Wednesday, 3 September 2025
मैथिली मानकीकरणके नाम पर 'फतबा' के ओरियान !
भारतक राजधानी नयाँ दिल्लीमे मैथिलीके मानकीकरणके नाम पर "फतबा" वा "उलेमा" जारी करबाक ओरियान, अर्थात् कट्टरपंथी वा एकपक्षीय दृष्टिकोण अपनाबेके प्रवृत्ति, शुरू भेल अछि, जे चिंताके विषय छै । अहि विषय पर सामाजिक संजाल फर मिश्रित प्रतिक्रिया देखल गेल अछि । मैथिली समाज अहि विषय पर ध्रुविकृत बनल अछि । ब्राम्हण आ ब्राम्हनेत्तरके रूपमे ध्रुबीकरण चिन्ताक गप्प थिक । एकर वजह नयाँ दिल्ली स्थित मैथिली शोध परिषद् नामक संस्थाद्वारा ओतह 6 सितम्बर 2025 में होबे जा रहल 'मैथिलीक वर्तनी विमर्श हेतु दिल्ली-विद्वत गोष्ठी' बनल अछि । मैथिलीके विद्वान/लेखक/अभियानी डाँ किशन कारिगर, आचार्य रमानन्द मण्डल सहितके विद्वत लोकैन जोरदार विरोध करैत मैथिली भाषामे लोकबोली,लोकशैली आ लोकलयके समावेश करबाक माग कयलक अछि । मैथिलीमे सर्वजन आ सर्वपक्षके समावेश करैत मानकीकरण होबाक चाही, नए त मैथिली धरासाही बनत प्रतिक्रिया सामाजिक संजालमार्फत् ओसभ कहि रहला अछि । मुदा दरभंगा आ मधुबनीके घराना सवर्णके बोली, शैलीके आधार बनाके मानकीकरण होएत त दूर्घटना निश्चित भेल बात सेहो ओसभ जोरदार रूपसँ कैह रहलाछ । दरभंगा आ मधुबनीवाला बोली/शैलीके पृष्टपोषणमे लागल सांभ्रात जातिक लोकसभ कथ्य नै लेख्य शैलीके मानकीकरणके आधार बनेबाक बात कैह रहला अछि । मानकीकरणके प्रक्रियामें यदि किछु विद्वान वा समूह एकटा खास शैली (जेना सोतीपुरा मैथिली) वा तत्सम शब्दावलीके थोपैत छथि, आ अंगिका, बज्जिका जेना उपबोली सबके उपेक्षा करैत छथि, त इ भाषाके लोक स्वरूप आ विविधता लेल हानिकारक साबित भए सकैछ। मानकीकरणमें सब क्षेत्रीय शैली आ उपबोली सबके प्रतिनिधित्व देल जाय। "फतबा" जेना एकपक्षीय निर्णयके बजाय, मिथिला, बज्जिकांचल, आ अंगिकांचलके विद्वानसभके एक मंच पर लावल जाय, जाहि से सहमति आधारित मानक बन सके।
मैथिलीके लोक स्वरूप, जेना तद्भव आ देसी शब्द, आ बोलचालके मुहावराके प्राथमिकता देल जाय । उदाहरण स्वरूप, 'पाणि' आ 'पानी' दुनूके स्वीकार्य बनावल जाय ।
वर्तनीमें भेद, जेना 'ण' बनाम 'न', वा 'ष' बनाम 'स', के पर्यायवाची रूपमें मान्यता देल जाय, जाहि सँ लेखकके रचनात्मक स्वतंत्रता बनल रहए।
मानकीकरणके लेल शब्दकोश, डिजिटल टूल आ शिक्षण सामग्री विकसित कायल जाय । संगैह, विद्यापति जेना ऐतिहासिक रचनाकारके कृतिके मूल रूपमें संरक्षित करबाक चाही, न कि शुद्ध मैथिलीमें बदलल जाय ।
"उलेमा" जेना दृष्टिकोणके बजाय, मैथिली भाषी समुदाय, साहित्यकार, आ शिक्षकसभके राय लेल जाय, जाहि सँ मानकीकरण सर्वस्वीकार्य हो।
मैथिलीके मानकीकरण जरूरी छै, मुदा एकर लेल समावेशी, लोक-केंद्रितङ आ लचीला दृष्टिकोण अपनावल जरूरी छै। "फतबा" वा कट्टर नियम थोपला सँ भाषाके सांस्कृतिक धरोहर कमजोर होय सकैछ। सब क्षेत्रीय विविधताखके समन्वय सँ एकटा मजबूत आ जीवंत मानक मैथिली बनावल जा सकैछ ।
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दिल्लीवाला कथित विद्वानसभ मैथिलीके डुब्बैक लेल षडयन्त्र कँ रहल छथि । @रामबाबु झा, सौराठसभा, मधुबनी ।
ReplyDeleteजुलुम होएत । मैथिली उपर नहि उठत् । #हरिमोहन मिश्र, मिशिरटोला, दरभंगा !
ReplyDeleteसाहौर ! साहौर ! ##टुटु बाबु, बाबुबरही, मधुबनी ।
ReplyDeleteहे जानकी ! मैथिली माएके बचबियौन ! ●रामभरोष , छातापुर, मधुबनी ।
ReplyDeleteधुर्त लोकसभ मैथिलीके रसातलमे ल जाएत, से बुझाएत अछि । #वंशीधर, जनकपुरधाम (नेपाल)
ReplyDeleteनीक आलेख हइ क सोलकन समाज लै त रामबाण होतै..
ReplyDeleteसोलकन समाजक पिछलगुआ सब बलू मैथिली लोक बोली के आंदोलन बेर सोइतपुरा बला संगे हं मे हं मिलबै जाइ हइ क. (डा. किशन कारिगर, भारत)
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ReplyDeleteजायज गप्प ! मुदा बुझत कतेक भलमानस ! @पंकज कुमार , लालवाग, दरभंगा !
ReplyDeleteमिथिला आ मैथिलीके डुबाके छोडत बुझाइत अछि । #रामलोचन ठाकुर, कलकत्ता, पश्चिम बंगाल ।
ReplyDeleteई बहुत महत्वपूर्ण आ गंभीर विषय छै जाहि पर विचार करबाक आवश्यकता छै। मैथिलीक मानकीकरण एकटा जटिल प्रक्रिया थिक जाहिमे भाषाक जीवन शक्ति आ ओकर समावेशिताके बचाबैत आगू बढ़बाक चाही।
ReplyDeleteदिल्लीमें होबय वला 'मैथिलीक वर्तनी विमर्श हेतु दिल्ली-विद्वत गोष्ठी' के ओरियान आ ओकर कारणेँ समाजमें भऽ रहल ब्राह्मण आ ब्राह्मणेत्तरके रूपमें ध्रुवीकरण निश्चय ही चिंताक विषय छै। भाषाकेँ कोनो खास वर्ग वा क्षेत्रके सीमामें बाँधब एकर लोक-स्वरूप आ भविष्यके लेल घातक सिद्ध भऽ सकै छै।
मैथिलीक मानकीकरणकेँ एकपक्षीय "फतबा" वा "उलेमा" जेना कट्टर दृष्टिकोणसँ बचाओल जाय। मानकीकरणके उद्देश्य भाषाकेँ एकटा सर्वस्वीकार्य लिखि-प्रणाली देब थिक, नहि जे ओकर विविधताकेँ समाप्त कऽ देल जाय ।
मिथिलांचल, बज्जिकांचल आ अंगिकांचल तीनों क्षेत्रक विद्वान, लेखक, शिक्षक आ आम भाषी लोककेँ एकटा व्यापक मंच पर आनि कऽ सहमति-आधारित मानक बनेबाक चाही।
अंगिका आ बज्जिका जेना उपबोली सबकेँ उपेक्षा करबाक बजाय, ओकर उत्तम शब्दावली आ भाषिक तत्व केँ सेहो मानकमें स्थान भेटबाक चाही। भाषाकेँ धरातल पर जीवंत रखनिहार तऽ ओकर लोकबोली, लोकशैली आ लोकलय थिक।
मानकीकरणमें तद्भव आ देसी शब्द तथा बोलचालके मुहावराकेँ प्राथमिकता देल जाय, जेना कि अहाँ सेहो कहलहुँ: 'पाणि' आ 'पानी' दुनूकेँ स्वीकार्य बनाओल जाय।
लेखककेँ रचनात्मक स्वतंत्रता देब लेल, वर्तनीमें किछु भेदकेँ पर्यायवाची रूपमें मान्यता देल जाय (जेना 'ण' बनाम 'न', 'ष' बनाम 'स')। एकरा "कथ्य नै लेख्य शैली" के नाम पर दरभंगा-मधुबनीक घराना सवर्णके बोली, शैली तक सीमित कऽ देब उचित नहि छै। भाषा कोनो एक वर्गक सम्पत्ति नहि होइ छै।
विद्यापति जेना महान रचनाकारके कृतिकेँ ओकर मूल रूपमें संरक्षित कयल जाय। 'शुद्ध' मैथिलीमें परिवर्तित करबाक प्रयास ओकर ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक महत्वकेँ कम करत।
मानकीकरणकेँ सहयोग देब लेल शब्दकोश, आधुनिक डिजिटल टूल आ शिक्षण सामग्री विकसित कयल जाय। एकरा तकनीकसँ जोड़ब भाषाकेँ समकालीन बनाबैत छै।
ध्रुवीकरणसँ बचबाक लेल रचनात्मक मार्ग
ब्राह्मण आ ब्राह्मणेत्तरके बीचक ध्रुवीकरण भाषाकेँ कमजोर करत। एकर समाधान समावेश आ सहमतिमें निहित छै ।
प्रस्तावित गोष्ठीकेँ अपन स्वरूप बदलबाक चाही। ई 'फतबा जारी करबाक ओरियान' जेना प्रतीत नहि होमय चाही, बल्कि मिथिलांचल, बज्जिकांचल आ अंगिकांचलकेँ सब वर्ग आ जाति के विद्वानसभकेँ समावेश करैत एकटा "संवाद मंच" बनय।
मानकीकरणके मानदंड 'सोतीपुरा मैथिली' वा तत्सम शब्दावली थोपनाइ नहि होमय चाही, बल्कि सर्वाधिक व्यापकता, सुगमता आ क्षेत्रीय शब्दावलीकेँ स्वीकार्यता होमय चाही।
अन्तमे, मैथिलीके मानकीकरण होब जरुरी छै, मुदा ई प्रक्रिया लोक-केंद्रित, लचीला आ समावेशी होबय चाही। कट्टर नियम थोपला सँ भाषा धरासाही भऽ सकै छै। सब क्षेत्रीय विविधताकेँ सम्मान आ समन्वयसँ मात्र एकटा मजबूत आ जीवंत मानक मैथिलीकेँ आधार भेटत।
##डा. भोगेन्द्र झा, पाटलीपूत्र पटना, बिहार ##