मैथिली काव्य साहित्यमे महाकवि विद्यापति आ अन्य काव्यकारक रचना पर हमर धारणा
दिनेश यादव
किछु विद्वानक मत छइन जे महाकवि विद्यापति १४म् शताब्दीके छलाह (राप्रउ पोखरेल,३० असार २०७५, अन्नपूर्ण पोस्ट) । हुनकासँ पहिने जतेक साहित्य लिखाइत छल, सबटा संस्कृतमे । मुदा विद्यापति जनभाषामे काव्य–रचना करबाक पैघ साहस केलैथ । कहल जाइत अइछ जे ओई समयमे हुनका विरोध मात्र नई बहिष्कार सेहो कएने छलाह । तइयो ओ अबहठ (मैथिलीके अपभ्रंश) भाषामे १५ गोट ग्रन्थकृति लिखलैथ । ओ सात सौसँ बेसी पदावली (गीति पद्य) मैथिली भाषामे रचना केलैथ । हुनक सम्पूर्ण पदावलिके शृंगार, भक्ति(भगवान शिव, गंगा, राधाकृष्णके चित्रण) आ व्यवहार पद(विवाह, द्विरागमन, छठिहार, मुन्डन) मे बाटल गेल अइछ ।
विद्यापति पर समाजशास्त्रीय लेखाजोखा नई भेल अईछ । मात्र स्तुतिगानमे केन्द्रित भए हुनका बारेमे लिखल गेल छई ।
आधुनिक युगमे विद्यापतिके वस्तुवादी दृष्टिसँ सेहो गमबाक, देखबाक, सुधि लेबाक आ लिखबाक आवश्यक छै । हुनका बुझबाक लेल आ नव पीढिसभके पढलेल आतुर आ उत्प्रेरित बनेबाक लेल आब शास्त्रिय लेखन मात्र नई आधुनिक लेखनशैलीके औजारसबके उपयोगमे सेहो कर पडत । ओ औजार सब विद्यापति पर लिखल सामग्री सबमे सजीवता प्रदान करैत मैथिली भाषाक चमत्कायर सेहो दर्शनीय बनत । आधुनिक संदर्भमे वैज्ञानिक माक्र्सवादी दृष्टिकोण सेहो एकगोट औजार भ सकैत अइछ ।
कल्पना, मिथ, किवदन्ती आदि इतिहासक अंश भेल, साहित्यमे एकर प्रवेश न्यून होबाक चाहिं । कियैक त इतिहासक घटना सभहक अध्ययन आ पात्र आ परिवेशक मनोरम चित्रण एक बात थिक आ वैज्ञानिक इतिहास दृष्टिसँ निष्कर्ष बहार क समाजकें चेतना बढाब दोसर बात थिक । विद्यापति पर लिखल साहित्य सब देखल जाए त एकैहटा ढर्रा पर चलैत आइब रहल अइछ । हुनक जन्म तिथि , बासस्थान, जाति, पहिरन, संस्कार पर वर्षौसं विवाद रहलैए, आ एहिमे लेखक लोकैन समय वर्वाद कए रहल छैथ, हरेक पोथीमे अई पर अनाहक पुनर्रावृति भ रहल छै । हम कहब–अई पर मतैक्यता नई भ सकैत अईछ त एकरा इतिहासक विषय पर छोइड देल जाए, विद्यापतिके विशुद्ध साहित्यिक विषय बनाओल जाए । एकर अर्थ हुनक ऐतिहासिक पक्षके वहिष्कार कएल जाए से किमार्थ नए, मात्र साहित्यमे अई पक्षके चर्च कम होए । अईसँ कि होएत जे हुनकाबारेमे नव दृष्टिकोण सब पाठकके पढबाक अवसैर भेटतैन ।
विद्यापतिके कुनू ‘बाद’ के स्कूल बनेनाई अनुचित अई । खास ककें विद्यापति स्मृति पर्व वा आन समारोहमे जई तरहे एकैह समुदायके देखल जाइत अइछ, ओ महाकवि विद्यापतिके योगदानक चर्चासंं बेसी अमुक ‘बाद’ के स्कूलक पृष्ठपोषण करैत चाँदी कटाईके माध्ययम बना रहल छैथ । जाहि स्कूलमे महाकवि विद्यापतिके ‘जातिय’ रुप दए रहल छैथ, अईसं जन–जनके इन्ट्रेस्ट घटबे करत ने ?
विद्यापतिके वैष्णव आ शैव भक्तिके सेतुक रुपमे स्वीकार कएल गेल छै । मिथिलाक लोकके ‘देसिल बयना सब जन मिठ्ठा’ के सूत्र दके लोकभाषाके जनचेतनाके जीवित रखबाक पैघ प्रयास केलैथ । मुदा अखन जोडबाक गप्प कम तोडबाक काज बेसी भए रहल अइछ ।
मैथिलीमे सबसँ बेसी पढल आ लिखल आ उच्चारण कएल गेल शब्द थिक विद्यापति । ई पैघ खुशीक गप्प थिक । मुदा काव्यसाहित्यमे हुनकासँ पहिने डाक, अमीर खुसरोसहितके लोक सेहो आएल छल । हुनका सबहक रचना अखनो जन–जनके मुखारविन्दूसँ सुनुवामे अबैत अइछ । परन्च लिखित साहित्यमे कम कियैक ? कि ओसभ अब्राह्मण छला तें ? तहिना मिथिलामे तुलसी दासक चर्चा जतेह भेटलैए ओतेह सूर, कबीर, मीराके कियैक नई ? ई एकगोट यक्ष प्रश्न थिक । हिन्का लोकइनके मैथिली साहित्यमे चर्च कके विद्यापतिक गरिमा घैट जाएत से नई छैक, आओर बढत ।
हमरा बिचारसँ महाकवि विद्यापतिके आन समुदायसं जोडबाक लेल अन्य काव्य वा काव्यकारके ओतबे स्थान भेटबाक चाहि । खास ककें मैथिली बोलीसं मिलैवाला खुसरो काव्य, रासो वा रास काब्य तथा डाक बचन –
१) खुसरोके पाति देखल जाए–
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस ।
चल खुसरो घर अपन सांझ भई चहुँ देस ।।
२) डाक बचन –
खटहट खटिय, बतकट बोहु ई दुःख बिहि ककरो नहि देहु ।
साँझ पराती, भोर बसन्त, तकरा दुखक ने कहियो अन्त । (स्रोत :डाक दृष्टि)
३) रासो साहित्यमे युद्धवर्णन –
बज्जिय घोर निसांन रान चौहान चहूँ दिसि ।
सकल सूर सामन्त समर बल जंत्र मंत्र तिसि ।
उट्ठि राज प्रथिराज, बाग लग्ग मनहु वीर नर ।
कढत तेग मन बेग लगत मनहु बीजु झट्ट थट्ट ।
(नोट:अई पाँतिके डिंगल भाषा कहल गेल छै, मुदा मैथिली शैली छै)
(स्रोत:रासो काव्य एवं लौकिक साहित्य)
४) महाकवि विद्यापतिक रचना–
देसिल बअना सब जन मिट्ठा
ते तैंसन जपओं अवहट्ठा
अन्त्यमे, विद्यापतिके अवहट्ठमे रचना करबाक कारण कि रहैन ? वस्तुत ः राज–दरबारके अभिजात्यके बीच अपभ्रंश भाषा प्रचलन रहै । विद्यापति राजाश्रयमे रचना करैत छला । अतः हुनका विवशतावस दरबारक भाषामे सेहो रचना करै पडलैन । ‘कीर्तिलता’ आ ‘कीर्तिपताका’ हुनक एहा विवशताक प्रतिफल थिक । विद्यापतिक भाषामे लोक–अनुभूति आ लोक–अनुभवक आधार एतेक ने गहिरगर रहैत छल जे ओइसं हुनक अवहट्ड रचना सब सेहो प्रभावित भेल । ओइ अपभ्रंशके विशेषता– जे ओई मे देशभाषाक किछु बेसी प्रभाव रहैक । भाषा साहित्य आ काब्यके उद्देश्य जन–जनके जोबाक होमाक चाहिं । अई दिशि सभगोटेके ध्यान केन्द्रित होए– एहा महाकवि विद्यापतिप्रतिके हमरासभक पैघ श्रद्धा आ सम्मान होएत ।
(अमेरिकामे एन्टाद्वारा २० डिसेम्बर २०२० मे आयोजित ‘अमेरिकामे विद्यापति समारोह –२०२०’ मे राखल गेल हमर धारणा।
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उत्तम लेख दिनेश बाबू ! विद्यापति के बारे में दोसर भाषा सब में सेहो रचना सब प्रकाशित करे के जरुरत छै अहि से गैर मैथिलभाषी सेहो हुनक बारे में जानकारी प्राप्त क सकता |
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