(मैथिली कविता)
–दिनेश यादवछलैह एकटा जमाना,
खुशीक नहि कुनू ठिगाना,
चन्दामामा तर जेबाक चाहना,
मुदा टाँट पर बैसल टिकुलीक दिवाना,
आहा, बाल्यकाल बहुत सुहाना ।१।
कर्चीक छडि बनाना,
मास्टरजीक टेस्ट अपने पर करबाना,
पाटी पर कारिख लगाना,
पत्थरखडी सँ कख–कबिरकान लिखना,
पढाईसँ बेसी खेलकूदक दिवाना ,
आहा, बाल्यकाल बहुत सुहाना ।२।
गोरहा खेतमे महिस चराना,
जलखोइ–कलौह भैंसबारेसंगैह खाना,
गुल्ली–डन्डी खुब खेलना,
चौपायाक ओगरबाहीमें मन लगाना,
इस्कुल जेबाक नहि चाहना,
आहा , बाल्यकाल बहुत सुहाना ।३।
पठरु, बच्छरुसंग खेलना,
आनक खेतसँ धान नोइचके लाना,
अगहायत धरि खुआबैत रहना,
कूदफान खुब करना,
टिसन नहि जेबाक अनेक बहाना,
आहा, बाल्यकाल बहुत सुहाना ।४।
लोरहा–आठीक चाहना,
फुनगी परक आम ढेपासँ तोड्ना,
हाथसँ ओकरा गिला करना,
ओहीमे बोहैर बनाके चुसना,
अहि बहाने फुलबारीक ओगरबाही करना,
आहा, बाल्यकाल बहुत सुहाना ।५।
२०७७ जेठ २,(शुक्रबार ११ः२५ अपरान्ह )


Subhakamana sahit badhae !
ReplyDeleteKavita man ke chu gel.lagat rahe ee kavita hamare par ta nai likhalu ya! Asha achi je ahi blog me bahut kuch dekhe ke milat !
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