Tuesday, 11 September 2012

मिथिला बनल ‘बाभनक गाम’


मिथिला बनल ‘बाभनक गाम’

...........प्राचीनकाल सँ मिथिलाक समाज पूर्णतः ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर आधारित रहल अछि । चाहे कोनो ब्राह्मण दरिद्र छिम्मडि किएक नइँ होथि, श्रेष्ठतावादी फोबिया मे कनको कम नहि । हुनक कुलीनतावादी कट्टताक आख्यान हमसभ हरिमोहन झा आ यात्री जीक साहित्य मे पढि सकैत छी । निःसन्देश मैथिली साहित्य मे ब्राह्मण जातिक भीतर जमकल कट्टरता, जडता आ विद्रूपता केँ देखार करबाक प्रारम्भि काज हरिमोहन झा आ यात्रीक लेखन द्वारा संभल भेल, मुदा हिनको लोकनिक साहित्य मे सामाजक सभ वर्गक प्रतिनिधित्व संभव नइँ भ’सकल । हरिमोहन झा आ यात्री जीक कथा साहित्य मुख्य रुप सँ ब्राह्मण–सुधारक साहित्य थिक, जाहि मे आन जाति अथवा वर्गक उपस्थिति मात्र परिवेशगत अछि । ईहो सत्य, जे जँ ब्राह्मण सुधरि जाथि तँ ओहि सुधारक प्रभाव सामाज पर पडबे टा करत । मुदा , ई सुधार केत संभव भेल से खोजक विषय थिक । सोलहवीं शताब्दीक बाद वर्णव्यवस्थावादी तुलसी दासक पदक तँ जमिक’प्रचार–प्रसार भेल, मुदा कबीर आ रैदासक वाणी केँ मिथिलाक प्रभु जाति मुख्यधारा मे नइँ आब’देलक । बीसवीं शताब्दीक नवजारणक दौर मे मिथिला मे कोनो सामाजिक सुधारक नइँ भ’ सकल । मिथिलाक बाहर जे समाज सुधार आन्दोलन राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, ज्योतिबा फुले, पंडिता रमा बाई अथवा अन्य सुधारक द्वारा चलाओल गेल तकर हबो धरि मिथिलाक सीमा मे नइँ पैसि सकल, आ तकरे परिणाम भेल जे ‘बाभनक गाम’ क अपन खोल मे बन्द पडल रहल । ओना वर्तमान मे बाहरी दुनियाक सम्पर्क मे अयलाक बाद एहि जडता मे थोडेक फर्क आबि रहल अछि , मुदा ‘बाभनक गाम’ जडता मे एखनो यथेष्ट परिवर्तन अथवा सुधार संभव नइँ भ’सकल । बहुत पहिने जार्ज ग्रियर्सन मैथिल ब्राह्मणक एहि जडता पर टिप्पणी करैत लिनने रहिथि जे ‘दुनिया बदलि गेल, मुदा मैथिल समाजक धार्मिक ओ सामाजिक कट्टरता आ रुढिवादिता मे कोनो अन्तर नइँ आयल ।’ प्रश्न अछि जे एकैसम शताब्दी मे आइ एहि समाजक कट्टरता मे कतेक परिवर्तन संभल मेल अछि ? एहि लेखक उद्देश्यय तारानन्द वियोगीक कविता ‘बाभनक गाम’, बुद्धक दुख’ समय सभ केँ मिलाओत’, आ ‘आगू मैथिलीक बाट नहि’ कविताक माध्यममे मिथिलाक एहि सामाजिक परिवर्तनक पडताल करब थिक । ‘बाभनक गाम’ कविताक शुरुआत आ अन्त निम्न पंक्ति सँ होइत अछि ः
पधारि रहल अछि गर्दमगोल मचौने
एकैसम शताब्दी
आ कनैए बाभनक गाम’
उपरोक्त पंक्ति आ ग्रीयर्सनक उक्ति मे लगभग सौ वर्ष सँ अधिक समयक अन्तर रहितो कोनो असमानता नइँ अछि । ‘बाभनक गाम’ कविता एकैसम शताब्दीक मुहान पर (१९९९ ई.) मे रचल गेल छल । एकैसम शताब्दी दुनिया भरी मे जत’ आधुनिकता आ बदलावक प्रतीक बनल , ओतहिए मिथिलाक ‘बाभनक गाम’ कानि रहलि अछि जे कतहुँ ई बदलावक बसात ओकरा गाम मे ने पसि जाय । ब्राह्मणवादी व्यवस्था मिथिलाक बहुत जडि तक घुसल अछि तेँ ओकरा भीतर कोनो बदलावक गुंजाइश बहुत मुश्किल, ओना नवतुरिया वर्गक छिटफुट हस्तक्षेप अवश्य देखा पडैत अछि, मुदा से हाशिए पर अछि ।.............
स्रोत ः अंतिका, अक्टूबर, २०११–मार्च, २०१२, पृष्ठ ४३–४४, लेखक ःश्रीधरम, लेख शिर्षक ः ब्राह्मणवादक सभ्यता समीक्षा ।

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