पण्डित जी’क तोता (मैथिली व्यंग कविता)
 |
दिनेश यादव |
एकगोट मनुक्खके देखते
पण्डित जी’क तोता
अनाहक कहैछ– ‘धूर मुर्ख !’,
ई सुनिते मनुक्ख आबाक छै,
प्रतिउत्तरक अवस्था गौण छै,
मुदा मनेमन बोली अपन गुनगुनाई छै,
कियैक त ओ मनुक्ख छै ।१।
पिजडामे बन्द तोता
मनुक्खके देखते
फेर कहैछ– ‘धूर अज्ञानी !’
ई सुनिते मनुक्ख स्तब्ध छै,
अनाहक मथापिच्चीमे डुइब जाई छै,
तईयो अपनाके सम्हारैत बाट चलैत छै,
कियैक त ओ मनुक्ख छै ।२।
दोसरके दानापानी पर जीवित तोता
मनुक्खके देखते
चिच्चियाबैत कहैछ– ‘धूर बौका !’
ई सुनिते मनुक्खक मियाद गरम छै,
मुदा कहूँना–कहूँनाके शान्त छै,
अपन मिसनमे दत्तचित्त छै,
कियैत त ओ मनुक्ख छै ।३।
आनक बोली बोलैवला तोता,
मनुक्खके देखते
हिंहिंआएत कहैछ– ‘धूर नामर्द !’
ई सुनिते मनुक्ख निराश छै ,
मुठीभरि लोकक कुकृत्यसं चिन्तित छै,
मुदा बखारीभरि लोकक मुंह खुजत से विश्वासमे छै,
कियैत त ओ मनुक्ख छै ।४।
बहसल जाइत छल तोता ,
तब, सिकायत भेल पण्डित जी’सँ,
रामधुलाईमे तोता छै,आब बनल ऊ मौन छै,
मुदा मनुक्ख ओकरा घुरि–घुरि देखैत छै,
तब हंसैत तोता कहैछ–
‘बौआ, आब बुझनामे आइब गेल हेतौ ,
हम तोता तों मनुक्ख छें’ ।५।
पण्डित जी’क तोता,
साँच्चे, मलिकबासँ कम कहाँ छै,
उलहन पर सेहो महान छै,
‘उल्टे चोर कोतबाल’के डाँटैत छै,
माईर खेलाके बादो अपनाके पैघ मानै छ,
कियैक त ऊ पण्डित जी’क तोता छै,
तें ऊ ओकरे भाषा बोलै छै ।६।
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