Monday, 18 May 2026

जनकपुर साहित्य महोत्सव : एक विहंगम दृष्टिकोण (Janakpur Literature Festival: A Panoramic Perspective)

प्राचिन मिथिलामें स्तुतिगान करैवालाके उँच पिढिया पर बैठेबाक चलन छल, ओ अखनोधरि जारी अछि । तईँ एतह व्यक्तिके चालिसा पाठ होएत अछि । पक्षमे घडिघंट बजबैवाला बाहेक दोसरके पुछारी कमे होएत आयल अछि । घंटा बजबैवालाकेँ सम्मान कथित अभियानी सभ कहियो नहि देलक, कियक त ओ वर्चस्प पर चोट कसैत अछि । घडिघंटि डोलके बजैत अछि, मुदा घंटा तानिके वा अपना दिसि खिचके बजाओल जाएत अछि । प्रशंसाके भुखल लोक, स्तुतिगानमें आत्मरतिलिन लोकैन सभ एहि प्रराक्रममें बहुतोंकेँ भविष्यमे गदहा जनम सँ मुक्ति करबाक ध्यानमग्न रहैत छथि ।
✍ दिनेश यादव
जनकपुरधाम धार्मिक, सांस्कृतिक आ भाषिक त्रिवेणी संगम स्थल अछि । आब ई समग्र मधेशीके पहिचान, सम्मान आ संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपालक लेल नमुना स्थलके रुपमे सेहो अपन परिचय स्थापित कएने अछि । नेपालक सात प्रदेशमे पहिचानक आधारपर बनल मधेश प्रदेश मात्र अछि । एकर साख, सम्मान आ प्रतिष्ठा बचेबाक जिम्मेवारी सबगोटाके अछि । एहि वर्षक जेठ पहिल साता जनकपुरमे आयोजित तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव पर हमर ई टिप्पणी केन्द्रित अछि । एकटा लोकमैथिली साहित्यक विद्यार्थी होबाक नाता सँ हम अपन विचार पाठक समक्ष जाहेर करबाक प्रयास कए रहल छी । हमर एहि बिचार सँ सभकियो सहमत होएत से जरुरी नहि अछि मुदा मनन करबाक आवश्यक अछि ।
प्राचिन मिथिलामें स्तुतिगान करैवालाके उँच पिढिया पर बैठेबाक चलन छल, ओ अखनोधरि जारी अछि । तईँ एतह व्यक्तिके चालिसा पाठ होएत अछि । पक्षमे घडिघंट बजबैवाला बाहेक दोसरके पुछारी कमे होएत आयल अछि । घंटा बजबैवालाकेँ सम्मान कथित अभियानी सभ कहियो नहि देलक, कियक त ओ वर्चस्प पर चोट कसैत अछि । घडिघंटि डोलके बजैत अछि, मुदा घंटा तानिके वा अपना दिसि खिचके बजाओल जाएत अछि । प्रशंसाके भुखल लोक, स्तुतिगानमें आत्मरतिलिन लोकैन सभ एहि प्रराक्रममें बहुतोंकेँ भविष्यमे गदहा जनम सँ मुक्ति करबाक ध्यानमग्न रहैत छथि । जनकपुरक पिछला महोत्सवमे बहुतोंकेँ गदहा जनम छुटल होएत से हमर अनुमान मात्र अछि, सहभागी लोकैन एकर प्रत्यक्षदर्शी जरुर भेल हेताह । ई विषयकेँ प्रवुद्ध पाठक लोकैनकेँ स्वविवेक आ अनुसन्धान पर छोडि आब महोत्सवकेँ उद्देश्य पर विहंगम दृष्टिगोचर करी ।
सातम् संस्करणकेँ ई महोत्सव पिछला आयोजन सब सँ कनिको भिन्न नहि रहल अछि । जतह आयोजनक उद्देश्य भ्रमपूर्ण होइछ, ओतह निस्कर्षमे पहुँचनाए दुर्लभ होइछ । ओहूमे ४० टा स्पोन्सरके प्रचार लोगो तर रहिकेँ साहित्य, कला, संस्कृति आ भाषा जेहेन गम्भिर विषय पर भेल विमर्श विवादमुक्त आ उद्देश्य अनुरुप होएत उदाहरण कतौहू नहि भेटैत छैक । प्राचिन मिथिलामें समाज आ गाम सँ बेहरी उठाके सांस्कृतिक काज करबाक परम्परा रहलैए । अखनो बहुत रास गाम आ क्षेत्रमे एहि तरहे सांस्कृतिक कार्यक्रम सामूहिक रुप सँ आयोजन होएत आएल अछि । एहि तरहे आयोजनमे समाज आ गामक सभगोटेके अपनत्व रहैत छैक । मुदा जनकपुरधामक महोत्सव सबमे एकर अभाव सदखनि देखल गेल आ भेटैत अछि । एहि तरहे आयोजनमें स्पोन्सरके बाहेक किनको अपनत्व नहि रहि जाएत अछि । ई बात जनकपुरिया आ आयोजक संस्थाके बुझैटा पडतैन ।
‘जनकपुर साहित्य महोत्सव’केँ उद्देश्य सांस्कृतिक आ भाषिक गौरवक उन्नयन रहबाक चाही छल , से नहि भेल । महोत्सव पर सकारात्मकता सँ बेसी नकारात्मकता देखल गेल । सामाजिक संजाल आ जनमानसक प्रतिक्रिया एकर पुष्टि करैत अछि । महोत्सवके प्रमुख कमजोरी सबमे सहभागी संरचना, नाम विवाद, अमुक पार्टीके राजनीतिक वर्चस्प, जातिगत मानसिकता, आर्थिक पारदर्शिता , विवादित व्यक्तिके सहभागिता आदि देखल गेल ।
विविधतायुक्त मधेश प्रदेश आ राजधानी जनकपुरधाम रहितौहू समग्र मधेशक प्रमुख भाषाभाषीकेँ महोत्सवमे सहभागी नहि केनाए, आयोजकके पूर्वाग्रही मानसिकताकेँ पुष्टि करैत अछि । काठमाडौंसँ आयल व्यक्ति सभकेँ दबदबा आ प्राथमिकता एकर प्रमाण अछि । प्रदेशक विभिन्न भाषाभाषी–लोकमैथिली, भोजपुरी, बज्जिका, महगी, जोलहा आदि के निषेध कयल गेल आरोप महोत्सवके पर्यवेक्षक सभके अछि । ओ सभ कहैत अछि जे–स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्ग महोत्सवमेँ उपेक्षित रहल ।
आयोजनकेँ नाम विवाद सेहो देखल गेल । ‘जनकपुर’ नाम प्रयोग करबाक कारणेँ आलोचना भेल । स्थानीय जनमानसक आग्रह रहैत अछि जे धार्मिक आ सांस्कृतिक महत्त्वक अनुरूप ‘जनकपुरधाम’ नाम प्रयोग होबाक चाही । ओकर सुधारक कोनो गुन्जाईस आयोजक नहि केलक । तहिना साहित्यिक मंचमे राजनीतिक हस्तक्षेप स्पष्ट देखल गेल । महोत्सवक विमर्श साहित्यिक विषयसँ हटि राजनीतिक वर्चस्वक प्रदर्शनमे बदलि गेल , जे पैघ दुर्भाग्य अछि ।
महोत्सवमे सहभागी लोकक चयन सीमित जाति आ पहुँचके आधार पर भेल कहि आरोप लागल । ई आरोप साहित्यिक समावेशी भावनाके कमजोर करैत अछि । जनकपुरधामके सम्पदा सूचीमे सूचिकृत करबाक लेल गेरुवावस्त्र धारण कए पैदल मार्च कएल गेल , कि एहि सँ जनकपुरधाम युनेस्कोकेँ सम्पदा सूचिमे समावेश भए जाएत ? ई कदमक औचित्य आ पारदर्शिता प्रश्नमे रहल ।
आयोजक संस्थाक एकटा कमाण्डर जनकपुर जानकी मन्दिरमे चढाओल गेल पैसाक हिसाब सार्वजनिक करबाक मांग उठौलथि । ई विषय महत्वपूर्ण होइतहू, महोत्सवके उद्देश्य अनुरुप नहि रहैक । जे संस्थामें स्वयं आर्थिक पारदर्शिताक अभाव रहलैए, ओ दोसर पर आंगूर उठाएब कतेक उचित ? एतेह कहि दि जे ई स्तम्भकार हरेक क्षेत्र, संस्था वा महोत्सव सबकें आर्थिक पारदर्शिताके पक्षधर सदखनि रहल अछि । महोत्सवके सब सँ दुःखद बात ई रहल जे विवादित व्यक्तिके हालीमुहाली देखल गेल । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार आ विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखल गेल । ई महोत्सवक समावेशी छवि आ जनविश्वासमे आघात पहुँचल ।
हमरा जनितब, शायद, जनकपुर साहित्य महोत्सवक आयोजन साहित्यिक आ सांस्कृतिक उन्नयनक अपेक्षामे भेल छल, मुदा वास्तविकता मे ई आयोजन राजनीतिक वर्चस्व, जातिगत छनौट, नाम विवाद आ पारदर्शिताक अभावक कारणेँ आलोचनाक विषय बनल । स्थानीय भाषाभाषी समुदायक उपेक्षा आ जनकपुरधामक धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक अवहेलना एहि महोत्सवक मूल कमजोरी रहल ।
जनकपुरधामक सांस्कृतिक, धार्मिक आ भाषिक महत्त्वक अनुरूप भविष्यमे महोत्सवकेँ सफल, समावेशी आ विश्वसनीय बनाबय लेल सुधार आवश्यक अछि । खास ककेँ नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, समावेशी छनौट, राजनीतिक हस्तक्षेत्र निरुत्साहितता, विवादित व्यक्ति सँ दूरी कायम, सांस्कृतिक विविधता आदिकेँ जरुरी छैक ।
आयोजनक नाममे ‘जनकपुरधाम’ प्रयोग करबाक चाही, जे धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक सम्मान करैत अछि । स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्गकेँ प्राथमिकता दिओनाइ अनिवार्य छैक । बाहरी सहभागी सेहो रहथि, मुदा स्थानीय आवाजक उपेक्षा नहि होबाक चाही । जाति, पहुँच वा व्यक्तिगत सम्बन्धक आधार पर नहि, स्पष्ट मापदण्ड आ पारदर्शी प्रक्रिया अनुसार सहभागी चयन होबाक जरुरी अछि । साहित्यिक मंचकेँ राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त राखी ।
विमर्शकेँ साहित्य, संस्कृति आ भाषा पर केन्द्रित करबाक व्यवस्था होउक । आयोजनसँ संकलित धनराशिकेँ सार्वजनिक रूपमे हिसाब दिओनाइ अनिवार्य होउक । ई विश्वसनीयता आ जनसमर्थन बढेबाकले नितान्त आवश्यक अछि । सम्पदा सूचीमे सूचिकरण लेल स्पष्ट मापदण्ड, विशेषज्ञ समिति आ सार्वजनिक परामर्श आवश्यक अछि । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार वा विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखबाक परम्परा तोडि, समावेशी आ निष्पक्ष व्यक्तित्वकेँ अग्रता दिओनाइ जरुरी अछि । महोत्सवमे स्थानीय संस्कृति, लोककला, लोकगीत, चित्रकला आ नाट्यक प्रदर्शनक समावेश करबामेँ कोनो कसर नहि छोडनाए आवश्यक अछि । संक्षेपमें एकरा ई कहि सकैत छी जे–जनकपुरधाम साहित्य महोत्सवकेँ भविष्यमे सफल बनाबय लेल नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, पारदर्शिता आ समावेशी दृष्टिकोण अनिवार्य अछि । राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त, सांस्कृतिक विविधता आ आर्थिक पारदर्शितासँ सम्पन्न महोत्सव जनकपुरधामक गौरव बढाबय आ स्थानीय साहित्यक उन्नयन करयमे मिलके पाथर बनौक ।
(लेखकके निजी बिचार)

12 comments:

  1. वाह ! गजब आ सटिक विश्लेषण ! तित मुदा सान्दर्भिक अछि । सुन्दर आलेखकेँ लेल बहुत रास धन्यवाद आ आभार ! #राधा रमण कर्ण, जनकपुरधाम !

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  2. बेजोड़ आ स्वादिष्ट ! मैथिली भाषा, कला, संस्कृतिकेँ उन्नयनकेँ लेल सकारात्मक आलेख । एकैह सासमे हम पढि लेलोए । एहि तरहे विहंगम समिक्षा मैथिली आ मिथिलाकेँ लेल अपरिहार्य अछि । सादर नमस्कार ! ■दिनकर दिनेश, दडिभङ्गा, मिर्जापुर (बिहार)

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  3. भाई साहेब ! अपने गडदा जनमकेँ जोगाड़ सँ बचल छी ? ●राम उद्गार साह, सिरहा, नेपाल ।

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  4. एक गोट बभन झौलके उत्कृष्ट शब्दचित्र ! आभारसहित हार्दिक धन्यवाद ! ■रामलोचन पथिक, बेनिपट्टी, मधुबनी ।

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  5. सातम् संस्करणकेँ ई महोत्सव पिछला आयोजन सब सँ कनिको भिन्न नहि रहल अछि । जतह आयोजनक उद्देश्य भ्रमपूर्ण होइछ, ओतह निस्कर्षमे पहुँचनाए दुर्लभ होइछ । ओहूमे ४० टा स्पोन्सरके प्रचार लोगो तर रहिकेँ साहित्य, कला, संस्कृति आ भाषा जेहेन गम्भिर विषय पर भेल विमर्श विवादमुक्त आ उद्देश्य अनुरुप होएत उदाहरण कतौहू नहि भेटैत छैक । प्राचिन मिथिलामें समाज आ गाम सँ बेहरी उठाके सांस्कृतिक काज करबाक परम्परा रहलैए । अखनो बहुत रास गाम आ क्षेत्रमे एहि तरहे सांस्कृतिक कार्यक्रम सामूहिक रुप सँ आयोजन होएत आएल अछि । एहि तरहे आयोजनमे समाज आ गामक सभगोटेके अपनत्व रहैत छैक । मुदा जनकपुरधामक महोत्सव सबमे एकर अभाव सदखनि देखल गेल आ भेटैत अछि । एहि तरहे आयोजनमें स्पोन्सरके बाहेक किनको अपनत्व नहि रहि जाएत अछि । ई बात जनकपुरिया आ आयोजक संस्थाके बुझैटा पडतैन । ■प्रमोद बिहारी , जमशेदपुर, झारखण्ड ।

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  6. आयोजनक नाममे ‘जनकपुरधाम’ प्रयोग करबाक चाही, जे धार्मिक–सांस्कृतिक महत्त्वक सम्मान करैत अछि । स्थानीय भाषाभाषी, लेखक, कलाकार आ बौद्धिक वर्गकेँ प्राथमिकता दिओनाइ अनिवार्य छैक । बाहरी सहभागी सेहो रहथि, मुदा स्थानीय आवाजक उपेक्षा नहि होबाक चाही । जाति, पहुँच वा व्यक्तिगत सम्बन्धक आधार पर नहि, स्पष्ट मापदण्ड आ पारदर्शी प्रक्रिया अनुसार सहभागी चयन होबाक जरुरी अछि । साहित्यिक मंचकेँ राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त राखी ।
    ●किरण प्रजापति, सिंहेश्वर, बिहार ।

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  7. आयोजक संस्थाक एकटा कमाण्डर जनकपुर जानकी मन्दिरमे चढाओल गेल पैसाक हिसाब सार्वजनिक करबाक मांग उठौलथि । ई विषय महत्वपूर्ण होइतहू, महोत्सवके उद्देश्य अनुरुप नहि रहैक । जे संस्थामें स्वयं आर्थिक पारदर्शिताक अभाव रहलैए, ओ दोसर पर आंगूर उठाएब कतेक उचित ? एतेह कहि दि जे ई स्तम्भकार हरेक क्षेत्र, संस्था वा महोत्सव सबकें आर्थिक पारदर्शिताके पक्षधर सदखनि रहल अछि । महोत्सवके सब सँ दुःखद बात ई रहल जे विवादित व्यक्तिके हालीमुहाली देखल गेल । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार आ विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखल गेल । ई महोत्सवक समावेशी छवि आ जनविश्वासमे आघात पहुँचल । ■■ राम दरेश मिश्र, नई दिल्ली, भारत ।

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  8. विमर्शकेँ साहित्य, संस्कृति आ भाषा पर केन्द्रित करबाक व्यवस्था होउक । आयोजनसँ संकलित धनराशिकेँ सार्वजनिक रूपमे हिसाब दिओनाइ अनिवार्य होउक । ई विश्वसनीयता आ जनसमर्थन बढेबाकले नितान्त आवश्यक अछि । सम्पदा सूचीमे सूचिकरण लेल स्पष्ट मापदण्ड, विशेषज्ञ समिति आ सार्वजनिक परामर्श आवश्यक अछि । ब्राह्मणवादक पृष्ठपोषण करनिहार वा विवादित व्यक्तिकेँ प्रमुख भूमिकामे राखबाक परम्परा तोडि, समावेशी आ निष्पक्ष व्यक्तित्वकेँ अग्रता दिओनाइ जरुरी अछि । महोत्सवमे स्थानीय संस्कृति, लोककला, लोकगीत, चित्रकला आ नाट्यक प्रदर्शनक समावेश करबामेँ कोनो कसर नहि छोडनाए आवश्यक अछि । संक्षेपमें एकरा ई कहि सकैत छी जे–जनकपुरधाम साहित्य महोत्सवकेँ भविष्यमे सफल बनाबय लेल नामक शुद्धता, स्थानीय सहभागिता, पारदर्शिता आ समावेशी दृष्टिकोण अनिवार्य अछि । राजनीतिक वर्चस्वसँ मुक्त, सांस्कृतिक विविधता आ आर्थिक पारदर्शितासँ सम्पन्न महोत्सव जनकपुरधामक गौरव बढाबय आ स्थानीय साहित्यक उन्नयन करयमे मिलके पाथर बनौक । ●●●●●●विश्वास कुमार वत्स, बेगुसराय ।

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  9. एक गोट हिम्मतवाला मैथिल छी अपने । एहि तरहे लिखनिहार मैथिलीमे कम भेटैक छैथ । जी हजुरी नहि करैवालाकें कलम अपने ही जका धरगर छोइछ । अपनेकेँ एहि प्रयासकेँ सत्-सत् नमन करैत छी । धन्यवाद । ■रामलखन झा, अललपट्टी , दोनाइर , दरभंगा । ###

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  10. भैया ! बिना पेनीके लोटासभकेँ मुँहतोड़ जवाफ अपने देने छियैक । बहुत निक लागल । एहि तरहे अपेक्षा मैथिलजन अपने सँ सदखनि रखैत अछि । साधुवाद ।■प्रफूल्ल कुमार आर्यन, दलसिंहसराय, समस्तीपुर (बिहार)

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  11. जोहला भाषाकेँ चर्च अपने आलेखमे केने छि ताहिलेल हार्दिक धन्यवाद । ■मोहम्मद हबिबुल्लाह शेख, सर्लाही, हाल :साउदी अरब ।

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  12. प्रणाम हम राँची सँ रामभरोस माझी ।

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