Friday, 14 August 2020

ओली की कडवी बोली

दिनेश यादव 

कोरोना भाइरस और लकडान से नेपाली जनजीवन ही नही विश्व आक्रान्त हैं । लोग भूखे और उपचार के अभाव मे मर रहे हैं । बेरोजगारी उत्कर्ष पर है, उद्योग–व्यावसाय चौपट सी हैं । विश्व के सरकारें स्थिति सामान्य बनाने के प्रयास मे लगा है । संक्रमितों की संख्या दिनप्रति दिन बढ्ने के कारण ‘फूलप्लेज’ मे लोगो की दिनचर्या सही लिक पर नही आ पा रही है । ऐसे दुःख के घडी मे दो मीठे बोल की ललक लोगों मे बढ जाती है । 

प्रधानमन्त्री ओली की कडबी बोली, स्रोत: द पब्लिक/नेपाल 

ऐसे अवस्थामे धन से ना भी हो, मन से ही सही लोगों के प्रति सहानुभूति रखना ही चाहिए । कहा भी गया है, ‘सैम्पैथी इज फार बेटर दैन गोल्ड ’(सहानुभूति सोना से भी अच्छा होता है) । परन्तु नेपाल के प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली इस से पडे परे है । ऐसे परिस्थिति मे अनर्गल बयानबाजी और मूल मुदा को विषयान्तर करने की मनोदशा को किसी भी दृष्टिकोण से सही नही ठहराया जा सकतां । इस तरह के गतिविधि जब किसी देश के सरकार प्रमुख से हो, तब जन–जन के दुःख, कष्ट, वेदना, निराशाएं बढ जाती है । हा“, नेपाल के सन्दर्भ मे वैसे ही अनुभव हो रही हैं । कोरोना के कहर और लकडान अवधि मे प्रधानमन्त्री ओली द्वारा जिस तरह के बयानबाजी हुई है, वह दुखद, अमार्यादित, अमानवीय, असामयिक, असान्दर्भिक, अप्रासंगित तथा असामाजिक और समग्र मानवता के उपहास करने जैसी हैं । साथ ही, पदीय सोपान और आचरण का खिल्ली उडाना ही है । 

किसी भी मुल्क के एक शक्तिशाली कार्यकारी प्रमुख के अभिव्यक्ति संभवत : विवादरहित होनी ही चाहिए । प्रधानमन्त्री ओली ऐसा कर नही पा रहे हैं । वैसे तो पहले से ही उनके विवादास्पद अभिव्यक्तियो आ ही रही थी । खास कर के मधेसी समुदाय पर उनके वक्तव्य हमेशा असहिष्णु रहा हैं । नेपालके बडे आबादीवाले लोगों के अधिकार के आन्दोलन के समय पुलिस÷प्रशासन की क्रुर्रता, बर्वरता, दमन और हत्या पर ‘दो चार आम गिरने से बृक्ष को कुछ नही होता है’ जैसे अभिव्यक्ति देना अपने ही नागरिकों के साथ नाइन्साफी थी , और है । वह आन्दोलन की दौर थी, अभी कोरोना और लकडान की दौर है । डर, त्रास, निराशा और भयावह अवस्था के इस दौर मे हमारे बजरेआजम (प्रधान मन्त्री) का शृंखलाबद्ध विवादास्पद अभिव्यक्तियों का जो चरण चल रही हैं, उसे अत्यन्त दुखद ही कहा जा सकता हैं । पहले समुदाय पर, अब धर्म और आस्था पर उनके बयानबाजी आई है ।    

दो तिहाई बहुमत से निर्वाचित यह सरकार के प्रमुख कहते है, ‘मुझे पदच्युत करने के लिए भारत/भारतीय दूताबास द्वारा चलखेल हो रही है ।’ किसी भी देश के प्रधानमन्त्री इस तरह से नही कहते । यदि ऐसा हो रहा है तो सम्बन्धित मुल्क के कुटनीतिक को बुलाकर सवाल–तलब किया जा सकता है वा चित्त न बुझ्ने पर देश निकाला भी करने की अधिकार सरकार प्रमुख को र्है । परन्तु कुटनीतिक और अन्तर्राष्ट्रीय मान्याता के खिलाप इस तरह के बयानबाजी

प्रधानमन्त्री ओली की कडबी बोली, स्रोत: द पब्लिक/नेपाल 

हताठ मानसिकता से उब्जे अस्वभाविक प्रतिक्रियाएं ही हो सकती है । महत्वपूर्ण विषय, सवाल और मुदा से लोगों का ध्यान दूसरे तरफ मोड्ना वा विषयान्तर करते के दृष्टि से ही यह किया गया पुष्टि होता है । अपने शासकीय असक्षमता पर पर्दा डालने के इस तरह के कार्डे प्रयोग करना अशोभनिय है । जन–जन को भ्रमित करने की आलावा यह और कुछ हो हि नही सकता ?

 कुछ सप्ताह से प्रधानमन्त्री ओली के ‘राम–अयोध्या काण्ड’ चल रही है, यह विषय बहस के शिखर पर हैं । इस काण्ड से नेपाल–भारत सम्बन्ध पर आंच आने जैसी बात हो गई । भारत के सत्तारुढ हिन्दूवादी दल ‘भारतीय जनता पार्टी’ को भी इस मे लपेटने की प्रयास किया गया । जब यह विवाद तुल पकडा, तब मत्थर करने के लिए नेपाल के परराष्ट्र मन्त्रालय को प्रधानमन्त्री के कथन को खण्डन करना पडा । उसने प्रधानमन्त्री के बयान के बारे मे विभिन्न व्याख्या और टिप्पणी पर गम्भिर ध्यानाकर्षण होने की बात करते हुए ‘किसी के भावनाओं और संवेदनाओं पर चोट पहुंचाने के नियत से न होने की’ स्पष्ट करी थी । इस से पहले, प्रधानमन्त्री ओली ने नेपाली संसद के रोस्टम से ही भारतीय नीति पर टिप्पणी करी थी । कहा था, ‘सत्यमेव जयते की सिंहमेव जयत हैं ।’ वही पर उन्होने कहा था ,‘ चीन के तुलना मे भारत से आया कोराना भाइरस खतरनाक हैं ।’ इस तरह के टिप्पणी कुटनीतिक मर्यादा विपरीत ही होती हैं । भूमी विवाद पर नेपाल–भारत बीच मनोमालिन्यता थी ही, इस तरह के बयानबाजी से दो देशों के संबन्ध मे खटास की अनुभूति सर्वत्र हो रही हैं । 

    सत्तारुढ दल मे महिनों से ताण्डव जारी हैं । यह और गहराती चली जा रही है । समाधान की कोई गुन्जाईस नही दिखता । परन्तु, पार्टी मे विवाद के ही क्रममे अपुष्ट और तथ्यहिन बात करना मनासिब नही ठहराया जा सकता । प्रधानमन्त्री ओली ने अपने बयानबाजी के दुसरे कडी के रुप मे ‘राष्ट्रपति के उपर महाभियोग लगाने’ की बात कर के जग हंसाई करी है । क्योकि उनके इस तरह के आरोपों का खण्डन खुद पार्टी के दिग्गज नेतागण ही कर चुके र्है । पक्ष और विपक्ष मे इस सम्बन्ध मे गरमागरम बहस जारी थी ही, इसी बीच उनका दुसरा ‘बोली काण्ड’ धुम मच्चा ।

प्रधानमन्त्री ओली की कडबी बोली, स्रोत: द पब्लिक/नेपाल 

उन्होने कोरोना भाइरस के उचार और नेपालीयों के इम्युनिटीके बारेमे गलत व्याख्या करी । कहा, ‘नेपाली के इम्युनिटी पावर अत्याधिक होने है, कोरोना अदरख और हल्दी–जल मिलाकर लेने से ठीक होती है ।’ उनके यह बयान उस समय आया जब विश्व के शोध कर्ता इस तरह के बातों का पुष्टि नही कर पा रहे थे । अभी भी विज्ञान और शोधकर्ता द्वारा इसकी पुष्टि नही हो पाई है । परन्तु प्रधानमन्त्री ने ‘एक विशेषज्ञ’ की तरह यह बयान देने की बात तब पुष्टि हुई जब सोसल मिडिया पर इसका जोरदार विरोध हुआ , किया गया । विरोध मे पार्टी के नेता तथा कार्यकर्ता भी सामेल हुए । 

नेपालमे कम्युनिष्ट पार्टी के नेता महा–विभाजित हैं । इस मे देखा गया गुट–उपगुट, समूह–उप–समूह इसकी पुष्टि करती है । वैसे भी नेपाल मे कम्युष्टिों के नाम पर घोषित और अघोषित रुप मे बहुत सारे पार्टीयां है । सभी मे नेतृत्व संघर्ष हमेसा देखा गया है । इसिलिए तो विगत मे बार–बार कम्युनिष्टों की धुंजा–धुंजा हुई है । नेपाल के सन्दर्भ मे कम्युनिष्ट अब ‘स्वार्थी नेतृत्व’ के गुट भर बना हुआ है । व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण नेतृत्ववर्ग अपने अनुरुप पार्टी को चलाते है । फलस्वरुप पार्टी मे आग्रह–पूर्वाग्रह, अनुग्रह–विग्रह की अवस्था आ जाती हैं । ऐसे ही अवस्था नेकपा की हैं और इस अवस्था से त्राण पाने के लिए नेतृत्व मे रहे अध्यक्ष ओली समय–समय पर अनावश्यक टिप्पणी और बयानबाजी करके पार्टी के विवाद तथा अपनी असक्षता पर पर्दा लगाने की कुचेष्टा करते आ रहे हैं ।  

  पशु–पक्षी भी अपनी भावाभिव्यक्तियों के लिए बोलीयों का उपयोग करते है । इन बोलियों का भी नाम होता है–शेर की बोली को दहाड्ना, हाथी की बोली को चिंघाड्ना, घोडे की बोली को हिनहिनाना .....कहते हैं । लेकिन प्रधानमन्त्री ओली के बोली को क्या कहेगें ? मनुष्य की बोली सभ्य और सौम्य होनी चाहिए । बोली÷वाणी पर सन्त कबीर के एक चर्चित कथन ही है –‘ऐसी बाणी बोलिए, मन के आपा खोए, औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय ।’ (अर्थ :मान और अहंकार त्यागकर ऐसी वाणी बोले वा बात करें कि औरों के साथ–साथ स्वयं को भी खुशी

प्रधानमन्त्री ओली की कडबी बोली, स्रोत: द पब्लिक/नेपाल 

मिले । वाणी में व्यक्तिगत कुंठा और आत्मरति के भाव प्रकट होने लगे तो समझना चाहिए व्यक्ति मे अहमता बढ गई है । ऐसे अवस्था मे, किसी भी व्यक्ति के बोली और भाषण पर से जन–जन के विश्वास उठ जाता है । एक बार भरोसा टुट जाने पर फिर उसे तत्काल विश्वास पर लाना मुश्किल सी होती है । इसिलिए मीठी वाणी से लोगों का दिल जीते जा सकते है । तथ्यहिन और अप्रासंगिक भाषण÷बोली से इस तरह के कार्य असंभव है । बोली के ही कारण प्रधानमन्त्री ओली अपने गुट के लिए भी अब लोकप्रियता गुमा चुके हैं । बोलने की आजादी सब को है, होनी चाहिए । परन्तु पदीय आचरण और सीमा तो किसी को भी पार नही करनी चाहिए  । खास कर के, मर्यादित और सम्मानित पदासिन व्यक्तियों को किसी भी कौम वा धर्म वा सम्प्रादाय के आस्था पर चोट पहुंचानेवाली बाणी की छुट नही है । यदि इसके विपरीत करते है तो वह ‘बडबोलापन’ ही हैं । और यह राष्ट्रीय एकता के मानस को कभीकाल खंडित करने के अस्त्र भी बन सकता हैं ।  

प्रजातन्त्र सभ्यता, शील और मर्यादा के उत्कर्ष की सत्ता–प्रणाली है । कुछ वर्षों से प्रजातन्त्र के शील का आसन भाषण, अभिव्यक्ति और बोली की अराजकता से गंदा किया गया है । दायित्व, मर्यादाएं, और सीमाएं तोडकर जिस तरह से अपनी मनकी कुंठाओं को ‘कलुषित बोली’ के मार्फत् सार्वजनिक किया गया है उससे आम–नागरिक और उसके नैतिक अधिकार पर सवाल खडा कर दिए है । बोलना अगर बडबोलापन बन जाए , अभिव्यक्ति अगर विकृति बन जाए, लोकजन किसी के बोली से चिढने लगे तो प्रजातन्त्र और राजतन्त्र वा एकतन्त्र के बीच फर्क ही क्या रहेगा ? बोलतन्त्र के पृष्ठपोषक जब कार्यकारी नेतृत्व मे हो , तब जन–जन को बहुत तकलिफे उठानी पडती है । शालीनता से भरा आचरण नेतृत्व और नेताओं मे होनी ही चाहिए । परन्तु बहुमत के आड पर अहंमता अशोभनीय है । बोली के सन्दर्भ मे, ओली ने अपना शील लांघा है । वह जनता को ग्रसित और उत्तेजित करते रहे है । 

बोली/भाषा/अभिव्यक्ति किसी भी समाज या देश की सभ्यता की पहचान होती है । राजनीति में बोली÷भाषा बल भी है ओर छल भी । भाषा–बल का दुरुपयोग भाषा का शील–भंग करता है । राजनीति जब नीति से पृथक होती है, तो सबसे पहले भाषा को ही विकृत करती है  मर्यादाओं का उल्लघंन घृणा उत्पन्न करता है । घृणा–ग्रन्थवाले नेतृत्व उत्तेजित बयान देते हैं । कही पर पढा था, ‘सत्ता लोकतंत्र नहीं होती, जनता लोकतंत्र होती है । सत्ता तो लोकतंत्र के संरक्षण और लोकचरित्र का उंचा उठाने के लिए होती है । पर वे केवल शक्ति के व्यवस्था–तंत्र की प्रतीक बन कर रह जाती हैं । लोकतंत्र बोलिया या गोलियों की व्यवस्था नही है ।’ उत्तेजनाओ मे बोलना और देशभक्ति के कृत्रिम नाटक की पताका लहराना केवल उत्तेजना और हिंसा तो पैदा कर सकता है, शांति, शील और मर्यादा नहीं । बोली और भाषा का संयम जरुरी है । किसी भी देश के प्रधानमन्त्री पद लोकतंत्र की लोक–पाठशाला है, लोक–विश्वविद्यालय होता है, होनी चाहिए । इसिलिए वह जोश की बोली/भाषा बोलने का उदाहरण न बने तो अच्छा । नेपालीयो की सब से बडी विशेषताएं हैं कि तमाम राजनीतिक और प्रशासनिक अराजकताओं के बावजूद जनता उसके प्रति अपनी निष्ठा खोति नही है । यदि नेतृत्व इसे गलत इस्तेमाल करता है, तो मासुम जनता के लिए अन्याय ही ठहरेगी, होगी । इस तरह की बात नही होनी चाहिए ।

अन्त्यमे, प्रधानमन्त्री ओली के विवादास्पद बयान और अपशब्दोका जखीरा बना दिख रहा र्है । जनता बोले और सत्ता सुने होनी चाहिए, यहां तो सत्ता बोले और जनता सुने की स्थिति है । इसिलिए तो समाजिक संजाल मे जनता प्रधानमन्त्री के विरुद्ध भडक रहे है । बडबोलेपन से देश की संस्कृति और सभ्यता को अपमानित करने का हक किसी को नही हैं । भूगोल अलग हो सकती है परन्तु परम्परागत संबन्ध गाढ और प्रगाढ होती है, उसे कडबा बोली से विग्रह के स्थिति मे लाने की छुट भी किसी को नही हैं । वैसे भी प्रधानमन्त्री के द्वारा दिया गया अभिव्यक्ति पर सामाजिक संजाल वा अन्य मंच पर अतिरिक्त टिप्पणी आने वाली नही होनी चाहिए । भारत को खचरा फेकनेवाली गढा समझ कर प्रधानमन्त्री ओली भारत के विरोध मे अनाप सनाप बोल रहे है । इस तरह के बोली अपने असक्षमता, भ्रष्टाचार, नालायकी और जनविरोधी क्रियाकलाप हटाने के लिए ही हो सकती है । भारतमे पाकिस्तान का विरोध, चीन मे अमेरिका का विरोध, अमेरिका मे चीन के विरोध को राष्ट्रीयता का जमा पहना दिया जाता हैं । नेपाल मे भी भारत के विरोध को राष्ट्रीयता के जमा पहना वाली पुरानी परम्परा कायम रखने के लिए ही ‘एन्टि–इन्डियन–कार्ड’ प्रयोग करना दुखद हैं । हम सार्वभौमसत्ता राष्ट्र है, हम असंलग्न राष्ट्र की नीति अवलंवन करके ही आगे बढ सकते है । चीन हो या भारत , हमारी सबसे करीब पडोसी है । पडोसी को परिवर्तन नही किया जा सकता हैं । अत : ‘हैट स्पिच’ से हमे किसीको नही चिढाना चाहिए ।   



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