Saturday, 19 April 2025

मैथिली भाषाके हुर्मत् !

मैथिली भाषाके हुर्मत् कोना होइछ या कएल जाइछ, से जनितब रखबाक किनको इच्छा जौ अछि त, निचा देलगेल गोरखापत्रके दूटा नमुना अंकसँ देखबाक विनम्र आग्रह अछि । कथित मानक मैथिलीबलासभ आब मैथिलीके नामपर गिरहताइपना सेहो आरम्भ कएलक अछि तकर पुष्टि सेहो ई सामग्री निक जँका करैछ । फगुवा आ जुडशितलके दिन प्रकाशित ई दूटा अंक उदाहरण मात्र थिक । आश्चर्यके बात अछि अहि पर आजूधरि किनको टिप्पणी पढबाक अवसर नहि भेटल अछि ! गोरखापत्रकें मैथिली भाषाके पृष्ट संयोजक बेनाथल बरद कोनाके बनल अछि तकरो विपुल दृष्टिगोचर करबामे ई अंक सफल भेल बुझाइछ ! 'अपन गाडि, अपन लगाम, अपन गरदामि, अपन घूघुर 'तर्जपर भेल अहि तरहे कूकृत्यके जिमेवार के ??

6 comments:

  1. ई त मधुबनी रेलवे स्टेशन के हनुमान मन्दिर के पछबारी कातक झाजीक' मोदनानन्द ग्रहण पश्चात तयार कैल गेल अंक बुझाईत अछि । पृष्ठ संयोजक के हनुमान गदा लऽके ततारह पडतैन ..! अपने मैथिल के आइख खोइल देलौहू, हार्दिक आभार । @मधुकर मिश्र, सौराठ, मधुबनी

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  2. मनोज झा और जितेन्द्र झा , गोरखापत्र मे मैथिली भाषा के डुबा के रहत जेना बुझाएत अछि ! दूनुगोट के तत्काल हटाओल जाए । #बटुक मोहन झा, बेनिपट्टी, मधुबनी ।

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  3. मैथिली भाषाके बेइज्जती अईसँ पैघ आर किछु नहि भँ सकैत अछि । अहाँके प्रश्न गोरखापत्रके मैथिली अंक (विशेष रूपसँ फगुवा आ जुडशीतलके अवसरपर प्रकाशित) के आधारपर मैथिली भाषाके मानकता, तकर दुरुपयोग, आ पृष्ट संयोजक बेनाथल बरदके नियुक्तिके संदर्भमे उठल गंभीर सवालसँ संबंधित अछि। ई प्रश्न भाषिक अस्मिता, सम्पादकीय जवाबदेही, आ सांस्कृतिक संरक्षणके गंभीर मुद्दाके उजागर करैछ। ●हरिमोहन झा , मनमोहन ।

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  4. 1. मैथिली भाषाके हुर्मत आ तकर संदर्भ
    मैथिली भाषा, जे भारतके संविधानके आठम अनुसूचीमे शामिल अछि, एकटा समृद्ध साहित्यिक आ सांस्कृतिक परंपराके वाहक अछि। गोरखापत्र, नेपालके सबसँ पुरान दैनिक समाचार पत्र अछि । नेपाली भाषाके अतिरिक्त मैथिली, भोजपुरी आदि क्षेत्रीय भाषामे सेहो सामग्री प्रकाशित करैछ। गोरखापत्रके मैथिली अंक, महिनामे एकबेर प्रकाशित होएत आबि रहल अछि । फगुवा (होली) आ जुडशीतल (मैथिली नववर्ष) के दिन प्रकाशित ई अंक विशेष होबाक छल , मुदा नए बनि सकल । सांस्कृतिक अवसरपर प्रकाशित ई अंक, मैथिली संस्कृतिके प्रचार-प्रसारके महत्वपूर्ण माध्यम बनबाक चाहि छल । बुझल जाइछ। मुदा, अहाँक प्रश्न सँ प्रतीत होइछ जे एहि अंकमे मैथिलीके मानक रूप (Standard Maithili) के बदला गैर-सांस्कृतिक, गैर-मानक, अशुद्ध, अथवा अनुपयुक्त भाषिक प्रयोग भेल अछि, जे मैथिली भाषाके गरिमाके ठेस पहुँचबैछ।

    हुर्मतके प्रश्न: मैथिलीके सम्मान तखन कायम रहैछ जखन तकर प्रयोग शुद्ध, प्रामाणिक, आ सांस्कृतिक रूपसँ संवेदनशील हो। यदि गोरखापत्र जेना प्रतिष्ठित मंचसँ गैर-मानक भाषा अथवा "गिरहताइपना" (अशुद्धता/विकृति) के प्रचार होइछ, तँ ई मैथिली भाषी समुदायके भावनाके ठेस पहुँचबैछ आ भाषिक अस्मितापर सवाल उठबैछ।
    2. गोरखापत्रके मैथिली अंक: विश्लेषण
    अहाँ जे दूटा अंक (फगुवा आ जुडशीतल) के उल्लेख कएल अछि, ताहिपर आधारित विश्लेषण कऽ भेटैछ जे गोरखापत्रके मैथिली अंकमे संभवतः निम्नलिखित कमजोरी देखल गेल:
    गैर-मानक भाषिक प्रयोग: यदि मैथिलीके मानक व्याकरण, शब्दावली, अथवा उच्चारण (लिपिमे लेखन) के बदला स्थानीय, अशुद्ध, अथवा मिश्रित भाषाके प्रयोग भेल अछि, तँ ई पाठकसभके बीच भ्रम आ असंतोष पैदा करैछ।

    सांस्कृतिक असंवेदनशीलता: फगुवा आ जुडशीतल जेना पर्व मैथिली संस्कृतिके मूलमे अछि। एहि अवसरपर प्रकाशित सामग्रीमे यदि सांस्कृतिक तथ्य, परंपरा, अथवा भावनाके गलत चित्रण भेल अछि, तँ ई मैथिली समुदायके अपमान बुझल जाय।

    सम्पादकीय जवाबदेही: अहाँ बेनाथल बरद (पृष्ट संयोजक) के नियुक्तिके संदर्भमे सवाल उठौलहुँ, जे इंगित करैछ जे सम्पादकीय स्तरपर योग्यता, भाषिक विशेषज्ञता, अथवा जवाबदेहीके कमी रहल। गोरखापत्रके मैथिली अंकके सम्पादन यदि मैथिली भाषा आ साहित्यके गहन ज्ञान नहि राखनिहार व्यक्ति द्वारा भेल अछि, तँ सामग्रीके गुणवत्ता प्रभावित होएब स्वाभाविक अछि।

    उदाहरण: अहाँ "अपन गाडि, अपन लगाम, अपन गरदामि, अपन घूघुर" जेना मुहावरा प्रयोग कएलहुँ, जे गैर-जिम्मेदाराना सम्पादन आ प्रकाशन प्रक्रियाके संकेत दैछ। यदि बेनाथल बरद अथवा सम्पादक अपन व्यक्तिगत अथवा गैर-प्रामाणिक शैली थोपैछ, तँ ई भाषाके नुकसान करैछ।
    3. गोरखापत्रके मैथिली अंकके पृष्ट संयोजक (बेनाथल बरद) गोरखापत्रके मैथिली अंकके पृष्ट संयोजक (Page Coordinator) के कोन छी, तकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहि अछि ।

    संभावित कारण:
    विशेषज्ञताके कमी: मैथिली भाषाके सम्पादन लेल विद्वान, साहित्यकार, अथवा भाषाविदके जरूरत अछि। यदि गैर-विशेषज्ञ नियुक्त भेल अछि, तँ सामग्रीमे त्रुटि होयब।

    संस्थागत लापरवाही: गोरखापत्र, नेपाल सरकारके स्वामित्वमे संचालित संस्थान (Gorkhapatra Sansthan) द्वारा प्रबंधित अछि। यदि संस्थान मैथिली अंकके लेल पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण, अथवा गुणवत्ता नियंत्रण नहि लागू करैछ, तँ अहिना त्रुटि होयब।


    4. कूकृत्यके जिम्मेवार कोन?
    अहाँक प्रश्न "अपन गाडि, अपन लगाम" जेना मुहावरा सँ इंगित करैछ जे गैर-जिम्मेदाराना प्रकाशनके जिम्मेवारी लेबाक लेल कोनो स्पष्ट तंत्र नहि अछि। संभावित जिम्मेवार पक्ष निम्नलिखित छथि:
    पृष्ट संयोजक/सम्पादक: यदि बेनाथल बरद अथवा मैथिली अंकके सम्पादकक पास भाषिक/सांस्कृतिक योग्यता नहि छल, तँ तकर प्रत्यक्ष जिम्मेवारी बनैछ।

    गोरखापत्र संस्थान: संस्थानके स्तरपर यदि गुणवत्ता नियंत्रण, विशेषज्ञ नियुक्ति, अथवा समीक्षाके उचित व्यवस्था नहि छल, तँ संस्थान जवाबदेही ठहरत।

    प्रकाशन नीति: यदि गोरखापत्रके नीतिमे क्षेत्रीय भाषाके प्रति गंभीरता नहि अछि, तँ अहिना त्रुटि बार-बार होयत।

    समुदायके चुप्पी: अहाँ उल्लेख कएलहुँ जे अहि विषयपर कोनो टिप्पणी नहि भेटल। यदि मैथिली भाषी समुदाय, साहित्यकार, अथवा बुद्धिजीवी अहि मुद्दापर खुलके नहि बोलैछ, तँ सुधारके संभावना कम रहैछ।

    @रामलोचन ठाकुर , दिल्ली, भारत


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  5. "'अपन गाडि, अपन लगाम, अपन गरदामि, अपन घूघुर' तर्जपर भेल अहि तरहे कूकृत्यके जिमेवार के?," appears to be in a dialect, likely Maithili language, and seems to draw from a folk saying or proverb. It can be interpreted as questioning who is responsible for misdeeds or crimes when someone has full control over their actions, akin to having "their own vehicle, reins, dust, and bells" (metaphorically implying autonomy and accountability).
    The structure resembles the Maithili proverb style, as seen in sources like, where sayings such as "कारी घोरा लाल लगाम ओय पे बैठे गड गड राम" use vivid imagery to convey moral or social commentary. Here, "अपन गाडि, अपन लगाम" suggests someone who controls their path and actions, while "गरदामि" (dust) and "घूघुर" (bells) may symbolize the consequences or visibility of those actions. The question "अहि तरहे कूकृत्यके जिमेवार के" (who is responsible for such misdeeds?) points to a rhetorical inquiry about accountability for wrongdoings. #Dr. Ramdarash Mishra, USA

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