उत्तर खेती जो हर गहा । मध्यम खेती जो संग रहा ।।जो पूछेसि हरवाहा कहाँ ।। बीज बूडिगे तिनके तहाँ ।।खेत बेपनिया जोतो तब । ऊपर कुँआ खोदाओ जब ।।

हम एक ऐसे पुरातन देश का हिस्सा हैं जिसमें मूल्य एवं आदर्श प्राचीनकाल से जीवन के अनिवार्य अवयव हैं, और जिन्हें केवल दोबारा कहे जाने और पुनः सुशोभित किए जाने की आवश्यककता है। इस सन्दर्भ में रीतिकालीन नीति कवियों में घाघ-भड्डरी के काव्य की उपादेयता असंदिग्ध है। घाघ-भड्डरी का काव्य भारतीय कृषकों के लिए कितना उपयोगी है, इसका अंदाज़ा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के इस कथन से लगाया जा सकता है – “हिन्दी भाषा जनता के सलाहकार प्रधानतः तीन ही रहे हैं - तुलसीदास, गिरिधर कविराय और घाघ । तुलसी धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में, गिरिधर कविराय व्यवहार और नीति के क्षेत्र में, घाघ खेती-बाड़ी के सम्बन्ध में ।” घाघ-भड्डरी की कहावतें कृषक समाज में अत्यन्त लोकप्रिय रही हैं। प्रसिद्ध कवि रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार “घाघ-भड्डरी की नीति सम्बन्धी कहावतें भी बड़ी मजेदार हैं। छोटे-छोटे मन्त्रों में बड़े-बड़े अनुभवों के गूढ तत्त्व भर दिए हैं। उनमें किसानों के जीवन के अनेक सुखों और दुःखों के जीते जागते चित्र हैं।"
घाघ-भड्डरी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व
घाघ-भड्डरी रीतिकालीन नीतिकाव्य के उल्लेखनीय कवि हैं। उनके नीतिकाव्य में मानवीय सदाचरण एवं नैतिक जीवन-मूल्यों की कई विशेषताएँ एक साथ उपलब्ध हैं । विचार में बहुत शक्ति होती है । जब अभिव्यक्ति को मानव-कल्याण पर केन्द्रित किया जाता है तो विचार अधिक दुर्जेय हो जाते हैं। सही से व्यक्त तथा साझा किये गए विचार मानवीय समस्याओं को उचित तरीके से उठाते हैं और अनुपालन हेतु सदैव अभिप्रेरित करते हैं । इस दृष्टि से घाघ-भड्डरी के विचार और उनका काव्य जनोपयोगी और प्रासंगिक सिद्ध होता है।
व्यक्तित्व
घाघ-भड्डरी के जीवनवृत्त के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वान घाघ-भड्डरी को अलग-अलग नहीं मानते हैं। जबकि पण्डित रामनरेश त्रिपाठी घाघ को कन्नौज का निवासी मानते हैं और कुछ विद्वानों ने भड्डरी को काशी के आस-पास का तो अन्य विद्वानों ने मारवाड़ का निवासी भी बताया है । घाघ का जन्मकाल वि.सं. 1753 माना गया है। वे कब तक जीवित रहे, इस बारे में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है। रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार घाघ पहले-पहल हुमायूँ के राजकाल में गंगा पार के रहने वाले थे तथा उसके बाद वे हुमायूँ के दरबार में गए । तदोपरान्त अकबर के साथ ही रहने लगे। एक बार अकबर ने उन पर बहुत खुश होकर कहा कि - "अपने नाम का कोई गाँव बसाओ।" इस प्रकार घाघ ने वर्तमान 'चौधरी सराय' नामक गाँव बसाया और उसका नाम 'अकबराबाद सराय घाघ' रखा। अब भी सरकारी कागजातों में उस गाँव का नाम सराय घाघ' ही लिखा जाता है। ‘सराय घाघ' कन्नौज शहर से एक मील दक्खिन और कन्नौज स्टेशन से तीन फ़ल्ग पश्चिम में है। घाघ जाति के दुबे ब्राह्मण थे। मार्कण्डेय दुबे और धीरधर दुबे घाघ के दो पुत्र माने जाते हैं। दूसरी ओर भड्डरी के बारे में प्रामाणिक तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। एक मान्यता के अनुसार घाघ और भड्डरी वराहमिहिर के पुत्र स्वीकार किए जाते हैं। हालाँकि, भाषा को देखते हुए घाघ या भड्डरी, दोनों में से किसी को भी वराहमिहिर का पुत्र नहीं माना जा सकता । सत्य चाहे जो हो, लेकिन इतना अवश्य है कि घाघ और भड्डरी का व्यक्तित्व आदर्श एवं नैतिक मानवीय मूल्यों से अभिप्रेरित अवश्य रहा होगा । भड्डरी के बारे में रामनरेश त्रिपाठी लिखते हैं कि “वे काशी के आस-पास के रहने वाले थे या मारवाड़ के, यह एक विचारणीय प्रश्न है, क्योंकि भड्डरी की भाषा में मारवाड़ी शब्दों के प्रयोग बहुत मिलते हैं तथा उनकी रचनाओं में युक्तप्रान्त और बिहार की ठेठ बोली के शब्द भी मिलते हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि या तो भड्डरी और भड्डली नाम के दो व्यक्ति हुए होंगे या एक ही भड्डरी युक्तप्रान्त से मारवाड़ में जा बसे होंगे और उन्होंने यहाँ और वहाँ दोनों प्रान्तों की बोलियों में अपने छन्दों का निर्माण किए होंगे।"
कृतित्व
घाघ-भड्डरी की रचनाओं के सन्दर्भ में डॉ. भोलानाथ तिवारी मत है – “घाघ की कोई लिखी पुस्तक नहीं मिलती। घाघ के नाम पर जनता में प्रचलित शकुन, खेती तथा आचार-नीति सम्बन्धी बड़ी ही सटीक तथा अभूतपूर्व बातें छन्दबद्ध सरल भाषा और सीधी शैली में कही गई हैं।” उल्लेखनीय है कि पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने जनप्रचलित घाघ-भड्डरी की कहावतों का संकलन व सम्पादन किया है। वे लिखते हैं – “घाघ की जो कहावतें इस पुस्तक में दी गई हैं, वे सभी घाघ की बनायी हुई हैं, इस बात का कोई प्रमाण नहीं है । घाघ ने कोई पुस्तक लिखी थी या वे जुबानी कहावतें कहा करते थे, इसका भी कुछ पता नहीं है। यह भी सम्भव है कि कुछ कहावतें घाघ ने कही हो और कुछ उसके बाद के लोगों ने बनाकर उनके नाम से प्रचलित कर दी हों ।” भड्डरी की रचनाओं के बारे में पण्डित रामनरेश त्रिपाठी लिखते हैं – “उनकी एक छोटी-सी पुस्तिका छपी हुई मिलती है जिसका नाम 'शकुन विचार' है। लेकिन वह इतनी अशुद्ध है कि कितने ही स्थानों पर उसको समझना कठिन है। वैसे राजपूताने में भड्डली की एक पुस्तक भड्डली पुराण' के नाम से प्रसिद्ध है।"
घाघ-भड्डरी का युगबोध एवं मानव-दर्शन
घाघ-भड्डरी की प्रसिद्धि कृषि, व्यवहार और नीति सम्बन्धी कहावतों की वजह से है। उनकी कहावतें आमजन में खासी प्रचलित एवं लोकप्रिय रही हैं। मानवीय जीवन की व्यावहारिक एवं कृषि जगत् की नीतियों को अत्यन्त सरल एवं स्पष्ट शब्दों में कहना घाघ-भड्डरी की कहावतों का वैशिष्ट्य है । उनकी कहावतों में ज्ञान, सज्जन, धन, बुद्धि, समाज, नारी, पुत्र, कृषि, ऋतु आदि सभी विषयों पर ज्ञानोक्तियाँ उद्धृत की गई हैं । बिहारीलाल, वृन्द, दीनदयाल गिरि आदि तत्युगीन नीतिकारों की भाँति घाघ-भड्डरी नीतिकाव्योचित अलंकारों द्वारा अपने छन्दों में प्रभविष्णुता लाने का प्रयास नहीं करते हैं, तथापि वे उनका काव्य-सौन्दर्य न्यून नहीं आंका जा सकता । रीतिकालीन काव्य-परम्परा अपनी प्रकृति में ऐहिक ओर लौकिक है। घाघ-भड्डरी का काव्य भी युगीन चेतना एवं मानव जीवन-दर्शन की व्यापकता में जीवन की यथार्थ एवं कटु अनुभूतियों को समेटने का प्रयास करता है।
घाघ-भड्डरी का नीतिकाव्य : एक सिंहावलोकन
घाघ-भड्डरी की कहावतों में दृश्यमान और विद्यमान संसार की ज़रूरतों को आधार बनाया गया है। लोक में नीति-शिक्षा की आवश्यकता सबसे अधिक होती है। घाघ-भड्डरी की कहावतें बिहार, मध्यप्रदेश और युक्तप्रान्त से लेकर सारे राजपूताना और पंजाब तक जन-जन का कण्ठहार बनी हुई हैं। उनकी कहावतों में मानवजीवन के वैयक्तिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक (आदर्श राज्य एवं राजा), कृषि एवं पर्यावरण व सांस्कृतिक मूल्यों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है।
वैयक्तिक नीति
वैयक्तिक नीति के आलोक में कवि घाघ-भड्डरी ने विशेष तौर पर शारीरिक स्वास्थ्य के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। घाघ के अनुसार अपनी भूख से कम खाने वाला व्यक्ति सदैव नीरोगी और सुखी रहता है। वे शरीर को स्वस्थ और नीरोग रखने के लिए सलाह देते हैं–
रहै नीरोगी जो कम खाय । बिगरै काम न जो गम खाय ।।
यदि व्यक्ति सुबह चारपायी से उठकर तुरन्त पानी पी लेता है तो वह कभी बीमार नहीं होता है। इस परिप्रेक्ष्य में कवि घाघ अपने अनुभव से नीतिसम्मत सीख देते हैं–
प्रात काल खटिया ते उठि कै पिअइ तुरंतै पानी।
कबहूँ घर में बैद न अइहैं बात घाघ कै जानी ॥
अगर कोई व्यक्ति खाना खाने के उपरान्त मूत्र-त्याग का अभ्यास बना ले और तदुपरान्त कुछ देर के लिए बायीं करवट लेट कर विश्राम कर ले तो पूरे गाँव में कभी वैद्य की आवश्यकता नहीं रहती है। इस सन्दर्भ में घाघभड्डरी कहते हैं–
खाई कै मूतै सूतै बाउं।
काहे क बैद बसावै गाउं॥
जो व्यक्ति कभी-कभार डण्ड-बैठ करता है, ताल में स्नान करता है, ओस में सोता है, उसे देव नहीं मारता, अपितु वह स्वयं ही काल का ग्रास बन जाता है। इस प्रकार कवि घाघ-भड्डरी ताल में नहाने और ओस में सोने वालों को चेतावनी देते हैं–
अन्तरे खोतरे डंडे करे, तालु नहाय ओस मा परै, दैव न मारै अपुवइ मरै ॥
खान-पान के आलोक में कवि घाघ का मानना है कि चैत्र में गुड़, बैसाख में तेल, जेठ में राह, आषाढ़ में बेल, सावन में साग, भादों में दही, क्वार व अश्विन में करेला, कार्तिक में मट्ठा, अगहन व मार्गशीर्ष में जीरा, पौष में धनिया, माघ में मिश्री और फाल्गुन में चने का सेवन नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा है–
चैत गुड़ वैसाखे तेल। जेठ क पंथ असाढ़ क बेल ।।
सावन साग न भादों दही। क्वार करेला कातिक मही॥
अगहन जीरा पूसे घना। माघे मिश्री फागुन चना ॥
शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत करते हुए घाघ कहते हैं कि जो व्यक्ति माघ मास बिना ही घी और खिचड़ी खाता है तथा बिना मौसम के पौला पहनता है, वह कौओ के समान होता है। व्यक्ति को ऐसी प्रवृत्ति से बचना चाहिए–
बिना माघ घी खीचड़ खाय । बिन गौने ससुरारी जाय॥
बिना ऋतु के पहिरै पउवा। घाघ कहै ई तीनौ कौआ॥ व्यक्ति को मृदुभाषी होना चाहिए । घाघ-भड्डरी स्वभाव में मृदुलता और विनम्रता को आवश्यक मानते हैं। कर्कशास्त्री को सबसे बड़ी विपत्ति मानते हुए कवि घाघ कहते हैं–
तिरिया कलही करकस होइ । नियरा बसल दुहट सब कोइ ।
समय सबसे मूल्यवान् है । व्यक्ति को अपना समय व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए । समय की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए घाघ भली-भाँति यह स्वीकार करते हैं कि जो सबसे पहले खेत बोता है तथा जो पहले वार करता है, उन्हें कभी पराजय का भय नहीं होता -
असगर खेती असगर मार ।
कहैं घाघ ते कबहुँ न हार ।।
आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है । व्यक्ति को आलस्य से सावधान रहना चाहिए । कवि घाघ के अनुसार आलस्य और नींद किसान का, खाँसी चोर का, कीचड़ वाली आँखें वेश्या का और दासी साधु का नाश करती है। उन्होंने कहा है–
आलस नींद किसानै नासै, चोरै नासै खांसी।
अंखियां लीबर बेसवै नासै बाबै नासै दासी॥
घाघ-भड्डरी की दृष्टि में ओछापन सर्वथा त्याज्य है। जो व्यक्ति ओछे लोगों के साथ बैठता है, ओछे काम करता है, आठों पहर (दिन-रात) ओछी बातें करता है, ऐसे निकम्मे का नाम भूलकर भी नहीं लेना चाहिए। घाघ कवि सचेत करते हैं–
ओछे बैठक ओछे काम।
ओछे बातें आठों जाम ।।
घाघ बताये तीनि निकाम ।
भूलि न लीजौ इनको नाम ।।
सामाजिक नीति
घाघ-भड्डरी ने समाज के विभिन्न घटकों और उनके अपेक्षित गुणों की ओर भरपूर संकेत किया है। कवि घाघ के अनुसार ठाकुर यदि तेजहीन हो, वैद्य का लड़का रोग न पहचानता हो, बनिया यदि शाह खर्च हो, पण्डित चुप-चुप हो यानी अल्पभाषी हो तथा वैश्या मैली हो, तो इन पाँचों का घर नष्ट हो जाता है–
बनिय क सखरच ठकुर क हीन ।
बइद क पूत व्याधिन चीन ।।
पण्डित चुपचुप बेसवा मइल।
कहैं घाघ पांचो घर गइल ।।
नारी जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति ही नहीं, अपितु उनकी स्थापना का भी महत्त्वपूर्ण जरिया है। इस आलोक में घाघ-भड्डरी का मानना है कि स्त्री को गृहस्थी के काम-काज में निपुण होना चाहिए । घाघ की दृष्टि में जिस पुरुष को ऐसी स्त्री मिल जाए तो मानो कि उसे धरती पर बैकुण्ठ मिल गया है–
भुइयाँ खेड़े हर है चार। घर पर गिहथिन गउ दुधार ।।
अरहर की दाल जड़हन का भात । गागल निबुआ औ बिउ तात ॥
खांड दही जौ घर में होय। बांकै नैन परोसै जोय ॥
कहैं घाघ तब सबही झूठा । उहां छोड़ि इहवै बैकुंठा ।।
कवि घाघ ने विचारवती नारी की महत्ता स्वीकार की है। नारी के स्वतन्त्र चिन्तन की नीतिपरक सीख दी है। वे कहते हैं–
निहपछ राजा मन को हाथ ।
साधु परोसी नीमन साथ।
हुक्मी पूत धिया सतवार।
तिरिया भाई रखे विचार ॥
कहैं घाघ हम कहत बिचार।
बड़े भाग से दे करतार ।।
स्त्री के बिना पुरुष अधूरा है । उसकी गृहस्थी की गाडी स्त्री से ही चलती है । इस परिप्रेक्ष्य में घाघकवि ने कहा है–
बिन बैलन खेती करैं बिन भयन के रार ।
बिन मेहरारु घर करे चौदह साख लवार ।।
लेकिन, सामाजिक नीति एवं लोक व्यवहार के आलोक में घाघ–भड्डरी यह भी स्वीकार करते हैं कि जिस घर अथवा परिवार में मारने वाला बैल और चटकीली–भट्कीली औरत रहती हो, उसमें सदैव उलाहने आते रहते है । इसलिए ऐसी स्थिति के प्रति सदैव सचेत रहने की सीख कवि घाघ ने दी है–
बैल मरकाना चमकुल जोय । वा घर ओरहन नित उठि होय ।।
अर्थ नीति
प्रत्येक व्यक्ति अपनी–अपनी स्वार्थ–सिद्धि में लीन है । दुःख में कोई किसी का साथ नहीं है । आज सब लोग अन्न और वस्त्र के लिउ झगड रहे हैं , ऐसे में इससे बडा और कोई संकट नहीं हो सकता है । इस आलोक में कवि घाघ अर्थ यानी धन की महत्ता स्वीकार करते हुए कहते हैं–
आपन–आपन सब कोई होई । दुःख मां नाहिं संघाति कोई ।।
अन बहतर खातिर झगडंत । कहे घाघ ई विपत्ति क अन्त ।।
घार–भड्डरी की दृष्टि में धनवान् होना अपार सुख है । इस सन्दर्भ में कवि घाघ कहते हैं कि स्त्री वाला, वंश वाला, समझदार भाई वाला, अच्छे वाली सतवंती नारी वाला तथा धन और पुत्र से युक्त और विचारयुक्त मन वाला होना ही परम सुख है–
जोइगर बसंगर बुझगर भाय । तिरिया सतवंति नीक सुभाय ।।
धन पुत हो मन होइ बिचार । कहै घाघ ई सुक्ख अपार ।।
अपने अर्थ विषयक चिन्तन में कवि घाघ–भड्डरी महत्वपूर्ण सीख देते हुए कहते है कि उधार लेने और उधार लेकर ऋण देने वाले का मुँह काला होता है । कवि घाघ के अनुसार स्वयं उधार लेकर कर्ज देने वाले का, छप्पर के घर में ताला लगाने वाले का, साले के साथ बहन को भेजने वाले का मुँह काला होता है । इस प्रकार ऋण लेकर ऋण देने की प्रवृत्ति मूर्खतापूर्ण है । वे कहते हैं–
उधार काढि व्यौहार चलावै, छप्पर डारै तारो ।
सारे के संग बहिनी पठवै, तीनउ का मुँह कारो ।।
पराये हाथ में व्यापार देने वाला, सन्देशा देकर खेती करने वाला, बिना जाँच–पडताल बेटी विवाह करने वाला तथा दूसरे के द्वार पर धरोहर गाड्ने वाला, ये चारों तो छाती पीटकर पछताते हैं । इसलिएर व्यापार को कभी भी दूसरे के भरोसे न करने की चेतावनी देते हुए घाघ कवि कहते र्है–
परहथ बनिज संदेसे खेती । बिन घर देखे ब्याहै बेटी ।।
द्वार पराये गाडै थाती । ये चारों मिलि पीटैं छाती ।।
धनाभाव जीवन का सबसे बडा संकट हैं । इससे बडकर कोई और दूसरी विपत्ति नही. हो सकता है । इस आलोक में कवि घाघ सीख प्रदान करते हैं–
एक तो बसो सडक पर गाँव । दूजे बढे बडेन में गाँव ।।
तीजे पर दरबि से हीन ।। घग्घा हमको बिपता तनि ।।
भारतीय आर्थिक चिन्तन परम्परा में मनीषियों ने आवश्यकता से अधिक धन–स.चयन की प्रवृत्ति को विनाशकारी माना है । इसलिए घाघ–भड्डरी धन–संचय के फेर में न पडने और पाप से धन अर्जिन न करने की चेतावनी देते हैं । जिस प्रकार चींटी अन्न का संचय करती है लेकिन उसे तीतर खा जाता है, ठीक उसी प्रकार पापी का धन प्रत्यक्ष एवं परोक्ष ढंग से दूसरे के पास ही चला जाता है, उसके पास नहीं टिकता –
कीडी संचै तीतर खाय । पापी का धन पर ले जाय ।।
घाघ–भड्डरी नीच व्यक्ति से लेन–देन करना उचित नहीं मानते हैं । ऐसे व्यक्ति को निकम्मा मानते हुए घाघ ने कहा हैं–
नीचन से ब्यौैहार बिसाहा, हंसि के मांगत दम्मा ।
आलस नींद निगोडी घेरे, घग्घा तीति निकम्मा ।।
कृषि व वर्षा ऋतु सम्बन्धी नीति
भारत एक कृषिप्रधान देश है । भारतीय परिवेश में कृषि एवं वर्षा ऋतु सम्बन्धी घाघ–भड्डरी की कहावतें बेहद उपयोगी हैं । घाघ–भड्डरी की कहावतें मे भारतीय कृषि दर्शन सहज ही अनुभूत है । कवि घाघ कहते हैं कि जो स्वयं अपने हाथ से हल चलता है उसकी खेती उत्तम, जो हलवाहे के साथ रहता है उसकी मध्यम, और जिसने पूछा कि हलवाहा कहाँ है, उसका तो बीज बोना ही बेकार है–
उत्तर खेती जो हर गहा । मध्यम खेती जो संग रहा ।।
जो पूछेसि हरवाहा कहाँ ।। बीज बूडिगे तिनके तहाँ ।।
खेत बेपनिया जोतो तब । ऊपर कुँआ खोदाओ जब ।।
खेती अधिक करने से दूसरों को लाभ पहुँचता है तथा कम करने से अपने को । इस सन्दर्भ में घाघ कहते है–
बहुत करे सो और को । थोड करै सो आप को ।।
इसलिए जो अधिक परिश्रमपूर्वक थोडी खेती करता है, उस किसान को कभी किसी चीज की कमी नहीं रहती । कवि घाघ कहते हैं–
खेती जो थोडी करे, मिहनत करे सिवाय ।
राम चहें वही मनुष को टोटा कभी न आय ।।
असाढ मास में जो किसान मेहमानी खाता–फिरता है, उसकी खेती कमजोर होती है । इस सन्दर्भ में घाघ कहते हैं–
असाढ मास जो गंवही कीन । ताकी खेती होवै हीन ।।
कवि घाघ के अनुसार गेहूँ कई बाँह करने से , धान बिदाहने से और ईख गोडने से अधिक पैदा होती है–
गेहूँ बाहा धान गाहा । उख गोडाई से है आहा ।।
जो किसान खेत में खाद नहीं डालता, उसके घर में दरिद्र घुसा रहता हैं । घाघ कवि कहते हैं–
खेते पांसा जो न किसाना । उसके घरे दरिद्र समाना ।।
नीतिकवि घाघ की प्रबल धारणा है कि खेत को जितना ही गहरा जोता जाता है, बीज पड्ने पर वह उतना ही अच्छा फल देता है–
जेतना गहिरा जोतै खेत । बीज परे फल अच्छा देत ।।
गोबर, पाखाना और नीम की खली डालने से खेती में दाना पैदा होता है । कवि घाघ कहते हैं–
गोबर मैला पानी सडै । तब खेती में दाना पडै ।।
भारतीय कृषि प्रणाली में गोबर की महत्ता स्थापित करते हुए घाघ कवि कहते हैं कि जिस किसान के खेत में गोबर नहीं पडा, उसे कमजोर समझना चाहिए–
जेकरे खेत पडा नहिं गोबर । वहि किसान को जान्यो दूबर ।।
ऋतु वर्णन के आलोक में घाघ–भड्डरी की कहावतें प्रायः वर्षा–विषयक हैंं । कवि घाघ के अनुसार यदि आकाश का रंग लाल हो तो यह अधिक वर्षा होने का संकेत है–
आभा राता । मेह माता ।।
यदि जेठ मास के उतरते ह मेढक टर्राने लगे तो समझना चाहिए कि बहुत अधिक वर्षा होगी । घाघ कहते हैं–
उतरे जेड जो बोले दादर । कहै भड्डरी बरसै बादर ।।
यदि प्रातःकाल मेघ भागे जा रह हों और शाम को ठंडी हवा चले तो समझना चाहिए कि अकाल पडेगा यानी वर्षा नहीं होगी । कवि भड्डरी कहते हैं–
परभाते मेह डम्बरा, सांजे सीला बाव ।
डंक कहै हे भड्डली, काला तणा सुभाव ।।
लेकिन यदि प्रातः काल इन्द्रधनुष हो ओर संध्या को सूर्य की किरणें लाल दिखाई पडें तो समझना चाहिए कि नदियों में बाढ आएगी यानी खूब वर्षा होगी । भड्डरी कहते हैं –
उगन्तेरो माछलो, अर्थव तेर मोग ।
डंक कहै हे भड्डली, नहिंयां चढसी गोग ।।
कवि भड्डरी होली के दिन प्रभावित होने वाली हवा के लक्षणों पर विचार करते हुए कहते हैं कि उससे शुभ–अशुभ फलों का सार संकेतित होता है । उनके अनुसार यदि पश्चिम की हवा बहे तो बहुत अच्छा है क्योंकि उससे पैदावार अच्छी होगी और वृष्टि होगी । पूरब की हवा बहती है तो कुछ वृष्टि होग और सूखा पडेगा । दक्षिण की हवा बहती तो प्राणियों का वध और नाश होगा । कृषि मेंं सनई और घास की पैदावर अधिक होगी । उत्तर की हवा बहती हो तो निश्चयतः पृथ्वी पर पानी पडेगा । लेकिन यदि चारों ओर का झकोरा चलता हो तो दुःख पडेगा और जीवों को भय होगा–
होली झर को करो बिचारा । सुभ अरु असुभ कहा फल सार ।।
पच्छिम बायु बहै अति सुन्दर । समयौ निपजै सजल बसुन्धर ।।
पूरब दिशि की बहै जो बाई । कतु भीजै कछु कोरो जाई ।।
दक्खिन बाय बहे बध नास । समया निपजे सनई घाघ ।।
उत्तर बाय बहे दडबडिया । पिरथी अचूक पानी पडिया ।।
जोर झकोरै चारो बाय । दुखया परघा जीव डराय।।
जोर झलो आकाशै जाय । तौ पृथ्वी संग्रा कराय ।।
राज्य नीति
घाघ–भड्डरी के अनुसार राजा के निकटस्थ सलाहकारों की सोच में राजा से प्रकृतिगत, स्वभावगत, आयुगत बहुत अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए क्योंकि देर–सवेर उनमें टकराव अवश्यम्भावी है । कवि घाघ ने यह विचार प्रकर किया है कि यदि राजा लडका हो और मंत्री बूढा हो तो देर–सवेर मामला बिगड्ने देर नही लगती है–
लरिका ठाकुर बुढ दिवान । ममिलां बिगरै सांझ बिहीन ।।
नीच स्वभाव का सलाहकार कष्टदायक होता है । नीत स्वभाव का मंत्री चूँकि हमेशा खतरनाक सिद्ध होता है, इसलिए राज्य नीति के आलोक में राजा को अपने ऐसे मंत्रियो से सदैव सचेत रहना चाहिए । नीच प्रकति का मंत्रि राजा का , काई तालाब का , फूट मान–मर्यादा का तथा बिवाई पैर का नाश कर देती है । घाघ कहते हैं–
ओछो मंत्री राजै नासै, ताल बिनासै काई ।
सान साहिबी फूट बिनासै, घग्घा पैर बिवाई ।।
राजा को दयालु होना चाहिए । उसे निर्दयी नहीं होना चाहिए । घाघ कहते हैं कि जहाँ नौकर चोर तथा राजा निर्दयी हो,वहाँ धैर्य रखने का कोइ मतलब नहीं है, उसका कोई फाइदा नहीं है–
चाकर चोर राजा बेपीर । कहै घाघ का धारी धीर ।।
राजा को हमेशा प्रजा के हितों का ध्यान रखना चाहिए । उसे प्रजावत्सल होना चाहिए । दुष्ट राजा या राज्य का होना जीवन का सबसे बडा दुःख है । ऐसे में घाघ कहते है कि भेद देने वाला सेवक, सुन्दरी नारी, जीर्ण वस्त्र और बुरा राज या राजा, ये चार सबसे बडे दुःख हैं–
भेदिहा सेवक सुंदरि नारि । जीरन पट कुराज दुःख चारि ।।
सांस्कृतिक नीति
भारतीय संस्कृति में धर्म और कर्म की महिमा का गुणगान सर्वत्र मिलता है । इस आलोक में घाघ कवि की नीति कहती है कि पुत्र पिता के धर्म से बढता है लेकिन खेती अपने कर्म से होती है–
बाढै पूत पिता के धर्मा । खेती उपजै अपने कर्मा ।।
आपसी कलह त्याज्य है । इससे व्यक्ति,परिवार व समाज में अशान्ति फैलती है तथा सुख–समृद्धि नष्ट होती है । इसलिए कवि घाघ सचेत करते हैं कि जिस घर में रात–दिन की लडाई, आभूषण की भूख, सूखती हुई ईख, कमजोर खेती और निर्बुृद्धि भाई हों, उससे बडा दुःख और दूसरा नहीं हो सकता –
घर की खुनुस और जर की भूख । छोट दमाद बराहे उखस ।।
पातर खेती भुकवा भाइ । घाघ कहैं दुख कहाँ समाय ।।
संयमित वाणी नीतिसम्मत है । कवि घाघ यह सीख देते हैं कि जिस प्रकार बहुत वर्षा अच्छी नहीं होती है और न ही बहुत धूप अच्छी मानी जाती है, ठीक, उसी प्रकार न बहुत बोलना अच्छा है और न ही चुप रहना–
ना अति बरखा ना अति धूप । ना अति बकता ना अति चूप ।।
शत्रु की कृपा की अपेक्षा मित्र की डाँट–डपट नीतिसम्मत है । इस आलोक में कवि भड्डरी सलाह देते हैं कि जब कडाके की गर्मि पडती है तथा पसीना नहीं सूखता, तब केवल वर्षा की ही आशा होती है–
दुश्मन की किरपा बुरी, भली मित्र की त्रास ।
आडंग कर गरमी करै, जद वरसन की आस ।।
जिस प्रकार प्रातः काल बादल गरजने से वर्षा होती है,ठीक उसी प्रकास सत्पुरुष का वचन कभी निष्फल नहीं जाता । इस सन्दर्भ में कवि भड्डरी की धारणा हैं–
सवारो गाजियो, नै सापुरस रो बोलियो एल्यो नहीं जाय ।।
घाघ–भड्डरी का नीतिकाव्य और रीतिकायव्य–परम्परा मूल्य–चेतना
हिन्दी साहित्य की रीतिकालीन काव्य–परम्परा में नैतिक आचरण एवं मानवीय जीवन–मूल्यों की स्थापना का प्रयास बहुआयामी है । रीतिकालीन नीतिकवियों मे घाघ–भड्डरी व्यक्ति व समाज को समझ के उस नैतिक बिन्द पर लाने का अभूतपूर्व प्रयास करते हैं जहाँ सम्पूर्ण परिवेश में मानव–हित ही सर्वोपरि है । वैयक्तिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक सदाचरण एवं व्यवहारों के अनुक्रम में उनका काव्य–चिन्तन रहस्यवादी नहीं है तथा उसे धार्मिक व आध्यात्मिक भी नहीं माना जा सकता है ।
समवेततः घाघ–भड्डर िकी कहावतें उनकी अपनी रहनी है । विचार,सदाचार, स्वास्थ्य, सत्य, विश्वास, सन्तोष, विकारहीनता, मानवीय एकता आदि नैतिक मानवीय–मूल्यों के सम्बन्धीत उनकी कहावतों में उनकी अपना अनुभव नाना रुपों में अभिव्यक्त हुआ है । कहना न होगा कि इन कहावतों में लोक का अनन्तकालीन अनुभव भी समाहित है । घाघ–भड्डरी का नीतिकाव्य शारीरिक, मानसिक व प्राकृतिक संस्कार का बृहत्तर समायोग है । उनके नीतिकाव्य में सहज एवं सरल जीवन जीन की अभिप्रेरणा सर्वत्र परिलक्षित होती है । उनका नैतिक चिन्तन पोथी–पुराण–कुरान के अनुरुप आचरण करने के स्थान पर सहज आचरण एवं व्यवहार की ओर उन्मुख करता है ।
उपयोगी ग्रन्थ–सूची
१. त्रिपाठी, रामनरेश , घाघ और भड्डरी, हिन्दुस्तान एकेडेमी, इलाहाबाद
२.नेगी, डा.संजीव सिंह, रीतिकालीन नीतिकाव्य की सामाजिक भूमिका, नवराज प्रकाशन, नयी दिल्ली
३.राजपाल, डा. हुकुमचंद, हिन्दी साहित्य का इतिहास, डीसेंट पब्लिशर्स, नयी दिल्ली
४.चतुर्वेदी, डा. रामस्वरुप, हिन्दी साहित्य और सम्वेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
५.शर्मा, डा. शिवकुमार, हिन्दी साहित्य : युग और प्रवृत्तियाँ, अशोक प्रकाशन, नयी दिल्ली
६.डा. नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास , नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नयी दिल्ली
स्रोत : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, दूर शिक्षा निदेशालय, हिंदी विश्वविद्यालय, गांधी हिल्स, वर्धा (महाराष्ट्र)/हिन्दी नीतिकाव्य और मूल्य चेतना /प्रथम संस्करण:जून २०१८/प्रधान सम्पादक: प्रो.गिरीश्वर मिश्र, कुलपति(मगांअंहिंविवि, वर्धा)