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| The ‘International Conference on Nepal’s Reconstruction-2015′ in 25 th June 2015 at Kathmandu . |
दिनेश यादव(Dinesh Yadav).....................................................
नेपाल में बिना योजना और परियोजना के २५ जुन २०१५ मे दाता राष्ट्र के अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलन सम्पन्न हुआ हैं । पिछले वर्ष जब भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी नेपाल आए थे, एक खर्ब नेपाली रुपैया“ देने का ऐलान किए थे, सरकार के तरफ आज तक कोई भी सार्थक योजनाओं का घोषणा नही हो पाया हैं । फिर उसी तरह के ऐलान विभिन्न मुल्क के ओर से हुआ हैं । पिछले दफा भारत के आलावा अन्य मुल्क के द्वारा सहयोग/ अनुदान/सहुलियत ऋण देने का बचनबद्धता आया है, सम्मेलन के मार्फत् । खास कर के पुनर्निमाण के नाम पर वह घोषणा और प्रतिबद्धता आइ है , जिस के कार्यान्वयन पर अनेकौं सवालिया निशास लग रहा है । अनेक शंका और संशय यहा जारी हैं । यह बिना वजह नही आई है । राहत के नाम पर आए सामग्री मे भ्रष्टाचार और लूट खसोट करने की छुट देने बाला यह सरकार किस मुखारविन्दु से यह कह रहा हैं कि दाता मुल्क से प्राप्त सहयोग पुर्ण रुपेण भूकम्प के तवाही से घरबार विहीन बना पीडितों को मरहम लगाने के लिए काम आयेगा, उपयोग मे लाया जायेगा । नेपाल मे सरकार के द्वारा प्रति वर्ष होने वाला बजेट विनियोजन के रकम सही सलामत और नियत समय मे खर्च न कर पाने से करोड के करोड बजेट फ्रिज होता आ रहा है, यह यहा“ का एक यथार्थ भी हैं । इसिलिए विदेशी मुल्क के सहयोग मे भी इस तरह के कार्य न होने का क्या ग्यारेन्टी है ? इतना ही नही, यहा“ कोइ भी अन्तर्राष्ट्रिय सहयोग आज तक पारदर्शी नही हो पाया है, यह एक कडबा सच है । इस के ढेर सारे उदाहरण हमारे पास विद्यमान है । इस बारे मे सूची बनाया जाय तो एक फेरिस्त ही तयार हो सकता हैं । कुछ वर्ष पहले पूर्वी नेपाल मे बाढ के तवाही के समय भी ढेर सारे रकम एकठे हुआ था, बाढ के बहुत सारे पीडितों का पहूच आज तक उस पर नही हो पाया हैं । उस राशी का सदुपयोग कम और यहा“ के सभी दलपति अपने–अपने कार्यकर्ताओं को बांटा और भागबण्डे किया । तत्कालिन सरकार ने उस रकम पर लुट खरोट भरमार मचाने की आरोप भी पीडितो ने लगाया था । इसी तरह पश्चिम नेपाल मे बाढ के ताण्डव मे फसा जनता को भी ढाडस के अलावा आज तक कुछ भी नही मिला है । उस कस्बे और क्षेत्र के सभी पीडित समुदाय सहयोग पाने के लिए महिनौ से इन्तजार में हैं । यह तो हुई विगत के प्राकृतिक प्रकोपों का प्रभाव की बात । हरेक वर्ष यहा“ आग के चपेट, शितरहल, सुखा लगायत के कहर और सीतम भी जारी रहता है , राज्य के उपस्थिति इस प्रकार के कहर पर कभी नही दिखाई देता है, दिया है । इसलिए जनता की राहत पाने की चाहत पुरा होगा, जन–जन कैसे माग जायेगा , सरकार पर वह विश्वास कैसे करेगा । यह सरकार पर विश्वास करने योग्य कोई बात ही शेष बचा ही नही है । उस मे भी एकल जाति के बर्चस्प कायम रहा वर्तमान सरकार पर तो नेपाल के उपेक्षित, उत्पीडित, शोषित, दमित वर्गो का विश्वास विल्कुल है ही नही । इस वर्गो को सरकार अन्तर्राष्ट्रिय बहस से दुर रखा हैं । देश एक बडा सा हिस्सा मे बसोबास कर रहे बहुसंख्यक अवादी वाले मधेसी लोगो को अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलन से दूर रख कर आयोजन किया गया सम्मेलन मे करीब एक दर्जन मुल्क से व्यक्त किया गया सहयोग की प्रतिबद्धता और बचनबद्धता लागु हो पायेगा, भला विश्वास कौन करे ।
इसिलिए सहयोग राशी के कार्यान्वयन पक्ष विल्कुल कमजोर है, पार्टी के कार्यकर्ता और दल के नेता अन्तर्राष्ट्रिय सहयोग पर गिद्य की दृष्टि लगाया हुआ है । सहयोग कार्यान्वयन नहोने का ढेर सारे कारण है भी तो हैं । क्योकी इस मे आने वाले दिनों मे होने वाला भ्रष्टाचार को कोई नही रोक सकता है, क्योकी उसके गुन्जाइस बहुत ही है । क्योकीं विना विवाद के आज तक कोइ भी निर्णय न कर पाने वाला यहा“ के सरकार राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण संयन्त्र÷प्राधिकरण मे विशेषज्ञ को सामेल नही किया हैं । फिर एक बडे आवादी को अघोषित सरकारी नीति के तहत दूर रखा गया है । इतना ही नही सरकार के नेतृत्व कर रहे सुशिल कोइराला को ही उस संयन्त्र के नेतृत्व सौपना अपने आप मे एक समस्या है । क्योकीं कोइराला के सरकार आज तक कोइ भी सही काम विना विवाद और जालझेल से नही कर है । कहने के लिए तो कहता है कि भ्रष्टाचारी को नही बक्सेंगे , परन्तु अर्थमन्त्री रामशरण महत के स्वकीय सचिव के द्वारा विदेश से राहत मे आया त्रिपाल लगायत के सामग्री का विक्रीवितरण जो हुआ , वह एक बडी प्रमाण है । अनैतिक और अमर्यादित काम गर्ने बाले उस पिए महोदय को सरकार ने आज तक कारवाही नही कर पाया है । इसिलिए विगत के अनुभव को देखे तो सहयोग रकम के कार्यान्वयन पक्ष कमजोर है । दुसरी बात, जनशक्ति का अभाव है, सरकार मे पार्टी और नेता हावी है । जवावदेहिता किसी के पास नही है । सब के सब लुटेरे है, भागबण्डे के अधिकारी है, उस के लिए हमेसा भी आतूर रहा करते है । इसिलिए तो पिछले समय प्रतिपक्ष मे रहे ३० दलीय मोर्चा के एक मठाधिस और उस के दल भी सरकार बनाने की खेल मे जुटे हैं । एमाओवादी के मुखिया पुष्पकमल दाहाल जो संर्घषकारी और अधिकार के लिए लडाई लड रहे समूह, सम्प्रदाय और वर्गो को पिछे छोड कर सरकारी नाउ पर अपना पोदान रख चुके है । उसे साथ दे रहा है ,विजयकुमार गच्छदार के लोकतान्त्रिक फोरम ।
इसी बीच, कुछ नेता कह रहा है कि बैशाख १२ और २९ को आया प्रलयकारी महाभूकम्प से तहसनहस हुआ सांस्कृतिक धरोहर, सर्वसाधारण के घर, सडक मार्ग, पुल लगायत के ध्वस्त संरचनाको यथाशिघ्र बनायेंगे । ३ वर्ष मे मुल्क को पहले की अवस्था मे पहू“चा कर दम लेंगे भी कह रहे है वह । नागरिक समाज के लोगों को इस मे हिस्सेदार बनायेगें, राजनीतिककर्मी को सहयोग लेने के चाहत को बन्देज करेंगे , प्रभावित क्षेत्र पहिचान कर प्राथमिकता आधार पर काम करगें, दलिय स्वार्थ से उपर उठेंगे, भूकम्प के बाद पुर्ननिर्माण के लिए बोलाया गया अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलन को एक ‘ब्रान्डिङ ’ भी बनायेंगे और विश्व भर एक खासा सन्देश भी प्रवाह करने की बात भी नेता लोग कर रहा हैं । परन्तु विगत के अनुभव उत्तम न होने के कारण इन बातो पर विश्वास कर लेना अपने को मुर्ख मनाना ही होगा । पूर्व गर्भनर दीपेन्द्रबहादुर क्षेत्री के द्वारा एक अखबार को दिया गया प्रतिक्रिया को ले तो सभी बात साफ होती है । उनका कहना था कि विदेश से जुटा रकमों का आज तक कभी भी सभी खर्च नही हो पाया है , ४१ प्रतिशत से ज्यादा खर्च नही कर पाने की बात तो आज जगजाहेर ही हो चुका है । इसिलिए विदेशी ने दिल खोलकर सहयोग किया है कह कर इस का पुरा उपयोग होने के ग्यारेन्टी के लिए काफी नही हैं । नेपाल के प्ररिपेक्ष्य मे यह एक कडबा सच भी है कि यहा के अधिकांश नेता जनता के लिए नही सत्ता के लिए राजनीति करते हैं । यदि जनता के लिए होता तो नेपाल मे बार–बार अधिकार के लिए संघर्ष न होता, लोगो को अपने जीवन आहूती नही देना पडता । वेसे भी जिस सरकार को अपनी आलोचना होने का दर है, और तमाम पत्रकारों को सम्मेलन स्थल से दूर–दूर रोका गया, उस के छाया तक भी पसन्द नही किया गया, वह कैसे सहयोग का सत प्रतिशत उपयोग करेगें ?
सहायता के लिए तत्कालिन परियोजना का घोषणा नही हो पाना कार्यान्वन की सब से बडी चुनौति है । कुछ मुल्क के सर्तसहित के सहयोग भी कार्यान्वयन पक्ष कमजोर होने का संकेत है । सरकार के प्रतिनिधि से घोषणा के नाम पर घोषणा तो हुआ है परन्तु शिघ्र सम्झौता कर के रकम परिचालन की प्रत्याभूति आज तक नही आ पाया है , यस भी एक बहुत बडी समस्या हो सकता हैं । दाता के द्वारा घोषित सहयोग पहले आन्तरिक स्रोत से खर्च करना होता है , उसका शोधभर्ना या नगद लेकर आगे बढ्ना भी होता है । इसे भी चुनौति के तौर पर देखा गया है । मिलाजुलाकर कहें तो सहायता रकम का उपयोग मे ढेर सारे महा–जलिताएं भी हैं । रकम के खर्च प्राधिकरण मार्फत या दाता निकाय के द्वारा हो यह भी अस्पष्ट है । कुछेक दाता निकाय अपने सहायता राशी को सरकारी सिस्टम से न होकर विदेशी और अन्तर्राष्ट्रिय गैरसरकारी संस्था के ‘थ्रु’ कराने की स्पष्ट चाहत भी फरमान किया है । सहयोग कर्ता के तरफ से आया यह चाहत÷फरमान रास्ते के पत्थर है, सरकार के लिए । समाचार सुत्रों के अनुसार अमेरिका और बेलायत जैसे मुल्क सरकार के मार्फत सहयोग खर्च करने की मनसाय मे विल्कुल नही हैं । अन्य देश से भी स्पष्ट अडान आज तक सार्वजनिक नही हो पाया है । स्रोत का मानना है कि भारत, चीन, जापान जैसे मुल्क भी सरकार के गलत मनसाय से वाकिफ होते हुए राशी सरकारी सिस्टम से वा अन्य मार्ग से हो, इस पर ‘क्लियर कट’ नही है । क्योकी सम्मेलन मे सहभागी दाता और विज्ञ ने नेपाल के पुर्ननिर्माण के लिए प्राप्त राशियां पीडित तक पहुंचेगा या नही इस पर घोर शंका जताया हैं । नेपाल संकटकालिन अवस्था मे है, जिसे सक्रमणकालिन स्थिति से भी जाना जाता हैं । इस अवस्था से गुजर रहे मुल्क मे सहयाता के राशियां सही सलामत उपयोग न हो पाने का उदाहरण भी है । यहा तो सरकार अपने जवावदेहिता से कोशो दुर है । इसलिए उपयोग का गुन्जाइस बहुत कम हैं । पारदर्शिता के अभाव मे भ्रष्टाचारी पनप सकता है, यदि ऐसा हुआ तो विदेशी मुल्क अपना सहयोग तत्काल रोक्ने के निर्णय भी कर सकता हैं । इस से नेपाल के छवि धुमिल होने का अन्देशा भी बहुत हैं । पुर्ननिर्माण के क्रम मे यहा“ सीप, ज्ञान और प्रविधि के अभावों का फाइदे विदेशी मुल्क उठा लेने की गुन्जाइसे भी है । क्योकी इसके लिए महंगे पांच तारे होटेल मे कार्यशाला का आयोजना भी सरकार को करना पडेगा । महंगा होटेल उस के छनौट मे हमेशा रहा है । इसमे भरमार खर्च होने की गुन्जाइश को नकारा नही जा सकता है । इस से पुर्ननिर्माण के लक्ष्य मे पहूच पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन भी हो सकता हैं ।
किसने कितना दिया : पडोसी मुल्क भारत ने एक खर्ब देने का ऐलान किया है । उस के यह सहयोग, अनुदान और ऋण के तौर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, हाउजिङ, सडक, यातायात, सांस्कृति धरोहर के निर्माण मे खर्च करने की सर्त रखी हैं । साथ ही प्रकोप न्युनिकरण मे भी राशी का खर्च हो, भारत चाहता है । भारत के छनौट मे बहुत सारे विषय वस्तु पड्ने के कारण नेपाल सरकार को प्राथमिकता निर्धारण करने मे दिक्कते आ सकती है । क्योकी यहा“ के सरकार के पास अभि तक ‘प्राइरोर्टी’ निधारण करने का कोई भी विश्वस्त सूचक/मानक नही बन पाया है । उस पर भी सरकार के नेतृत्व एक पार्टी कर रहा है, नियन्त्रण दुसरे दल के होने के कारण विषय जटिल बना हुआ हैं । इसी प्रकार चीन ने ७७ अर्ब ७० करोड रुपैयां अनुदान सहयोग करने का बचन दिया है । उसके प्राथमिकता हिमाली क्षेत्र के लोगो के जीवनस्तर को उपर उठाना रहा हैं । इसके बाद सांस्कृतिक सम्पदा के जीणोद्धार, विपद के पूर्व तयारी और स्वास्थ्य को प्राथमिकता मे रखा है, चीन ने । उस के इस तरह के प्राथमिकता भी सरकार के लिए धर्मसंकट लाने के लिए काफी हैं । विनाशकारी भूकम्प के बाद उद्धार के लिए आये विदेशी बचाव दल को सरकार ने ठोस निर्देशन न देने के कारण एक ही जगह तीन÷चार मुल्क के उद्धारकर्मी का पहूचना और जमावडा होना, फिर वापस आना , अछि संकार नही रहा, था । यह अब के दिन मे भी न हो, कहना मुश्किल हैं । अन्तमे, सरकार ने भूकम्प के बाद पुर्ननिर्माण के लिए प्रकोप के बाद आवश्यकता पहिचान(पीडीएनए) छ खर्ब ६९ अर्ब रुपैया अनुमान किया था , परन्तु दाता मुल्क ने कुछ सर्तो के साथ ४ खर्ब ४० अर्ब रुपैया“ सहयोग करने की प्रतिबद्धता जताई हैं । सत्ताधारी इस से उत्साहित तो जरुर है, जनता मे उदासिनता बरकरार है । नेपाल के पुर्ननिर्माण के लिए अन्तर्राष्ट्रिय सम्मेलन(आईसीएनआर)–२०१५ जुन २५ सकारात्मक होते हुये पेचिदा भी उत्तना ही हैं । प्रधानमन्त्री ने विधि के शासन और शून्य भ्रष्टाचार मे लिए निफिर्किर रहने का जिकिर किया , परन्तु रामशरण महत के पिएद्वारा किया गया भ्रष्टाचारी को वह नजर अन्दाज किया है । प्रधानमन्त्री ने अपने सम्बोधन मे सर्वपक्षिय और सर्वदलिय सहमति के साथ आगे बढ्ने कि बात नही कहा है । परन्तु उनके मन्त्री परिषद के लोग उनको साथ देने की स्थिति मे नही दिख रहा है । आने वाले कुछ हप्तो मे सरकार की रवैया साफ हो जायेगा । उसके लिए प्रतिक्षा तो करना ही होगा । (द पब्लिक हिन्दी मासिक के लिए ०७२ असार १३ मे लिखा गया यह मेरा आलेख)
किसने कितना कबुल किया
- भारत– एक खर्ब
- चीन –७७ अबं
- जापान –२६ अर्ब
- अमेरिका– १३ अर्ब
- बेलायत– ११ अर्ब
- नर्वे – तीन अर्ब
- विश्व बैंक– ५० अर्ब
- एशियाली विकास बैंक– ६० अर्ब
- युरोपियन युनियन – ११ अर्ब
- अन्तर्राष्ट्रिय मुद्रा कोष– ५ अर्ब

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