Friday, 20 September 2019

मैथिली मानक की सच्चाई

हिन्दी भाषा 

नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र में वर्षौ से भाषा के मानक पर विवाद रहा हैं । इस विवाद का समाधान किए बेगर कथित ‘मानक जाति (उच्च जाति)’ की भाषिका, शैली, लब्ज, तर्ज, लेखनी और उच्चारण को ‘मैथिलीभाषी बहुसंख्यक निम्न जाति’ पर थोपारा जा रहा हैं । नेपाल में नेपाली के बाद दूसरे सब से अधिक बोली जानेबाली भाषा है मैथिली । सरकारी आँकडोें के मुताबिक कूल आबादी के ११ दशमलव ०७ फिसदी लोगों की यह भाषा हैं । खास करके पूर्वी और मध्य तराई–मधेस के कुछ हिस्सो मे यह विभिन्न भाषिका के रुप मे बोली जाती हैं । परन्तु वहाँ कथित उच्च जाति के बाहेक अन्य के बोली/भाषिका को ‘शुद्ध मैथिली’ की मान्यता नही है । भारत बिहार मधुवनी के पाँच कोष बृत मे रहने बाला उच्च जाति (ब्राह्मण सहित के तीन जातिय समूह) का ‘मैथिली बोली’ को अघोषित रुप से नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र मे विभिन्न माध्यमों के द्वारा मानक के तौर पर प्रचार में लाया जा रहा हैं । नेपाल सरकार भी इस प्रचार शैली की पृष्ठपोषक बनि हुईं हैं । इसके ठोस प्रमाण सरकारी संचार माध्यम भी हैं । गोरखापत्र मे मैथिली पृष्ठ, रेडियो नेपाल में मैथिली समाचार (अभि बन्द हैं), नेपाल टेलिभिजन मे मैथिली कार्यक्रम और प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित होनेबाली पत्रिका सहित के सरकारी अनुदान मे संंचालित संचार माध्यम ० दशमलव ८३ फिसदी आवादी की भाषिका को प्रचार कर रही हैं । विद्यालयस्तरीय मैथिली मातृभाषा की पाठ्यपुस्तक और पाठ्यसामग्री भी उसी अभियान के दूसरे रुप हैं । इसिलिए तो इन सभी मे कथित ‘मानक जाति’ के लोगो को ही जिम्मेवारी दिई गई हैं औ दिई जाती रही हैं । अन्य बहुसंख्यक जाति के लोगों को अघोषित रुप से बन्देज है या वहिष्कार किया गया हैं । अपनी वास्तविक चोली बदल कर पद, अवसर और सुविधा पाने के लिए बेचैन कुछ स्वार्थी लोक उसी अभियान के पृष्ठपोषक बने हुए हैं । और ब्राह्मणवादी के पद्चिन्ह पर चल्ने को वह अपने को ज्यादा सुरक्षित और आराम महशुश करता हैं । 
एक अध्ययनके मुताबिक खास करके ब्राह्मणवादीयों की कब्जा में सभी सरकारी संचार माध्यम है ।  इन माध्यमों मे उच्च जातिय समूह के कायस्थ और राजपूत समुदाय समेत को दरकिनार करते हुए, सिर्फ ब्राह्मणवादी की हालिमुहाली देखने को मिलती हैं । यहाँ कुछ अपवाद को छोडकर नीजि क्षेत्र सहित के बात करें तो कमोवेश सतप्रतिशत की आँकडा पार कर सकती हैं, जिसमे ब्राह्मणवादी की एकतर्फी दबदबा हैं । वह लोक प्रतिभाशाली है, इसिलिए इस आँकडे मे उनका योगदान है, ऐसी बात नही । यह सब ब्राह्मणवादीयो की कलुषित मानसिकता के ही उपज और देन है,कहने मे किसी को संकोच नही होनी चाहिए । कथित ‘मानक मैथिली’ भाषा थोपरने की संकीर्ण लालसा और दबंग सोच का ही यह परिणाम हैं । सरकारी पत्रिका गोरखापत्र में कुछ वर्ष पहले मैथिली पृष्ठ के संयोजक से गैर–ब्राह्मण को वैसे ही नही हटाया गया था । इस बारे मे गोरखापत्र के एक पूर्व कार्यकारी सम्पादक महोदय ने इस स्तम्भकार को बारबार कह चुके है, ‘मैथिली भाषाके मानक गोरखापत्र के द्वारा समाप्त किया जा रहा है कहते हुए ब्राह्मणवादी लोक सम्बन्धित निकाय में डेलिगेसन लेकर के गए थे और अन्तर्गोत्वा गोरखापत्र से उसे खडेर दिया गया , उस पृष्ठ से दरकिनार किया गया । ’ गोरखापत्र के ही वह पत्रकार सिरहा के हैं, जहाँ सब से अधिक मैथिली भाषा बोली जाति है । यह तो एक प्रतिनिधिमूलक उदाहरण भर हैं । ब्राह्मणवादी कहते तो है, ‘अहाँ जे बजैत छ, ओहे मैथिली (आप जो बोलते है, वही मैथिली)’ । परन्तु यह सिर्फ नारा में सिमट सी गई है, व्यवहार मे यह कही भी नही दिखती हैं । इतना ही नही ब्राहमणवादी लोक ‘कथित मैथिली मानक’ के नाम पर कुछ कठपुतलिया भी खडे करते हैं । उसके माध्यम से भी अपना उल्लू सिधा करने मे लगे रहते हैं । बडी दुःख की बात हैं स्तुतिगान और गणेश परिक्रमा मे रमने बाले कुछ लोक आसानी से उनके कठपुतलिया बन जाते हैं । और मैथिली भाषी बहुजन समाज के लोगों की भाषिका और बोली को बलि की बेदी पर चढा देतें हैं । आम मैथिलीजन की जिव्हा के मिठासपूर्ण और माँ की गरिमामय बोली की गला घोंटने की अभिन्न अंग वह बन जाने हैं । 

नेपाल संघियता मे जाने के बाद बना प्रदेश मे सब से अधिक भाषा विवाद प्रदेश २ मे देखा गया हैं । इसके बहुत से कारणों मे ब्राह्मणवाद भी एक हैं । वहाँ की कूल आवादी मे ४५ दशमलव १८ फिसदी लोगों की मातृभाषा मैथिली हैं । बाँकी ५४ दशमलव ८२ फिसदी भोजपुरी, बज्जिका, मगही, थारु, उर्दू, नेपालीसहित के भाषाभाषी की हैं । तथ्यांक विभाग और त्रिभूवन विश्वविद्यालय केन्द्रिय समाजशास्त्र और मानवशास्त्र विभाग के ‘ सोसल इन्क्लुजन एटलस अफ नेपाल(भाग १ और २)’ के मुताबिक सप्तरी मे तीन चौथाई (७९ दशमलव १४ फिसदी) से अधिक लोगों की मातृभाषा मैथिली हैं । इसमें शून्य फिसदी से कम जनसंख्या बाले ‘मैथिली भाषी उच्च जाति’ के भाषिकाको कथित मानक के रुप मे प्रचार किया जा रहा हैं । जिला मे बाँकी १० दशमलव ४० फिसदी थारु, ४ दशमलव ११ फिसदी नेपाली और ३ दशमलव ८३ फिसदी उर्दू भाषी हैं । सिरहा मे ८५ दशमलव ८२ फिसदी, धनुषा मे ८५ दशमलव ७८, महोत्तरी मे ८० दशमलव ५८, सर्लाही मे ४९ दशमलव ०२, रौटहट मे ३, बारा मे ३ दशमलव ८२ और पर्सा मे ५ दशमलव १० फिसदी लोक मैथिली बोलते है । इन सभी जिलों मे भी मैथिली ब्राह्मणवादीयों की आबादी शून्य फिसदी से भी बहुत कम हैं । परन्तु उसके ही लेखनी, बोली, शैली, भाषिका अन्य बहुसंख्यक मैथिली भाषी को मानने के लिए बाध्य किया जा रहा हैं । 

दूसरे प्रमाणों के रुप में नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित सामग्रीयों को भी लिई जा सकती है । यह स्तम्भकार के एक अध्ययन के मुताबिक प्रतिष्ठान के अधिकांश प्रकाशित सामग्री मे मैथिली ‘मानक जाति’ के ही कब्जा हैं । प्रकाशनों मे उसी जाति के लोगो की रचनाएं और आलेखों की ढेर लगी हुई हैं । जमिनी और ग्रामिण लोगोंको उस मे  निस्तेज किया गया हैं । यहाँ मैथिली पत्रिका के २०७६ अंक ८ को उदाहरण के तौर पर लिया गया हैं । पत्रिका मे कूल ३० सामग्री प्रकाशित हैं । जिसमे २० रचना÷आलेख (६६.६७ फिसदी) उच्च जाति के लोगों का ही हैं । बहुसंख्यक मैथिलीभाषी जाति के सिर्फ ८ रचना÷आलेख (२६.६६ फिसदी) और २ अन्य जाति के द्वारा लिखा गया सामग्री समावेश किया गया है, जो सिर्फ ६.६७ फिसदी हैं(तालिका देखें)


पत्रिका मे बहुमत जाति के आवादी बाले लोगोको खास करके दलित, मुसलमान और जनजाति को वहिष्कृत किया गया हैं । पत्रिका में मानक थोपने की भग्मग्दूर प्रयास किई गई है । आङन पत्रिकाके भाषा स्तम्भ में ‘एक राष्ट्र–एक भाषा नीति’ की आलोचनाए की गई हैं । मैथिली मे मानक जाति के भाषिका लागू करनेकी  बात जोरदार रुप से उठाया गया हैं । इसिलिए तो उस स्तम्भ मे बहुसंख्यक मैथिली भाषी के  प्रसंग आते ही लेखक महोदय अनुत्तरित हो जाते है और ‘प्रश्नवाचक चिन्ह’ रखते हुए आगे निकल जाते हैं (आङन २०७६ः२२ः२९ः३०) । प्रज्ञा प्रतिष्ठान के इस वार्षिक पत्रिका मे मैथिली अभियानयानी के रुप मे एक गैर ब्राह्मणका छोडकर बाँकी सभी उच्च जातिको उस सर्वमान से नाबाजा गया हैं । उसके मानक भाषिकाको लाधने का काम किया गया हैं । सब से अचम्भित बात तो यह हैं सम्पादकीय मे एक ब्लग साइटको विवादास्पद मानक जैसे सम्वेदनशिल विषय मे विज्ञापन के शैली मे प्रयोग मे लगा गया हैं । ब्लगको आथिकारिक तौर पर सरकारी मान्यता नेपाल मे कही नही है , उसको सरकारी पत्रिकाले प्रचार मे लाया हैं । पत्रिका मे एक लेखक महोदय ने मानक मैथिली और मानक जातिके नाम पर सत्यनारायण भगवान की कथा, विद्यापति पर्व, मैट्रिमोनियल साइट, मैथिली मसाज थेरैपी को आधार बनाकर तथ्यहीन बात और सप्रमाणित विषय को उजागर करन की कुचेष्टा किया गया मिलता हैं । अल्पसंख्यके भाषिका को बहुसंख्यक वा बहुजन के भाषिका बाले पर थोपना बन्द हो । 
-दिनेश यादव 
(काठमाण्डू से प्रकाशित होनेवाली हिन्दी मासिक पत्रिका ‘द पब्लिक’ के लिउ ५ सेप्टेम्बर २०१९ (२०७६ भादव १९) मे लिखी गई यह आलेख । )


Thursday, 19 September 2019

वर्णाश्रम

हिन्दी पुस्तक 

  • रामधारी सिंह दिवाकर

पंडित वचेश्वर झा की प्रसन्नता की ओर-छोर नहीं था। हाथ में एक हज़ार रुपए का मनीऑर्डर फॉर्म लिए वे स्वयं में समा नहीं रहे थे। मनीऑर्डर की जो कटिंग डाकिए ने उन्हें दी थी उसमें उनके पुत्र गुणानन्द का आह्लादित और आश्वस्त करता एक वाक्य यह भी था-‘माँ भगवती की कृपा से अब प्रतिमाह मनीऑर्डर भेजता रहूँगा।...’
युग-युग जिओ ! सुपुत्र ! युग युग जिओ ! शतायु भव !....शक्ति के परमोपासक पंडित वचेश्वर झा दालान की ‘ओलती’ के नीचे खड़े देवी भगवती के ध्यान में लीन हो गए-
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽ स्तुते।।....
उनके उन्मीलित नेत्रों के समक्ष जैसे साक्षात् भगवती ही अवतरित हो गई थीं। शुभ और मंगल-कामना के श्लोक वे गुनगुनाते रहे-
करोतु सा : शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:।।....
उनकी ध्यान मुद्रा तब टूटी, जब वैशाख महीने के तीसरे पहर की तपती धूप छिन्न-भिन्न छप्पर की राह आकर उनके गंजे सिर पर ऊधम मचाने लगी। उन्होंने दालान की छप्पर देखी और मुस्कराए। सहसा उन्हें सुखद विभ्रम-सा हुआ कि फूस की यह गिरने-गिरने को हो आई दालान सीमेंट-कंक्रीट के पक्के मकान में बदल गई है।
दहलीज लाँघते हुए वे अंदर आँगन में गए। पंडिताइन ओसारे पर बैठी चावल की खुद्दियों में से कंकण बीन रही थी। माँ की बगल में बैठी पुत्री कलावती मूँज की डाली-मउनी बीनने में व्यस्त थी। छोटी पुत्री लीलावती अंदर खाट पर लेटी हुई थी।
पंडित वचेश्वर झा चुपचाप ओसारे की छाँह में जाकर खड़े हो गए और उद्ग्रीव-से होकर इस प्रकार ध्यानस्थ हो गए, जैसे अपर लोक की अंतर्यात्रा कर रहे हों। विचलित और चकित पंडिताइन सूप में खुद्दियों को ज्यों का त्यों छोड़ पति को देखने लगी, क्या हो गया इनको ? कलावती भी मूँज और टेकुनी हाथों में लिए आश्चर्यित अपने पिता को देखने लगी। स्वयं में इस तरह निमग्न पिता कभी दिखे नहीं। क्या हो गया इनको ?


घबराई हुई-सी पंडिताइन पति के पास आई और उनको झकझोरती हुई बोली, ‘‘क्या बात है ? बोलते क्यों नहीं ?’’ पंडितजी के चेहरे पर अपूर्व आभा-सी थी। दाहिनी मुट्ठी खोलते हुए उन्होंने आंतरिक प्रसन्नता से रूँधी आवाज में कहा, ‘‘देखो....गुणानंद ने रुपए भेजे हैं- पूरे एक हजार और यह भी लिखा है कि देवी माँ की कृपा से प्रतिमाह रुपए भेजता रहूँगा।’’

‘‘तो नौकरी हो गई गुणानंद की।’’ पंडिताइन का बीमार चेहरा एकाएक खिल उठा।
पंडितजी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘हुई ही समझो। वैसे अभी स्थायी नहीं हुई है, लेकिन हो ही जाएगी। सब देवी भगवती की कृपा है।’’
प्रसन्न्ता से भरी पंडिताइन की धँसी आँखों में दुर्दिन की अंतिम विदाई का भाव उभर आया, ‘‘हाँ, सब माँ भगवती की कृपा है। दीजिए रुपए। याद नहीं, कब देखे थे एक हजार रुपए। दीजिए, पहले गौरी को अर्पित कर पूजा-अर्चना कर आऊँ।’’ प्रसन्न मुख पंडितजी ने एक हजार रुपए पंडिताइन के हाथ में रख दिए। पंडिताइन ने हँसती हुई आँखों में कुछ देर रुपयों को निहारा और कलावती को देती हुई बोली, ‘‘हाथ-मुँह धोकर आती हूँ।’’
कुएँ पर हाथ-मुँह धोकर लौटती पंडिताइन देवी मैया के भजन गुनागुना रही थी। कुछ ही देर बाद पूजा-घर में भगवती की प्रार्थना के स्वर गूँज उठे-
जय अंबे गौरी, मैया जब अंबे गौरी।
तुमको निसदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी।

कोटिक चन्द्र दिवाकर ....’
पंडित वचेश्वर झा ओसारे पर खड़े सोचते रहे-सब देवी भगवती की कृपा है, लेकिन इस कृपा का माध्यम तो बना है बिलट महतों का बेटा अगमलाल। क्यों न बिलट महतो को अभी इसी समय धन्यवाद दे आऊँ ! उन्हीं की पैरवी से अगमलाल ने नौकरी दिलाई गुणानंद को। बाप की पैरवी न होती तो लाल-जैसा ‘चलती’ वाला अफसर गरीब ब्राह्मण को नौकरी दिलाता ? चपरासी की नौकरी हुई तो क्या, यह नौकरी भी कहाँ मिलती है ! कितने तो बी.ए., एम.ए. वर्षों से सड़क नाप रहे हैं। फिर संस्कृत की मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण गुणानंद को दूसरी नौकरी क्या मिल सकती थी ? कुछ भी है, है तो सरकारी नौकरी।
नहीं, बिलट महतो को धन्यवाद दे ही आना चाहिए। जजमान हैं। शूद्र हैं तो क्या, हैं भले आदमी ! बेचारे अपने ‘खर्चे’ से गुणानंद को पटना ले गए। अपने बेटे के पास रख दिया। पौने दो साल गुणानंद ने अगमलाल का ‘अन्न-पानी’ खाया है। कम बड़ी बात है यह ?

पुरोहिती की गगनवृत्ति पर जीवन-यापन करने वाले पंडित वचेश्वर झा ने जीवन में पहली बार शूद्र बिलट महतो के प्रति कृतज्ञता का अनुभव किया।
सोलकन टोले के बिलट महतो पुश्तैनी जजमान ठहरे पंडित वचेश्वर झा के। बिलट महतो ने अपने पुरोहित को यथोचित सम्मान देने में कभी कोर-कोताही नहीं की, इस बदले युग में नहीं, जब टोले के पढ़ुआ लड़के ब्राह्मणों को लेकर तरह-तरह की जली-कटी बातें करते हैं। ‘हरनी-खगनी’ ‘बर-बेगरता’ जब भी पंडितजी ने अपने जजमान से कुछ माँगा है, बिलट महतो बिना बहाना बनाए देते रहे हैं।
इस सबके बावजूद पंडित वचेश्वर झा ने अपने ब्राह्मण होने की श्रेष्ठता को सदा सुरक्षित रखा है। जजमान की भक्ति और श्रद्धा अपनी जगह ठीक है, मगर बिलट महतो हैं तो सोलकन। हाँ, पानी चलता है उनका। अछूत नहीं हैं। उनकी रसोई का कच्चा खाना तो खैर नहीं खाया जा सकता, मगर व्रत-अनुष्ठान आदि में भर छाँक दही-चूड़ा खाकर सीधा-पानी, दान-दक्षिणा लेकर पंडितजी सहर्ष घर लौटते रहे हैं।
हालाँकि पंडितजी को अब यह प्रतीत होने लगा है कि इस जजमानी से जीवन-यापन होने वाला नहीं है। दुष्कर वृत्ति होती जा रही है पुरोहिती। सोलकनों में कठपिंगल पढ़ने वाले नवतुरिया लोगों के कारण अब धर्म-कर्म के प्रति पहले वाली आस्था नहीं रही। धर्म-कर्म, व्रत-अनुष्ठान, दान-दक्षिणा सवर्ण जजमानों के परिवारों में ही कुछ आस्था रह गई है, लेकिन इलाके में सवर्ण जजमान हैं ही कितने ? फिर एक वे ही तो पुरोहिती करने वाले नहीं हैं ? बभन टोली में पांच-छह घर इसी वृत्ति पर जीते हैं। किसी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। खैर, यह तो ब्रह्माजी का ही शाप है- पौरोहित्य कर्म करने वाले सात्त्विक ब्राह्मण को कभी संपत्ति नहीं रहेगी।
संपत्ति है भी कहाँ पंडित वचेश्वर झा को ! डेढ़ एकड़ जमीन है। आधी एकड़ जमीन जो पिछवाड़े में है, वह तो परती ही पड़ी रहती है। एक ‘बंसबिट्टी’ है उसमें बस। ‘अगवार-पिछुआर’ के लिए तो वह जरूरी ही है। बाकी एक एकड़ जमीन तो बटाई पर ही लगी है। साल-भर में कुछ अनाज पानी आ गया तो आ गया, बाकी बटाईदार की मर्जी। पंडितजी तो कभी देखने भी नहीं जाते कि जमीन में क्या लगाया है बटाईदार ने !
पंडित वचेश्वर झा बिलट महतो को धन्यवाद देने सोलकन टोली की तरफ चले तो भीतरी आह्लाद के बावजूद कुछ यादें भी थीं-विगत अपराध-भाव से जुड़ी यादें ! सोच रहे थे-किस मुँह से कृतज्ञता ज्ञापित करेंगे वे ?
बबुआन टोले में स्थित सरकारी स्कूल में बिलट महतो ने जब अगमलाल का नाम लिखाया था, तब पंडित वचेश्वर झा ने व्यंग्य करते हुए अपने जजमान बिलट महतो से कहा था, ‘‘हौ बिलटू !...अरे, अगमलाल का नाम लिखा दिया है स्कूल में। पढ़ा-लिखाकर हाकिम बनाएगा क्या बेटे को ?’’
बिलट महतो मार खाए मन को दबाते हुए बोले थे, ‘‘नहीं पंडितजी, हाकिम-हुक्काम क्या बनेंगे हमारे बच्चे। बस, थोड़ी ‘बिद्दा’ आ जाए।’’
....हालाँकि बहुत दिन हो गए इस बात को-पच्चीस वर्ष से भी अधिक। याद भी नहीं होगा बिलट महतो को....लेकिन क्या सच में उनको याद नहीं होगा ?
पंडित वचेश्वर झा को अच्छी तरह याद है-जब स्कूल के एक हरिजन शिक्षक के प्रयास से सोलकन टोली के ही नहीं, चमार टोली के भी कुछ लड़के स्कूल में आने लगे थे तो कैसी खलबली-सी मची थी बभन टोली और बबुआन टोली में ! उन्होंने तो अपनी आँखों से देखा था। अपने ही टोले के कुछ लड़के अगमलाल को सड़क पर घेरकर तंग करते थे, ‘‘रौ अगमा !...अरे, सारे कुत्ते काशी चले जाएँगे तो हड्डियाँ कौन चाटेगा रे ? राड़-सोलकन सब पढ़बे करेंगे ?’’
याद है पंडितजी को। स्कूल के हेड पंडितजी ने जब गाँव में सूचना दी कि अगमलाल वर्ग में प्रथम स्थान पाता है तो चिढ़ाने वालों की हँसी बंद हो गई थी। शिक्षकों में दो छोड़ बाकी सब तो ब्राह्मण ही थे। चाहते तो अगमलाल को वर्ग में प्रथम स्थान नहीं भी दे सकता था। बभन टोली या बबुआन टोली के किसी लड़के को प्रथम स्थान दे देते, लेकिन शायद वह युग ही कुछ दूसरा था।
और जब मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में अगमलाल ने मेरिट लिस्ट में पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो ‘पिल्ही चमकी’ बभन टोली या बबुआन टोली के लोगों की। कैथ टोली के लड़के तो परीक्षा-फल में ठीक—ठाक रहे, लेकिन बबुआन टोली और बभन टोली के कुछ लड़के द्वितीय श्रेणी में निकले और कुछ खींच-खाँचकर पास हुए। आधे से ज्यादा अनुत्तीर्ण । ऐसे अनुत्तीर्ण लड़कों ने बापों या अभिभावकों से पिटाई भी खाई, ‘‘साले, दिन-भर हीरोपनी करते रहेंगे। छोंड़ी सबके पीछे बेहाल रहेंगे। फेल नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ? देखो तो बिलट महतो के बेटे अगमलाल को ! साला सोलकन होकर जिले में फस्ट आया है।...’’
बेटे के परीक्षा फल से बल मिला बिलट महतो को। स्कॉलरशिप भी मिली थी अगमलाल को। फिर बिलट महतो की अच्छी खेती-बाड़ी थी। सपरिवार मजदूर की तरह लगे रहते थे खेती में। किसी से पेंचा-उधार लेते नहीं थे।
अगमलाल को शहर भेज दिया पढ़ने के लिए। आई.ए. बी.ए. और एम.ए. की परीक्षाओं में भी अगमलाल ने अच्छे अंकों से उत्तीर्णता पाई। बी.पी.एस.पी. की प्रतियोगिता परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर जब अगमलाल को अफसरी मिली तो बभन टोली और बबुआन टोली में पहली बार हाय-तोबा मची। कैथ टोली के लोग तो दवात-पूजा वाली जाति के ठहरे। कहीं न कहीं, किसी न किसी नौकरी में लग ही जाते हैं, बभन टोली और बबुआन टोली से तो अब तक या तो सेना में लोग गए या शिक्षक, क्लर्क सिपाही वगैरह बने। अफसर तो कोई निकला ही नहीं इन दोनों टोलों से।
सबसे तीव्र प्रक्रिया बभन टोली में हुई। अन्तत: पंडितों ने यही सोचकर मन को संतोष दिलाया कि चलो, अगमलाल जैसे दो चार शूद्र अफसर बन भी गए तो कौन-सा पहाड़ ढह जाएगा ? राज तो ब्राह्मणों का ही है। सभी क्षेत्रों में नीचे से ऊपर तक तो ब्राह्मण ही ब्राह्मण हैं। फिर हमारी चाहे पुरोहिती वृत्ति ही क्यों न हो, हैं तो हम ब्राह्मण देवता ! सारे सामाजिक-धार्मिक विधि-निषेध तो हम ब्राह्मणों से ही सुनिश्चित होते हैं। अगमलाल चाहे कितना भी बड़ा अफसर बन जाए, रहेगा तो शूद्र ही। ब्राह्मण अनपढ़ भी रहे तो क्या, पूजनीय ही रहता है। भक्त शिरोमणि तुलसीदास की उक्ति को झुठला सकता है कोई ?
पूजिय विप्र सील गुन हीना।
नहीं सूद्र गुन ग्यान प्रवीना।..
लेकिन ये सारी बातें मन को सांत्वना तो देती थीं, मस्तिष्क को समझा नहीं पाती थीं। जिस दिन जीप लेकर अगमलाल बभन टोली के रास्ते से अपने घर आया, उस दिन सोलकन टोली में कीर्तन-भजन और भोज-भात के आयोजन हुए और बभन टोली-बबुआन टोली में चुप्पी छाई रही।
 -दीवाकर रामधारी सिंह । २००४। नयाँ दिल्ली– किताबघर प्रकाशन ।  _

खुम्च्याईँदै आरक्षण













 ‘सेवा छान्न पाउने व्यक्तिको अधिकार हो’ भन्ने आबाज चारैतिर गुञ्जिन थालेपछि नेपालका सत्ताजाति र राज्य संचालकले आरक्षणको मागलाई स्वीकार्य गरेको हो, अब आयोग उल्टो दिसातर्फ लागेको हो कि भन्ने महशुश धेरैले गर्न थालेका छन् । संविधानमै भएको व्यवस्था उल्टयाउने प्रयास हुनु दुखद छ । अझ संविधानको प्रस्तावनामै समानुपातिक समावेशिकताको सुनिश्चिताको प्रतिबद्धता व्यक्त गरिएको छ । त्यसलाई निमोठने प्रयास कतैबाट भयो या भईरहेको छ भने रोक्नु पर्छ । 

दिनेश यादव 




नेपालमा ०५० को दशकसम्म प्राविधिक र शिक्षकबाहेक अन्य सरकारी सेवामा मधेसीको प्रवेश न्यून रहेको कुरो सर्वविदितै छ । निजामती सेवाका कर्मचारीलाई मात्र त्यस्ताका प्रमाणपत्रहरुको प्रतिलिपी एटेस्टेट (प्रमाणित गर्ने) अधिकार थियो । फलस्वरुप सरकारी कलेजमा प्रवेशदेखि अन्य कुनै सरकारी प्रयोजनका लागि आवश्यक पर्ने प्रमाणपत्रहरुको प्रतिलिपि एटेस्टेट गर्न त्यसताकाका मधेसीले धेरै सास्ती खेपे । अहिले भने त्यो समस्या पूर्ण रुपमा समाधान नभएपनि केही सरलीकरण चाही भएको छ । सरकारले नै सीमित प्रयोजनबाहेक धेरैमा यो परिपाटीको अन्त्य गरेको छ । स्वयं व्यक्तिलाई जिम्मेवार बनाउन आफ्ना प्रमाणपत्रहरुलाई स्वप्रमाणित गर्ने प्रचलन धेरै ठाउँमा लागू भएको देखिन्छ । ‘सक्कल बमोजिम नक्कल ठीक छ’ भन्दै आफ्नो हस्ताक्षर धस्काउने चलन शायद त्यसैको परिणाम हो । यद्यपी, जुन ठाउँमा सरकारी अधिकृतको हस्ताक्षर गरिएको प्रतिलिपी अनिवार्य छ, त्यहाँ अझै पनि मधेसीलाई समस्यै छ । तर मधेसीलगायतका समुदाय अधिकृत बनेपछि केही सहजता भने महशुश गरिदैछ ।

वर्षौसम्म शून्यकै हाराहारीमा रहेको निजामती सेवामा मधेसीको प्रवेश र उपस्थिति पछिल्लो समय बाक्लिदै गएको थियो । त्यसको प्रमुख कारण समानुपातिक आरक्षणको व्यवस्था नै थियो, हो । ०६४ यता धेरै मधेसी, जनजाति लगायतका समुदाय निजामती सेवामा सजिलै प्रवेश पाएका छन् । लोकसेवा आयोगको ०७२ सम्मको आठ वर्ष अवधिमा १८ सय २२ जना मधेसीले आयोग पास गरेका थिए । त्यो क्रम वर्षेनी बढदै थियो । तर अब त्यसलाई संकुचित बनाउने प्रपञ्च रचिँदैछ । यसको सिकार सिंगो मधेसी मात्रै होइन, आरक्षणको क्याटगरीमा परेका समुदाय समेत हुने निश्चित छ । आयोगको तथ्यांक अनुसार ०६४–७२ सम्मको अवधिमा आदिवासी/जनजातिका २३ सय ४९ जना, दलितका ७ सय ४९, पिछडिएको क्षेत्रबाट २ सय ८५ जनाले लोकसेवा परीक्षा पास गरि निजामती सेवामा प्रवेश गरिसकेका छन् । ती समुदायले पाएको यो सफलता आरक्षणकै बलमा भएको निस्कर्षमा पुग्न कसैलाई गाह्रो नपर्ला । आरक्षणको फाइदा अन्य समुदायलाई पनि उत्तिकै भएकै छ । निजामती सेवामा समावेशीतर्फ सिफारिस गरिएका कर्मचारी संख्या तालिकामा हेर्न सकिन्छ । आरक्षणबाट लक्षित समूहहरु महिला, आदिवासी/जनजाति, मधेसी , दलित, अपाङ्गता भएका व्यक्ति र पिछडिएका क्षेत्रलगायत लाभान्वित भइरहेकै थिए । तर, सतप्रतिशतमा कब्जा जमाउनेहरुले यसलाई अंश खोसेको रुपमा लिइरहेका छन् । अब चाही त्यसलाई रोक्ने प्रयास शुरु भएको जस्तो भान हुन थालेको छ । त्यसैको ठोस प्रमाणका रुपमा लोकसेवा आयोगले पछिल्लो समय स्थानीय तहका लागि गरेको विज्ञापनलाई लिन सकिन्छ । 


आरक्षणमाथि नै ग्रहण लाग्ने गरि गरिएको विज्ञापनले धेरैलाई चिन्तित तुल्याएको छ । ‘सेवा छान्न पाउने व्यक्तिको अधिकार हो’ भन्ने आबाज चारैतिर गुञ्जिन थालेपछि नेपालका सत्ताजाति र राज्य संचालकले आरक्षणको मागलाई स्वीकार्य गरेको हो, अब आयोग उल्टो दिसातर्फ लागेको हो कि भन्ने महशुश धेरैले गर्न थालेका छन् । संविधानमै भएको व्यवस्था उल्टयाउने प्रयास हुनु दुखद छ । अझ संविधानको प्रस्तावनामै समानुपातिक समावेशिकताको सुनिश्चिताको प्रतिबद्धता व्यक्त गरिएको छ । त्यसलाई निमोठने प्रयास कतैबाट भयो या भईरहेको छ भने रोक्नु पर्छ । नेपाली संविधानको धारा ३८(४), ४०(१),४२(१) र २८५ ले महिला, दलित, मधेसी , थारु, जनजाति, मुस्लिम, पिछडा वर्गसहित राज्यका निकायहरुमा समावेशी समानुपातिक रुपमा सहभागी हुन पाउने हकको ग्यारेन्टी गरेको छ । सरकारी सेवाको गठनबारे धारा २८५ (२) मा ‘संघीय निजामती सेवा लगायत सबै संघीय सरकारी सेवामा प्रतियोगितात्मक परीक्षाद्वारा पदपूर्ति गर्दा संघीय कानुन बमोजिम खुला र समानुपातिक समावेशी
सिद्धान्तका आकार हुनेछ भन्ने पनि उल्लेख छ । संविधानमा समानुपातिक समावेशिकतालाई प्रष्ट रुपमा व्यख्या गरेको अवस्थामा सेवाका लागि योग्य व्यक्तिको छनौेट गर्ने जिम्मा पाएको निकायका पदाधिकारीले बदमासी गर्न थालेको छन् । उसले आफनै अनुकूलको व्याख्या गर्दै विज्ञापन गरेपछि आन्दोलन शुरु भएको छ । यसो त, निजामती सेवा ऐन, २०४९(दोस्रो संशोधन, २०६४) अनुसार ५५ प्रतिशत खुला र ४५ प्रतिशत आरक्षणबाट पदपूर्ति गर्नुपर्ने कानुनी व्यस्था छ । यसै ऐनमा आरक्षित ४५ प्रतिशतलाई शतप्रतिशत मानेर महिलालाई ३३, आदिवासी जनजातिलाई २७, मधेसीलाई २२, दलितलाई ९, अपाङ्गता भएकालाई ५ र पिछडिएको क्षेत्रलाई ४ प्रतिशत सिट आरक्षित गरिएका छन् । 

तर, लोक सेवा आयोगले संघीयताको मूल मर्म र समानुपातिक समावेशी सिद्धान्त विपरित गरेको पछिल्लो विज्ञापनले राज्यबाट वर्षौसम्म विभेदमा पारिएका समुदायलाई आन्दोलनमा उत्रन बाध्य भएका हुन । उनीहरुले सेवा आयोगको असमावेशी विरुद्ध विरोध प्रदर्शन गरिरहेका छन् । ‘आरक्षण बचाऔं’ आन्दोलनमा आदिवासी जनजाति, मधेसी, दलित, मुस्लिम, अल्पसंख्यक सबै होमिएका छन् । चर्का नारा पनि दिइरहेकै छन् । तर कहि कतै सुनुवाई भएको छैन । मधेस केन्द्रीत दलहरु यो आन्दोलनमा औपचारिक रुपमा प्रतिक्रिया नजनाएपनि कार्यकर्ताहरु भने सक्रिय देखिन्छ । विभिन्न जातिय संघ/संगठनसंग कार्यगत एकता गर्दै अगाडि बढ्ने मुडमा आन्दोलनरत पक्षहरु छन् । यसका लागि उनीहरुले लुई कोसरको सिद्धान्तलाई समेत अगाडि सारेका छन् । कोसरका अनुसार सामान्य समयमा विभिन्न समुदायका आआफ्नै प्राथमिकता हुने गरेपनि विषम परिस्थितिमा आफ्ना विशिष्ट प्राथमिकतालाई विर्सेर सामुहिक प्राथमिकताको लागि सामूहिक शत्रूविरुद्ध एबै एकजूट हुनुपर्छ ।
नेपालमा अहिले त्यस्तै अवस्थाको सिर्जना भएको भान सर्वत्र हुने थालेको छ । राज्यले आफूहरुको अधिकारलाई कुन्ठित पारेको भन्दै बालुवाटार घेराउसम्मको आन्दोलन गरे । त्यहा दमन भयो । तर पनि आन्दोलनकारीले हार मानेको संकेत देखिदैन । आरक्षणको पक्षमा सक्रिय रहेकामध्ये काशिन्द्र कबिरले आफ्नो फेसबुक पेजमा लेखेका छन्, ‘ आरक्षणको अपहरणको विरुद्धमा लडौं, कानुनी राज्य र समावेशी लोकतन्त्रको विरुद्ध लडौं । ’ उनले यो आन्दोलनाई समावेशी समानुपातिक प्रतिनिधित्व र समाजिक न्यायका लागि लडाई भनेका छन् । पहिचान, आत्मसम्मान र स्वाभिमानको लागि यो आन्दोलनमा सबैलाई साथ दिन आग्रह समेत गर्दै आएका छन् । अर्का आन्दोलनकारी रकम चामलिङले फेसबुक वाल मार्फत नै आन्दोलनमा जनहभागिताको महत्व उल्लेख गरेका छन । उनले लेखेका छन् , ‘ शान्तिपूर्ण आन्दोलनमा शक्ति प्रदर्शन भनेको जनसहभागिता नै हो ।’

उत्पीडन  र विभेदमा परेका जनताको भारी मत पाएर जितेकाहरु सिंहदरबार पुगेपछि साच्चिकै सिंहको भूमिकामा देखिन थालेका छन् । उनीहरुले नियुक्त गरेकाहरुले एक पछि अर्को गर्दै विभेदमा परेका वा पारिएकाहरुको अधिकारलाई कुन्ठित बनाउँदै लगेको आरोप धेरैको छ । आन्दोलन चर्किएकै बेला मधेसी आयोगले विवादास्पद अभिव्यक्ति दिएको भन्दै आलोचना भईरहेको छ । जनकपुरका संचारकर्मी किशोर गुरु आफ्नो वालमा आयोगमाथि व्यंग्य गर्दै लेखेका छन्, ‘ मधेसी जनताको हित हुने कुनै कार्य नगरेपनि तीन महिनामै ३ करोड खर्च गरेको मधेसी आयोगले लोक सेवाको विज्ञापन ऐनबमोजिम भएको भनेको छ । जुन लोक सेवाको विज्ञापन सच्याउन माग गर्दै मधेसी, थारु, जनजाति र मुस्लिम आन्दोलन गर्दैछ ।’ ‘आरक्षण बचाऔं’ अभियान शुरु भएको धेरैपछि साउन २२ मा प्रदेश २ का एक जना सांसदले यसबारे प्रदेश सरकारको धारणा माग गरे । संघीय सरकारले असमावेशी तरिकाले निकालेको लोकसेवाको विज्ञापनबारे प्रदेशमा सत्तारुढ रहेको राष्ट्रिय
जनता पार्टी(राजपा) का सांसद विदेश्वर यादवले संघीय सरकारले समावेशी आरक्षण कटौति गरिएको सन्दर्भमा प्रदेश सरकारको धारणा माग गरेका थिए । त्यसअघि आयोजित एक कार्यक्रममा साउन १९ मा राजपा र समाजवादी पार्टी (सपा) ले आन्दोलनमा जाने बताएका थिए । तर त्यसपछि कुनै पनि प्रतिक्रिया यसबारे नआएको गुनासो आरक्षण बचाउ अभियानमा लागेकाहरुले बताएका छन् ।


अगस्ट ३ मा आरक्षण बचाऔं अभियानमा लागेका एक मधेसी अगुवाले लेखेका छन् ,‘अहिलेको लोकसेवाको असंवैधानिक असमावेशी विज्ञापन संविधानको मूल मर्मको बर्खिलापमा रहेको छ । यसबाट पुष्टि भएको छ कि नेपालमा अहिले पनि लोकतन्त्रमा परिकल्पना गरिएको जस्तो कानुनको शासन नभएर कानुनद्वारा शासनको अभ्यास भैरहेको छ । राजतन्त्रमा औपचारिक रुपमा राजा कानुनमाथि हुन्थ्ये तर अहिले अनौपचारिक रुपमा


एकल जातिय स्वार्थ संविधान र कानुन भन्दा माथि छ । यसमा राज्यको सबै निकायको अघोषित अनौपचारिक सहमति रहेको देखिन्छ ।’ विभेदमा परेका समूदायका मानिसको यो सेवामा चार्मिङ बढ्दै गएपछि मधेसीलगायत अन्य समुदायपनि यता आकर्षित हुनु थाले । तर यो सेवामा नेपालका खस ब्राहम्ण, क्षेत्रीलगायतको बचस्र्पले गर्दा अन्य समुदायको प्रवेश निषेध नै गरिएको जस्तो भान जो कोहीलाई पनि पर्ने गथ्र्यो । हुनपनि हो, यसका लागि हुने गरेको लिखित परीक्षामा मधेसीहरु सफल भएपनि अन्तर्वार्तामा फालिने गरेको गुनासो धेरैको मुखबाट सुनिने गरिएकै थियो । ती तिता अनुभव सुनाउनेहरु तराई–मधेसमा अझै पनि भेटिने गरेकै छन् । पछि निजामती सेवामा मधेसीलगायतका समुदायको प्रवेश सुनिश्चतताको माग उठ्न थाल्यो । अन्य मुलुकमा जस्तै यो सेवामा प्रवेश गर्नेहरुका लागि आरक्षणको माग गरियो । धेरै संषर्घ भए, अनाहकमा धेरैले बलिदान समेत दिनुपर्यो ।

आयोगले पछिल्लो समय गरेको विज्ञापनको थप घट संख्याले उसको नियतमाथि शंका गर्ने ठाउँ दिन्छ (आरक्षित सिट बाँडफाँटमा भएको असंगति उल्लेख गरिएको तालिका हेर्नुस) । तालिका अनुसार विज्ञापनबाट सबैभन्दा बढी घाटा मधेसी, त्यसपछि आदिवासी/जनजाति,दलित , अपाङ्गता भएका व्यक्ति र पिछपिडएको क्षेत्र पर्छन । महिलालाई केही भएपनि फाइदा छ । विज्ञापनमा ऐन अनुसार छुट्टाउनु पर्ने संख्या ९०७ भएकोमा ७६ वटा मात्रै सिटको व्यवस्था गरिएको छ । अर्थात ८ सय ३१ जना आरक्षित सेवाबाट बञ्चित हुने अवस्थामा छन् । त्यस्तै, दलितका लागि ३७१ वटा हुनुपर्नेमा ३० र पिछडिएको क्षेत्रमा १६५ मा दुई जनाका लागि मात्रै विज्ञापन गरिएको छ । यो विज्ञापनमा तुलनात्मक रुपमा महिला र आदिवासीको सिट संख्या केही हदसम्म सन्तोषजनक भएपनि समग्रमा परिणाम निराशाजनक नै छन् ।


अन्त्यमा, संविधानको समानुपातिक समावेशिता र निजामती सेवा ऐन २०४९(दोस्रो संशोधन) अनुसार आरक्षित सिट नछुटयाई विज्ञापन गरिएकोले सच्चाउन आवश्यक छ । सरकारी सेवामा प्रवेशका लागि आरक्षणको फाइदा, लक्षित समुदाय भन्दा धनी , टाठा–बाठा र स्रोत साधनमा पहुँच भएकाहरुले नै बढी पाएको भन्ने कुरो पनि आएको छ । यसमा विमर्श गर्न सकिन्छ तर यसैलाई बहाना बनाएर आरक्षणलाई रोक्न पाईन्न । आरक्षण पाउने महिला, आदिवासी जनजाति, मधेसी, दलित, सीमान्तकृत आर्थिक र सामाजिक रुपमा पछाडि परेका हुनुपर्ने व्यवस्था कानुनमै पनि छ । त्यो कसरी छुट्टायने भन्ने नखुलाइँदा ती समुदायभित्रका प्रभावशाली वर्गले फाईदा उठाईरहेको चाही पक्का हो । तर यो समस्याको समाधान सिट कटौति सक्तैन ।  (काठमाडौंबाट प्रकाशित हुने युवा डट कम मासिकका लागि ०७६ भदौं ९ मा लेखिएको आलेख)


Saturday, 14 September 2019

भाषिक पत्रकारिताः चुनौति आ समाधान



Writter दिनेश यादव 
                                                मैथिली भाषा

समाज, संस्कृति, इतिहास, दर्शन आ राजनीतिशास्त्रके अध्ययन बिना सुच्चा पत्रकारिता असंभव अछि । खास ककें भाषिक पत्रकारितामें एकरा अनिवार्य मानल गेल अछि । विभिन्न भाषाकें अपन–अपन महत्व आ पहिचान होयत अछि । मैथिली भाषा ओहिमें सम्भवतः सब सँ उपर आ आगा अछि । एकर विरासत आ इतिहास आन कोनो भाषा सँ बेसी गरिमामय अछि । परन्च मैथिली डेगाडेगी मात्र बढि रहल अछि । अहि भाषा’क उत्थान’क लेल सरोकारवला सबके ‘अश्व शक्ति’ बढेनाई आवश्यक अछि । अहि शक्तिके प्राप्ति’क लेल मैथिली भाषामें पत्रकारिताकें एकटा अस्त्रकें रुपमें प्रयोग कयल जा सकैत अछि । मुलधार’क पत्रकारितामें दिनानुदिन चुनौति बढिए रहल अछि । ऐहन अवस्थामें भाषिक पत्रकारिता कएनाई अउर बेसी चुनौतिपूर्ण अछि । कारण अखनों मैथिलीमें मानक पाठ्य सामग्री आ संदर्भग्रंथके अभाव देखल गेल अछि । निष्पक्ष, विश्लेषणात्मक गं्रथ आ विवेचना’क अभाव ओतबे अछि । पठनीय सामग्री सब त भेटत मुदा ओ विषयान्तर भेल बेसी रहैत अछि । ठोस समालोचना’क अभावमें सर्वमान्य ग्रन्थ आ पोथि मिथिलामें दूलर्भ बात अछि । तईं पछुलका पीढी सबमें सेहो पुरनके संकिर्णताबाद हावी होनाईकें एकटा प्रमाणकें रुपमें एकरा लए सकैत छि । किछु वर्ष एम्हर किछू गोटे एकरा दूर करबाक प्रयासमें लागले छथि, परन्च ओ प्रयाप्त नहि भँ पावि सकल अछि । 


सर्वस्वीकार्यता’क अपरिहार्यता 


मैथिली भाषाकें उपयोगी भूमिकामें व्यापकता’क लेल भाषिक पत्रकारिता कएनिहार सबकें कनिक संकिर्णताबाद आ आत्मकेन्द्रित मनोभाव सँ उपर उठबाक अपरिहार्यता देख रहल छि । मिथिला’क हरेक क्षेत्रमें अपनत्ववाद हावी छई, तेकरा तोडवाक दिश एक कदम आगा मैथिलीमें पत्रकारिता कएनिहार लोकन्हिके बढैय पडतन्हि । अखन युवा सबमें उच्चाध्ययन’क अभाव सेहो खटैक रहल अछि । तई विषयान्तर भँ विषयवस्तु’क उठान कए दैत छथि । पत्रकारितामें एक गोटा पत्रकारकें विषयान्तर होनाई समाज आ देशकें दिगभ्रमित कए सकैत अछि । तईं सत्यनिष्ठ भँ जहि विषयकें उठान पत्रकार कँ रहल छथि, ओहिमें केन्द्रित भए आगा बढबाक जरुरी अछि । ‘एक गोटा पत्रकार सत्य तक पहुँचबाक लेल आ स्रोत तक पहुँचबाक लेल तमाम उपलब्ध वैद्य हथकंडा कें प्रयोग कैर सकैत अछि । सत्यके सत्ताके साथ सक्रिय करैयके काम पत्रकारिताकें थिक’ (पचौरी, सुधिश) । सत्य धरि पहुँचय सँ पहिले कएल गेल पत्रकारिता ‘स्वार्थ’ सँ मुक्त नहि भँ सकैत अछि । एहेन अवस्थामें सर्वस्वीकार्यता असंभव बात भँ जाएत अछि । तईं अहि दिश सम्बन्धित लोकन्हिकें डेग बढेनाई जरुरी अछि ।   


शोध पर जोड

पत्रकारितामें शोध आधारित तथ्य सबकें अभाव बड बेसी अछि । खास ककें भाषिक पत्रकारिता’क क्षेत्रमें एकर अभाव बड बेसी खटकैत अछि । एकरा हम व्यवहारिक आ व्यवसायिक कठिनाईकें रुपमे लैत छि । शुद्ध आचरण आ वृहत्त सोच रखनिहार सबके न्यून उपस्थिति’क कारण भाषिक पत्रकारिता ‘जातिय संकीर्णता’ के नहि तोडि सकल अछि । चाहे ओ मूलधार’क पत्रकारिता होए वा क्षेत्रिय । दुनूमें ई एकटा पैघ कमजोरी देखल गेल अछि । तहिना समावेशिता आ समान–सम्मान आजूक अपरिहार्य विषय अछि । पत्रकारितामें अहि विषयकें एकटा ‘प्रचार सामग्री’ के रुपमें मिडिया संचालक सब उपयोग कए रहल अछि । अखनो सीमित जाति, वर्ग आ समूहके कब्जामें मूलधार’क पत्रकारिता अछि । दलित, जनजाति, आदिवासी, सीमान्तकृतसहितके समूह अखनो मूलधार’क पत्रकारिता सँ बचिंत अछि । एहेन परिस्थितिमें भाषिक वा क्षेत्रिय पत्रकारिताकें महत्व अउर बढि जाएत छैक । ओ समावेशिता’क सिद्धान्त अंगिकार करैत जौं आगा बढत , समाजमें एकता आ विश्वसनीयता संगैह स्वीकार्यता सेहो स्थानीय स्तरमे प्राप्त कए सकैत अछि । 


मर्यादित पत्रकारिता


मिथिलामें ‘गारी’ एकटा संस्कृतिक अंगकें रुपमे अछि । परन्च ओहो विशेष परिस्थितिमें सुहनगर आ रुचिकर होयत छैक । अखुनका युवा पीढि सब अहि बातके नहि बुझि एकरा ‘बाह्रमासा’ बना देने छथि । खास ककें पत्रकारितामें गालिगलौज अमर्यादित बात होएत छैक । अहि बातकें नव युवा सबकें बुझैहीटा पडतैय । खास ककें भाषिक (मैथिली) पत्रकारितामें भाष्य शैली मर्यादित होमाक जरुरी छहि । एकर अभावमें किनको लेल व्यक्तिगत बिचारमें ‘पत्रकारिता’ भँ सकैत अछि, परन्च ओ आमजन’क सोचमें ‘पित्त पत्रकारिता’क’ कोटी आ तह सँ उपर नहि उठि सकैत अछि । तईं सत्य सगैंह सभ्य आ मर्यादित भाषाके पकडैत बेजोड प्रस्तुतिकें साथ आगा बढबाक नितान्त जरुरी अछि । दोसर बात, मधेस आ मिथिलामें बेरोजगारी’क कारण प्रतिभावान व्यक्ति सब दलगत कुल्लीमें रुपान्तरित भेल अछि । अई तरहकें रुपान्तरण मधेस, मिथिला आ मैथिलीकें लेल दुखद आ निराशाजनक प्रवृत्ति अछि । पर्चाकारिता, दलकारिता, हनुमानकारिता, भजनियाकारिता’क कारण पत्रकारिता जहि रुप सँ आगा बढि सकैत छलैय, तक्कर सुखानूभूति नहि भँ पावि रहल अछि । खास ककें मिथिला क्षेत्र सँ प्रकासित अखबार सबमें बड्ड बेसी कमजोरी देखल गेल अछि । खोजी पत्रकारिता’क ओतेह ओतबे आभाव अछि । हाँ, एकर नाम पर घेंच तोडबाक प्रवृति देखमामें बेर–बेर आयल अछि । गलत प्रवृतिके विरोध होमाकें चाहि । अहि क्षेत्रकें अपन पेशा’क रुपमें ग्रहण कयलाके पश्चात ई बात बुझई पडत जे ‘पत्रकारिताके उद्देश्य लोकसेवा होएत छैक, तईं जनहितक लेल खोजी पत्रकारिता स्वीकार्य भेल अछि । ग्रामिण पत्रकारिता ग्रामीण जीवनके लेले महत्वपूर्ण छैक , एकर आशय ग्रामीण समस्या सबके बाहर अनैत ग्राम विकास योजना सबकें निर्धारित करमामे अपन महत्वपूर्ण योगदान दैति । मुद्दा अहि दिस ध्यान नही जा रहल अछि’(त्रिपाठी आ पाण्डेय) । नेपालमें ग्रामिण पत्रकारिता’क प्रयास त भेल अछि , परन्च ओ प्रयाप्त नहि । अखनो, ‘टेलिफोनी’ पत्रकारिता होएत अछि । स्रोत आ साधन’क अभावमें अखबार’क संवाददाता सब सदरमुकाम केन्द्रित पत्रकारिता कए रहल अछि । ई पत्रिका भरबा’क लेल प्रकाशन गृहके सामग्री त निक जका भेट जाएत छन्हि, परन्च ग्रामिण क्षेत्र’क जनबोली आ हिया’क आबाज गुम भँ जाएत अछि । ओतेह ‘आबाजबिहिन’क आबाज’ देबामें पत्रकारिता चुकि जाएत छैक । एहेन अवस्थामें ‘म्याकें बोली’ मे कएल गेल पत्रकारिता अर्थात भाषिक पत्रकारिताकें महत्व बढि जाएत छैक ।

प्रमाणिक स्रोत पर ध्यान


पत्रकारितामें स्पोन्सरसिप दुर्भाग्यपूर्ण अछि । किनको कहला पर नहि अपने सँ खोजिकें कयल गेल पत्रकारितामे प्रभावकारिता बेसि भेटैक छहि । अखन, प्रमाणिक स्रोत आ सामग्री’क अभाव’क कारण तथ्यपरक बात सब उजागर नहि भँ पावि रहल अछि । अहू दिश सरोकारवलाकें ध्यान देमाक चाहि । तहिना, सकारात्मक पुरान परम्पराकें जीवित आ सुरक्षित रखबामें आ गलत संस्कार , व्यवहार आ थितिके वहिष्कार करबाक हैसियतमें पत्रकारिताकें होनाई अति आवश्यक अछि । किछु मातृभाषा’क छोडि अन्यमें एकर अनुभव अखनिधरि नहि भेल अछि । अई क्षेत्रमें सकारात्मकता’क साथ जाधरि पत्रकारिता आगा नहि बढत, ताधरि घुस्कुनिया ई क्षेत्र कटैतेह रहत । घुस्कुनिया त बहुत कम समय’क लेल होएत अछि । मुदा मिथिला आ मैथिली वर्षौवर्ष सँ अई अवस्था सँ गुजरबाक कारण कि अछि ? ई मननयोग्य बातके बुँझि जौ आगा बढल जाए त मैथिली भाषिक पत्रकारिता जल्दिए युवा भए सकैत अछि । परन्च अहिकें लेल मन, बचन आ कर्म सँ आगा बढबाक प्रण, प्रतिबद्धता आ अपनाकें परिस्कृत’ करबाक जरुरी अछि ।


दुरस्त संपादन 

सहि संपादन’क अभाव खटकैत रहल अछि , पत्रकारितामें । कोनो भी सामग्री प्रकाशन या सार्वजनिकिरण सँ पहिने तुलनात्मक अध्ययन आ सम्बन्धित विषय’क सन्तुलन’क जाँच पडताल होमाक सेहो आवश्यतका अछि । अहि सँ पाठक वर्ग’क रुचि आ आकर्षण त बढबे करत, मान्यता आ प्रमाणिकता से हो ओतबे मिलत । पत्रकारकें भूगोल, संस्कृति आ रीतिरिवाज’क ऐतिहासिकताके जानकार सेहो होमाक । अहि सँ पत्रकारके समाचारकें विषयवस्तु उपर पकड मात्र नय, ओकराप्रति विश्वास से हो ओतबे बृद्धि होएत । ‘ऐतिहासिकता प्रमाणित कालक्रमकें ठोस आधार पर सिद्ध कएल जा सकैत अछि ’(मुखर्जी, राधाकुमुद) । तईं सुनल बात सँ बेसी ठोस बात पर जोड देबाक चाहीं । पत्रकार कोनो ऐतिहासिकता’क प्रमाणित कएनिहार सेहो भए सकैत अछि । पत्रकारितामें ई अभाव अछि । भाषिक पत्रकारितामें ई बात निर्विवाद मानल गेल अछि । ऐतिहासिकता’क गमने आ मनने बिना कयल गेल पत्रकारिता, लेखन आ विश्लेषण आग्रह÷पूर्वाग्रह सँ प्रेरित मानल जा सकैत अछि । खास ककें अगुवा सब अहि विषय पर गहन मन्थन आ चितंन करौथि ।


पत्रकारितामें साहित्य

पत्रकार एक गोटा निक साहित्यकार सेहो होमाकें चाहि । किएक त साहित्यकार आ पत्रकार दू सहोदर भाई होयत अछि । मिथिला क्षेत्रमें साहित्यिक पत्रकार’क रौदी अछि । जे लोकन्हि अछि से आत्मकेन्द्रित मात्र अछि, ‘सर्वे भवन्तु कल्याणम्’ ओ नहि थिकैह । ‘साहित्यिक पत्रकारिता मानवीय मूल्य सबकें शाश्वत प्रदान करैत ओकर ग्राहय, नियन्त्रित आ लोकमंगलकारी बनबैत अछि । साहित्य आ पत्रकारिता एकैहटा मूलके दू धारा मानल जाएत अछि । इ दुनू लोकरक्षण, लोकरंजन आ लोकशिक्षण के धर्मक निर्वाहक अछि । साहित्यिक पत्रकारिता लेखकीय चेतना, पाठकीय चेतना आ सामाजिक चेतना के विस्तार देबामे सहायक होएत अछि’ (तिवारी, अरुण) । भाषिक पत्रकारितामें लगैवला सबकें सम्बन्धित भाषा’क साहित्य, कला, संस्कृति पढबाकें चाहि । परन्च ओ भावनात्मक नहि विचारात्मक होय, गद्यात्मक नहि, पद्यात्मक होय, कल्पनात्मक नहि तार्किक होय, संवेगपूर्ण नहि, वैज्ञानिक आ सहजबृद्धि पर आधारित होय । ई विषय सबकें अभावमें लिखल साहित्य पढि मनलुभावन पत्रकारिता असंभव अछि । 

अपन–अपन क्षेत्र’क प्रभावशाली व्यक्तित्व लोकन्हि अपन अवस्था’क ऐहन बनाबी जे आबैवला पीढि अपनाकें गौरवान्वित महशुश करैथ । एकर अभावे झटपट आ बेगारीकें अवस्थामें आयल युवा सब अनेरे व्यक्ति आलोचनामें लगि जाएत अछि आ अपन पत्रकारिताकें कलुषित, संकिर्ण आ जातिवादी घेरम्मा दिश टहला दैत छथि । ई एकटा पैघ दूर्भाग्य बाहेक अउर किछु नहि, सुधार’क अपेक्षा अछि । यावत कारणें मिथिला पत्रकारितामें रौबदार उपलब्धी सब अखनों धरि शून्य देख रहल छी । अतितमें अहि क्षेत्रमें जे सब भेल अछि ओ जातिवाद, संकीर्णतावाद, मनुवाद, व्यक्तिवाद, परिवारवाद, अपनत्ववादकें चंगूलमें रहल किछु गोटाकें कारणें मटियामेट भँ गेल अछि । आब फेर सँ दम लगाकें ‘हईस्सा’ कहैत बढ पडत । ओना त अहि क्षेत्रमें अपवाद भेटैत अछि । मुदा आजूक दिन ओहि सँ काम नहि चलत । तईं आब अईकें लेल सम्बन्धित सबकें मानसिक रुप सँ तयार होमे पडत ।

स्तुतिगान वर्जित 


पत्रकारितामें यशोगान वा स्तुतिगान बड बेसी बढि गेल अछि । ई निस्तेज होइते, बेंङ जका पत्रकारिता कुदैय लागत हमर विश्वास अछि । काउछ’क गति सँ आब लोक’क मोन ऊबि गेल छन्हि, आ अहि सँ आब काजो त नय चलत, गिरगिटिया प्रवृति छोडय पडत । अई विषय पर विचारक मैक्समूलकें कथन समचिन अछि । ओ कहैत छथि, ‘विचार सबके आन्तरिक कालक्रम’के तयारी सबहक जिम्मेवारी होमाक चाहि । मुदा पुरान नहि नव विचार’क सृजना होए । एकर अर्थ पुरनका सकारात्मकता युक्त विचार , संस्कार आ रीतिकें छोडि दियौन से किमार्थ नहि । ’


पत्रकारितामें अनुशासन

पत्रकारितामें अनुशासन अपरिहार्य विषय अछि । एकरा अलग ककें असल पत्रकारिता असम्भव अछि । कौटिल्य शिक्षाकें प्रथम स्थानमें अनुशासन(विनय) के रखने छथि । अहिमें सात गोटा गुण रहल बात लिखने छथि । शुश्रुषा(ज्ञान प्राप्त करबाक इच्छा), श्रवण(जीवनमें सिखल गेल सत्य पर ध्यान देनाई), ग्रहणम्(सिखलाह विषयकें समझनाई), धारणम्(समझमें आयल बातकें हृदयंगम करनाई), विज्ञानम्(सिखल गेल सत्यकें प्राप्ति हेतु उपाय आ साधान’क खोजी), उहा(निस्कर्ष निकालनाई) आ चिन्तन–मनन करनाई (मुखर्जी,राजमुकुन्द) विषयकें समटल गेल छैक । पत्रकारिता कएनिहार सबकें कौटिल्यकें अहि बात सब पर ध्यान दैति आगा बढबाक चाही । किछु वर्ष एमहर पत्रकारिताकें अपन विषयवस्तु बनाकें आगा बढल लोक सब सेहो पैघ संख्यामे बजारमें उपलब्ध अछि । मुदा ओ सब व्यवहारिक ज्ञान सँ बड पछा छथि । किएक त नेपाल’क शिक्षामें अध्ययन आ व्यवहार दुनूके समावेश नहि कयल गेल अछि । होमाक दुनू बात चाही, सैद्धान्तिक होनाई अनुचित अछि ।

अहंकारी, अशिष्ट आ असहिष्णु प्रवृति मिथिलामें हरेक क्षेत्रमें देखल गेल अछि । खास ककें मिथिला अभियानी सब अहि विषयमें सबटा सीमा पार कए देने छथि । अहि प्रवृतिकें रोकमामें से हो भाषिक पत्रकारिताके एकटा निक ‘टूल्स’ बनायल जा सकैत अछि । उपेक्षा, तिरस्कार आ विफलता सुच्चा पत्रकारिता कएनिहार सबकें बड बेसी भेटैक छैक, एकरा नजरअन्दाज करैत आगा बढैयवला मात्र ‘बाजिगर’ बनि सकैत अछि । मुदा क्षोभ आ कटुवा सँ दूर रहनाईकें एकर एकटा सर्तकें रुपमें लेमे पडत ।

चुनौति’क सामना


कोनो भी राज्य नैतिक पतन उन्मुख होनाई बहुत पैघ अभिशाप अछि । अहि सँ मुक्त भँ मुनक्ख’क जीवन पुनः नैतिक दृष्टि सँ श्रेष्ठ होय, ताहिलेल विगतमें नेपालमें जनआन्दोलन, जनविद्रोह, मधेसविद्रोह भेल रहैय । ई आन्दोलन आ विद्रोह सबके थोरबहुत संवोधन जरुर भेल छहि । परन्च मधेसीकें बलिदानी’क तुलनामे बहुत कम मात्र सफलता÷अधिकार नेपाल’क संविधानमें सुचिकृत भँ सकल अछि । प्रमुख दल सब संविधान संशोधनकें क्रमके जीवित रखबाक प्रण करैत संविधान जारी केलैथि । मुदा ‘खोला तर्यो, लौरो बिर्सियो’ नेपाली कहबी जका भँ गेल अछि, वर्तमान अवस्था । ओना संघियता आ समावेशिता मधेस जनविद्रोहके ही देन थिक । अखन एकरो एकटा शोकेसमें राखैय वला बस्तु बनाओल जा रहल अछि । बहुत राश अधिकार अखनो केन्द्रमें राखल गेल अछि । भाषिक अधिकार अखनो हाथि’क दन्त बनल अछि । एकर सुनिश्चिता’क अभावे भाषिक पत्रकारिताके भविष्य अंधकारमय अछि । आब त ‘ब्लैक होल’कें अस्तित्व सेहो प्रमाणित भँ चुकल अछि । परन्च नेपाल’क संविधानमे उल्लेख केल गेल भाषिक अधिकार अस्तित्वमें नहि आयल अछि । ओना ई अवस्था पहिनौ रहैक, तइयो किछु अग्रज आ जुझारु युवा सब एकरा एकटा चुनौतिकें रुपमें स्वीकार करैत आगा बढलाह आ आजू भाषिक पत्रकारिता’क लेल ‘मिलकें पाथर साबित भेल अछि । ओहुना भाषिक पत्रकारितामें बड पैघ चुनौति सब अछि । परन्च एकर भविष्य अखनों इजोते अछि । प्रेस काउन्सिलके वर्गिकरणमें भाषिक पत्रकारिताकें प्राथमिकतामें राखल गेल अछि । गोरखापत्रमें हरेक दिन भाषिक पृष्ठकें स्थान देल गेल अछि । एकर बाबजूद भाषिक पत्रकारिता’क स्तरियता अखनों उग्गडुब्ब करैत देखमा आ बुझमामें आबैत अछि । खास ककें मैथिली भाषा पत्रकारिता’क स्तर सन्तोषजनक नहिं अछि । अहि क्षेत्रमें लागल लोक सब हुक्कुर–हुक्कुर करैत छथि । सामग्री सब आत्मकेन्द्रित आ जातिवाद पर आधारित बेसि भेटैक छैक । सप्तरीकें राजबिराज सँ प्रकाशित एक पत्रिकाकें अवस्था जेहेन छई धनुषा’क जनकपुर सँ प्रकाशित मैथिली अखबार’क ओहने छैक । मैथिली अखबारके विश्लेषण कयला पर ई देखल गेल अछि जे समाचार सँ लकें लेख रचनाधरिमें मिथिला क्षेत्र’क इलिट क्लासकें प्राथमिकता अछि । अनुवाद सामग्री सबमें सेहो ओहे रबैया भेटल गेल अछि । शायद ‘दालिभात’ जोडबाक माध्यम नहि बनलाकें कारण ई भँ सकैत अछि से हमर ‘हाइपोथेसिस’ रहैक । परन्च ओ झुठ सावित भेल छल, अध्ययन कयलाकें बाद । जातिवादीकें गन्ध बेसी भेटल , समग्र मैथिली आ मिथिलाके पक्षमें ओ नही देखल गेल । पत्रकारिता मैथिलीकें नाम पर मुदा अपन लेख÷रचना आ सामग्री सबकें विशेष ग्राहयता देल गेल भेटल । स्थानीय सामग्री सँ बेसी पडोसक पत्रिका सबमें प्रकाशित लेख÷रचनाकें अनुवाद (ओहू मे सम्बन्धित संपादक जहि जातिकें छथि, ओहि पार छापल ओहे जाति’क सामग्री) कें प्राथमिकतामे रखल गेल भेटल । एकर संपादक आ प्रकाशक सब मैथिली भाषाकें ‘भेटेरान्स’ सब अछि । आखिर ई मानसिकता कहिया धरि रहत ?


‘स्थिर बाइट’ न्युनिकरण होय  

अन्त्यमें, पत्रकारितामें ‘स्थिर बाइट’ के ठीक नहि मानल जाएत अछि । तईं मिडियाके बहुवचनताके लिए जगह बनेबाक चाही, आजुक गणतन्त्र, जनतन्त्र, लोकतन्त्रके लेल इ एकटा बुनियादी बात छैक, अंगिकार करबाक जरुरी अछि । मिडिया आ पत्रकार’क संख्यामें वृद्धि सुखद बात अछि । परन्च ओकर तुलनामें भाषिक पत्रकारिता बहुत पाछा अछि । मिडियाके बढोत्तरी के कारण राजनीति आ दल सभहक स्वरुप आ राजनीतिक संस्था सब मे परिवर्तन जरुर भेल अछि । एकरा एकटा उपलब्धिकें रुपमें ल सकैत छि । परन्च ओहि परिवर्तन’क तुलनामें भाषिक पत्रकारिता बहुत पाछा अछि । आजुक सूचना तेज आ तत्काल बनल सामग्री बनल अछि । अहि बातकें बुझि आगा बढबाक आवश्यकता अछि । विकास पत्रकारिता, सामाजिक पत्रकारिता, ग्रामिण पत्रकारिता, नागरिक पत्रकारिताके बेसी स्थान भेटैय । खास ककें भाषिक पत्रकारितामें ई विषयवस्तु सब एकटा अनिवार्य विषय बनबाक चाही । स्थलगत रिपोर्टिङ पत्रकारितामें प्राण भरि दैत छैक । एकरा अवलंवन सब गोटाकें करैटा पडतैन्हि । कोनो दिन मीडिया हरेक संसदीय क्षेत्र के बारेमें बारीकी सँ बतेनाय शुरु कैर देत त यकिन करु सांसद लौटके अपन संसदीय क्षेत्रमें नही पहूंचत । पत्रकारिताकें एक अउर पैघ चुनौति कहियौं वा समाचार’क स्रोत, ओ अछि ‘नेट नागरिक’ । समाजिक संजालमें एहन नागरिक सब अपन विचार जोडदार रुप सँ पडोसैत रहैत छथि । ओ सब अपन–अपन बिचार नेट पर दैत रहैत छथि । एकरा सामग्री बनाकें पाठक समक्ष परोसल जा सकैत अछि । ‘बाईट’ के रुपमें सेहो एकर उपयोग कए जा सकैत अछि । तहिना, पत्रकारिताके दलाली’क पोल खोलबाक लेल सेहो तयार होमे पडत । पत्रकारिताकें एकटा अनुष्ठानकें रुपमे बढाओल जाए त ई क्षेत्र सम्मानित, मर्यादित आ जन–जनके हिया सँ जुडि सकैत अछि ।
(Aangan, Issue:8, 2076, Nepal Pragya Pratisthan, Kathmandu)


सन्दर्भ सामग्री :
–मिडिया जनतन्त्र और आतंकबाद, सुधिश पचौरी, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली ,२००१,पृष्ठ७८
–पत्रकारिता के सिद्धान्त, डा.रमेशचन्द्र त्रिपाठी,पत्रकारिताःसिद्धान्त और प्रयोग–डा.लक्ष्मीकान्त पाण्डेय, पृष्ठ ८०,मीडिया और हिन्दी : बदलती प्रवृत्तियाँ,वाणी प्रकाशन नई , २०१६)
–मुखर्जी, राधाकुमुद, चन्द्रगुप्त मौर्य और उसका काल, राजकमल प्रकासन, नई दिल्ली, सन १९९०
–साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य, पृष्ठ ३०५–३०७, प्रेरणा प्रब्लिकेसन्स, सं.अरुण तिवारी ) 

Sunday, 1 September 2019

मैथिली अगुवामा पुरानै मानसिकता हावी


आङन (मैथिली पत्रिका) 
नेपालको सरकारी बजेटबाट निस्किने वार्षिक पत्रिकामा समावेशिताको सिद्धान्त लागु गरिएको छैन । मैथिली भाषामा एकल जातिय वर्चस्पलाई निरन्तरता वर्षौदेखि यो पत्रिकाले दिँदै आएको छ । त्यसैको पछिल्लो कडिका रुपमा आंगनको पछिल्लो अंक ८ बन्न पुगेको छ । यो अंकमा तल्ल उल्लेखित त्रुटीहरु फेला परेका छन् । यो त्रुटीबारे सम्बन्धीत सबैलाई प्रत्यक्ष रुपमा भेटेरै बताइ सक्दा पनि खासै चित्त बुझ्दो प्रतिक्रिया आएको छैन । कार्यकारी सम्पादकलाई त्रुटीबारे जानकारी दिँदा उहाँले भन्नुभयो, ‘यस्तो त भई रहन्छ ।’ एउटा जिम्मेवार पदमा बसिसकेको व्यक्तिबाट जुन रुपमा गैरजिम्मेवारपूर्ण अभिव्यक्ति आएको छ, त्यसले मैथिलीलाई उकास्न सक्तैन ।


  

आङ्न पत्रिकामाथि टिप्पणी 

१. पत्रिका समग्र मैथिलीभाषीको बन्न सकेन :
क) कूल ३० वटा सामग्री प्रकाशित गरिएकामा २० वटा (६६.६७ प्रतिशत) मिथिलाका कथित ‘उच्च जाति/वर्ग’ को मात्रै परेका छन् । १० वटा (३३.३३ प्रतिशत)मात्रै अन्य जाति/वर्गका व्यक्तिको समावेश गरिएका छन् । 
ख) पत्रिकामा ‘७० प्रतिशत मैथिल समुदाय एक–भाषी (पृ.२६)’ दाबी गरिएको छ । केही  समयका लागि यही दाबीलाई पनि मान्ने हो भने पनि पत्रिका समावेशी नभएको पुष्टि हुन्छ ।
(नोट :यहाँ विवादास्पद शब्द ‘मैथिल’ प्रयोग गरिएको छ, जुन निश्चित जातिका लागि विगतमा संवोधन बोधक शब्द हो । 
ग) पत्रिकाले मिथिला क्षेत्रमा बसोबास गर्ने अन्य जाति(दलित, मुस्लिम, सोलकन, ओबिसीलगायत) को प्रतिनिधित्व गराउन सकेको छैन । पत्रिकामै ‘मैथिलीभाषी बहुसंख्यक निम्न जाति र अल्पसंख्यक उच्च जाति (पृ.३०)’ भनेर लेखिएको छ । तर बहुसंख्यक कथित निम्न जातिको प्रतिनिधित्वलाई खुम्च्याइएको छ, ३३.३३ प्रतिशतलाई मात्रै प्रतिनिधित्व गराइएको छ । 

२. मानव थोपरर्ने प्रयास :
क) मिथिलामा सीमित जातिको अल्पसंख्यक उच्च जातिको भाषा, बोली, लय , शब्द, शैलीलाई अन्यमाथि थोपर्ने प्रयास भएको छ । पत्रिकाको पृ. २९मा यादव, रामावतार : १९९८को साइटेसन नोट र पृ.२९ र ३० को अमरकान्त झाको आलेखले त्यसको पुष्टि गर्छ । मानकका रुपमा कथित उच्च जातिकै बोली, लय र शैलीलाई मान्नै पर्नेगरि विभिन्न देशका उदाहरण प्रस्तुत गरिएको छ । यसलाई लागु गर्ने केही उपायहरुमा शिक्षा, प्रशासन र सञ्चार क्षेत्रमा निरन्तर प्रयोगलाई बनाइएको छ । यी तिनैमा लेखकले भने जस्तै र यो पत्रिकाले अवलम्वन गरेको ‘गोप्य नीति (हिडेन पोलिसी) कै अंग हुन सक्छन् । लेखक झाले उपशीर्षक मानकीकरणको अन्त्यतिर बहसका लागि तीन वटा विकल्प बहसका रुपमा राख्दै भाषाविद्माथि निर्णयको जिम्मा दिने प्रयास गरेको देखिन्छ । 

ख) पत्रिकाको पृ.२२ को विषय–प्रवेश उपशीर्षकमा ‘ एक राष्ट्र–एक भाषा नीति’ को आलोचना गरिएको छ । तर ‘भाषा’ स्तम्भको यो आलेखका लेखकले ‘एउटै भाषा, शैली र लय’ अन्यमा थोपर्ने भग्मग्दुर प्रयास गरेको देखिन्छ । त्यसैले खुलेर बहुसंख्यक मैथिली भाषीको कुरा आउँदा अनुत्तरित भएर प्रस्तुत भएका छन् । अर्थात् बहुसंख्यकको प्रसंग आउने बित्तिकै ‘प्रश्नवाचक चिन्ह’ राख्नै पन्छिने गरेको पाइएको छ(पृ.२९को अन्तिम अनुच्छेद र पृ.३० को अन्तिम अनुच्छेद) । 

३. भाषिक नीतिबारे एउटै जातिको प्रतिनिधित्व:

मैथिलीको भाषिक नीतिलगायतका विषयमा पनि अन्य जातिमाथि विश्वास नभएर हो या अन्जानमा हो पत्रिकामा उल्लेख गरिएको शब्दाबली ‘अल्पसंख्यक उच्चजाति’ कै हालीमुहाली छ (उदाहरण : नेपालक भाषा नीति आ मैथिली(पृ.२२), शिक्षा–क्षेत्रमे मैथिली : नीति आ यथार्थ( पृ.४५) र मैथिली भाषा–साहित्यक अवस्था, दशा आ उन्नतिक उपाय(पृ.८०) ।

४.मैथिली अभियानीको प्रसंग :

पत्रिकामा परमेश्वर कापडिबाहेक पुनम ठाकुर, विनित ठाकुर, प्रविणनारायण चौधरी, धीरेन्द्र झा ‘प्रेमर्षी’, देवेन्द्र मिश्र, गणेशकुमार लाललाई मिथिला मैथिली अभियानीका रुपमा पस्किएको छ । कापडिबाहेक पत्रिकामै उल्लेखित शब्दाबली ‘अल्पसंख्यक उच्च जाति’ परेछन् । (नोट: यहाँ यो टिप्पणीलाई योगदानको अवमूल्यन गरेको रुपमा नलिन आग्रह छ । 

गम्भीर त्रुटी :

क)पत्रिकाको सम्पादकीयमा एउटा ब्लगको विज्ञापन गरिएको छ । अझ विवादास्पद मानक जस्तो सम्वेदनशिल विषयमा ब्लगलाई स्रोत/विचारकै रुपमा ल्याउनु गम्भीर त्रुटी हो । कुनैपनि ब्लगलाई स्रोतका रुपमा उदृत गर्नुलाई राम्रो मानिन्न । नेपालमै पनि ब्लगस्पटको मान्यता सरकारी स्तरमा छैन । पत्रिकाले त विज्ञापनकै शैली अप्नाएको जस्तो भान हुन । यो त्रुटी हो, सुधारिनु पर्छ । 
ख) पत्रिकाको ‘नेपालक प्रमुख मैथिली साहित्यिक पत्रपत्रिका’(पृ.५७–६३सम्म) आलेखमा लेखकले आफ्नै प्रशंसा स्वयंम गरेका छन् । बाईलाईन आइसकेपछि आलेखमा कसरी प्रस्तुत हुने भन्ने थाहा नपाएर हो वा लेखकको आफ्नो स्वभावले हो, थाहा भएन । तर यो एउटा स्व–स्तुती हो । यस्तो कुसंस्कारको अन्त्यका लागि प्रज्ञा प्रतिष्ठान जस्तो गरिमामय संस्थालाई विनम्रतापूर्वक आग्रह गर्छु । आफ्नो प्रशंसा आफैले गर्ने कुनै भाषा र त्यसका लेखक मैथिलीमा मात्रै भेटिएको छ । 
ग) पत्रिकाका ‘अन्तर्राष्ट्रिय परिधिमे मैथिली आ मिथिला’ शीर्षक आलेखमा तथ्यहीन र अप्रमाणिक विषयहरु समेटिएका छन् । सत्यनारायण भगवानको कथा, विद्यापति पर्व, मैट्रिमोनियल साइट, मैथिली मसाज थेरैपीलाई आधार बनाएर जसरी जबर्जस्ती आलेख बनाइएको छ र त्यो प्रज्ञा प्रतिष्ठान जस्तो सम्मानितसंस्थाको प्रकाशनमा प्रकाशित गरिएको छ । यो पनि गम्भिर त्रुटी हो । 


घ) पत्रिकाकै शब्दावली ‘अल्पसंख्यक उच्च जाति’ कै चाड/पर्व र ती जातिको महिमामण्डन हुने सामग्रीलाई स्थान दिनुले बहुसंख्यक निम्न जातिलाई मैथिलीले जोड्दैन , तोडछ (पृ.८६ र पृ.९३)। पृष्ठ ८३ मा मधुश्रावणीलाई मिथिलाकै पर्वका रुपमा र पृ. ९३ मा डिहबारलाई ‘ब्राह्मण राजा’ कै रुपमा प्रस्तुत गरिएका छन् । यसमा कति सत्यता छ, त्यो पछि छलफलको विषय बनाउन सकिएला, तर अहिले यति  चाही भनिदिऊँ, एकल जाति वर्चस्प हाबी भएको भन्दै मैथिलीप्रति सिंगो बहुसंख्यक मैथिली भाषीको वितृष्णा जागेकै बेला यसप्रकारको हर्कतले मैथिली भाषालाई हानी मात्र गर्छ । 
ङ)पत्रिकाको ‘पुस्तक समीक्षा’ स्तम्भमा समिक्षकले पुस्तकको समिक्षामा साधुवाद वा धन्यवाद दिएको पहिलो रेकर्ड बनेर गएको छ (पृ.११२को अन्तिम अनुच्छेद) ।

–दिनेश यादव