Saturday, 31 August 2013

छद्मभेदी लोग बातबहादुर


Dinesh yadav
असहमति या विमति न जताते तक सभी लोगो के लिए कोई सुयोग्य और अच्छे कहलाते है, विपरित होते ही ‘दोगला चरित्र’ की संज्ञा देना वही पुरानी अदायें हैं । आप भी उस से परे नही ठहरे ? खैर, यह आप की अपनी बात और मर्जी हुई । यहाँ मै आप के टिप्पणी को पूर्ण रुपेण अस्विकार करता हूँ । इस जमाने मे लोक ‘यस मैन’ को ज्यादा चाहते है, मै उसमे से नही हूँ । आप चाहे लाखो बुराई करते अपनी भडास मुझ पर निकाले, ‘झुठ को झुठ और सच को सच’ ही कहुँगा । पत्रकारिता के दो दशक के दौरान मैने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से ढेर सारे नेता को पनाह दी है, अपने बुतो से सहयोग करी है , मन्त्री भी बने है बहुतो । माफ करिएगा, मै उन नेताओं का नाम यहाँ उल्लेख करना उचित नही मानता । साहजी, छद्मभेदी लोग बातबहादुर होते है । आपके ‘स्टेटस’ मे काफी दोगली बातेँ भी कहीँ है, अपवाद से परे आप भी नहीं । जहाँ तक आपकी पत्रकारिता की बाते हैं, अब वह व्यवसायिकता के डगर पर हैं । व्यापार और उद्योग भी । इसिलिए आपके ‘इन्ट्रेस्ट’ भला वह क्यो पडोसेगा ? फिर भी कमोवेश सभी क्षेत्र और वर्गोका ‘कभरेज’ तो अखबार कर ही रहा हैं । दुसरे के दुकान पर ‘तुम यह बेचो , वह मत बेचो’ नही कह सकते ? मै दो दशक एक ही बात दोहराता आ रहा हूँ, ‘कोई मधेस के लाल निकले जो अखबार चलाए ।’ इसके अनसुनी आजतक जारी हैं । यहाँ यह कह देना उचित होगा कि मधेस मे ‘पैसाकारिता और प्रचाकारिता’ नहीँ ‘अलख जगानेबाली मिशन पत्रकारिता’ जरुरी है । कुछ मधेसी अग्रज और अनुज मधेस के नाम पर ‘धन्दाबाज’ और ‘सौदाबाज’ बन कर चाँटी काट रहे हैं । यदि उसी को आप मधेसी पत्रकार और मधेसी पत्रकारिता कहते हैं तो यह आप की बात होगी । परन्तु मै इसे खारिज करता हूँ ।
देखिए , मधेस मे विकृति, विसंगति और कुसंस्कारों के जड राजनीतिक पार्टी और उसके मुखिया है । वे सभ मधेस के नाम पर लूट मचा रहे है । पिछले दिने मधेस के नाम पर एनजिओ÷आइएनजीओ धन्दागिरी शुरु हुई है । कुछ लोक मालामाल हो रहे हैं । खैर यह उनकी खुशी है । इसमे किसी को ईष्र्याभाव नही जगनी चाहिए ।  
जनाव साह साहेब, आज, भगवा कुछ मधेसी लोक दोगलापन्थी के एक बडा नमूना बनकर उभर रहें हैं ।  उनके अप्राकृतिक मधेस भक्ति संदेहास्पद है । मधेस एक अंधी खायीँ के मोहाने पे खडा हैं, एक हलके से हावा का झोका पिछले ‘मधेस विद्रोह’ के सभी उपलब्धियोको समाप्त कर देगा । परन्तु जनता करे तो क्या करे ? मधेस के आम जनता आज खरबूजे की भांत हों गयी है और भ्रष्ट, पदलोभी, सत्तालोभी, द्रव्यलोभी मधेसी नेता छूरी के सामान हैं, यानी खरबूजा छूरी पे गिरे तो भी कटेगा और छूरी खरबूजे पे गिरे तो भी वो कटेगा । इसिलिए आप जैसै बृद्धिजीवि से मधेस के रेत माफिया से पंगा लेने वाले इमानदार और समाज के सच्चा सिपाही÷संचारकर्मी को किरकिरी का विषय बत बनाए । जिसकी ईमानदारीता और कर्तव्यनिष्ठा दो छाँक की रोटी भर जुटा रहा है । उसके जज्बे और हौसले को कम करेंगे तो अन्याय होगा । इसिलिए मै कहता हूँ कि आपके ९० प्रतिशत पत्रकार और बुद्धिजीविको दोगले कहनेका निचोड बेतूक और बकवास है । एक सच्चा पत्रकार लग्गू–भग्गू नहीँ बन सकते , वह चाहे किसी भी कौम के भला क्यो न हो ।
आप ही बताए, अति मधेसपन्थी भडकाव से क्या मधेस और मधेसीयों का कल्याण संभव है ? रंगे सियार मधेसी नेता पहाडी नेतृत्व के गठबन्धन सरकार के खम्भे बारम्बार बना, आज भी है । मधेस मे कायापलट क्यो नही हो सका । सत्तालोभी हमारे नेता बातबहादुर है, भला और वे कर भी क्या सकते हैं ? हाँ, गत्ते की तलबारें भाँज सकते है, कभी एमाओवादी, कभी कांग्रेस और कभी एमाले की पूँछ में कँघी कर सकते है , तो कभी उनके घिसा रिकार्ड बजाकर जनताको सुना सकते है ।
शेर की खाल ओढे इन छद्म मधेसवादी दल के नेता गीदडो की जमात मे अकेले नही है, बेनामधारी फेसबुक बाले और उपनामधारी लोगों का भी साथ हैं । इतना ही नहीं और भी कई नकली मधेसवादी छुटभैये भी है । २०६४ के मधेस विद्रोह मे जनता के उभार ने मधेसी के भीतर मौजूद क्रान्तिकारी कतारों में जबरजस्त आशा का संचार किया था । अवसरवाद, सरकारवाद, धनवाद, सुविधावाद के कारण मधेसवाद से वो निर्णायक विच्छेद के स्थिति मे जकड गए, सभीको कुर्सीबाद, झुठबाद और दुस्साहसवाद के राहु ने ग्रस लिया है । मधेसी दल और उसके नेता के इसी भटकाव के रास्ते पर आगे बढी और खण्ड–खण्ड विभाजन की त्रासदी का शिकार भी हुई । यही तो सच्चाई है । अन्त्यमे, मधेस जनविद्रोह के दौरान बेमिसाल और अकूत कुर्वानियाँ देनबारे वीर सभीको सत्सत नमन करते शेर और लोमडी के झुन्ड बनाए नेतासभ से देश और मधेस को बचावे । feedback of Diyara shah
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