Friday, 12 June 2020

पाग कक्कर ?(Whose PAAG?)

मैथिल ब्राह्मणक पाग 

मैथिली भाषी क्षेत्रमें ‘पाग’ पर बषौं सँ विवाद जारी अछि । हरेक मैथिली गतिविधि आ कार्यक्रममे ई बहस आ विवादके विषय बनैत आइब रहल अछि ।  मुद्दा तइयो किछू जाति विशेषक लोक सभ एकर समाधान दिशि कम आ प्रचार दिशि बेसी धडफडीमे रहैत छथि । मैथिली आ मिथिला पर ब्राह्मणवाद हाबी भेलाक किटानी आरोपक बाबजूद अहि तरहे क्रियाकलाप होनाइ अहितकर अछि । अहि विषय पर बारम्बार आबाज उठाओल जा रहल अछि । मुदा ओहि आबाजके सुनूबाक प्रयासधरि नहि होएत अछि । एकडा एकगोटा दूर्भाग्यपूर्ण आवस्था कहि सकैत छी । #मैथिली आ #मिथिला ब्राह्मणवाद सँ मुक्त नहि होएत त एकड भविष्य अन्धकार अछि । हाँ, किछू गोटाके अहि नाम पर वर्षौधरि चाँदि कटैया जारी रहि सकैत अछि, मुदा मैथिली हक्कन कानति । जहाधरि पागक गप्प अछि, पाग विशुद्ध अगाडा जाति (#ब्राह्मण आ कर्ण–कायस्थ) के थिक । ई एकगोटा ध्रुवसत्य सेहो थिक । मुदा एकर अर्थ ई किमार्थ नहि जे एकडा विरोध कयैल जाए । कुनू जातिक पहिरवाक विरोध अनुचित अछि, मुदा एकडा समुच्चा मैथिली भाषीक शीरक शान कहि देनाई अतिबादी आ विस्तावादी सोचके आलाबा अउर किछु नहि भए सकैत अछि । अहि तरहे सोचके विरोध निश्चित अछि, होएत । पागके शुभाराम्भ कालक तथ्यपरक प्रमाण सभके अभाव अछि । जे किछु अछि सबटा एकमुडिया आ एकभगहा सब भेटैत अछि । मुदा एकर बाबजूद पागक विषयमे जे यथार्थ आ सत्य अछि अखनोधरि ककरो सँ चोरायल नहि अछि । ‘पाग कक्कर ?’ शीर्षकमे भेल अध्ययनके क्रममे निचा देल गेल सामग्री सब मिथिलामे पाग ब्राह्मण , कर्ण–कायस्थके अलाबा दुसरके नहि थिकैह ,तक्कर जोरदार रुप सँ पुष्टि होइत अछि । 

पाग ब्राह्मण आ कर्ण–कायस्थके थिकैह

एकर पुष्टि भारतक चर्चित पत्रिका जनसत्ता सेहो कए रहल अछि । पत्रिकाके ५ नोभेम्बर २०१५ के अंकले देवशंकर  नविन लिखने छथि–
.‘...यस पूरी मिथिला का सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है । ‘पाग’ की प्रथा मिथिला मे सिर्फ ब्राह्मण और कायस्थ में हैं ।’ 
#पाग प्रति बहुत राश गइर ब्राह्मणके आक्रोश देखबामे अबैत अइछ । एकर विपक्षमें रहनिहार सब विभिन्न मंच आ आलेख मार्फत् अपन मोनक भडास निकालैत रहैत छथि । अहिमे नेपालक मैथिली भाषी बुद्धिजीवि सर्वश्री प्रो. परमेश्वर कापडि, विदेह सदेहमे ‘विदेह मैथिली प्रबन्ध–निबन्ध–समालोचना’ शीर्षकमे लिखने छथि :– 
 ‘.....आई किछु लोक कत्तह कहाँ के धोती कुर्ता आ बभनौटी पागकें मैथिली संस्कृतिक पहचान सङे जोडैके घृष्टता कए रहलाह अछि  ..समाजमे बाभन छोडि आन केओ पाग पहिरते नै छै । जे जाति विशेष सँ आबद्ध अछि से पाग जँ मैथिली संस्कृतिक प्रतिक बनत तँ नै लगैय जे ई बात फेरु हमरे बाभनक थीक से भँ जएतै ? ’ 
कापडि पागके बभनौटि संस्कृतिक प्रतिक कहैत समुच्चा मिथिलाके पहचान सङे जोडैके धृष्टता नहि करबाक चेतावनी दैत छथि । पागके बारेमे सुभद्र झा सेहो अपन पोथी नातिक पत्रक' उत्तरमे एकरा आन जातिके पहिरबा मानैक लेल तयार नहि छथि । ओ ‘ब्राह्मण आ कायस्थक पाग’ पहिरब बात उल्लेख कयने छथि । 
पागके ब्राह्मण आ कर्ण–कायस्थके आलाबा दुसरके नहि होबाक बात मैथिली साहित्यकार प्रफुल्ल कुमार सिंह सेहो जोड दए के कहने छथि । भर्जिनिया विश्वविद्यालयक डिजिटलाइज संस्करणमे सिंह ‘सुनसरी :अंकालिका कथा–रिपोर्ट का पहला संकलन’ शीर्षकमे लिखने छथि -
 ‘... पाग की तो बात ही छोडो । थारु पाग पेन्हता ही नहीं । मैथिल बाम्हन पेन्हता हैं । सरियो न तो मैथिल है और न तो बाम्हन ही ।  
पाग सोलकन आ पिछडा जातिके पहिरन नही होबाक' बात इतिहासकार उपेन्द्र ठाकुर सेहो कयने छथि । ओ त ब्राह्मण, कर्ण–कायस्थके विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आ परम्परागत क्रियाकलापमे पागक' प्रयोग होइत बात लिखने छथि । ‘मिथिला चित्रकला व शिल्पकला’ पोथीमे ठाकुर लिखने छथि –

‘मैथिल ब्राह्मण तथा कायस्थ परिवारमे यज्ञोपवीत संस्कारक हेतु पवित्र सूच(जनेउ अथवा यज्ञोपवीत).मिथिलाक विशेष शिर–त्राण, जे ‘पाग’ क नामसँ प्रसिद्ध अछि ...।’ 

अहि तरहे पुष्टि नवभारत टाइम्स सेहो कएने छयैक । पत्रिकाक अनलाइन संस्करणके ४ जनवरी २०२० को अंकमे अंकित ओझा द्वारा संपादनमे प्रकाशित समाचारमे ‘पाग लगाने की प्रथा मिथिला के ब्राह्मणों और कायस्थों में ही है...’ उल्लेख अछि । तहिना बिएनएन न्यूजमे विकास झाके बाइलाईनमे छप्पल समाचारमे समग्र मिथिलाके पहिरबा नहि होमाक तथ्य उल्लेख अछि । पत्रिकाक' अनलाईन संस्करणमे लिखल अछि–

‘....पाग बिहार के मिथिला क्षेत्र और नेपाल के तराई इलाकों में मैथिली भाषी ब्राह्मण व कर्ण कायस्थ जातियों मे अमूमन मांगलिक अवसरों पर पहनने की परंपरा रही हैं ।’

भारतीय समाचार माध्यम ‘आइबीएन७’ के न्यू दिल्लीके २०१६ के अनलाईन संस्करणमे सेहो समुच्चा मिथिलाके पहिरन नहि होमाक' बात उल्लेख अछि । पत्रिकामे अहि तरह लिख अछि–

‘...मिथिला में पडितों के बीच सिर पर सफेद पाग धारण करने की परम्परा हैं । ब्राह्मण और कायस्थ जातियों में मांगलिक अवसरों मे लाल पाग पहना जाता है । पाग की स्वीकार्यता यूँ तो दो ही जातियों में है...। ’

हिन्दी न्यूजके २०१६ के सेप्टेम्बर अंकमे सेहो पाग मिथिलाके समुच्चा जातिके प्रतिनिधित्व नहि कए रहल तथ्य उजागर कएने छहि । 
 ‘...सच तो यह है कि मिथिला में सदियों बाद भी पाग की स्वीकार्यता ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ,दो ही जातियों में है । ब्राहम्णवादी संस्था मिथिलालोक फाउन्डेसन अन्य जाति के लोगों में भी इसकी स्वीकार्यता बढाने की दिशा मे प्रयासरत है ।’
 ‘..पाग विवाह, उपनयन, यज्ञ, पुजा आ अन्य धार्मिक कार्यक्रममे प्रयोग होइत अछि ’(टेलिग्राफ इण्डिया) 

२०१२ मार्चमे प्रकाशित विदेहके संपादकीयमे पाग पर आलोचनात्मक टिप्पणी कयल गेल अछि । मिथिलामे पाग पर जारी विवादके पत्रिका अपन सटिक टिप्पणी मार्फत् ब्राह्मणेत्तर, सोलकन, पिछडावर्ग, शिल्पी समुदायसहितके पक्ष लेबाक' पुष्टि होइत छहि । संपादकीयमे लिखल अइछ :-

'....पाग मात्र ब्राह्मण आ कर्ण–कायस्थ परिवारक सकल मंगलकार्यमे पहिरल जाइत अछि । आन जातिक मध्य एकर कोनो प्रयोजन वा परंपरा नै । तखन मिथिलाक सभटा साहित्यक समारोहमे पाग पहिरेबाक प्रथाकें की मानल जाए ? चाटुकार ब्राह्मण साहित्यकार ऐ प्रथा द्वारा की प्रमाणित करबए चाहै छथि  जे मैथिली मात्र ब्राह्मणेटा केर भाषा थिक । ’
डिजिटल पत्रिका विदेहके  समानान्तर परम्पराक' विद्यापति आ पाग विदेह सदेह के २०१२ के अंक ११ मे महाकवि विद्यापतिके पाग लगाके ब्राह्मण बना देनाइ कार्य के खुब आलोचना कयल गेल अइछ । सहि आ यथार्थ चित्रण पाग पर भेल अछि -

‘मौर कोढिलाक बनैत अछि आ पागसं फराक अछि । कर्ण कायस्थमे सेहो सिद्धान्त कुमरम आदिमे मात्र पाग पहीरि कँ विध होइत अछि ,ओहो सभ बियाह कर पाग नै मौरि पहीरि क जाइ छथि । पूर्णियांक ब्राह्मणमे नव–विवाहिता बरसाइते मौर पहीरि क वटबृक्ष धरि जाइ छथि । पाग मात्र आ मा मैथिल ब्राह्मणक बियाहक विध–बाधक प्रतीक अछि । विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृत्ता लिखल अछि आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि ।....फेर अनचोक्के पाग पहिरा क (मिथिला सांस्कृतिक परिषद ई संस्था भारतक स्वतन्त्रताक बाद विद्यापतिकें पाग पहिरा क हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक ) विद्यापति (मैथिल बला, संस्कृत बला नै) कें हम्मर विद्यापति ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल ।...’

विकिपेडियाके अंग्रेजी संस्करण मे पाग पर लिखल बात सँ ई सम्मुचा मैथिली भाषीके पहिरवा नहि भेलाक बात कएने छयैक । 
The Paag is a headdress in the Mithila region of India and Nepal worn by Maithil Brahmin and Karna Kayastha people. It is a symbol of honour and respect and a significant part of Maithil Brahmin culture.[1] Paag is not the dress of everyone in the Maithili speaking region. The tradition of applying Paag in the Maithili region is in Brahmin and Karna Kayastha. Folk of other caste do not wear Paag. Brahminical sub-clans are being attacked by other caste communities in the Maithili speaking region. This is Brahmin expansionism. In Mithila region, there is a desire to wear a Pagadi or a Muretha. People of all castes apply it. Brahmins and Karna-Kayasthas wear their Paag on the occasion of their Upanayana, marriage. Now it is being forced on the forehead to all people by Brahmin.
(पाग मैथिली भाषी क्षेत्र के सभ कियो के पहिरवा नहि अछि । मैथिली क्षेत्र मे पाग लगेबाक परम्परा ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ मे मात्र थिकैह । अन्य जाति के लोग पाग नहि पहिनैयत छयैक । ब्राह्मणवादी सभ पाग मैथिली भाषी क्षेत्र के अन्य जाति/समुदाय पर जबरजस्ती लधबाक काज कए रहल छहि । ई ब्राह्मण विस्तारवाद अछि । मिथिला क्षेत्र मे पगडी वा मुरेठाक रिबाज अछि । ई सब जाति के लोक लबैइत छहि । ब्राह्मण और कर्ण–कायस्थ अपन यज्ञोपवित, उपनयन, विवाहके अवसर पर मात्र पाग पहिनैत छहि । ’ (विकीपीडिया),  
पिछला वर्ष २०१९ के नोभेम्बर में मैकमिलन अंग्रेजी शब्दकोषमें ‘पाग’के समावेश भेल अछि । ओहीमे लिखल अछि भारतक' मिथिला क्षेत्रक व्यक्ति सभके द्वारा लगबैय वला एक प्रकारके ‘हेडगेयर’ - a kind of headgear worn by people in the Mithila belt of India) .‘एकटा पहिरन’क प्रकार कहल गेल छहि, एकर अर्थ ई सबके नहिएटा थिक । आश्चर्यके बात त तब लगैत अछि जब ओतेह पाग पर वाक्य विन्यासक' उदाहरण देल गेल छहि, ओहि मे धुर ब्राह्मणवादी सभके द्वारा चलाओल गेल अभियानक' नामक जिक्र कएल गेल अछि । (मैकमिलन डिक्सनरी)

पाग पर जतेह कतौह चर्चा भेल अछि वा साइटेसन, वा फूटनोट वा समाचारक' बाइट भेटत सबटामें धुर ब्राह्मणवादी सभ मात्र भेटयैक' छथि । आन समुदाय आ सम्प्रदायके अहि प्रति कुनू आकर्षण नहि होनाई आ मैथिलीके हरेक कार्यक्रममे पाग पहिरनके अभियान निश्चित जातिसँ मात्र होनाई पाग पर ब्राह्मणवादी प्रचारके अलावा आरु किछू नहि भए सकैत अछि (गूगल सर्ज इन्जिन,२०२०)। दुई दशक पहिल धरि पाग ब्राह्मण आ कर्ण–कायस्थ मात्र प्रयोग करैत छलाहए (लोकल डट मिथिलाकनेक्ट, २०१९) । 
नेपालक वरिष्ठ विश्लेषक सिके लाल अंग्रेजी अखबार माईरिपब्लिकाके २०१८ मई २१ मे लिखने छइथ :
In the Hindu hierarchy of headgears in Mithila, the austere Paag is mainly for pundits of Brahmans and Kayasthas......(मिथिलामें हेडगल्र्सके हिंदू पदानुक्रममे., मुख्य रुप सँ पाग ब्राह्मण आ कायस्थके पंडितक लेल अछि । परन्तु आब अन्य जाति सभके विद्वान लोक सेहो अहि पर दाबी करि सकैत अछि । ) 
अन्तमें, 
ऐतेक प्रमाण आ तथ्यके बाबजूद जौ कियो कहैत छथि जे पाग समुच्चा मिथिलाक' पहिचान थिक, ओ ब्राहमणवादक' पृष्ठपोषक' थिकाह । पाग किन्नौह नहि मैथिली भाषीके पहिचान भए सकैत अछि ।  पाग कर्ण–कायस्थके पहिरन होइतौ ओ सभ एकर प्रचार प्रसारमे कम देखल गेल अइछ । अपन पारिवारिक वा अन्य अनुष्ठानके अलाबा आन जगह पर ओ सभ पागक प्रचारबाजी नय करैत भेटयैत अछि । मुद्दा ब्राह्मणवादी सब जोडतोडके साथ एक सूत्रिय आन्दोलन जँका प्रचारमे लागल अछि । अपन–अपन पहिरबाके प्रदर्शन करबाक छुट सबके छयैक, मुदा एकरा समुच्चा मिथिलाके पहिचानके रुपमे प्रचार केनाइ अनुचित अछि । पागके सम्मान सदखनि करब, करैत छी , मुदा समुच्चा मिथिलावासीके पहिचान बनेबाक अन्धून यात्रा पर रोक लगबाक आग्रह अछि । 
  
सन्दर्भ सामग्री :-
  1.  देवशंकर नविन, जनसत्ता ५ नोभेम्बर २०१५ ।
  2.  परमेश्वर कापडि, विदेह मैथिली प्रबन्ध–निबन्ध–समालोचना, विदेह संदेह १०९ अंक ५१–१०००,श्रुति प्रकाशन, संस्करण –२०१२,पृ.४४० 
  3. सुभद्र झा, नातिक पत्रक उत्तर, सन् १९८४, पृ.१३१ ।
  4. प्रफुल्ल कुमार सिंह, सुनसरी ः अंकालिका कथा–रिपोर्टजा का पहला संकलन । प्रकाशक ःरचनाकार, १९७७, पृ.१८ डिजिटाइज ःभर्जिनिया विश्वविद्यालय ।
  5. उपेन्द्र ठाकुर, मिथिला चित्रकला व सिल्पकला, पटना÷नयाँ दिल्ली (भारत)
  6. अंकित ओझा, सम्पादन, नवभारत टाइम्स डट कम, ४ जनवरी २०२० ।
  7. विकास झा, बिएनएन न्यूज, २८ फेब्रुअरी २०१८ ।
  8. आइबीएन७ न्यूज डेल्ही,५ डिसेम्बर २०१६ ।
  9. हरिनारायण सिंह, टेलिग्राफ इण्डिया, अनलाइन संस्करण ६ डिसेम्बर २०१
  10.  हिन्दी न्यूज १८ ,११ सेप्टेम्बर २०१६ । 
  11.  शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ सहायक सम्पादक। सम्पादकीय १०१ म अंक,विदेह , १ मार्च २०१२, वर्ष ५ मास ५१ ।
  12. विदेह, समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग विदेह सदेह ११ अंक १०१–११०। पृ २१–२२ २०१२।
  13. सिके लाल ,‘सिग्नीफिकेन्स अफ सिम्बोलिज्म’, माईरिपब्लिका नागरिकन्युजनेटवर्क, अनलाईन संस्करण, २१ मे २०१८ ।




4 comments:

  1. यथार्थ लिखल !

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  2. मैथिली आ मिथिलाके सुडाह करबाक तीन बात : कथित मानक, पाग आ ब्राह्मणबाद !

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  3. Nice a piece ! ●Govind Ballabh , Darbhanga (Bihar)

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