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नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र में वर्षौ से भाषा के मानक पर विवाद रहा हैं । इस विवाद का समाधान किए बेगर कथित ‘मानक जाति (उच्च जाति)’ की भाषिका, शैली, लब्ज, तर्ज, लेखनी और उच्चारण को ‘मैथिलीभाषी बहुसंख्यक निम्न जाति’ पर थोपारा जा रहा हैं । नेपाल में नेपाली के बाद दूसरे सब से अधिक बोली जानेबाली भाषा है मैथिली । सरकारी आँकडोें के मुताबिक कूल आबादी के ११ दशमलव ०७ फिसदी लोगों की यह भाषा हैं । खास करके पूर्वी और मध्य तराई–मधेस के कुछ हिस्सो मे यह विभिन्न भाषिका के रुप मे बोली जाती हैं । परन्तु वहाँ कथित उच्च जाति के बाहेक अन्य के बोली/भाषिका को ‘शुद्ध मैथिली’ की मान्यता नही है । भारत बिहार मधुवनी के पाँच कोष बृत मे रहने बाला उच्च जाति (ब्राह्मण सहित के तीन जातिय समूह) का ‘मैथिली बोली’ को अघोषित रुप से नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र मे विभिन्न माध्यमों के द्वारा मानक के तौर पर प्रचार में लाया जा रहा हैं । नेपाल सरकार भी इस प्रचार शैली की पृष्ठपोषक बनि हुईं हैं । इसके ठोस प्रमाण सरकारी संचार माध्यम भी हैं । गोरखापत्र मे मैथिली पृष्ठ, रेडियो नेपाल में मैथिली समाचार (अभि बन्द हैं), नेपाल टेलिभिजन मे मैथिली कार्यक्रम और प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित होनेबाली पत्रिका सहित के सरकारी अनुदान मे संंचालित संचार माध्यम ० दशमलव ८३ फिसदी आवादी की भाषिका को प्रचार कर रही हैं । विद्यालयस्तरीय मैथिली मातृभाषा की पाठ्यपुस्तक और पाठ्यसामग्री भी उसी अभियान के दूसरे रुप हैं । इसिलिए तो इन सभी मे कथित ‘मानक जाति’ के लोगो को ही जिम्मेवारी दिई गई हैं औ दिई जाती रही हैं । अन्य बहुसंख्यक जाति के लोगों को अघोषित रुप से बन्देज है या वहिष्कार किया गया हैं । अपनी वास्तविक चोली बदल कर पद, अवसर और सुविधा पाने के लिए बेचैन कुछ स्वार्थी लोक उसी अभियान के पृष्ठपोषक बने हुए हैं । और ब्राह्मणवादी के पद्चिन्ह पर चल्ने को वह अपने को ज्यादा सुरक्षित और आराम महशुश करता हैं ।
एक अध्ययनके मुताबिक खास करके ब्राह्मणवादीयों की कब्जा में सभी सरकारी संचार माध्यम है । इन माध्यमों मे उच्च जातिय समूह के कायस्थ और राजपूत समुदाय समेत को दरकिनार करते हुए, सिर्फ ब्राह्मणवादी की हालिमुहाली देखने को मिलती हैं । यहाँ कुछ अपवाद को छोडकर नीजि क्षेत्र सहित के बात करें तो कमोवेश सतप्रतिशत की आँकडा पार कर सकती हैं, जिसमे ब्राह्मणवादी की एकतर्फी दबदबा हैं । वह लोक प्रतिभाशाली है, इसिलिए इस आँकडे मे उनका योगदान है, ऐसी बात नही । यह सब ब्राह्मणवादीयो की कलुषित मानसिकता के ही उपज और देन है,कहने मे किसी को संकोच नही होनी चाहिए । कथित ‘मानक मैथिली’ भाषा थोपरने की संकीर्ण लालसा और दबंग सोच का ही यह परिणाम हैं । सरकारी पत्रिका गोरखापत्र में कुछ वर्ष पहले मैथिली पृष्ठ के संयोजक से गैर–ब्राह्मण को वैसे ही नही हटाया गया था । इस बारे मे गोरखापत्र के एक पूर्व कार्यकारी सम्पादक महोदय ने इस स्तम्भकार को बारबार कह चुके है, ‘मैथिली भाषाके मानक गोरखापत्र के द्वारा समाप्त किया जा रहा है कहते हुए ब्राह्मणवादी लोक सम्बन्धित निकाय में डेलिगेसन लेकर के गए थे और अन्तर्गोत्वा गोरखापत्र से उसे खडेर दिया गया , उस पृष्ठ से दरकिनार किया गया । ’ गोरखापत्र के ही वह पत्रकार सिरहा के हैं, जहाँ सब से अधिक मैथिली भाषा बोली जाति है । यह तो एक प्रतिनिधिमूलक उदाहरण भर हैं । ब्राह्मणवादी कहते तो है, ‘अहाँ जे बजैत छ, ओहे मैथिली (आप जो बोलते है, वही मैथिली)’ । परन्तु यह सिर्फ नारा में सिमट सी गई है, व्यवहार मे यह कही भी नही दिखती हैं । इतना ही नही ब्राहमणवादी लोक ‘कथित मैथिली मानक’ के नाम पर कुछ कठपुतलिया भी खडे करते हैं । उसके माध्यम से भी अपना उल्लू सिधा करने मे लगे रहते हैं । बडी दुःख की बात हैं स्तुतिगान और गणेश परिक्रमा मे रमने बाले कुछ लोक आसानी से उनके कठपुतलिया बन जाते हैं । और मैथिली भाषी बहुजन समाज के लोगों की भाषिका और बोली को बलि की बेदी पर चढा देतें हैं । आम मैथिलीजन की जिव्हा के मिठासपूर्ण और माँ की गरिमामय बोली की गला घोंटने की अभिन्न अंग वह बन जाने हैं ।
नेपाल संघियता मे जाने के बाद बना प्रदेश मे सब से अधिक भाषा विवाद प्रदेश २ मे देखा गया हैं । इसके बहुत से कारणों मे ब्राह्मणवाद भी एक हैं । वहाँ की कूल आवादी मे ४५ दशमलव १८ फिसदी लोगों की मातृभाषा मैथिली हैं । बाँकी ५४ दशमलव ८२ फिसदी भोजपुरी, बज्जिका, मगही, थारु, उर्दू, नेपालीसहित के भाषाभाषी की हैं । तथ्यांक विभाग और त्रिभूवन विश्वविद्यालय केन्द्रिय समाजशास्त्र और मानवशास्त्र विभाग के ‘ सोसल इन्क्लुजन एटलस अफ नेपाल(भाग १ और २)’ के मुताबिक सप्तरी मे तीन चौथाई (७९ दशमलव १४ फिसदी) से अधिक लोगों की मातृभाषा मैथिली हैं । इसमें शून्य फिसदी से कम जनसंख्या बाले ‘मैथिली भाषी उच्च जाति’ के भाषिकाको कथित मानक के रुप मे प्रचार किया जा रहा हैं । जिला मे बाँकी १० दशमलव ४० फिसदी थारु, ४ दशमलव ११ फिसदी नेपाली और ३ दशमलव ८३ फिसदी उर्दू भाषी हैं । सिरहा मे ८५ दशमलव ८२ फिसदी, धनुषा मे ८५ दशमलव ७८, महोत्तरी मे ८० दशमलव ५८, सर्लाही मे ४९ दशमलव ०२, रौटहट मे ३, बारा मे ३ दशमलव ८२ और पर्सा मे ५ दशमलव १० फिसदी लोक मैथिली बोलते है । इन सभी जिलों मे भी मैथिली ब्राह्मणवादीयों की आबादी शून्य फिसदी से भी बहुत कम हैं । परन्तु उसके ही लेखनी, बोली, शैली, भाषिका अन्य बहुसंख्यक मैथिली भाषी को मानने के लिए बाध्य किया जा रहा हैं ।
दूसरे प्रमाणों के रुप में नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित सामग्रीयों को भी लिई जा सकती है । यह स्तम्भकार के एक अध्ययन के मुताबिक प्रतिष्ठान के अधिकांश प्रकाशित सामग्री मे मैथिली ‘मानक जाति’ के ही कब्जा हैं । प्रकाशनों मे उसी जाति के लोगो की रचनाएं और आलेखों की ढेर लगी हुई हैं । जमिनी और ग्रामिण लोगोंको उस मे निस्तेज किया गया हैं । यहाँ मैथिली पत्रिका के २०७६ अंक ८ को उदाहरण के तौर पर लिया गया हैं । पत्रिका मे कूल ३० सामग्री प्रकाशित हैं । जिसमे २० रचना÷आलेख (६६.६७ फिसदी) उच्च जाति के लोगों का ही हैं । बहुसंख्यक मैथिलीभाषी जाति के सिर्फ ८ रचना÷आलेख (२६.६६ फिसदी) और २ अन्य जाति के द्वारा लिखा गया सामग्री समावेश किया गया है, जो सिर्फ ६.६७ फिसदी हैं(तालिका देखें)
पत्रिका मे बहुमत जाति के आवादी बाले लोगोको खास करके दलित, मुसलमान और जनजाति को वहिष्कृत किया गया हैं । पत्रिका में मानक थोपने की भग्मग्दूर प्रयास किई गई है । आङन पत्रिकाके भाषा स्तम्भ में ‘एक राष्ट्र–एक भाषा नीति’ की आलोचनाए की गई हैं । मैथिली मे मानक जाति के भाषिका लागू करनेकी बात जोरदार रुप से उठाया गया हैं । इसिलिए तो उस स्तम्भ मे बहुसंख्यक मैथिली भाषी के प्रसंग आते ही लेखक महोदय अनुत्तरित हो जाते है और ‘प्रश्नवाचक चिन्ह’ रखते हुए आगे निकल जाते हैं (आङन २०७६ः२२ः२९ः३०) । प्रज्ञा प्रतिष्ठान के इस वार्षिक पत्रिका मे मैथिली अभियानयानी के रुप मे एक गैर ब्राह्मणका छोडकर बाँकी सभी उच्च जातिको उस सर्वमान से नाबाजा गया हैं । उसके मानक भाषिकाको लाधने का काम किया गया हैं । सब से अचम्भित बात तो यह हैं सम्पादकीय मे एक ब्लग साइटको विवादास्पद मानक जैसे सम्वेदनशिल विषय मे विज्ञापन के शैली मे प्रयोग मे लगा गया हैं । ब्लगको आथिकारिक तौर पर सरकारी मान्यता नेपाल मे कही नही है , उसको सरकारी पत्रिकाले प्रचार मे लाया हैं । पत्रिका मे एक लेखक महोदय ने मानक मैथिली और मानक जातिके नाम पर सत्यनारायण भगवान की कथा, विद्यापति पर्व, मैट्रिमोनियल साइट, मैथिली मसाज थेरैपी को आधार बनाकर तथ्यहीन बात और सप्रमाणित विषय को उजागर करन की कुचेष्टा किया गया मिलता हैं । अल्पसंख्यके भाषिका को बहुसंख्यक वा बहुजन के भाषिका बाले पर थोपना बन्द हो ।
-दिनेश यादव
(काठमाण्डू से प्रकाशित होनेवाली हिन्दी मासिक पत्रिका ‘द पब्लिक’ के लिउ ५ सेप्टेम्बर २०१९ (२०७६ भादव १९) मे लिखी गई यह आलेख । )







