Monday, 11 May 2026
मैथिली लघुकथा : मृत्युभोज
आत्माक शांति देखावटी भोज सँ नहि, जीवितक सेवा आ सहारा सँ होइत अछि ।
■दिनेश यादव
मनमोहना ग्वार फकिरा गामक चौरीचाँचरमें भैंस चरबैत छल । नजिक मुतनी नदीके घनघोर झाँकडिमे ओकर नजर गामक बुजुर्ग मैञ्जन जादव पर पड़ल । गामक सभ लोक हुनका ‘दादा’ कहि पुकारैत छल ।
मनमोहना नजिक गेल आ पुछलक—
‘दादा, अहाँ गाम सँ एतेक दूर मुतनी नदीके झाँकडिमे अकेले कियैक ? किछु जड़ी–बूटी चाही छल या कोनो वनस्पति आवश्यक छल तऽ हम आनि दितहुँ ।’
दादा आँखि नम करैत कहलखिन—
‘बौआ, काल्हि सँ एतहि भूखल छी । घरवला निकालि देलक । बुखार लागल छल, पाँच बेटामे सँ कोनो औषधिक लेल पैसा नहि देलक । मोन होइए जे एतैह प्राण तेज देतू । ’
चार दिनक बाद फकिरामे खबर फैलल— मैञ्जन दादा आब एहि संसारमे नहि रहलाह ।
ग्रामिण सभ गामक पोखरि महाड पर दादाके अन्त्येष्टिमे पहुँचल छल, गुमस्ता काका ओतहि दादाके पाँचो बेटाके पुछलक–
‘बौआ, मैञ्जनक भोज कतेह करबहक ? दादा बहुत धन कमाकेँ छोडि गेलौक । दू सभा मृत्युभोज त करै पडतौं । गाम समाजके चाहना एहा छयैक । ’
मैञ्जनक जेठका लडका कहलक–
‘समाज जे जेना कहतै, करबै । हम सभ भरि गाम या एक खपकटी भोज करबार सोच बनौने छियैक ।’
तेरहम दिन हुनकर बेटा सभ 10 कुन्टल बसमतिया चौरक एक सभा मृत्युभोज कएलक । सभा भोजमे रहरि दालि, डल्ना तरकारी, पापड, कुम्रौडि, परवलकेँ भुजिया सहित पाँचटा सब्जी आ सकलौडि एवं दहीचिनीकेँ भरमार व्यवस्था ककेँ सात गम्मा लोककेँ भोजन कराओल गेल ।
मनमोहना मनहि मन सोचैत छल—
‘जखन दादा जीवित छलाह तऽ औषधि उपचार नहि कएल गेल । समाज सेहों बेटा सभ सँ दादाके उपचारक खातिर कोनो पहल नहि कएलक । मुदा लाखों खर्च कऽ मृत्युभोज कएलक अछि । आत्माक शांति देखावटी भोज सँ नहि, जीवितक सेवा आ सहारा सँ होइत अछि ।’
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गजब अछि । ■रामधारी वैश्नव, भोपाल, मध्य प्रदेश ।
ReplyDeleteसमाजक यथार्थ चित्रण ! प्रेरणाप्रद, शिक्षाप्रद आ जानकारीमुलक अछि ई लघुकथा । गहिगर विषय पर चोटगर प्रस्तुती । कथाकार दिनेश यादवके बहुत रास बधाई । ●सुरेन्द्र सूर्यवंशी, नई दिल्ली
ReplyDeleteराम नाम सत्य है ! ¤ जयमंगल झा, बेनीपट्टी, मधुवनी
ReplyDeleteभोज खाइवाला आ करैवालाके लाज लगताह आब । सुन्दर शैली । मिथिलाक ई कुसंस्कृतिकेँ रोकबाक जरूरी अछि । पहलके लेल कथाकारकेँ बधाई दैत छियैन । ●तृप्ति नवल, कँकडबाग, पटना, बिहार !
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ReplyDeleteगम्भिर विषय पर स्वादिष्ट प्रस्तुती । धन्यवाद ! @विन्देसर खंग, सिरहा माडर , नेपाल
ReplyDeleteमृत्युभोज की जगह यदि हम दान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक हित में खर्च करें, तो यह न केवल मृतक की आत्मा के लिए सच्ची शांति का मार्ग होगा, बल्कि जीवित समाज के लिए भी स्थायी कल्याण का आधार बनेगा । –रामभरोसी यादव, बेटिया ,बिहार ।
ReplyDeleteबिल्कुल सही कहा आपने। मृत्युभोज जैसी परम्पराएँ जहाँ जीवित व्यक्ति की उपेक्षा और मृतक के नाम पर अपव्यय को बढ़ावा देती हैं, वहीं दान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक हित में खर्च करना समाज के लिए स्थायी लाभकारी साबित होता है । @Ram Kumar Yadav, Benipur, Darbhanga .
ReplyDeleteमधेशी समाज में मृत्युभोज की परम्परा आज भी जीवित है, परन्तु यह मानवीय संवेदना और आर्थिक न्याय के विरुद्ध खड़ी है ।
ReplyDeleteइस कथा से स्पष्ट होता है कि हमें मृत्युभोज की जगह दान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक हित में खर्च करने की दिशा अपनानी चाहिए ।
–मिरा कुमारी रजक, मटिहानी, महोतरी, नेपाल ।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अक्सर इस भोज के कारण कर्ज़ में डूब जाते हैं । सामाजिक प्रतिष्ठा और ूलोग क्या कहेंगेू की मानसिकता इसे जीवित रखती है । –रामाधिन रामकर, पडौंल बजार, मधुवनी ।
ReplyDeleteआर्थिक बोझ, सामाजिक दिखावा और मानवीय विडम्बना का जिता जागता और सटिक उदाहरण है, यह लघुकथा । मृत्युभोज मे गरीब किसान परिवार कर्ज़ में डूब जाते हैं । मृत्युभोज प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बनना अनुचित है । जीवित व्यक्ति की उपेक्षा, मृतक के नाम पर अपव्यय करना महापाप हैं । –विणा देवी सिन्हा, मोकामा, बिहार ।
ReplyDeleteबिल्कुल सही कहा आपने । मृत्युभोज जैसी परम्पराएँ जहाँ जीवित व्यक्ति की उपेक्षा और मृतक के नाम पर अपव्यय को बढ़ावा देती हैं, वहीं दान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक हित में खर्च करना समाज के लिए स्थायी लाभकारी साबित होता है ।–सूर्य प्रकाश ‘प्रतिबिम्व’, बोकारो, झाडखण्ड ।
ReplyDeleteभारतको राजस्थानमा मृत्युभोजलाई कानूनी रूपमा प्रतिबन्ध लगाइसकेको छ । नेपालको मधेश लगायतका क्षेत्रमा अझै प्रचलित छ, तर आलोचना बढ्दो छ । धेरै समाजहरूले मृत्युभोजको सट्टा दान वा सामाजिक कार्यलाई प्राथमिकता दिन थालेका छन् । यतातिर सबैको ध्यानाकर्षण गर्न चाहन्छु । दिनेश यादवज्यूको लघुकथा पठनीय, प्रेरक र शिक्षाप्रद छ । हार्दिक धन्यवाद सहित, –राममनोहर केवट, कलैया, बारा, मधेश प्रदेश (नेपाल) ।
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