Thursday, 28 December 2017

मैथिली सम्मेलन राजबिराज घोषणापत्रक त्रुटि


  • By Dinesh Yadav
मिथिला क्षेत्र में तेरहम विद्या कें चर्चा खुबे होयत छैक , शायद ओहे कारण १३ टा बूँदा में घोषणापत्र जारी भेल, ई हमर एकटा अनुमान मात्र । ओना १३ दिनधरि श्राद्धक काजक्रिया सेहों मिथिला में होइते छैक । जेना जे होए, घोषणापत्र में हमर व्यक्तिगत दृष्टिकोण सँ देखल गेल त्रुटिसभ प्रस्तुत 
अए :– 

  • बुंदा १ मे आयोजक सभ अपन कर्तव्य कें निर्वाह केनै छथि । ‘मिथिला प्रदेश’ घोषणा होय या नय, मुदा दस्ताबेजिकरण करबाक लेल ई विषय कें एक नम्बर में प्राथमिकता में राखि विशुद्ध प्रचार रणनीति कें पुष्टि करति अछि । 
  • बुँदा २ कें भाषा अस्पष्ट छैक । भोजपुरी के सम्मानजनक अधिकार के बात कयल गेल अछि, मुदा प्रदेश २ के आन भाषा (थौर,उर्दू, मगही, बज्जिका,मारबाडी, बंगाली, हिन्दी आदि) के उल्लेख नए केनाए के अर्थ आन भाषा के अस्तित्व नय स्वीकार केनाए । एहीं बुँदा के ई सभस पैघ त्रुटि अछि । 
  • बुँदा ३ में, प्रदेश १ कें सन्दर्भ में बहुत पैघ महात्वाकांक्षी कें रुपमें आयोजक सभ प्रकट भेल छैक । ऐहो बुंदा के लम्बेतान करबाक लेल आ मांगक लेल मांग करबाक लेल मात्र प्रतित होयत छैक । 
  • बुँदा ४ सं ८ धरि, एकैह टा प्रसंग कें आ विषयवस्तु में घोषणापत्र ओझरायल बुझाएत अछि । घोषणापत्र लम्बा कएला सँ मांग सम्बोधन होयत छैक से बात नए । भेग बात सभ सेहों एहीं बुँदा में समटल छैक , जकर आवश्यकता तत्काल नए छलए ।      
  • बुंदा ९ के सन्दर्भ में, जे संस्था नेपालीय मैथिली भाषी कें बीच में अई सम्मेलन के सर्वमान्य नय बना सकल ओं नेपालमें मैथिली अकादमी स्थापना केर माग केने अछि । घोषणापत्र जारी कएनिहार आ तयार कएनिहार सभ मैथिली के नाम पर धुरन्धर विद्वान छयथि, बहुत अनुभवी सेहों छयथि । कि मात्र अकादमी स्थापना सँ मैथिली , भाषा, साहित्य, कला आ लोकसंस्कृति केर संरक्षण ,सम्बद्र्धन एवं प्रवद्र्धन भँ जेतयह ? नव बोरा में पुरनका चउर रखला सँ नयाँ नय होइत छैक । अकादमी स्थापनाक लेल आधारभूत मान्यता आ सर्वमान्य सिद्धान्त के पहिले प्रतिपादन करी, तहन एहीं दिश बढी त निक  । 
  • बुंदा १० में, शोध–वृतिक घोषणा करबाक मांग आयल अछि । ओहूना ई एकटा भेग विषय छैक । ओहूमे नेपालक राष्ट्रीय अभिलेखागारमे संरक्षित मैथिलीक प्राचीन पाण्डुलिपि सभहक अध्ययन एवम् अनुशन्धानक लेल मात्र ई घोषणा सान्दर्भिक नए छैक । एहीं के लेल कोषक स्थापना कें मांग किछु पोसपुत्र सभ के पोशेबाक काम बाहेक आर किछु भँ नए सकैत अए । मैथिली में मास्टर्स पढिनिहार विद्यार्थी सभ कें शोधपत्र कें लेल प्रोत्साहित कएला सँ सेहो बहुत रास बात आबि सकैत छैक । तेँ ई बूँदा सेहो उचित नय । 
  • बूंदा एघार में, मिथिलाक्षर(तिरहुता लिपि) कें संरक्षणक बात अए । लोपोन्मुख अई लिपि कें लेल मैथिली अभियानी सभ(जे सभ मैथिली के नाम पर पुरस्कार ग्रहण आ तामाशा देखा रहल छयन्हि) आगा आबय पडत । ओहूना ई २१ सम् सताब्दी में एहीँ लिपि स मिथिला आ मैथिली कँे बड पैघ उपलब्धि प्राप्त भँ जेतयह से हमरा नय बुझमामें अए । तेँ योहों विषय माँग के लेल मात्र मांग जका सार्वजनिक भेल अए ।   
  • बूंदा १२ में, मैथिली चलचित्र में सरकारी अनुदानक बात कहल गेल अछि । सरकारी अनुदान भेटत त चलचित्र बनाएब, से बात आब समय सान्र्दभिक नए । ई माग किछुक कलाकारिता के ठिक्केदार सभहक भँ सकैत छय । हाँ, मिथिला क्षेत्रक नाघ, नटुवा, लोकगाथा में आधारित चलचित्र आ सामग्री सभ के अनुदान भेटबाक माग अबैत त निक रहैत । ओहूना युटुभ के जामाना में , नीजि लगानी मे बहुत रास शिक्षाप्रद सामाग्री सभ मैथिली में बनले छए आ बनि सेहो रहल अई । मैथिली सिनेमा कें व्यवसायिक बनाबाक हेतू प्रयास में जोड दयतौंह त निक रहैत । 
  • बूंदा १३ में, मिथिलाक लोकगाथा सभक बात सकारात्मक अए । विद्युतीय अभिलेखीकरण, पर्यटकीयकरण एही क्षेत्रक लेल निक माग अए । सबस पैघ आ महत्वपूर्ण बात केँ अन्तिम में रखनाई के अर्थ भेल जे घोषणापत्र पर काज कएनिहार सभ प्राथमिकता के नए बुझि, अपन–अपन दोकान आ व्यापार के चम्काबै कें फेरी मे छथि,से बुझमामें आयल । 
     अन्तमें, सम्मेलन शुरु होय सँ पहिने आयोजक सभ कें लेल हमर एघार बुँदा सुझाबपत्र एवं जिज्ञासापत्र सार्वजनिक भेल छल, हमर जिज्ञासापत्रक एकोह टा बुँदा मे छलफल नए भेल, एहीँप्रति हमर खेद आ दुःख अए । पाठक सभकें जानकारी कें लेल ओं बुँदा सभ फेर स दोहरा रहल छि - मैथिली हमर माई कें बोली छी । तें #मिथिला आ #मैथिली कें हरेक गतिविधि कें अंशियार हमहूँ छी आ रहब । हमर गृह जिल्ला सप्तरी में मैथिली #सम्मेलन भँ रहल अछि, एहीं सें पैघ खुशी आ प्रसन्नता हमरा लेल आर किछु भइए नय सकैये । आयोजक कें धन्यवाद आ शुभकामना । सम्मेलन में सहभागी आदरणीय(?) मैथिली अभियानी(?) आ आयोजक सभ सँ हमर किछु जिज्ञासा अए :–


  1. मैथिली विश्व कें प्राचिनतम भाषा में से एक अए । मुद्दा ई भाषा अखनों ‘त्रिया चरित्र’ के अवस्था सँ किएक गुजरी रह अछि ? 
  2. बड पुरान भाषा मुद्दा नेपालीय मैथिली क्षेत्र सँ आजूधरि दलित रचनाकार आ साहित्यकार सभ कें दिबिया नेस कें खोजबाक अवस्था किएक छैक ? 
  3. मैथिली भाषा के कला आ सांस्कृति के रखबाला में सभ सँ बेसी दलित अए, मद्दा हुनका सभहक बेसी सक्रियता आ सहभागिता रहैय बाला नाच, नटुवा,बाजा, ढोल,पीपही आ सांस्कृतिक गतिविधि ‘डायनोसर’ किएक बनि गेल ? 
  4. मिथिला कें #कुमरबृजभान, #दिनाभद्री,#अल्हा–रुदल, डफरा बौसली......कतह आ किएक हरा गेल ? ओं संस्कृति अभिजात वर्गक नए छलैह तेँ हरा गेलैए ने ?
  5. किछु जाति विशेषक पहिरन ‘पाग’ मिथिला कें धरोहर कोना के भँ गेलैह ? #पाग के सम्बन्ध में हमरा पास संग्रहित तथ्य आ प्रमाण सभ त ई राजस्थानक पहिरनक होबाक पुष्टि करतै छैक ।
  6. मिथिला आ मैथिली कें बात अबिते किछु ‘नटवरलाल’ आ किछु ‘गिरगिट’ सभ मात्र किएक ‘फ्रन्ट’ पर देखवा में अबैत छैक ? 
  7. मैथिली भाषा नेपालक स्कूल सभ में #पाठ्यक्रम बनल बहुत दिन भँ गेल, मुद्दा ओही पाठ्यक्रमक समिक्षा आम–#मिथिलाजन सँ आजुधरि किएक नए भेल ?
  8. मिथिला साहित्य या भाषा में नेतृत्वदायी भूमिका मे सदैब एकल अभिजात वर्ग आ जाति विशेषक हालीमुहाली किएक छैक ? आ ई कतेक दिन रहत ?
  9. मिथिला क्षेत्र में शान्तिदूत #Budha क चर्चा किएक नए भेल आ आजुधरि एही विषय मे आबाजक उठान किएक नए भँ रहल अछि ?
  10. मिथिला आ मैथिली के नाम पर करोड के करोड बजेट निकासा होएत छैक, तईयों मिथिला आ मैथिली किएक हक्कन पारी कें कानि रहल अछि ?
  11. सिल्पी समुदाय कें आगा देखा कें कथित अभिजात वर्ग आ एकेहटा जाति विशेष कें बौआ(?) सभ मिथिला आ मैथिली के कहियाधरि लुटैत रहत ?
हमर ई जिज्ञासा पर सकारात्मक बहस करबाक न्यौता मिथिला अभियानी(?) , अनुरागी आ सम्मेलन में सहभागि सभ गोटा कें दैति छी । धन्यवाद ?

 राजबिराज घोषणापत्र 2017(22-23 December)




Saturday, 9 September 2017

{MAITHILI SERIAL } KONA JIYAB HUM AHANK BINA

यौवनके भरल गगरिया | YAUWANKE BHARAL GAGRIYA | SANTOSH SANU | ASHOK DUTTA...

‘सेप्टेम्बर युद्ध’मा मधेश

दिनेश यादव

तराई–मधेशमा स्थानीय तहको निर्वाचनलाई शर्तकै रुपमा उपयोग गर्नुपर्ने पक्षमा धेरै युवाहरु थिए । कमोवेश त्यसमा केही घटबढसहित अझै उनीहरु त्यही मानसिकतामा छन् । खासगरि राष्ट्रिय जनता पार्टी नेपाल(राजपा) का युवा नेताहरु निर्वाचनअघि सरकारले गरेको सहमति र जनताको माग सम्बोधनपछि मात्र चुनावमा जानुपर्ने अडान राख्दै आएका थिए । यसमा संघिय फोरम नेपाल र लोकतान्त्रिक जनअधिकार फोरमका केही नेताहरुको समर्थन थियो । तर, यी दुई पार्टीले चुनावमा जाने घोषणा गरेपछि तिनका अनुशासित कार्यकर्ताहरु त्यत्यै होमिन बाध्य भए, यो एउटा तीतो यथार्थ नै हो । त्यस्ताकाका त्यो बाध्यता र अहिले संविधानसभाबाट दोस्रो संशोधन प्रस्ताव असफल भएपछिको अवस्थामा यी पार्टीहरु निर्वाचनमा जानुमा खासै तात्विक भिन्नता र अन्तर देखिन्न । किनभने सरकारबाट गरिने निर्णय र संविधान संशोधन दुई पृथ्थक कुरा हुन । केही सरकारी निर्णय बाहेक दुई चरणमा सम्पन्न स्थानीय तहको निर्वाचनअघि जुन वातावरण थियो, अहिले तेस्रो चरणको चुनाव हुनु अघि पनि त्यही छ । निर्वाचन भयो, हुन्छ । स्वतन्त्रको हैसियतमा वहिष्कारवादी दलहरुले दोस्रो चरणको चुनावमा सहभागिता जनाए, अब तिनीहरु दलगत हैसियतमै निर्वाचनमा जाने बातावरण बनेकै हो त ? संविधान संशोधन त्यस वेला पनि पास हुने अवस्था थिएन, आखिर आज त्यही अवस्थाको सामना मधेश केन्द्रित दलहरुले गर्नै प¥यो । त्यसैले मधेश केन्द्रित केही दलहरु यस मायनेमा चुकेकै हुन् । त्यसै वेला संविधान संशोधन प्रस्ताव सीमाकंनसहितको हुनैपर्ने अडान राख्दै फेल भएको अवस्थामा पनि त्यसलाई एजेन्डा बनाएरै निर्वाचन जान सकिन्थ्यो । आफ्नो बलियो मुद्दाका रुपमा जन–जन समक्ष त्यसलाई राख्न सकिन्थ्यो । तर, अहिले अब सरकारी निर्णयहरुको फेरिस्त बोकेर निर्वाचनमा जानुपर्ने वाध्यता आइपरेको छ । कुनै पनि एउटा दल सरकारी र प्रतिपक्ष दुवै भूमिकामा देखिनु या रहनु किमार्थ उचित थिएन, छैन । अझै पनि केही बिग्रेको छैन । चुनाव वहिष्कार गर्ने मधेशी दलले सरकारलाई दिएको समर्थन तत्काल फिर्ता लिने र संसदबाट आफ्ना सांसदलाई राजिनामा दिन लगाएर कार्यक्षेत्र फर्कन सक्नु पर्छ । अब कुनैपनि बहानामा यसमा गरिने विलम्ब भनेको अन्र्तगोत्वा आफैलाई आत्मघाती हुन सक्छ ।
  • चुनाव वहिष्कारको लेखाजोखा-

राजपाले निर्वाचन वहिष्कार गरेपनि जनताले निर्वाचनमा भाग लिने कुरा एक, पाँच र सात नम्बर प्रदेशले देखाई सकेको छ । स्वयं पार्टीका केन्द्रिय नेताहरुले पनि यो तथ्यलाई सिंधै मान्न तयार नभएपछि स्वीकार्न वाध्य छन् । अब पनि पार्टीले वहिष्कारकै रणनीति अख्तियार गरे स्थिति राजपामैत्री नहुन सक्छ । आफूलाई लोकतान्त्रिक धारको मान्ने पार्टीले प्रजातान्त्रिक मूल र मर्मबाट जनता र आफैलाई पनि अलग–थलग राख्नु हुन्न । निर्वाचन वहिष्कारले राम्रो सन्देश कतै गएको भेटिदैन, पाइन्न । दुई चरणको घोषित निर्वाचन वहिष्कारले पनि त्यस्तै देखाएको छ । जनधनको क्षति गराउने आन्दोलन र जनतासंगको लिंक टुटाउनेगरि निर्वाचन वहिष्कार यी दुवै कसैको हितमा छैन, हुँदैन । भन्नका लागि त, नेपालमा निर्वाचनबाट आजसम्म कुनै परिवर्तन भएको छैन, जति भए ती सबै सडक आन्दोलनबाटै भए । यसमा सत्यता भएपनि मधेशीको अधिकारको सन्दर्भमा यो फरक छ । आन्दोलनबाटै मधेशीले अन्तरिम संविधानमा धेरै कुरा समावेश गराउन सफल भएकै थिए । किन अहिले ती मध्ये अधिकांश उल्टाइए ? त्यस्तै, मधेशी, जनजाति, आदिवासीको अधिकारका नाममा मुलुकमा नाकाबन्दीसम्म भयो, आन्दोलनका क्रममा ठूलो जनधनको क्षति पनि भयो तर अहिले मधेशी नेताहरु सरकारी निर्णयहरुलाई आफ्नो सफलता भन्दै जन–जनमा जान वाध्य किन भएका छन् त ? अतः आत्मसमिक्षाका साथ अघि बढ्नुको विकल्प छैन । र, मुद्दालाई जीवित बनाई राख्न आफ्नो प्रयास संधै कायमै राख्नु पर्छ ।
  • विरोधाभास विचार हावी-

‘महागठबन्धन’ को मौलिक पहिचान र आफ्नै आवश्यकता अनूकलको सिद्धान्त टेकेर बनेकाले होला, राजपाभित्र परस्पर विरोधाभासपूर्ण विचारहरुले बढी नै स्पेस लिने गरेको पाइन्छ । छ पार्टी, छ अध्यक्ष, एक सय ३२ पदाधिकारी र ८१५ जना केन्द्रिय सदस्य रहेको पार्टीमा यस्तो अभास हुनुलाई अस्वभाविक ठान्नु हुन्न । तर, अनुशासित र मर्यादित चाही बन्नु पर्छ । कार्यकर्ता या केन्द्रिय नेताहरुको उच्चशृंखलायुक्त विचार र भाव प्रवाहबाट कुनै पार्टीको उन्नति भएको इतिहास छैन । त्यसैले संयमितता अपनाउनु बेश हुन्छ । ‘छ आत्मा एक शरिर’ बनिसकेको अवस्थामा पुरानै धङ्गधङ्गीलाई अंगिकार गर्नुको तुक छैन । खासगरि चुनाव चिन्हमा आ–आफनो पुरानै पार्टीका चिन्हतर्फ केही नेताहरु केन्द्रित भइरहेको देखिएका छन् । यो दुर्भाग्य हो । राजपाले छाता छापमा दाबी गरेको छ, त्यो चुनाव चिन्ह नपाउने भएपछि साइकल या हातको पंजा या अन्य जे रोजे पछि हुन्छ । तर छलफल चलाएर बहुमतका आधारमा निर्णय गर्दा उपर्युक्त देखिन्छ । राजपा नेतृत्व चुनावमा जाने लगभग पक्का भईसकेको अवस्थामा पार्टीका केही युवा नेता अझै पनि मधेशका जिल्लामा निर्वाचनको वातावरण बनी नसकेको प्रतिक्रिया दिन छाडेका छैनन् । ती मध्ये केहीले दोस्रो संविधान संशोधन प्रस्ताव असफल भएको अवस्थामा राजपा नेपाल चुनावमा गए नेपालको संविधान संशोधनको अध्यायनै समाप्त हुने तथा संविधान फाल्ने आन्दोलन झनै गाह्रो र अन्त्यहिन हुने निश्चित भएको’ प्रतिक्रिया आफ्नो फेसबुक वाल मार्फत दिएका छन् । यो भनाई आधिकारिक हो÷होइन, त्यो बहसको विषय पक्कै हुनसक्तैन । तर पार्टीका एक जिम्मेवार केन्द्रिय नेताको यसखाले टिप्पणीले महत्व राख्छ । अझ ती युवा नेताले संवैधानिक अधिकार बिना राजपा प्रदेश २ मा असोज २ मा हुने भनिएको चुनावमा सहभागी नभई संघर्षमा जानु पर्ने धारणा समेत राखेका छन् । ‘निर्णय कठिन भएपनि निर्विकल्प हो’ राजपाका केन्द्रिय नेता सुरेन्द्रकुमार झाले भदौ ५ मा आफ्नो फेसबुक वालमा लेखेका छन् । राजपाका अर्का युवा नेता सुरेशकुमार मण्डल भने निर्वाचनका पक्षमा उभिएका छन् । उनी समय र परिस्थिति बदलिएको र आफूहरुले भन्दै आएको यथास्थितिको अवस्थामा मूलभूत परिवर्तन आएकोले चुनावमा जानुपर्ने तर्क गरेका छन् । भदौ ५ गते ‘नागरिकन्युज’ मा आफ्नो आलेख मार्फत चुनावमा जाने संकेत उनले गरेका हुन । मण्डलले लेखेका छन्,‘ जनसंख्याको आधारमा स्थानीय तहको संख्या बढाउने र आन्दोलनकारीमाथि लगाइएको मुद्दा सरकारले फिर्ता गर्ने तथा सदनमा विचाराधीन रहेको संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तावलाई निर्णयार्थ प्रस्तुत गर्ने यी तीनवटै राजपाको बटमलाइन थियो, यी अडानहरु ठोस प्रगतिमा छन् ।’ #राजपा अध्यक्ष मण्डलका नेता महेन्द्रराय यादव मधेशमा स्थानीय तहको निर्वाचनमा पार्टी सहभागी हुनुपर्ने अडान पहिलेदेखि नै राख्दै आएका थिए । पार्टी अध्यक्ष मण्डलका अर्का नेता राजेन्द्र महतोले पनि निर्वाचनका लागि सकारात्मक वातावरण तयार भएको भनाई संचार माध्यमबाट व्यक्त गरिसकेका छन् । यी भनाईहरुले तेस्रो चरणको स्थानीय तहको निर्वाचनको माहौल बनेको पुष्टि गर्छ ।
  • संविधान संशोधनको विषय-

संविधानको दोस्रो संशोधन सदनबाट असफल भइसकेको छ । यसो त यो #संशोधन #सीमाको विवादलाई समेत टुंगोमा पु¥याउने गरि ल्याइएको थिएन । झिनामसिना विवाद बाहेक यसमा केही छँदै थिएन । अब संशोधनको ‘बार्गेनिङ टुल्स’ पनि डेट अक्सपाएर अर्थात काम नलाग्ने भएकाले चुनावमै आफ्नो मुद्दालाई केन्द्रित गर्दै अघि बढ्नु #मधेशी दलहरुको हितमा हुनेछ । नेतृत्व तहको अकर्मण्यता र रुढवादिताकै कारणले अब मधेशी दलहरुसंग ‘बिलट्जक्रेग’ अर्थात् तुफानी हमला गर्ने हैसियत पनि छैन । मुद्दा जीवित छ, यसलाई चुनावी मैदानमा उपयोग गर्दै अघि बढ्नु पर्छ । मित्रशक्तिलाई एकतावद्ध पार्दै चुनावी तालमेल गरेरै भएपनि विजुली युद्धको तयारी गर्न अब ढिलाई गर्नु हुन्न । ‘मे युद्ध’ लडने हैसियत थिएन, मधेशी दल लडेनन, ठीकै छ । ‘जून युद्ध’ मा जित्ने सम्भावना थियो, वहिष्कार र आपसी द्वन्द्वमै रुमलिँदा प्रचुर सम्भावनाबाट मधेशी दलहरु चुक्यो । अब ‘सेप्टेम्बर युद्ध’ र त्यसपछि ‘नोभेम्बर युद्ध’ को तयारी हुँदैछ । यी दुई युद्धमा आफ्नो हैसियत दमदार रुपमा देखाउनै पर्छ । यहाँ निर्वाचनलाई ‘युद्ध’ को रुपमा किन चित्रण गरिएको हो भने युद्धमा जस्तै ‘टुल्स’ यहाँका बर्चस्ववादी तथा राज्य सत्तामा पहूँचवादीले प्रयोग गर्छन । फेरि यो यस्तो युद्ध हो जुन बिना हतियारकै लडेर जितिन्छ । विचार, सिद्धान्त, मतैक्यता र मैत्री शक्तिको एकताबाटै यो युद्ध जितिने हो । यहाँका केही ‘आततायी’ नेताहरुलाई सत्ताच्युत गर्न, वैचारिक र जातिय रुपमा खण्ड–खण्ड मधेशीलाई एकाकार गरी सभांवनायुक्त व्यक्तिलाई राजनीतिक शिक्षा–संस्कारसहित नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह गर्नेगरी जनशक्तिको तयारी अपरिहार्य हुन्छ । यसकालागि पनि निर्वाचनमा जानुको विकल्प छैन ।
  • भावी रणनीति-

मधेश र मधेशीले पटक–पटकको आन्दोलनबाट विभिन्न अध्याय लेखिसकेका छन् । अब रणनीतिक स्पष्टताको कला मधेशी दलले प्रदर्शन गर्नैपर्छ । खासगरि वर्तमान राजपा नेतृत्वको अध्यक्ष मण्डलले त सबैभन्दा बढी यसको प्रदर्शन गर्नु पर्ने देखिन्छ । निर्वाचनलगायत अन्य मुद्दामा विगतमा अपनाएको जस्तो अस्पष्टतालाई चिर्दै आफ्नो स्पष्ट धारलाई आधिकारिक शैलीमा प्रस्तुत गर्न सक्नु पर्छ । किनभने जनताले मधेशी नेताहरुको संगीन रस्साकशी धेरै पटक देखि सकेका छन् । अब उसको स्पष्टता, अडान, जनअपेक्षित शैली र व्यवहारको परीक्षा हुनेछ । यसमा सफल हुने नै नेता कहलिने छन् । त्यस्तै, आन्तरिक र बाह्र शक्ति केन्द्रको भडकाउ र उक्साहटमा अब मधेशमा नर–वलि नचढोस् भन्ने हेक्का पनि तिनीहरुले रोख्नै पर्छ । तौलेर मात्रै कुनै पनि प्रतिक्रिया दिनु पर्छ मधेशी नेतृत्वले । आफ्नैलाई अब दिइने गाली गलौज कम गर्नुपर्छ । मित्रशक्तिसंग समान घोल बनाउन नसकेपनि त्यसका मिहिन पक्षहरुलाई आत्मसात गदै अगाडि बढ्नु पर्छ । साम (मेलमिलाप), दाम(लोभ), दण्ड तथा भेद (फुट) चाणक्यको सिद्धान्त ‘साम’ बाटै शुरु हुन्छ । त्यसैले अगामी युद्धहरु यही ‘साम’ बाटै जित्न सकिन्छ । दोस्रो संविधानसभामा यहाँका प्रमुख दलहरुले चलाएको ‘सुगा’ र ‘रुगा’ अभियान, अनि पछिल्ला निर्वाचनमा अंगिकार गरेको अनेकौ ‘आर्टिफिसियल एलायन्स’ बाट पाठ सिक्दै अगाडि नबढे फेरी पनि मधेश केन्द्रित दलहरु चुक्ने अवस्था आउन सक्छ ।
  • शत्रुपक्षको पहिचान-

यहाँका प्रमुख तीन दलसहित छिमेकी मुलुक पनि मधेशी दलहरुको प्रभावलाई नियन्त्रित राख्ने चाहनाबाट अभिप्रेरित रहदै सम्बन्ध विच्छेद पनि नगर्ने मनसाय राखेको पाइन्छ । अझ प्रमुख दलहरु त मधेशी पार्टीलाई एउटा यस्तो प्रतियोगीका रुपमा हेर्न गरेको छ, जोसंग सम्बन्ध त कायम गर्नुपर्छ भन्ने ठान्छन्, तर नियन्त्रित पनि राख्नु पर्छ भन्ने मानसिकतामा रहेको पाइन्छ । संविधान संशोधन थाती राखेर गरिएका अघिल्ला दुई चरणको स्थानीय तहको निर्वाचनको समय र प्रकृति यही नीति अनुरुप रहेको अब पुष्टि भइसकेको छ । त्यसैले मधेशी दलहरुको प्रमुख शत्रुपार्टी या पक्षप्रति आफनै दृष्टि स्पष्ट राखेको अवस्थामा ती पार्टीहरु जुन कुराबाट ओतप्रोत भई मधेशी हितको विरोध गर्छन्, त्यसलाई मधेशी समुदायले सजिलै बुझन सक्ने छन् । प्रमुख दलहरुले मधेश केन्द्रित दललाई धोका दिएको सूची लामो छ । पहिलो संविधान सभाले अन्तरिम संविधानलाई स्वीकार गरेको अवस्थामा त्यसताका संविधान जारी हुनबाट रोक्नु, दोस्रो संविधानसभाबाट अन्तरिम संविधानकै अधिकांश धारा, उपधारा र व्यवस्थाहरुलाई उल्टयाउनु या परिमार्जन गर्नु, पटक–पटक वार्ता गर्नु र लिखित सहमति समेत गर्नु तर पालनाको समयमा किचलो सिर्जना गर्नु, सत्ताधारी बन्ने वेला मधेशी दलहरुसंग सहानुभूति राखेर सरकारका लागि चाहिने बहुमत प्राप्त गर्न सम्बन्ध कायम गर्नु तर माग संवोधनको सवालमा मधेशी नेतृत्वलाई चारैतिरबाट घेरने प्रयास गर्नुलगायत त्यही मनसाय र प्रतियोगि मानसिकताकै उपज हुन । यसैगरि खुला र वेपरवाह रुपमा प्रमुख दलहरुले आपसमा सांठगाठ गर्दै आफ्ना अनूकुलको संविधान संशोधन गर्नु, आफनो हितमा नीतिनियमहरु बनाउनुले पनि तिनीहरुको मिलेमतोलाई रेखांिकत गरेकै छ । यसबाट पनि पाठ सिक्न जरुरी छ ।
  • आइडेन्टीटीका कुरा-

मधेश सामरिक र भोट बैंकको दृष्टिले शक्तिशाली भएकाले कुनै शत्रु शक्तिको सजिलै सिकार हुने स्थिति छैन । यो महत्वलाई बुझन जरुरी छ । अतः मधेशी नेताले आफ्नो समयसिद्ध मित्रहरुलाई तल गिराउने जस्तो गतिविधिबाट टाढा रहनु पर्छ । शान्तिपूर्ण तरिकाले मागको संवोधन गर्छ भने ठीक छ गर्दैन भने अब भनिदिनु पर्छ कि हामी अब सहन सक्तैनौं । आर्थिक संस्कृति आवश्यक हुनु पर्नेमा जातीय पहिचानको घोल तयार गरिनुले पनि समस्या सिर्जित भएका छन् । केही कटरवादीहरु आफू भन्दा बाहिर राजनीति र सत्तालाई जाने दिने मुडमा छैनन । किनभने तिनीहरुको संगठनको विचारमा ‘#आईडेन्टीटी’ छ । त्यसैले तिनीहरु आफनो ‘आईडेन्टीटि’ भन्दा बाहिर अरुलाई शत्रु ठान्ने गरेका छन । केही प्रमुख दलका नेताहरु अलकायदा, आईएसआईएस, तालिबान जस्तै फरमान जारी गर्नु र मधेशीलाई चिढाउने बोली प्रयोग गर्नुले पनि त्यसको पुष्टि गर्छ । तर, यहाँ एउटा कुरो के बुझ्नै पर्छ भने काँचो आइडेन्टीटी भएकाहरु अहंलाई सन्तुष्ट गर्न तिर लाग्ने गर्छ । हिटलरको ‘नाजी आइडेन्टीटी’ त्यस्तै थियो । जुन विश्व युद्धमा गएर सकियो । उसको तर्क थियो, जबसम्म यहुदी रहन्छन, नाजीहरुको अस्तित्व संकटमा रहने छ । अर्थात आफ्नो उत्थानका लागि आफू भन्दा फरक देखाउन खोज्नेमाथि आक्रमण । #मधेशीमाथि भईरहेको यही हो । संविधानको प्रस्तावनामा खसआर्यलाई समेट्नुको अर्थ यो भन्दा भिन्न छैनन, आइडेन्टीटीकै लडाई हो त्यो । त्यसैले अन्य आईडेन्टीटीलाई स्वीकार्न केही दलहरुले नसकिरहेको अवस्था छ । अब खोतल्नै पर्ने बेला भो । वास्तविक शत्रु को ? त्यो जो हामी भन्दा अलग देखिन्छ या त्यो जो हामीमाथि शासन गर्छ ?
अन्त्यमा, हामीबीच समरसता आवश्यक छ, तर यो मौन संस्कृतिले असंभव छ । हामीबीच विद्यमान अन्र्तविरोधहरु तीखा प्रश्न र बहसहरुबाटै निश्चित निष्कर्षमा पुग्नेछन् । मनुष्यता कुनै अमूर्त वस्तु होइन, जुन मात्र प्रेम, दया, दान र करुणबाट सहजै प्राप्त भई हालोस् । मनुष्यता मूर्त वस्तु हो, जुन हाल तमाम सत्ताहरुको सिक्रीले जकडिएको छ, यी सिक्रीहरुलाई नतोडेसम्म सहज भावले मानवता या मनुष्यताको कुरो गर्न असम्भव छ । फेरि डराएको समाज कायर बन्छ । प्रतिगामी शक्ति यस्तै समाज चाहेको हुन्छ ,जसले केही गर्दैन र केही गर्नबाट डराउँछ । अब कायर बन्ने या युद्धमा संघर्ष गर्ने छनौटको समय आई सकेको छ ।(This article has published in Yuva.com and ehalkhabar online, August Issue)

Wednesday, 6 September 2017

मधेसलाई नेपालसँग बस्नुपर्ने कुनै कारण छैन : सीके लाल

भारतको अलिगढ मुस्लिम विश्वविद्यालयबाट इन्जिनियरिङ गरेका स्तम्भकार तथा टिप्पणीकार सिके लालले आफ्नो औपचारिक पढाइको क्षेत्रमा भन्दा समाजविज्ञानको क्षेत्रलाई आफ्नो कर्मथलो बनाएका छन् । ०४६ यताबाट उनी नियमित स्तम्भ लेख्ने तथा राजनीतिक टिप्पणी गर्ने काममा लागिरहेका छन् । यसैबीच उनका ह्युमन राइट्स गभर्नेन्स एन्ड डेमोक्रेसी इन साउथ एसिया, नेपालीय हुनलाई र मिथिला मन्थन प्रकाशित भइसकेका छन् । सिके लालसँग नरेश ज्ञवालीले गरेको कुराकानी यहाँ प्रस्तुत गरिएको छ ।
 
धोती लगाएको कालो वर्णको मान्छे देख्ने बित्तिकै यो भारततिरको हो कि भन्ने कुरा मेरो मानसिकतामा किन आउँछ ?
मानिसको सोच पाँचवटा कुराबाट निर्देशित हुन्छ । पहिलो, हामीले जानी नजानी आफ्नो आमा–बुबाको, समाजको र जुन परिवारमा बस्छौँ, तीनका मूल्य, मान्यता ग्रहण गरिरहेका हुन्छौँ । दोस्रो, पाहाडबाट मधेस झर्ने भनेकै मूलतः भारत जानका लागि हो । उनीहरूलाई कहाँबाट मधेसको सिमाना टुङ्गिन्छ र कहाँबाट हिन्दुस्तानको सिमाना सुरु हुन्छ भन्ने कुरा कहिलै स्पष्ट भएन । त्यहाँका मानिसको भेषभूषा, भाषा, संस्कृति उस्तै लागेका कारणले पनि त्यो प्रष्ट नभएको होला । तेस्रो, भारतीय पक्षबाट मधेसी भनेका भारतीय मूलका हुन् भनेर ठूलै हौवा पिटिएको छ । जुन हौवा मानिसलाई अहिले पनि सही नै लाग्छ । भारतीयले त्यो हौवा पिटिदिँदा यताको पूर्वाग्रह झन् बलियो हुन गयो । 
चौथो, काठमाडौँ उपत्यकालाई पृथ्वीनाराण शाहको पालादेखि ‘जफत किल्ला’ मानी आइएको हो । त्यसैले सबैलाई काठमाडौँ आउन राहदानी लिन लगाइयो । त्यो राहदानीलाई राणाकालभरी प्रचार गरियो । १०४ वर्षसम्म कुनै कुरा प्रचलनमा रहने हो भने त्यसले कस्तो मनस्थितिको निर्माण गर्छ बुझ्न गरो छैन । पाँचौँ, अहिले त होइन तर पहिले मधेसमा साक्षरता तुलनात्मक रूपमा बढी थियो । तिनले नाप, तौल जानेका थिए । व्यापार गर्थे । अनि यिनले ठग्छन् भन्ने भावना जानीबुझी बिस्तार गरियो । यस्ता सबै कुराले पाहाडिया मानसिकतामा मधेसी भनेको भारतीय हो, उनीहरू फरक होइनन् भन्ने भावनाको विकास गराउँछ । 
यस्तो धारणामा एकप्रकारले सन् २००६ को जनआन्दोलनपछि परिवर्तन ल्याउने प्रयत्न नभएको होइन । माओवादी नेता मातृका यादवले ‘गर्व से कहु हम मधेसी छी’ भने र काठमाडौँको भित्ता–भित्तमा लेखे । त्यसले परिवर्तन होला जस्तो देखिएको थियो तर दुर्भाग्य पहिलो संविधानसभाको अवसानपछि पुरानो शक्तिले सत्तामा पुनः कब्जा जमायो । पुरानो शक्तिले सत्ता कब्जा गरेपछि अब मधेसीहरूलाई सियोको टुप्पो जति पनि ठाउँ छोड्नु हुँदैन भन्नेमा उनीहरू पुगे र अहिलेको पश्चगामी संविधान लागू भयो । 
राज्यको नीतिबाटै मधेसमा बस्नेहरूप्रति एकखाले धारणा विकास गराइयो र यसमा भारतीय हौवाले ठूलो काम गर्यो भन्ने तपाईंको निष्कर्ष ? 
सबै भावनामा डर र लोभको स्थान प्रमुख हुन्छ भन्ने एउटा भनाइ छ । नेपालका सत्ताधारीको डर के हो भने दक्षिणले हामीलाई मिच्छ । र, लोभ के हो भने त्यसलाई रोक्न सकियो भने हाम्रो एकाधिकार कायम रहन्छ । यही कुरालाई नेपालका सत्ताधारीहरूले जनतामा बेचे । भारतको सत्तालाई लोभ के हो भने हामीले मधेसीलाई भारतीय मूलका भनी राख्यौँ भने यी हाम्रा रहिरहन्छन् । डर के हो भने मधेसीहरू पनि पक्का नेपाली हुने हो भने हाम्रै मान्छे जस्ताहरूबाट सुरक्षा भय हुन सक्छ । त्यही कुरालाई उनीहरूले कहिले आईएसआई, कहिले नक्कली नोट त कहिले मधेसमा धेरै मदरसा खुले भनेर उठाइरहन्छन् । काठमाडौँ र दिल्लीको सत्ताको डर र लोभको दुवै पाटोका बीच मधेसी पिल्सिए । 
सन् १९८० मा हामी जनमत सङ्ग्रहमा पुग्यौँ । जनमत सङ्ग्रहमा के कुरा उठ्यो भने पाहाडका मानिसहरू हुलका हुल ल्याएर मधेसमा बसाइँदै छ, यदि हामी नबोल्ने हो भने यो प्रक्रियाले के रूप लेला । त्यसबेला सुकुम्बासीहरूलाई जग्गा दिने भनिएको थियो । सबैभन्दा धेरै सुकुम्बासी मधेसमै रहेका दलितहरू थिए, तर उनीहरूलाई जग्गा दिइएन । मात्र पाहाडबाट तल झर्नेहरूलाई जग्गा वितरण गरियो । त्यसपछि हर्क गुरुङ प्रतिवेदनले (मेरो बुझाइमा हर्क गुरुङको काँधमा बन्धुक राखेर चलाइएको गोली ।) मधेसीलाई दोस्रो दर्जाको नागरिक बनायो ।
पाहाडमा बस्नेहरूको मानसिकता जसरी विकास गरियो भन्नुभयो, त्यसैगरी मधेसमा बस्नेहरूको पनि मानसिकता विकास गरियो होला ? मधेसमा कस्तो धारणा पाउनुभएको छ ?
मधेसका विषयमा धेरै लेखिएको छैन । पाहाडका बारेमा स्वदेशी, विदेशी धेरैले लेखेका छन् । त्यसैले यसमा आफ्नो अनुभवका आधारमा बोल्नुपर्ने हुन्छ । म सानो हुँदाबाटै हामी हारेकाहरू हौँ र यो राज्य पाहाडीहरूको हो, ती मालिक हुन् र उनीहरूसँग मिलेर बस्नुपर्छ भनेर हामीलाई सिकाइन्थ्यो । भन्नुको अर्थ हामी दोयम दर्जाका नागरिक हौँ भनेर सिकाइन्थ्यो । सन् ७० को दशकपछि नेपालमा आधुनिकताले प्रवेश पायो । त्यहाँबाट होइन मानिस भनेको सबै एउटै हुन् भन्ने धारणा विकसित भयो । एउटै देशमा बसेर, समान कर तिरेर, एउटै कानुन मानेर नागरिक कसरी दुईथरिका हुन् सक्छन् भन्ने भयो । त्यहाँबाट मधेसमा अलिकति असन्तुष्टि देखिन थाल्यो । जुन असन्तुष्टि नेपाली काङ्ग्रेस मार्फत अभिव्यक्त भयो । किनभने त्यस ताका मधेसमा नेपाली काङ्ग्रेस प्रभावशाली थियो । 
तर त्यो विचारलाई झनै कडाइका साथ दबाइयो । सन् १९८० मा हामी जनमत सङ्ग्रहमा पुग्यौँ । जनमत सङ्ग्रहमा के कुरा उठ्यो भने पाहाडका मानिसहरू हुलका हुल ल्याएर मधेसमा बसाइँदै छ, यदि हामी नबोल्ने हो भने यो प्रक्रियाले के रूप लेला । त्यसबेला सुकुम्बासीहरूलाई जग्गा दिने भनिएको थियो । सबैभन्दा धेरै सुकुम्बासी मधेसमै रहेका दलितहरू थिए, तर उनीहरूलाई जग्गा दिइएन । मात्र पाहाडबाट तल झर्नेहरूलाई जग्गा वितरण गरियो । त्यसपछि हर्क गुरुङ प्रतिवेदनले (मेरो बुझाइमा हर्क गुरुङको काँधमा बन्धुक राखेर चलाइएको गोली ।) मधेसीलाई दोस्रो दर्जाको नागरिक बनायो । यो प्रतिवेदनले नागरिकता नहुने सबै आप्रवासी हुन् भनेर घोषणा गरिदियो । अधिकांश नागरिकसँग मधेसमा नागरिकता नै थिएन । 
त्यसको मधेसमा त्यसको व्यापक विरोध भयो र मधेसका जनताको काङ्ग्रेससँग मोहभङ्ग भयो । त्यसपछि मधेसीको भविष्य सुरक्षित गर्नुपर्छ भनेर सप्तरीका गजेन्द्रनारायण सिंहले नेपाल सद्भावना परिषद गठन गरे । यो परिघटनाले भारतलाई लाग्यो मधेस हाम्रो हातबाट फुत्कियो । उता काठमाडौँको राज्यसत्तालाई मधेसको राजनीतिलाई भारतले उचालिरहेको छ भन्ने लाग्न थाल्यो । सन् ८० को मध्यतिर आइपुग्दा मधेस फरक हो र यसको अधिकारका लागि आफै लड्नु पर्छ भन्ने भावना विकसित भयो । त्यसलगत्तै भारतले सन् १९८९ नाकाबन्दी गर्यो । त्यो नाकाबन्दीले मधेसको कार्यसूचीलाई ओझेलमा परिदियो । त्यसलगत्तैको निर्वाचनमा मधेसबाट काङ्ग्रेसले जित्यो र सरकार गठन गर्यो । निर्वाचनसँगै सद्भावना परिषद ओझेलमा पर्यो । तर सत्तामा पुगेको काङ्ग्रेसले मधेसको मुद्धालाई प्राथमिकतामा राखेन । किनभने काङ्ग्रेस काठमाडौँ सत्ताको अङ्ग बनिसकेको थियो । त्यसपछि एमालेले मधेसको पक्षमा केही गर्छ कि भन्ने आश पलायो । तर उसले पनि केही काम गर्न सकेन । 
त्यसपछि माओवादी सशस्त्र विद्रोह नै हो, जसले मधेसमा निकै ठूलो आशा जगायो । किनभने माओवादीले नागरिकताको मुद्दा, दलितको मुद्दा, महिलाको मुद्दाहरू उठाएको थियो । अन्तरिम संविधान लागू हुँदासम्म त्यसको एउटा पक्ष माओवादी थियो । तर मधेसको अधिकारको पक्षमा माओवादी कहीँ पनि अडिएन । अनि उपेन्द्र यादवको नेतृत्वमा मधेस विद्रोह भयो । समस्या के भयो भने मधेसमा पहिलो मधेस विद्रोह चल्दै गर्दा माओवादी निकै सशक्त थियो । त्यसकारण काठमाडौँको सत्ताले उपेन्द्र यादवलाई प्रयोग गर्न सके माओवादीलाई मधेसमा रोक्न सकिन्छ कि भन्ने बुझाइका कारण त्यसलाई मलजल गर्न पुगे । सँगसँगै त्यसलाई भारतीय समर्थन पनि प्राप्त भयो । यी सबै उतार–चढावले गर्दा मधेसको मुद्दा स्थापित त भयो तर त्यसले खासै उपलब्धि हासिल गर्न सकेन । 
पटक पटकका आन्दोलनले पुरानो मानसिकतामा के कति परिवर्तन ल्याए होलान् ?
मधेसमा देखिएको मुख्य परिवर्तन भनेको के हो भने सजिलै अधिकार पाइनेवाला छैन । नेपाली काङ्ग्रेसले युद्ध लडेको हो । त्यसका नेता ३० वर्षसम्म निर्वासनमा बसेका हुन् । एमालेले टाउको काट्दै हिँडेको हो । माओवादीको सशस्त्र विद्रोहमा १७ हजार नेपालीले ज्यान गुमाएका हुन् । त्यसको दममा उनीहरू स्थापित भएका हुन् । बिना सङ्घर्ष सम्झौताको आधारमा समानताको अधिकार त पाइदैन भन्ने स्थापित भएको छ । मुद्दा कहिले ओझेलमा पर्छ कहिले अगाडि आउँछ । तर सङ्घर्ष निरन्तर जारी छ । मधेस सङ्घर्षको यो एक सय वर्षमा पहिलो पटक हो, जति बेला उनीहरूले आन्दोलनबाट पाएको कुरा खोसिएको छ । त्यसकारण अहिले निराशा, वितृष्णा अलिक बढी छ । तर मुद्दाका हिसाबले आन्दोलन अगाडि नै बढेको छ । 
काठमाडौँको सत्ता अलिकति सहिष्णु नहुने हो भने मधेसको मुद्दा सल्टिने सम्भावना देखिँदैन । यो विस्तारै फैलिँदै गरेको भुसको आगो सरह हो । थोरै असहज अनुभूत भयो भने यो फेरि प्रज्वलनशील भएर दन्किन बेर लाग्दैन । त्यसैले काठमाडौँको सत्ताको सहनसिलता महत्वपूर्ण हो । जहाँसम्म दिल्लीको कुरा छ, उसले मधेसको मुद्दामा किन आफ्नो टाउको दुखाओस् । उसलाई जे लिनु छ, त्यो काठमाडौँको सत्तासँग छ । दिल्लीले काठमाडौँसँग चाहने भनेको पानी र जवानी हो ।
मधेसमा भएका आन्दोलन, काठमाडौँ र दिल्लीको सत्ता स्वार्थबीच मधेसको भविष्य कस्तो देख्नु हुन्छ ?
काठमाडौँको सत्ता अलिकति सहिष्णु नहुने हो भने मधेसको मुद्दा सल्टिने सम्भावना देखिँदैन । यो विस्तारै फैलिँदै गरेको भुसको आगो सरह हो । थोरै असहज अनुभूत भयो भने यो फेरि प्रज्वलनशील भएर दन्किन बेर लाग्दैन । त्यसैले काठमाडौँको सत्ताको सहनसिलता महत्वपूर्ण हो । जहाँसम्म दिल्लीको कुरा छ, उसले मधेसको मुद्दामा किन आफ्नो टाउको दुखाओस् । उसलाई जे लिनु छ, त्यो काठमाडौँको सत्तासँग छ । दिल्लीले काठमाडौँसँग चाहने भनेको पानी र जवानी हो । मोदीले यो वाक्य त्यसै प्रयोग गरेका थिएनन् । पानी भनेको नेपालका नदी हुन र जवानी भनेको नेपालको गोर्खा भर्ती हो । मधेसलाई उसले एउटा कार्डभन्दा बढी कहिलै पनि ठान्दैन । 
काठमाडौँसँग भारतलाई केही चाहिँदा र उसले आनाकानी गर्दा त्यो ‘मधेस कार्ड’ भारतले मज्जैले प्रयोग गर्ला नि होइन ?
दिल्लीले त्यो कोशिस प्रत्येक पटक गरेको छ । जस्तो कि सन् १९८९ को नाकाबन्दीमा भारतलाई मधेसले हाम्रो पक्षमा बोल्नेछ भन्ने ठूलो आशा थियो । तर मधेस बोलेन । उसले काङ्ग्रेसलाई साथ दियो । त्यतिबेला काङ्ग्रेसले यसपालि न्याय हुन्छ भनेकै आधारमा भारतको पक्षमा मधेसमा एउटा कुकुर पनि भुकेन । तर सन् २०१५ सम्म आई पुग्दा भारतको रणनीति केही हदसम्म सफल भएको देखिन्छ । जस्तो कि नाकाकसीको नैतिक जिम्मेवारी मधेसीले लिइदिएका हुन् । भन्नुको अर्थ भारतलाई सन् १९८९ मा जस्तो सन् २०१५ मा अन्तर्राष्ट्रिय स्तरमा बेइज्जत हुनुपरेन । अहिले त झनै के भयो भने नेपालको आन्तरिक मामिलामा भारतले कमजोरको पक्ष लिएको जसरी उसको अन्तर्राष्ट्रिय मञ्चमा झनै राम्रो छवि निर्माण भयो । यसको अर्थ मधेसीले मोदीको नाक जोगाइदिए । 
मधेसमा चीनको झण्डा जलाउने र भारतको झण्डा गर्वका साथ फहर्याउने मानसिकताको विकास कसरी गरियो होला ? 
भारत–पाकिस्तानको म्याच हुँदा पाहाडमा पाकिस्तानको झण्डा देखाउनेदेखि अधिकांश खस–आर्यहरू किन पाकिस्तानको पक्षमा उभिन्छन् भन्ने ख्याल गर्नु भएको छ ? किनभने पाहाडमा भारत विरोधी भावना बलियो छ । यसको विपरित मधेसमा नातागोता, दाजुभाई र वारीपारीको सम्बन्धले पनि भारतको पक्षमा बन्धुत्व भाव छ । तर यसको अर्थ त्यो राजनीतिमा पनि कायम हुन्छ भन्ने छैन । तर एउटा कुरा पक्का हो, जसमा दास मानसिकता हुन्छ उसमा धार्मिक भावना अलिक बढी हुन्छ । किनभने उसले मुक्तीको अरु बाटो देखेको हुँदैन । पाहाडका लागि धेरै विकल्प छन् जुन मधेसका लागि खुला छैनन् । हिन्दीमा एउटा भनाई छ– ‘डुबते को तीनके का साहारा’ । मधेसीलाई भारतले साथ दिँदैनन भन्ने जान्दा जान्दै पनि त्यसको पछाडि लाग्न बाध्य छन् । 
नेपाल–भारत सम्बन्धलाई ‘रोटी–बेटी’को नाम दिएर विशिष्ट सम्बन्धको रूपमा अर्थाउने गरिन्छ । दुई राष्ट्रको अन्तर्राष्ट्रिय सम्बन्धलाई यसरी अर्थ लगाउनु सही हो ?
यसका दुईवटा पक्ष छन् । पृथ्वीनारायण शाहको पालादेखि राणा र शाहहरूले भारतका राजा–रजौटाहरूसँग बिहे गर्ने चलन छ । राणाहरूले भारतको राजपुतसँग बिहे गर्थे तर नेपालको राजपुतसँग गर्दैनथे । किनभने रैतीसँग बिहे सम्बन्ध गाँस्ने कुरा भएन । त्यसैगरी मधेसमा पनि बिहे गरेर दिने र बिहे गरेर ल्याउने प्रचलन रहेको छ । त्यसैले यो परम्परा मधेस र पाहाड दुवैमा रहेको छ । मधेसमा चाहिँ अलिक बढी थियो । नेपाल–भारतसम्बन्धमा बेटीको सम्बन्ध यही हो । रोटीको सम्बन्ध कहाँबाट जोडिएको छ भने पहिले पहिले चौगामा भोज भन्ने गरिन्थ्यो । चौगामा भोज भनेको चार गाउँको भोज भनेको हो । त्यहाँ अन्तर्राष्ट्रिय सिमानाको कुनै अर्थ हुँदैन्थ्यो । आजको सन्दर्भमा यो दुवै कुरा कमजोर भएर गएका छन् । भन्नुको अर्थ रोटी–बेटीको सम्बन्ध कमजोर हुँदै गएको छ । 
फिजीकरण नेपालको होइन, मधेसको भइसकेको छ । मधेसमा पहिले पाहाडको जनसङ्ख्या १० प्रतिशत थियो आज एक तिहाई नाघिसकेको छ । जहाँसम्म सिक्किमीकरणको कुरा छ, त्यो यी पाहाडी मूलका नेपाली भाषीहरूले गरेका हुन् । भनेपछि हाम्रा मान्छेले जे गरे त्यही अरूले पनि गर्छन् भन्ने छ र < फेरि अर्को कुरा सिक्किमीकरण गरेर सिक्किमको राम्रो भयो कि नराम्रो भन्ने कुरा सिक्किमेलीलाई सोध्नुपर्यो । तिब्बतलाई चीनले लिएर राम्रो भयो कि नराम्रो तिब्बतीलाई सोध्ने हो ।
मधेसमा उठेको नागरिकताको विषयलाई काठमाडौँमा ‘फिजीकरण’ र ‘सिक्किमीकरण’का रूपमा हेर्ने गरिन्छ, जुन भारतको जनसङ्ख्याको अगाडि चिन्ताजनक नै लाग्छ । यसमा तपाईंको बुझाइ के हो ?
यो सोझै भ्रम सिर्जना गर्न खोजिएको हो । मधेसको नागरिकताको विषय काठमाडौँको स्थायी सत्ताका लागि एटीएम कार्ड हो । जति पटक सीडीओ र अञ्चलाधीश फेरिए त्यति पटक नागरिकता बनाउनुपर्ने । कहिले कसको नक्कली त कहिले कसको नक्कली । बनाई दिने को हो भन्ने बारेमा कुनै सोध खोज छैन । यो विभिन्न बाहानामा पैसा असुली गर्ने माध्यम बनेको छ । नेपालको नागरिकता लिनु अमेरिकाको ग्रिन कार्ड पाउनुभन्दा गारो छ । तपाईं आफै भन्नुस कसैले ग्रिन कार्ड छोडेर नेपालमा बस्न आउला ? तपाईंलाई अझै पनि लाग्छ कि बङ्गाली, बिहारी, सिक्किमेली, गढवाली अथवा उत्तराखण्डी आफ्नो नागरिकता त्यागेर नेपालमा आउलान् ? आजको समयमा संसारको सबैभन्दा धेरै विकास गरिरहेको अर्थतन्त्रमध्येको भारतबाट संसारको १० सबैभन्दा गरिब देशहरूमध्येको एक नेपालमा कोही आउला भन्ने मलाई लाग्दैन ।
फिजीकरण नेपालको होइन, मधेसको भइसकेको छ । मधेसमा पहिले पाहाडको जनसङ्ख्या १० प्रतिशत थियो आज एक तिहाई नाघिसकेको छ । जहाँसम्म सिक्किमीकरणको कुरा छ, त्यो यी पाहाडी मूलका नेपाली भाषीहरूले गरेका हुन् । भनेपछि हाम्रा मान्छेले जे गरे त्यही अरूले पनि गर्छन् भन्ने छ र ? भारतले बरु बङ्गालदेश बनाई दिएको छ । श्रीलङ्का जोगाइ दिएको छ । फेरि अर्को कुरा सिक्किमीकरण गरेर सिक्किमको राम्रो भयो कि नराम्रो भन्ने कुरा सिक्किमेलीलाई सोध्नुपर्यो । तिब्बतलाई चीनले लिएर राम्रो भयो कि नराम्रो तिब्बतीलाई सोध्ने हो । यस्ता मनोगत कुरा उठाएर जनसमूहलाई दास बनाई राख्ने यो भ्रम प्रचार हो । 
मधेस केन्द्रित दलहरू कमजोर हुनु, सीके राउतका समर्थक बढ्दै जानु साथै उनले सशस्त्र युद्ध होइन कि शान्तिपूर्ण आन्दोलन मार्फत नेपालबाट मधेसलाई अलग गर्ने कुरा गर्नुले मधेसको भावि राजनीतिलाई कतातर्फ डोर्याउला ? तपार्इंले यसलाई कसरी हेर्नु भएको छ ? 
सीके राउतको अडान सैद्धान्तिक अडान हो । दोस्रो विश्वयुद्धपछि संयुक्त राष्ट्रसङ्घको स्थापना हुँदा ४५ देश थिए । पछि ६० भए र अहिले २ सयको हाराहारीमा छन् । ४५ बाट २ सय राष्ट्रहरू बन्ने प्रक्रिया मङ्गलग्रहबाट झरेर बनेको होइन । यहीँका देशबाट स्वतन्त्रता प्राप्त गरेर देश बनेका हुन् । राष्ट्रको निर्माण कसरी हुन्छ ? भन्ने कुरामा हामीले ध्यान दिनुपर्ने हुन्छ । यसका केही आधार हुन्छन् । जस्तै, पहिलो, केन्द्र निकै कमजोर भयो भने त्यहाँबाट छुट्टिने रहर जाग्छ । दोस्रो, शोषण बढ्यो भने छुट्टिने रहर जाग्छ । (उदाहरणको रूपमा बङ्गालादेश । पाकिस्तानको शोषणले सीमा नाघेपछि बङ्गलादेशलाई स्वतन्त्र हुने बाध्यता जाग्यो ।) तेस्रो, नागरिकलाई सम्मान र समान व्यवहार गरिएन भने छुट्टिने रहर जाग्छ । चौथो, व्यक्तिको महत्वकाङ्क्षाले पनि राष्ट्रको भूगोल बदलिन्छ । जसरी जिन्नाले विश्व मानचित्रमा पाकिस्तान भन्ने देश थपे । 
नेपालको सन्दर्भमा कुरा गर्ने हो भने मधेसको नेपाल राज्यसँग छुट्टिने लगभग सबै कारण विद्यमान छन् । दमनले सीमा नाघेको छ । मधेसीको सम्मान स्थापित छैन । मधेसको दृष्टिकोणबाट हेर्दा केन्द्र निकै कमजोर छ । जसले न मधेसीको सुरक्षा गर्छ न सेवा दिन्छ । साधन, स्रोत र सत्तामाथि खसआर्यको एकाधिकार रहँदै आएको छ । तर पनि मधेसलाई स्वतन्त्र हुन नदिने तीन कारण छन् । पहिलो, नेतृत्वको कमी । सीके राउतमा मोहम्मद अलि जिन्नाको जति लौह निश्चय देखिँदैन । दोस्रो, भूराजनीति । कुनै पनि राष्ट्र स्वतन्त्र हुनका लागि भूराजनीति निर्णायक हुन्छ । भारतले चाह्यो बङ्गालदेश बन्यो । भारतले चाहेन तमिल इलम बनेन । अस्टे«लियाले चाह्यो इस्टटिमोर छुट्टियो तर कसैले पनि साथ दिएनन्, इन्डोनेसिया, फिलिपिन्स यथावत छन् । बेलायतले चाह्यो मलेसियाबाट शन्तिपूर्ण ढङ्गले सिङ्गापुर निस्कियो । तर त्यस्तै अवस्था बेलायत, इटली अथवा जर्मनीमा हुँदाहुँदै पनि सम्भव देखिएको छैन । 
त्यसैले मधेसको पक्षमा भूराजनीति छैन । भारत आफ्नो दुइटा मुटु उत्तरप्रदेश र बङ्गाल नजिकै छुट्टै देश चाहँदैन । ऊ आफूप्रति निकै बफादार सेना गोर्खाली पल्टनमा टाउको दुखाइ चाहँदैन । त्यसैले भारत स्वतन्त्र मधेसको पक्षमा हुँदैन । चीन पनि स्वतन्त्र मधेसको पक्षमा छैन । पश्चिमाहरूको सोझो कुरा छ । जे कुरा भारत र चीन चाहँदैनन्, उनीहरू पनि त्यो कुरा चाहँदैनन् । तेस्रो, आर्थिक स्रोत । मधेस राष्ट्र हुनका लागि त्यसको बलियो आर्थिक स्रोत हुनुपर्छ । मधेसमा इराकको जस्तो तेल अथवा सेरालियोनको जस्तो हीराको खानी भएको भए अमेरिकीहरूले उहिलै स्वतन्त्र राष्ट्र बनाई दिइसकेका हुन्थे । किनभने मधेसलाई नेपाल राज्यसँग बस्नुपर्ने कुनै कारण छैन । सेना, प्रहरी, प्रशासन, सत्ता, मिडिया कहीँ पनि उनका आफ्ना मान्छे छैनन् । हरेक दृष्टिकोणले मधेसको नेपालसँग न अपनत्व छ, न यो राष्ट्रसँग ममत्व छ । मात्र एउटा दासले मालिकप्रति देखाउनुपर्ने समपर्ण भावबाहेक केही छैन । 
अहिले मधेसवादीले भनेको कुरा– हामी निर्वस्त्र भयौँ, एउटा लँगौटी देऊ हामी मधेसलाई सम्झाउँछौँ भनेको हो । संविधान संशोधन मार्फत मागेको त्यति एउटा लँगौटी हो । तर नेपालको सत्ताले होइन, तँ नाङ्गै जा भनेर पठाइदियो । हामीसँग विकल्प भएन भने पहिले विजय गच्छदार फेरि उपेन्द्र यादव र अहिले सबै मधेस केन्द्रित दल नाङ्गै मधेस झरे ।
आजको विश्वका पुँजीवादीहरू नफासहितको स्वतन्त्रतामा लगानी गर्छन् तर नाफा नआउने ठाउँमा चाँसो समेत गर्दैनन् । त्यसैले विश्व पुँजीवादलाई पनि मधेसको स्वतन्त्रतामा रुचि छैन । यी सबै कुराबाट मधेसका अगाडि अमेरिकी अर्थशास्त्रीले भनेझै तीनवटा विकल्प देखिन्छन् । पहिलो, सत्तासँग बफादारी देखाउने । बफादारीता देखाए बापत दुई छाक खान कुकुरले पनि पाउँछ, मधेसीले पनि पाउँछन् । दोस्रो, एक्जिट हो । बाहिर निस्कने । धेरै मधेसी यो प्रक्रियामा दिक्क मानेर विदेशिएका छन् । तेस्रो, आवाज बलियो पार्ने । आवाज बुलन्द गर्ने काम विगत एक सय वर्षदेखि चलिआएको छ । तर पटक पटक यसलाई दबाउने काम भइआएको छ । यस पटक पनि मधेसी जनताको आवाज दबाइएको छ । तर आवाज बुलन्द गर्ने काम जनताको उनीहरू आवाज बुलन्द गरिरहन्छन् । यी तीन विकल्पमध्ये कुनैले काम गरेन भने अन्तिम विकल्प भनेको विद्रोह हो । जुन विद्रोहको बाटोमा डा. सीके राउत हिँड्दै छन् । रह्यो शान्तिपूर्ण अथवा सशस्त्र भन्ने कुरा त्यो त उपाय मात्र हो । यदि उद्देश्य विद्रोह हो भने उपाय परिस्थितिले जन्माउँछ । 
जसरी मधेस आन्दोलनका आयाम अगाडि आउँदै छन्, तिनको सम्बोधन गर्न के गर्नुपर्ने देख्नु हुन्छ ?
अहिले मधेसवादीले भनेको कुरा– हामी निर्वस्त्र भयौँ, एउटा लँगौटी देऊ हामी मधेसलाई सम्झाउँछौँ भनेको हो । संविधान संशोधन मार्फत मागेको त्यति एउटा लँगौटी हो । तर नेपालको सत्ताले होइन, तँ नाङ्गै जा भनेर पठाइदियो । हामीसँग विकल्प भएन भने पहिले विजय गच्छदार फेरि उपेन्द्र यादव र अहिले सबै मधेस केन्द्रित दल नाङ्गै मधेस झरे । यो घटनाले केन्द्रमा र मधेसमा कसैलाई पनि नाङ्गिनबाट बचाउन सकेन । यसले मधेसीको घाउमा नुन–चुक दल्ने काम भएको छ । यसले घाउ झनै बल्झिने हो । अझै पनि मधेसको मूल मुद्दा नागरिकता, भाषाको सम्मान र प्रतिनिधित्व नै हो । यो कुरा पुरा नभएसम्म यो चरणको आन्दोलनले सही निकास पाउँदैन ।
मधेसलाई नेपालसँग बस्नुपर्ने कुनै कारण छैन : सीके लाल | Ratopati :: For Latest Nepal news and updates

Sunday, 3 September 2017

मोवाईल प्रयोगकर्ताले जान्नैपर्ने कुराहरु

एन्ड्रोइड फोन मिनी कम्प्युटर हो । यसभित्र पनि मदरबोर्ड, प्रोसेसर, रयाम र मेमोरीलगायतका उपकरण जडान गरिएका हुन्छन् । जहा“ गए नि संगै बोकेर लगिने भएकाले यसमा व्याट्रीको महत्वपूर्ण भूमिका रहन्छ । खेल, मनोरञ्जन, पठनीय सामग्री, सुचना आदानप्रदानलगायतका सुविधा एन्ड्रोइड मोबाइलबाट लिन सकिने भएकाले यसको प्रयोग र हेरचारमा ध्यान दिन जरुरी छ । विभिन्न एप्सहरु डाउनलोड गरेपछि यो साच्चीकै स्मार्ट बन्न पुग्छ । हिजोआज स्मार्टफोन मानिसको जीवनशैलीको अभिन्न अंग बनिसकेको छ । यो व्यक्तिको आवश्यकतामा मात्रै सीमित छैन, फेसनको प्रतिक समेत बनेको छ । त्यसैले यसलाई सुरक्षित बनाउन र लामोसमय समय टिकाइ राख्नु आजको चुनौति हो । यो आलेख मोबाइलको सुरक्षा, महत्वपूर्ण एप्स, ह्याङ्ग हुनबाट बचाउने र ब्याट्रीलाई धेरै टिकाउन बनाउने केही टिप्पहरु प्रस्तुत गरिएका छन् ।
मोबाइलको सुरक्षा :–

  • केही दिन प्रयोग गरेपछि स्मार्टफोनको डिस्प्लेमा धुलो टा“सिन र स्क्रेच पर्न सक्छ । मोबाइल सफा गर्ने क्रममा आफूसंग भएको रुमाल, कपडा, टीशर्ट या टावेलको प्रयोग गर्नु हुन्न । यी वस्तुले मोबाइलको डिस्प्लेमा सानातिना धर्साहरु पर्न सक्छ । डिस्प्ले सफा गर्दा माइक्रोफाइबर कपडाको प्रयोग गर्नु राम्रो हुन्छ । सय रुपैयामा यो सजिलै पाउन सकिन्छ । यसका लागि विशेषखालको तरल पदार्थ पनि प्रयोग गर्न सकिन्छ । 
  • मोबाइलको सुरक्षामा स्क्रीन गार्डको भूमिका महत्वपूर्ण हुन्छ । स–साना पसलहरुमा पनि सजिलै पाइने भएकाले सस्तो गार्डको प्रयोग गर्नु हुन्न । स्क्रिन गार्ड राम्रो भए फोन खसेमा पनि स्क्रीनमा खासै असर पर्दैन । त्यसैले अलिक महंगो भएपनि असल खालको गार्ड रोज्नु पर्छ । 
  • मोबाइल फोन पेन्ट या जिन्सको खल्तीमा राख्नुको साटो मोबाइल क्यारी÷पाउचको प्रयोग गर्नुपर्छ । यसले पेन्टको बेल्टमा पनि झुन्डयाउन सकिन्छ । यसबाट दुईटा  चोरी हुने खतरा र खस्ने डर हु“दैन । 
  • मोबाइलको ब्याट्रीको चार्ज ५० प्रतिशत भन्दा कम भएको अवस्थामा मात्रै चार्जिङ गर्नुपर्छ । चार्जिङ गर्दा जुनसुकै चार्जरको प्रयोग गर्नु हुदैन । यो स्मार्टफोनको हितमा पनि हुदैन । सकेसम्म कम्पनीकै चार्जर प्रयोग गर्दा ब्याट्री राम्ररी चार्ज हुनुको साथै छिटै खराब ह“ुदैन ।    
  •  मोबाइलमा गेम खेल्दा या अन्य कुनै काम गर्दा फोनमा भएको सीपीयु र रयामको प्रयोग संगसंगै हुन्छ । आवश्यकता भन्दा बढी प्रयोगले मोबाइल तातिन सक्छ । यसले मोबाइलको आयु घट्छ । त्यसैले लगातार लामो समयसम्म यसको प्रयोग गर्नु हु“दैन ।  


  •  मोबाइललाई राती चार्जिङ मै छाडेर सुत्नु हुदैन । ओभर चार्जिङले फोनको ब्याट्री छिटै खराब हुन्छ । बरु थोरै–थोरै गरी चार्ज गर्न सकिन्छ । विद्युत नभएको बेला पावर बैंकको प्रयोग पनि गर्न सकिन्छ ।  
  • साथीहरुसंग कुनै फाइल्स या भिडियो सेयर गर्दा मोबाइलमा भाइरस छिर्ने सम्भावना हुन्छ । एक पटक भाइरस छिरेपछि मोबाइलले राम्ररी काम गर्दैन । यसका लागि एन्टीभाइरस पनि जडान गर्नुपर्छ । 
  • अनावश्यक भिडियो र फोटोहरु राखेर मोबाइलको इन्टरनल मेमोरीलाई डस्टबीन बनाउनु हुदैन । यसले मेमोरी चाडै भरिन्छ, मोबाइलले विस्तारै काम गर्न थाल्छ । यसका लागि ब्याकअफ राख्न सकिन्छ । 
  • एक अध्ययनले फोन खराब हुनुको प्रमुख कारण भूईमा खस्नु पनि हो । मोटरसाइकलमा यात्रा गर्दा या हिड्दा हिड्दै मोबाइलको प्रयोग गर्ने क्रममा खस्ने गर्छ । यस्तो अवस्थामा बाइकलाई साइड गरेर या सुरक्षित ठाउमा उभिएर फोन गर्नु पर्छ । यो सम्भव नभए ब्लुटुथ हेडसेट या इयरफोनको प्रयोग गर्न सकिन्छ ।  
  • बालबालिकालाई आफ्नो स्मार्टफोन दिनु हुदैन । किनभने उनीहरु गेम मात्रै खेल्छन, मोबाइल चलाउने बारे अरु केही थाहा हुदैन । बालबालिकाले झुकिएर आवश्यक फाइल डिलिट गर्न सक्छन । पानी, जमिनमा खसाएर बिगार्न पनि सक्छन् । 
  • सानो र सबै ठाउ“मा लग्न मिल्ने भएकाले कहिलेकाही हराउने या चोरिने संभावना हुन्छ । गलत व्यक्तिको हातमा परे व्यक्तिगत डाटा, नीजि सुचनाहरुको मिसयुज हुन सक्ने भएकाले यसबाट बच्न मोबाइललाई ‘अटो–लक’मा राख्नु पर्छ । अटो–लक गरिएको मोबाइल पाच मिनेटमा बन्द हुने र खोल्न पासवर्ड चाहिने भएकाले सुरक्षित रहन्छ ।  
मोबाइलमा एप्स :–
सामान्यतया मोबाइल एप्सलाई पा“च खालका छन् । ती हुन् शपिङ, सोसल मिडिया, युटिलिटी र प्रडक्टिभीटी, इमेल र म्यासेज एप्स । सपिङ एप्समा फ््िलपकार्ट, सप–हर, पेटिएम, स्प्रिङ प्रमुख हुन भने सोसलमिडियामा फेसबुक, ह्वाट्सएपलगायतका छन् । यसैगरि माइक्रोसफ्ट अफिस एप्स युटिलिटी र प्रोडक्टिभीटीमा सबैभन्दा बढी प्रयोग हुने गर्छ । यसको प्रयोग विन्डोज फोनदेखि आईओएस र एन्ड्रोएड फोनमा पनि सजिलै गर्न सकिन्छ । त्यस्तै, मोबाइलमा इमेल पठाउनका लागि एकमप्लि र म्यासेज पठाउनका लागि स्नेपचैट, लाइन, ह्वाट्सअपलगायत प्रयोग गर्न सकिन्छ । यी बाहेक स्काइपी, ट्वीटर, एडब फ्ल्यास प्लेयर, फेसबुक म्यासेन्जर, एडब रिडर, इन्स्टाग्राम, गुगल प्ले म्युजिक, भाईबर, ड्रपबक्स,  गुगल प्लेबुक, स्ट्रिट भिउ अन गुगल म्याप्स, क्यान्डी क्रुस सागा, गुगल ट्रान्सलेटलगायतका ५० भन्दा बढी एप्स विकसित भइसकेका छन् ।  

  • सफ्टवेयर समय–समयमा अप टू डेट गरि राख्नु पर्छ । यसले दुष्ट ह्याकरहरुबाट बच्न सहयोग गर्छ । डिभाइस उत्पादक र एप्स विकास गर्नेहरुले आफ्नो सफ्टवेयरलाई लगातार अपडेट गरिरहने भएकाले नया“ सुरक्षा ग्यापबाट बच्न सहयोग पुग्छ । अपडेट नगरिएको अवस्थामा रिक्स उठाउनु पर्ने हुन सक्छ । 
  • एप्सहरु डाउनलोड गर्दा विवेकको प्रयोग गनु पर्छ । सचेत र सावधानीपूर्वक डाउनलोड गर्नु पर्छ । जस्तो पाए त्यस्तै एप्सको प्रयोगले मोबाइल हाइजेक हुन सक्छ ।  एप्सको रेटिङ र रिभ्युहरु पढेर विश्वासिलो एप्सको मात्रै प्रयोग गर्नु उपर्युक्त हुन्छ । 
  • सार्वजनिक वाईफाई नेटवर्क सर्वव्यापी बनेको अवस्था छ । तर यस्ता नेटवर्कहरुका लागि सुरक्षा दुर्लभ हुने भएकाले प्रयोग गर्दा सावधानी अप्नाउनु पर्छ । सार्वजनिक वाइफाई नेटवर्कहरु अन्यले पनि हेर्ने हुदा यस्तो अवस्थामा पासवर्ड अरुले थाहा पाउने सम्भावना हुन्छ । बैंकको एकान्ट नम्बर या क्रेडिट कार्ड नम्बर चोरिने अवस्था पनि हुने भएकाले सुरक्षित भई यस्ता नेटवर्कको प्रयोग गर्नुपर्छ । 
  • पीसीमा जस्तै आफ्नो मोबाइललाई सुरक्षित राख्नु पर्छ । अधिकांश मानिसले पहिलेनै भाइरस र स्पाइवेयरदेखि आफ्नो पीसीका लागि सुरक्षित सफ्टवेयरको प्रयोग गरेका हुन्छ । मोबाइलमा पनि यस्तै उपाय अप्नाउनु पर्छ । 
  • पानीलगायतका कुनै तरल वस्तुमा मोबाइल खस्दा स्मार्टफोन तत्कालै बन्द हुने, ह्यांग हुनु, पटक–पटक मोबाइल रिस्टार्ट हुने, चार्जिङ नहुनु या भएपनि केही क्षणमा यो बन्द हुने, स्पीकर या रिंगरले कार्य गर्न छाड्ने र फोनको माइकले काम नगर्नेलगायतका खराबीहरु देखिन सक्छ । यस्तो अवस्था भए मोबाइलबाट तत्कालै ब्याट्री झिक्नु पर्छ । यसले मोबाइलभित्र ब्याट्री चार्ज रहेको अवस्थामा सर्ट–सर्किट भई फोनले काम गर्न छाड्छ । ब्याट्री झिकि सकेपछि सावधानीपूर्वक फोनको डिस्प्ले र कनेक्टरसंग जोडिएका सबै पार्टसलाई पिसीबीबाट अलग गर्नु पर्छ । यसपछि थिनर(असिटोन या आइसो–प्रोपानल) हालेर ब्रसले विस्तारै मोबाइल सफा गर्नुपर्छ । यसैगरि पानी रहेको स्थानलाई पनि सफा गर्न सकिन्छ । तत्कालै हट एयर गनले हलुका रुपमा ताम दिएर फोनलाई सुकाउनु पर्छ । सबै पार्ट सुकेको ढुक्क भएपछि मोबाइललाइ सेट गरी अन गर्नुपर्छ , अन भए सबै ठीक छ भनेर बुझ्नु पर्छ । मोबाइल खुलेन भने सोफ्टरलाई जोडेर चेक गर्नु पर्छ । यी सब गर्न उपकरणको अभाव भए पानीमा खसेलगतै मोबाइल खोलेर घाममा सुकाउनु पर्छ। यति गर्दा पनि काम गरेन भने नजिकैको मोबाइल पसलमा सम्पर्क गर्नुपर्छ । 
ब्याट्रीको बचाउ कसरी गर्ने 
  • टच स्क्रिन भएको स्मार्टफोनमा आधी ब्याटी स्क्रिनले मात्रै खर्च गर्ने हुुदा मोवाइलको स्क्रिनको ब्राइटनेस कम गर्ने,ब्राइटनेसका लागि अटो मोड भए त्यसको प्रयोग गर्ने,५० प्रतिशत ब्राइटनेस राख्ने।
  • कहिलेकाही मात्र प्रयोग गर्ने जीपीएस(ग्लोबल पोजिसनिंग सिस्टम) बन्द राख्नु पर्छ,ब्लुटुथ र वाईफाई बन्द गर्ने । रेन्ज बाहिर बाइफाइ अन भएको अवस्थामा सिग्नल खोज्न मै बढी ब्याटी खर्च हुन्छ ।
  • रिंगटोनको तुलनामा भाईब्रेसनमा बढी पावर खर्चिने हुंदा फोनलाई आवश्यक परेको अवस्थामा मात्र भाईब्रेसनमा राख्नुपर्छ  
  • तैरिरहेको माछा, विस्तारै हल्लिने पात जस्ता मोबाईलमा लाइभ वालपेपर नराख्ने , बरु कुनै डार्क रंगको वालपेपर राख्ने ।
  • फोन बढी तातो भएको अनुभव भए त्यसले बढी ब्याटी खपत गरिहको बुझनु पर्छ । ब्याटी कम भईसकेको अवस्थामा क्यामेरा र भिडियोको प्रयोग नगर्ने ।
  • एप्लिकेसन्स सही ढंगले बन्द गर्ने । नया प्रयोगकर्ताले सबैभन्दा बढी गल्ति यही गर्छन् । होम बटन दबाएर एप्लिकेसन्स बन्द हुदैन, ब्याकग्राउण्डमा जान्छ, यसले ब्याट्री र म्यामोरी दुबैलाई हानी हुन्छ । एप्लिकेन्स बन्द नभएसम्म ब्याक बटन दबाई राख्नु पर्छ जबसम्म एपबाट बाहिर निस्किन्न । त्यस्तै एक्जिट बटमको पनि प्रयोग गर्न सकिन्छ ।
  • अनावश्यक एप डाउनलोड गर्नु हुन्न । धेरै एप सित्तैमा डाउनलोड गर्न सकिन्छ । मोबाइललाई एप्सको डंगुर बनाउनबाट बच्नु पर्छ । जुन एप्सको प्रयोग गर्नुहुन्न त्यसलाई हटाउनु पर्छ । 
  • विजेट्सले स्क्रिनमा धेरै स्थान ओगट्छ । मौसमबारे जानकारी दिने या फेसबुक र ट्वीटरको विजेट्स । आफै अपडेट हुने अपडेट विजेट्सले ब्याट्रीको आयु घटनाउछ, ।यसले इन्टरनेटको बिल पनि बढाउछ । 
  • फोनको होम स्क्रिनमा एप्सको आइकन्सको भीड लगाउन हुन्न । जुन एप्स कहिलेकाही मात्रै प्रयोग गरिन्छ, त्यस्तालाई होम स्क्रिनमा नराखेर मेन्युको भित्र गएर खोल्नु पर्छ । 
  • प्ले स्टोरबाट ब्याट्री सेभिङ एप्पस डाउनलोड गर्नु राम्रो होइन । ब्याट्री सेभिङ एप्स धेरै विवादको विषय हो । विशेषज्ञहरुका अनुसार यो एप्स जति ब्याट्री बचाउछ त्यो भन्दा बढी त्यो एप्स चलाउनमा खर्च गर्छ । यस्तो अवस्थामा फोनको इनबिल्ट पावर सेभरको प्रयोग गर्नु पर्छ , 
  • एप्सलाई अटो अपडेट हुन दिनु हुदैन । एन्डोइड फोनको सबै एप हालका दिनमा अपडेट भइरहन्छ । घडी घडी एप्स अपटेड गर्दा ब्याट्री र डेटा चार्जेज दुबैलाइ समस्या हुन्छ , 
  • एप्सको  सिन्क इन्टरभल कम गर्नु पर्छ । तपाईको फोनमा कति सेवाहरु लगातार चलिरहेको छ अर्थात सिन्क भइरहेको त्यसमा ध्यान दिनु पर्छ । फेसबुक, टवीटर, जीमेल, अफिस मेल, गुगल प्लसले ब्याट्री मात्रै खपट गर्दै डेटा पनि लिन्छ । यदि यसलाई बन्द गर्न सकिन्न भने एप्पस सेटिंगमा गएर सिन्क इन्टरभल कम गर्नु पर्छ ।सम्भव भए फेसबुक र अन्यका लागि एप्स डाउनलोड गर्नुको साटो ब्राउसरमा बुकमाक्र्स बनाएर प्रयोग गर्न सकिन्छ । 
  • विज्ञापनसहित आउने एप्सले तपाईको डिभाइसको ब्याट्रीको लाइफ २.१ देखि २.५ घन्टा सम्म कम गर्न सक्छ । त्यसैले सित्तैमा पाइने एप्सबाट बच्नु पर्छ । सके एप्स किनेरै चलाउनु राम्रो । 
मोवाइललाई ह्याङ्ग हुनबाट बचाउने उपायहरु
एकै पटक धेरै एप्लिकेसन्स चलाउदा, फोन मेमोरी फुल हुन, धेरै एप्लिकेसन्सहरु मेमोरी कार्डमा राख्नुको साटो फोनमै राख्नु, कुकीज, क्यासी, लग फाइसलाई नहटाउनु , ७० प्रतिशत भन्दा बढी र्यामको प्रयोग हुन , कमअसल खालको मेमोरी कार्डको प्रयोग गर्नु लगायतका कारणले मोबाइल ह्यांग हुने गर्छ । फोनको मेमोरी बढाउने । अनावश्यक डेटा डिलिट गर्ने । मोबाइलमा इन्स्टल भएका एपहरु इन्टरनलबाट एक्सर्टरनल मेमोरीमा सार्ने । गीत, भिडियो र फोटोजहरु राख्नु पर्ने एक्सर्टरनल मेमोरी बढी प्रयोग गर्ने । यति गर्दागर्दै पनि समस्या समाधान भएन भने सम्पर्क फोन र एप्लिकेसन्सहरुलाई ब्याकअफमा राखेर फोन रिसेट गर्ने । यी बाहेक हरेक १५–२०दिनमा कम्प्युटरमा जोडेर एन्टी मोबाइल स्क्यान गर्नु पर्छ, यसले फोनको सबैभाइरस हट्ने छ ।
गुगल प्लेस्टोरबाट ब्ल्याकमार्ट एप डाउनलोड गरेर पेड एन्डोएड एप्स डाउनलोड गर्न सकिन्छ । ब्ल्याकमार्ट एप फ्रि छ । यो एप भित्र धेरै एप्स छन , जनु प्लेस्टोरमा पेड प्राप्त हुन्छ । तर ब्ल्याकमार्टबाट यो सित्तै डाउनलोड गर्न सकिन्छ । यसका लागि सबैभन्दा पहिले ब्ल्याकमार्ट एप डाउनलोड गर्ने या इन्टरनेटबाट ब्ल्याकमार्ट अल्फा डट एपीके एप डाउनलोड गर्न सकिन्छ । अब यो एपलाई आफ्नो एन्ड्रोइड फोनमा इन्स्टल गर्ने । ब्ल्याकमार्ट एपलाई ओपन गर्नुस र आफ्नो मनपर्ने एप सर्च गर्नु । ती एप्स फ्रिमा डाउनलोड गर्नु् ।
त्यस्तै, १मोबाइलमार्केट एप पनि पेड एप्स फ्रि डाउनलोड गर्ने एप हो । यका युजर इन्टरफेज धेरै सजिलो छ । यो एपमा तपाईले धेरै एप्स पाउन सक्नु हुनेछ । ती सबै सित्तैमा प्रयोग गर्न सकिन्छ । सबैभन्दा पहिले प्लेस्टोरबाट १मोबाइलमार्केट एप डाउनलोड गर्नुस या इन्टरनेटबाट १मोबाइलमार्केट एपीके डट एप डाउनलोड गर्नु । यो एपलाई एन्ड्रोइड फोनमा इन्स्टल गर्नुस । अब १ मोबाइलमार्केट ओपन गरेर आफ्नो मन पर्ने एप सर्च गर्नुस या डाउनलोठ गर्ने । यहा सबै सितैमा प्राप्त गर्न सकिन्छ । 

Tuesday, 4 July 2017

राजपामा पदाधिकारी थप्न होडबाजी


बैशाख ५ गते राजधानीमा आयोजित एक विशेष भेलाबाट मधेस केन्द्रित छ वटा दलहरु मिलेर राष्ट्रिय जनता पार्टी(राजपा) गठन भएको हो । दलहरु मर्ज भई बनेको एकिकृत राजपाभित्र हाल पदाधिकारी थप्ने होडबाजी नै चलेको छ । पहिलेका छ वटै दलपिच्छे ३–४ जनाजति गरि २४ जना वरिष्ठ उपाध्यक्ष नियुक्त गरिसकिएको छ । त्यस्तै,उपाध्यक्ष मात्रै ४० जना बनाइएको छ । कोषाध्यक्ष र सहकोषाध्यक्ष गरि १० जना पुगेका छन् । पहिलेको सद्भावना पार्टीको मात्रै ५ जना महासचिव बनाइएको छ । यो संख्यालाई उछिन्नदै नेपाल सद्भावना पार्टीले आठ वटा महासचिव आफ्नो तर्फबाट बनाएको छ । जिल्लास्तरका अधिकांश नेताहरु केन्द्रिय पदाधिकारी बनि बनाइएको छ । पहिलेका केन्द्रिय पदाधिकारीलाई जानकारी नै नदिई धमाधम केन्द्रिय प्रतिनिधिको छनौटप्रति राजपाका केही नेताहरु आक्रोशित समेत बनेका छन् । विभिन्न संचारमाध्यमहरुमा तिनीहरुको आक्रोसपूर्ण अभिव्यक्तिहरुले त्यसको पुष्टि थोरबहुत गरेकै छ । राजपा स्रोतका अनुसार पार्टी माओवादी केन्द्रको जस्तै जम्बो केन्द्रिय समिति बनाउन थालेकोले अगामी दिनहरुमा पार्टी चलाउन कठिन हुनसक्छ । वरिष्ठताको विवाद त राजपामा छँदैछ । सही समयमा सही निर्णय गर्न नसक्दा कार्यकर्ताहरु रुष्ट र निराश बन्न थालेको एक केन्द्रिय पदाधिकारीले बताए ।


Monday, 3 July 2017

मिथिला क्षेत्र मेँ नटवरलालक हालीमुहाली

संस्मरण 
–दिनेश यादव  
१९८६–१९९५ धरि हम दरभंगा मे बितेलौह । मारवारी कलेज सँ इन्टर केला के बाद सिएम साइन्स कलेज में हमर नामांकन भेल । एही कलेज में श्रीरामपुर दरभंगा के विनोद मिश्र (विद्यार्थी) नेता सँ हिमचिम बढल । नेता साथी पाबी हम बढ हर्षित भेलौह । एक दिन ओ कहलैत जे बाबा बैजनाथ चौधरी ‘बैजू’ मिथिला राज्य के आन्दोलनक लेल महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह मेमोरियल
कलेज में बैसार केने छथि , चलु हम सभ । मैथिली के अपन माय के बोली ठानि हम हुन्का साथ ओतए पहुँच गेलौं । विद्यार्थी सभहक उपस्थिति निक रहए । विनोद जी हमरा कहलैत जे आजुक बैसार मे बेसी बाभन भ गेलए, अहा गैर–बाभन छि, प्रतिनिधि के रुप मे रह पडत । हम ‘हाँ’ कहि देलियै । तकर बाद विनोद जी के नेतृत्व मे सज्जन चौधरी, अवधेसकुमार झा, बच्चाजी, बौआजी झा, मनोरञ्जन ठाकुर, दिग्विजय झासहित बहुत रास मित्र लोकन्हि संगैह बेर–बेर मिथिला राज्य के लेल विद्यार्थी आन्दोलन मे सरिक भेलौह । आन्दोलनक क्रम में बाबा बैजुसंग मात्र एक बेर साक्षात्कार भेल रहए । हुनक ओजपुर्ण अभिव्यक्ति आ जोशगर भाषण हमरा मोही लेले रहए । हम क्रान्तिकारी मिथिला आन्दोलन में सक्रिय भँ गेहौह । मुदा हमर क्रान्तिकारिता बेसी दिन नए टिकल, कारण जे ओतेह गैर–ब्राहमण के दोसर दर्जा के आदमी जका व्यवहार होमे लागल । कार्यक्रम सभ मे जेनाइए हम छोडि देलौह । मुदा मैथिली भाषाप्रति के हमर मोह भंग नए भेल छल, अखनौ नए भेल अछि । तँई हमर दरभंगा मे रहती काल आकाशवाणी दरभंगा सँ प्रसारण होमेवाला कृषि कार्यक्रम मे ‘खुरखुर भैइया’ के सुनैत रहौं, मैथिली के गीतनाद हमरा बड निक लागैत अछि । बाद मे खुरखुर भैइया के कार्यक्रम मे प्रतिक्रिया आ मैथिली गीतक फरमाईस पत्र पठबति छलौह । ई क्रम आठ वर्षधरि जारी रहल । स्वदेश नेपाल फिर्ला के बाद राजधानी सँ प्रसारित एकटा एफएम में सेहो मैथिली मेँ पत्र पढाबे लगलौं ।  इन्जिनियरिङ कलेज मे एक गोटा मैथिली कविता गोस्टि के आयोजन नियमित रुप मे करैत रहए, ओहू मे हमर सक्रियता किछु दिन निके रहल । ओतेह मैथिली मे गितो गेने रही हम । २०५२ साल मे रेडिया नेपाल मे मैथिली भाषा मे गीत सेहो गेने रही हम । ओतैह किछ अउर मैथिली भाषी सँ सम्पर्क बढ्ल । मुदा जतेक भेटल किछु अपवाद के छोडि दिऔ त सभटा ठगे भेटल । ओकर वाद हम अपन डेग रसे रस पछा करए लगलौह । एही बीच मे वागमति मे बहुत राश जल बहि चुकल अछि । नटवरलाल सभ सेहो बढि गेल अछि । सबटा के अपनेटा मात्र सुझ लगलए । आजु २५ वर्ष बित गेल मुदा मिथिला आ मैथिली ठामेठाम अछि । हाmँ एही क्षेत्र मे संचार माध्यम मे बृद्धि के कारण प्रचारप्रसार मे बढोतरी जरुर भेल छईक । किछु गैर–ब्राहमण के छोडि अतिबाद ब्राह्मणवादी सभ मैथिली आ मिथिला के नाम मे ठिकेदारी मे जुटल देख मोन कलुषित भँ जाएत छईक । आब फेर मिथिला आन्दोलनक बात भँ रहल अछि, मुदा हमर मन मे एकेटा जिज्ञासा सदैब रहलए जे कि मैथिली ब्राह्मणवादी सोच रखनिहार लोकन्हि के मात्र थिकैह ? आन मिथिलावासी ओकर पछुवा मात्र छैक ? यदि नए, त एकैह जाति विशेषक परिहन के किएक मिथिला के शान ब्राह्मणवादी सभ मानि रहल छैक आ ओकेरे प्रचार मे अपन ऊर्जा किएक फुँइक रहल छैक ? २५ वर्ष के दौरान मे हमरा सम्पर्क मे आजुधरि दलित या सिल्पीकार, मुस्लिम समुदाय के प्रतिभा सभ मैथिली साहित्य आ आन विषय मे किएक नए उभरि के आएल छैक । भँ सकैत अए जे हम गल्ति कही रहल छि । मुदा ई एकटा यथार्थ आ यक्ष प्रश्न आजुक दिन मे मिथिलावासी के समक्ष मुँह बोने ठाड अछि । कि मैथिली आ मिथिला व्यापार करबाक सामग्री छि, जे किछु लोग एकरा अपन चाँदी कटाई के विषय बनबैति आबि रहल अछि ।
अन्त मे, मिथिला आ मैथिली के जोडबाक अछि त ओछपन आ दरिद्र मानसिकता सभ के त्यागि आगा बढए पडत , नई त मिथिला के नाम पर नेमचुस दए फुसलाबय बाला सभ के कोनो कमी नए छैक । सचेत आ सावधान रही आगा बढी, जातिपाति के अलग राखि अग्रगमन दिश जौ नए पढव त मिथिला माय हक्कन सदैब एहिना कानैति रहती । जय हो ।

Sunday, 2 July 2017

एउटै व्यापारबाट अर्बपति


 - दिनेश यादव(DINESH YADAV)- काठमाडौं ----
कुनै पनि व्यापार थप फस्टाउनका लागि तीन कुराहरू आवश्यक पर्ने भनेर हामीलाई सिकाइन्छ । पहिलो : कयौं ग्राहकसँग अपिल गर्नु, दोस्रो : अरूभन्दा फरक उत्पादनमा केन्द्रित हुनु र तेस्रो : नयाँ–नयाँ वस्तुहरू बजारमा ल्याइरहनु । तर, वास्तवै के यी तीन कुरा अन्तिम सत्य हुन् त ? अमेरिकी अखबार ‘फोब्र्स’ को ४ सयजना अर्बपतिको सूचीलाई विश्लेषण गर्दा योभन्दा फरक र नयाँ तथ्य फेला परेको छ । 
अर्बपति बनेकाहरूको रुझान र प्रवृत्ति हेर्दा व्यापारमा विविधिताको तुलनामा विशिष्टतालाई उजागर गरेको छ । अर्थात् कुनै एउटा व्यापारमा केन्द्रित भई अगाडि बढ्दा अपेक्षा गरेभन्दा बढी सफलता हासिल भएको पाइएको छ । ‘फोब्र्स’ सूचीमा समावेश विश्वका अधिकांश सफल र धनाढ्यहरू आआफ्ना एउटै कारोबारमा अतिकेन्द्रित र विशिष्टताका साथ अघि बढेको पाइएको छ । फेसबुक र मिन्ट कम्पनीमा एकजना कर्मचारी नोआह कागनले तयार पारेको विश्लेषण/रिपोर्टले त्यस्तै देखाएको छ । कागनले तयार पारेको रिपोर्टमा आधारित भई ‘बिजनेस इन्साइडर’ अनलाइनले सार्वजनिक गरेको विश्लेषणले व्यापारमा विविधताको साटो विशिष्टताका साथ एउटैमा केन्द्रित भएकाहरू बढी सफल भएको पुष्टि गरेको छ । 
उक्त अनलाइनले आफ्नो विश्लेषणलाई थप प्रस्ट्याउन विश्वका तीन अर्बपतिको उदाहरण पनि प्रस्तुत गरेको छ । सुरुमा वारेन बफेट, मार्क जुकरबर्ग र फिल नाइटलाई आफ्नो उदाहरण बनाएको छ । यी तीनजना अर्बपतिहरूको व्यापार अन्य विभिन्न उद्योग/कम्पनीबाट चम्के पनि सुरुमा तिनीहरूको एउटै मात्र व्यापार थियो । त्यसैमा तिनीहरू बढी केन्द्रित भई धन आर्जन गरेका थिए । अर्थात् तीनजना पहिले एउटै व्यापारलाई आआफ्नो च्यानल वा रणनीति बनाएर अघि बढेका थिए । वारेन बफेट बर्कसायर हाथावेमा लगानी गरी ७३ दशमलव २ अर्ब अमेरिकी डलरको सम्पत्ति बनाए भने जुकरबर्ग फेसबुकबाटै ६१ दशमलव ७ अर्ब अमेरिकी बराबरको धन जोड्न सफल भएका थिए । त्यस्तै नाइक कम्पनीकै कारण फिल नाइटले २४ दशमलव ३ अर्ब अमेरिकी डलर बरोबरको सम्पत्ति बनाएका थिए । 
अर्को कुरो अर्बपतिहरू झनै अर्बपति हुनुको कारणचाहिँ तिनीहरू मानिसको आवश्यकतामा केन्द्रित भएर अघि बढ्नु पनि हो । विशिष्ट क्षेत्रमा अतिकेन्द्रित रणनीतिहरू बनाएर अघि बढ्दा व्यापार थप फराकिलो बन्छ । तर, धेरै मानिस ठान्छन्, विविधता (एकैपटक धेरै व्यापार) ले कुनै पनि व्यापारलाई विस्तार गर्नमा सहयोग पुर्‍याउँछ । विविध व्यापार र उद्योगको विपक्षमा रहेकाहरूले यसलाई अस्वीकार गरेका छन् । उनीहरू भन्छन्, ‘यसो गर्नु भनेको उद्यमीको सोचलाई विभाजित गर्नु हो । सोच डाइभर्ट भएको अवस्थामा सफलता हासिल गर्न कठिन हुन सक्छ ।’ यसको साटो एउटै व्यापारमा मात्रै केन्द्रित हुनुलाई उनीहरूले राम्रो भनेका छन् । विविधतामा विश्वास गर्ने उद्यमी र व्यावसायीहरूले धेरै कुरा सही तरिकाले गर्न सक्तैनन् । 
अनलाइनले अर्को उदाहरणका रूपमा स्टेभ जब्सलाई अघि सारेको छ । उसले जब्सले एप्पललाई कसरी बचाए ? भनेर आफ्नो विश्लेषणमा बेलिविस्तार गरेका छन् । अनलाइन लेख्छ : सन् १९७६ मा ‘एप्पल आई’ को सुरुआत एउटै मात्र उत्पादनबाट भएको थियो । कम्पनीको विस्तार भएपछि एप्पल टोलीले विभिन्न बजारहरूलाई लक्षित गरी नयाँ ब्रान्डहरू ल्याउन सफल भयो । सन् १९९१ मा म्याकिन्तोस क्वाद्राको बजार उच्च विन्दुमा रह्यो । त्यसपछि सन् १९९२ मा परिवारलाई लक्षित गरी म्याकिन्तोस फरफर्मा सेरिज कम्पनीले ल्यायो । त्यस्तै सन् १९९३ मा मिड–रेन्जको म्याकिन्तोस सेन्ट्रिस लाइन पनि ल्यायो । यी उत्पादनहरू परिचयात्मक यन्त्रका रूपमा विभिन्न मूल्य विन्दुमा बिक्री भएका थिए । कम्पनीको सुरुमा विभिन्न सेग्मेन्ट बजारमा ल्याउने लक्ष्यका साथ अघि बढेको थियो । तर, त्यो सम्भव हुन सकेन । 
तीनवटा उत्पादनहरू ९० को दशकमा ल्याए पनि त्यसले अपेक्षा गरेअनुरूपको लाभ कम्पनीलाई प्राप्त हुन सकेन । फेरि यी उत्पादनहरू त्यस बेला ल्याइएको थियो, जब विश्वव्यापी रूपमा कम्प्युटरलाई स्वीकार गरिएको थिएन । किनभने उपभोक्ताहरूले यी उत्पादनहरूबीच फरक बुझ्न नसकेर कन्फुजनको अवस्थामा थिए । तीनैवटा उत्पादनलाई एउटै ठानेका थिए, उपभोक्ताहरूले । फलस्वरूप सन् १९९४ देखि १९९७ सम्म प्रत्येक वर्ष कम्पनी घाटामा गएको थियो । सन् १९९७ मा मात्रै कम्पनीले ७ सय ८ मिलियन अमेरिकी डलर घाटा बेहोर्नुपरेको थियो । तर, कम्पनी आफ्नो यही उत्पादनमा केन्द्रित रह्यो, अन्य व्यापारमा हाम फालेन । 
आफ्नो विशिष्टता जोगाउनका यी उत्पादहरूलाई जीवितै बनाउने सोचमा कम्पनी रहेको थियो । यसै क्रममा आफ्नो घाटा जोगाउन सन् १९९७ मा कम्पनीले स्टेभ जब्सलाई भित्र्यायो । तत्कालै स्टेभले आवश्कताहरूमा केन्द्रित भई काम गर्न थाले । जब्स कम्पनीमा पुनप्र्रवेशअघि एप्पलका एक दर्जनजति विभिन्न मोडलका कम्प्युटर बजारमा थिए । तर, सन् १९९८ मा एप्पलका चारवटा मोडलहरू पावर म्याकिन्तोस जी ३, म्याकिन्तोस सर्भर जी ३, पावरबुक जी ३ सेरिज र आइम्याक जी ३ बजारमा रहेका थिए । 
आफ्ना यी उत्पादनहरूमा अतिकेन्द्रित भएपछि कम्पनीको नाफा ३ सय ९ मिलियनसम्म पुग्यो । जब्सले आफ्नै भनाइलाई चरितार्थ गर्न कम्मर कसेर लागेपछि उनी एप्पल कम्पनी जोगाउन सफल भएका हुन् । उनले एउटा अन्तर्वार्तामा भनेका थिए, ‘धेरै मानिसले काममा केन्द्रित हुनुलाई आफूले पाएको कामलाई ‘सही’ भन्नु मात्रै भएको ठान्छन् तर यो सधैं लागू नहुन सक्छ । त्यसैले ‘नो’ भन्न सक्नुपर्छ । ‘नो’ शब्दले सयौं नयाँ विचारहरू ल्याउन सक्छ, जसले मानिसलाई सफल बनाउँछ ।’ जब्सको ‘नो’ शब्दले कम्पनीलाई पुनर्जीविन दिन सफल भएको हो । 
अन्त्यमा, धेरै मानिस आफ्नो व्यापारलाई विस्तार गर्न नयाँ सोच वा तरिकाको खोजीमा अनावश्यक समय र ऊर्जा खर्च गर्छन् । त्यो ठीक नभएको विश्लेषण गरिएको छ । किनभने एकैपटकमा धेरै व्यापार थाल्दा कुनै पनि उद्यमी/व्यापारीसँग पहिलेदेखि भएको व्यापारमा केन्द्रित हुन असम्भव हुन्छ । घाटा लाग्यो भनेर केही उद्यमीहरू अन्य व्यापारमा हात हाल्छन् । अझ एकैपटकमा धेरै व्यापारमा हाम फाल्नेहरू पनि भेटिन्छन् । हुन त कहिलेकाहीँ यसमा सफलता पनि प्राप्त हुन सक्छ तर बढी असफलता नै हात पर्छ ।
(असार १०, २०७४,KANTIPUR DAILY) (एजेन्सीहरू)

अर्बपति गेट्स र बफेटको अनौठो बानी


  • दिनेश यादव(DINESH  YADAV)
रिश्रमले मात्रै व्यक्ति सफल हु“दा हुन् त केही व्यक्ति जीवनभर मिहिनेत गर्छन, सफल हुन्नन् । धनाढ्य बन्ने कुरो त झनै टाढाको भइहाल्यो। परिश्रमस“गै सानासाना उपाय अपनाएरै केही मानिस थोरै समयमा धनाढ्य भने बनेका छन् । ती उपायहरूमध्ये पुस्तक पढ्नु पनि एक हो । सीपका विकासमा पुस्तकहरू सहयोगी हुन सक्छन् । विश्वका अर्बपतिहरूले समेत आफ्नो व्यापार र उद्यमशिलतामा सफलता प्राप्त गर्न पुस्तकहरू पढ्ने गरेका छन् । बिल गेट्स र वारेन बफेटजस्ता अर्बपतिको त पुस्तकस“ग लगावै छ । धनाढ्यहरू जतिसुकै व्यस्त भए पनि पुस्तक पढ्न भने छाडदैनन् । यी त्यस्ता पुस्तकहरू हुन्, जुन एकपटक पढिसकेपछि पनि उनीहरू फेरि फेरि पनि पढ्ने गर्छन् ।
किनभने हरेकपटक तिनले पुस्तकहरूबाट केही नया“ कुरा सिक्ने गरेका हुन्छन् । बिल गेट्सलाई नचिन्ने मानिस सायदै भेटिएला । हाल उनी विश्वकै सबैभन्दा ठूला अर्बपति हुन् । ‘फोब्र्स’ को यो वर्षको अर्बपति सूचीमा उनी पहिलो स्थानमा छन् । बिल एन्ड मेलिन्डा गेट्स फाउन्डेसनका सहसंस्थापक बिल गेट्सको कुल सम्पत्ति ८८ दशमलव ७ अर्ब अमेरिकी डलर (रियल टाइम ३० जुन २०१७) रहेको छ । संसारकै सबैभन्दा ठूलो निजी च्यारेटेबल फाउन्डेसनका मालिकसमेत रहेका उनको संस्थाले मानिसको जीवन बचाउने र विश्वव्यापी रूपमा स्वास्थ्यमा सुधार गर्ने अभियानमा सक्रिय छ । उनको संस्थाले पोलियो निवारणका लागि रोटरी इन्टरनेसनलस“ग मिलेर काम गर्दै आएको छ । ‘फोब्र्स’ को विश्वका अर्बपतिहरूको सूचीमा उनी १८ जनाभित्र विगत २३ वर्षदेखि पर्दै आएका छन् । सन् १९७५ मा पउल एलेनले स्थापना गरेको सफ्टवेयर कम्पनी ‘माइक्रोसफ्ट’ का उनी बोर्ड सदस्य हुन् । अघिल्लो वर्षको अन्त्यतिर गेट्सले २० अन्य व्यक्तिस“ग मिलेर १ अर्ब अमेरिकी डलर बराबरको ‘ब्रेकथ्रु इनर्जी इन्भेस्टमेन्ट फन्ड’ को घोषणा गरेका थिए । ६१ वर्षीय उनी हावार्ड विश्वविद्यालयबाट ‘ड्रप आउट’ भएका थिए । सानो छ“दा उनी किताब पढ्नमा धेरै समय खर्चिन्थे । यो बानी थाहा पाएरै उनका बुबाले डिनर टेबलमा नया“–नया“ पुस्तकहरू राखिदिने गर्थे । पुस्तक पाएपछि गेट्स हुरुक्कै हुन्थे । हाई स्कुलमा उनले आफ्ना साथी पउल अलेनको पावर प्लान्टबारेको प्रोग्रामिङमा सहयोगीको भूमिका निर्वाह गर्ने अवसर पाएका थिए ।  
उनीस“ग जोडिएको अर्को रोचक कुरो के छ भने जब उनी कतै घुम्न निस्कन्छन्, आफूस“ग अन्य वस्तुहरूको तुलनामा पुस्तकलाई सबैभन्दा पहिलो प्राथमिकतामा राख्छन् । पुस्तकका लागि उनीस“गै छुट्टै ब्याग हुने गर्छ । उनी ‘बिजनेस एडभेन्चर्स’ पुस्तकको चर्चा गर्दै भन्छन्, ‘यो व्यापारस“ग जोडिएका ती बेस्ट बुक्समध्येका हुन्, जो म आज पनि पढ्ने गर्छु । जोन बुरक्स आज पनि मलाई मन पराउने बिजनेस लेखकमध्येका एक हुन् ।’
बिल गेट्सलाई मन पर्ने पुस्तकमा लेखक थोमास पिकेट्टीको ‘क्यापिटल इन द ट्वेन्टी (फस्ट सेन्च्युरी’ पनि हो । उनले यो पुस्तक विश्वमा बढदो असमानता जस्तो समस्यास“ग जुध्न मार्गचित्र बनाउन सहयोग पुग्ने बताउ“छन् । विश्वव्यापी रूपमा यसबारे बहस चलाउनसमेत यो पुस्तक कारगर रहेको उनको भनाइ छ । त्यस्तै, नीति निर्माणमा समेत पिकेट्टीको
पुस्तक सहयोगी हुन सक्ने बिलको धारणा छ । बिल गेट्स १३ वर्षको छ“दै जेडी स्यालिङको पुस्तक ‘द क्याचर इन द राई’ पढेका थिए । यो पुस्तकबारे उनी भन्छन्, ‘दोधारमा रहेका युवाहरूलाई त्यसबाट उन्मुक्ति दिलाउने गरी तथ्यहरू पुस्तकमा छन् ।’ यसैगरी ‘ग्रामी सिम्सियनका ‘द रोसी इफेक्ट’ उनलाई औधी मन पर्ने पुस्तक हो । उनले यो पुस्तकलाई मानिसहरूस“गको सम्बन्ध बढाउन र सही समयमा सही लगानी गर्ने ऊर्जाको सञ्चारमा सहयोगी भनेर प्रतिक्रिया दिएका छन् । विलेको ‘मेकिङ द मोर्डन वल्र्ड’ पुस्तकले उनलाई विश्वलाई राम्रो बनाउने उपायहरूको जानकारी दिएको एक अन्तर्वार्तामा उनले बताएका छन् । पुस्तकमा सिलिकन, काठ, प्लास्टिक र सिमेन्टमा प्रयोग हुने सामग्रीहरूका बारेमा जानकारी समेटिएका छन ।
पुस्तकमा औधी रुचि राख्नेमा वारेन बफेट पनि हुन् । आफ्नो व्यापार र लगानीमा सधैं सफल हुने उद्यमीमा पर्छन्, उनी । ८६ वर्षीया उनी बर्कसाएर हाथावेजका सीईओ हुन् । अमेरिकी अखबार ‘फोब्र्स’ का अनुसार बफेटको कुल सम्पत्ति ७५ दशमलव ९ अर्ब अमेरिकी डलर (रियल टाइम ३० जुन २०१७) रहेको छ । ‘ओमाहाका भविष्य निर्माता’ भनेर चिनिने उनी गिको, डुरासेल र डेरी क्विनलगायतका ६० भन्दा बढी कम्पनीका मालिक हुन् । एकजना अमेरिकी कांग्रेसम्यानका छोरा उनी ११ वर्षकै उमेरमा सेयर खरिद गरेका थिए भने १३ वर्षमै पहिलोपटक कर बुझाउन भ्याइसकेका थिए । उनी आफ्नो सम्पत्तिको ९९ प्रतिशत मानवकल्याण सेवामा लगाउने प्रतिबद्धता जाहेर गरिसकेका छन् । त्यसै अनुरूप उनले हालसम्म २८ दशमलव ५ अर्ब अमेरिकी डलर दान गरिसकेका छन् । ‘फोब्र्स’ को यस वर्षको अर्बपति सूचीमा उनी दोस्रा हुन् । बफेट आफैंले खोलेको व्यापारबाट अर्बपति बनेका हुन् । उनी अर्बपति भइसक्दा पनि अमेरिकी राज्य ओमाहास्थित नेब्रास्कामा सन् १९५८ मा ३१ हजार ५ सय अमेरिकी डलरमा खरिद गरेको आफ्नो पुरानै घरमा बस्छन् । उनले हावार्ड बिजनेस स्कुलमा पढ्न अस्वीकार गरी कोलम्बिया विश्वविद्यालयबाट अर्थशास्त्रमा स्नातकोत्तर गरेका हुन् ।
उनलाई सबैभन्दा बढी मनपर्ने पुस्तक बेन्जामिन ग्राहमको ‘द इन्टेलिजेन्ट इन्भेस्टर’ हो । सेयर बजारमा सफलतापूर्वक लगानी गर्ने मानसिकता बनाउने यो पुस्तकले उनलाई सहयोग गरेको उनी आफैं बताउ“छन् । भन्छन्, ‘पहिलोपटक लगानीकर्तालाई यो पुस्तक बुझ्न केही कठिन हुन्छ, किनभने यसमा वित्तीय शब्दावलीहरू जटिल खालका छन् ।’ यो पुस्तकलाई बुझ्न कठिन भए ‘द
इन्टेलिजेन्ट इन्भेस्टर’ को सय पृष्ठको सारांश पनि पढ्न सकिने सुझाव उनको छ । पुस्तकका लेखक ग्राहम र बफेटका बारेमा एउटा रोचक कुरो के छ भने कोलम्बियामा विद्यार्थी छ“दा ग्राहम उनका शिक्षक थिए । ग्राहमको इन्भेस्टमेन्ट क्सासेसमा बफेट मात्रै ‘ए प्लस’ ल्याउने विद्यार्थी थिए ।  
एउटा अन्तर्वार्तामा उनले भनेका छन्, ‘यो पुस्तक म पटकपटक पढ्न रुचाउ“छु । यसबाट मैले लगानी गर्ने धेरै उपायहरू सिकेको छु, यसको फाइदा मेरो पोर्टफोलियोमा समेत हेर्न सकिन्छ ।’ उनका अनुसार लगानीबाट प्रतिफल पाउनका लागि धेरै पढ्नुपर्छ । भन्छन्, ‘यो पुस्तक मेरा लागि भाग्य बनाउने ज्यावल पो बनेछ ।’ यसैगरी बफेटलाई मन पर्ने अर्को पुस्तक हो, बेन्जामिन ग्राहम र ड्याभिड एल डुडको पुस्तक ‘सेक्र्युरिटी एनालिसिस’ । उनी बेन्जामिनका चेला छ“दै यो पुस्तक कलेजमा पढेका थिए ।
व्यापारमा लगानी गर्ने अनेकौं टुल्स यसमा रहेकाले धेरैका लागि उपयोगी हुन सक्ने उनले भनेका छन् ।  उनले भनेका छन्, ‘हुन त यो पुस्तकमा पठनीय सामग्रीहरू धेरै समेटिएकाले बुझ्न र ती सबै पढ्न समय लाग्न सक्छ । भर्खरै लगानीमा हात हालेकाहरूलाई यो पुस्तकको ‘समरी गाइड’ पढ्न म सल्लाह दिन्छु ।’ पुस्तक ‘सेक्र्युरिटी एनालिसिस’ अल–टाइम वेस्ट सेलरमध्येको एक हो । लगानीकर्तालाई सफल हुन महŒवपूर्ण सीपहरू सिकाउने भएकाले सबैलाई यो पुस्तक पढ्न पटकपटक सल्लाह दिने गर्छन् । बफेटको अर्को मन पराउने पुस्तकमध्ये डेल कारनेगीको ‘हाउ टु विन फ्राइन्ड्स एन्ड इन्फ्युएन्स पिपल’ पनि हो । उनी आफ्नो कार्यालयको भित्तामा कलेजबाट प्राप्त भएका प्रमाणपत्रहरू झुन्ड्याउ“दैनन्, डेल कारनेजी कोर्स गर्दा पाएको सर्टिफिकेट र लेखकका महŒवपूर्ण भनाइहरू बालमा टा“सेका छन् । बफेटले यसबारे भनेका छन्, ‘डेल कारनेगीको लेखन र कोर्सले मेरो जीवनमै परिवर्तन ल्याइदियो ।’यसो त बफेटले आफैंले पनि पुस्तक लेखेका छन् । ‘बर्कसाएर हाथावे लेटर्स टु सेयरहोल्डर्स’ नामक पुस्तकमा उनले आफ्नो कम्पनी सफल हुनुको रहस्य र आफूले समय–समयमा लिएको निर्णयहरूको बेलिविस्तार गरेका छन् । यो पुस्तक उनले आफ्नो कम्पनीको वेबसाइटमा समेत निःशुल्क पढ्ने व्यवस्था गरेका छन् । तर, सबै सूचना र जानकारीहरू प्राप्त गर्न पुस्तकको हार्डकपी नै पढ्नुपर्ने सुझाव उनको छ । बफेटलाई लेखक फिलिप ए फिसरको ‘कमन स्टक्स एन्ड अनकमन प्रोफिट’ पनि मन पर्ने पुस्तकमध्येको एक हो । उनी यो पुस्तकबाट निकै प्रभावित छन् । भन्छन्, ‘म ८५ प्रतिशत ग्राहम र १५ प्रतिशत फिसर हु“ । मैले आफ्नो जीवनमा यी दुई लेखकका पुस्तकबाट धेरै कुरो सिकेको छु । यसमा उद्यमीका लागि आवश्यक पर्ने अधिकांश टुल्सहरू रहेको मैले पाएको छु । ती टुल्सहरू उपयोग गरेरै म सफल पनि भएको हु“ ।(Published @ Kantipur on 1st July 2017)  (एजेन्सीहरू)