Friday, 14 September 2018

मिथिला केँ चौठचन्द्र वा चौरचन पर विवाद

डा.रमानन्द झा 'रमण' संपादक रहल पुस्तक 'मिथिलाक व्रत आ पाबनि-तिहार' के पृष्ट 68 मे लिखल छय : ..मिथिलामे चौठचन्द्र (चौरचन) मिथिलानरेश हेमाङ्गद ठाकुरद्वारा प्रचलित भेल । एहि पावनिक प्रचार प्रसार ओहे कयलनि ..! दरिभंगाके मिथिला नरेश,ओ जे-जे बात प्रचलनमे आनलथि,से सबटा नेपालीय मैथिली भाषीके कि मानैह पडत ? पाजा अई पार रहल दरिभंगा नरेशक अनुयायी आ प्रचारक बिड़ा उठेनिहार सब ओहे तर्ज पर नेपालीय मिथिलामे काज कऽ करल छथि । सबके 'मैथिल' कही देनाय आ सबके माथ पर 'पाग'क भारी बिसाय दैबाक कि अर्थ?? डा.सुरेन्द्रकुमार झा अई चौरचनके नेपालक मधेसक पर्व कहिके प्रचार कऽ रहल छथि । 
अहि विषय पर आय प्रतिक्रिया एतह प्रस्तुत अछि :

MuraliDhar :नेपाल में मिथिला क त छय हमरा देखा नहि रहल ऐछ भ सकैया हमरा रतौंधी किवाँ हम अन्हरा गेल होएब। पाजा ओहि पारक गन्ध अहिपार पसार वलाकेँ प्रतिबन्धित होअए एहन प्रावधान संविधान में होअएवाक चाहि जेना लैग रहल ऐछि।
Gurudev Kamat Classic Singer :राजाजनक अा जनकपुर नेपालक भुमीमे परैछै त्याँ हेतु असलमिथिला नेपालक भुमीमे परैछै बातछै चौरचनके बारेमे जेलिखनेछथि डा, रमानन्दझा अाे अपना माेनसँ किछ लिखनेछथि चौरचन प्रथा अाइसनहि इ कथा बहुत पुरानछै .
Dinesh Yadav : जी, सहमत । मुदा किछु अपवाद के छोडि देल जाय त देवानजी ,पुजारीजी, मास्टरजी... के भेष में पाजा अई पारक सुच्चा मिथिला मे प्रवेश कएनिहार सब मे दरिभंगिया आ मधुवनिया भाषा, भेष,पहिरन,संस्कृतिक प्रभाव छय आ ओ सब कोनो ने कोनो रूप मे आन मैथिलीजन पर ओ थोपबाक प्रपन्च,उद्यम आ षडयन्त्र मे लागल रहैत छथि । सर्वमान्य आ सर्वसम्मत लोकोचार के ओ सब निस्तेज करबा मे सक्रिय छथि । तें नेपालिय मिथिला मे ओहे सब अपन भाषा आ परिहरनक पेटेन्ट के दाबी कऽ रहल छथि । अई में बड बेसी ओहे सब भेटताह जकर एक गोटा पिढी नय नेपाल मे बितल छन्हि । नेपालक मिथिला मे नव-नागरिकक प्रवेसक कारण 'रैथाने' सब पीडित बनल बात एकटा यथार्थ थिक । जाहाधरि चौरचन्द पावनि के बात छय,अपने सही कहलौ,पर-पर दादा के काल सऽ अहा हम मना रहल छी,मुदा अहू मे 'पेटेन्टक'दाबी पुस्तक मार्फत कऽ रहल छथि । ई बड पैघ दुर्भाग्य नै त अउर कि भऽ सकैत अछि ? पाजा पार सऽआबैवला सब अपन वंश,गोत्र,सजाति लोकन्हि के सेहो नेपालक नागरिक हेबाक प्रमाणित करबा मे लागल रहैत छथि (e.g. काठमाण्डु उपत्यका आ रौतहट के एकटा गाम के प्रचारबाजी के ल सकैत छी ) । कहबी छय-लभका चउर पन्थ नय होयत छैक । मुदा नेपालिय मिथिला मे लभका चउरक पन्थक प्रचलन बड बेसी भेलाक कारण मैथिली आ मिथिला माय बिमार छय ।
Surendra Kumar Jha अपने के जाही स मन आनन्दी होयत से लिखु ! हमरा अइ पुस्तक के बारेमे बुझल नई अई।। मधेस मे चौरचन नई होयत छै से अपने प्रमानित करु भाईजी।
Dinesh Yadav ‘चौरचर’ पर जे स्टेटस हम लिखौए, सबटा उदृत ककँे लिखने छी । अई पाबनि के यथार्थ मिथिलाजन आ आनठामक लोक सब (जे सब मिथिला स दोसर जगह माइग्रेट भ गेल छथि आ ई मनबय छथि) बुझते छथि । हमरो घरमे धुमधाम सँ मनबैते छय । ‘आब हौ चाँद मामा लपक हौ पुरी’ गीत मिथिला बाहेक आन ठाम सुनबाक नय भेटल अछि । मुदा अहि पर्व पर आयल अहाके टिप्पणी हमरा लग उपलब्ध सामग्री सब ओकरा खारेज क दैत छैक । रमण जी कहैत छथिःई मिथिलाके थिक, अहाँ कहैत छी ई मधेशक थिक । रमणजी के पोथि मिथिलाजन के घर–घर में भेटैत छैक, अहाँ के बात मात्र ‘अनुहार पुस्तिका’मे पढलौं । आब कहूँ डाक्टर साहेब ककरा मानल जाए । जहाँधरि अपने प्रमाण पेश करबाक चुनौति देलोए, हमर स्टेटसे एकर ठोस प्रमाण थिक । अहाँ के जानकारीक लेल ‘मिथिलाक व्रत आ पाबनि–तिहार’(संपादक डा.रमानन्द झा‘रमण’,संकलन :कल्पना झा, प्रकाशन:उर्वशी प्रकाशन, पटना, मुद्रक: सपना अफसेट, पटना–६ संस्करण वर्ष–२००६) पढबाक विनम्र आग्रह अछि । हाँ पुस्तक २००६ के संस्करण छि, अहि से पहिने जौ मिथिला आ मैथिली बाहेक आन कियो अहि पर्व के ‘चौरचने’ के रुप में मनौने हेता या मनबति हेता त प्रमाण पेश करी, हमरा लेल ज्ञानवद्र्धन करी🤔,ताहीलेल सदैव अनुग्रहित रहब । गणेश चतुर्दशी, चौठी कहीके आन ठाम जरुर मनिबति छए, चौरचन त मिथिलाक मौलिक संस्कृति थिक । अही मे रमण जी किएक जातिय ‘पेटेन्ट’ के दाबी केलक से नय जानि ।

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