मैथिली भाषी क्षेत्रके एकगोटा विद्वान डा. लक्ष्मण झाके पढबाक मोन हमरा बहुत दिनसँ छल । कारण जे ओ सुगौली संधिके तहत भारत आ नेपालक बीच मिथिलाके बाँटबखराके विपक्षमे छलाह । ओ बाँटल गेल मिथिलाके एक करबाक लेल नेपाल–भारत सीमा पर रहल पिलर–तोड अभियान शुरु कएने छलाह । मिथिलाके ओ विभाजित मानयैक लेल तयार नहि छलाह ।
मिथिला आ मैथिलीके पढबाक लेल हम सदखनि आतुर रहैत छी । सम्बन्धित सामग्री सभ खोजबाक आ संग्रह कएबाक लेल बेसी इच्छुक हम रहलौए । ताहि क्रममें वेबसाइट ‘विचारविन्दू’ पर डा.लक्ष्मणके बारेमे आलेख भेटल । एकहै निस्सासे हम एकरा पढि लेलौहू । मनपसिन व्यक्तित्वके पढबाक मौका जौ भेटैत छहि, तँ भूख/
पियास सेहो परा जाइत छहि ।
आलेखक बेजोड शीर्षक ‘डाँ लक्ष्मण झा: आधुनिक विदेह’ मे गुरुत्वाकर्षण सेहो बेसी रहयैक, छहि । लेखक आदित्य मोहन झाके अहि प्रसंशनीय काजक लेल बधाई छनि । आलेखक प्रस्तुति गमकगर रहितौ जीवनीके विश्राम दैत काल अन्त्यमे लेखक आदित्य जे लिख देलथि, ओ भोजनक कउरमें पाथर बुझबामे आएल अछि । एकगोट विद्वानके जहि तरहे ओ अपन दियाद आलेखमार्फत बनौने छथि, हमरा दुखित बनौलक अछि, । पीडाबोधक भाव सेहो अनु भव कए रहल छी ।
एकगोटा लेखक कोनाके एकटा विद्वान, विभूति, क्रान्तिकारी, लेखक, ब्रह्मचारी, अनुशन्धानधर्मीके अपने मूल आ दियादीमे समेट लइत छथि, तक्कर एक निक उदाहरण यी आलेख सेहो भए सकैत अछि ।
लेखक आदित्य मोहन हिन्दीमे लिखने छथि, ‘...लगभग साल भर पहले ही ज्ञात हुआ की हमलोग एक ही दियादी में आते है और एक ही मूल के है । सतलखा–सतलखे स निकल कर दियाद का एक हिस्सा रसियारी चला गया और एक हिस्सा मकुनमा । अपने वश के ट्रेस को ढुंढते हुए एकबार ये हमारे गाँव आए भी थे और रहे भी कई दिन ।’ एकरा संगैह अटैच कएल गेल सर्ट–स्क्रिनमे सेहो पढि सकैत छी । डा. लक्ष्मणके अवसानक बाद लेखकके एकैह दियादी भेलाक बात ज्ञात होइत छहि । जीवित कालमे लेखकके बुता नहि जुटलनि अहि तरहे संवोधनक लेल ! मैथिली भाषी कहियाधरि अहि तरहे साहित्य, जीवनी, आलेख, लेख पढबाक लेल विवश रहत ?
https://www.vicharbindu.com/dr-laxman-jha/
मिथिला आ मैथिलीके पढबाक लेल हम सदखनि आतुर रहैत छी । सम्बन्धित सामग्री सभ खोजबाक आ संग्रह कएबाक लेल बेसी इच्छुक हम रहलौए । ताहि क्रममें वेबसाइट ‘विचारविन्दू’ पर डा.लक्ष्मणके बारेमे आलेख भेटल । एकहै निस्सासे हम एकरा पढि लेलौहू । मनपसिन व्यक्तित्वके पढबाक मौका जौ भेटैत छहि, तँ भूख/
पियास सेहो परा जाइत छहि ।
आलेखक बेजोड शीर्षक ‘डाँ लक्ष्मण झा: आधुनिक विदेह’ मे गुरुत्वाकर्षण सेहो बेसी रहयैक, छहि । लेखक आदित्य मोहन झाके अहि प्रसंशनीय काजक लेल बधाई छनि । आलेखक प्रस्तुति गमकगर रहितौ जीवनीके विश्राम दैत काल अन्त्यमे लेखक आदित्य जे लिख देलथि, ओ भोजनक कउरमें पाथर बुझबामे आएल अछि । एकगोट विद्वानके जहि तरहे ओ अपन दियाद आलेखमार्फत बनौने छथि, हमरा दुखित बनौलक अछि, । पीडाबोधक भाव सेहो अनु भव कए रहल छी ।
एकगोटा लेखक कोनाके एकटा विद्वान, विभूति, क्रान्तिकारी, लेखक, ब्रह्मचारी, अनुशन्धानधर्मीके अपने मूल आ दियादीमे समेट लइत छथि, तक्कर एक निक उदाहरण यी आलेख सेहो भए सकैत अछि ।
लेखक आदित्य मोहन हिन्दीमे लिखने छथि, ‘...लगभग साल भर पहले ही ज्ञात हुआ की हमलोग एक ही दियादी में आते है और एक ही मूल के है । सतलखा–सतलखे स निकल कर दियाद का एक हिस्सा रसियारी चला गया और एक हिस्सा मकुनमा । अपने वश के ट्रेस को ढुंढते हुए एकबार ये हमारे गाँव आए भी थे और रहे भी कई दिन ।’ एकरा संगैह अटैच कएल गेल सर्ट–स्क्रिनमे सेहो पढि सकैत छी । डा. लक्ष्मणके अवसानक बाद लेखकके एकैह दियादी भेलाक बात ज्ञात होइत छहि । जीवित कालमे लेखकके बुता नहि जुटलनि अहि तरहे संवोधनक लेल ! मैथिली भाषी कहियाधरि अहि तरहे साहित्य, जीवनी, आलेख, लेख पढबाक लेल विवश रहत ?
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