| Writter दिनेश यादव |
समाज, संस्कृति, इतिहास, दर्शन आ राजनीतिशास्त्रके अध्ययन बिना सुच्चा पत्रकारिता असंभव अछि । खास ककें भाषिक पत्रकारितामें एकरा अनिवार्य मानल गेल अछि । विभिन्न भाषाकें अपन–अपन महत्व आ पहिचान होयत अछि । मैथिली भाषा ओहिमें सम्भवतः सब सँ उपर आ आगा अछि । एकर विरासत आ इतिहास आन कोनो भाषा सँ बेसी गरिमामय अछि । परन्च मैथिली डेगाडेगी मात्र बढि रहल अछि । अहि भाषा’क उत्थान’क लेल सरोकारवला सबके ‘अश्व शक्ति’ बढेनाई आवश्यक अछि । अहि शक्तिके प्राप्ति’क लेल मैथिली भाषामें पत्रकारिताकें एकटा अस्त्रकें रुपमें प्रयोग कयल जा सकैत अछि । मुलधार’क पत्रकारितामें दिनानुदिन चुनौति बढिए रहल अछि । ऐहन अवस्थामें भाषिक पत्रकारिता कएनाई अउर बेसी चुनौतिपूर्ण अछि । कारण अखनों मैथिलीमें मानक पाठ्य सामग्री आ संदर्भग्रंथके अभाव देखल गेल अछि । निष्पक्ष, विश्लेषणात्मक गं्रथ आ विवेचना’क अभाव ओतबे अछि । पठनीय सामग्री सब त भेटत मुदा ओ विषयान्तर भेल बेसी रहैत अछि । ठोस समालोचना’क अभावमें सर्वमान्य ग्रन्थ आ पोथि मिथिलामें दूलर्भ बात अछि । तईं पछुलका पीढी सबमें सेहो पुरनके संकिर्णताबाद हावी होनाईकें एकटा प्रमाणकें रुपमें एकरा लए सकैत छि । किछु वर्ष एम्हर किछू गोटे एकरा दूर करबाक प्रयासमें लागले छथि, परन्च ओ प्रयाप्त नहि भँ पावि सकल अछि ।
सर्वस्वीकार्यता’क अपरिहार्यता
मैथिली भाषाकें उपयोगी भूमिकामें व्यापकता’क लेल भाषिक पत्रकारिता कएनिहार सबकें कनिक संकिर्णताबाद आ आत्मकेन्द्रित मनोभाव सँ उपर उठबाक अपरिहार्यता देख रहल छि । मिथिला’क हरेक क्षेत्रमें अपनत्ववाद हावी छई, तेकरा तोडवाक दिश एक कदम आगा मैथिलीमें पत्रकारिता कएनिहार लोकन्हिके बढैय पडतन्हि । अखन युवा सबमें उच्चाध्ययन’क अभाव सेहो खटैक रहल अछि । तई विषयान्तर भँ विषयवस्तु’क उठान कए दैत छथि । पत्रकारितामें एक गोटा पत्रकारकें विषयान्तर होनाई समाज आ देशकें दिगभ्रमित कए सकैत अछि । तईं सत्यनिष्ठ भँ जहि विषयकें उठान पत्रकार कँ रहल छथि, ओहिमें केन्द्रित भए आगा बढबाक जरुरी अछि । ‘एक गोटा पत्रकार सत्य तक पहुँचबाक लेल आ स्रोत तक पहुँचबाक लेल तमाम उपलब्ध वैद्य हथकंडा कें प्रयोग कैर सकैत अछि । सत्यके सत्ताके साथ सक्रिय करैयके काम पत्रकारिताकें थिक’ (पचौरी, सुधिश) । सत्य धरि पहुँचय सँ पहिले कएल गेल पत्रकारिता ‘स्वार्थ’ सँ मुक्त नहि भँ सकैत अछि । एहेन अवस्थामें सर्वस्वीकार्यता असंभव बात भँ जाएत अछि । तईं अहि दिश सम्बन्धित लोकन्हिकें डेग बढेनाई जरुरी अछि ।
शोध पर जोड
पत्रकारितामें शोध आधारित तथ्य सबकें अभाव बड बेसी अछि । खास ककें भाषिक पत्रकारिता’क क्षेत्रमें एकर अभाव बड बेसी खटकैत अछि । एकरा हम व्यवहारिक आ व्यवसायिक कठिनाईकें रुपमे लैत छि । शुद्ध आचरण आ वृहत्त सोच रखनिहार सबके न्यून उपस्थिति’क कारण भाषिक पत्रकारिता ‘जातिय संकीर्णता’ के नहि तोडि सकल अछि । चाहे ओ मूलधार’क पत्रकारिता होए वा क्षेत्रिय । दुनूमें ई एकटा पैघ कमजोरी देखल गेल अछि । तहिना समावेशिता आ समान–सम्मान आजूक अपरिहार्य विषय अछि । पत्रकारितामें अहि विषयकें एकटा ‘प्रचार सामग्री’ के रुपमें मिडिया संचालक सब उपयोग कए रहल अछि । अखनो सीमित जाति, वर्ग आ समूहके कब्जामें मूलधार’क पत्रकारिता अछि । दलित, जनजाति, आदिवासी, सीमान्तकृतसहितके समूह अखनो मूलधार’क पत्रकारिता सँ बचिंत अछि । एहेन परिस्थितिमें भाषिक वा क्षेत्रिय पत्रकारिताकें महत्व अउर बढि जाएत छैक । ओ समावेशिता’क सिद्धान्त अंगिकार करैत जौं आगा बढत , समाजमें एकता आ विश्वसनीयता संगैह स्वीकार्यता सेहो स्थानीय स्तरमे प्राप्त कए सकैत अछि ।
मर्यादित पत्रकारिता
मिथिलामें ‘गारी’ एकटा संस्कृतिक अंगकें रुपमे अछि । परन्च ओहो विशेष परिस्थितिमें सुहनगर आ रुचिकर होयत छैक । अखुनका युवा पीढि सब अहि बातके नहि बुझि एकरा ‘बाह्रमासा’ बना देने छथि । खास ककें पत्रकारितामें गालिगलौज अमर्यादित बात होएत छैक । अहि बातकें नव युवा सबकें बुझैहीटा पडतैय । खास ककें भाषिक (मैथिली) पत्रकारितामें भाष्य शैली मर्यादित होमाक जरुरी छहि । एकर अभावमें किनको लेल व्यक्तिगत बिचारमें ‘पत्रकारिता’ भँ सकैत अछि, परन्च ओ आमजन’क सोचमें ‘पित्त पत्रकारिता’क’ कोटी आ तह सँ उपर नहि उठि सकैत अछि । तईं सत्य सगैंह सभ्य आ मर्यादित भाषाके पकडैत बेजोड प्रस्तुतिकें साथ आगा बढबाक नितान्त जरुरी अछि । दोसर बात, मधेस आ मिथिलामें बेरोजगारी’क कारण प्रतिभावान व्यक्ति सब दलगत कुल्लीमें रुपान्तरित भेल अछि । अई तरहकें रुपान्तरण मधेस, मिथिला आ मैथिलीकें लेल दुखद आ निराशाजनक प्रवृत्ति अछि । पर्चाकारिता, दलकारिता, हनुमानकारिता, भजनियाकारिता’क कारण पत्रकारिता जहि रुप सँ आगा बढि सकैत छलैय, तक्कर सुखानूभूति नहि भँ पावि रहल अछि । खास ककें मिथिला क्षेत्र सँ प्रकासित अखबार सबमें बड्ड बेसी कमजोरी देखल गेल अछि । खोजी पत्रकारिता’क ओतेह ओतबे आभाव अछि । हाँ, एकर नाम पर घेंच तोडबाक प्रवृति देखमामें बेर–बेर आयल अछि । गलत प्रवृतिके विरोध होमाकें चाहि । अहि क्षेत्रकें अपन पेशा’क रुपमें ग्रहण कयलाके पश्चात ई बात बुझई पडत जे ‘पत्रकारिताके उद्देश्य लोकसेवा होएत छैक, तईं जनहितक लेल खोजी पत्रकारिता स्वीकार्य भेल अछि । ग्रामिण पत्रकारिता ग्रामीण जीवनके लेले महत्वपूर्ण छैक , एकर आशय ग्रामीण समस्या सबके बाहर अनैत ग्राम विकास योजना सबकें निर्धारित करमामे अपन महत्वपूर्ण योगदान दैति । मुद्दा अहि दिस ध्यान नही जा रहल अछि’(त्रिपाठी आ पाण्डेय) । नेपालमें ग्रामिण पत्रकारिता’क प्रयास त भेल अछि , परन्च ओ प्रयाप्त नहि । अखनो, ‘टेलिफोनी’ पत्रकारिता होएत अछि । स्रोत आ साधन’क अभावमें अखबार’क संवाददाता सब सदरमुकाम केन्द्रित पत्रकारिता कए रहल अछि । ई पत्रिका भरबा’क लेल प्रकाशन गृहके सामग्री त निक जका भेट जाएत छन्हि, परन्च ग्रामिण क्षेत्र’क जनबोली आ हिया’क आबाज गुम भँ जाएत अछि । ओतेह ‘आबाजबिहिन’क आबाज’ देबामें पत्रकारिता चुकि जाएत छैक । एहेन अवस्थामें ‘म्याकें बोली’ मे कएल गेल पत्रकारिता अर्थात भाषिक पत्रकारिताकें महत्व बढि जाएत छैक ।
प्रमाणिक स्रोत पर ध्यान
पत्रकारितामें स्पोन्सरसिप दुर्भाग्यपूर्ण अछि । किनको कहला पर नहि अपने सँ खोजिकें कयल गेल पत्रकारितामे प्रभावकारिता बेसि भेटैक छहि । अखन, प्रमाणिक स्रोत आ सामग्री’क अभाव’क कारण तथ्यपरक बात सब उजागर नहि भँ पावि रहल अछि । अहू दिश सरोकारवलाकें ध्यान देमाक चाहि । तहिना, सकारात्मक पुरान परम्पराकें जीवित आ सुरक्षित रखबामें आ गलत संस्कार , व्यवहार आ थितिके वहिष्कार करबाक हैसियतमें पत्रकारिताकें होनाई अति आवश्यक अछि । किछु मातृभाषा’क छोडि अन्यमें एकर अनुभव अखनिधरि नहि भेल अछि । अई क्षेत्रमें सकारात्मकता’क साथ जाधरि पत्रकारिता आगा नहि बढत, ताधरि घुस्कुनिया ई क्षेत्र कटैतेह रहत । घुस्कुनिया त बहुत कम समय’क लेल होएत अछि । मुदा मिथिला आ मैथिली वर्षौवर्ष सँ अई अवस्था सँ गुजरबाक कारण कि अछि ? ई मननयोग्य बातके बुँझि जौ आगा बढल जाए त मैथिली भाषिक पत्रकारिता जल्दिए युवा भए सकैत अछि । परन्च अहिकें लेल मन, बचन आ कर्म सँ आगा बढबाक प्रण, प्रतिबद्धता आ अपनाकें परिस्कृत’ करबाक जरुरी अछि ।
दुरस्त संपादन
सहि संपादन’क अभाव खटकैत रहल अछि , पत्रकारितामें । कोनो भी सामग्री प्रकाशन या सार्वजनिकिरण सँ पहिने तुलनात्मक अध्ययन आ सम्बन्धित विषय’क सन्तुलन’क जाँच पडताल होमाक सेहो आवश्यतका अछि । अहि सँ पाठक वर्ग’क रुचि आ आकर्षण त बढबे करत, मान्यता आ प्रमाणिकता से हो ओतबे मिलत । पत्रकारकें भूगोल, संस्कृति आ रीतिरिवाज’क ऐतिहासिकताके जानकार सेहो होमाक । अहि सँ पत्रकारके समाचारकें विषयवस्तु उपर पकड मात्र नय, ओकराप्रति विश्वास से हो ओतबे बृद्धि होएत । ‘ऐतिहासिकता प्रमाणित कालक्रमकें ठोस आधार पर सिद्ध कएल जा सकैत अछि ’(मुखर्जी, राधाकुमुद) । तईं सुनल बात सँ बेसी ठोस बात पर जोड देबाक चाहीं । पत्रकार कोनो ऐतिहासिकता’क प्रमाणित कएनिहार सेहो भए सकैत अछि । पत्रकारितामें ई अभाव अछि । भाषिक पत्रकारितामें ई बात निर्विवाद मानल गेल अछि । ऐतिहासिकता’क गमने आ मनने बिना कयल गेल पत्रकारिता, लेखन आ विश्लेषण आग्रह÷पूर्वाग्रह सँ प्रेरित मानल जा सकैत अछि । खास ककें अगुवा सब अहि विषय पर गहन मन्थन आ चितंन करौथि ।
पत्रकारितामें साहित्य
पत्रकार एक गोटा निक साहित्यकार सेहो होमाकें चाहि । किएक त साहित्यकार आ पत्रकार दू सहोदर भाई होयत अछि । मिथिला क्षेत्रमें साहित्यिक पत्रकार’क रौदी अछि । जे लोकन्हि अछि से आत्मकेन्द्रित मात्र अछि, ‘सर्वे भवन्तु कल्याणम्’ ओ नहि थिकैह । ‘साहित्यिक पत्रकारिता मानवीय मूल्य सबकें शाश्वत प्रदान करैत ओकर ग्राहय, नियन्त्रित आ लोकमंगलकारी बनबैत अछि । साहित्य आ पत्रकारिता एकैहटा मूलके दू धारा मानल जाएत अछि । इ दुनू लोकरक्षण, लोकरंजन आ लोकशिक्षण के धर्मक निर्वाहक अछि । साहित्यिक पत्रकारिता लेखकीय चेतना, पाठकीय चेतना आ सामाजिक चेतना के विस्तार देबामे सहायक होएत अछि’ (तिवारी, अरुण) । भाषिक पत्रकारितामें लगैवला सबकें सम्बन्धित भाषा’क साहित्य, कला, संस्कृति पढबाकें चाहि । परन्च ओ भावनात्मक नहि विचारात्मक होय, गद्यात्मक नहि, पद्यात्मक होय, कल्पनात्मक नहि तार्किक होय, संवेगपूर्ण नहि, वैज्ञानिक आ सहजबृद्धि पर आधारित होय । ई विषय सबकें अभावमें लिखल साहित्य पढि मनलुभावन पत्रकारिता असंभव अछि ।
अपन–अपन क्षेत्र’क प्रभावशाली व्यक्तित्व लोकन्हि अपन अवस्था’क ऐहन बनाबी जे आबैवला पीढि अपनाकें गौरवान्वित महशुश करैथ । एकर अभावे झटपट आ बेगारीकें अवस्थामें आयल युवा सब अनेरे व्यक्ति आलोचनामें लगि जाएत अछि आ अपन पत्रकारिताकें कलुषित, संकिर्ण आ जातिवादी घेरम्मा दिश टहला दैत छथि । ई एकटा पैघ दूर्भाग्य बाहेक अउर किछु नहि, सुधार’क अपेक्षा अछि । यावत कारणें मिथिला पत्रकारितामें रौबदार उपलब्धी सब अखनों धरि शून्य देख रहल छी । अतितमें अहि क्षेत्रमें जे सब भेल अछि ओ जातिवाद, संकीर्णतावाद, मनुवाद, व्यक्तिवाद, परिवारवाद, अपनत्ववादकें चंगूलमें रहल किछु गोटाकें कारणें मटियामेट भँ गेल अछि । आब फेर सँ दम लगाकें ‘हईस्सा’ कहैत बढ पडत । ओना त अहि क्षेत्रमें अपवाद भेटैत अछि । मुदा आजूक दिन ओहि सँ काम नहि चलत । तईं आब अईकें लेल सम्बन्धित सबकें मानसिक रुप सँ तयार होमे पडत ।
स्तुतिगान वर्जित
पत्रकारितामें यशोगान वा स्तुतिगान बड बेसी बढि गेल अछि । ई निस्तेज होइते, बेंङ जका पत्रकारिता कुदैय लागत हमर विश्वास अछि । काउछ’क गति सँ आब लोक’क मोन ऊबि गेल छन्हि, आ अहि सँ आब काजो त नय चलत, गिरगिटिया प्रवृति छोडय पडत । अई विषय पर विचारक मैक्समूलकें कथन समचिन अछि । ओ कहैत छथि, ‘विचार सबके आन्तरिक कालक्रम’के तयारी सबहक जिम्मेवारी होमाक चाहि । मुदा पुरान नहि नव विचार’क सृजना होए । एकर अर्थ पुरनका सकारात्मकता युक्त विचार , संस्कार आ रीतिकें छोडि दियौन से किमार्थ नहि । ’
पत्रकारितामें अनुशासन
पत्रकारितामें अनुशासन अपरिहार्य विषय अछि । एकरा अलग ककें असल पत्रकारिता असम्भव अछि । कौटिल्य शिक्षाकें प्रथम स्थानमें अनुशासन(विनय) के रखने छथि । अहिमें सात गोटा गुण रहल बात लिखने छथि । शुश्रुषा(ज्ञान प्राप्त करबाक इच्छा), श्रवण(जीवनमें सिखल गेल सत्य पर ध्यान देनाई), ग्रहणम्(सिखलाह विषयकें समझनाई), धारणम्(समझमें आयल बातकें हृदयंगम करनाई), विज्ञानम्(सिखल गेल सत्यकें प्राप्ति हेतु उपाय आ साधान’क खोजी), उहा(निस्कर्ष निकालनाई) आ चिन्तन–मनन करनाई (मुखर्जी,राजमुकुन्द) विषयकें समटल गेल छैक । पत्रकारिता कएनिहार सबकें कौटिल्यकें अहि बात सब पर ध्यान दैति आगा बढबाक चाही । किछु वर्ष एमहर पत्रकारिताकें अपन विषयवस्तु बनाकें आगा बढल लोक सब सेहो पैघ संख्यामे बजारमें उपलब्ध अछि । मुदा ओ सब व्यवहारिक ज्ञान सँ बड पछा छथि । किएक त नेपाल’क शिक्षामें अध्ययन आ व्यवहार दुनूके समावेश नहि कयल गेल अछि । होमाक दुनू बात चाही, सैद्धान्तिक होनाई अनुचित अछि ।
अहंकारी, अशिष्ट आ असहिष्णु प्रवृति मिथिलामें हरेक क्षेत्रमें देखल गेल अछि । खास ककें मिथिला अभियानी सब अहि विषयमें सबटा सीमा पार कए देने छथि । अहि प्रवृतिकें रोकमामें से हो भाषिक पत्रकारिताके एकटा निक ‘टूल्स’ बनायल जा सकैत अछि । उपेक्षा, तिरस्कार आ विफलता सुच्चा पत्रकारिता कएनिहार सबकें बड बेसी भेटैक छैक, एकरा नजरअन्दाज करैत आगा बढैयवला मात्र ‘बाजिगर’ बनि सकैत अछि । मुदा क्षोभ आ कटुवा सँ दूर रहनाईकें एकर एकटा सर्तकें रुपमें लेमे पडत ।
चुनौति’क सामना
कोनो भी राज्य नैतिक पतन उन्मुख होनाई बहुत पैघ अभिशाप अछि । अहि सँ मुक्त भँ मुनक्ख’क जीवन पुनः नैतिक दृष्टि सँ श्रेष्ठ होय, ताहिलेल विगतमें नेपालमें जनआन्दोलन, जनविद्रोह, मधेसविद्रोह भेल रहैय । ई आन्दोलन आ विद्रोह सबके थोरबहुत संवोधन जरुर भेल छहि । परन्च मधेसीकें बलिदानी’क तुलनामे बहुत कम मात्र सफलता÷अधिकार नेपाल’क संविधानमें सुचिकृत भँ सकल अछि । प्रमुख दल सब संविधान संशोधनकें क्रमके जीवित रखबाक प्रण करैत संविधान जारी केलैथि । मुदा ‘खोला तर्यो, लौरो बिर्सियो’ नेपाली कहबी जका भँ गेल अछि, वर्तमान अवस्था । ओना संघियता आ समावेशिता मधेस जनविद्रोहके ही देन थिक । अखन एकरो एकटा शोकेसमें राखैय वला बस्तु बनाओल जा रहल अछि । बहुत राश अधिकार अखनो केन्द्रमें राखल गेल अछि । भाषिक अधिकार अखनो हाथि’क दन्त बनल अछि । एकर सुनिश्चिता’क अभावे भाषिक पत्रकारिताके भविष्य अंधकारमय अछि । आब त ‘ब्लैक होल’कें अस्तित्व सेहो प्रमाणित भँ चुकल अछि । परन्च नेपाल’क संविधानमे उल्लेख केल गेल भाषिक अधिकार अस्तित्वमें नहि आयल अछि । ओना ई अवस्था पहिनौ रहैक, तइयो किछु अग्रज आ जुझारु युवा सब एकरा एकटा चुनौतिकें रुपमें स्वीकार करैत आगा बढलाह आ आजू भाषिक पत्रकारिता’क लेल ‘मिलकें पाथर साबित भेल अछि । ओहुना भाषिक पत्रकारितामें बड पैघ चुनौति सब अछि । परन्च एकर भविष्य अखनों इजोते अछि । प्रेस काउन्सिलके वर्गिकरणमें भाषिक पत्रकारिताकें प्राथमिकतामें राखल गेल अछि । गोरखापत्रमें हरेक दिन भाषिक पृष्ठकें स्थान देल गेल अछि । एकर बाबजूद भाषिक पत्रकारिता’क स्तरियता अखनों उग्गडुब्ब करैत देखमा आ बुझमामें आबैत अछि । खास ककें मैथिली भाषा पत्रकारिता’क स्तर सन्तोषजनक नहिं अछि । अहि क्षेत्रमें लागल लोक सब हुक्कुर–हुक्कुर करैत छथि । सामग्री सब आत्मकेन्द्रित आ जातिवाद पर आधारित बेसि भेटैक छैक । सप्तरीकें राजबिराज सँ प्रकाशित एक पत्रिकाकें अवस्था जेहेन छई धनुषा’क जनकपुर सँ प्रकाशित मैथिली अखबार’क ओहने छैक । मैथिली अखबारके विश्लेषण कयला पर ई देखल गेल अछि जे समाचार सँ लकें लेख रचनाधरिमें मिथिला क्षेत्र’क इलिट क्लासकें प्राथमिकता अछि । अनुवाद सामग्री सबमें सेहो ओहे रबैया भेटल गेल अछि । शायद ‘दालिभात’ जोडबाक माध्यम नहि बनलाकें कारण ई भँ सकैत अछि से हमर ‘हाइपोथेसिस’ रहैक । परन्च ओ झुठ सावित भेल छल, अध्ययन कयलाकें बाद । जातिवादीकें गन्ध बेसी भेटल , समग्र मैथिली आ मिथिलाके पक्षमें ओ नही देखल गेल । पत्रकारिता मैथिलीकें नाम पर मुदा अपन लेख÷रचना आ सामग्री सबकें विशेष ग्राहयता देल गेल भेटल । स्थानीय सामग्री सँ बेसी पडोसक पत्रिका सबमें प्रकाशित लेख÷रचनाकें अनुवाद (ओहू मे सम्बन्धित संपादक जहि जातिकें छथि, ओहि पार छापल ओहे जाति’क सामग्री) कें प्राथमिकतामे रखल गेल भेटल । एकर संपादक आ प्रकाशक सब मैथिली भाषाकें ‘भेटेरान्स’ सब अछि । आखिर ई मानसिकता कहिया धरि रहत ?
‘स्थिर बाइट’ न्युनिकरण होय
अन्त्यमें, पत्रकारितामें ‘स्थिर बाइट’ के ठीक नहि मानल जाएत अछि । तईं मिडियाके बहुवचनताके लिए जगह बनेबाक चाही, आजुक गणतन्त्र, जनतन्त्र, लोकतन्त्रके लेल इ एकटा बुनियादी बात छैक, अंगिकार करबाक जरुरी अछि । मिडिया आ पत्रकार’क संख्यामें वृद्धि सुखद बात अछि । परन्च ओकर तुलनामें भाषिक पत्रकारिता बहुत पाछा अछि । मिडियाके बढोत्तरी के कारण राजनीति आ दल सभहक स्वरुप आ राजनीतिक संस्था सब मे परिवर्तन जरुर भेल अछि । एकरा एकटा उपलब्धिकें रुपमें ल सकैत छि । परन्च ओहि परिवर्तन’क तुलनामें भाषिक पत्रकारिता बहुत पाछा अछि । आजुक सूचना तेज आ तत्काल बनल सामग्री बनल अछि । अहि बातकें बुझि आगा बढबाक आवश्यकता अछि । विकास पत्रकारिता, सामाजिक पत्रकारिता, ग्रामिण पत्रकारिता, नागरिक पत्रकारिताके बेसी स्थान भेटैय । खास ककें भाषिक पत्रकारितामें ई विषयवस्तु सब एकटा अनिवार्य विषय बनबाक चाही । स्थलगत रिपोर्टिङ पत्रकारितामें प्राण भरि दैत छैक । एकरा अवलंवन सब गोटाकें करैटा पडतैन्हि । कोनो दिन मीडिया हरेक संसदीय क्षेत्र के बारेमें बारीकी सँ बतेनाय शुरु कैर देत त यकिन करु सांसद लौटके अपन संसदीय क्षेत्रमें नही पहूंचत । पत्रकारिताकें एक अउर पैघ चुनौति कहियौं वा समाचार’क स्रोत, ओ अछि ‘नेट नागरिक’ । समाजिक संजालमें एहन नागरिक सब अपन विचार जोडदार रुप सँ पडोसैत रहैत छथि । ओ सब अपन–अपन बिचार नेट पर दैत रहैत छथि । एकरा सामग्री बनाकें पाठक समक्ष परोसल जा सकैत अछि । ‘बाईट’ के रुपमें सेहो एकर उपयोग कए जा सकैत अछि । तहिना, पत्रकारिताके दलाली’क पोल खोलबाक लेल सेहो तयार होमे पडत । पत्रकारिताकें एकटा अनुष्ठानकें रुपमे बढाओल जाए त ई क्षेत्र सम्मानित, मर्यादित आ जन–जनके हिया सँ जुडि सकैत अछि ।(Aangan, Issue:8, 2076, Nepal Pragya Pratisthan, Kathmandu)
सन्दर्भ सामग्री :
–मिडिया जनतन्त्र और आतंकबाद, सुधिश पचौरी, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली ,२००१,पृष्ठ७८
–पत्रकारिता के सिद्धान्त, डा.रमेशचन्द्र त्रिपाठी,पत्रकारिताःसिद्धान्त और प्रयोग–डा.लक्ष्मीकान्त पाण्डेय, पृष्ठ ८०,मीडिया और हिन्दी : बदलती प्रवृत्तियाँ,वाणी प्रकाशन नई , २०१६)
–मुखर्जी, राधाकुमुद, चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल, राजकमल प्रकासन, नई दिल्ली, सन १९९०
–साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य, पृष्ठ ३०५–३०७, प्रेरणा प्रब्लिकेसन्स, सं.अरुण तिवारी )
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