग-अलग प्रयोग होइत छल, आब लिंग-निरपेक्ष रूपमे एकरूपताक प्रयास आ व्यवहारमे सेहो देखल गेल अछि । उदाहरण स्वरूप, 'शिक्षक' (पुरुष) आ 'शिक्षिका' (स्त्री)क बदला केवल 'शिक्षक'क प्रयोग सर्वलैंगिक रूपमे कएल जाइछ , जे लैंगिक समानताक पक्षमे एक महत्वपूर्ण कदम मानल जाइतछ।
नेपालमे लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रयोग आ उदाहरण
नेपालमे, विशेष रूपसँ औपचारिक, शैक्षिक आ सरकारी संदर्भमे, लिंग-आधारित शब्दक प्रयोग कम करबाक लेल नीति आ सामाजिक जागरूकता बढ़लछ । निम्नलिखित उदाहरण एकर स्पष्टता दैतछ:
1. शिक्षक/शिक्षिका:
-पहिलेक प्रयोग: 'शिक्षक' पुरुष शिक्षकक लेल, आ 'शिक्षिका' स्त्री शिक्षकक लेल ।
-आधुनिक प्रयोग: आब 'शिक्षक' लिंग-निरपेक्ष रूपमे प्रयोग होइत छै। उदाहरण:
- "रमिता शिक्षक छथि" (स्त्री शिक्षकक लेल सेहो 'शिक्षक')।
- कारण: 'शिक्षिका'क प्रयोग लिंग-आधारित भेदभावक संकेत दै सकैत छै, तें एकर प्रयोग कम कएल जा रहल छै।
- वर्जित: 'शिक्षिका' लिखनाय वा बोलनाय औपचारिक दस्तावेजमे कम प्राथमिकता देल जाइत छै।
2. अध्यक्ष/अध्यक्षा:
-पहिलेक प्रयोग: 'अध्यक्ष' पुरुषक लेल, 'अध्यक्षा' स्त्रीक लेल।
- आधुनिक प्रयोग: केवल 'अध्यक्ष' लिंग-निरपेक्ष रूपमे। उदाहरण: - "सुनीता अध्यक्ष छथि।"
- नेपाल सरकारक दस्तावेज आ मिडियामे 'अध्यक्षा'क प्रयोग कम देखल जाइत छै।
- वर्जित: 'अध्यक्षा'क प्रयोग लैंगिक समानताक नीति अंतर्गत कम प्रचलित छै।
3. डाक्टर:
- पहिलेक प्रयोग: कखनो कखनो क्षेत्रीय स्तर पर 'डाक्टरनी' स्त्री चिकित्सकक लेल प्रयोग होइत छल।
- आधुनिक प्रयोग: 'डाक्टर' लिंग-निरपेक्ष छै। उदाहरण: - "डा. राधा डाक्टर छथि।"
- कारण: 'डाक्टरनी' जकां शब्द लिंग-आधारित भेद देखाबैत छल, तें एकर प्रयोग कम कएल गेल छै।
4. प्रहरी (पुलिस):
- पहिलेक प्रयोग: 'प्रहरी' पुरुषक लेल, आ कखनो 'महिला प्रहरी' स्त्रीक लेल।
- आधुनिक प्रयोग: 'प्रहरी' सर्वलैंगिक। उदाहरण: - "सीता प्रहरी छथि।"
- 'महिला प्रहरी'क प्रयोग सेहो कम कएल जाइत छै, कियाकि 'प्रहरी' अपनेमे लिंग-निरपेक्ष छै।
5. नेता/नेत्री:
- पहिलेक प्रयोग: 'नेता' पुरुषक लेल, 'नेत्री' स्त्रीक लेल।
- आधुनिक प्रयोग: 'नेता' लिंग-निरपेक्ष रूपमे प्रयोग होइत छै। उदाहरण: - "पुष्पा कमल दाहाल नेता छथि।"
- 'नेत्री'क प्रयोग आब कम प्रचलित छै, विशेष रूप स औपचारिक लेखनमे।
लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रयोगक कारण
- लैंगिक समानता: लिंग-आधारित शब्दक प्रयोग लैंगिक भेदभावक संकेत दै सकैत छै, जे नेपालक संविधान (2072) आ लैंगिक समानताक नीतिसँ मेल नहि खाइछ।
-आधुनिकताक प्रभाव: वैश्विक स्तर पर लिंग-निरपेक्ष भाषाक प्रचलन (जेना अंग्रेजीमे 'doctor', 'teacher') सँ प्रभावित होइत, नेपाली भाषामे सेहो एकर अनुकरण भँ रहलछ ।
- सामाजिक स्वीकार्यता: लिंग-आधारित शब्दक प्रयोग कम करब स समाजमे समानताक भावना बढ़ैछ।
मैथिली संदर्भमे टिप्पणी
मैथिली, जे नेपालक मधेश क्षेत्रमे व्यापक रूपसँ बोलल जाइछ, मे सेहो लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रति रुझान बढ़लछ, मुदा लोक-प्रयोगमे 'सराइन' जकां नव शब्द रचनात्मकतासँ बनलछ । प्रा.कापडीद्वारा उल्लेखित 'सर' सँ 'सराइन' बनओल गेल प्रसंग मैथिलीके जीवंत परंपराक हिस्सा भँ सकैछ, मुदा नेपालक लैंगिक समानताक नीतिक संदर्भमे, एकर प्रयोगक लेल सामाजिक स्वीकार्यता आ औपचारिक मान्यता जरूरी छै । जँ 'सर' आ 'सराइन'क बदला 'अध्यापक' जकां लिंग-निरपेक्ष शब्द प्रयोग कएल जाय, त' लैंगिक विभेदक प्रश्न कम उठत। उदाहरण: "हमर अध्यापक डा. यादव छथि।" (पुरुष वा स्त्री, दुनु लेल)
< अउर उदाहरणक सुझाव
जँ आगू अउर शब्दक लिंग-निरपेक्ष रूप वा वैकल्पिक प्रयोगक विचार करब, त' निम्नलिखित विचार क' सकैत छी:
- वकिल (वकील): 'वकिलनी'क बदला 'वकिल' लिंग-निरपेक्ष।
- कर्मचारी: 'महिला कर्मचारी'क बदला केवल 'कर्मचारी'।
-पत्रकार: 'पत्रकारनी'क बदला 'पत्रकार'।
नेपालमे लिंग-निरपेक्ष शब्दक प्रयोग लैंगिक समानताक लेल महत्वपूर्ण छै, आ 'शिक्षक', 'अध्यक्ष', 'डाक्टर', 'प्रहरी', 'नेता' जकां शब्द एकर उदाहरण छै। मैथिलीमे 'सराइन' जकां नव शब्द रचनात्मक छै, मुदा एकर प्रयोग लेल सामाजिक आ औपचारिक संदर्भमे विचार जरूरी छै।

Wednesday, 3 September 2025

मैथिली मानकीकरणके नाम पर 'फतबा' के ओरियान !

भारतक राजधानी नयाँ दिल्लीमे मैथिलीके मानकीकरणके नाम पर "फतबा" वा "उलेमा" जारी करबाक ओरियान, अर्थात् कट्टरपंथी वा एकपक्षीय दृष्टिकोण अपनाबेके प्रवृत्ति, शुरू भेल अछि, जे चिंताके विषय छै । अहि विषय पर सामाजिक संजाल फर मिश्रित प्रतिक्रिया देखल गेल अछि । मैथिली समाज अहि विषय पर ध्रुविकृत बनल अछि । ब्राम्हण आ ब्राम्हनेत्तरके रूपमे ध्रुबीकरण चिन्ताक गप्प थिक । एकर वजह नयाँ दिल्ली स्थित मैथिली शोध परिषद् नामक संस्थाद्वारा ओतह 6 सितम्बर 2025 में होबे जा रहल 'मैथिलीक वर्तनी विमर्श हेतु दिल्ली-विद्वत गोष्ठी' बनल अछि । मैथिलीके विद्वान/लेखक/अभियानी डाँ किशन कारिगर, आचार्य रमानन्द मण्डल सहितके विद्वत लोकैन जोरदार विरोध करैत मैथिली भाषामे लोकबोली,लोकशैली आ लोकलयके समावेश करबाक माग कयलक अछि । मैथिलीमे सर्वजन आ सर्वपक्षके समावेश करैत मानकीकरण होबाक चाही, नए त मैथिली धरासाही बनत प्रतिक्रिया सामाजिक संजालमार्फत् ओसभ कहि रहला अछि । मुदा दरभंगा आ मधुबनीके घराना सवर्णके बोली, शैलीके आधार बनाके मानकीकरण होएत त दूर्घटना निश्चित भेल बात सेहो ओसभ जोरदार रूपसँ कैह रहलाछ । दरभंगा आ मधुबनीवाला बोली/शैलीके पृष्टपोषणमे लागल सांभ्रात जातिक लोकसभ कथ्य नै लेख्य शैलीके मानकीकरणके आधार बनेबाक बात कैह रहला अछि ।
मानकीकरणके प्रक्रियामें यदि किछु विद्वान वा समूह एकटा खास शैली (जेना सोतीपुरा मैथिली) वा तत्सम शब्दावलीके थोपैत छथि, आ अंगिका, बज्जिका जेना उपबोली सबके उपेक्षा करैत छथि, त इ भाषाके लोक स्वरूप आ विविधता लेल हानिकारक साबित भए सकैछ।
मानकीकरणमें सब क्षेत्रीय शैली आ उपबोली सबके प्रतिनिधित्व देल जाय। "फतबा" जेना एकपक्षीय निर्णयके बजाय, मिथिला, बज्जिकांचल, आ अंगिकांचलके विद्वानसभके एक मंच पर लावल जाय, जाहि से सहमति आधारित मानक बन सके।
मैथिलीके लोक स्वरूप, जेना तद्भव आ देसी शब्द, आ बोलचालके मुहावराके प्राथमिकता देल जाय । उदाहरण स्वरूप, 'पाणि' आ 'पानी' दुनूके स्वीकार्य बनावल जाय ।
वर्तनीमें भेद, जेना 'ण' बनाम 'न', वा 'ष' बनाम 'स', के पर्यायवाची रूपमें मान्यता देल जाय, जाहि सँ लेखकके रचनात्मक स्वतंत्रता बनल रहए।
मानकीकरणके लेल शब्दकोश, डिजिटल टूल आ शिक्षण सामग्री विकसित कायल जाय । संगैह, विद्यापति जेना ऐतिहासिक रचनाकारके कृतिके मूल रूपमें संरक्षित करबाक चाही, न कि शुद्ध मैथिलीमें बदलल जाय ।
"उलेमा" जेना दृष्टिकोणके बजाय, मैथिली भाषी समुदाय, साहित्यकार, आ शिक्षकसभके राय लेल जाय, जाहि सँ मानकीकरण सर्वस्वीकार्य हो।
मैथिलीके मानकीकरण जरूरी छै, मुदा एकर लेल समावेशी, लोक-केंद्रितङ आ लचीला दृष्टिकोण अपनावल जरूरी छै। "फतबा" वा कट्टर नियम थोपला सँ भाषाके सांस्कृतिक धरोहर कमजोर होय सकैछ। सब क्षेत्रीय विविधताखके समन्वय सँ एकटा मजबूत आ जीवंत मानक मैथिली बनावल जा सकैछ ।

Monday, 1 September 2025

काका’क बात ! (#मैथिली लघुकथा)

अमेरिकामे क्रियाशील संस्था 'एसोसिएसन अप नेपाली तराइयन इन अमेरिका (एएनटीए) अर्थात् 'एन्टा'के 8म् महाधिवेशन तथा 20म् वार्षिकोत्सवके अवसरमे प्रकाशित 'सोभेनियर'मे छपल मैथिली लघुकथा !
रमेशके गामसँ राजधानी ऐला एक सप्ताह भ' गेल रहैक । राजधानी एलाक बादो गामक मुटकुन काका'क मोन ओकरा पड़ैत अछि। गाममे रहैत काल काका संग भेल संवाद आब रमेशके जीवन, परिवार, समाज आ देशक विकास लेल सूत्र जेकाँ बुझाइतछ ।
मुटकुन काका एक दिन मोनक बात बजैत कहलनि, ‘बाबू! तूँ सभ गाम छोड़ि क' बाहर चलि गेलहँ, नीक कएलहँ। एत' त' आब रहबाक स्थिति नहि रहल अछि। किछु कथित अगुआ लोकनि गामकेँ बर्बाद क' देलक अछि । घर-घरमे झगड़ा लगा देलक अछि....!’
मुटकुन काका निरंतर बाजि रहल छलाह। बीचमे रोकि क' रमेश पुछलक, ‘काका! के अगुआ? के-के छथि ओ लोकनि ?’
काका (थोड़ेक कड़क स्वरमे): ‘हैट ! गामक बच्चा-बच्चा जनैत अछि । सभसँ पुछह, कहि देतह। हम बूढ़ा छी, नाम नहि लेब । भित्तोमे कान होइत छै। जँ केओ सुनि देलक त' ओ लोकनि मैदान (खुला दिशा-पिशाबक स्थान), पैनछुवा , चौरचरण (पशु चरबाक स्थान) सब बंद करबाक हुकुम द' देत। फेर हम गरीब...!'
मुटकुन काकाक बात सुनि क' हुनकर मनमे भय देखल जा सकैत छल । रमेशक’ ओह निष्कर्ष छलैक।
रमेश (काकाक काँध पर हाथ राखि क' हुनकर मुंह दिस तकैत): ‘काका ! एहो युगमा अहाँ डराइत छी ?’
काका खिसिआ गेलनि। चारू कात तकैत गमछासँ पगड़ी कसि क' बाँधलनि आ कहलनि, ‘ रमेश बाबू! हम डरायल नहि छी, फालतू झंझटमे पड़' नहि चाहैत छी...। हमरा पर पंचैती बसाय देत से डर अछि । पंचैतीमे खैनी-बिडी, सुपारी जे खर्च करए पडैक छैक…। पंचैतीक नाम पर किछु बेरोजगार लोकक दिन एही तरहेँ कटैत अछि।’
गाममे रोज होइत फालतू पंचैतीक प्रति मुटकुन काकाक आक्रोश सुनि रमेश हुनकर पहिल बात पर ध्यान देबाक प्रयास कएलनि। पुछलनि, ‘काका ! कक्कर-कक्कर घरमे झगड़ा अछि ?’
काका : ‘कहब कठिन अछि, रमेश बाबू। कक्कर-कक्कर नाम कहब...?’ लंबा साँस लैत काका आगाँ कहलनि, ‘रमेश बाबू ! जई घरमे सहोदर भाइ-भाइमे प्रेम होइत अछि, जेठ-बड़केँ सम्मान भेटैत अछि, ओत' भगवानक वास होइत अछि। प्रेम टूटल त' रामायण लिखायल, संपत्ति बाँटल त' महाभारत । मनुष्यक पतन तखन शुरू होइत अछि, जखन ओ अपनाकेँ गिराब' लेल दोसरसँ सलाह लेब शुरू करैत अछि...!’
मुटकुन काका रमेशसँ समय पुछलनि, बिहानक ११ बजल छल। जलखोई करबाक रमेशक आग्रह पर काका कहलनि, ‘स्नान-ध्यानक बादे करब …! ‘ एतेक बाजैत काका पुरनी पोखरी दिस चलि गेलाह। रमेश , काकाके अंतिम बात पर सोचैत सोफा पर बैसल रहल।
- दिनेश यादव (लेखक/पत्रकार/अध्येयता), राजगढ-06, फकिरा, सप्तरी (मधेश प्रदेश)

Sunday, 31 August 2025

अन्न–धन लक्ष्मी

यो कथा रामभरोस कापडिको मैथिली कथासंग्रह ‘एन्टिवायरस’ मा प्रकाशित ‘अन्न–धन लक्ष्मी’ को पत्रकार दिनेश यादवले गर्नुभएको नेपाली अनुवाद हो । यो कथा कान्तिपुर दैनिकमा ९ कात्तिक २०७६ को कोशेली परिशिष्टमा प्रकाशित छ ।
-रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’
कार्तिक ९, २०७६, कान्तिपुर (कोसेली)
कुनै एउटा राजमार्गको तल बग्दै गरेको जीवित नदीमाथि बनेको पुल  । साठी–सत्तरी मिटर लम्बाइ हुनुपर्छ  । तल हरियो–कञ्चन पानी बगिरहेको छ । एउटी युवती जो अत्यन्तै राम्री छिन्, सुरुवाल–कुर्थामा सजिएकी तिनी पुलको रेलिङ समातेर धेरै समयअघिबाट तल नदीको पानीतिर हेरिरहेकी छन् । अर्थात् तिनी पुलबाट तलको दूरी नापिरहेकी छन् । त्यसै बेला एक जना पुरुष पूर्वबाट पश्चिमतिर पुल हुँदै गइरहेका देखिन्छन् । युवतीले जब एउटा पुरुष आफूतिरै आइरहेको देख्छिन्, उनको अनुहारमा केही क्षणकै लागि भए पनि प्रसन्नता बिजुली चम्केको जस्तो भान हुन्छ । फेरि तिनी पुरानै कुरो तलको पानीतिर हेर्न थाल्छिन् ।
पुरुष नजिकै आउँछन् । उनको चाल–ढालले लाग्छ कि उनलाई युवतीको त्यहाँ उभिनुको कुनै मतलबै छैन । उनी ती युवतीप्रति कुनै ध्यानै नदिएको जस्तो देखिन्छन् । पाइन्ट–सर्ट लगाएका ती पुरुष पच्चीस–छब्बीस वर्षभन्दा बढी उमेरका सायद थिएनन् । ती युवक जब सहज भावबाट आफूतिर नहेरीकनै अगाडि हुइँकिन्छन्, तब युवतीको चेतना फर्किन्छ । तिनी आश्चर्य मान्दै युवकतिर हेर्न पुग्छिन् । तिनलाई यो लागिरहेको थियो कि ती युवकले आफूलाई यो अवस्था देखेपछि एकपटक सोधपुछ गर्लान् । अर्थात् कुनै किसिमबाट प्रतिक्रिया जनाउनेछन् । त्यो नभएपछि युवती केही बेर विचलित हुन्छिन् । टाउको पश्चिमतिर फर्काउँदै युवकलाई सम्बोधित गर्दै आफ्नोतर्फ ध्यान केन्द्रित गराउँछिन् ।
युवती– ‘हजुर, सुन्नुस् त ।’ युवक केही बेर यताउत्ति हेर्छन् कसैलाई आफ्नो अगाडि र पछाडि नदेखेपछि आवाजतिर आफ्नो मुन्टो उठाउँछन् । युवती– ‘म तपाईंलाई नै बोलाइरहेकी छु ।’ युवक– (युवक केही वेर आश्चर्यमा पर्छन् अनि सोच्छन्ः अनजान कुनै युवती नजिक एक्लै जानु उचित/अनुचित, सम्भवतः त्यही गुनधुन गर्न थाल्छन् । ) युवती– ‘यता आउनु न ?’ युवक– ‘के कुरो होला ?’ युवती केही नरम भावमा भन्छिन्, ‘तपाईं यता आएपछि पो त !’ युवक अलिक धकाउँदै युवतीको नजिक पुग्छन् । ती युवतीको आँखामा प्रश्नवाचक दृष्टिले हेर्छन् । युवती– ‘(आश्वस्त पार्दै) यहाँ कुनै प्रकारको शंका–उपशंकाको गुन्जाइस छैन । मलाई एउटा मात्र कुरो सोध्नु थियो ।’ युवक– ‘ए.. के कुरो ?’
उनी टासिँदै युवतीको अगाडि पुग्छन् । युवती अब फेरि आफ्नो आँखा पुलको तल कलकल बगिरहेको नदीको पानीमा दौडाउँछिन् र युवकलाई अझै नजिक आउन आग्रह गर्दै भन्छिन्, ‘भन्नुस् त यो नदी कत्ति गहिरो होला ?’ युवक पहिले त अवाक हुन्छन् । उनले त नापेको छैन, तर अभियन्ता हुन्, त्यसैले अनुमान लगाउन सक्छन् । सामान्य रूपमा युवतीलाई उत्तर दिँदै भन्छन्, ‘अँ.. यो बीस–पच्चिस मिटर त पक्कै होला ।’ युवती सोध्छिन्, ‘माथिबाट हाम फाल्दा यो नदीमा डुबेर मर्न सकिएला त ?’ युवक आश्चर्य मान्दै युवतीतिर हेर्छन् । केही बोल्दैनन् । लाग्छ, उसको मनमा केही द्वन्द्व चलिरहेको छ । के जवाफ दिऊँ या यस्तो प्रश्न किन सोधिन् ।
त्यत्तिकैमा युवतीले फेरि त्यही प्रश्न दोहोर्‍याउँदै भनिन्, ‘हजुर, भन्नु न । पुलबाट यो नदीमा हाम फालेर कोही मर्न सक्छन् ? ’ युवक एकपटक तल बगिरहेको पानीलाई निहार्दै युवतीमाथि आँखा टिकाउँदै भन्छन्, ‘अवश्य डुबेर मर्न सक्छन् । तर तपाईंले यो प्रश्न किन गर्दै हुनुहुन्छ ?’ युवती फेरि हेर्दै जवाफ फर्काउँछिन्, ‘यो कारणले कि म पुलबाट हाम फालेर मर्न चाहन्छु ।’ युवक अवाक पर्छन् । यी युवती किन मर्न चाहन्छिन् ? उनी पहिलोपटक केही स्थिर हुँदै युवतीतिर हेर्छन् । सुरुवाल–कुर्थामा सजिएकी सुन्दरी यी युवती पढे लेखेकी जस्तो पनि देखिन्छिन् । उमेर २०–२२ वर्ष होला । ज्यान फाल्ने त केही कारण पक्कै होला । उनी आफैं यन्त्रभावले घरबाट निस्केर जीवनलाई तहसनहस हुन छाड्ने संकल्पका साथ यत्ता आएका रहेछन् । संसारिक सुखभोग प्राप्तिबाट वितृष्णा उत्पन्न भइसकेको छ, उनलाई । त्यसको पनि कारण छ । सम्भव छ, पुलमाथि हाम फाल्ने निर्णय गर्ने युवतीको पछाडि पनि त केही बलियो कारण हुन सक्छ ।
युवक सोध्छन्, ‘तपाईं यस्तो सोच्न कसरी सक्नुहुन्छ ? युवती उत्सुक हुन्छिन्, ‘मतलब, म मरे तपाईंलाई किन चाँसो ? हो, म मर्न चाहन्छु । अब तपाईं जान सक्नुहुन्छ ।’ युवतीको यो रूखोपनबाट युवक आहत हुन्छन् । तर उनी सम्हालिन्छन् । मनभित्र यो भारी बोकेर उनलाई त्यहाँबाट हिँड्न मन लागेन ।
उनी आफ्नो पीडा केही समयका लागि बिर्सिदिन्छन् । युवती उनलाई रहस्यमय लाग्न थाल्छ । उनको भित्रसम्मै पुग्न आवश्यक ठानेर युवतीको रूखो व्यवहारलाई चटक्कै बिर्सेर फेरि प्रश्न गर्दै बस्छन्, ‘तपाईंको यो उमेरमा यस्तो खतरनाक निर्णयसम्म पुर्‍याउने बाध्यता केले दिलायो ?’
‘तपाईंहरूले,’ आवेशमै युवतीले बोलिन् । यो कुरा भनिरहँदा उसको आँखा युवकको आँखासँग एकाएक जुध्न पुग्छ । र फेरि तत्कालै नदीको पानीमा भासिन्छ ।
‘हैन,’ मैले त केही गरेकै छैन । भेटघाट पनि अकस्मात भयो । न कहिले देखेको न चिनेको । फेरि मेरो दोष कसरी ?’ ‘म तपाईंलाई मात्रै भनेको छैन । तपाईंको जुन जाति छ, पुरुष जाति, त्यसलाई भन्या हुँ । मेरो यो कठोर निर्णय गर्नुको पछाडि यस्तै पुरुषहरूले गर्ने अत्याचार हो ।’
युवकको जिज्ञासा झनै बढ्यो । उनी सोध्छन्, ‘कस्तो अत्याचार ?’
युवतीको घाँटी तलतिर तन्किएकै छ । उनी उत्तर दिन्छिन्, ‘जानुस्, तपाईं यो झमेलामा किन पर्नुहुन्छ ? कति राम्रोसँग तपाईं आफ्नो बाटोतिर लागिरहनुभएको थियो । बेकारै तपाईंलाई डाकेछु ।’
‘ल, तपाईंले नजिक बोलाइहाल्नुभयो, कुरा पनि त भनिदिनुस् । जुन भारी बोकेर म हिँडिरहेको छु, त्यसमा केही नयाँपन होस् र मेरा भारी पनि केही हलुको होस् ।’ ‘त्यस्तो कुन भारी तपाईंमाथि छ ? कस्तो राम्रो त हुनुहुन्छ । ’ ‘मात्र यही कुरो छ आईमाईमा । आफूमाथि पर्‍यो भने पोखरी–जलाशय वा नदीमा डुबेर मर्न चाहन्छिन् । र जब पुरुषमाथि जुल्म हुन्छ, तब उनको रूप–रंगमाथि ध्यान दिन थाल्छन् । छोड्नुस् मेरो कुरो, पहिले तपाईं भन्नुस् ।’ ‘होइन, पहिले तपाईं भन्नुस् । म पनि बुझ्न चाहन्छु ।’ ‘त्यसो भए पहिले कसले बोलायो ?’ ‘मैले ।’ ‘कुरो कसले अगाडि बढायो ?’ ‘मैले ।’ ‘त्यसो भए कुरा कसले फर्साउने पहिले ?’ ‘कुरो त ठीकै हो । भन्न त मैले नै पर्छ ।’
युवक अब आश्वस्त हुँदै भन्छन्, ‘जे होस्, तपाईंलाई ज्ञान त भयो । अब भन्नुस तपाईं यो भुतही नदीमा किन हाम फालेर ज्यान दिन चाहनुभएको थियो ?’ युवती अब केही थाकेको र हारेको जस्तो देखिएकी छन् । उनी एकपटक गहिरो नदीमा आफ्नो नजर दौडाउँछिन् । मुखमा आएको क्लान्त भावलाई स्थिर गर्दै थुचुक्कै रेलिङ तलको पटरीमा बस्छिन् । उता पुलमाथि छेउमा उभिएका युवक पनि केही नजिकिँदै युवतीकै छेउमा बस्छन् । दुवैको भित्र संषर्घ जारी छ । कुरो कहाँबाट सुरु गरौं भनेर । युवक, युवतीतिर गहिरो नजरले हेर्दै सोध्छन्, ‘के हो तपाइँको कथा, जो यस्तो दुःखद निर्णय गर्न पुग्नुभएको थियो ?’ ‘ठीक छ, म सुनाउँछु । तर मेरो निर्णय भने अटल छ नि । मेरा लागि अब कुनै अर्को विकल्प बाँकी छैन ।’ ‘पहिला भन्नुस् न त ?’
युवती भन्छिन्, ‘मेरो बुबा भोकभोकै बसेर मलाई मैट्रिकसम्म पढाउनुभयो । उहाँको मन थियो, छोरी सुन्दरी छँदै छिन, पढे–लेखेमा कम दाइजोमै विवाह भई घरजम भइहाल्छ । तर जब धेरै प्रयासको बाबजुद केटा पाउन सक्नुभएन, अत्यधिक दाइजो मागका कारण बुबा गलिसक्नुभएको थियो । मलाई लाग्यो कि मेरै कारणले बुबा गल्नुभयो, थाक्नुभयो, चिन्तित बन्नुभएको छ । त्यसपछि निर्णय गरें कुनै जागिर गरी घरखर्च चलाऊँ । विवाह त पछि गरे पनि भइहाल्यो नि । मैले जागिर पाएँ, एउटा कार्यालयमा । कार्यालय प्रमुख अविवाहित थिए । उनलाई मसँग काम गर्न मन पर्‍यो । मसँग हिमचिम बढाए । कुरो यतिसम्म पुग्यो कि हामी दुवैले विवाह गर्नुपर्छ भन्ने निर्णय गर्‍यौं । उनको प्रेमभाव देखेर म मन्त्रमुग्ध थिएँ । लाग्थ्यो कि अब थकित बुबाको अनुहारमा पहिलेझैं खुसी छाउनेछ । यस्तै चिन्तन–मननमा रमाइरहेको बेला एक रात उनको र मेरोबीच सबै औपचारिक सम्बन्धको अन्त्य भयो । अब तीन–चार महिना भइसक्यो । उसको बच्चा मेरो कोखमा आएपछि उनी मबाट टाढिन र तर्किन थाले । बिहे गर्नबाट मात्रै होइन, कार्यालयमा पनि गलत आरोप लगाएर नोकरीबाटै निकालिदिए । अब मलाई घरमा गएर यो कुरो भन्ने आँट छैन ।
बुबाको पुरानै निराश अनुहार फेरि देखिने त छँदैछ, गाउँटोलमा बदनामी हुने अर्को डर । त्यसैले पानीमा हाम फालेर आत्महत्या मात्रै मेरो परिणति बन्न पुगेको हो । म यहाँ त्यही गन्थनमन्थनमा उभिएकी थिएँ कि हाम फालेर पनि मर्न सकिएन भने अर्को बबाल हुन सक्छ ।’
युवक, युवतीको कथा सुनेर गम्भीर बन्न पुगे । उनको आफ्नो व्यथा ती युवतीको अगाडि झिनो लाग्न थाल्यो । उनी धेरै वर्ष विदेशमा गएर धन कमाएका थिए । आमा–बुबा र एउटी बहिनी मात्रै थिए । बुबाले ऋण काढेर कतार पठाएका थिए । दुई वर्षमा पैसा कमाएर घर फर्केपछि बिहे गरिदिए । चार–पाँच वर्ष खुबै रमाए श्रीमतीसँग । आमा–बुबाले रोकिरहेका थिए, अहिले नजाऊ भने । उनीहरूको मनसाय उनले पछि मात्र बुझे, त्यो थियो— दुलहीको कोख भरिएपछि छोरो विदेश जाओस् । तर पाँच–छ महिनामा केही भएन, ड्युटीमा गइहाले । कतारबाट मलेसिया गए फेरि दुवई पनि पुगे । पढेका थिए, राम्रो काम हात लाग्यो । फेरि दुई वर्षपछि आए ।
योपटक धेरै रकम कमाएर ल्याएका थिए । कर्जा त सकियो नै, पुर्खौली जग्गामा पक्की घर बनाए । घरलाई सजाए, पत्नीलाई गरगहनाको भारी नै बोकाइदिए । बिदा छ महिनाभन्दा बढीको थियो । यो छ महिमा सबैथोक गरे पनि श्रीमतीको कोख भर्न सकेनन् । आमाले धेरै ठाउँ दुहलीलाई लगेर झारफुक गराइन्, धामीझाँक्रीसँग पनि देखाइन् । केही फाइदा भएन । यसैबीच उनी फेरि विदेश हानिए ।
विदेशबाट श्रीमतीको नाममा पटक–पटक रकम पठाइरहेका थिए । उनलाई यो कुरोको कुनै भान थिएन कि चार वर्षसम्म कुनै महिलाले सन्तान नपाए कस्तो अवस्था हुन्छ । उनी रकम पठाइरहेकै थिए । श्रीमतीसँग फोनमा कुराकानी पनि नियमित भइरहेकै थियो । रंगीला गफगाफ गर्न भ्याएकै थिए । वृद्ध आमाबुबालाई पक्की घरमा आराम गर्नुको सुख । सबै आ–आफ्नै धुनमा मस्त थिए । श्रीमती भने एउटा अर्कै खेलमा रमाइरहेकी थिइन् । एक दिन उसले दिएको गरगहना र पठाएको जति सबै रकम लिएर गाउँकै एक अधबैंसे विदुरसँग गइन् । जब यो कुरो उनलाई थाहा भयो, उनलाई आकाशबाट भुइँमा खसेजस्तो भयो ।
उनले मालिकलाई आग्रह गर्दै तत्कालै गाउँ फर्कने भन्दै बिदा लिए । गाउँ आए । गाउँभरि हल्ला फैलियो कि उनीबाट कुनै सखा–सन्तान नभएपछि श्रीमती अरूसँग भागिन् ।
उनलाई यो कुराले निकै ग्लानि भयो । अर्को बिहे गर्दा पनि त्यही सहनुपर्ने भयो । उनले सहर पुगेर आफ्नो जाँच गराए, नतिजा जुन आयो, त्यसबाट पनि उनी निराश भए । चारैतिर अँध्यारो छाएको थियो । पृथ्वी नै पूरै घुमिरहेजस्तो उनले अनुभव गर्न थाले । तन स्थिर भए पनि उनको मन जति गर्दा पनि स्थिर हुनै सकेन । घर फर्किने आँटै उनले गर्न सकेनन् । उनी उतै बरालिन थाले । सम्भवतः उनी पहिलो पटक आफ्नो जीवनमा लक्ष्यविहीन बन्न पुगेका थिए । बाँचू वा मरूँ । र यही अवस्थामा यो पुलमा एउटी युवतीसँग भेट भएको थियो ।
युवतीले जब यो कथा सुनिन्, अवाक बन्न पुगिन् । मृत्युको मुखमा जाने निर्णय गर्ने यी दुई जनाको कथा उस्तै–उस्तै थियो । एउटा पुरुषसँग प्रताडित र अर्को महिलासँग विक्षिप्त । त्यसपछि के ?
पुरुष उठ्छन् । महिला पनि उठ्छिन् । दुवै दक्षिणतिर मुख फर्काएर तल बग्दै गरेको नदीलाई हेर्छन् । दुवै हातले रेलिङलाई बलियोसँग समात्दै एक–अर्कालाई हेर्छन् । दुवैको आँखाबाट आँसुका धारा बग्न थाले । आँखा बन्द गरेर केही स्मरण गर्दै दुई खुट्टालाई नदीतिर फर्काएर दुवै एकैसाथ पानीमा हाम फाल्न खोजेको जस्तो देखिन्थ्यो । दुवैको कथा एकअर्कालाई उद्वेलित गर्छ ।
तर त्यसपछि के भयो, थाहा भएन । युवक, युवतीतिर हेर्छन् । आँखाले आफ्नो कथा एक–अर्कालाई बताइरहेको छ । दुवै पुलको माथिल्लो भागबाट खुट्टा र हात तल झार्छन् । उत्तरतिर मुख फर्काउँछन् । युवक आफ्नो दायाँ हात युवतीतिर बढाउँछन् । युवती बिनाहिच्किचाहटको हात अगाडि बढाउँछिन् । युवक उनको हातलाई दायाँ हातले दबाउँदै बायाँ हातले कस्दै पूर्व दिशातिर लाग्छन् । दुवैको अनुहारमा अन्न, धन, लक्ष्मी प्राप्त भएको खुसी छाउँछ । (मैथली कथासंग्रह ‘एन्टिवायरस’ बाट । अनुवाद : दिनेश यादव ।)
https://ekantipur.com/koseli/2019/10/26/157206551735827382.html

Tuesday, 29 July 2025

जामुन का पेड (व्यङ्ग कथा)

हिन्दी र उर्दु साहित्यका मुर्धन्य लेखक कृष्ण चन्दरको एउटा कथा छ – जामुनका पेड ।
सरकारी सचिवालयको प्रांगणमा रहेको एउटा बुढो जामुनको रुख एक राति चलेको हुरिले ढल्छ । बिहान उठ्दा सचिवालयको मालीले देख्छ — ढलेको त्यही जामुनको रुखमुनि एउटा मान्छे थिचिएको हुन्छ । रुखले थिचिएको व्यक्तिले आफ्नो जीवन बचाइदिन मालीसँग याचना गर्छ ।
मालीले रुखमुनि थिचिएको व्यक्तिले जीवन जोगाइदिन गरेको प्रस्ताव कार्यालयको पियूनलाई सुनाउँछ । पियून कर्मचारीलाई भन्न जान्छ । कर्मचारी सुपरिटेन्डेन्टलाई भन्न जान्छ । सुपरिटेन्डेन्ट उपसचिव कहाँ जान्छ । उपसचिव सहसचिव कहाँ जान्छ । सहसचिव मुख्य सचिव भएको ठाउँ जान्छ । एउटा सिंगै फाइल तयार हुन्छ ।
जोगाउनुपर्ने ढलेको जामुनको रुखले थिचिएको मान्छे थियो, तर सरकारी अड्डाको प्रक्रियाले ढलेको जामुनको रुख नै मुख्य विषय बन्न पुग्छ ।
जामुनको रुख फलफूल भएकाले मुख्य सचिवबाट फाइल बागवानी विभागमा जान्छ । सचिवालयको लेनमा रोपिएको रुख भएकाले बागवानी विभागले फाइल कृषि विभागमा पठाउँछ । बुझ्दै जाँदा रुखले च्यापिएको व्यक्ति शहरको नामुद सायर भएको खुल्न आउँछ । मामला संस्कृति विभागतर्फ मोडिन्छ ।
व्यंग्यभरि यो कहानी यति चोटिलो छ कि – सरकारी कर्मचारीतन्त्रको निवेदन दिनेदेखि फाइल सार्नेसम्मका प्रक्रियामाथि थपिने प्रक्रिया पूरा गरेर जतिबेला ढलेको जामुनको रुख हटाउने निर्णय गरिन्छ, त्यतिबेलासम्म रुखले च्यापिएको त्यो मान्छेको मृत्यु भइसक्छ ।
चन्दरको यो बेजोड कथा तत्कालीन भारतको सुस्त र कथित प्रक्रियामुखी सरकारी काम कारवाहीमाथिको सानदार व्यंग्य थियो । अहिले विश्वको चौथो अर्थतन्त्र भारतमा लाल फीताशाही त कहाँ न कहाँ कम भयो भनिन्छ । तर, चन्दरको उक्त कथा नेपालको सरकारी काम कारबाहीसँग धेरै हदसम्म मेल खान्छ ।
(नेपाल भ्यूजमा 13 साउन 2082 मा संजीव सत्गैंयाले लेख्नुभएको 'चरम घामले लागेको सुक्खामा (कु)शासनको रुखमुनि थिचिएका जनता' टिप्पणीबाट साभार गरिएको केही अंश/ स्केचको स्रोत : Nepalviews)

Friday, 13 June 2025

गोरखापत्रको मैथिली पृष्ठ : शैलीगत त्रुटिहरू !

गोरखापत्रको मैथिली पृष्ठमा देखिएको शैलीगत त्रुटिहरू उदेक लाग्दा छन् । भाषाप्रति नै वितृष्णा बढाउने यी त्रुटि र शैलीमा तत्काल सुधारको खाँचो छ । यो ब्लग मैथिलीको विकृत भाषागत शैली,भाषिक एकरूपता र सांस्कृतिक संवेदनशीलतामा केन्द्रित छ ।
●शैलीगत विसंगति र व्याकरणीय त्रुटि:
गोरखापत्र दैनिकको २०८२ जेठ २ गते प्रकाशित मैथिली भाषा पृष्ठमा पटक-पटक दोहरिदै आएको अक्षम त्रुटिहरूप्रति मेरो व्यक्तिगत ध्यानार्षण भएको छ । ती त्रुटिहरू पहिलो होइन, अन्तिम पनि नहुने देखिन्छ । पृष्ठमा पटक-पटक देखिने केही शैलीहरूले सुधारको संभावनालाई निस्तेज गरेको छ ।'मे'/'के', 'सँ'/'स', 'छन्हि'/'छनि', 'सभ'/'सब', 'नई'/'नहि' जस्ता शब्दहरूको असंगत प्रयोग शैलीले मैथिली भाषाप्रतिको हेलचक्राईलाई पुष्टि गर्छ । यसलाई एउटा गम्भीर चुनौती कै रूपमा व्याख्या गर्न सकिन्छ ।
पत्रकारितामा भाषिक एकरूपता पाठकको विश्वास र सामग्रीको स्पष्टताका लागि अनिवार्य हुन्छ। गोरखापत्रजस्तो राष्ट्रिय दैनिकमा यस्ता त्रुटिहरूले पाठकको विश्वसनीयतामाथि प्रश्न उठाउँछ । उदाहरणका लागि, 'देश/विदेश', 'देश-विदेश' वा 'देश या विदेश' जस्ता फरक शैलीहरूले सम्पादकीय लापरवाही र मानक शब्दावलीप्रति उदासीनता पनि झल्काउँछ।
●शब्द चयन र सांस्कृतिक सन्दर्भ:
'बिराजमान' शब्दको प्रयोग निर्जीव वस्तुका सन्दर्भमा अनुपयुक्त छ, किनभने यो शब्द सामान्यतः जीवित वा पूजनीय व्यक्तित्वका लागि प्रयोग हुन्छ । त्यसैगरी, 'देवपुरुष' शब्दको प्रयोग 'गोसाईं' वा 'देवतापितर' जस्ता स्थानीय र सांस्कृतिक रूपमा स्वीकार्य शब्दहरूको तुलनामा बेमेल देखिन्छ । यस्ता शब्दहरूले मैथिलीको लोकमैत्रीपूर्ण शैली र सांस्कृतिक पहिचानलाई कमजोर बनाउँछ । पत्रकारिता र साहित्यमा स्थानीय भाषिक संवेदनशीलता र चलनलाई प्राथमिकता दिनु आवश्यक छ ।
●भाषिक दोहराव र कमजोर संरचना:
यो अंकको मुख्य सामग्रीमा शीर्षकका शब्दहरूको बारम्बार दोहरावले लेखनको गुणस्तरलाई कमजोर बनाएको छ । यो दोहरावले पाठकको ध्यान भट्काउँछ र सामग्रीको प्रभावकारिता घटाउँछ । साथै, विरोधाभासपूर्ण भाषाशैलीले पाठकमा भ्रम सिर्जना गर्न सक्छ। उदाहरणका लागि,'जनकविताक कालजयी शिल्प: भगैत' शीर्षकको सामग्रीमा सांस्कृतिक र व्याकरणिक त्रुटिहरूले लेखको विश्वसनीयतामाथि प्रश्न उठाउँछ ।
●सम्पादकीय जवाफदेहिता:
गोरखापत्रजस्तो स्थापित मिडियामा यस्ता त्रुटिहरू दोहोरिनु सम्पादकीय प्रक्रियाको कमजोरीको संकेत हो । मैथिली भाषाको पृष्ठलाई गुणस्तरीय बनाउन सम्पादक, लेखक र भाषाविद्हरूको सहकार्य आवश्यक छ । पृष्ठ संयोजकको अक्षम लापारवाही छताछुल्ल छ । स्पष्ट दिशानिर्देश,सम्पादकीय दायित्वको वेवास्ता भाषिक ज्ञानको अभाव र प्रशिक्षणको कमीले यस्ता समस्याहरू बारम्बार दोहोरिरहेका छन्।
●सुझाव:
-मैथिली भाषाका लागि व्याकरण, शब्दावली, र लेखन शैलीको मानक दस्तावेज तयार गर्नुपर्छ। यसले विसंगतिहरूलाई कम गर्न मद्दत गर्छ।
-मैथिलीको लोकजीवन र सांस्कृतिक सन्दर्भलाई ध्यानमा राखेर शब्द चयन गर्नुपर्छ । उदाहरणका लागि, 'देवपुरुष'को सट्टा 'गोसाईं' वा 'देवतापितर' जस्ता शब्दहरू प्रयोग गर्नु उपयुक्त हुन्छ।
-सामग्री प्रकाशन गर्नुअघि कडा सम्पादकीय जाँच र भाषिक विशेषज्ञको संलग्नता आवश्यक छ ।
-पाठकहरूको प्रतिक्रिया संकलन गरी त्रुटिहरूलाई सुधार गर्ने प्रक्रिया स्थापित गर्नुपर्छ।
●निष्कर्ष : गोरखापत्रको मैथिली पृष्ठमा देखिएका यी त्रुटिहरूले भाषिक गुणस्तर र सम्पादकीय जिम्मेवारीमा सुधारको आवश्यकता देखाउँछ। मैथिली भाषा र संस्कृतिको संरक्षण र प्रवर्द्धनका लागि यस्ता समस्याहरूलाई गम्भीरतापूर्वक सम्बोधन गर्नुपर्छ। बुद्धिजीवी र सुधि पाठकहरूको सहभागिताले यस्ता मुद्दाहरूलाई उजागर गर्न र सुधारका लागि दबाब सिर्जना गर्न महत्त्वपूर्ण भूमिका खेल्न सक्छ । ●दिनेश यादव
द्रष्टव्य : यस ब्लगमा उल्लेखित विचार मेरो नितान्त व्यक्तिगत हो ।

मैथिली भाषा : पृष्ठ एक, शैली अनेक

राष्ट्रिय दैनिक गोरखापत्रमें मासिक रूपसँ प्रकाशित होएवाला मैथिली पृष्टमें बेर-बेर भँ रहल अक्षम्य त्रुटी पुन: दोहराओल गेल अछि । निचा देल गेल २०८२ जेठ २ गते शुक दिनक मैथिली भाषा पृष्ठ एक साक्षात प्रमाण थिक । एकैह पृष्ठमें अनेकन शैली फेरसँ पुनरावृत्ति भेल छै (पृष्ठ देखू) । फोटो क्याप्सन सहितके पाँचटा सामग्रीमे पृथ्थक-पृथ्थक शैली देखाइत अछि । मुख्य सामग्रीमे शीर्षकमें उल्लेखित शब्दाबली एकर विषयवस्तुके प्रायः हरेक वाक्यमें दोहराओल गेल छै । एहि सामग्रीमें भाषाशैली विरोधाभाषपूर्ण आ कमजोर छै । उदाहरण : 'बिराजमान' शब्दक प्रयोग निर्जीवताक भाष्यमें प्रयोग भेल अछि । तहिना कतौहू 'देश/विदेश', कतौहू 'देश-विदेश' आ 'देश या विदेश' लिखल छै ? कतौहू 'नई'कतौहू 'नहि'के प्रयोग छै । 'सभ' आ 'सब'के प्रयोग व्याकरणीय दृष्टिसँ बेमेल छै । ई शब्दक प्रयोग समग्र पृष्ठमें फरक -फरक भेटैछ..।
समग्र पृष्ठमे, 'मे','के', 'सँ' आदिके प्रयोगमे एकरूपता नहि छै । कतौहू 'छन्हि',कतौहू 'छनि'...लिखल भेटैछ । 'जनकविताक कालजयी शिल्प:भगैत'शीर्षक सामग्रीमे 'देवपुरूष'शब्दक प्रयोग लोकजन आ लोकमैथिलीसँ बेमेल अछि .....'गोसाईं' या 'देवतापित्तर' चलनक शैली अछि..। एतेह,समग्र पृष्ठमे चिन्हित अक्षरसब प्रमाणके लेल प्रस्तुत् अछि । ...बाँकी बुद्धिजीवि आ सुधि पाठक लोकैन पर निर्णय करबाक हक हस्तान्तरण कए रहल छी ।

Sunday, 20 April 2025

मिथिलामे ब्राह्मणवादक उन्नयन आ उपचार : एक विश्लेषण

@दिनेश_यादव
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव एक जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक मुद्दा छी, जे मिथिला क्षेत्र (मुख्यतः बिहारक उत्तरी भाग आ नेपालक मधेश क्षेत्र) के सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक परम्परा, आ शक्ति संतुलन सँ गहिर ढंग सँ जुड़ल अछि। एकटा आलोचनात्मक विश्लेषणक लेल, हम एहि प्रभावक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक गतिशीलता, आ एकर समकालीन परिणामसबके आलोचनात्मक चर्चा एतह करब। एकगोट जानकारी कराब'चाहब जे अहि आलेखमे 'मिथिला' शब्दक प्रयोग प्रतिकात्मक अछि, किएक त अखन ओ शब्द क्षतविक्षत अछि,अखन सरकारी दस्तावेज सबमे ओकर प्रयोग, उपयोग आ सान्दर्भिकता विलुप्त अछि । आब 'मैथिलीभाषी क्षेत्र' कहनाए समचिनी, उचित आ बेस रहत । प्रवुद्ध पाठक लोकैन 'माथिला'के ओहे रूपमे लेबाक विनम्र निवेदन अछि । चलू आजुक विषयवस्तुदिशि प्रवेश करैत छी :-
खंड-एक
●ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:- मिथिला क्षेत्र प्राचीन काल सँ विद्या, संस्कृति, आ धर्मक केंद्र रहल अछि। मैथिल ब्राह्मण, जे क्षेत्रक सामाजिक संरचनामे 'उच्च स्थान !' राखैत छथि, ऐतिहासिक रूप सँ पुरोहित, विद्वान, आ सामाजिक नेतृत्वक भूमिका मे रहल छथि। वैदिक धर्म आ ब्राह्मणवादी परम्पराक प्रभाव मिथिलामे गहिर रहल अछि, जे मण्डन मिश्र आ याज्ञवल्क्य जकाँ विद्वानक लेखन आ दर्शनमे देखल जाइत अछि।
ब्राह्मणवाद, जे जातिगत श्रेणी आ धार्मिक कर्मकांड पर आधारित विचारधारा अछि, मिथिलामे सामाजिक संरचनाक आधार बनल। पंजी प्रबन्ध (मैथिल ब्राह्मणक वंशावली राखबाक पर-परम्परा) जकाँ प्रथासब मैथिल ब्राह्मणक सामाजिक प्रभावकें मजबूत करैत अछि, जे किछु विद्वानसभ एकटा सामाजिक नियंत्रणक साधनक रूपमे देखैत छथि।
ऐतिहासिक रूपसँ, ब्राह्मणवादी प्रभाव ब्रिटिश औपनिवेशिक कालमे आओर बढ़ल, जब ब्राह्मणसभ ब्रिटिश प्रशासनक सलाहकार बनल आ हिन्दू धर्मक व्याख्यामे ब्राह्मणवादी ग्रन्थसबके उपयोग भेल। ई मिथिलामे आओर स्पष्ट छल, जतय मैथिल ब्राह्मणसभक बौद्धिक आ सामाजिक प्रभुत्व स्थापित भेल।
●सामाजिक गतिशीलता:- मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभावक सामाजिक गतिशीलता निम्नलिखित बिन्दुसबमे देखल जा सकैत अछि:-
●जातिगत संरचना:- मिथिलामे जाति व्यवस्था गहिर जड़ जमायल अछि, जाहिमे मैथिल ब्राह्मण शीर्ष पर छथि। ई संरचना सामाजिक, आर्थिक, आ राजनीतिक शक्तिकें सीमित करैत अछि, जाहिसँ गैर-ब्राह्मण समुदाय, विशेष रूपसँ दलित आ पिछड़ल वर्ग, हाशियापर रहैत छथि। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, जे जाति आ लिंगक आधार पर भेदभावकें बढ़ावा दैत अछि, मिथिलामे महिलाक स्थितिकें आओर जटिल बनबैत अछि।
●सांस्कृतिक प्रभुत्व:- मैथिल ब्राह्मणसभ मिथिला कला, साहित्य, आ सांस्कृतिक परम्परासबमे महत्वपूर्ण भूमिका निभबैत छथि। मैथिलीभाषा आ साहित्य, जे क्षेत्रक पहचान छी, मे ब्राह्मणवादी मूल्यसबक प्रभाव देखल जाइत अछि। उदाहरण लेल, मिथिलाक पौराणिके कथासब आ साहित्य, जेना सीता-रामक कथा, मे ब्राह्मणवादी नैतिकता आ आदर्शक प्रचार भेटैत अछि।
●आर्थिक नियंत्रण:- मिथिलामे जमींदारी व्यवस्था, जे ब्राह्मण आ उच्च जातिक नियंत्रणमे छल, सामाजिक असमानताकें बढ़ा देलक। ऐतिहासिक रूपसँ, मैथिल ब्राह्मण जमींदार छलथि, जे क्षेत्रक आर्थिक संसाधन पर नियंत्रण राखैत छलथि।
●राजनीतिक प्रभाव:- 1960-70 क दशकमे मिथिलामे मैथिल ब्राह्मणसभ राजनीतिक रूपसँ प्रभावशाली बनल। हिंदुत्व आ ब्राह्मणवादी राष्ट्रवादक उदयसँ, मिथिलामे गैर-ब्राह्मण समुदायसभक आवाजकें दबा देल गेल। ● आलोचनात्मक विश्लेषण:-
ब्राह्मणवादी प्रभावक आलोचना निम्नलिखित आधार पर कायल जा सकैत अछि:-
●सामाजिक असमानता: ब्राह्मणवाद मिथिलामे सामाजिक असमानताकें बनाय राखैत अछि। जातिगत श्रेणी आ पितृसत्ताक आधार पर संसाधन आ अवसरक असमान वितरण गैर-ब्राह्मण समुदायसभक विकासकें रोकैत अछि। उदाहरण लेल, दलित आ ओबीसी समुदायसभक शिक्षा आ रोजगारमे पहुँच सीमित रहैत अछि।
●सांस्कृतिक एकरूपता:- ब्राह्मणवादी प्रभाव मिथिलाक सांस्कृतिक विविधता कें सीमित करैत अछि। गैर-ब्राह्मण परम्परासब, जेना लोककला आ धार्मिक विश्वास, कें हाशियापर धकेल देल जाइत अछि। ई क्षेत्रक समावेशी सांस्कृतिक पहचानकें कमजोर करैत अछि।
●पितृसत्ताक सुदृढ़ीकरण:- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता मिथिलामे लिंग आधारित भेदभावकें बढ़ावा दैत अछि। महिलासभकें सामाजिक आ आर्थिक रूपसँ हाशियापर राखल जाइत अछि, आ एकर प्रभाव विशेष रूपसँ निम्न जातिक महिलासभ पर पड़ैत अछि।
●आधुनिक समयमे प्रासंगिकता:- आधुनिक समयमे, शिक्षा आ वैश्वीकरणसँ मिथिलामे सामाजिक चेतना बढ़ल अछि, आ ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ आवाज उठैत अछि। दलित-बहुजन आंदोलन, जे आंबेडकरक विचारधारासँ प्रेरित अछि, ब्राह्मणवादक खिलाफ समतामूलक समाजक वकालत करैत अछि। मुदा, हिंदुत्वक उदयसँ ब्राह्मणवादी प्रभाव नव रूपमे मजबूत भेल अछि। ●विरोधी स्वर आ समाधान
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ किछु उल्लेखनीय विरोधी स्वर सामने आयल अछि। आंबेडकरवादी विचारधारा, जे जाति आ वर्गविहीन समाजक पक्षधर अछि, मिथिलामे दलित-बहुजनक बीच लोकप्रिय भेल अछि। मिथिलाक सामाजिक कार्यकर्ता आ बुद्धिजीवी, जे गैर-ब्राह्मण समुदायसँ आबैत छथि, क्षेत्रक सांस्कृतिक आ सामाजिक संरचनामे परिवर्तनक मांग करैत छथि।
समाधानक रूपमे, निम्नलिखित कदम उपयोगी भ सकैत अछि:-
●शिक्षा आ जागरूकता:- सामाजिक समानता आ समावेशिता पर आधारित शिक्षा प्रणाली ब्राह्मणवादी प्रभाव कें कम करि सकैत अछि।
●सांस्कृतिक पुनर्जन्म:- गैर-ब्राह्मण परम्परासभ कें प्रोत्साहन देबाक द्वारा मिथिलाक सांस्कृतिक विविधताकें पुनर्जन्म कायल जा सकैत अछि।
●राजनीतिक सशक्तिकरण:- गैर-ब्राह्मण समुदायसभक राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ेबाकद्वारा सामाजिक शक्ति संतुलन कायम कायल जा सकैत अछि।
●निष्कर्ष:- मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव एक ऐतिहासिक आ सामाजिक वास्तविकता अछि, जे क्षेत्रक सामाजिक संरचना, संस्कृति, आ शक्ति संतुलन कें गहिर प्रभावित करैत अछि। एकर सकारात्मक पहलू, जेना बौद्धिक परम्परा आ सांस्कृतिक योगदान, के साथ-साथ एकर नकारात्मक प्रभाव, जेना सामाजिक असमानता आ सांस्कृतिक एकरूपता, कें मान्यता देब जरूरी अछि। आधुनिक समयमे, मिथिलामे सामाजिक परिवर्तनक लेल ब्राह्मणवादी प्रभावक आलोचनात्मक जाँच आ समावेशी समाजक निर्माण जरूरी अछि।
खंड-दू
अहि खंडमे मिथिलामे ब्राहमणवादक विशिष्ट उदाहरण, साहित्यिक विश्लेषण, वा समकालीन घटनाक आधार पर आलोचना कएल गेल अछि ।
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभावक आलोचनात्मक विश्लेषणक लेल विशिष्ट उदाहरण, साहित्यिक कृति, आ समकालीन घटनासबके आधार पर निम्नलिखित बिन्दु प्रस्तुत कायल गेल अछि:
● विशिष्ट उदाहरण:-
●पंजी प्रबन्ध:- मिथिलामे मैथिल ब्राह्मणसभक पंजी प्रबन्ध (वंशावली राखबाक प्रथा) ब्राह्मणवादी प्रभावक एकटा ठोस उदाहरण अछि। ई प्रथा केवल वंशावलीक रिकॉर्ड नहि, बल्कि सामाजिक नियंत्रणक साधनक रूपमे काम करैत अछि। पंजी प्रबन्धक आधार पर विवाह, सामाजिक स्थिति, आ जातिगत शुद्धताक निर्धारण होइत अछि, जे गैर-ब्राह्मण समुदायसभक हाशियापर धकेलैत अछि। ई प्रथा ब्राह्मणवादी श्रेष्ठताक भावकें बनाय राखैत अछि आ सामाजिक गतिशीलताकें सीमित करैत अछि। मधुबनी चित्रकला: मिथिलाक प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकला, जे विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त अछि, मे ब्राह्मणवादी प्रभाव स्पष्ट अछि। प्रारम्भमे, ई कला मुख्यतः ब्राह्मण आ कायस्थ महिलासभद्वारा बनायल जाइत छल, आ एकर विषयवस्तु (जेना- रामायण, महाभारत, आ वैदिक प्रतीक) मे ब्राह्मणवादी मूल्यसबके प्रभुत्व रहल अछि। गैर-ब्राह्मण समुदायसभक लोककथा वा परम्परासबकें कम महत्व देल गेल। ●साहित्यिक विश्लेषण:- मिथिलाक साहित्य, विशेष रूपसँ मैथिली आ हिन्दी साहित्य, मे ब्राह्मणवादी प्रभावक विश्लेषण निम्नलिखित कृतिसबके माध्यमसँ कायल जा सकैत अछि:-
●विद्यापति (14वीं-15वीं शताब्दी):- मिथिलाक महान कवि विद्यापति, जे मिथिली साहित्यक आधारस्तम्भ छथि, अपन रचनासबमे ब्राह्मणवादी मूल्यसबक प्रचार करैत छथि। ओकर पदावली, जे राधा-कृष्णक प्रेमक गीत अछि, वैष्णव भक्ति आ ब्राह्मणवादी दर्शनसँ प्रेरित अछि। विद्यापतिक रचनासबमे सामंती संरचना आ ब्राह्मणवादी नैतिकताक समर्थन देखल जाइत अछि, जाहिमे निम्न वर्गक चित्रण प्रायः अनुपस्थित रहैत अछि। आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी अपन पुस्तक हिन्दी आलोचनामे विद्यापतिक रचनासबकें ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक प्रभुत्वक उदाहरणक रूपमे देखैत छथि, जाहिमे लोकजीवनक तुलनामे वैदिक आदर्शसबकें प्राथमिकता देल गेल अछि।
●नागार्जुनक मैथिली कविता :-आधुनिक मैथिली कवि नागार्जुन (1911-1998) अपन रचनासबमे ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ तीखा आलोचना कयलथि। हुनकर कविता हरिजन गाथामे मिथिलाक दलित समुदायक शोषण आ ब्राह्मणवादी व्यवस्थाकद्वारा ओकर हाशियाकरणकें चित्रित कायल गेल अछि। नागार्जुनक मार्क्सवादी दृष्टिकोण मिथिलाक सामंती आ ब्राह्मणवादी संरचनाक खिलाफ एकटा वैकल्पिक आवाज प्रदान करैत अछि। आलोचक रामविलास शर्मा अपन लेखनमे नागार्जुनक रचनासबकें मिथिलामे वर्ग-संघर्षक साहित्यिक अभिव्यक्तिक रूपमे देखैत छथि।
●मन्नू भंडारीक महाभोज: यद्यपि मन्नू भंडारी मिथिलाक नहि छथि, तथापि ओकर उपन्यास महाभोज (1979) मिथिलाक सामाजिक संरचनाक आलोचनाक लेल प्रासंगिक अछि। ई उपन्यास ग्रामीण भारतमे जातिगत शोषण आ ब्राह्मणवादी राजनीतिक प्रभावकें उजागर करैत अछि। मिथिलाक सन्दर्भमे, महाभोज 'उच्च जातिक (मुख्यतः ब्राह्मण) ' मुखियासभद्वारा निम्न जातिक समुदायसभक शोषणक चित्रण मिथिलाक समकालीन सामाजिक वास्तविकताक संग मेल खाइत अछि। उपन्यासक भाषा आ चरित्र-चित्रण मिथिलाक सामंती संरचनाक आलोचनाकें और गहिर बनबैत अछि।
●समकालीन घटनासभक आधार पर आलोचना
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव समकालीन समयमे विभिन्न सामाजिक आ राजनीतिक घटनासबमे देखल जा सकैत अछि:
●जातिगत हिंसा (2023-2024):- मिथिलाक दरभंगा आ मधुबनी क्षेत्रसबमे हालक वर्षसबमे दलित आ ओबीसी समुदायसभ पर हमलाक खबर सामने आयल अछि, जे प्रायः उच्च जातिक (मुख्यतः ब्राह्मण आ राजपूत) जमींदारसभसँ जुड़ल रहल अछि। उदाहरण लेल, 2023 मे मधुबनीमे एकटा दलित बस्तीमे आगजनीक घटना, जे कथित रूपसँ जमीन विवादसँ जुड़ल छल, ब्राह्मणवादी आर्थिक प्रभुत्वक परिणामक रूपमे देखल गेल। ई घटना सामंती संरचना आ ब्राह्मणवादी शक्तिकें बनाय राखबाक प्रवृत्ति कें दर्शबैत अछि।
●हिंदुत्वक उदय:- मिथिलामे हिंदुत्वक बढ़ैत प्रभाव ब्राह्मणवादी मूल्यसबकें नव रूपमे मजबूत करैत अछि। 2024 मे अयोध्यामे राम मंदिरक उद्घाटनक बाद मिथिलामे धार्मिक उत्सवसबमे ब्राह्मणवादी प्रतीकसब (जेना- राम-सीता आ वैदिक कर्मकांड) कें प्राथमिकता देल गेल। ई प्रवृत्ति गैर-ब्राह्मण समुदायसभक सांस्कृतिक पहचानकें हाशियापर धकेलैत अछि। उदाहरण लेल, मिथिलाक लोक परम्परासब, जेना साल्हेस पूजा (दलित समुदायक बीच लोकप्रिय), कें कम महत्व देल गेल।
●शिक्षा आ रोजगारमे असमानता:- मिथिलाक विश्वविद्यालयसब, जेना ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, मे ब्राह्मण आ उच्च जातिक प्राध्यापकसभक प्रभुत्व देखल जाइत अछि। 2024 मे एकटा सर्वेक्षणमे पाएल गेल जे मिथिलाक उच्च शिक्षण संस्थानसबमे दलित आ ओबीसी समुदायसभक प्रतिनिधित्व मात्र 15% अछि, जखन कि ब्राह्मण आ कायस्थ 60% सँ बेसी अछि। ई असमानता ब्राह्मणवादी प्रभावक एकटा समकालीन उदाहरण अछि, जे सामाजिक गतिशीलताकें रोकैत अछि।
●आलोचनात्मक दृष्टिकोण:-
●सामाजिक असमानता:- उपरोक्त उदाहरणसब (पंजी प्रबन्ध, जातिगत हिंसा, शिक्षा असमानता) ब्राह्मणवादी प्रभावकद्वारा सामाजिक असमानताकें बनाय राखबाक प्रवृत्तिकें दर्शबैत अछि। मार्क्सवादी आलोचक, जेना रामविलास शर्मा, मिथिलाक सामंती संरचनाकें वर्ग-संघर्षक परिणामक रूपमे देखैत छथि, जाहिमे ब्राह्मणवादी विचारधारा शोषणकें वैध ठहरबैत अछि।
●सांस्कृतिक एकरूपता:- मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परासब, जेना मधुबनी चित्रकला आ विद्यापतिक रचनासब, मे ब्राह्मणवादी प्रभाव गैर-ब्राह्मण समुदायसभक सांस्कृतिक योगदानकें हाशियापर धकेलैत अछि। समकालीन घटनासब- हिंदुत्वक प्रचार, ई एकरूपताकें और बढ़ा दैत अछि, जे मिथिलाक बहुसांस्कृतिक पहचानकें कमजोर करैत अछि।
●प्रतिरोधक स्वर:- नागार्जुन जेहन साहित्यकार आ मिथिलाक दलित-बहुजन आंदोलन ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ प्रतिरोधक स्वर प्रस्तुत करैत अछि। समकालीन समयमे, मिथिलाक सामाजिक कार्यकर्ता, जस्ते कि बिहारक दलित नेता जीतन राम मांझी, ब्राह्मणवादी शक्ति संरचनाक खिलाफ समतामूलक समाजक वकालत करैत छथि।
● निष्कर्ष:-
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आ समकालीन स्तर पर सामाजिक संरचनाकें प्रभावित करैत अछि। पंजी प्रबन्ध आ मधुबनी चित्रकला जस्ता उदाहरण, विद्यापति आ नागार्जुनक साहित्यिक कृतिसब, आ समकालीन घटनासब (जेना- जातिगत हिंसा आ हिंदुत्वक उदय) ई दर्शबैत अछि कि ब्राह्मणवादी विचारधारा सामाजिक असमानता आ सांस्कृतिक एकरूपताकें बढ़ावा दैत अछि। मुदा, नागार्जुन जस्ता साहित्यकार आ दलित-बहुजन आंदोलनसभक प्रतिरोध ई संकेत दैत अछि कि मिथिलामे परिवर्तनक सम्भावना अछि। समावेशी शिक्षा, सांस्कृतिक विविधताक प्रोत्साहन, आ गैर-ब्राह्मण समुदायसभक राजनीतिक सशक्तिकरण द्वारा ब्राह्मणवादी प्रभाव कें कम कायल जा सकैत अछि। नोट: शोध पर आधारित ई आलेख हमर नितान्त व्यक्तिगत विचार प्रस्तुति थिक ।
सन्दर्भ सामग्री :
1.forwardpress.in ,
2.hi.wikipedia.org
3.doubtnut.com
4.egyankosh.ac.in
5.mediavigil.com
6.drishiias.com
7.brainly.in
8.textbook.com
9.maithilmanch.in
10.etvbharat.com
11.tv9hindi.com
12.navbharattimes.indiatimes.com

Saturday, 19 April 2025

मैथिली भाषाके हुर्मत् !

मैथिली भाषाके हुर्मत् कोना होइछ या कएल जाइछ, से जनितब रखबाक किनको इच्छा जौ अछि त, निचा देलगेल गोरखापत्रके दूटा नमुना अंकसँ देखबाक विनम्र आग्रह अछि । कथित मानक मैथिलीबलासभ आब मैथिलीके नामपर गिरहताइपना सेहो आरम्भ कएलक अछि तकर पुष्टि सेहो ई सामग्री निक जँका करैछ । फगुवा आ जुडशितलके दिन प्रकाशित ई दूटा अंक उदाहरण मात्र थिक । आश्चर्यके बात अछि अहि पर आजूधरि किनको टिप्पणी पढबाक अवसर नहि भेटल अछि ! गोरखापत्रकें मैथिली भाषाके पृष्ट संयोजक बेनाथल बरद कोनाके बनल अछि तकरो विपुल दृष्टिगोचर करबामे ई अंक सफल भेल बुझाइछ ! 'अपन गाडि, अपन लगाम, अपन गरदामि, अपन घूघुर 'तर्जपर भेल अहि तरहे कूकृत्यके जिमेवार के ??

Saturday, 12 April 2025

'मिथिला' बनाम 'लोकमैथिली भाषी क्षेत्र' !

दिनेश यादव
अखन 'मिथिला' नय 'प्राचीन मिथिला'शब्दावलीक प्रयोग उचित अछि । आब उपयुक्त शब्दावली त 'लोकमैथिली भाषी क्षेत्र' होबाक चाहि । किएक त,'मिथिला' आब रहिए नै गेलछ! वर्तमान सीमा,भूगोल आ सरकारी दस्तावेज सबमे सेहो 'मिथिला' नै भेटैत छैक...एही विषयपर हमर एकटा विश्लेषणात्मक आलेख-
परिचय:
‘मिथिला’शब्द 'लोकमैथिली भाषी क्षेत्रक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक आ साहित्यिक परिदृश्यमें गहन महत्व राखैछ । प्राचीन काल में 'मिथिला' एक समृद्ध राज्य छल, जे विदेह, तीरभुक्ति या तिरहुत नामसँ सेहो जानल जाइत छल । एकर सांस्कृतिक आ बौद्धिक परंपरा, विशेष रूप सँ लोकमैथिली भाषा आ साहित्य, आजुक दिन धरि जीवित छै। मुदा प्रश्न उठैछ जे की आधुनिक संदर्भमें ‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग उचित छै, या फेर ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्दावली बेशी उपयुक्त होयत ? एकर कारण छै जे वर्तमान भौगोलिक, प्रशासनिक आ सरकारी दस्तावेजसबमें ‘मिथिला’नामक कोनो स्वतंत्र इकाई नै भेटैछ । नेपालक मधेश प्रदेशमे 'मिथिला' शब्द जोडिके 'मिथिला बिहारी पालिका जरूर बनल अछि । मुदा स्वतन्त्र अस्तित्वमे 'मिथिला' मात्र नय बनि सकल । ई बाहेक 'मिथिला'सँ जुडल आधिकारिक नाम वर्तमान संदर्भमें कतौहू उल्लेख कयल नय भेटैक छैक । हाँ, किछु लोकसभ जबर्दस्ती 'मिथिला' लिखि आ बोलि रहल छैथ । विषेष:ब्राह्मणवादी मानसिकता रहल लोकसभ एही शब्दक प्रयोग बलजोरि करि एकर प्रचार-प्रसारमें अपन छठिहारक दूध पीबिक करि रहल छैथ !
प्राचीन मिथिला: ऐतिहासिक संदर्भ :
प्राचीन मिथिला एक शक्तिशाली राज्य छल, जकर उल्लेख शतपथ ब्राह्मण, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत, पुराण आ जैन-बौद्ध ग्रंथसबमें भेटैछ। ओ मिथिला, जे विदेह राजाक राजधानी छल, बौद्धिक आ सांस्कृतिक केंद्रक रूपमें विख्यात छल। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार, मिथिला नदीक बहुलताक कारण दलदली भूमि छल, जे अग्निदेवक आशीर्वाद सँ रहबा योग्य बनल । वृहद्विष्णु पुराणमें मिथिला-माहात्म्य खंड मिथिलाक पवित्रता आ सीताक जन्मभूमिक रूपमें एकर महिमा वर्णन भेटैक छैक । मुदा ई सबटा के आधार अवैज्ञानिक मात्र अछि ।
जहाधरि सीमाक बात अछि- प्राचीन मिथिलाक भौगोलिक सीमा विशाल छल। एकर पश्चिममें गंडकी, पूबमें महानंदा, दक्षिणमें गंगा आ उत्तरमें हिमालयक तलहटी(नेपालक वर्तमानमधेश प्रदेश आ कोशी प्रदेश किछु भूभाग) तक विस्तार छल। ई क्षेत्र वर्तमान बिहारक उत्तरी हिस्सा, नेपालक मधेश आ झारखंडक संथाल परगना तक फैलल छल । मुदा, मध्यकालसँ मिथिलाक राजनीतिक इकाईक रूप धीरे-धीरे लुप्त भ’ गेल, आ तिरहुत सरकारक रूपमें एकर उल्लेख आयनी-अकबरी में भेटैछ।
वर्तमान संदर्भ: मिथिला कत’ गेल ?
आजुक दिनमें ‘मिथिला’ कुनो प्रशासनिक या सरकारी इकाईक रूपमें अस्तित्वमें नय छै। पडोसी देश भारतक संविधान, भौगोलिक मानचित्र, या सरकारी दस्तावेजसब में ‘मिथिला’ नामक कुनो जिला, प्रखंड या राज्यक उल्लेख नहिं भेटैछ । नेपालमे त छहिए नय । बिहार में तिरहुत, दरभंगा, कोसी, पूर्णिया आ मुंगेर जकाँ प्रमंडल भौगोलिक रूपसँ मिथिलाक पुरान सीमासँ मेल खाइछ, मुदा प्रशासनिक रूपसँ एहि सबहक अलग-अलग पहचान छै। उदाहरणक लेल, बिहारक जिला जकाँ दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल, सहरसा आ मधेपुरा मैथिली भाषी क्षेत्रक प्रमुख हिस्सा छै, मुदा सरकारी दस्तावेजमें एहि सबकें मिथिला नय, बल्कि अलग-अलग जिला कहल जाइछ।
पहिने ही उल्लेख कए चुकल छी जे, नेपालमें सेहो मधेश आ कोशी प्रदेशक तराई क्षेत्र मैथिली भाषी छै, मुदा एकर प्रशासनिक नामकरण मिथिलासँ संबंधित नय छै। भारतक 2011 जनगणनाक आधार पर, मैथिली भाषी जनसंख्या बिहारक उत्तरी हिस्सा आ नेपालक मधेशमें केंद्रित छै, मुदा ‘मिथिला’ नामक कुनो आधिकारिक क्षेत्र नय भेटैछ।
‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’क उपयुक्तता:
‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्दावली वर्तमान संदर्भमें बेशी उपयुक्त प्रतीत होइछ, किएक त ई मैथिली भाषा आ एकर बोलनिहार समुदायक सांस्कृतिक एकता पर जोर दैछ, बिना कुनो लुप्त राजनीतिक या भौगोलिक इकाईक दावा करबाक । मैथिली, जे भारतीय संविधानक आठवीं अनुसूचीमें शामिल छै, बिहारक लगभग 12% आ नेपालक मधेशक एक बृहद हिस्साक मातृभाषा छै। ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्द एकर सांस्कृतिक पहचानकें जीवित राखैछ, जेना जे विद्यापति, मिथिलाक्षर (तिरहुता) लिपि, आ मिथिला चित्रकला जकाँ परंपरासब।
उदाहरण - मिथिला चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग) आजू विश्वविख्यात छै, आ एकर पहचान मधुबनी जिलासँ जुड़ल छै,नय कि कुनो ‘मिथिला’ नामक प्रशासनिक क्षेत्रसँ । ताहि तरहें, मैथिली साहित्यक संरक्षण आ प्रचार मिथिलाक्षर लिपि आ साहित्यिक संस्था जकाँ विद्यापति सेवा संस्थानक माध्यमसँ भ’ रहल छै, जे क्षेत्र विशेषक बजाय महाकवि, भाषा आ संस्कृति पर केंद्रित छै।
‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग: पक्ष आ विपक्षमें तर्क:
सांस्कृतिक निरंतरता: मिथिला शब्द सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक गौरवकें प्रतिबिंबित करैछ । मिथिलाक बौद्धिक परंपरा, जेना जे याज्ञवल्क्य, गार्गी, आ विद्यापति, आजू सेहो प्रासंगिक छै।
लोकमानसमें स्वीकार्यता: सामान्य लोक मिथिलाकें सीताक जन्मभूमि आ मैथिली संस्कृतिक प्रतीकक रूपमें देखैछ।
प्रतीकात्मक महत्व: मिथिला शब्द एकर साहित्य, कला, आ दर्शनक समृद्धिक प्रतीक छै, जे क्षेत्रीय सीमासँ परे छै।
विपक्षमें तर्क:
प्रशासनिक असंगति: आधुनिक भूगोल आ सरकारी दस्तावेज सबमें मिथिला कुनो स्वतंत्र इकाई नय छै। एकर प्रयोग भ्रम पैदा करैछ, जेना जे मिथिलाकें एक अलग राज्यक मांग सँ जोड़ल जाइछ।
सीमित भौगोलिक प्रासंगिकता: मिथिलाक प्राचीन सीमा आधुनिक जिला-प्रमंडलसँ मेल नय खाइछ। उदाहरण, कोसी प्रमंडलक किछु हिस्सा मिथिलाक अंतर्गत गनल जाइछ, मुदा एकर संस्कृति अंगिका या अन्य प्रभाव सँ सेहो जुड़ल छै। गण्डक क्षेत्र बज्जिका आ भोजपुरी या अन्यसँ जुडल छै ।
लोकमैथिली भाषी क्षेत्रक समावेशिता: ई शब्द मैथिली बोलनिहारसभकें एकजुट करैछ, चाहे ओ बिहार, नेपाल, या अन्यत्र रहै। ई शब्द मिथिलाक ऐतिहासिक बोझसँ मुक्त छै।
उपयुक्त शब्दावली कोन छै?
‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक संदर्भ में उचित छै, जखन कि प्रश्न एकर गौरवमय अतीत, साहित्य, या धार्मिक महत्वसँ संबंधित हो। मुदा, जखन बात आधुनिक भौगोलिक, सामाजिक, या प्रशासनिक परिदृश्यक होइछ, त ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ बेशी उपयुक्त छै। कारण:
समकालीन प्रासंगिकता: ई शब्द मैथिली भाषी समुदायकें समेटैछ, बिना कुनो भौगोलिक या राजनीतिक दावाके ।
स्पष्टता: सरकारी दस्तावेज आ जनगणनाक आधार पर मैथिली भाषी क्षेत्रक पहचान साफ छै, जखन कि मिथिला शब्दक भौगोलिक सीमा अस्पष्ट छै।
समावेशिता: ई शब्द बिहार, नेपाल, आ अन्य क्षेत्रक मैथिली भाषीसभकें एक मंच दैछ।
उदाहरण: जखन मिथिला चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग)क बात होइछ, त ‘मिथिला’ शब्द सांस्कृतिक रूपसँ प्रासंगिक छै, मुदा एकर उत्पादन आ प्रचार मधुबनी, दरभंगा, या अन्य जिलासँ जुड़ल छै नय कि कुनो एकीकृत ‘मिथिला’ क्षेत्रसँ।
मैथिली साहित्यक संदर्भ में, विद्यापति सेवा संस्थान या मिथिलाक्षर लिपिक प्रयास ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’क अवधारणाकें मजबूत करैछ, जे बिहार आ नेपालक सीमा पार करैछ।
बिहारक शिक्षा विभागक 2024क एक दस्तावेजक अनुसार, मैथिली भाषाक पठन-पाठन बिहारक उत्तरी जिला - दरभंगा, मधुबनी, आ सुपौल में होइछ, मुदा एकर लेल ‘मिथिला’ शब्दक बजाय ‘मैथिली भाषी क्षेत्र’क उल्लेख भेटैछ।
निष्कर्ष
‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक संदर्भमें अपन गहन महत्व राखैछ, मुदा आधुनिक भौगोलिक आ प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्दावली बेशी उपयुक्त छै। ई शब्द नय केवल मैथिली भाषा आ संस्कृतिक जीवंतता कें प्रतिबिंबित करैछ, बल्कि आधुनिक सीमा आ सरकारी दस्तावेजसबसँ सेहो मेल खाइछ। मिथिलाक प्राचीन गौरवकें संजोय राखल जरूरी छै, मुदा एकर वर्तमान पहचान ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’क रूपमें बेशी स्पष्ट आ समावेशी छै।
संदर्भ :
शतपथ ब्राह्मण आ वृहद्विष्णु पुराण, मिथिलाक ऐतिहासिक विवरण।
भारतीय संविधान, आठवीं अनुसूची।
विद्यापति सेवा संस्थान आ मिथिलाक्षर लिपि, मैथिली साहित्यक संरक्षण।
बिहार आ नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्रक जनगणना आ भौगोलिक विवरण।
सामाजिक मंच पर मिथिलाक सांस्कृतिक उल्लेख।
मधेश प्रदेशक दस्तावेज । (नोट: ई हमर नितान्त निजी विचार अछि)

Thursday, 10 April 2025

महावीरका सिद्धान्तहरु आर्थिक, सामाजिक र नैतिक सुधारका मार्गदर्शन हुन् : उपराष्ट्रपति यादव

काठमाडौं– सम्माननीय उपराष्ट्रपति रामसहाय प्रसाद यादवज्यूले जैन धर्मका २४औं तीर्थंकर महावीरका अहिंसा, सत्य, करुणा, समानता, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य र अनेकान्तवादजस्ता सिद्धान्तहरू देश र समाजका लागि आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक सुधारका मार्गदर्शन रहेको बताउनुभएको छ ।
उपराष्ट्रपति यादवले महावीरको २६२४औं जन्मजयन्ती (जन्म कल्याणक दिवस) को अवसरमा नेपाल जैन परिषद्ले काठमाडौं कमलपोखरीस्थित जैन निकेतनमा बिहीबार आयोजना गरेको विशेष समारोहमा उक्त कुरा बताउनुभएको हो ।
महावीरका सिद्धान्तहरु सिंगो मानव जीवनका विविध पक्षलाई समृद्ध बनाउने मार्गदर्शनका रूपमा रहेको उल्लेख गर्दै उहाँले भन्नुभयो, ‘ महावीर जन्मजयन्तीले सामाजिक एकता, धार्मिक सहिष्णुता र सांस्कृतिक मूल्यहरूलाई सुदृढ बनाउने अवसर प्रदान गरेको छ । ’ नेपाल जैन परिषद्ले भगवान महावीरका सिद्धान्तहरूलाई सम्पूर्ण समाजमा फैलाउन गरेको योगदानको प्रशंसा गर्दै उपराष्ट्रपति यादवले देश र समाजलाई थप शान्तिपूर्ण, सम्पन्न र समृद्ध बनाउने प्रेरणा प्रदान गर्न महावीरका विचारहरूको महत्वलाई उजागर गर्नुभयो ।
‘मानव जीवनका लागि अपरिहार्य ‘पञ्चशील’ सिद्धान्तका प्रतिपादक भगवान महावीरको जीवनले हामीलाई अहिंसा, सत्य, करुणा र समानताको संदेश दिन्छ । सामाजिक एकता, धार्मिक सहिष्णुता र सांस्कृतिक मूल्यहरुलाई थप सवल, सुदृद्ध र बलियो बनाउने अवसर पनि प्रदान गर्दछ ’ उहाँले भन्नुभयो, ‘महावीरले देखाउनुभएको सत्मार्ग, कर्ममार्ग र नैतिकमार्गमा हिड्न हामीलाई अभिप्रेरित गर्दै मानव जीवनमा शान्ति, सद्भाव र मैत्रीभाव प्रसार गर्नमा उत्तिकै सहयोग गर्दै आएको छ ।’
जैन धर्मले सहिष्णुता, अहिंसा र भाइचारा प्रदर्शन गर्दै आएको उल्लेख गर्दै उहाँले बहुजातिय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक विशेषतायुक्त, भौगोलिक विविधतामा रहेका समान आकांक्षासहितको विविधतायुक्त नेपाल जस्तो मुलुकमा जैन धर्मका सिद्धान्तहरुले देश र समाजका सबै वर्गहरु बीच सहिष्णुता र सद्भाव कायम गर्न महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गरेको बताउनुभयो । ‘महावीरका विचारहरुलाई आत्मसात गर्दै हाम्रो समाजलाई अझै न्यायपूर्ण, शान्तिपूर्ण र समानताको आधारमा संगठित गर्नका लागि अग्रसरता देखाउनु आजको आवश्यकता हो ’ उहाँले भन्नुभयो, ‘राजनीतिक रुपमा, महावीरले सत्य र नैतिकताको मार्ग अपनाउनमा जोड दिनुभएको छ । उहाँले हामीलाई सच्चा नेतृत्वको पाठ पनि सिकाउँनु भएको छ ।’
उहाँले नेतृत्कर्ताले व्यक्तिगत स्वार्थभन्दा माथि उठेर आमनागरिकको हितमा काम गरेको अवस्थामा मात्र सच्चा नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह गरेको ठहरिने समेत बताउनुभयो । उपराष्ट्रपति यादवले आर्थिक रुपमा, महावीरका ‘अपरिग्रह’ को सिद्धान्तले भौतिक सम्पत्तिको लोभलाई त्यागी सन्तुलित र न्यायपूर्ण आर्थिक प्रणालीको परिकल्पना गर्न सबैलाई प्रेरित गरेको बताउनुभयो । उहाँले भन्नुभयो, ‘ आजको विश्वमा, जहाँ आर्थिक असमानता बढ्दो छ, भगवान महावीरका यो सिद्धान्तले सम्पत्ति वितरणलाई समतामूलक बनाउने दिशामा अग्रसर हुन सक्ने मार्गदर्शन पनि प्रदान गर्दछ ।’
‘नैतिक रुपमा, भगवान महावीरको जीवन र सिद्धान्तले मानव जीवनमा सद्गुण, आत्मानुशासनको महत्वलाई उजागर गरेको छ ’ उहाँले भन्नुभयो, ‘ महावीरका पाँच प्रमुख व्रत/सिद्धान्तहरु– सत्य, अहिंसा, अपरिहग्रह, ब्रह्मचर्य र अनेकान्तवाद– मानव जीवनलाई नैतिक मूल्यमाथि आधारित बनाउने प्रयासहरु हुन् । यी सबैले व्यक्तिगत जीवनदेखि देश र समाजसम्मको समग्र सुधारका लागि मार्गदर्शकमा निहित सिद्धान्तहरु हुन् । हामी सबैले यसलाई अंगिकार गर्दै अघि बढ्न सक्नुपर्दछ ।’
उपराष्ट्रपति यादवले आफ्नो सम्बोधनका क्रममा सम्पूर्ण जैन धर्मावलम्बीहरुलाई हार्दिक शुभकामना व्यक्त गर्दै भगवान महावीरका सिद्धान्तहरुको पालना गर्दै सबै एकजुट भई देश र समाजसंगै सिंगो विश्वमा सकारात्मक परिवर्तन र रुपान्तरण ल्याउने प्रतिबद्धताका साथ अघि बढ्ने प्रण लिन उत्प्रेरित गर्न सकोस् भन्ने कामना गर्नुभयो । समारोहमा जैन धर्मावलम्बीहरू, नेपाल जैन परिषद्का पदाधिकारीहरू तथा विभिन्न क्षेत्रका अतिथिहरूको उपस्थिति रहेको थियो ।
२०८१ चैत २८ गते बिहीबार ।

Monday, 31 March 2025

प्राचीन काल मे ब्राह्मणवादक उदय आ विकास

प्राचीन काल मे ब्राह्मणवादक उदय आ विकास एक जटिल प्रक्रिया छल, जे विभिन्न सामाजिक, आर्थिक आ राजनीतिक कारक सँ प्रभावित छल। एकर अध्ययन के लेल विभिन्न स्रोत सामग्री उपलब्ध अछि, जकरा आधार पर एकर विकास के चरणबद्ध तरीका सँ बुझल जा सकैत अछि।
1. वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व):
वैदिक काल मे ब्राह्मणवादक नींव पड़ल। एहि काल मे रचल गेल वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद) ब्राह्मणवादक प्रारंभिक विचारधाराक स्रोत अछि।
ऋग्वेद: एहिमे विभिन्न देवी-देवताक स्तुति मे मंत्र अछि, जे यज्ञ आ अनुष्ठानक महत्व के दर्शावैत अछि। ब्राह्मणवादी विचारधाराक प्रारंभिक रूप एहिमे देखल जा सकैत अछि, जहिना कि वर्ण व्यवस्थाक बीज रूप (पुरुषसूक्त)।
सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद: एहि वेद सभ मे यज्ञ आ अनुष्ठानक विस्तृत विवरण अछि, जे ब्राह्मणक महत्व के बढ़ावैत अछि।
स्रोत सामग्री:
वेद: ऋग्वेद (पुरुषसूक्त), सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
ब्राह्मण ग्रंथ: ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण (यज्ञ विधि आ ब्राह्मणक महत्व के वर्णन)।
उपनिषद: छांदोग्य उपनिषद, बृहदारण्यक उपनिषद (आत्मा, ब्रह्म आ मोक्ष के विषय मे दार्शनिक चिंतन)।
विकास:
यज्ञ आ अनुष्ठान: यज्ञ आ अनुष्ठान जीवनक केंद्र बनल, आ ब्राह्मण एहिमे विशेषज्ञ भेलाह।
वर्ण व्यवस्थाक उदय: वर्ण व्यवस्था धीरे-धीरे मजबूत भेल, जहिमे ब्राह्मण सभक स्थान शीर्ष पर छल।
दार्शनिक चिंतन: उपनिषद मे आत्मा, ब्रह्म आ मोक्ष के विषय मे दार्शनिक चिंतन शुरू भेल, जे ब्राह्मणवादी विचारधारा के आधार बनल।
2. उत्तर वैदिक काल (500-200 ईसा पूर्व):
उत्तर वैदिक काल मे ब्राह्मणवाद अधिक मजबूत भेल। एहि काल मे ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक आ उपनिषद रचल गेल, जे ब्राह्मणवादी विचारधारा के विस्तार करैत अछि।
ब्राह्मण ग्रंथ: एहिमे यज्ञ आ अनुष्ठानक विधि के विस्तृत वर्णन अछि, आ ब्राह्मणक महत्व के स्थापित करैत अछि।
आरण्यक: एहिमे यज्ञ के आध्यात्मिक अर्थ के बताओल गेल अछि, आ एकान्त मे चिंतन के महत्व के दर्शाओल गेल अछि।
उपनिषद: एहिमे आत्मा, ब्रह्म आ मोक्ष के विषय मे दार्शनिक चिंतन जारी रहल, आ ज्ञान मार्ग के महत्व के बताओल गेल अछि।
स्रोत सामग्री:
ब्राह्मण ग्रंथ: तैत्तिरीय ब्राह्मण, गोपथ ब्राह्मण।
आरण्यक: तैत्तिरीय आरण्यक, ऐतरेय आरण्यक।
उपनिषद: केन उपनिषद, कठ उपनिषद, ईश उपनिषद।
सूत्र साहित्य: श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र, धर्म सूत्र (यज्ञ, संस्कार आ सामाजिक नियम के वर्णन)।
विकास:
वर्ण व्यवस्थाक दृढ़ीकरण: वर्ण व्यवस्था अधिक कठोर भेल, आ ब्राह्मणक अधिकार बढ़ल।
कर्मकांडक जटिलता: कर्मकांड अधिक जटिल भेल, आ ब्राह्मणक विशेषज्ञता आवश्यक भेल।
ज्ञान मार्गक उदय: उपनिषद मे ज्ञान मार्ग के महत्व के बताओल गेल, जे ब्राह्मणवादी विचारधारा मे एक नव आयाम जोड़लक।
3. मौर्य काल (322-185 ईसा पूर्व):
मौर्य काल मे बौद्ध आ जैन धर्मक उदय सँ ब्राह्मणवाद के चुनौती मिलल। यद्यपि, ब्राह्मणवाद अपन प्रभाव बनौने रखने मे सफल रहल।
बौद्ध धर्म: बौद्ध धर्म वर्ण व्यवस्था आ कर्मकांडक विरोध करैत छल, जे ब्राह्मणवादी विचारधारा के चुनौती देलक।
जैन धर्म: जैन धर्म अहिंसा आ तपस्या पर जोर दैत छल, जे ब्राह्मणवादी जीवनशैली सँ अलग छल।
स्रोत सामग्री:
अर्थशास्त्र (कौटिल्य): एहिमे राज्य व्यवस्था, समाज आ धर्म के विषय मे जानकारी अछि।
अशोकक शिलालेख: एहिमे बौद्ध धर्मक प्रचार आ सामाजिक न्याय के विषय मे जानकारी अछि।
मेगास्थनीजक इंडिका: एहिमे भारतीय समाज आ संस्कृति के विषय मे जानकारी अछि।
विकास:
बौद्ध आ जैन धर्मक प्रभाव: ब्राह्मणवाद के अपन विचारधारा मे परिवर्तन करबाक लेल बाध्य होना पड़ल।
धर्मशास्त्रक विकास: धर्मशास्त्र (जैसे कि मनुस्मृति) रचल गेल, जे सामाजिक नियम आ वर्ण व्यवस्था के समर्थन करैत छल।
ब्राह्मणक राजनीतिक भूमिका: ब्राह्मण सभक राजनीतिक भूमिका बढ़ल, आ ओ राजा के सलाहकार बनैत गेलाह।
4. गुप्त काल (320-550 ईस्वी):
गुप्त काल के "स्वर्ण युग" मानल जाइत अछि, जहिमे ब्राह्मणवाद के पुनरुत्थान भेल। एहि काल मे मंदिरक निर्माण बढ़ल, आ पुराण आ स्मृति ग्रंथ रचल गेल।
मंदिरक निर्माण: मंदिरक निर्माण बढ़ल, जे ब्राह्मणवादी धर्म के केंद्र बनल।
पुराण: पुराण (जैसे कि विष्णु पुराण, भागवत पुराण) रचल गेल, जहिमे देवी-देवताक कथा आ धार्मिक उपदेश अछि।
स्मृति ग्रंथ: स्मृति ग्रंथ (जैसे कि याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति) रचल गेल, जे सामाजिक नियम आ वर्ण व्यवस्था के समर्थन करैत छल।
स्रोत सामग्री:
पुराण: विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण।
स्मृति ग्रंथ: याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति।
कालिदासक रचना: अभिज्ञान शाकुंतलम, मेघदूत (एहिमे तत्कालीन समाज आ संस्कृति के विषय मे जानकारी अछि)।
फाहियान आ ह्वेनसांगक यात्रा वृत्तांत: एहिमे भारतीय समाज आ धर्म के विषय मे जानकारी अछि।
विकास:
ब्राह्मणवादक पुनरुत्थान: ब्राह्मणवाद अधिक मजबूत भेल, आ एकर प्रभाव बढ़ल।
भक्ति आंदोलनक उदय: भक्ति आंदोलनक उदय भेल, जे ब्राह्मणवादी धर्म के नव आयाम देलक।
संस्कृत भाषाक विकास: संस्कृत भाषाक विकास भेल, जे ब्राह्मणवादी साहित्यक भाषा बनल।
प्राचीन काल मे ब्राह्मणवादक उदय आ विकास एक जटिल प्रक्रिया छल, जे विभिन्न कारक सँ प्रभावित छल। वैदिक काल सँ लैत गुप्त काल तक, ब्राह्मणवाद धीरे-धीरे विकसित भेल, आ भारतीय समाज आ संस्कृति पर अपन गहरी छाप छोड़लक। एकर अध्ययन के लेल उपलब्ध स्रोत सामग्री के आधार पर एकर विकास के चरणबद्ध तरीका सँ बुझल जा सकैत अछि।

Sunday, 16 February 2025

स्वार्थ समूहको घेराबन्दीमा संस्था, दुर्घटना असम्भावी !

कुनै पनि संस्था बदनाम हुनुको पछाडि त्यो संस्था अमूक स्वार्थ समूहको घेराबन्दीमा पर्नु हो । संस्थामा नियुक्त 'केही' अक्षम र अकर्मण्य व्यक्तिको भूमिकाले पनि संस्था बदनाम हुने हो । विगतका बदनाम र विवादास्पद, अव्यवहारिक र अप्रमाणिक पद्चिन्हहरूलाई पछ्याउँदा दुर्घटना हुन सक्छ।
पहिले संस्था, त्यसपछि व्यक्ति हो, तर व्यक्ति पहिले भएपछि समस्या निम्तिने गर्छ । संस्था स्थायी हो, त्यहाँ कार्यरत व्यक्ति अस्थायी हो । संस्था एउटा प्रणाली र ठोस नीति अनुरूप चल्नु पर्छ । कसैको लहड र सनकीपनले संस्थाको ओज, सम्मान र प्रतिष्ठामा आँच पुग्न सक्छ ।
कुनै व्यक्तिका स्वार्थ, अयोग्यता र असक्षमता संस्थामा हावी हुन थालेपछि संस्थाको गरिमा ओरालो लाग्न सक्छ ! विगतका थुप्रै नजिरहरू घाम झै छर्लङ हुँदाहुँदै पनि स्वार्थ समूहको चङ्गुलमा संस्था फस्नु दुःखद मात्रै छैन, संस्थाकै सम्मान धारासायी बनाउने खालको छ।
'औपचारिकता पुरा गर्नमा मात्र सीमित' समूहलाई आफ्नो स्वार्थ पुरा गर्न उपयोग गर्दै आफूमाथि आउने भैपरी दोष ती समूहमा लगाएर उन्मुक्ति खोज्ने सोच डरलाग्दो दुष्परिणामको संकेत हो । यो संकेतलाई नजरअन्दाज गर्नु ठूलो भूल हुन सक्छ । समय छँदै सचेत हुन जरूरी छ । संस्थाको विश्वसनीयता कायम राख्न सबैले स्थायी र ठोस प्रणालीमा आधारित भएर काम गर्न आवश्यक छ ।

मलामी नपाउँदा घरमै आमाको शव कुर्दै प्रकाश

बैतडी, फागुन ३ गते । मलामी जाने मानिस नपाउँदा बैतडीका प्रकाश टेलर दमाई आँगनमा आमाको शव कुरेर बस्नु भएको छ । गाउँकै एक्लो दमाई परिवार भएकाले मृतक ६१ वर्षीया माना टेलरको शवलाई बोकेर मलामी जान कोही तयार नहुँदा यस्तो समस्या भएको हो ।
सिगास गाउँपालिका–१, अङडेगाडा गाउँकी माना टेलर लामो समयदेखि मधुमेह रोगबाट पीडित हुनुहुन्थ्यो । उहाँको शनिवार देहावसान भएको छ । गाउँमा विश्वकर्मा लोहार, चुनारा, सार्कीलगायत दलित र अन्य गैर दलित समुदायका परिवार भए पनि दलितभित्रै जातीय विभेद भएकाले माना टेलरको शव उठ्न सकेको छैन ।
मलामी जाने मानिस नभेटिँदा शव वाहन वा ट्याक्टरका लागि कुरा गरे पनि शनिबार रातिसम्म पनि टुङ्गो नलागेको मृतकका कुरुवा छोरा ३० वर्षीय प्रकाश टेलरले बताउनुभयो । प्रकाश टेलर स्थानीय भूमिराज आधारभूत विद्यालयका निजी स्रोतका शिक्षकसमेत हुनुहुन्छ ।
आमाको मृत्यु हुँदा मलामी जाने मानिस नपाउँदा दिनभरि आमाको शव कुरेर आँगनमा बस्नु परेको प्रकाशले पीडा सुनाउनुभयो । भक्कानिँदै उहाँले भन्नुभयो,“मलामी जाने मानिस भइदिए घरबाट आघा घण्टाको दूरीमा ढणालीगाड पर्छ । त्यतै दाहसंस्कार गर्न सकिन्थ्यो । तर, यो जात व्यवस्थाले आमाको शव उठाउन नसक्दा एक्लो अनुभूति भएको छ ।”
प्रकाशका ७२ वर्षीय रोगी बुवा श्रीमतीको मृत्युपछि ओछ्यानमा थला पर्नुभएको छ । सामान्य ज्याला मजदुरी र खलो (बालीघरे) मा काम गरेर जीविका चलाउँदै आएका टेलर परिवार गाउँकै एक मात्र दमाई परिवार हुनुहुन्छ ।
मलामी जाने मानिस नभएपछि आफ्नो पुर्ख्यौली थातथलो पाटन नगरपालिका–४, बगाडी गाउँका नातेदारलाई शव वाहन वा ट्याक्टरको व्यवस्था गरिदिन टेलिफोन गरेको प्रकाशले बताउनुभयो ।
मलामी जाने मानिस नभएकाले गाडीको व्यवस्था गरिदिन वडा कार्यालयमा पनि फोन आएको सिगास गाउँपालिका–१ का वडा अध्यक्ष रामचन्द्र ऐरीले बताउनुभयो । उहाँले शव वाहन वा ट्याक्टरका लागि नजिकको छिमेकी पाटन नगरपालिकासित कुरा भइरहेको बताउनुभयो । सवारी जिपले शव बोक्न नमानेका कारणले समस्या भइरहेको उहाँले बताउनुभयो ।
दमाई जातीको शव बोकेर मलामी जान सोही अन्य दलित जातीका मानिस तयार नभएपछि गाडीका लागि पाटन नगरपालिकामा टेलिफोन आएको उपप्रमुख कमलसिंह बोहराले बताउनुभयो ।
उहाँले दलितभित्र यस्तो जातीय विभेद रहिरहेसम्म जनप्रतिनिधिले कति चोटि गाडीको व्यवस्था गर्न सक्छन् ? भन्ने प्रश्न गर्नुभयो । “शव व्यवस्थापनका लागि जनप्रतिनिधि र दलित संघ सस्था मिलेर गरौँला तर जातकै कारणले शव नउठ्ने अवस्था किन विद्यमान छ ? यस्तो कुरीति हटाउन दलित, गैर ददित सबै एकजुट हुन जरुरी छ । यस्तो घटना भोलि पनि हुन सक्छ ? समाजले विभेद गरिरहने हो भने कतिजनाको शव बोकेर अर्को ठाउँमा लैजान सम्भव होला ?”
स्रोत :गोरखापत्र, ३ फागुन २०८१, शनिबार गोरखापत्रका संवाददाता गोकर्ण दयालको रिपोर्ट

Sunday, 26 January 2025

मैथिलीके मानकीकरण आकि मनमानीकरण ?

मैथिली भाषा-प्रेमी सभक लेल एक टा खुजल चिट्ठी
मानकीकरण आकि मनमानीकरण?
किछु सप्ताह पूर्व मैथिलीक एक टा तथाकथित ‘भाषा-सेवी’क पत्र भेटल जे दरभंगाक एक संस्थाक लेटर हेड पर छल जकर नाम पहिले बेर जानल। पत्रक जवाब लिखनहि रही कि संस्थाक संयोजक केर कॉल आयल आ ओहि बातचीत मे हुनक विद्वताक घमंड तते छल जे ओत’ पत्र पठायब उचित नइँ बुझायल। अस्तु ओहि पत्र केँ वास्तविक भाषा-प्रेमी धरि सोझे पहुँचा रहल छी।
महोदय,
दरभंगा-मधुबनी परिसरक मैथिल दिस सँ, खासक' मैथिली भाषाक चिंता सँ जुड़ल कोनो सांस्थानिक आयोजन समिति दिस सँ, एहन सन कोनो आयोजन मे भाग लेबा लेल साइत पहिल बेर आमंत्रण-पत्र भेटल अछि। मैथिली मे काज करैत आब लगभग पैंतीस साल भ' रहल अछि आ एते साल मे एहन ई पहिल पत्र। तें एहि आकस्मिक सौजन्यता लेल सब सँ पहिने अहाँ सभक प्रति आभार व्यक्त करय चाहब।
एत' मन मे उपजल आशंका सेहो व्यक्त क' दी जे आमंत्रण-पत्र भूल सँ आबि गेल अथवा खानापूर्ति जकाँ?...? एहन सन मारते रास प्रश्न सेहो उठल मन मे जे एकदम निराधार सेहो भ' सकैत अछि। मुदा, एकरा पाछाँ किछु ठोस कारण अछि। प्रायः दरभंगा-मधुबनीक सवर्ण समाजक लोक केँ कोसीक पूब-पछिम आकि दछिन भरक जन-स्वर नइँ अरघैत छनि आ असहमतिक सम्मान करबाक विवेक तँ पता नइँ किएक छत्तीस नदी सँ मथल एहि मिथिला मे बड़ कम भेटै अछि। हम ई लगातार अनुभव करैत रहल छी जे हमर असहमति आ दू-टूक कहबा सँ आहत मैथिली भाषा-साहित्यक अधिकांश संस्था/आयोजनकर्ता परहेज रखै छथि। तें ई पत्र पढ़ि आशंका भेल।
ज्ञातव्य जे मैथिली व्यापक जन-समुदायक भाषा छी, जे अक्षर-ज्ञान धरि सँ वंचित छथि आ विभिन्न तरहें अलग-अलग रूप मे बजैत छथि—एहन सन सब जाति-धर्म, क्षेत्र आ समुदायक सेहो ई भाषा छी। ने कि मात्र मधुबनी-दरभंगा परिसर केर किछु संस्थाजीवी विद्वान, ब्राह्मण-कायस्थ सन कुलीन वर्ग आकि सरकार आ अकादमी सभक पाइ बलें भाषा-विज्ञानी के तमगा पाबि गेल कोनो एहन असहिष्णु व्यक्ति केर जे तथ्यहीन बात पर अपन विद्वता केर ठाठ ठाढ कयने होथि। एहन विद्वान लोकसभ मे सँ अनेक मैथिली केँ संस्कृत जकाँ रूढ़ बना म्युजियम मे राखय चाहैत छथि। एहन लोकसभ ई कखनो ने सोचैत छथि जे ई सलहेसक धीया-पुता कि कोसी मे माछ मारैत बहुरा गोंढ़िनक बेदरा आकि कातक टोल मे गोनरि बनवैत रन्नू सरदारक लोकबेदक सेहो ई भाषा छी। ओना रास बिहारी लाल दास 1915 मे लिखि गेल छथि जे "आधुनिक समय में केवल दरभंगा जिला ही मिथिला का बोधक है परंतु उसमें भी मधुबनी सबडिविजनांतर्गत थाना मधुबनी, खजौली तथा बेनीपट्टी ही मिथिला का परिचय विशेष रूप से देते हैं। इस समय मिथिला का केंद्र मधुबनी माना जाता है। सन् 1877 ई. तक तो दरभंगा तथा मुजफ्फरपूर दोनों जिले संयुक्त होकर जिला तिरहुत के नाम से प्रख्यात थे परंतु 1978 ई. में पृथक-पृथक कर दिये गये।" (‘मिथिला दर्पण’, पृ. सं. 105-06, महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन, दरभंगा, द्वितीय संस्करण 2020) माने ई पंचकोसी मिथिलावादी लोकनिक कल्पित स्वर्ग! कदाचित अहाँ सभक समिति (कार्यदल वा पैनल) मे सेहो बेसी संख्या तेहने लोकक अछि जे भीतर सँ ‘पंचकोसी’ वा सोतिपुरा केँ मिथिला मानैत मैथिली भाषा केँ तत्सम-प्रधान बनौने राख’ चाहैत छथि। एकाध केँ छोड़ि सब पंचकोसी केर कुलीन! एहन वर्ग-समुदायक प्रतिनिधि सभ मिथिला मिहिर के जमाना मे मैथिलीक एक टा ब्राह्मणी रूप तँ गढ़नहि छला आ तकर मारते लोक (हुनक समुदायक) पालन सेहो करै छथि! अहाँक पत्रक भाषा सेहो तकर अनुशरण करैत अछि। आब यदि सर्वसमावेशी रूप निर्धारण के कनेको चिंता रहैत तँ अपन कात-करोट के माने हाशिया परक समाज केँ प्रतिनिधित्व बेसी दैतहुँ। सुभाष चंद्र यादव, तारानन्द वियोगी, जगदीश प्रसाद मण्डल, विभा रानी, रामरिझन यादव, चंद्रकिशोर, आर. के. परार्थी, मुख्तार आलम, बिभा कुमारी, दिनेश यादव, वैद्यनाथी राम, रघुनाथ मुखिया, आचार्य रामानन्द मंडल आदि सन अनेक लोक आ एहन अन्य समुदायक भागीदारी छोड़ि जे एकतरफा निर्णय लेब से कते जनतांत्रिक हैत? ओकाति वला आ सत्ताक करीबी होइवला लग किछु जेबी संस्था रहैत अछि, मुदा तें ओ जे चाहत से नइँ भ' जायत।
आकि अहाँ सभ स्वयं केँ सकल समाजक भाग्यविधाता मानि लेलहुँ?
ज्ञात होअय कि ने जे अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा, सुपौल जिला मे ब्राह्मण-कायस्थ छोड़ि बहुजन समुदाय सँ पैघ संख्या मे लोक अपन भाषा ठेठी, गमार, अंगिका, सूरजापुरी लिखा रहल अछि! सीतामढ़ी-मुजफ्फरपुर के लोक बज़्जिका। पंचकोसी के हठ के चलते एना ने होअय जे एक दिन मैथिली मात्र मधुबनी-दरभंगा परिसर के किछु गाम के भाषा रहि जाय आ अहाँ सभक मनमानी प्रयास सेहो तकर एक टा प्रमुख कारण बनि जाय। एहि सँ बचाव लेल जरूरी जे बहुजन केँ जोड़ू आ सर्वसमावेशी होइ के प्रयास करू।
जनतांत्रिक ढंगें सर्वसमावेशी तरीका सँ मानकीकरण के प्रयास तँ बढ़िया बात, मुदा मानकीकरण के बहाने मनमानीकरण आकि भाषा के संस्कृतकरण होइए तँ से हमरा सन असख्य लोक केँ कोना स्वीकार्य हैत?
महोदय, अहाँ सभ लग जतेक प्रकाशित मिथिलाक इतिहास अछि, ओहि मे वर्तमान कोसी नदीक पूब केर कोनो चर्च नहि अछि, बहुजनक कोनो टा धरोहरिक चर्च नइँ। अहाँक जते शब्द कोष अछि, ओहि मे कोसी पारक शब्द नहि अछि। अहाँ सभक लग तिरहुत आकि दरभंगा राज पर गौरव करबा केर विराट गर्व-बोध अछि, संस्कृत सँ एहन अगाध प्रेम जे मैथिली केँ संस्कृत बनेबा पर कट्टरता के हद धरि अहाँ सभ अड़ल रहैत छी। अहाँ सभक चारू कात जे लोक छथि ओहि मे सँ अधिकांश सब तरहक सत्ता सँ सटल एहन अदृश्य घमण्ड मे रहैत छथि जे दोसर ककरो सुनहि नइँ चाहैत छथि। एहना ठाम संवाद कठिन तँ होइए मुदा असम्भव नइँ।
पैघ चिंताक बात जे एहि समिति के नेतृत्व मे सार्थक संवाद कठिन अछि। तथापि भाषा-चिंता सँ जुड़ल होइ के कारणें हम निश्चित रूप सँ आबितहुँ। एक लेखक-संपादक होइ मात्र केर कारणें नइँ, कोसी क्षेत्रक लोक केर बात ल'क', रन्नू सरदारक लोकबेद आ सलहेसक धीयापुताक बात-चिंता ल'क', मुदा अहाँक आयोजन तिथि पर हम दोसर काज मे व्यस्त रहब। एहि चलतें आयोजन मे भाग लेब सम्भव नइँ हैत।
'उम्मीद' हमरा नजरि मे बड़ महत्त्वपूर्ण शब्द, ई हमरा जीवनक संबल सेहो। तथापि हमरा, एहि परियोजना के कार्यदल मे शामिल अधिकांश नाम जाहि मे सँ किछु के काज सँ अवगत नइँ छी आ जिनका जनै छी ताहि मे सँ दू-तीन गोटे कें अपवाद छोड़ि, शेष केर काज आ गैर-जनतांत्रिक विचार के चलतें संदेह बेसी अछि।
एहन स्थिति मे आयोजन सफल हेबाक उम्मेद बड़ कम अछि; तथापि शुभकामना संग चाहब जे हमर आशंका गलत सिद्ध होइ।
पुनश्च : एत’ हम अपन पूर्व-लिखित एक टा अन्य टिप्पणी संलग्न क’ रहल जे मैथिलीक ‘संस्कृतकरण’ वा तत्सम-प्रधान बनेबाक चिंता सँ जुड़ल अछि—
मैथिली पर नव-नव रूप मे अबैत पुरान संकट
पहिने किछु सवाल :--
1. बहुजन समाज मे प्रचलित मैथिलीक 'विविधतापूर्ण' रूप अहाँ स्वीकार करब आकि मुट्ठी भरि संभ्रांत कुलीन सभक बीच प्रचलित एक टा 'रूढ़ि' जकाँ भ' गेल संस्कृतनिष्ठ रूप ओकरा पर थोपब?
2. संस्कृत सँ प्रेम बेजाय बात नइँ, मुदा तें (संस्कृत-मोह मे पड़ि) मैथिली केँ संस्कृतक अनुगामिनी-दासी बना देब'क प्रयास केँ अहाँ उचित मानब की?
3. सप्रयास 'तद्भव'क जगह 'तत्सम' घुसेड़ब खाहे एहि लेल जे ओकर वर्चस्व 80 प्रतिशत बनल रहय; की ई अहाँ केँ उचित लगैत अछि?
4. लोक सँ काटि भाषा केँ शास्त्रीय बनायब, तथाकथित 'गमार' सँ दूरी रखबा लेल 'पण्डितमुखी' होयब, पंचकोसीक शब्द-संस्कार सँ उच्चारण-व्यवहार धरि सौंसे मैथिला समाज पर थोपब; ई सब कोन तरहक सोच आ मानसिकताक फल थिक?
5. मिथिला मे एक प्रतिशत सँ कम पंचकोसीक सवर्णक जनसंख्या हैत आ ताहू मे सोतिक संख्या बहुत कम, मुदा एहि भाषा पर ओकर वर्चस्व बनौने रखबाक पैघ जतन अहाँ केँ केहेन लगैत अछि?
6. की अहाँ स्त्री आ बहुजन विरोधी लोकोक्ति आ मोहाबरा सँ भरल भाषाक ओहि रूपक ओकालति करब जत' अहीं सन मारते रास लोक केँ हीन बुझल जाइत होअय?
7. सरकारी लाभ लेल जे सभ अंगिका-बज्जिका-सुरजापुरिया क्षेत्र धरि केँ अपन साम्राज्य मानैत रहल, तकरा सभक मुँहें बभनटोलीक पंडीजी सभ सँ बाहरक भाषा केँ 'छोटका लोकक बोली' कि 'राड़क भाषा' कि 'मौगियाही भाषा' कि 'मुसलमानी बोली' कहब की अहाँ केँ अपमानजनक नइँ लगैत अछि? की पचपनियाँक जन्म भाषायी अत्याचार सहबा लेल भेल अछि?
बेगरता :--
'भाषा संकट'क नाम पर एम्हर बहुत चतुराइ सँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कुलीनतावाद आ पैट्रियरकी (Patriarchy) केर निंघेस छिटबाक नव-नव खेला शुरू भेल अछि। मिथिलाक पंचकोसी मे जनतांत्रिक सोचक अकाल जरूर रहल, मुदा 'ब्रह्मवर्चसी'वला ओहि सोचक खेती खूब होइत रहल जाहि मे बौद्धिक कला कि चतुराइ सँ 'जजमनिका' चलबैत रखबाक षडयंत्र देखाइत अछि। एहन लोक केँ 'विविधता' नइँ सोहाइ छै। 'एकरूपता'क अ'ढ़ मे 'वर्चस्व'क खेला! सत्ता सँ सटि क' रहबाक तेहेन आदति जे स्त्री आकि दलित अस्मिताक सवाल दिस पीठ कयने समय कटि जाय! तहिना मैथिली भाषा आ साहित्य पर एहि बुधियार लोक सभ केँ वर्चस्व चाही अपन दोकानदारी चलबै लेल, भने भाषा नष्ट भ' जाय!...
एहेन-एहेन सोचवला विद्वान सभक मधु मिलायल जहर पीबैत रहब हमरा उचित नइँ लगै अछि तें हम उपरोक्त प्रश्न ल'क' आयल छी जे अहाँ केँ तीत सेहो लागि सकैत अछि।...
आइना :--
'छै' केँ 'छैक'
'छलै' केँ 'छलैक'
'गेलै' केँ 'गेलैक'
'हेतै' केँ 'हेतैक'
'भेलै' केँ 'भेलैक'
'सैह' केँ 'सएह'
'घोड़ा' केँ 'घोरा'
'गौरीनाथ' केँ 'गौड़ीनाथ'
'छलनि' केँ 'छलन्हि'
'कयलनि' केँ 'कयलन्हि'
'नइँ'', 'नै' सन शब्द केँ 'नहि'
एहेन मारते रास उदाहरण अछि। रबड़ जकाँ तिरि क' अनावश्यक रूप सँ भाषा केँ दुरूह, कठिन आ बहुजनक समझ मे नइँ आब'वला बनेबाक कोन काज? संस्कृतक मोह मे विभक्ति केँ सटा क' लिखबाक कोन जरूरति?
चलू, अहाँ ओहिना लिखू! हम सभ तैयो स्वीकारैते आयल छी। मुदा हमरा सभ सन लोक पर तँ अपने-सन लिखै लेल जोर-आजमाइश नइँ करू। बेसी नीक हैत जे हमरो सभक रूप केँ अहाँ सहजता सँ स्वीकार करू। हजार रंगक फूल केँ फुलाइ के मौका भेटबाक चाही। एकरंगा-भाषाक ई आग्रह एक टा स्वस्थ्य विचार नइँ, हिटलरशाही सनक दबाव थिक। हमरा एक्के गाम कोइलख केर भीमनाथ झा कि धूमकेतु आ हरेकृष्ण झाक अलग-अलग भाषा-रूप बुझै मे आ तकर आनंद लै मे दिक्कत नइँ। एक्के गाम लोहना परिसरक अशोक आ शिवशंकर श्रीनिवास बिल्कुल दू तरहक भाषा लिखै छथि आ दुनूक कथा पढ़ब हमरा पसिन अछि। मुदा तें अहाँ एक केँ स्वीकार आ दोसर केँ अस्वीकार करय लेल कहब तँ हम आपत्ति करब। सुभाष चंद्र यादवक पचपनियाँ अहाँ केँ अनसोहाँत, असहज, ठेठ आ गमारक भाषा लागि सकैए, मुदा हमरा बेसी प्रिय अछि। फारबिसगंज, अररिया, बीरपुर आकि मधेपुरा मे बाजल जाइवला मैथिली सुपौल-सहरसा सँ अलग अछि। जे सब कमला पार करैते हनछिन करय लगै छथि, से कोसी-पार आबि की करताह तकर अनुमाने टा लगा सकै छी! एन्ने, ओन्ने, तखनी, बरगाही के सुनैत मातर बेहोश ने भ' जाइ!...
अंत मे आग्रह :--
हे मैथिलीक उपकारी तथाकथित 'विद्वान' सब! अहाँ मैथिलीक बड़ चिंता कयलियै, आब ओकरा बहुजन सँ काटि दै के प्रयास जुनि करू। ताहि सँ नीक जे ओकरा अपन हाल पर छोड़ि दियौ। बहुजन गमार सब, पचपनियाँ सब, ढहलेल-बकलेल मुदा काजुल नवयुवती सभक बलें ई भाषा बचल रहलै, बचल छै आ बचल रहतै। अहाँ सभ सब दिन अपना लेल पुरस्कारक ओरिआओन मे अपसियाँत रहलियै, कोर्स मे अपन रचना सोन्हियेबाक तिकड़म मे ओझरायल रहलियै; आबो सैह करैत रहू महामहोपाध्याय! मैथिली अहाँ बल पर कम, अपन निमुँह-निरक्षर-निर्धन जनक जुबान पर जीवित रहलीह आ एहिना जिबैत रहतीह।
—गौरीनाथ