Monday, 17 August 2026

हँसबाक बहाना खोजी (HANSBAAK BAHANA KHOJI)

मैथिली गीत
■दिनेश यादव
चलू हँसबाक कोनो,
आब बहाना खोजी,
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी ।
बहुत उड़लौंह अकास में,
पंख पसारि कए,
आब माटि कए चूमी,
मन कए संवारि कए ।
अपन धरती सँ जुड़ल,
कोनो जमाना खोजी,
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी ।
चलू हँसबाक कोनो,
आब बहाना खोजी,
चलू हँसबाक कोनो,
आब बहाना खोजी ।
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी,
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी ।
जिंदगीक अहि रण में,
कतेको संग छुटल,
कतेको हँसैत चेहरा,
अपनहि सँ रुठल ।
कतेको के टुटल मोन,
जोड़बाक बहाना खोजी,
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी ।
बीत गेल कते राति,
अनहारक साया में,
भटकैत रहलौंह मुदा,
मायाक काया में ।
आब अन्हरिया रातिक,
नव बिहान खोजी,
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी ।
चलू हँसबाक कोनो,
आब बहाना खोजी,
चलू हँसबाक कोनो,
आब बहाना खोजी ।
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी,
कतहु दुःख नहि होए,
से ठिकाना खोजी ।

Saturday, 15 August 2026

मैथिली कहिया शुधरत ? Maithili Kahiya Shudhrat ?)

मैथिली भाषाक लेखन शैली आ शुद्धाशुद्धि दिनानुदिन गिरैत जा रहल अछि । एतेह मानकक गप्प नै कऽ रहल छी, एकैह सामग्रीमें फरक-फरक शैलीकेँ बात हम कऽ रहल छी । हमर ई ब्लग भाषागत शुद्धता आ शब्दक औचित्य पर आधारित अछि । सामाजिक संजालमे हरेक दिन कथित मैथिली विद्वानक सामग्री सबसँ साक्षात्कार होइत रहैछ । हुनका लोकनिसँ मैथिली भाषाकेँ जाहि तरहे मानमर्दन होइछ, ओ आन भाषामे असभंव छैक । एतेह एकटा नमुना प्रस्तुत अछि (तस्बिर आ ओहिमे लिखल विषयवस्तु देखू) । ई निमंत्रण पत्र (मैथिली भाषामे) देखला पर व्याकरण, शब्दावली आ सामाजिक-साहित्यिक शिष्टाचारक दृष्टिकोणसँ निम्नलिखित मुख्य त्रुटी आ विवादास्पद बिन्दु सब स्पष्ट रूपसँ नजरि आवैत अछि :
​१. भाषागत आ व्याकरणीय त्रुटी (Language & Grammatical Errors)
​'श्रद्धाञ्जली कार्यक्रम' क औचित्य :
​मृत्यु भेल व्यक्तिकेँ स्मरण आ आदर देबाक लेल आयोजित शोक आ सम्वेदना व्यक्त करै वाला सभा केँ 'श्रद्धाञ्जली सभा' कहब उपयुक्त आ मानक होइछ । 'कार्यक्रम' शब्द सामान्य वा औपचारिक उत्सव, गोष्ठी वा कार्यसँ सम्बद्ध बुझाइछ, जे शोकक गम्भीरताकेँ किछु कम कऽ दैछ ।
​पुनरावृत्ति (Redundancy / Repetition):
​मुख्य शीर्षकमे 'श्रद्धाञ्जली कार्यक्रम' लिखल गेल अछि ।
​पुन: विवरणक वाक्यमे लिखल अछि - "श्रद्धाञ्जली कार्यक्रम इयह साओन ३१ गते..."।​ओकरा ठीक नीचाँ विवरणक बक्सा (Box) पर पुन: 'कार्यक्रम' लिखल गेल अछि । ​एहि तरहक शब्द पुनरावृत्तिसँ लेखन शैली असंतुलित आ अशुद्ध प्रतीत होइछ ।
​वर्ण विन्यास आ कारकगत अशुद्धि:
​"साओन" / "श्रावण": तिथिक विवरणमे उपर 'श्रावण' लिखल अछि आ नीचाँ 'साओन'। एकरूपता (Consistency) होएबाक चाही ।
​२. शिष्टाचार, आदर आ मृत्युपरान्त 'जी' क प्रयोग (Honorific Terms Post-Decease)
​मृत्युपरान्त 'जी' क प्रयोग (विमल जीक (?) / विमलजी(?)):
​मैथिली आ संस्कृत परम्परामे दिवंगत (मृत्यु भऽ गेल) व्यक्तित्वक लेल 'जी' सँ बेसी 'स्वर्गीय', 'दिवंगत', 'पुण्यात्मा' वा 'शोकसन्तप्त स्मरणार्थ' जकाँ शब्दक प्रयोग कएल जाइछ ।
​'जी' जीवित व्यक्तिक आदरार्थ प्रयोग होइछ । मृत्योपरान्त 'जी' कहब भाषाशास्त्र आ परम्पराक दृष्टिकोणसँ अपूर्ण आ अनुचित मानल जाइछ । ओहोमे कतौहू ‘जी’ के जोडि देब आ कतौहू अलग कऽदेब ?, ई मैथिलीके तोहिन भेल !
​३. शब्दावलीक औचित्य आ वैचारिक विवाद (Controversial Titles & Metaphors)
​'महामना' उपधिक औचित्य:
​'महामना' (उदात्त आ महान् मन भेल) ओहन व्यक्तित्वक लेल प्रयोग होइछ जे समाजमे सर्वमान्य, निष्कलंक आ महान् योगदान देने होथि (जेना महामना मदन मोहन मालवीय) ।
​यदि ककरो जीवन वा विचार विवादास्पद रहल होइन, तँ ओहन व्यक्ति लेल सार्वजनिक वा संस्थागत सामग्रीमे 'महामना' जकाँ सर्वोच्च आदरसूचक विशेषण लिखब सर्वसाधारण वा समालोचक लोकनिक लेल विचारणीय आ प्रश्नवाचक बनि जाइछ ।
​'ऐंजेरू' (परजीवी/Parasite) आ संघर्षक तुलना:
मधेशमे ​पहिचान, अधिकार आ सम्मानक लेल भेल जन-संघर्ष वा जन-आन्दोलन केँ 'ऐंजेरू' (जे दोसर गाछक रस चुसि कऽ बाँचैछ) सँ तुलना करब वा ओहि सँग जोडब अत्यन्तै अनुचित आ अपमानजनक अछि ।
​पहिचान आ अधिकारक सङ्घर्ष समाजक सजीव आ मौलिक सङ्घर्ष थिक । ओकरा नकारात्मक वा परजीवी (ऐंजेरू) रूपमे प्रस्तुत करब सामाजिक आ ऐतिहासिक सत्यक उपहास थिक ।
जे स्वयं कतेक बेर एहि विवादकेँ मिडिया मार्फत् स्वीकार कऽचुकल छलाह । जे स्वयं ‘हम विवादित छी’ कहैत छलाह, हुनका लेल ‘महामना’ उपाधि कतेक उचित ?
"...साहित्यिक वरिष्ठ साहित्यकार" लिखब शब्दावलीक अतिशयोक्ति (Exaggeration) आ मुद्रण अशुद्धिक प्रतीक थिक । ओतय 'साहित्यक' दुई बेर प्रयोग भेल अछि जे भाषिक संरचनाक त्रुटि अछि ।
अन्तमे , ​ई निमंत्रण पत्र भाषागत शुद्धता (व्याकरण), शब्द-चयन आ आदर-सूचक परम्पराक हिसाब सँ त्रुटिपूर्ण अछि । श्रद्धाञ्जली सभा जकाँ गम्भीर अवसर पर शब्दक चयन आ व्याकरणक स्वच्छता पर विशेष ध्यान देब आवश्यक होइछ । दिवंगत डा राजेन्द्र विमलप्रति भावपूर्ण श्रद्धाञ्जली ....! हम सभ शुद्ध मैथिली लिखि, हुनका लेल सबसँ पैग श्रद्धा आ सम्मान होएत ।

Friday, 7 August 2026

नेपालको पहिलो मुलुकी ऐनको अंश

यो तस्बिर वि.सं. १९१० मा श्री ५ सुरेन्द्र विक्रम शाहको शासनकाल (तत्कालीन प्रधानमन्त्री जंगबहादुर राणाको समय) मा जारी गरिएको नेपालको पहिलो मुलुकी ऐनको अंश हो। यस ऐनले तत्कालीन समाजलाई जातका आधारमा विभाजन गरी कानुनी रूपमै जातीय विभेदलाई प्रश्रय दिएको थियो।
तस्बिरमा उल्लेखित विषयवस्तुको विस्तृत व्याख्या निम्न बमोजिम छ:
​१. ऐनको दफा १७ को व्याख्या
​पाठ: "छोइ छिटो हालनु पर्ने जातका कमारिहरूले विष्ट जातलाइ करणि दि हवस् भात पनि खुवाइ हवस् तागाधारि जात नमासिन्या मासिन्या मतवालि जातलाइ भात पानिमा पार्या भन्या तेस्तालाइ ३ वर्ष कैद गरि उसैका खसमका जिम्मा गरि छोडि दिनु।"
​अर्थ: यदि 'छोइछिटो हाल्नुपर्ने' (अछुत मानिएका) जातका कमारी/दासीहरूले माथिल्लो जातका व्यक्तिहरूसँग यौन सम्बन्ध राखेमा वा तागाधारी (ब्राह्मण, क्षेत्री) तथा मतवाली जातका व्यक्तिहरूलाई भात-पानी खुवाएर जात खसालेमा/भ्रष्ट गराएमा, त्यस्ता महिलालाई ३ वर्ष कैद गरी पुनः उनका श्रीमान् (खसम) को जिम्मा लगाइने कानुनी व्यवस्था थियो।
​२. ऐनमा गरिएको जातीय वर्गीकरण
​यस पृष्ठमा मानिसहरूलाई पानी र छुवाछूतका आधारमा मुख्य दुई श्रेणीमा विभाजन गरी जातहरूको सूची (तपसिल) दिइएको छ:
​क. पानी नचल्ने (छुवाछूत/छिटो हाल्नु नपर्ने) जात:
​यस श्रेणीका मानिसहरूको हातबाट माथिल्लो जातले पानी नपिउने, तर उनीहरूलाई छुँदैमा शरीरमा पानी छिट्याएर चोखिनु (छिटो हाल्नु) नपर्ने मानिन्थ्यो।
​तपसिलका जातहरू:
​मुसल्मान , ​धोबी, ​मधेसका तेलि, ​कसाहि, ​कुसल्या, ​कुलु, ​म्लेच्छ , ​चुन्याडा
​ख. छिटो हाल्नु पर्ने जात (पानी नचल्ने र छोएमा चोखिनुपर्ने):
​यस श्रेणीमा रहेका मानिसहरूलाई छुँदा समेत माथिल्लो जातका व्यक्तिहरू 'बिटुलिने' वा अपवित्र हुने मानिन्थ्यो र चोखिनका लागि पानीको छिटो हाल्नुपर्ने नियम थियो।
​तपसिलका जातहरू:
​सार्कि, ​कामी, ​चुनार/चुनारा, ​हुर्क्या, ​दमै, ​गाइने (गाइन्या), ​वादी/भाड, ​पोढ्या
​च्याह्रामलक (च्याह्रा षलक)
​ऐतिहासिक निष्कर्ष
​यो ऐतिहासिक दस्तावेजले नेपालमा राणाकालमा राज्यसत्ताले नै कानून बनाएर कसरी जातीय विभेद, छुवाछूत र लैङ्गिक असमानतालाई संस्थागत गरेको थियो भन्ने कुरा स्पष्ट पार्छ। वि.सं. २०२० को नयाँ मुलुकी ऐन लागू भएपछि भने यो कानुनी जातीय वर्गीकरण र विभेदलाई पूर्ण रूपमा खारेज गरियो।
नोट : यो जानकारी दस्ताबेजीकरणका लागि मात्र यहा संकलन गरिएखो हो ।

समाचार छोटो, सिक्नुपर्ने पाठ थुप्रो

गोरखापत्र दैनिकमा प्रकाशित एउटा छोटो समाचारमा पत्रकारले सिक्नुपर्ने पाठ थुप्रो छ (हेर्नुस:सर्टस्क्रिन) । पत्रकारिताको दृष्टिले समाचारमा केही गम्भीर त्रुटिहरू देखिन्छन्, जसले यसको विश्वसनीयता र प्रभावकारिता कमजोर बनाउँछ ।
प्रमुख त्रुटिहरू
स्रोत अस्पष्टता: समाचारमा महिला मजदुरको भनाइ उद्धृत गरिएको छ, तर सरकारी तथ्यांक, श्रम कार्यालय वा आधिकारिक अध्ययनको आधार प्रस्तुत गरिएको छैन । यसले समाचारलाई व्यक्तिगत गुनासोमा मात्र सीमित बनाउँछ ।
सांख्यिकीय अभाव: पुरुष र महिलाको ज्यालामा भिन्नता उल्लेख गरिएको छ, तर कति प्रतिशत महिला प्रभावित छन्, कति क्षेत्रमा यस्तो विभेद छ भन्ने तथ्याङ्क छैन।
सन्तुलनको कमी: समाचारमा महिला मजदुरको आवाज मात्र छ । नियोक्ता, पुरुष मजदुर वा स्थानीय निकायको दृष्टिकोण समावेश गरिएको छैन । पत्रकारितामा बहुपक्षीयता आवश्यक हुन्छ ।
प्रसङ्गीय पृष्ठभूमि: नेपालमा श्रम कानुनले समान कामको समान ज्याला सुनिश्चित गर्ने प्रावधान छ। तर समाचारले कानुनी पृष्ठभूमि वा नीति–नियमको उल्लेख गरेको छैन ।
भाषिक असन्तुलन: “भोकभोकै बस्नुपर्ने बाध्यता” जस्ता वाक्यांश भावनात्मक छन्, तर पत्रकारितामा तथ्यपरक र संयमित भाषा प्रयोग गर्नुपर्छ । समाचारले महिला मजदुरको पीडा र विभेद उजागर गरेको छ, तर पत्रकारिताको दृष्टिले यसलाई अझ सशक्त बनाउन स्रोत स्पष्टता, तथ्याङ्कीय आधार, बहुपक्षीय दृष्टिकोण, कानुनी प्रसङ्ग, र संयमित भाषा आवश्यक हुन्छ।
उल्लेख गरिएको अंश — “मुख्य बाली, धान, गहुँ, दाल, तरकारीको उत्पादन” — मा पत्रकारिताको दृष्टिले केही त्रुटिहरू छन्:
त्रुटिहरूशब्दावली असंगति: “मुख्य बाली” भनेपछि फेरि धान, गहुँ, दाल, तरकारी सूचीकरण गरिएको छ । तर “मुख्य बाली” शब्दले सामान्य श्रेणी जनाउँछ, त्यसपछि सूचीमा “तरकारी” जस्तो व्यापक श्रेणी राख्दा असंगति हुन्छ ।
वर्गीकरण अस्पष्टता: धान, गहुँ, दाल स्पष्ट रूपमा अनाज वा दलहन हुन्, तर तरकारी भने सब्जीको समूह हो। एउटै स्तरमा राख्दा वैज्ञानिक वा कृषि वर्गीकरणमा भ्रम पैदा हुन्छ ।
तथ्यपरक अपूर्णता: सप्तरीको “मुख्य बाली” भन्नाले केवल यी चारवटा मात्र होइन, अन्य महत्त्वपूर्ण बाली (जस्तै मकै, तेलहन, आलु आदि) पनि समावेश हुन्छन् । समाचारले सम्पूर्णता नदिएको छ ।
भाषिक पुनरावृत्ति: “मुख्य बाली” र “उत्पादन” शब्द एकै वाक्यमा दोहोरिएको छ, जसले वाक्यलाई भारी बनाउँछ । यसलाई यसरी लेख्दा स्पष्ट हुन्छ:
“सप्तरीमा धान, गहुँ, दाल तथा तरकारी प्रमुख बालीका रूपमा उत्पादन हुँदै आएका छन् ।"
ठीकै देख्नुभयो। समाचारमा धान रोपाइँको मौसम (असार महिना) उल्लेख गरिएको छ, तर त्यसै सन्दर्भमा “दिनभरमा एक कट्ठा धान काट्नमर्ने बाध्यता” भन्ने वाक्य प्रयोग गरिएको छ।
त्रुटि
ऋतु असंगति: असार महिनामा नेपालमा धान रोपाइँ हुन्छ, धान काट्ने काम त चैत–बैशाख वा कार्तिक–मङ्सिरतिर मात्र हुन्छ। त्यसैले रोपाइँको बेला “धान काट्ने” भनाइ तथ्यगत रूपमा गलत छ।
समयगत भ्रम: समाचारले कृषिको चक्र (रोपाइँ, बढ्ने, काट्ने) स्पष्ट पार्न सकेको छैन। यसले पाठकलाई कृषि प्रक्रियाबारे भ्रमित बनाउँछ।
भाषिक असावधानी: सम्भवतः पत्रकारले “धान रोप्ने” भन्न खोज्दा “धान काट्ने” लेखिएको हो। यस्तो असावधानीले समाचारको विश्वसनीयता घटाउँछ।
यसलाई यसरी लेख्दा स्पष्ट हुन्छ: “दिनभरमा एक कट्ठा धान रोप्दा पनि महिलाले पाँच सयदेखि सात सय रुपैयाँ मात्र पाउने गरेको गुनासो गरेका छन्।