Thursday, 31 December 2020

मैथिली काव्य साहित्यमे महाकवि विद्यापति आ अन्य काव्यकारक रचना पर हमर धारणा

दिनेश यादव
किछु विद्वानक मत छइन जे महाकवि विद्यापति १४म् शताब्दीके छलाह (राप्रउ पोखरेल,३० असार २०७५, अन्नपूर्ण पोस्ट) । हुनकासँ पहिने जतेक साहित्य लिखाइत छल, सबटा संस्कृतमे । मुदा विद्यापति जनभाषामे काव्य–रचना करबाक पैघ साहस केलैथ । कहल जाइत अइछ जे ओई समयमे हुनका विरोध मात्र नई बहिष्कार सेहो कएने छलाह । तइयो ओ अबहठ (मैथिलीके अपभ्रंश) भाषामे १५ गोट ग्रन्थकृति लिखलैथ । ओ सात सौसँ बेसी पदावली (गीति पद्य) मैथिली भाषामे रचना केलैथ । हुनक सम्पूर्ण पदावलिके शृंगार, भक्ति(भगवान शिव, गंगा, राधाकृष्णके चित्रण) आ व्यवहार पद(विवाह, द्विरागमन, छठिहार, मुन्डन) मे बाटल गेल अइछ ।
विद्यापति पर समाजशास्त्रीय लेखाजोखा नई भेल अईछ । मात्र स्तुतिगानमे केन्द्रित भए हुनका बारेमे लिखल गेल छई ।
आधुनिक युगमे विद्यापतिके वस्तुवादी दृष्टिसँ सेहो गमबाक, देखबाक, सुधि लेबाक आ लिखबाक आवश्यक छै । हुनका बुझबाक लेल आ नव पीढिसभके पढलेल आतुर आ उत्प्रेरित बनेबाक लेल आब शास्त्रिय लेखन मात्र नई आधुनिक लेखनशैलीके औजारसबके उपयोगमे सेहो कर पडत । ओ औजार सब विद्यापति पर लिखल सामग्री सबमे सजीवता प्रदान करैत मैथिली भाषाक चमत्कायर सेहो दर्शनीय बनत । आधुनिक संदर्भमे वैज्ञानिक माक्र्सवादी दृष्टिकोण सेहो एकगोट औजार भ सकैत अइछ ।
कल्पना, मिथ, किवदन्ती आदि इतिहासक अंश भेल, साहित्यमे एकर प्रवेश न्यून होबाक चाहिं । कियैक त इतिहासक घटना सभहक अध्ययन आ पात्र आ परिवेशक मनोरम चित्रण एक बात थिक आ वैज्ञानिक इतिहास दृष्टिसँ निष्कर्ष बहार क समाजकें चेतना बढाब दोसर बात थिक । विद्यापति पर लिखल साहित्य सब देखल जाए त एकैहटा ढर्रा पर चलैत आइब रहल अइछ । हुनक जन्म तिथि , बासस्थान, जाति, पहिरन, संस्कार पर वर्षौसं विवाद रहलैए, आ एहिमे लेखक लोकैन समय वर्वाद कए रहल छैथ, हरेक पोथीमे अई पर अनाहक पुनर्रावृति भ रहल छै । हम कहब–अई पर मतैक्यता नई भ सकैत अईछ त एकरा इतिहासक विषय पर छोइड देल जाए, विद्यापतिके विशुद्ध साहित्यिक विषय बनाओल जाए । एकर अर्थ हुनक ऐतिहासिक पक्षके वहिष्कार कएल जाए से किमार्थ नए, मात्र साहित्यमे अई पक्षके चर्च कम होए । अईसँ कि होएत जे हुनकाबारेमे नव दृष्टिकोण सब पाठकके पढबाक अवसैर भेटतैन ।
विद्यापतिके कुनू ‘बाद’ के स्कूल बनेनाई अनुचित अई । खास ककें विद्यापति स्मृति पर्व वा आन समारोहमे जई तरहे एकैह समुदायके देखल जाइत अइछ, ओ महाकवि विद्यापतिके योगदानक चर्चासंं बेसी अमुक ‘बाद’ के स्कूलक पृष्ठपोषण करैत चाँदी कटाईके माध्ययम बना रहल छैथ । जाहि स्कूलमे महाकवि विद्यापतिके ‘जातिय’ रुप दए रहल छैथ, अईसं जन–जनके इन्ट्रेस्ट घटबे करत ने ?
विद्यापतिके वैष्णव आ शैव भक्तिके सेतुक रुपमे स्वीकार कएल गेल छै । मिथिलाक लोकके ‘देसिल बयना सब जन मिठ्ठा’ के सूत्र दके लोकभाषाके जनचेतनाके जीवित रखबाक पैघ प्रयास केलैथ । मुदा अखन जोडबाक गप्प कम तोडबाक काज बेसी भए रहल अइछ ।
मैथिलीमे सबसँ बेसी पढल आ लिखल आ उच्चारण कएल गेल शब्द थिक विद्यापति । ई पैघ खुशीक गप्प थिक । मुदा काव्यसाहित्यमे हुनकासँ पहिने डाक, अमीर खुसरोसहितके लोक सेहो आएल छल । हुनका सबहक रचना अखनो जन–जनके मुखारविन्दूसँ सुनुवामे अबैत अइछ । परन्च लिखित साहित्यमे कम कियैक ? कि ओसभ अब्राह्मण छला तें ? तहिना मिथिलामे तुलसी दासक चर्चा जतेह भेटलैए ओतेह सूर, कबीर, मीराके कियैक नई ? ई एकगोट यक्ष प्रश्न थिक । हिन्का लोकइनके मैथिली साहित्यमे चर्च कके विद्यापतिक गरिमा घैट जाएत से नई छैक, आओर बढत ।
हमरा बिचारसँ महाकवि विद्यापतिके आन समुदायसं जोडबाक लेल अन्य काव्य वा काव्यकारके ओतबे स्थान भेटबाक चाहि । खास ककें मैथिली बोलीसं मिलैवाला खुसरो काव्य, रासो वा रास काब्य तथा डाक बचन –
१) खुसरोके पाति देखल जाए–
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस । चल खुसरो घर अपन सांझ भई चहुँ देस ।।
२) डाक बचन –
खटहट खटिय, बतकट बोहु ई दुःख बिहि ककरो नहि देहु । साँझ पराती, भोर बसन्त, तकरा दुखक ने कहियो अन्त । (स्रोत :डाक दृष्टि)
३) रासो साहित्यमे युद्धवर्णन –
बज्जिय घोर निसांन रान चौहान चहूँ दिसि । सकल सूर सामन्त समर बल जंत्र मंत्र तिसि । उट्ठि राज प्रथिराज, बाग लग्ग मनहु वीर नर । कढत तेग मन बेग लगत मनहु बीजु झट्ट थट्ट ।
(नोट:अई पाँतिके डिंगल भाषा कहल गेल छै, मुदा मैथिली शैली छै) (स्रोत:रासो काव्य एवं लौकिक साहित्य)
४) महाकवि विद्यापतिक रचना–
देसिल बअना सब जन मिट्ठा ते तैंसन जपओं अवहट्ठा
अन्त्यमे, विद्यापतिके अवहट्ठमे रचना करबाक कारण कि रहैन ? वस्तुत ः राज–दरबारके अभिजात्यके बीच अपभ्रंश भाषा प्रचलन रहै । विद्यापति राजाश्रयमे रचना करैत छला । अतः हुनका विवशतावस दरबारक भाषामे सेहो रचना करै पडलैन । ‘कीर्तिलता’ आ ‘कीर्तिपताका’ हुनक एहा विवशताक प्रतिफल थिक । विद्यापतिक भाषामे लोक–अनुभूति आ लोक–अनुभवक आधार एतेक ने गहिरगर रहैत छल जे ओइसं हुनक अवहट्ड रचना सब सेहो प्रभावित भेल । ओइ अपभ्रंशके विशेषता– जे ओई मे देशभाषाक किछु बेसी प्रभाव रहैक । भाषा साहित्य आ काब्यके उद्देश्य जन–जनके जोबाक होमाक चाहिं । अई दिशि सभगोटेके ध्यान केन्द्रित होए– एहा महाकवि विद्यापतिप्रतिके हमरासभक पैघ श्रद्धा आ सम्मान होएत ।
(अमेरिकामे एन्टाद्वारा २० डिसेम्बर २०२० मे आयोजित ‘अमेरिकामे विद्यापति समारोह –२०२०’ मे राखल गेल हमर धारणा।
)

Friday, 25 December 2020

Tuesday, 22 December 2020

अमेरिकामा विद्यापति !


अमेरिकामा बसोबास गर्ने नेपालका तराईबासीहरुको संस्था ‘एसोसिएसन अफ नेपाल–तरायन इन अमेरिका’ (एन्टा) ले आइतबार वाशिङ्गटन डिसीबाट ‘विद्यापति समारोह अमेरिका–२०२०’ को आयोजना गर्यो । यो भच्र्युअल समारोहका सहभागीहरुले विद्यापतिलाई ‘मिलेनियम’ कवि भएको जनाउंदै मिथिला/मैथिलीमा उनीबाहेकका अन्य काव्यकारलाई पनि उत्तिकै सम्मान दिनु पर्ने औल्याए । उनीहरुले मैथिली भाषामाथि भईरहेको षडयन्त्रप्रति सचेत रहन सबै सरोकारवालाहरुलाई आग्रह समेत गरे ।   

कार्यक्रममा पूर्व प्राज्ञ, साहित्यकार, पत्रकार एवं लेखक #रामभरोस_कापडि भ्रमरले मैथिली साहित्यको शुरुवात ७ औं शताब्दीमा भएको जनाउँदै यसमा महाकवि विद्यापतिको अतूलनीय योगदान रहेको बताए । उनले भने, ‘ अपभ्रंश मैथिली (अवहठ) मा १५ वटा ग्रन्थ लेखेका विद्यापति नेपालमा १२ वर्ष बिताएका थिए ।’

अर्का सहभागी लेखक एवं साहित्यकार #रामनारायण_देवले नेपालमा पहिलो पटक काठमाडौंमा ०२३ मा विद्यापतिलाई स्मरण गर्न उमाकान्त कुँवर, डा.डम्बरनारायण यादव र पण्डित सुन्दर झा ‘शास्त्री’ को अगुवाईमा विद्यापति पर्वको आयोजना गरिएको जनाउँदै त्यसअघि यहाँ विद्यापतिको चर्चासम्म नगरिएको बताए । 

साहित्यकार #डा._राजेन्द्र_विमलले नोवेल पुरस्कार विजेता रविन्द्रनाथ ठाकुरसमेत विद्यापतिबाट प्रभावित रहेको स्मरणगर्दै विद्यापतिलाई ‘मिलेनियम कवि’ को संज्ञा दिए । उनले भने, ‘सन १३८७ यता विश्वमा विद्यापति जस्ता कविको जन्म भएकै छैन ।’

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक #रामरिझन_यादवले एक जना बंगाली लेखकले सन् १८७५ मा विद्यापतिलाई मैथिली कवि भएको भनेपछि बल्ल मिथिलामा उनको चर्चा हुन थालेको बताए । उनले भने, ‘ त्यसअघि विद्यापति बंगाली कवि रहेको मान्यता थियो । त्यसैले विद्यापतिबारे गहन अनुसन्धानको आवश्यकता छ । ’ उनले एउटा छुट्टै प्रसंगमा मैथिलीमाथि षडयन्त्र भईरहेकाले सबै मातृभाषा सचेत रहनु पर्ने औल्याए । 

कार्यक्रममा मैथिली साहित्यकार #देवेन्द्र_मिश्रले विद्यापतिका बारेमा भन्दापनि मैथिली भाषाप्रति आफ्नो चिन्ता व्यक्त गर्दै भने, ‘मैथिली पढ्न र लेख्न नआएको गुनासो धेरै मैथिली भाषीको रहेकाले यसको समाधान मैथिली भाषालाई शिक्षाको माध्यम बनाएर गर्न सकिन्छ ।’ अर्का लेखक एवं साहित्यकार #रोशन_जनकपुरीले विद्यापति रहस्यवादी कवि भएको स्मरण गर्दै पछिल्लो समय उनलाई देवकरण गर्न खोज्नु दुखद रहेको बताए । ‘हरेक पक्षलाई समालोचनात्मक दृष्टिकोणले हेर्नु पर्छ । मैथिलीमा धेरै अन्तरविरोध रहेकाले विभिन्न भाषाबाट यसलाई थ्रेट छ ’ उनले भने, ‘ मैथिलीमा धेरै डाइलेक्ट भएपनि एउटै समुदायको डाईलेक्टमाथि जोड दिनुनै समस्याको मुल कारण हो । ’ 

भच्र्युअल समारोहका अर्का सहभागी मैथिलीका अनुसन्धानकर्ता, साहित्यकार एवं पत्रकार #दिनेश_यादवले १४ औं शताब्दीका महाकवि #विद्यापतिले पहिलो पटक संस्कृत भाषाबाहेक जनभाषामा काव्य रचना गरेको बताए । ‘संस्कृत भाषाबाहेक अन्यमा लेखे विद्वान कहलाउनबाट बञ्चित हुनु पर्ने युगमा विद्यापतिले मैथिलीको अपभ्रंश ‘अवहठ’ भाषामा १५ वटा ग्रन्थकृति लेखेर ठूलै साहस गरेका थिए’, उनले भने, ‘विद्यापतिले सात सय भन्दा बढी पदावली (गीति पद्य) मैथिली भाषामा लेखेका थिए । ती सबैलाई शृंगार, भक्ति र व्यवहार पदमा बाँडिएका छन् । ’

 उनले विद्यापतिलाई कुनै अमुक ‘बाद’ को स्कुल बनाउनु अनुचित भएको बताए । ‘मैथिलीमा सबैभन्दा बढी पढिएको, लेखिएको र उच्चारण गरिएको शब्द हो विद्यापति । यो खुशीको कुरो हो ’ उनले भने, ‘तर #काव्यसाहित्यमा उनी भन्दा पहिलेका #डाक, #घाघ_भड्डरी, #अमीर_खुसरोसहितको चर्चा किन कम भए, जबकी यी श्रष्टाहरुको रचना अहिले पनि जन–जनको मुखारविन्दूमा उत्तिकै लोकप्रिय छन् ।’ उनले मैथिलीमा विद्यापति र तुलसीबाहेक #सूर, #कबीर, #मीरा, #घाघ, डाकलगायतको साहित्य रचना विरलै पाउनु दुखद रहेको बताए । एन्टाका प्रवक्ता #मोहनकुमार_यादवको सक्रियता र संयोजनमा आयोजित कार्यक्रमका अन्य सहभागीहरुमा साहित्यकार #प्रेम_विदेह, पत्रकार #श्यामसुन्दर_यादव, #अर्जूनप्रसाद गुप्ता ‘दर्दिला’ तथा एन्टाका #विजय_सिंह, #रामकृष्ण_साह, #ईन्द्र_साह, #कञ्चन_ठाकुर, #अरबिन्द_कर्णसहित अधिकांश पदाधिकारीहरु थिए ।  

साहित्यकार रामभरोष कापडिको सभापतित्व रहेको कार्यक्रममा वरिष्ठ संगीतकार एवं गायक #गुरुदेव कामत, युवा गायक #सन्तोष सानु र गायिकाहरु #सोनाली_कर्ण, #तनुजा_चौरसिया, #अन्जली_पटेल र #अन्जू_यादवले विद्यापति रचित गीत प्रस्तुत गरेका थिए ।  

1.     https://www.janatasamachar.com/2020/12/232076?fbclid=IwAR3Qe1mtxhdrjNCF8pEF-                        8HejEk- iZS7BS7PmLnnOOM5Uj35_urAsNmXNrQ

2.      http://www.maithilijindabaad.com/?p=15221                                                                

3.      facebook.com/watch/live/?v=132689905198259&ref=watch_permalink 

4.       https://www.facebook.com/111995714006064/videos/132689001865016

5        http://www.majheri.com/node/22819

6.    https://sites.google.com/view/madheshinepaliblogspotcom/home

7.    https://www.youtube.com/watch?fbclid=IwAR0b1wVk0YiGnZNdRfDuYdIuY-                     VeC1TBZSvVjYf3e2CsWhWqTRESxKYwrTU&v=iBqyjG2dr1I&feature=youtu.be

8.    https://farakdhar.com/story/41833/

9.    https://www.pinterest.com/dinesh38_yadav/mithila/

10)     http://kha.bar/news/631932

11) https://www.linkedin.com/posts/dinesh-yadav-29421520_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%AE-%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%9D%E0%A4%A8-%E0%A4%89%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%AE-activity-6748799218565173248-HYd1

पण्डित जी’क तोता (मैथिली व्यंग कविता)

दिनेश यादव 

एकगोट मनुक्खके देखते
पण्डित जी’क तोता
अनाहक कहैछ– ‘धूर मुर्ख !’,
ई सुनिते मनुक्ख आबाक छै,
प्रतिउत्तरक अवस्था गौण छै,
मुदा मनेमन बोली अपन गुनगुनाई छै,
कियैक त ओ मनुक्ख छै ।१।



पिजडामे बन्द तोता
मनुक्खके देखते 
फेर कहैछ– ‘धूर अज्ञानी !’
ई सुनिते मनुक्ख स्तब्ध छै,
अनाहक मथापिच्चीमे डुइब जाई छै, 
तईयो अपनाके सम्हारैत बाट चलैत छै,
कियैक त ओ मनुक्ख छै ।२। 



दोसरके दानापानी पर जीवित तोता
मनुक्खके देखते 
चिच्चियाबैत कहैछ– ‘धूर बौका !’
ई सुनिते मनुक्खक मियाद गरम छै,
मुदा कहूँना–कहूँनाके शान्त छै,
अपन मिसनमे दत्तचित्त छै,
कियैत त ओ मनुक्ख छै ।३।



आनक बोली बोलैवला तोता,
मनुक्खके देखते
हिंहिंआएत कहैछ– ‘धूर नामर्द !’
ई सुनिते मनुक्ख निराश छै ,
मुठीभरि लोकक कुकृत्यसं चिन्तित छै,
मुदा बखारीभरि लोकक मुंह खुजत से विश्वासमे छै,
कियैत त ओ मनुक्ख छै ।४। 



बहसल जाइत छल तोता ,
तब, सिकायत भेल पण्डित जी’सँ,
रामधुलाईमे तोता छै,आब बनल ऊ मौन छै, 
मुदा मनुक्ख ओकरा घुरि–घुरि देखैत छै,
तब हंसैत तोता कहैछ–
‘बौआ, आब बुझनामे आइब गेल हेतौ ,
हम तोता तों मनुक्ख छें’ ।५।



पण्डित जी’क तोता,
साँच्चे, मलिकबासँ कम कहाँ छै,
उलहन पर सेहो महान छै,
‘उल्टे चोर कोतबाल’के डाँटैत छै,
माईर खेलाके बादो अपनाके पैघ मानै छ,
कियैक त ऊ पण्डित जी’क तोता छै, 
तें ऊ ओकरे भाषा बोलै छै ।६।


Friday, 18 December 2020

‘धूर अहा बरद छी’


दोसरेके लेल बहब,

खुट्टामे बानहल रहब,

कुट्टीसानी लेल टुकुर–टुकुर ताकब,

मलिकवाक दाना लेल कच्छर कातब,

डिरिएबाक आदत बनाएब,

तिरपित ओहीमे रहब,

झुठ नई छै शनिश्चराक कहब–

धूर अहा बरद छी ।१।


बधिया त पहिने भ गेल,

बच्छाक जामाना गेल,

साढ बनाबक समय सेहो गेल, 

मर्खाहा बनबाक नई करु झेल,

टाइरमे बहब जमाना गुजैर गेल,

खैर–दाना बिना लार–पुआर खाएब,

झूठ नई छै शुक्राके कहब–

धूर अहा बरद छी ।२।


घेंचमे लागल गरदामी, 

ओईमे लटकल डोरी, 

कहियौ औतैह लागल घुघुर–कौडी,

सिंहमे तेल मालिस तोडी,

अई सिंगारक नई कुनू जोडी,

जोतबालेल तयार रहब,

 झुठ नई छै बृहस्पतियाक कहब–

 धूर अहा बरद छी ।३।


आँखि बन्द कोलमे घुमै,

कहियो झपकैत–झपकैत हर तानै,

सदखनि जुआ आ पालो बहै,

जोतहा जब पुच्छ पकडै,

अरे आह–आह कहैत अइठै

कान फडफराबैत मुडि हिलाएब,

झुठ नई छै बुधनाक कहब–

धूर अहा बरद छी ।४।


कांढिसं इलाजक आदि,

अपना पर मूँहमे जाबी,

दूसराक बालि पर हाबी,

ढोकनासं निकलत बदमासी,

बेसी कसबाकलेल नाथि,

तइयौ जुवाली सहबे करब,

झुठ नई छै मंगालाक कहब–

धूर अहा बरद छी ।५।


लांधी खाली रहत,

पेटके लेल डिरियाबै पडत,

मलिकबा त जोतेबे करत,

दयाभावसँ मलिकाइन पुवार ओगरत,

गोबरकर्सी अपन मर्जीसँ उठाएत,

ठूठ पुच्छ हिला–हिलाके कुकुरमाछी भगाएब 

झूठ नई छै सोमनाके कहब–

धूर अहा बरद छी ।६।


कतबो दौनि घुमब,

तइयो पेनी खाएब,

कहियो गोला कहाएब,

सिलेबिया सेहो कहाएब,

जौ नई बहब, त बुढवा कहाएब,

नियति बनल मालिकके खुश करब,

झुठ नई छै रवियाके कहब–

धूर अहा बरद छी ।७।

( २०७७ पुस ३ )






 








 


 


Tuesday, 15 December 2020

मैथिली पोथी पर तुलनात्मक समालोचना आ विवेचना

 








‘आंजूर’ पत्रिकाको असोज–कात्तिक अंकमा मैथिलीमा पढाई हुने प्राथमिक तहका पाठ्यपुस्तक र पाठ्यसामग्रीबारे प्रकाशित मेरो तुलनात्मक समालोचना र अनुसन्धानमुलक आलेख । नेपालको तथ्यांक अनुसार मैथिली नेपालको दोस्रो सबैभन्दा बढी बोलिने भाषा हो । तर, सीमित व्यक्तिले वर्षौदेखि जारी राखेको सिण्डिकेटको प्रभावले यो भाषा माथि उक्लनै सकेको छैन । यसो हुनुमा ती सिण्डिकेटधारीहरुले कहिले पंचायतकालिन सत्ता त कहिले राजाकालिन सत्ता, अहिले लोकतान्त्रिक राज्यसत्तामाथि दोष थुपारेर उम्कने गरेका छन् । तर, राज्यसत्ताबाट मैथिलीका नाममा सबैभन्दा बढी सुख, सुविधा, पद र अवसर पाउनेमा तिनीहरु नै रहने गर्छन् । सत्तामा पहुँचका भरमा अवसरका खोजीमा रहेका तिनीहरुले गरेका घिनौना कर्तूत् र कल्पनासम्म गर्न नसकिने कुकर्महरुमाथिको पर्दा पछिल्लो समय विस्तारै हट्दै गएको आभास हुन थालेको छ । यो एउटा सकारात्मक पक्ष हो । तर, सबैभन्दा दुखद कुरो त के छ भने ती सिण्डिकेटधारीहरुले मैथिली मातृभाषी बालबालिकाको बालमनोविज्ञानमाथि समेत अन्याय गर्न पछि परेनन् । यसो गर्नुका दुई कारण छन्– एउटा,तिनका बालबालिकाले मैथिली पढ्दैनन्  र दोस्रो, तिनीहरुमा भाषा भन्दा पनि द्रव्य बढी हुनु हो । नत्र यसरी पटक–पटक तिनीहरुले गल्ती नगर्नुपने हो । यहाँ तिनीहरुले कसरी बालमनोविज्ञान र शिक्षण सिकाई क्रियाकलापलाई धज्जी उडाएका छन्, त्यसको ठोस प्रमाणको एउटा अंश यो आलेख पनि बन्न सक्छ । मेरो यो खोजबिन पढेर प्रतिक्रिया दिन विनम्र निवेदन छ । यो आलेख प्रकाशित गरी मैथिली भाषी मात्र होइन, सरोकारवाला सबै पक्ष (सरकारी निकायसहित) को ध्यानाकर्षण गराउन सहयोग गर्नुभएकामा ‘आंजूर’ पत्रिकाका प्रकाशक एवं सम्पादक रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ प्रति कृतग्न र आभारी छु । धन्यवाद ।   

Thursday, 10 December 2020

'पत्रकार न्यायाधिश होइनन’

 ‘रोल मोडेल’ ठानिने पेशाकर्मीबाट भएको घिनलाग्दो यो घटनामा संलग्नमाथि कडा कारवाही हुनुपर्छ भन्नेमा कसैको दुई मत हुनैसक्तैन । तर यहाँ पत्रकार पनि चुकेकै छन् । दमकको समाचारमा पत्रकारिताको इथिक्सलाई पालना गरेको देखिन्छ । यो समाचारमा आरोपित व्यक्ति र उनी कार्यरत स्कूलको नाम उल्लेख नगरिएपनि तिनको अपराध प्रष्टै छ । तर, सिन्धुलीको समाचारमा इथिक्सलाई पूर्ण रुपमा बेवास्ता गर्दै पत्रकार न्यायाधिशको भूमिकामा देखिएका छन् । न्यायालयले अपराधीको अपराधलाई दोषी ठहर गर्ने  हो, दोषी ठहरिएपछि तिनको नाम सार्वजनिक गर्नुपर्ने अन्तर्राष्ट्रिय मान्यता नै छ । ती मान्यतालाई के पत्रकारले पालना गर्नु पर्दैन ? फेरी, प्रहरीले आरोपितलाई पक्राउ गर्दैमा अपराध प्रमाणित हुने होइन । धेरै मामिलामा प्रहरी पक्राउ गरी कयौ दिन हिरासतमा राखेकाहरु अदालतको फैसलबाट आरोपमुक्त हुने गरेका छन् । सिन्धुलीको दुखद घटनामा पत्रकार पूर्वाग्रही देखिएका छन् । गोरखापत्र पनि चुकेको छ । सम्बन्धित सबै पक्षबाट करेक्सनको अपेक्षा छ । 



 (स्रोत:गोरखापत्रमा २०७७ कार्तिक २५ गते पृष्ठ ७ र १३ मा प्रकाशित समाचार)