Thursday, 31 December 2020

मैथिली काव्य साहित्यमे महाकवि विद्यापति आ अन्य काव्यकारक रचना पर हमर धारणा

दिनेश यादव
किछु विद्वानक मत छइन जे महाकवि विद्यापति १४म् शताब्दीके छलाह (राप्रउ पोखरेल,३० असार २०७५, अन्नपूर्ण पोस्ट) । हुनकासँ पहिने जतेक साहित्य लिखाइत छल, सबटा संस्कृतमे । मुदा विद्यापति जनभाषामे काव्य–रचना करबाक पैघ साहस केलैथ । कहल जाइत अइछ जे ओई समयमे हुनका विरोध मात्र नई बहिष्कार सेहो कएने छलाह । तइयो ओ अबहठ (मैथिलीके अपभ्रंश) भाषामे १५ गोट ग्रन्थकृति लिखलैथ । ओ सात सौसँ बेसी पदावली (गीति पद्य) मैथिली भाषामे रचना केलैथ । हुनक सम्पूर्ण पदावलिके शृंगार, भक्ति(भगवान शिव, गंगा, राधाकृष्णके चित्रण) आ व्यवहार पद(विवाह, द्विरागमन, छठिहार, मुन्डन) मे बाटल गेल अइछ ।
विद्यापति पर समाजशास्त्रीय लेखाजोखा नई भेल अईछ । मात्र स्तुतिगानमे केन्द्रित भए हुनका बारेमे लिखल गेल छई ।
आधुनिक युगमे विद्यापतिके वस्तुवादी दृष्टिसँ सेहो गमबाक, देखबाक, सुधि लेबाक आ लिखबाक आवश्यक छै । हुनका बुझबाक लेल आ नव पीढिसभके पढलेल आतुर आ उत्प्रेरित बनेबाक लेल आब शास्त्रिय लेखन मात्र नई आधुनिक लेखनशैलीके औजारसबके उपयोगमे सेहो कर पडत । ओ औजार सब विद्यापति पर लिखल सामग्री सबमे सजीवता प्रदान करैत मैथिली भाषाक चमत्कायर सेहो दर्शनीय बनत । आधुनिक संदर्भमे वैज्ञानिक माक्र्सवादी दृष्टिकोण सेहो एकगोट औजार भ सकैत अइछ ।
कल्पना, मिथ, किवदन्ती आदि इतिहासक अंश भेल, साहित्यमे एकर प्रवेश न्यून होबाक चाहिं । कियैक त इतिहासक घटना सभहक अध्ययन आ पात्र आ परिवेशक मनोरम चित्रण एक बात थिक आ वैज्ञानिक इतिहास दृष्टिसँ निष्कर्ष बहार क समाजकें चेतना बढाब दोसर बात थिक । विद्यापति पर लिखल साहित्य सब देखल जाए त एकैहटा ढर्रा पर चलैत आइब रहल अइछ । हुनक जन्म तिथि , बासस्थान, जाति, पहिरन, संस्कार पर वर्षौसं विवाद रहलैए, आ एहिमे लेखक लोकैन समय वर्वाद कए रहल छैथ, हरेक पोथीमे अई पर अनाहक पुनर्रावृति भ रहल छै । हम कहब–अई पर मतैक्यता नई भ सकैत अईछ त एकरा इतिहासक विषय पर छोइड देल जाए, विद्यापतिके विशुद्ध साहित्यिक विषय बनाओल जाए । एकर अर्थ हुनक ऐतिहासिक पक्षके वहिष्कार कएल जाए से किमार्थ नए, मात्र साहित्यमे अई पक्षके चर्च कम होए । अईसँ कि होएत जे हुनकाबारेमे नव दृष्टिकोण सब पाठकके पढबाक अवसैर भेटतैन ।
विद्यापतिके कुनू ‘बाद’ के स्कूल बनेनाई अनुचित अई । खास ककें विद्यापति स्मृति पर्व वा आन समारोहमे जई तरहे एकैह समुदायके देखल जाइत अइछ, ओ महाकवि विद्यापतिके योगदानक चर्चासंं बेसी अमुक ‘बाद’ के स्कूलक पृष्ठपोषण करैत चाँदी कटाईके माध्ययम बना रहल छैथ । जाहि स्कूलमे महाकवि विद्यापतिके ‘जातिय’ रुप दए रहल छैथ, अईसं जन–जनके इन्ट्रेस्ट घटबे करत ने ?
विद्यापतिके वैष्णव आ शैव भक्तिके सेतुक रुपमे स्वीकार कएल गेल छै । मिथिलाक लोकके ‘देसिल बयना सब जन मिठ्ठा’ के सूत्र दके लोकभाषाके जनचेतनाके जीवित रखबाक पैघ प्रयास केलैथ । मुदा अखन जोडबाक गप्प कम तोडबाक काज बेसी भए रहल अइछ ।
मैथिलीमे सबसँ बेसी पढल आ लिखल आ उच्चारण कएल गेल शब्द थिक विद्यापति । ई पैघ खुशीक गप्प थिक । मुदा काव्यसाहित्यमे हुनकासँ पहिने डाक, अमीर खुसरोसहितके लोक सेहो आएल छल । हुनका सबहक रचना अखनो जन–जनके मुखारविन्दूसँ सुनुवामे अबैत अइछ । परन्च लिखित साहित्यमे कम कियैक ? कि ओसभ अब्राह्मण छला तें ? तहिना मिथिलामे तुलसी दासक चर्चा जतेह भेटलैए ओतेह सूर, कबीर, मीराके कियैक नई ? ई एकगोट यक्ष प्रश्न थिक । हिन्का लोकइनके मैथिली साहित्यमे चर्च कके विद्यापतिक गरिमा घैट जाएत से नई छैक, आओर बढत ।
हमरा बिचारसँ महाकवि विद्यापतिके आन समुदायसं जोडबाक लेल अन्य काव्य वा काव्यकारके ओतबे स्थान भेटबाक चाहि । खास ककें मैथिली बोलीसं मिलैवाला खुसरो काव्य, रासो वा रास काब्य तथा डाक बचन –
१) खुसरोके पाति देखल जाए–
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस । चल खुसरो घर अपन सांझ भई चहुँ देस ।।
२) डाक बचन –
खटहट खटिय, बतकट बोहु ई दुःख बिहि ककरो नहि देहु । साँझ पराती, भोर बसन्त, तकरा दुखक ने कहियो अन्त । (स्रोत :डाक दृष्टि)
३) रासो साहित्यमे युद्धवर्णन –
बज्जिय घोर निसांन रान चौहान चहूँ दिसि । सकल सूर सामन्त समर बल जंत्र मंत्र तिसि । उट्ठि राज प्रथिराज, बाग लग्ग मनहु वीर नर । कढत तेग मन बेग लगत मनहु बीजु झट्ट थट्ट ।
(नोट:अई पाँतिके डिंगल भाषा कहल गेल छै, मुदा मैथिली शैली छै) (स्रोत:रासो काव्य एवं लौकिक साहित्य)
४) महाकवि विद्यापतिक रचना–
देसिल बअना सब जन मिट्ठा ते तैंसन जपओं अवहट्ठा
अन्त्यमे, विद्यापतिके अवहट्ठमे रचना करबाक कारण कि रहैन ? वस्तुत ः राज–दरबारके अभिजात्यके बीच अपभ्रंश भाषा प्रचलन रहै । विद्यापति राजाश्रयमे रचना करैत छला । अतः हुनका विवशतावस दरबारक भाषामे सेहो रचना करै पडलैन । ‘कीर्तिलता’ आ ‘कीर्तिपताका’ हुनक एहा विवशताक प्रतिफल थिक । विद्यापतिक भाषामे लोक–अनुभूति आ लोक–अनुभवक आधार एतेक ने गहिरगर रहैत छल जे ओइसं हुनक अवहट्ड रचना सब सेहो प्रभावित भेल । ओइ अपभ्रंशके विशेषता– जे ओई मे देशभाषाक किछु बेसी प्रभाव रहैक । भाषा साहित्य आ काब्यके उद्देश्य जन–जनके जोबाक होमाक चाहिं । अई दिशि सभगोटेके ध्यान केन्द्रित होए– एहा महाकवि विद्यापतिप्रतिके हमरासभक पैघ श्रद्धा आ सम्मान होएत ।
(अमेरिकामे एन्टाद्वारा २० डिसेम्बर २०२० मे आयोजित ‘अमेरिकामे विद्यापति समारोह –२०२०’ मे राखल गेल हमर धारणा।
)

Friday, 25 December 2020

Tuesday, 22 December 2020

अमेरिकामा विद्यापति !


अमेरिकामा बसोबास गर्ने नेपालका तराईबासीहरुको संस्था ‘एसोसिएसन अफ नेपाल–तरायन इन अमेरिका’ (एन्टा) ले आइतबार वाशिङ्गटन डिसीबाट ‘विद्यापति समारोह अमेरिका–२०२०’ को आयोजना गर्यो । यो भच्र्युअल समारोहका सहभागीहरुले विद्यापतिलाई ‘मिलेनियम’ कवि भएको जनाउंदै मिथिला/मैथिलीमा उनीबाहेकका अन्य काव्यकारलाई पनि उत्तिकै सम्मान दिनु पर्ने औल्याए । उनीहरुले मैथिली भाषामाथि भईरहेको षडयन्त्रप्रति सचेत रहन सबै सरोकारवालाहरुलाई आग्रह समेत गरे ।   

कार्यक्रममा पूर्व प्राज्ञ, साहित्यकार, पत्रकार एवं लेखक #रामभरोस_कापडि भ्रमरले मैथिली साहित्यको शुरुवात ७ औं शताब्दीमा भएको जनाउँदै यसमा महाकवि विद्यापतिको अतूलनीय योगदान रहेको बताए । उनले भने, ‘ अपभ्रंश मैथिली (अवहठ) मा १५ वटा ग्रन्थ लेखेका विद्यापति नेपालमा १२ वर्ष बिताएका थिए ।’

अर्का सहभागी लेखक एवं साहित्यकार #रामनारायण_देवले नेपालमा पहिलो पटक काठमाडौंमा ०२३ मा विद्यापतिलाई स्मरण गर्न उमाकान्त कुँवर, डा.डम्बरनारायण यादव र पण्डित सुन्दर झा ‘शास्त्री’ को अगुवाईमा विद्यापति पर्वको आयोजना गरिएको जनाउँदै त्यसअघि यहाँ विद्यापतिको चर्चासम्म नगरिएको बताए । 

साहित्यकार #डा._राजेन्द्र_विमलले नोवेल पुरस्कार विजेता रविन्द्रनाथ ठाकुरसमेत विद्यापतिबाट प्रभावित रहेको स्मरणगर्दै विद्यापतिलाई ‘मिलेनियम कवि’ को संज्ञा दिए । उनले भने, ‘सन १३८७ यता विश्वमा विद्यापति जस्ता कविको जन्म भएकै छैन ।’

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक #रामरिझन_यादवले एक जना बंगाली लेखकले सन् १८७५ मा विद्यापतिलाई मैथिली कवि भएको भनेपछि बल्ल मिथिलामा उनको चर्चा हुन थालेको बताए । उनले भने, ‘ त्यसअघि विद्यापति बंगाली कवि रहेको मान्यता थियो । त्यसैले विद्यापतिबारे गहन अनुसन्धानको आवश्यकता छ । ’ उनले एउटा छुट्टै प्रसंगमा मैथिलीमाथि षडयन्त्र भईरहेकाले सबै मातृभाषा सचेत रहनु पर्ने औल्याए । 

कार्यक्रममा मैथिली साहित्यकार #देवेन्द्र_मिश्रले विद्यापतिका बारेमा भन्दापनि मैथिली भाषाप्रति आफ्नो चिन्ता व्यक्त गर्दै भने, ‘मैथिली पढ्न र लेख्न नआएको गुनासो धेरै मैथिली भाषीको रहेकाले यसको समाधान मैथिली भाषालाई शिक्षाको माध्यम बनाएर गर्न सकिन्छ ।’ अर्का लेखक एवं साहित्यकार #रोशन_जनकपुरीले विद्यापति रहस्यवादी कवि भएको स्मरण गर्दै पछिल्लो समय उनलाई देवकरण गर्न खोज्नु दुखद रहेको बताए । ‘हरेक पक्षलाई समालोचनात्मक दृष्टिकोणले हेर्नु पर्छ । मैथिलीमा धेरै अन्तरविरोध रहेकाले विभिन्न भाषाबाट यसलाई थ्रेट छ ’ उनले भने, ‘ मैथिलीमा धेरै डाइलेक्ट भएपनि एउटै समुदायको डाईलेक्टमाथि जोड दिनुनै समस्याको मुल कारण हो । ’ 

भच्र्युअल समारोहका अर्का सहभागी मैथिलीका अनुसन्धानकर्ता, साहित्यकार एवं पत्रकार #दिनेश_यादवले १४ औं शताब्दीका महाकवि #विद्यापतिले पहिलो पटक संस्कृत भाषाबाहेक जनभाषामा काव्य रचना गरेको बताए । ‘संस्कृत भाषाबाहेक अन्यमा लेखे विद्वान कहलाउनबाट बञ्चित हुनु पर्ने युगमा विद्यापतिले मैथिलीको अपभ्रंश ‘अवहठ’ भाषामा १५ वटा ग्रन्थकृति लेखेर ठूलै साहस गरेका थिए’, उनले भने, ‘विद्यापतिले सात सय भन्दा बढी पदावली (गीति पद्य) मैथिली भाषामा लेखेका थिए । ती सबैलाई शृंगार, भक्ति र व्यवहार पदमा बाँडिएका छन् । ’

 उनले विद्यापतिलाई कुनै अमुक ‘बाद’ को स्कुल बनाउनु अनुचित भएको बताए । ‘मैथिलीमा सबैभन्दा बढी पढिएको, लेखिएको र उच्चारण गरिएको शब्द हो विद्यापति । यो खुशीको कुरो हो ’ उनले भने, ‘तर #काव्यसाहित्यमा उनी भन्दा पहिलेका #डाक, #घाघ_भड्डरी, #अमीर_खुसरोसहितको चर्चा किन कम भए, जबकी यी श्रष्टाहरुको रचना अहिले पनि जन–जनको मुखारविन्दूमा उत्तिकै लोकप्रिय छन् ।’ उनले मैथिलीमा विद्यापति र तुलसीबाहेक #सूर, #कबीर, #मीरा, #घाघ, डाकलगायतको साहित्य रचना विरलै पाउनु दुखद रहेको बताए । एन्टाका प्रवक्ता #मोहनकुमार_यादवको सक्रियता र संयोजनमा आयोजित कार्यक्रमका अन्य सहभागीहरुमा साहित्यकार #प्रेम_विदेह, पत्रकार #श्यामसुन्दर_यादव, #अर्जूनप्रसाद गुप्ता ‘दर्दिला’ तथा एन्टाका #विजय_सिंह, #रामकृष्ण_साह, #ईन्द्र_साह, #कञ्चन_ठाकुर, #अरबिन्द_कर्णसहित अधिकांश पदाधिकारीहरु थिए ।  

साहित्यकार रामभरोष कापडिको सभापतित्व रहेको कार्यक्रममा वरिष्ठ संगीतकार एवं गायक #गुरुदेव कामत, युवा गायक #सन्तोष सानु र गायिकाहरु #सोनाली_कर्ण, #तनुजा_चौरसिया, #अन्जली_पटेल र #अन्जू_यादवले विद्यापति रचित गीत प्रस्तुत गरेका थिए ।  

1.     https://www.janatasamachar.com/2020/12/232076?fbclid=IwAR3Qe1mtxhdrjNCF8pEF-                        8HejEk- iZS7BS7PmLnnOOM5Uj35_urAsNmXNrQ

2.      http://www.maithilijindabaad.com/?p=15221                                                                

3.      facebook.com/watch/live/?v=132689905198259&ref=watch_permalink 

4.       https://www.facebook.com/111995714006064/videos/132689001865016

5        http://www.majheri.com/node/22819

6.    https://sites.google.com/view/madheshinepaliblogspotcom/home

7.    https://www.youtube.com/watch?fbclid=IwAR0b1wVk0YiGnZNdRfDuYdIuY-                     VeC1TBZSvVjYf3e2CsWhWqTRESxKYwrTU&v=iBqyjG2dr1I&feature=youtu.be

8.    https://farakdhar.com/story/41833/

9.    https://www.pinterest.com/dinesh38_yadav/mithila/

10)     http://kha.bar/news/631932

11) https://www.linkedin.com/posts/dinesh-yadav-29421520_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%AE-%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%9D%E0%A4%A8-%E0%A4%89%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A4%A8%E0%A4%AF%E0%A4%AE-activity-6748799218565173248-HYd1

पण्डित जी’क तोता (मैथिली व्यंग कविता)

दिनेश यादव 

एकगोट मनुक्खके देखते
पण्डित जी’क तोता
अनाहक कहैछ– ‘धूर मुर्ख !’,
ई सुनिते मनुक्ख आबाक छै,
प्रतिउत्तरक अवस्था गौण छै,
मुदा मनेमन बोली अपन गुनगुनाई छै,
कियैक त ओ मनुक्ख छै ।१।



पिजडामे बन्द तोता
मनुक्खके देखते 
फेर कहैछ– ‘धूर अज्ञानी !’
ई सुनिते मनुक्ख स्तब्ध छै,
अनाहक मथापिच्चीमे डुइब जाई छै, 
तईयो अपनाके सम्हारैत बाट चलैत छै,
कियैक त ओ मनुक्ख छै ।२। 



दोसरके दानापानी पर जीवित तोता
मनुक्खके देखते 
चिच्चियाबैत कहैछ– ‘धूर बौका !’
ई सुनिते मनुक्खक मियाद गरम छै,
मुदा कहूँना–कहूँनाके शान्त छै,
अपन मिसनमे दत्तचित्त छै,
कियैत त ओ मनुक्ख छै ।३।



आनक बोली बोलैवला तोता,
मनुक्खके देखते
हिंहिंआएत कहैछ– ‘धूर नामर्द !’
ई सुनिते मनुक्ख निराश छै ,
मुठीभरि लोकक कुकृत्यसं चिन्तित छै,
मुदा बखारीभरि लोकक मुंह खुजत से विश्वासमे छै,
कियैत त ओ मनुक्ख छै ।४। 



बहसल जाइत छल तोता ,
तब, सिकायत भेल पण्डित जी’सँ,
रामधुलाईमे तोता छै,आब बनल ऊ मौन छै, 
मुदा मनुक्ख ओकरा घुरि–घुरि देखैत छै,
तब हंसैत तोता कहैछ–
‘बौआ, आब बुझनामे आइब गेल हेतौ ,
हम तोता तों मनुक्ख छें’ ।५।



पण्डित जी’क तोता,
साँच्चे, मलिकबासँ कम कहाँ छै,
उलहन पर सेहो महान छै,
‘उल्टे चोर कोतबाल’के डाँटैत छै,
माईर खेलाके बादो अपनाके पैघ मानै छ,
कियैक त ऊ पण्डित जी’क तोता छै, 
तें ऊ ओकरे भाषा बोलै छै ।६।


Friday, 18 December 2020

‘धूर अहा बरद छी’


दोसरेके लेल बहब,

खुट्टामे बानहल रहब,

कुट्टीसानी लेल टुकुर–टुकुर ताकब,

मलिकवाक दाना लेल कच्छर कातब,

डिरिएबाक आदत बनाएब,

तिरपित ओहीमे रहब,

झुठ नई छै शनिश्चराक कहब–

धूर अहा बरद छी ।१।


बधिया त पहिने भ गेल,

बच्छाक जामाना गेल,

साढ बनाबक समय सेहो गेल, 

मर्खाहा बनबाक नई करु झेल,

टाइरमे बहब जमाना गुजैर गेल,

खैर–दाना बिना लार–पुआर खाएब,

झूठ नई छै शुक्राके कहब–

धूर अहा बरद छी ।२।


घेंचमे लागल गरदामी, 

ओईमे लटकल डोरी, 

कहियौ औतैह लागल घुघुर–कौडी,

सिंहमे तेल मालिस तोडी,

अई सिंगारक नई कुनू जोडी,

जोतबालेल तयार रहब,

 झुठ नई छै बृहस्पतियाक कहब–

 धूर अहा बरद छी ।३।


आँखि बन्द कोलमे घुमै,

कहियो झपकैत–झपकैत हर तानै,

सदखनि जुआ आ पालो बहै,

जोतहा जब पुच्छ पकडै,

अरे आह–आह कहैत अइठै

कान फडफराबैत मुडि हिलाएब,

झुठ नई छै बुधनाक कहब–

धूर अहा बरद छी ।४।


कांढिसं इलाजक आदि,

अपना पर मूँहमे जाबी,

दूसराक बालि पर हाबी,

ढोकनासं निकलत बदमासी,

बेसी कसबाकलेल नाथि,

तइयौ जुवाली सहबे करब,

झुठ नई छै मंगालाक कहब–

धूर अहा बरद छी ।५।


लांधी खाली रहत,

पेटके लेल डिरियाबै पडत,

मलिकबा त जोतेबे करत,

दयाभावसँ मलिकाइन पुवार ओगरत,

गोबरकर्सी अपन मर्जीसँ उठाएत,

ठूठ पुच्छ हिला–हिलाके कुकुरमाछी भगाएब 

झूठ नई छै सोमनाके कहब–

धूर अहा बरद छी ।६।


कतबो दौनि घुमब,

तइयो पेनी खाएब,

कहियो गोला कहाएब,

सिलेबिया सेहो कहाएब,

जौ नई बहब, त बुढवा कहाएब,

नियति बनल मालिकके खुश करब,

झुठ नई छै रवियाके कहब–

धूर अहा बरद छी ।७।

( २०७७ पुस ३ )






 








 


 


Tuesday, 15 December 2020

मैथिली पोथी पर तुलनात्मक समालोचना आ विवेचना

 








‘आंजूर’ पत्रिकाको असोज–कात्तिक अंकमा मैथिलीमा पढाई हुने प्राथमिक तहका पाठ्यपुस्तक र पाठ्यसामग्रीबारे प्रकाशित मेरो तुलनात्मक समालोचना र अनुसन्धानमुलक आलेख । नेपालको तथ्यांक अनुसार मैथिली नेपालको दोस्रो सबैभन्दा बढी बोलिने भाषा हो । तर, सीमित व्यक्तिले वर्षौदेखि जारी राखेको सिण्डिकेटको प्रभावले यो भाषा माथि उक्लनै सकेको छैन । यसो हुनुमा ती सिण्डिकेटधारीहरुले कहिले पंचायतकालिन सत्ता त कहिले राजाकालिन सत्ता, अहिले लोकतान्त्रिक राज्यसत्तामाथि दोष थुपारेर उम्कने गरेका छन् । तर, राज्यसत्ताबाट मैथिलीका नाममा सबैभन्दा बढी सुख, सुविधा, पद र अवसर पाउनेमा तिनीहरु नै रहने गर्छन् । सत्तामा पहुँचका भरमा अवसरका खोजीमा रहेका तिनीहरुले गरेका घिनौना कर्तूत् र कल्पनासम्म गर्न नसकिने कुकर्महरुमाथिको पर्दा पछिल्लो समय विस्तारै हट्दै गएको आभास हुन थालेको छ । यो एउटा सकारात्मक पक्ष हो । तर, सबैभन्दा दुखद कुरो त के छ भने ती सिण्डिकेटधारीहरुले मैथिली मातृभाषी बालबालिकाको बालमनोविज्ञानमाथि समेत अन्याय गर्न पछि परेनन् । यसो गर्नुका दुई कारण छन्– एउटा,तिनका बालबालिकाले मैथिली पढ्दैनन्  र दोस्रो, तिनीहरुमा भाषा भन्दा पनि द्रव्य बढी हुनु हो । नत्र यसरी पटक–पटक तिनीहरुले गल्ती नगर्नुपने हो । यहाँ तिनीहरुले कसरी बालमनोविज्ञान र शिक्षण सिकाई क्रियाकलापलाई धज्जी उडाएका छन्, त्यसको ठोस प्रमाणको एउटा अंश यो आलेख पनि बन्न सक्छ । मेरो यो खोजबिन पढेर प्रतिक्रिया दिन विनम्र निवेदन छ । यो आलेख प्रकाशित गरी मैथिली भाषी मात्र होइन, सरोकारवाला सबै पक्ष (सरकारी निकायसहित) को ध्यानाकर्षण गराउन सहयोग गर्नुभएकामा ‘आंजूर’ पत्रिकाका प्रकाशक एवं सम्पादक रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ प्रति कृतग्न र आभारी छु । धन्यवाद ।   

Thursday, 10 December 2020

'पत्रकार न्यायाधिश होइनन’

 ‘रोल मोडेल’ ठानिने पेशाकर्मीबाट भएको घिनलाग्दो यो घटनामा संलग्नमाथि कडा कारवाही हुनुपर्छ भन्नेमा कसैको दुई मत हुनैसक्तैन । तर यहाँ पत्रकार पनि चुकेकै छन् । दमकको समाचारमा पत्रकारिताको इथिक्सलाई पालना गरेको देखिन्छ । यो समाचारमा आरोपित व्यक्ति र उनी कार्यरत स्कूलको नाम उल्लेख नगरिएपनि तिनको अपराध प्रष्टै छ । तर, सिन्धुलीको समाचारमा इथिक्सलाई पूर्ण रुपमा बेवास्ता गर्दै पत्रकार न्यायाधिशको भूमिकामा देखिएका छन् । न्यायालयले अपराधीको अपराधलाई दोषी ठहर गर्ने  हो, दोषी ठहरिएपछि तिनको नाम सार्वजनिक गर्नुपर्ने अन्तर्राष्ट्रिय मान्यता नै छ । ती मान्यतालाई के पत्रकारले पालना गर्नु पर्दैन ? फेरी, प्रहरीले आरोपितलाई पक्राउ गर्दैमा अपराध प्रमाणित हुने होइन । धेरै मामिलामा प्रहरी पक्राउ गरी कयौ दिन हिरासतमा राखेकाहरु अदालतको फैसलबाट आरोपमुक्त हुने गरेका छन् । सिन्धुलीको दुखद घटनामा पत्रकार पूर्वाग्रही देखिएका छन् । गोरखापत्र पनि चुकेको छ । सम्बन्धित सबै पक्षबाट करेक्सनको अपेक्षा छ । 



 (स्रोत:गोरखापत्रमा २०७७ कार्तिक २५ गते पृष्ठ ७ र १३ मा प्रकाशित समाचार)

Saturday, 10 October 2020

कृषि अनुसन्धानः दशा र भावी दिशाा




  • प्रदिप कुमार यादव

पृष्ठभूमि : विश्व वैंकको प्रतिवेदन ‘एग्रीकल्चर फर डिभलपमेन्ट २००८’ अनुसार, ‘२१ औं शताब्दीमा पनि कृषि आधारित देशहरुमा गरिबी न्यूनीकरण, आर्थिक वृद्धि र दिगो स्वस्थ्य वातावरण निर्माणमा कृषि क्षेत्रको मुख्य भूमिका रहेको छ । विज्ञान र प्रविधिले विकासशिल देशहरुमा आर्थिक वृद्धिको प्रक्रियामा संचालक हो, कृषि अनुसन्धान र विकासले भविष्यामा महत्वपूर्ण भूमिका खेल्ने आशा लिएको छ ।’  कुनै पनि राष्ट्र सबै क्षेत्रमा आत्मनिर्भर हुदैन, अन्तनिर्भर हुन्छ र परनिर्भर पनि हुन्छ नै । नेपाल कृषि प्रधान राष्ट्र मात्र नभएर नेपाली जीवनसंस्कृति र मानवजीवनको अभिन्न अंग हो । यसले नेपाली जनतालाई रोजगार, खाद्यान्न, आयआर्जनको श्रोत, गरिबी न्यूनीकरणमा सहयोग, कृषि उद्योग कारखानाहरुलाई कच्चा पदार्थहरु, व्यापार संतुलनमा समेत अहंम भूमिका प्रदान गर्दछ । नेपालको ८० प्रतिशत भन्दा बढी ग्रामीण जनसंख्याको जीवननिर्वाहको मुख्य आधार पारिवारिक खेती प्रणाली नै हो र बाँकी २० प्रतिशतको जीवननिर्वाहको आधार पनि कृषि नै हो । नेपाल जैविक, अजैविक प्राकृतिक सम्पदाहरुको श्रोत केन्द्र नै हो  अर्थात् समग्रमा भन्नु पर्दा कृषि नेपाली अर्थतन्त्रको मुख्य आधार र मानिस एवं जनावरहरुको जीवननिर्वाहका आधार नै हुन् । यसबाहेक कृषिले स्वच्छ एवं स्वस्थ्य वातावरण निर्माण र प्राकृतिक हरियाली सौन्दर्यता मार्फत कृषि—वन—पर्यावरण–पर्यटन प्रवद्र्धमा मद्त पु¥याउँछ । नेपालको ईतिहासमा कृषि यस्तो स्थायी स्वाभिमानी पेशा हो जो दश वर्षे जनयुद्धकालमा पनि जनतालाई भोक र रोगबाट मृत्युवरण हुन दिएन । स्वदेशमै कृषि उत्पादनको संभावना रहेको, उत्पादन गर्न सकिने, आयातको प्रतिस्थापन गर्दै निर्यात प्रवद्र्धनको यथेष्ठ संभावना रहेको छ । नेपाल कृषि प्रधान देशमा वास्तविक खेति गर्ने बहुसंख्यक मध्यम, गरिब, भूमिहिन, कृषि श्रमिक किसानहरुको हातमा जमिन छैन, प्रविधि, ज्ञान, सीप, पुंजी, दक्षता आदिको अभाव छ, उनीहरुको जीवन दैनिक हातमुख जोडने खालको छ तर प्रकृति प्रदत जमिन हुने खानेहरुको कब्जामा छ जसले जमिन देखेको छैन, लगायत कारणले प्रति वर्ष उपभोग्यवस्तुहरु आयात गर्नु परेको जर्जर अवस्था छ । नेपाल राष्ट्र बैंकका अनुसार ०७५÷७६ मा एक खर्व ६१ अर्व ५८ करोडको खाद्य कृषि तथा पशुजन्यवस्तुको आयात र आव ०७६÷७७ मा दुई खर्व ४३ अर्बको कृषि तथा पशुपंक्षीजन्य विषाक्त एवं कचरा उपभोग्यवस्तुहरु बिना रोकटोक आयात गर्नु परेको छ । यो देशको लागि १९७० दशक पछि वर्षेनी आयात वृद्धि हुने दुखद् समस्या भए पनि राष्ट्रिय नेतृत्व देखि सर्वसाधारण समेत सम्झिन्छ तर समस्या टरे पछि बिर्सिने परिपाटी स्थापित भएको छ । अर्को तर्फ, कृषि क्षेत्रमा उत्पादन एवं उत्पादकत्व बृद्धि मार्फत आत्मनिर्भर र स्वाधिन कृषि अर्थतन्त्रको निर्माणको नीति निर्माण बारेमा विभिन्न क्षेत्रका विज्ञहरु, विद्वानहरु, योजनाकार, नीति निर्माता, राष्ट्रिय नेतृत्वहरु सेमिनार, कार्यशाला, गोष्टी, औपचारिक÷अनौपचारिक मिटिङ्गि, अन्तक्रियात्मक मञ्चहरुमा ‘नेपाल कृषि प्रधान देश हो, अथवा नेपाली अर्थतन्त्रको मूल आधार कृषि हो अथवा कृषि क्षेत्रको प्रगतिबिना नेपालको विकास सम्भव छैन्’ कृषि क्रान्ति गर्ने, कृषि क्षेत्रमा व्यवसायीकरण, आधुनिकीकरण एवं औद्योगीकिकरण, दिगो उत्पादकत्व वृद्धि, आत्मनिर्भर कृषि अर्थतन्त्र निर्माण गर्ने जस्ता सर्वज्ञ जस्तै दार्शनिक, सैद्धान्तिक  संभाषण  ठोक्ने गर्दछन, प्रतिवद्धता पनि जनाउदै आएका छन, राष्ट्रको विकासको कुराहरु गर्ने गर्छन, मानौ आजैकै भोली नेपाल समृद्धशाली बन्ने छ, स्वर्ग वन्ने छ , भाषणमा पछि पर्दैन, तर राष्ट्रका समस्याहरु ज्यूका त्यूं किन छन् ? । कृषि उपभोग्यवस्तुमा परनिर्भरता वृद्धिले झन गम्भिर प्रश्नहरु जनमानसमा उठन थालेका छन् । नेपालको खेति प्रणाली परम्परागत, टुक्रे, छरिएको, दैनिक जीविका टार्ने पुग/नपुग निर्वाहमूखिबाट गुज्रिरहेकोमा सीमित छ । ०१३ साल प्रथम पंचवर्षिय राष्ट्रिय योजना देखि १५औं योजनासम्मका कृषि कार्यक्रमहरु विदेशी ऋण, अनुदान र आन्तरिक बजेटबाट केन्द्रीय एवं विभागीय वहुवर्षिय र वार्षिक कार्यक्रमहरु उत्पादन तथा उत्पादकत्व वृद्धि गर्ने लक्ष्य लिएको हुन्छ । कार्यक्रमको संचालन प्रक्रिया तथा सम्पन्न कार्यक्रमहरुको चौमासिक तथा वार्षिक समिक्षाहरुमा राष्ट्रिय नेतृत्व, नीति निर्माता, कार्यक्रम कार्यान्वयनकर्ता तथा अन्य विशिष्ट संभ्रान्त अनुगमनकर्ता, मुल्यांकनकर्ता, विश्लेषक आदि जस्ता समिक्षकहरुको उपस्थितिमा शतप्रतिशत प्रगति भएको प्रस्तुति हुन्छ । तर, राष्ट्रका श्रोत साधनहरु खर्च भए पनि कार्यक्रम निर्माणको भाषण र कार्यान्वयनको व्यवहारमा एकरुपताको अभाव देखिन्छ, भने नेतृत्वहरुमा काम गर्ने ईच्छाशक्ति, ईमन्दारीता एवं कार्यक्षमताको अभाव छ कि भने आभाष देखिन्छ । राष्ट्रमा कृषि तथा पशुपंक्षीजन्य उपभोग्यवस्तुहरु अभावै अभाव हुन्छ । यसै सन्दर्भमा एक विद्वत अर्थशास्त्रीले ‘योहो वहस टिभी चैनलमा’ भन्नुभएको थियो कुनै पनि योजनाहरु एक त समयमा सम्पन्न हुदैन र प्रगति पनि ३०÷३५ प्रतिशत भन्दा बढी हुदैन । यसो हो भने राज्यले नैतिक दायित्वबाट पन्छिएर दृष्टिविहीन र लाचारीको परिचय दिएको मात्र होईन कि कृषिमा उत्पादन वृद्धिका नीति, रणनीति, कार्यनीति र कार्यक्रम र संगठनात्मक संरचना बहुसंख्यक किसान, कृषि उद्यमीहरुसंगको सघन अन्तक्रिया र सहभागिताबिना केन्द्रीकृत प्रशासन व्यवस्थापन प्रणालीवाट अनुसन्धान एवं किसानमुखि होईन कि केही संभ्रान्तमुखि अपारदर्शी तरिकाले निर्माण भएको पुष्टि हुन्छ । जसले किसान र संस्थाको बीच अन्तरसम्बन्ध कायम स्थापित गर्न सक्दैन, सरोकारवालाहरुको समक्ष प्रविधिको पहुँच हुदैन । उन्नत श्रोतवीउ,ं गुणस्तरिय प्राङ्गागारिक वा अप्राङ्गागारिक मल, गुणस्तरीय जैविक वा अजैविक विषादी, प्रविधि, ज्ञान, सीप, उपलव्ध गर्ने गराउने संरचनाहरु,  अनुसन्धानकर्ताहरु केन्द्रीत वा विकेन्द्रीत र भौतिक संरचना उत्पादनशीलताको बारेमा गहन अध्ययनमा अकर्मण्यता हो वा लाचारी वा अयोग्यता हो बुझिनसक्नु छ । अर्को पक्ष के हो भने नेतृत्वले व्यक्तिगत लाभको फन्दामा फसिसके पछि राष्ट्रिय स्वार्थका समस्याहरु गौण वा महत्वहीन हुन जान्छ । प्रविधिहरु उत्पादन गर्ने, उपलव्ध गराउने कृषि अनुसन्धानलाई राष्ट्रिय गौरवको आयोजना प्रधानमन्त्री कृषि आधुनिकिकरण परियोजना निर्माण तथा कार्यान्वयनमा प्रत्यक्ष सहभागिता नगराउनु शंकामय छ । यसले झन गम्भिर प्रश्न उठाएको छ । कृषि विकासका नीति निर्माण र निर्णयमा वास्तविक किसान र कृषि उद्यमी व्यवसायीहरुको सामाजिक—आर्थिक, प्रविधि, ज्ञान, सीपको अवस्थाबारे संंभाव्यता अध्ययन, छलफल, सन्दर्भ सामग्री एवं नीतिहरुको समीक्षा, विश्लेषण र आवश्यकताको मनन् नगरि शहरिया बुद्धिजीवीहरुले तारे होटलहरुमा दुरदराजको विकासको खाका कोरेको देखिन्छ । यसले कृषि विकासको जिम्मेवारी सम्हालेका नेतृत्वहरुमा योग्यता, कार्यक्षमता, एवं ईमन्दारीतामा प्रश्न चिन्ह खडा भएको छ किन कि नेपालको सन्दर्भमा राजनीतिक नेतृत्वले सबैथोकको निर्णय आफै गर्न खोजेको पाईन्छ तर नेतृत्वले बुझ्नु पर्ने असाधारण प्रतिभासम्पन्न वा बौद्धिक वा सिर्जनात्मक मानिस भए पनि आफ्नो विषयमा बाहेक अरु धेरै विषयमा कमजोर हुन्छन । दर्शन, विज्ञान, कला र व्यवहारको तारतम्य मिलाएर प्रयोग गर्न सक्नु महान्ता हुन्छ । त्यो प्रक्रियागत कार्यान्वयनको अभावको कारण आज कृषि प्रधान देश आयातित मुलुकमा रुपान्तरण हुदै गईरहेका छन  । यसै सन्दर्भमा प्रोफेशर टोनी हेगन भन्दछन्, ‘नेपालको अर्थतन्त्र ज्यादै पछौटे छ, तर नेपाललाई प्रकृतिले नै गरिब मुलुक बनाएको भने होईन ।’ 

विश्वको कुनै पनि मुलुक कृषि क्रान्ति वेगर औद्योगिक क्रान्तिमा प्रवेश गरेको छैन । कृषि क्षेत्रमा अध्ययन, अनुसन्धान तथा प्रविधि, ज्ञान, सीप, दक्षता एवं अनुभव आदिको प्रयोगबिना कृषिमा व्यवासायिकरण वा आधुनिकीकरण वा औद्योगिकीकरण संभव छदैछैन, कृषि उद्योगहरुलाई कच्चा पदार्थहरु उपलव्ध हुन सक्दैन, उत्पादन तथा उत्पादकत्वमा वृद्धि पनि हुँदैन, यो ध्रुवसत्य हो त्यसै अर्थमा प्रविधि, ज्ञान र सीपको विकासको लागि नेपाल कृषि अनुसन्धान परिषद (नार्क) ०४८ वैशाख २५ गते स्थापना भएको हो । परिषद्ले केन्द्रीकृत संरचना र श्रोतसाधनको अभाव हुदाँहुदै पनि उद्देश्य अनुरुप कृषि प्रविधि विकासप्रति समर्पित रहे तापनि अपेक्षाकृत प्रविधि विकास गर्न सकेको छैन । अनि कसरी राष्ट्र आत्मनिर्भर हुन सक्छ ? भौतिक संरचना, जनशक्ति, बजेट एवं कार्याक्रमहरु केन्द्रीत अवस्थामा राखेर जो कोहिको पनि आत्मचिन्तन विकासवादी मात्र नभै दिग्भ्रमित सोच मात्रै हो । यसले किसानले अपेक्षा गरेको पर्याप्त नवीनतम प्रविधिहरु विकास गर्न सकेको छैन, माग र पहुँच पुरा गर्नै सक्दैन जस्ता प्रश्नहरु उब्जिएका छन् । फलस्वरुप किसान एवं सरोकारवालाहरु आर्थिकरुपमा क्षमतावान हुन सक्दैन, मानवीय क्षमतामा स्तरोउन्नति हुन सक्दैन, प्राकृतिक सम्पदाहरुको संरक्षनात्मक क्षमताको विकास हुन सक्दैन । विदेशी आयातित कच्चा पदार्थहरुबाट निर्मित सामग्रीहरु निर्यात गरी कहिले पनि प्रतिस्पर्धि, नाफामुलुक र दिगो हुनै सक्दैन, । कृषि अनुसन्धान परिषद्को वर्तमान संरचनाको मोडेल र परम्परागत अनुसन्धान प्रणालीको विशिष्टिकृत अनुसन्धान गर्नै सक्दैन, किसान तथा सरोकारवालाहरुको माग पुरा गर्न सक्दैन । त्यसकारण, तत्कालिन माननीय कृषि तथ पशुपंक्षी मन्त्री ज्यूको प्रमुख आतिथ्यमा २०७५ साल भदौ ४ गते नेपाल कृषि अनुसन्धान परिषद पुनर्संरचना सम्वन्धि अन्तरक्रिया कार्यक्रम ,क्षेत्रीय कृषि अनुसन्धान केन्द्र,लुम्लेमा आयोजना गएिको थियो । कृषि विकास रणनीति,२०१५ ले परिषदको पुनर्संरचना गर्ने सम्वन्धि उल्लेख गरेको छ तर आजको मितिसम्म कार्यान्वयनमा आएको छैन, त्यसको खोज तलास पनि छैन । कृषि क्षेत्रमा उत्पादन,उत्पादकत्व र किसानको आयस्तर वृद्धिको लागि पर्याप्त प्रविधि विकास र उपलव्ध गर्न गराउन र नेपाल सरकारको अन्य निर्णयहरु कार्यान्वयन एवं सम्पादन गर्न परिषदको पुनर्संरचना, नीति निर्माण र अनुसन्धानकर्ताको विकास एंव व्यवस्थापन गर्नु अति आवश्यक भैसकेको छ किन कि प्रविधिले नै स्वस्थ्य माटो, स्वस्थ्य वातावरण, स्वस्थ्य वाली,स्वस्थ्य उत्पादन,दिगो कृषि अर्थतन्त्र निर्माणमा ईन्जिनको काम गर्दछ । एक जापानी विज्ञानको ईतिहासविद्ले भनेको छ “ १९औं शताव्दी रसायनको थियो जस्तै रासायनिक मलखाद,रासायिनिक विषादी, २० औं शताव्दी भौतिक शताव्दीको थियो जस्तै कृषिको लागि कृषि औजार, उपकरण भने २१औं शताव्दी जैविक अनुसन्धानको विषय सुचि वनेको छ विशेषतः जैविक औद्यौगीकिय वा व्यवसायिको छ । अर्को अर्थमा अनुसन्धान भनेको समस्या समाधानमुलक प्रविधिको खोज, अन्वेषण, अविष्कार र प्रयोगको अर्थमा वुझ्न आवश्यक छ । प्रविधि यस्तो संभाग हो जहां अनुसन्धानले मुद्रालाई ज्ञानमा रुपान्तरण र नवीन प्रविधिले ज्ञानलाई मुद्रा,सम्पतिमा रुपान्तरण गर्छ । अर्को अर्थमा प्रविधिको प्रयोगले कृषिको व्यवसायिकरण, आद्योगिकिकरण र आधुनिकिकरणमा स्थायीत्व प्रदान गर्छ, उत्पादन तथा उत्पादकतव वृद्धिमा दिगोपना प्रदान गर्छ । नेपालको विकासमा कृषिको अग्रण्ी भूमिका एवं नेतृत्वको संभावना रहेकोले  कृषि क्षेत्रमा आत्मनिभर र स्वाधिन कृषि अर्थतन्त्र निर्माणको लागि“ १९औं शताव्दी रसायनक, २०औं शताव्दी भौतिक अनुसन्धानको जगमा २१औं शताव्दी का आवश्यकतामा आधारित जैविक औद्यौगीकिय अनुसन्धान आवश्यक छ । 

कृषि अनुसन्धानको पुनर्संरचनाको आवश्यकता

नेपाल भौगोलिक र जैविकविविधताको वैभवशाली देशमा कृषि पेशा रणनीतिक, गतिशील र वहुआयामिक व्यवसाय मात्र नभएर मानवजीवनको अभिन्न अंग हो । नेपाल खाद्यान्न वाली २८, तरकारी २१३,दलहन वाली २७, तेलहन वाली २६, नगदे व्यवसायिक औद्योगीक वाली १९, जैविक विषादीयुक्त वनस्पति ६४,मसला वाली २०र२५, पुष्प ३० र४० वालीवस्तुहरुको गन्य र नगन्य रुपमा खेति व्यवसाय भैईरहेका छन । त्यस वालीहरुमा अनुसन्धान र प्रविधि विकस गर्ने जिम्मेवारी लिएको कृषि अनुसन्धानका अन्तर्गत कार्यालयहरुको संख्या ६२ वटा मध्ये २६ वटा केन्द्र उपत्यका स्थित (काठमाण्डौ, भक्तपुर, ललितपुर) र वांकि ७४ जिल्लामा २६ वटा मात्र केन्द्रीकृत छ । त्यत्ति मात्र होईन भौतिक संरचना, अनुसन्धानकताहरु,वजेट र कार्यक्रम, शक्ति एवं अधिकारहरु तथा अन्य केन्द्रीत अवस्थामा रहेको कारण यसले आत्मनिर्भरता हुने वालीवस्तुहरुमा अनुसन्धन गर्नै सक्दैन । यस्तो अनुसन्धाले राष्ट्रिय महत्व राख्ने वालीवस्तुहरुलाई समेटनै सक्दैन । शहर केन्द्रीत अनुसन्धान प्रणालीेको कारण किसान र सरोकारवालाहरु विज्ञान एवं प्रविधिमा आधारित विकसित एवं प्रमाणित प्रविधिसम्म पहुंच तथा प्रविधि ग्रहणको अभाव मात्र नभै अनुसन्धाकर्ता, प्रसारकर्ता,प्रयोगकर्ता बीच समन्वय एवं दिगो व्यवस्थापनको पनि अभाव छ । संरचना र कार्यक्रमहरु नतिजामुखि नभै अन्तरमुखि, दोहोरापना, तेहोरापना, खर्चिलो,ं बोझिलोको तथा खरिदमुखि मात्रै हुने गरेको छ । कृषि विकास नीतिहरु, अनुसन्धानका कार्यक्रम, भौतिक संरचनाहरु, तथा अनुसन्धानकर्ताहरुको विकास, व्यवस्थापन तथा भर्ना कार्यक्रमको प्रभावकारी रुपमा कार्यान्वयन हुन नसकेको अवस्था छ । यस्तो यथास्थितिमा नेपालले विश्वको परिवर्तित परिदृश्य खुला वजार अर्थनीति, भूमण्डलीकरणको प्रतिस्पर्धि मागलाई वर्तमान संरचनाले सम्वोधन गर्न सक्दैन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा र खाद्य सम्प्रभुताको संवोधन गर्न सक्दैन, कृषि—वन—पर्यावरण—पर्यटन, कृषिमैत्री दिगो पर्यावरण—प्राङ्गागारिक खेति प्रणाली, जलवायु परिर्वन अनुकूलनको संवोधन गर्न सक्दैन, स्थानीय तहको कृषिका समस्याहरु समाधानार्थ प्रविधिहरुको विकास गर्न नसकिने अवस्था छ भने अर्को तर्फ संगठनात्मक संगठन, दक्ष अनुसन्धानकर्ताहरुको सहि सदुपयोग छैन, कार्यक्रमहरुको डुप्लीकेशनमा सीमित बजेटको दुरुपयोगको अवस्था छ आदि समस्याहरुको निराकरणको लागि कृषि अनुसन्धानको पुर्संरचना आवश्यक छ । अव प्रश्न उठ्न सक्छ, पुनर्संरचनालाई कसरी परिभाषित गर्ने हो ? प्रारुप रुपरेखा कस्तो किसिमको हुने हो ? आदि जिज्ञासाहरु । कुनै संस्थाहरुको नाम मात्र परिवर्तन गर्नु पुनर्संरचना होईन, सुधार पनि होईन, यो परम्परागत आत्मकेन्द्रीत सोच मात्रै हुन सक्छ ।

मानव जगत अस्तित्वमा रहुन्जेल कुनै पनि शताव्दीमा जीवननिर्वाहको लागि कृषिको महत्व र आवश्यकता रहिरहने छ, अर्थात कृषिविना वांच्न सक्दैन । त्यस अर्थमा कृषि क्षेत्रमा क्रमिक विकास गर्दै आत्मनिर्भर तर्फ ध्यान केन्द्रीत हुन अपरिहार्य छ । प्रविधि विकास गर्न परिषद अन्तरराष्ट्रियस्तरको राष्ट्रिय संस्था हो । नेपालको  हिमाल,पहाड र तराईको आधारमा वर्गिकरण होईन, वालीवस्तुहरुको ठाउं विशेषको हावापानी ,माटो अनुकूल, संभाव्यता, राष्ट्रिय आवश्यकता, किसानको माग आदिको महत्वका आदिको आधारमा (१) खाद्यान्न वालीको आत्मनिर्भरमा जोड दिदै व्यवसायिकरण, (२) वागवानी वाली(तरकारी, फलफूल एवं पुष्प) मा आत्मनिर्भर, व्यवसायिकरण एवं व्यापार (३) नगदे वालीमा व्यवसायिकरण, आधुनिकराण, औद्योगिककिकरणको लागि प्राथमिकता निर्धाराण र भौतिक संरचनाको निर्माण, वैज्ञानिक जनशक्तिहरुको विकास र दिगो आर्थिक श्रोतको व्यवस्थापन राजनीतिक दल, राष्ट्रिय नेतृत्व र उच्चपदस्थ्य प्रशासनिक कर्मचारीतन्त्रले जिम्मेवारी एवं नैतिक दायितवका साथ के सोचन जरुरी छ भने विदेशी विषाक्त र कचरा खाद्यवस्तुहरुको प्रतिस्थापन गर्दै कृषि क्षेत्र उत्पादनशील, नाफामुलक र दिगो वनाउनु पर्छ । क्षमतावान एवं स्वस्थ्य किसान, स्वस्थ्य कृषि तथा पशुपंक्षी जन्यवस्तुहरुको उत्पादन अपरिहार्य एवं नितान्त जरुरी भएकोले  केन्द्रीकृत कृषि अनुसन्धानको संरचनालाई ग्रामिण लक्षित किसान, कृषि उद्यमी एवं अन्य सरोकारवालाहरुलाई केन्द्र विन्दुमा राखि कृषि अनुसन्धान परिषद्लाई भौतिक संरचना, अनुसन्धानकर्ता र आर्थिक रुपले सवल, सक्षम, गतिशील र उत्पादनशील संस्थाको आवश्यक छ ।  

परिषद्का मुख्य नीति एवं कार्यहरु 

  • केन्द्रीय कार्यालयले कृषि अनुसन्धान नीति निर्माण, प्राथमिकता निर्धारण, श्रोत साधनहरुको विनियोजन, दीर्घकालिन योजना सम्वन्धि संगठनात्मक संरचना, समन्वय,योजना निर्माण, कृषि अनुसन्धानको कार्यान्वयन र अन्य सरकारको कृषि मन्त्रालयसंग समवन्धी निर्देशन वमोजम कार्यान्वयन र राय सुझव दिनु
  • राष्ट्रिय कृषि अनुसन्धान नीति निर्माण र अनुसन्धानका कार्यक्षेत्रका प्राथमिकता निर्धारण, राष्ट्रिय विकासका उदेश्यहरु अनुरुप कृषि अनुसन्धानको समग्र उदेश्य र दृष्टीकोण, कार्यक्षेत्रको समय सापेक्ष पुनर्परिभाषित गर्ने ।
  • राष्ट्रिय अनुसन्धानमा परम्परागत, प्रविधिहरुको खोज,अन्वेषण,अविष्कार र उच्चस्तरको नवीनतम प्रविधि विकासको लागि आवधिक समिक्षाको आधारमा प्राविधिक मानव श्रोत संसाधनको विकास,व्यवस्थापन,आवश्यक दरवन्दीहरुको सिर्जना, पदपूर्तिको व्यवस्थापन आदिको नीतिगत योजना निर्माण, समय सापेक्ष अनुसन्धान नीति निर्माण तथा स्थायी अस्थायी वजेटको व्यवस्थापन, विकास, प्रगति र नवीन कार्यक्रमहरुको अनुगमन,मुल्यांकन, र परियोजनाहरु सम्पन्नताको प्रभावको विश्लेषण,
  • कृषि अनुसन्धान प्रतिष्ठानको आवश्यकता अनुसार वजेट, अनुसन्धानकर्ता र भौतिक श्रोतहरु समवन्धि उपयुक्त एव.मनासिव अधिकारहरु प्राप्तीको जनशक्तिहरुको सेवा सुविधा र शर्तको नेपाल सरकार समक्ष सिफारिस र कृषि अनुसन्धान परिषद् र सरकार वीच संचार माध्यमको काम गर्ने ।
  • एकिकृत अनुसन्धान,शिक्षण, प्रसार र प्रविधि उपयोगकर्ता, निजी र सामुदायिक समुह विच सहभागिता आदिको नीतिगत समन्वय एवं लिंकेज सन्यन्त्र निर्माण,
  • उच्चस्तरको अनुसन्धान,विकास र नवीनतम् प्रविधि विकासको लागि राष्ट्रिय र अन्तरराष्ट्रिय अनुसन्धान संघ संस्थाहरुसंग नीतिगत सम्वन्धन, समन्वय,र सहकार्य प्रवद्र्धन, 
  • कृषि अनुसन्धान प्रतिष्ठानहरुको संगठनात्मक संरचना, कर्मचारीहरु, वितिय,  विषय विभागहरु, कृषि अनुसन्धान नीति र योजना, परियोजना र कार्य सम्पादनको समय सापेक्ष आवधिक समिक्षा गर्ने ।
  • कृषि क्षेत्रको विकासका कार्यसुचि तथा उदेश्य प्राप्तीको लागि अनुसन्धान केन्द्रहरुलाई सवल, सक्षम,गतिशील र उत्पादनशील निर्माण तथा उत्कृष्ट केन्द्रको रुपमा विकास

कृषि अनुसन्धान संरचनाको नयां मोडेल

कृषिले खाद्य तथा पोषण सुरक्षा, खाद्यान्न क्षेत्रमा आत्मनिर्भर, स्वाधिन कृषि अर्थतन्त्र निर्माणमा अहंम भूमिका खेलेकोले कृषि वालीवस्तुहरुको राष्ट्रिय आवश्यकता, किसान, कृषि उद्योगी व्यवसायिक तथा अन्य सरोकारवालाहरुको माग अनुसार अध्ययन, अनुसन्धान र प्रविधि विकासको लागि केन्द्रीकृत कृषि अनुसन्धानको वालीवस्तु विशेष राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रतिष्ठानको रुपमा पुनर्संरचना गर्न अति आवश्यक  छ । भारतीय विद्वान टी.आर. रामानाथनको अनुसार संगठनलाई  (क) #डिभलपमेन्टल, ट्रान्जिसनल र ट्रान्सफरमेशनल  तीन किसिमको परिवर्तन भनेको छ । समग्रमा भन्नु पर्दा विभिन्न देशका अनुसन्धान आधारित सुचना, सन्दर्भ ग्रन्थहरुको समिक्षा, संगठनात्मक संरचनाको अध्ययन,समिक्षा, नीतिहरु, भिजन अभिलेख, ज्ञान र अनुसन्धान आधारित सिद्धान्त अनुसार आधारभूतरुपमा संगठनको विघटन, विलय, रुपान्तरण, र आवश्यकता अनुसार नयां संगठनको निर्माणा हो भने वुझ्नु पर्छ । नया संरचनाले पारदर्शी र जिम्मेवारी वोद्यका साथ प्रतिष्ठागत अनुसन्धानका कार्यक्रम प्रभावकारी रुपमा संचालन तथा सम्पादन सम्पन्न, अनुसन्धानकर्ताहरुको सोच एवं व्यवहारमा अनुसन्धानमय वातावरणको निर्माण आफ्नो विषयको विज्ञता, कुशलता, एवं कार्यक्षमतामा अभिवृद्धि र अन्य श्रोत साधनहरुको समुच्चित सदुपयोग मात्र हैन वर्षेनि प्रविधिहरुको उत्पादन हुन्छ र प्रविधिको प्रयोगले उत्पादन तथा उत्पादकत्व वृद्धि मार्फत आत्मनिभर हुदै हरित कृषि अर्थतन्त्रको निर्माण हुन्छ । रािष्ट्रय कृषि अनुसन्धान प्रतिष्ठान, राष्ट्रिय पशुविज्ञान अनुसन्धान प्रतिष्ठानलाई विघटन गरि वनस्पति पजनन्, माटो —पोषणतत्व—सिचाई, वाली रोग, किट विज्ञान, जीवरसायन एवं जैविक प्रविधि, कृषि यन्त्र, वाली विज्ञान,#वायोमेट्रिक्स, प्रशोधन प्रविधि, प्रविधि सल्लाह प्रसार, प्रकाशन सुचना संचार प्रविधि, सामाजिक—आर्थिक, प्रशासन एवं आर्थिक प्रशासन आदि विभागहले (क) फन्डामेन्टल (ख) #स्ट्राटेजिक (ग) एप्लायड (घ) एडप्टिभ जस्ता उच्चस्तरको अनुसन्धान गर्न  सवै वालीहरुको छुट्टा छुट्टै राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रतिष्ठान उपयुक्त हुन्छ । यस सानो आलेखमा वाली तथा वागवानी तर्फको पुनर्संरचनाका संंक्षिप्त खाका प्रस्तुत गरेको छु । 

(१)कृषि अनुसन्धानको केन्द्रय कार्यालयमा रहेका अनावश्यक निर्देशालयहरुलाई विघटन गरि अनुसन्धान निर्देशालय  र प्रशासन निर्देशनालयको मात्र  आवश्यक छ । 

(२)राष्ट्रिय वागवानी अनुसन्धान केन्द्र खुमलटार, वागवानी अनुसन्धान केन्द्र दैलेख, वागवानी अनुसन्धान केन्द्र पोखरा आदिलाई विघटन वा विलय गरि “उष्ण प्रदेशीय वागवानी केन्द्र, सर्लाहीलाई राष्ट्रिय वागवानी अनुसन्धान प्रतिष्ठान” को रुपमा रुपान्तरण र त्यस अन्तर्गत उष्ण समशितोष्ण एवं शितोष्ण भौगोलिक विविधताको आधारमा क्षेत्रीय÷प्रादेशीक छुट्टा छुट्टै तरकारी,फलफूल, पुष्प र कन्द मूल अनुसन्धान केन्द्रहरु र स्थान विशिष्ट किसानको आवश्यकता  अनुसार थप प्रयोगात्मक फार्मको स्थापना,

(३)राष्टिय व्यवसायिक वाली अनुसन्धान कार्यक्रम, कृषि अनुसन्धान केन्द्र धनकुटा, जुटवाली अनुसन्धान कार्यक्रम ईटहरीलाई विघटन वा विलय गरि “राष्ट्रिय व्यवसायिक वाली अनुसन्धान प्रतिष्ठान”  र त्यस अन्तर्गत जुट, कपास, चिराईतो, आदिका वेग्ला वेग्लै भौगोलिक विविधता अनुसार क्षेत्रीय÷प्रादेशिक अनुसन्धान केन्द र ठाउं विशिष्ट किसानको आवश्यकता  अनुसार थप प्रयोगात्मक फार्मको  स्थापना, 

(४)चिया तथा कफी राष्ट्रिय महत्व एवं विदेशी मुद्रा आयआर्जनको श्रोत भएकोले राष्ट्रिय व्यवसायिक वाली  अनुसन्धान केन्द्र खुमलटार र कफि अनुसन्धान कार्यक्रम, गुल्मी,लाई विघटन गरि “राष्ट्रिय प्लान्टेशन वाली अनुसन्धान प्रतिष्ठान” र त्यस अन्तर्गत क्षेत्रीय/प्रादेशिक अनुसन्धान केन्द्र को संरचना निर्माण र स्थान विशिष्ट किसानको आवश्यकता  अनुसार थप प्रयोगात्मक फार्मको स्थापना,

(५)नेपालमा मसला वालीहरु महत्वपूर्ण स्थान ओगटेकोले अदुवावाली अनसन्धान कार्यक्रम सल्यानलाई “राष्ट्रिय मसलावाली अनुसन्धान प्रतिष्ठानका”रुपमा र त्यस अन्तर्गत क्षेत्रीय÷प्रादेशिक अनुसन्धान केन्दहरु र स्थान विशिष्ट विभिन्न मसलावाली र किसानको आवश्यकता  अनुसार उष्ण समशितोष्ण  एवं शितोष्णको आधारमा स्थापना,

(६) राष्ट्रिय कृषि वातावरण, कृषि प्रविधि सूचना केन्द्र, वाह्य अनुसन्धान,वाली विज्ञान, किट विज्ञान, माटो विज्ञान, वाली प्रजनन् तथा आनुवांशिक, खाद्य , जैविक प्रविधि, कृषि औजार अनुसन्धान, कृषि यन्त्र परिक्षण तथ अनुसन्धान, वाली रोग, कृषि ईन्जिनियरिङ्ग,कृषि नीति, विउ विज्ञान प्रविधि आदिलाई विघटन एवं पुनर्गठन गरि अन्तराष्ट्रियस्तरको प्रयोगशाला र वहुविषयक विज्ञहरु सहित ९ःगतिष्मष्अष्उष्लिबचथ ब्उउचयबअजभक० को धान,मकै,गहु, कोशेवाली, तेलवाली, उखुवाली, आलुवाली, सुन्तलावाली, कृषि औजार एवं यन्त्र, आदि सम्वन्धि सवै वालीहरुको छुट्टा छुट्टै “राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रतिष्ठान” नयां संरचना निर्माण,र त्यस अन्तर्गत आफ्नै आफ्नै क्षेत्रीय÷प्रादेशिक÷स्थानविशेष अनुसन्धान केन्द्रहहरुको स्थापना र स्थान विशिष्ट किसानको आवश्यकता  अनुसार थप प्रयोगात्मक फार्मको स्थापना,।

(७) कृषि अनुसनधान तथा तालिम केन्द्र :

 कृषि अनुसन्धान निर्देशनालय तरहरा सुन्सरी, परवानीपुर वारा, लुम्ले कास्की, डोटी र गुठीचौर जुमलालाई प्रशासकिय रुपमा होईन, प्राविधिक रुपमा अनुसन्धानका वहुपक्षिय रुपमा रुपान्तरण आवश्यक छ । विभिन्न वालीहरुको अनुसन्धानवाट प्राप्त प्रविधिहरुको विभिन्न माटो, हावापानीमा सुहाउंदो, उपयोगीको प्रमाणिकरण, परिक्षण, टेष्टिङ्ग, भेरिफिकेशन, जर्मप्लाजम संकलन, संरक्षण,सम्वद्र्धन, फिल्ड जिन वैंक स्थापना, विषादीयुक्त वनस्पति उद्यान, प्राङ्गारिक खेति प्रविधि अनुसन्धान, खेति प्रणाली अनुसन्धान, नर्सरी एवं श्रोत वीउ व्यवस्थापन, स्थानीयस्रतरमा श्रोत कस्टोडियन किसानको तयारी, आदि प्रयोगात्मक फार्मको रुपमा प्रयोग हुने । किसान एवं अनुसन्धानकर्ताको सहभागिताममा संयुक्त अनुसन्धान, नियमति भ्रमण, अवलोकन, तथ्यांक संकलन, ,प्रविधि प्रदर्शन, प्रविधि प्रसार, विस्तार, हस्तान्तरण आदि कायक्रम संचालन, अनुसन्धानकर्ता, प्रविधि प्रसारकर्ता, प्रयोगकर्ता, कृषि उद्यमी व्यवसायि तथा अन्य सरोकाकारवालाहरुको समन्वय र अन्तरसम्वन्ध कार्यक्रम संचालन, किसान, अनुसन्धानकर्ता, राष्ट्रिय नेतृत्व एवं जनप्रतिनिधिहरु र अन्य सरोकारवालाहरुको विच अन्तक्रिया,  कृषि परियोजनाहरु निर्माण, समाधानमुलक समस्याहरुका खोज, शीप, ज्ञानको आदान प्रदान, आदि सम्वन्धि समन्वय आदिको लागि क्षेत्रीय वा प्रादेशिक,वा स्थानविशेष “कृषि अनुसनधान एवं तालिम केन्द्रमा रुपान्तरण  हुने ।

(८) राष्ट्रिय कृषि अनुसन्धान नीतिः 

साधारणतया, कृषि नीति भनेको कृषि अनुसन्धान सम्वन्धि योजना, कार्यक्रमहरुको कार्यान्वयनको मार्गदर्शन हो । अथवा कुन अनुसन्धान प्रतिष्ठानले भौगोलिक वातावरण अनुसार कुन कृषि वालीवस्तुको अनुसन्धान कहां गर्ने, कसरी गर्ने, कस्को लागि गर्ने, भूमिका तथा जिम्मेवारीको पूर्ण विवरण सहितको ऐन, नियम, विनियम, कानून, नियमन  आदिको वारेमा सुस्पष्ट उल्लेख भएकोे नीति मार्गदर्शन हो, दर्पण हो । असल नीति, योग्यता, र पदीय जिम्मेवारीमा राज्यको अंगहरुको संचालन प्रणालीको स्थिरता,परिपक्ता, वैद्यता, र आयुको योग्यता निर्माण हुन्छ । राज्यको कुनै पनि निकायको भावी कार्यक्रम संचालन तथा विकास नीतिविनाको यात्रा शुन्य मस्तिष्क र दृष्टिविहिन हुन्छ त्यसरी नै योग्यहरुविना नीतिको रथ गुड्याउन गाह्रो हुन्छ । विश्वका हरेक देशहरुको आ—आफ्नो किसिमका राष्ट्रिय कृषि अनु।सन्धान नीति छन तर नार्क २०४८ साल वैशाखा २५ गते स्थापना भए देखि आजको मितिसम्म शहरिया केन्द्रीत विज्ञहरु, नीति निर्माताहरु काठमाण्डौ उपत्यकालाई मात्र ठानेर  कृषि क्षेत्रलाई निम्न दर्जामा आंकलन गरी राष्ट्रिय कृषि अनुसन्धान नीति निर्माण गरेन, किसानहरु अन्नदाता हुन भने कहिले पनि ठानेन, किसान राष्ट्रको शान हो भनेर कहिले पनि ठानेन, फलतःत्यही राष्ट्रिय मान्छेहरु विदेशी कचरा र विषाक्त खाद्यवस्तुहरु माथि दैनिकी जीवन धान्न वाध्य हुनु परेको अवस्था छ । नेपाल सरकारको मार्गदर्शन, कार्यक्रम आदिको भरमा परिषद् अहिलेसम्म कृषि अनुसन्धान गर्दै आएको छ । राष्ट्रिय प्राथमिकता प्राप्त कृषि क्षेत्रमा व्यवसायिकरण, आधुनिकिकरण, औद्योगिकिकरण मार्फत आत्मनिर्भर र स्वाधिन कृषि अर्थतन्त्र निर्माणको लागि लक्षित वालीहरुको लक्षित उच्चस्तरको अनुसन्धान र प्रविधि विकास अति आवश्यक छ । त्यस अर्थमा भौगोलिक अवस्थित वालीहरुको प्राथमिकिकरण, नीतिगत मानव संसाधन विकासको योजना, क्षमता अभिवृद्धि, व्यवस्थापन, आर्थिक व्यवस्थापन, प्रविधि,ज्ञान,शीपको व्यवस्थापन तथा हस्तान्तरण, जैविक विविधता तथा प्राकृतिक श्रोतहरुको दिगो संरक्षण,सम्वद्र्धन र उपयोग, नीतिगत राष्ट्रिय एवं अन्तरराष्ट्रिय अनुसन्धान संघ संस्थाहरु र नीजि क्षेत्रको प्रत्यक्ष संलग्नता, सम्वन्ध, समन्वय र सहयोगाको सन्यन्त्र, कृषि क्षेत्रमा छरिएर भईरहेका डुप्लीकेशन र आत्मकेन्त्रित अनुसन्धानको लागि अनुसन्धान जस्ता अनावश्यक अनुसन्धानहरु हटाउन, नतिजामुखि अनुसन्धानको लागि संस्थाहरुको शिक्षा, अनुसन्धान र प्रसारलाई नीतिगत एकिकृत संचालन, संस्थाको सवल, दुर्वल, अवसर र चुनौतिहरुको ५ वर्षे आवधिक समिक्षा, र आवश्यकता अनुसार संस्थाको पुनर्संरचना आदिको प्रावधान नीतिमा हुने गरि राष्ट्रिय कृषि अनुसन्धान नीतिको निर्विकल्प निर्माण आवश्यक शर्त हो ।

(९) मानव संसाधनको विकास र व्यवस्थापन :

विश्वका हरेका देशहरुमा वालीवस्तुहरुको महत्वको आधारमा छुट्टा छुट्टै अनुसन्धान प्रतिष्ठान रहेका छन । श्रीलंकाको चिया अनुसन्धान प्रतिष्ठानमा अनुसन्धानकर्ता ८८ जना, वंगलादेशको चिया अनुसन्धान प्रतिष्ठानमा अनुसन्धानकर्ता १८२ जना र धान अनुसन्धान प्रतिष्ठानमा ६७३ जना कार्यरत छन । पाकिस्तानको राष्ट्रिय चिया अनुसन्धान प्रष्ठिानमा अनुसन्धानकर्ता ९ जना, केन्याको कृषिमा अनुसन्धानकर्ता ९४७ छन जव कि नेपालको समग्र कृषिमा अनुसन्धानकर्ता (वैज्ञानिक ४१३ मा कार्यरत २३४, र प्राविधिक अधिकृत ३६३ मा कार्यरत ३१९ जना अर्थात परिषदको ६२ अनुसन्धान कार्यालयहरुको ७७६ दरवन्दी मध्ये कार्यरत ४५३ जना मात्र प्राविधिक कर्मचारी रहेको छ । तथ्यांकले के देखाउं छ भने अरु देशहरुको तुल्नामा नेपालको अनुसन्धानमा दक्ष जनशक्तिहरुको निकै अभाव छ, यसले अनुसन्धान गर्नै सक्दैन । धेरै जसो कार्यालयहरु एक व्यक्ति एक प्रमुखको भरमा संचालनको अवस्थामा छ,  प्राविधिक कर्मचारीहरुको नयां भर्ना प्रक्रिया छैन, वर्षे पिच्छे ५०।६० जना अनिवार्य अवकास हुन्छ । अर्को तर्फ विदेश अवसर पाउने वितिकै दक्षजनशक्तिको पलायनको समस्या झन गम्भिर छ । वजेटको पर्याप्तता जति भए पनि अनुसन्धानकर्ताको अभावमा काम हुनै सक्दैन । उत्पादनका साधनहरु मध्ये मानवजनशक्ति सवै भन्दा महत्वपूर्ण मानिन्छ । कृषि क्षेत्रको विकासको लागि कृषि अनुसन्धानकर्ताहरुको आत्मवल वढाउन र पलायनवाट रोक्न समय सापेक्ष वृति विकास, नयाँ नयाँ विषयवस्तुहरुमा क्षमता अभिवृद्धि तालिम, उच्च अध्ययन, अन्य सुविधताहरु सहितको स्वतःसम्पन्नताको अनुभूति हुनु अनिवार्य शर्त हो । फन्डामेन्टल,स्ट्राटेजिक,एप्लायड,एडप्टिभ जस्ता सफल उच्चस्तरको अनुसन्धान मार्फत दिगो उत्पादकत्व वृद्धि र नाफामुलक कृषि व्यवसायको लागि प्रत्येक राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रतिष्ठानमा २२ देखि ८८ अनुसन्धानकर्ता आवश्यक र नयां दरवन्दीको सिर्जना आवश्यक छ, अन्यथा परिषद्को  विघटन भविष्यमा सुनिश्चित छ ।

(१०) सल्लाहकार समिति र अवकाश प्राप्त अनुसन्धानकर्ताको उपयोग

कर्यकारी निर्देशकलाई अनुसन्धानका कार्याक्रम नीति, परियोजना निर्माण, आर्थिक श्रोत, योजना एवं कार्यान्वय वीच सार्वजानिक सम्वन्ध, सम्वन्धि राय, सुझावको लागि कार्यकारी निर्देशकको मातहतमा अवकाश प्राप्त अनुसन्धानकर्ताहरु र अन्य कृषि विज्ञहरुको समुहको प्राविधिक सल्लाहकार समितिको रुपमा संगठनात्मक संरचना आवश्यक छ ।

(लेखक वरिष्ठ कृषिविद् हुनुहुन्छ )





Sunday, 20 September 2020

विद्यापति पुरस्कार कोषसॅ पुरस्कृत स्रष्टा









 Sources :नेपाल विद्यापति पुरस्कार अर्पण समारोह, कार्यक्रम पुस्तिका–२०७७ असार २७, विद्यापति पुरस्कार कोष , जनकपुरधाम