Sunday, 20 April 2025

मिथिलामे ब्राह्मणवादक उन्नयन आ उपचार : एक विश्लेषण

@दिनेश_यादव
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव एक जटिल सामाजिक, सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक मुद्दा छी, जे मिथिला क्षेत्र (मुख्यतः बिहारक उत्तरी भाग आ नेपालक मधेश क्षेत्र) के सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक परम्परा, आ शक्ति संतुलन सँ गहिर ढंग सँ जुड़ल अछि। एकटा आलोचनात्मक विश्लेषणक लेल, हम एहि प्रभावक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक गतिशीलता, आ एकर समकालीन परिणामसबके आलोचनात्मक चर्चा एतह करब। एकगोट जानकारी कराब'चाहब जे अहि आलेखमे 'मिथिला' शब्दक प्रयोग प्रतिकात्मक अछि, किएक त अखन ओ शब्द क्षतविक्षत अछि,अखन सरकारी दस्तावेज सबमे ओकर प्रयोग, उपयोग आ सान्दर्भिकता विलुप्त अछि । आब 'मैथिलीभाषी क्षेत्र' कहनाए समचिनी, उचित आ बेस रहत । प्रवुद्ध पाठक लोकैन 'माथिला'के ओहे रूपमे लेबाक विनम्र निवेदन अछि । चलू आजुक विषयवस्तुदिशि प्रवेश करैत छी :-
खंड-एक
●ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:- मिथिला क्षेत्र प्राचीन काल सँ विद्या, संस्कृति, आ धर्मक केंद्र रहल अछि। मैथिल ब्राह्मण, जे क्षेत्रक सामाजिक संरचनामे 'उच्च स्थान !' राखैत छथि, ऐतिहासिक रूप सँ पुरोहित, विद्वान, आ सामाजिक नेतृत्वक भूमिका मे रहल छथि। वैदिक धर्म आ ब्राह्मणवादी परम्पराक प्रभाव मिथिलामे गहिर रहल अछि, जे मण्डन मिश्र आ याज्ञवल्क्य जकाँ विद्वानक लेखन आ दर्शनमे देखल जाइत अछि।
ब्राह्मणवाद, जे जातिगत श्रेणी आ धार्मिक कर्मकांड पर आधारित विचारधारा अछि, मिथिलामे सामाजिक संरचनाक आधार बनल। पंजी प्रबन्ध (मैथिल ब्राह्मणक वंशावली राखबाक पर-परम्परा) जकाँ प्रथासब मैथिल ब्राह्मणक सामाजिक प्रभावकें मजबूत करैत अछि, जे किछु विद्वानसभ एकटा सामाजिक नियंत्रणक साधनक रूपमे देखैत छथि।
ऐतिहासिक रूपसँ, ब्राह्मणवादी प्रभाव ब्रिटिश औपनिवेशिक कालमे आओर बढ़ल, जब ब्राह्मणसभ ब्रिटिश प्रशासनक सलाहकार बनल आ हिन्दू धर्मक व्याख्यामे ब्राह्मणवादी ग्रन्थसबके उपयोग भेल। ई मिथिलामे आओर स्पष्ट छल, जतय मैथिल ब्राह्मणसभक बौद्धिक आ सामाजिक प्रभुत्व स्थापित भेल।
●सामाजिक गतिशीलता:- मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभावक सामाजिक गतिशीलता निम्नलिखित बिन्दुसबमे देखल जा सकैत अछि:-
●जातिगत संरचना:- मिथिलामे जाति व्यवस्था गहिर जड़ जमायल अछि, जाहिमे मैथिल ब्राह्मण शीर्ष पर छथि। ई संरचना सामाजिक, आर्थिक, आ राजनीतिक शक्तिकें सीमित करैत अछि, जाहिसँ गैर-ब्राह्मण समुदाय, विशेष रूपसँ दलित आ पिछड़ल वर्ग, हाशियापर रहैत छथि। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, जे जाति आ लिंगक आधार पर भेदभावकें बढ़ावा दैत अछि, मिथिलामे महिलाक स्थितिकें आओर जटिल बनबैत अछि।
●सांस्कृतिक प्रभुत्व:- मैथिल ब्राह्मणसभ मिथिला कला, साहित्य, आ सांस्कृतिक परम्परासबमे महत्वपूर्ण भूमिका निभबैत छथि। मैथिलीभाषा आ साहित्य, जे क्षेत्रक पहचान छी, मे ब्राह्मणवादी मूल्यसबक प्रभाव देखल जाइत अछि। उदाहरण लेल, मिथिलाक पौराणिके कथासब आ साहित्य, जेना सीता-रामक कथा, मे ब्राह्मणवादी नैतिकता आ आदर्शक प्रचार भेटैत अछि।
●आर्थिक नियंत्रण:- मिथिलामे जमींदारी व्यवस्था, जे ब्राह्मण आ उच्च जातिक नियंत्रणमे छल, सामाजिक असमानताकें बढ़ा देलक। ऐतिहासिक रूपसँ, मैथिल ब्राह्मण जमींदार छलथि, जे क्षेत्रक आर्थिक संसाधन पर नियंत्रण राखैत छलथि।
●राजनीतिक प्रभाव:- 1960-70 क दशकमे मिथिलामे मैथिल ब्राह्मणसभ राजनीतिक रूपसँ प्रभावशाली बनल। हिंदुत्व आ ब्राह्मणवादी राष्ट्रवादक उदयसँ, मिथिलामे गैर-ब्राह्मण समुदायसभक आवाजकें दबा देल गेल। ● आलोचनात्मक विश्लेषण:-
ब्राह्मणवादी प्रभावक आलोचना निम्नलिखित आधार पर कायल जा सकैत अछि:-
●सामाजिक असमानता: ब्राह्मणवाद मिथिलामे सामाजिक असमानताकें बनाय राखैत अछि। जातिगत श्रेणी आ पितृसत्ताक आधार पर संसाधन आ अवसरक असमान वितरण गैर-ब्राह्मण समुदायसभक विकासकें रोकैत अछि। उदाहरण लेल, दलित आ ओबीसी समुदायसभक शिक्षा आ रोजगारमे पहुँच सीमित रहैत अछि।
●सांस्कृतिक एकरूपता:- ब्राह्मणवादी प्रभाव मिथिलाक सांस्कृतिक विविधता कें सीमित करैत अछि। गैर-ब्राह्मण परम्परासब, जेना लोककला आ धार्मिक विश्वास, कें हाशियापर धकेल देल जाइत अछि। ई क्षेत्रक समावेशी सांस्कृतिक पहचानकें कमजोर करैत अछि।
●पितृसत्ताक सुदृढ़ीकरण:- ब्राह्मणवादी पितृसत्ता मिथिलामे लिंग आधारित भेदभावकें बढ़ावा दैत अछि। महिलासभकें सामाजिक आ आर्थिक रूपसँ हाशियापर राखल जाइत अछि, आ एकर प्रभाव विशेष रूपसँ निम्न जातिक महिलासभ पर पड़ैत अछि।
●आधुनिक समयमे प्रासंगिकता:- आधुनिक समयमे, शिक्षा आ वैश्वीकरणसँ मिथिलामे सामाजिक चेतना बढ़ल अछि, आ ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ आवाज उठैत अछि। दलित-बहुजन आंदोलन, जे आंबेडकरक विचारधारासँ प्रेरित अछि, ब्राह्मणवादक खिलाफ समतामूलक समाजक वकालत करैत अछि। मुदा, हिंदुत्वक उदयसँ ब्राह्मणवादी प्रभाव नव रूपमे मजबूत भेल अछि। ●विरोधी स्वर आ समाधान
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ किछु उल्लेखनीय विरोधी स्वर सामने आयल अछि। आंबेडकरवादी विचारधारा, जे जाति आ वर्गविहीन समाजक पक्षधर अछि, मिथिलामे दलित-बहुजनक बीच लोकप्रिय भेल अछि। मिथिलाक सामाजिक कार्यकर्ता आ बुद्धिजीवी, जे गैर-ब्राह्मण समुदायसँ आबैत छथि, क्षेत्रक सांस्कृतिक आ सामाजिक संरचनामे परिवर्तनक मांग करैत छथि।
समाधानक रूपमे, निम्नलिखित कदम उपयोगी भ सकैत अछि:-
●शिक्षा आ जागरूकता:- सामाजिक समानता आ समावेशिता पर आधारित शिक्षा प्रणाली ब्राह्मणवादी प्रभाव कें कम करि सकैत अछि।
●सांस्कृतिक पुनर्जन्म:- गैर-ब्राह्मण परम्परासभ कें प्रोत्साहन देबाक द्वारा मिथिलाक सांस्कृतिक विविधताकें पुनर्जन्म कायल जा सकैत अछि।
●राजनीतिक सशक्तिकरण:- गैर-ब्राह्मण समुदायसभक राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ेबाकद्वारा सामाजिक शक्ति संतुलन कायम कायल जा सकैत अछि।
●निष्कर्ष:- मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव एक ऐतिहासिक आ सामाजिक वास्तविकता अछि, जे क्षेत्रक सामाजिक संरचना, संस्कृति, आ शक्ति संतुलन कें गहिर प्रभावित करैत अछि। एकर सकारात्मक पहलू, जेना बौद्धिक परम्परा आ सांस्कृतिक योगदान, के साथ-साथ एकर नकारात्मक प्रभाव, जेना सामाजिक असमानता आ सांस्कृतिक एकरूपता, कें मान्यता देब जरूरी अछि। आधुनिक समयमे, मिथिलामे सामाजिक परिवर्तनक लेल ब्राह्मणवादी प्रभावक आलोचनात्मक जाँच आ समावेशी समाजक निर्माण जरूरी अछि।
खंड-दू
अहि खंडमे मिथिलामे ब्राहमणवादक विशिष्ट उदाहरण, साहित्यिक विश्लेषण, वा समकालीन घटनाक आधार पर आलोचना कएल गेल अछि ।
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभावक आलोचनात्मक विश्लेषणक लेल विशिष्ट उदाहरण, साहित्यिक कृति, आ समकालीन घटनासबके आधार पर निम्नलिखित बिन्दु प्रस्तुत कायल गेल अछि:
● विशिष्ट उदाहरण:-
●पंजी प्रबन्ध:- मिथिलामे मैथिल ब्राह्मणसभक पंजी प्रबन्ध (वंशावली राखबाक प्रथा) ब्राह्मणवादी प्रभावक एकटा ठोस उदाहरण अछि। ई प्रथा केवल वंशावलीक रिकॉर्ड नहि, बल्कि सामाजिक नियंत्रणक साधनक रूपमे काम करैत अछि। पंजी प्रबन्धक आधार पर विवाह, सामाजिक स्थिति, आ जातिगत शुद्धताक निर्धारण होइत अछि, जे गैर-ब्राह्मण समुदायसभक हाशियापर धकेलैत अछि। ई प्रथा ब्राह्मणवादी श्रेष्ठताक भावकें बनाय राखैत अछि आ सामाजिक गतिशीलताकें सीमित करैत अछि। मधुबनी चित्रकला: मिथिलाक प्रसिद्ध मधुबनी चित्रकला, जे विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त अछि, मे ब्राह्मणवादी प्रभाव स्पष्ट अछि। प्रारम्भमे, ई कला मुख्यतः ब्राह्मण आ कायस्थ महिलासभद्वारा बनायल जाइत छल, आ एकर विषयवस्तु (जेना- रामायण, महाभारत, आ वैदिक प्रतीक) मे ब्राह्मणवादी मूल्यसबके प्रभुत्व रहल अछि। गैर-ब्राह्मण समुदायसभक लोककथा वा परम्परासबकें कम महत्व देल गेल। ●साहित्यिक विश्लेषण:- मिथिलाक साहित्य, विशेष रूपसँ मैथिली आ हिन्दी साहित्य, मे ब्राह्मणवादी प्रभावक विश्लेषण निम्नलिखित कृतिसबके माध्यमसँ कायल जा सकैत अछि:-
●विद्यापति (14वीं-15वीं शताब्दी):- मिथिलाक महान कवि विद्यापति, जे मिथिली साहित्यक आधारस्तम्भ छथि, अपन रचनासबमे ब्राह्मणवादी मूल्यसबक प्रचार करैत छथि। ओकर पदावली, जे राधा-कृष्णक प्रेमक गीत अछि, वैष्णव भक्ति आ ब्राह्मणवादी दर्शनसँ प्रेरित अछि। विद्यापतिक रचनासबमे सामंती संरचना आ ब्राह्मणवादी नैतिकताक समर्थन देखल जाइत अछि, जाहिमे निम्न वर्गक चित्रण प्रायः अनुपस्थित रहैत अछि। आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी अपन पुस्तक हिन्दी आलोचनामे विद्यापतिक रचनासबकें ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक प्रभुत्वक उदाहरणक रूपमे देखैत छथि, जाहिमे लोकजीवनक तुलनामे वैदिक आदर्शसबकें प्राथमिकता देल गेल अछि।
●नागार्जुनक मैथिली कविता :-आधुनिक मैथिली कवि नागार्जुन (1911-1998) अपन रचनासबमे ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ तीखा आलोचना कयलथि। हुनकर कविता हरिजन गाथामे मिथिलाक दलित समुदायक शोषण आ ब्राह्मणवादी व्यवस्थाकद्वारा ओकर हाशियाकरणकें चित्रित कायल गेल अछि। नागार्जुनक मार्क्सवादी दृष्टिकोण मिथिलाक सामंती आ ब्राह्मणवादी संरचनाक खिलाफ एकटा वैकल्पिक आवाज प्रदान करैत अछि। आलोचक रामविलास शर्मा अपन लेखनमे नागार्जुनक रचनासबकें मिथिलामे वर्ग-संघर्षक साहित्यिक अभिव्यक्तिक रूपमे देखैत छथि।
●मन्नू भंडारीक महाभोज: यद्यपि मन्नू भंडारी मिथिलाक नहि छथि, तथापि ओकर उपन्यास महाभोज (1979) मिथिलाक सामाजिक संरचनाक आलोचनाक लेल प्रासंगिक अछि। ई उपन्यास ग्रामीण भारतमे जातिगत शोषण आ ब्राह्मणवादी राजनीतिक प्रभावकें उजागर करैत अछि। मिथिलाक सन्दर्भमे, महाभोज 'उच्च जातिक (मुख्यतः ब्राह्मण) ' मुखियासभद्वारा निम्न जातिक समुदायसभक शोषणक चित्रण मिथिलाक समकालीन सामाजिक वास्तविकताक संग मेल खाइत अछि। उपन्यासक भाषा आ चरित्र-चित्रण मिथिलाक सामंती संरचनाक आलोचनाकें और गहिर बनबैत अछि।
●समकालीन घटनासभक आधार पर आलोचना
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव समकालीन समयमे विभिन्न सामाजिक आ राजनीतिक घटनासबमे देखल जा सकैत अछि:
●जातिगत हिंसा (2023-2024):- मिथिलाक दरभंगा आ मधुबनी क्षेत्रसबमे हालक वर्षसबमे दलित आ ओबीसी समुदायसभ पर हमलाक खबर सामने आयल अछि, जे प्रायः उच्च जातिक (मुख्यतः ब्राह्मण आ राजपूत) जमींदारसभसँ जुड़ल रहल अछि। उदाहरण लेल, 2023 मे मधुबनीमे एकटा दलित बस्तीमे आगजनीक घटना, जे कथित रूपसँ जमीन विवादसँ जुड़ल छल, ब्राह्मणवादी आर्थिक प्रभुत्वक परिणामक रूपमे देखल गेल। ई घटना सामंती संरचना आ ब्राह्मणवादी शक्तिकें बनाय राखबाक प्रवृत्ति कें दर्शबैत अछि।
●हिंदुत्वक उदय:- मिथिलामे हिंदुत्वक बढ़ैत प्रभाव ब्राह्मणवादी मूल्यसबकें नव रूपमे मजबूत करैत अछि। 2024 मे अयोध्यामे राम मंदिरक उद्घाटनक बाद मिथिलामे धार्मिक उत्सवसबमे ब्राह्मणवादी प्रतीकसब (जेना- राम-सीता आ वैदिक कर्मकांड) कें प्राथमिकता देल गेल। ई प्रवृत्ति गैर-ब्राह्मण समुदायसभक सांस्कृतिक पहचानकें हाशियापर धकेलैत अछि। उदाहरण लेल, मिथिलाक लोक परम्परासब, जेना साल्हेस पूजा (दलित समुदायक बीच लोकप्रिय), कें कम महत्व देल गेल।
●शिक्षा आ रोजगारमे असमानता:- मिथिलाक विश्वविद्यालयसब, जेना ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, मे ब्राह्मण आ उच्च जातिक प्राध्यापकसभक प्रभुत्व देखल जाइत अछि। 2024 मे एकटा सर्वेक्षणमे पाएल गेल जे मिथिलाक उच्च शिक्षण संस्थानसबमे दलित आ ओबीसी समुदायसभक प्रतिनिधित्व मात्र 15% अछि, जखन कि ब्राह्मण आ कायस्थ 60% सँ बेसी अछि। ई असमानता ब्राह्मणवादी प्रभावक एकटा समकालीन उदाहरण अछि, जे सामाजिक गतिशीलताकें रोकैत अछि।
●आलोचनात्मक दृष्टिकोण:-
●सामाजिक असमानता:- उपरोक्त उदाहरणसब (पंजी प्रबन्ध, जातिगत हिंसा, शिक्षा असमानता) ब्राह्मणवादी प्रभावकद्वारा सामाजिक असमानताकें बनाय राखबाक प्रवृत्तिकें दर्शबैत अछि। मार्क्सवादी आलोचक, जेना रामविलास शर्मा, मिथिलाक सामंती संरचनाकें वर्ग-संघर्षक परिणामक रूपमे देखैत छथि, जाहिमे ब्राह्मणवादी विचारधारा शोषणकें वैध ठहरबैत अछि।
●सांस्कृतिक एकरूपता:- मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परासब, जेना मधुबनी चित्रकला आ विद्यापतिक रचनासब, मे ब्राह्मणवादी प्रभाव गैर-ब्राह्मण समुदायसभक सांस्कृतिक योगदानकें हाशियापर धकेलैत अछि। समकालीन घटनासब- हिंदुत्वक प्रचार, ई एकरूपताकें और बढ़ा दैत अछि, जे मिथिलाक बहुसांस्कृतिक पहचानकें कमजोर करैत अछि।
●प्रतिरोधक स्वर:- नागार्जुन जेहन साहित्यकार आ मिथिलाक दलित-बहुजन आंदोलन ब्राह्मणवादी प्रभावक खिलाफ प्रतिरोधक स्वर प्रस्तुत करैत अछि। समकालीन समयमे, मिथिलाक सामाजिक कार्यकर्ता, जस्ते कि बिहारक दलित नेता जीतन राम मांझी, ब्राह्मणवादी शक्ति संरचनाक खिलाफ समतामूलक समाजक वकालत करैत छथि।
● निष्कर्ष:-
मिथिलामे ब्राह्मणवादी प्रभाव ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आ समकालीन स्तर पर सामाजिक संरचनाकें प्रभावित करैत अछि। पंजी प्रबन्ध आ मधुबनी चित्रकला जस्ता उदाहरण, विद्यापति आ नागार्जुनक साहित्यिक कृतिसब, आ समकालीन घटनासब (जेना- जातिगत हिंसा आ हिंदुत्वक उदय) ई दर्शबैत अछि कि ब्राह्मणवादी विचारधारा सामाजिक असमानता आ सांस्कृतिक एकरूपताकें बढ़ावा दैत अछि। मुदा, नागार्जुन जस्ता साहित्यकार आ दलित-बहुजन आंदोलनसभक प्रतिरोध ई संकेत दैत अछि कि मिथिलामे परिवर्तनक सम्भावना अछि। समावेशी शिक्षा, सांस्कृतिक विविधताक प्रोत्साहन, आ गैर-ब्राह्मण समुदायसभक राजनीतिक सशक्तिकरण द्वारा ब्राह्मणवादी प्रभाव कें कम कायल जा सकैत अछि। नोट: शोध पर आधारित ई आलेख हमर नितान्त व्यक्तिगत विचार प्रस्तुति थिक ।
सन्दर्भ सामग्री :
1.forwardpress.in ,
2.hi.wikipedia.org
3.doubtnut.com
4.egyankosh.ac.in
5.mediavigil.com
6.drishiias.com
7.brainly.in
8.textbook.com
9.maithilmanch.in
10.etvbharat.com
11.tv9hindi.com
12.navbharattimes.indiatimes.com

Saturday, 19 April 2025

मैथिली भाषाके हुर्मत् !

मैथिली भाषाके हुर्मत् कोना होइछ या कएल जाइछ, से जनितब रखबाक किनको इच्छा जौ अछि त, निचा देलगेल गोरखापत्रके दूटा नमुना अंकसँ देखबाक विनम्र आग्रह अछि । कथित मानक मैथिलीबलासभ आब मैथिलीके नामपर गिरहताइपना सेहो आरम्भ कएलक अछि तकर पुष्टि सेहो ई सामग्री निक जँका करैछ । फगुवा आ जुडशितलके दिन प्रकाशित ई दूटा अंक उदाहरण मात्र थिक । आश्चर्यके बात अछि अहि पर आजूधरि किनको टिप्पणी पढबाक अवसर नहि भेटल अछि ! गोरखापत्रकें मैथिली भाषाके पृष्ट संयोजक बेनाथल बरद कोनाके बनल अछि तकरो विपुल दृष्टिगोचर करबामे ई अंक सफल भेल बुझाइछ ! 'अपन गाडि, अपन लगाम, अपन गरदामि, अपन घूघुर 'तर्जपर भेल अहि तरहे कूकृत्यके जिमेवार के ??

Saturday, 12 April 2025

'मिथिला' बनाम 'लोकमैथिली भाषी क्षेत्र' !

दिनेश यादव
अखन 'मिथिला' नय 'प्राचीन मिथिला'शब्दावलीक प्रयोग उचित अछि । आब उपयुक्त शब्दावली त 'लोकमैथिली भाषी क्षेत्र' होबाक चाहि । किएक त,'मिथिला' आब रहिए नै गेलछ! वर्तमान सीमा,भूगोल आ सरकारी दस्तावेज सबमे सेहो 'मिथिला' नै भेटैत छैक...एही विषयपर हमर एकटा विश्लेषणात्मक आलेख-
परिचय:
‘मिथिला’शब्द 'लोकमैथिली भाषी क्षेत्रक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक आ साहित्यिक परिदृश्यमें गहन महत्व राखैछ । प्राचीन काल में 'मिथिला' एक समृद्ध राज्य छल, जे विदेह, तीरभुक्ति या तिरहुत नामसँ सेहो जानल जाइत छल । एकर सांस्कृतिक आ बौद्धिक परंपरा, विशेष रूप सँ लोकमैथिली भाषा आ साहित्य, आजुक दिन धरि जीवित छै। मुदा प्रश्न उठैछ जे की आधुनिक संदर्भमें ‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग उचित छै, या फेर ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्दावली बेशी उपयुक्त होयत ? एकर कारण छै जे वर्तमान भौगोलिक, प्रशासनिक आ सरकारी दस्तावेजसबमें ‘मिथिला’नामक कोनो स्वतंत्र इकाई नै भेटैछ । नेपालक मधेश प्रदेशमे 'मिथिला' शब्द जोडिके 'मिथिला बिहारी पालिका जरूर बनल अछि । मुदा स्वतन्त्र अस्तित्वमे 'मिथिला' मात्र नय बनि सकल । ई बाहेक 'मिथिला'सँ जुडल आधिकारिक नाम वर्तमान संदर्भमें कतौहू उल्लेख कयल नय भेटैक छैक । हाँ, किछु लोकसभ जबर्दस्ती 'मिथिला' लिखि आ बोलि रहल छैथ । विषेष:ब्राह्मणवादी मानसिकता रहल लोकसभ एही शब्दक प्रयोग बलजोरि करि एकर प्रचार-प्रसारमें अपन छठिहारक दूध पीबिक करि रहल छैथ !
प्राचीन मिथिला: ऐतिहासिक संदर्भ :
प्राचीन मिथिला एक शक्तिशाली राज्य छल, जकर उल्लेख शतपथ ब्राह्मण, वाल्मीकीय रामायण, महाभारत, पुराण आ जैन-बौद्ध ग्रंथसबमें भेटैछ। ओ मिथिला, जे विदेह राजाक राजधानी छल, बौद्धिक आ सांस्कृतिक केंद्रक रूपमें विख्यात छल। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार, मिथिला नदीक बहुलताक कारण दलदली भूमि छल, जे अग्निदेवक आशीर्वाद सँ रहबा योग्य बनल । वृहद्विष्णु पुराणमें मिथिला-माहात्म्य खंड मिथिलाक पवित्रता आ सीताक जन्मभूमिक रूपमें एकर महिमा वर्णन भेटैक छैक । मुदा ई सबटा के आधार अवैज्ञानिक मात्र अछि ।
जहाधरि सीमाक बात अछि- प्राचीन मिथिलाक भौगोलिक सीमा विशाल छल। एकर पश्चिममें गंडकी, पूबमें महानंदा, दक्षिणमें गंगा आ उत्तरमें हिमालयक तलहटी(नेपालक वर्तमानमधेश प्रदेश आ कोशी प्रदेश किछु भूभाग) तक विस्तार छल। ई क्षेत्र वर्तमान बिहारक उत्तरी हिस्सा, नेपालक मधेश आ झारखंडक संथाल परगना तक फैलल छल । मुदा, मध्यकालसँ मिथिलाक राजनीतिक इकाईक रूप धीरे-धीरे लुप्त भ’ गेल, आ तिरहुत सरकारक रूपमें एकर उल्लेख आयनी-अकबरी में भेटैछ।
वर्तमान संदर्भ: मिथिला कत’ गेल ?
आजुक दिनमें ‘मिथिला’ कुनो प्रशासनिक या सरकारी इकाईक रूपमें अस्तित्वमें नय छै। पडोसी देश भारतक संविधान, भौगोलिक मानचित्र, या सरकारी दस्तावेजसब में ‘मिथिला’ नामक कुनो जिला, प्रखंड या राज्यक उल्लेख नहिं भेटैछ । नेपालमे त छहिए नय । बिहार में तिरहुत, दरभंगा, कोसी, पूर्णिया आ मुंगेर जकाँ प्रमंडल भौगोलिक रूपसँ मिथिलाक पुरान सीमासँ मेल खाइछ, मुदा प्रशासनिक रूपसँ एहि सबहक अलग-अलग पहचान छै। उदाहरणक लेल, बिहारक जिला जकाँ दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल, सहरसा आ मधेपुरा मैथिली भाषी क्षेत्रक प्रमुख हिस्सा छै, मुदा सरकारी दस्तावेजमें एहि सबकें मिथिला नय, बल्कि अलग-अलग जिला कहल जाइछ।
पहिने ही उल्लेख कए चुकल छी जे, नेपालमें सेहो मधेश आ कोशी प्रदेशक तराई क्षेत्र मैथिली भाषी छै, मुदा एकर प्रशासनिक नामकरण मिथिलासँ संबंधित नय छै। भारतक 2011 जनगणनाक आधार पर, मैथिली भाषी जनसंख्या बिहारक उत्तरी हिस्सा आ नेपालक मधेशमें केंद्रित छै, मुदा ‘मिथिला’ नामक कुनो आधिकारिक क्षेत्र नय भेटैछ।
‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’क उपयुक्तता:
‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्दावली वर्तमान संदर्भमें बेशी उपयुक्त प्रतीत होइछ, किएक त ई मैथिली भाषा आ एकर बोलनिहार समुदायक सांस्कृतिक एकता पर जोर दैछ, बिना कुनो लुप्त राजनीतिक या भौगोलिक इकाईक दावा करबाक । मैथिली, जे भारतीय संविधानक आठवीं अनुसूचीमें शामिल छै, बिहारक लगभग 12% आ नेपालक मधेशक एक बृहद हिस्साक मातृभाषा छै। ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्द एकर सांस्कृतिक पहचानकें जीवित राखैछ, जेना जे विद्यापति, मिथिलाक्षर (तिरहुता) लिपि, आ मिथिला चित्रकला जकाँ परंपरासब।
उदाहरण - मिथिला चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग) आजू विश्वविख्यात छै, आ एकर पहचान मधुबनी जिलासँ जुड़ल छै,नय कि कुनो ‘मिथिला’ नामक प्रशासनिक क्षेत्रसँ । ताहि तरहें, मैथिली साहित्यक संरक्षण आ प्रचार मिथिलाक्षर लिपि आ साहित्यिक संस्था जकाँ विद्यापति सेवा संस्थानक माध्यमसँ भ’ रहल छै, जे क्षेत्र विशेषक बजाय महाकवि, भाषा आ संस्कृति पर केंद्रित छै।
‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग: पक्ष आ विपक्षमें तर्क:
सांस्कृतिक निरंतरता: मिथिला शब्द सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक गौरवकें प्रतिबिंबित करैछ । मिथिलाक बौद्धिक परंपरा, जेना जे याज्ञवल्क्य, गार्गी, आ विद्यापति, आजू सेहो प्रासंगिक छै।
लोकमानसमें स्वीकार्यता: सामान्य लोक मिथिलाकें सीताक जन्मभूमि आ मैथिली संस्कृतिक प्रतीकक रूपमें देखैछ।
प्रतीकात्मक महत्व: मिथिला शब्द एकर साहित्य, कला, आ दर्शनक समृद्धिक प्रतीक छै, जे क्षेत्रीय सीमासँ परे छै।
विपक्षमें तर्क:
प्रशासनिक असंगति: आधुनिक भूगोल आ सरकारी दस्तावेज सबमें मिथिला कुनो स्वतंत्र इकाई नय छै। एकर प्रयोग भ्रम पैदा करैछ, जेना जे मिथिलाकें एक अलग राज्यक मांग सँ जोड़ल जाइछ।
सीमित भौगोलिक प्रासंगिकता: मिथिलाक प्राचीन सीमा आधुनिक जिला-प्रमंडलसँ मेल नय खाइछ। उदाहरण, कोसी प्रमंडलक किछु हिस्सा मिथिलाक अंतर्गत गनल जाइछ, मुदा एकर संस्कृति अंगिका या अन्य प्रभाव सँ सेहो जुड़ल छै। गण्डक क्षेत्र बज्जिका आ भोजपुरी या अन्यसँ जुडल छै ।
लोकमैथिली भाषी क्षेत्रक समावेशिता: ई शब्द मैथिली बोलनिहारसभकें एकजुट करैछ, चाहे ओ बिहार, नेपाल, या अन्यत्र रहै। ई शब्द मिथिलाक ऐतिहासिक बोझसँ मुक्त छै।
उपयुक्त शब्दावली कोन छै?
‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक संदर्भ में उचित छै, जखन कि प्रश्न एकर गौरवमय अतीत, साहित्य, या धार्मिक महत्वसँ संबंधित हो। मुदा, जखन बात आधुनिक भौगोलिक, सामाजिक, या प्रशासनिक परिदृश्यक होइछ, त ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ बेशी उपयुक्त छै। कारण:
समकालीन प्रासंगिकता: ई शब्द मैथिली भाषी समुदायकें समेटैछ, बिना कुनो भौगोलिक या राजनीतिक दावाके ।
स्पष्टता: सरकारी दस्तावेज आ जनगणनाक आधार पर मैथिली भाषी क्षेत्रक पहचान साफ छै, जखन कि मिथिला शब्दक भौगोलिक सीमा अस्पष्ट छै।
समावेशिता: ई शब्द बिहार, नेपाल, आ अन्य क्षेत्रक मैथिली भाषीसभकें एक मंच दैछ।
उदाहरण: जखन मिथिला चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग)क बात होइछ, त ‘मिथिला’ शब्द सांस्कृतिक रूपसँ प्रासंगिक छै, मुदा एकर उत्पादन आ प्रचार मधुबनी, दरभंगा, या अन्य जिलासँ जुड़ल छै नय कि कुनो एकीकृत ‘मिथिला’ क्षेत्रसँ।
मैथिली साहित्यक संदर्भ में, विद्यापति सेवा संस्थान या मिथिलाक्षर लिपिक प्रयास ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’क अवधारणाकें मजबूत करैछ, जे बिहार आ नेपालक सीमा पार करैछ।
बिहारक शिक्षा विभागक 2024क एक दस्तावेजक अनुसार, मैथिली भाषाक पठन-पाठन बिहारक उत्तरी जिला - दरभंगा, मधुबनी, आ सुपौल में होइछ, मुदा एकर लेल ‘मिथिला’ शब्दक बजाय ‘मैथिली भाषी क्षेत्र’क उल्लेख भेटैछ।
निष्कर्ष
‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक संदर्भमें अपन गहन महत्व राखैछ, मुदा आधुनिक भौगोलिक आ प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’ शब्दावली बेशी उपयुक्त छै। ई शब्द नय केवल मैथिली भाषा आ संस्कृतिक जीवंतता कें प्रतिबिंबित करैछ, बल्कि आधुनिक सीमा आ सरकारी दस्तावेजसबसँ सेहो मेल खाइछ। मिथिलाक प्राचीन गौरवकें संजोय राखल जरूरी छै, मुदा एकर वर्तमान पहचान ‘लोकमैथिली भाषी क्षेत्र’क रूपमें बेशी स्पष्ट आ समावेशी छै।
संदर्भ :
शतपथ ब्राह्मण आ वृहद्विष्णु पुराण, मिथिलाक ऐतिहासिक विवरण।
भारतीय संविधान, आठवीं अनुसूची।
विद्यापति सेवा संस्थान आ मिथिलाक्षर लिपि, मैथिली साहित्यक संरक्षण।
बिहार आ नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्रक जनगणना आ भौगोलिक विवरण।
सामाजिक मंच पर मिथिलाक सांस्कृतिक उल्लेख।
मधेश प्रदेशक दस्तावेज । (नोट: ई हमर नितान्त निजी विचार अछि)

Thursday, 10 April 2025

महावीरका सिद्धान्तहरु आर्थिक, सामाजिक र नैतिक सुधारका मार्गदर्शन हुन् : उपराष्ट्रपति यादव

काठमाडौं– सम्माननीय उपराष्ट्रपति रामसहाय प्रसाद यादवज्यूले जैन धर्मका २४औं तीर्थंकर महावीरका अहिंसा, सत्य, करुणा, समानता, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य र अनेकान्तवादजस्ता सिद्धान्तहरू देश र समाजका लागि आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक सुधारका मार्गदर्शन रहेको बताउनुभएको छ ।
उपराष्ट्रपति यादवले महावीरको २६२४औं जन्मजयन्ती (जन्म कल्याणक दिवस) को अवसरमा नेपाल जैन परिषद्ले काठमाडौं कमलपोखरीस्थित जैन निकेतनमा बिहीबार आयोजना गरेको विशेष समारोहमा उक्त कुरा बताउनुभएको हो ।
महावीरका सिद्धान्तहरु सिंगो मानव जीवनका विविध पक्षलाई समृद्ध बनाउने मार्गदर्शनका रूपमा रहेको उल्लेख गर्दै उहाँले भन्नुभयो, ‘ महावीर जन्मजयन्तीले सामाजिक एकता, धार्मिक सहिष्णुता र सांस्कृतिक मूल्यहरूलाई सुदृढ बनाउने अवसर प्रदान गरेको छ । ’ नेपाल जैन परिषद्ले भगवान महावीरका सिद्धान्तहरूलाई सम्पूर्ण समाजमा फैलाउन गरेको योगदानको प्रशंसा गर्दै उपराष्ट्रपति यादवले देश र समाजलाई थप शान्तिपूर्ण, सम्पन्न र समृद्ध बनाउने प्रेरणा प्रदान गर्न महावीरका विचारहरूको महत्वलाई उजागर गर्नुभयो ।
‘मानव जीवनका लागि अपरिहार्य ‘पञ्चशील’ सिद्धान्तका प्रतिपादक भगवान महावीरको जीवनले हामीलाई अहिंसा, सत्य, करुणा र समानताको संदेश दिन्छ । सामाजिक एकता, धार्मिक सहिष्णुता र सांस्कृतिक मूल्यहरुलाई थप सवल, सुदृद्ध र बलियो बनाउने अवसर पनि प्रदान गर्दछ ’ उहाँले भन्नुभयो, ‘महावीरले देखाउनुभएको सत्मार्ग, कर्ममार्ग र नैतिकमार्गमा हिड्न हामीलाई अभिप्रेरित गर्दै मानव जीवनमा शान्ति, सद्भाव र मैत्रीभाव प्रसार गर्नमा उत्तिकै सहयोग गर्दै आएको छ ।’
जैन धर्मले सहिष्णुता, अहिंसा र भाइचारा प्रदर्शन गर्दै आएको उल्लेख गर्दै उहाँले बहुजातिय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक विशेषतायुक्त, भौगोलिक विविधतामा रहेका समान आकांक्षासहितको विविधतायुक्त नेपाल जस्तो मुलुकमा जैन धर्मका सिद्धान्तहरुले देश र समाजका सबै वर्गहरु बीच सहिष्णुता र सद्भाव कायम गर्न महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गरेको बताउनुभयो । ‘महावीरका विचारहरुलाई आत्मसात गर्दै हाम्रो समाजलाई अझै न्यायपूर्ण, शान्तिपूर्ण र समानताको आधारमा संगठित गर्नका लागि अग्रसरता देखाउनु आजको आवश्यकता हो ’ उहाँले भन्नुभयो, ‘राजनीतिक रुपमा, महावीरले सत्य र नैतिकताको मार्ग अपनाउनमा जोड दिनुभएको छ । उहाँले हामीलाई सच्चा नेतृत्वको पाठ पनि सिकाउँनु भएको छ ।’
उहाँले नेतृत्कर्ताले व्यक्तिगत स्वार्थभन्दा माथि उठेर आमनागरिकको हितमा काम गरेको अवस्थामा मात्र सच्चा नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह गरेको ठहरिने समेत बताउनुभयो । उपराष्ट्रपति यादवले आर्थिक रुपमा, महावीरका ‘अपरिग्रह’ को सिद्धान्तले भौतिक सम्पत्तिको लोभलाई त्यागी सन्तुलित र न्यायपूर्ण आर्थिक प्रणालीको परिकल्पना गर्न सबैलाई प्रेरित गरेको बताउनुभयो । उहाँले भन्नुभयो, ‘ आजको विश्वमा, जहाँ आर्थिक असमानता बढ्दो छ, भगवान महावीरका यो सिद्धान्तले सम्पत्ति वितरणलाई समतामूलक बनाउने दिशामा अग्रसर हुन सक्ने मार्गदर्शन पनि प्रदान गर्दछ ।’
‘नैतिक रुपमा, भगवान महावीरको जीवन र सिद्धान्तले मानव जीवनमा सद्गुण, आत्मानुशासनको महत्वलाई उजागर गरेको छ ’ उहाँले भन्नुभयो, ‘ महावीरका पाँच प्रमुख व्रत/सिद्धान्तहरु– सत्य, अहिंसा, अपरिहग्रह, ब्रह्मचर्य र अनेकान्तवाद– मानव जीवनलाई नैतिक मूल्यमाथि आधारित बनाउने प्रयासहरु हुन् । यी सबैले व्यक्तिगत जीवनदेखि देश र समाजसम्मको समग्र सुधारका लागि मार्गदर्शकमा निहित सिद्धान्तहरु हुन् । हामी सबैले यसलाई अंगिकार गर्दै अघि बढ्न सक्नुपर्दछ ।’
उपराष्ट्रपति यादवले आफ्नो सम्बोधनका क्रममा सम्पूर्ण जैन धर्मावलम्बीहरुलाई हार्दिक शुभकामना व्यक्त गर्दै भगवान महावीरका सिद्धान्तहरुको पालना गर्दै सबै एकजुट भई देश र समाजसंगै सिंगो विश्वमा सकारात्मक परिवर्तन र रुपान्तरण ल्याउने प्रतिबद्धताका साथ अघि बढ्ने प्रण लिन उत्प्रेरित गर्न सकोस् भन्ने कामना गर्नुभयो । समारोहमा जैन धर्मावलम्बीहरू, नेपाल जैन परिषद्का पदाधिकारीहरू तथा विभिन्न क्षेत्रका अतिथिहरूको उपस्थिति रहेको थियो ।
२०८१ चैत २८ गते बिहीबार ।