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मैथिली–भोजपुरी अकादमी ब्राह्मणवाद को पृष्ठपोषक करने वाली संस्था हैं । संस्थाका नाम ‘मैथिली–भोजपुरी’ और काम ‘खास जाति के लोगो को’ प्रोमोसन करना ही रहा है । अकादमी के कलुषित नियत और जातिवादी मानसिकता अब जगजाहेर सी हो चुकी हैं । इस अकादमी प्रति कोई मोह किसी का अब भी बचा हो तो कृपा कर के तत्काल अपने मोह भंग कर लें ।
भारत कें नया“ दिल्ली में क्रियाशिल यह संस्था सिर्फ ब्राह्मणवादी साहित्य, गीत, संगीत, संस्कार, परम्परा और संगोत्री को प्रोमोट करना हैं । मिथिला कें सन्दर्भ में यह ‘मिथिलाञ्चल’, खास तौर पर दरिभंगा महाराज के द्वारा स्थापित मान्यताको बढाबा देना इसके ‘हिडेन थिंक’ अब किसी से छुपा नही हैं ।
अकादमी का सोच रहा हैं कि मैथिली गीत का विकास यात्रा और वर्तमान स्वरुप के बारे में सिर्फ ब्राह्मणवादी ही जानकार हैं । २५ सितम्बर २०१८ आयोजित कार्यक्रम ‘मैथिली गीतक विकास यात्रा एवं वर्तमान स्वरुप(संदर्भ : गायन, रंगमंच आ चलचित्र)’ कार्यक्रम कें आमंत्रित वक्ता से लेकर संचालक तक सभी एक ही जाति ‘ब्राह्मण’ हैं । कार्यक्रम कें आमंत्रित वक्ता द्वय धीरेन्द्र झा ‘प्रेमर्षी और सियाराम झा ‘सरस’, मुख्य अतिथि में दिलीप पाण्डे, अध्यक्षता देवशंकर नवीन, सानिद्ध में नीरज पाठक और संचालन प्रकाश झा का हैं । इतना ही नही अकादमी द्वारा किये गए कार्यक्रम (अप्रैल, २००८–२०१३ तक) के सुची देखने पर यह सिर्फ ब्राह्मणवाद का पृष्ठपोषक रहा प्रमाणित होती हैं । संचालन समिति (गवर्निंग–बाँडी) के सदस्यों की सूची में भी उच्च जाति की बाहुल्यता हैं ।
दिल्ली सरकार के वेभसाइट के अनुसार स्थापना का लक्ष्य था(?)–मैथिली व भोजपुरी भाषाओं व साहित्य–संस्कृति का उन्नयन व पल्लवन । परन्त अब यह संस्था किस तरह से कार्य कर ही हैं, सभी को जानकारी ही हैं ।
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