Thursday, 18 October 2018

मिथिला में ब्राह्मणबाद पर बबाल

नेपालीय मिथिला क्षेत्र कें महोत्तरी में भँ रहल मैथिली कार्यक्रम ‘अडहूल’ पर लिखल गेल हमर ई फरक मत थिक । अई कार्यक्रम में एक–दुइगोटा बाहेक झाडि एकल जाति (ब्राह्मणवादी) सभहक सहभागिता आ दबादबा देख हम प्रतिक्रिया लिखलौए । सामाजिक संजाल सकारात्मक बहसकें निक मैदान थिक, एकरा अहि रुपेण प्रयोग होमाक चाहीं से हमर मान्यता रहलैए । तार्किक बहस के पक्षपाती छी, तेँ स–प्रमाण तर्कसहित प्रस्तुत भेलौए । प्रवुद्ध आ विद्वान पाठक वर्ग अपने सभ न्यायाधिश छी । न्यायके पक्षमे खाड होयब से अपेक्षा । हमर फरक मत सभ गोटा के निमने लगई से त नहि भँ सकैत अछि । ऐतह, हमर स्टेटस पर आयल विचार बिना सम्पादन कएने रखने छी । अपने सभहक प्रतिक्रिया कें लेल ललायित सदखनि रहब । मिथिला सुहनगर बनौत से मात्र हमर पवित्र मकसद अछि । एकरा अहि रुप सँ लेबाक सभगोटा के हमर विन्तिभाव सेहो अछि !
कोनो पुस्तकमें हम पढने रही: भाषा/साहित्य जाति, लिंग, धर्म आ सम्प्रदाय सँ ऊपर होयत छैक । ओहिमें नहि स्थानक भेद रहैत छहि, नहि कालक भेद , नहि भाषाक भेद, नहि मानवक भेद । ओहिमें नहि कोनो शर्मा होएत छहि, नहि वर्मा होएत छहि, नहि झा होएत छहि, नहि यादव होएत छहि, नहि कियो दलित होएत छहि, न किओ मुस्लिम होएत छहि...... मुदा रोटी–पानीकें जुगाड मे रहल किछु लोक आ कमाउ कमिटि कें ईंचार्ज किछु गोटा किएक मैथिली भाषाकें कमजोर आ बाँटबखराकें प्रयासमें लागल छथि ? तई, एक गोटा ‘पाग बनेबाक काजमें’ जुटल छथि आ दोसर गोटा गैरजिम्मेवारीपूर्वक जातिय प्रचारक विडा उठेने छथि । प्रचारमें आयल लोक सभ में किछु गोटा माक्र्सवादी सेहो छथि । ओ भाषाकें विकास कम आ व्यक्तिगत स्वार्थ आ सदैव हरिअरीकें जोगाडमें बेसी रहल पुष्टि बहुत पहिले भँ चुकल अछि । ओ सब कहैत छथि, जातिके बाते नहि वर्गक बात करु । मुदा हुनका सबहक वर्ग माने भाषाक नामपर जातिबाद मात्र देखमामें आयल अछि । तें हरेक नाम सँ पहिले आब मिथिलामें जातिक पत्ता कथित साहित्यकार सब करैय लागल छथि । अपवादकें रुपमें पर्दा आगा एक आ दू गोटा गएर–जातिके देखाकें ओ सब ओहे लेखक/साहित्यकार/कलाकारके सही मानैत छथि, जे हुनका लोकन्हिकें अपन जातिकें रहैत छथि । चेला आ चेलवाके चेला जे काम लगैय बला होए, कुलगोत्र बढाबय बला होए, ओकरे चयन होएत छहि । दुर्भाग्य जे, प्रगतिशिल लोक सभ जातिशील जका काँज कए रहल छथि । पता नहि, मैथिलीकें अग्रज विद्वान द्वय डा।महेन्द्रनारायण राम आ श्री परमेश्वर कापडि जी द्विज सबहक भ्रमजाल आ नेपालक नटवरलाल सबकें चंगूलमें कोनाकें फसिं जाएत छन्हि ?

हमर ई स्टेटस पढिकें मैथिली भाषाकें सक्रिय अभियानी एवं सर्जक विष्णुकुमार मण्डल लिखलथि :
अपनेक कथन काटबाक अवस्था नहि, मुदा मिथिला त मिथिला छियै एकर संरक्षण आवश्यक । ताहि वास्ते एहि सत्य के उजागर करैत उपर लिखल गेल अप्पन भूमि बन्हकी राखि हरियरी चर, मे व्यस्त कथित विद्वान लोकनि के मार्गदर्शन करब आवश्यक । मिथिला आ मैथिली ककरो बपौती नहि, हमरा सभक छी, एकर रक्षा हमरा सभक दायित्व छी, एहि सकारात्मक भावना दिस ध्यान केन्द्रित होयब अपरिहार्य । 

मनोज झा ‘मुक्ति’के प्रश्न रहनि:
दोसरो कोनो आयोजन होइ, जाइमें ई आरोप नइ लगाओल जासकय । मुदा, करत के ?
मात्र आ मात्र फण्ड समाप्त करवाकलेल कार्यक्रम आयोजना करबाक संस्कार रहल अपना ओतऽ अपन नितान्त व्यक्तिगत खर्चपर ूचनमाू क सफल आयोजन पश्चात ूअडहूलूके आयोजन कएने विभा झा बधाईयक पात्र छथि ।एकटा व्यक्तिगत खर्चपर बेदाग कार्यक्रम आयोजना कएल जाय भाइ साहेब । जँ भऽसकय त हौसला देलजाय, मनोबल तोडवाक काज कतौसँ नइ होएवाक चाही ।

सिरहामें रहिकें मैथिली आ नेपाली गीत, साहित्यकें श्रीवृद्धिमें सक्रिय अर्जुनप्रसाद गुप्ता लिखलहिन:
भाषाक नामपर राजनीति कयनाई एवं व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षी बननाई अपराध सरह अछि । जनमभूमिक दलाली कयनाई अपन माईसँ बइमानी कयनाई अछि । किछु अभिशापी पापीसब भाषा साहित्य आ जनमभूमिके बहाना बनाक अपन महत्वाकांक्षा पुरा करमे व्यस्त अछि । फेरो उहे इमान्दार कहलाबैत अछि उहे सम्मानित भ रहल य । गुलामी आ पिच्छलगुवा त वास्तविक सन्तानपर अन्याय क रहल य ।शोषक ओकरे चाबसी द रहल य । 

मनोज झाकें प्रति हमर प्रश्न रहनि:
कोनो कार्यक्रमक आयोजन आ प्रचार दूइटा पृथ्थक बात थिक । कार्यक्रमक आयोजनकें ई अर्थ किन्नौह नहि जे एकल जातिय भाषा/शैली/लवज/व्यक्ति/परम्पराकें सर्वव्यापीकरण करी । एकटा व्यक्तिगत खर्चपर बेदाग(?) कार्यक्रमक आयोजनाकें इहो अर्थ नहि जे ओहिमें मात्र आ मात्र सिन्डिकेटधारी आ कार्टेलिङबादीकें अपन मनमौजी करबाक छुट होए । भाय, राजधानीमें पिछला मईमें भेल ‘चनमा’ केर बात अपने कयलौए या आन जगहक ‘चनमा’ केर बात ? राजधानी बला ‘चनमा’ मे ‘कथित पागक प्रचार’ नहि होमाक बात सकारात्मक छल । मुदा कार्यक्रमक वक्ताक प्रस्तुति आ अहिके बारेमें सार्वजनिक भेल ‘न्युज’ त मैथिलीकें तोडबाक पुष्टि कएलक अछि । ओहि कार्यक्रममें नेपाली कांग्रेसके नेता/सांसद प्रदिप गिरी आ वामपन्थी नेता रामचन्द्र झाकें टिप्पणी पर अपनेकें प्रतिक्रिया जानए लेल इच्छुक छी । गिरी जी कहने रहथि –‘मैथिली भाषा सिर्फ ब्राह्मण–कायस्थ में बोलल जाएत अछि’ आ झा जी के कथन रहन्हि जे ‘ब्राह्मण–कायस्थक बोली मैथिली भाषाक मानक थिक ।’ ‘मैथिली जिन्दाबाद’ कें एकटा गोटा संचालक पूर्व राष्ट्रपति रामबरण यादव(राजधानी बला ‘चनमा’ कार्यक्रमक विशिष्ट अतिथि रहन्हि) कें ‘मैथिली भाषाक ज्ञान नहि होमए वला व्यक्ति’ कें रुपमें ओ अपना अनलाईनमें चित्रण कएने रहैक ।.....‘चनमा’के बाद ‘मैथिली मचान’क आयोजना राजधानीमें भेल, ओहूमें प्रदिप जी आ रामचन्द्र जीकें परिभाषामें समटल मैथिली बजैबला लोकन्हि सबहक दबदबा रहैक (ओहूठाम एक गोटा कथित ‘नचनिया’ आ एक गोटा कथित ‘बजनिया’ में वर्चस्पकें लडाई छताछुल्ल भेल रहैक) । इ दूईटा घटनाक्रमक बाद ‘अडहूल’ कें आयोजन भँ रहल अछि । इ सकारात्मक होइतो, अहिकें प्रचारमें (बिजय दत्त ‘मणि’जी आगन्तुक अतिथिगणक हेतु शिर पर ‘पाग’ धमाधम निर्माण भँ रहल बात लिखलथि) आ सहभागी सभहक सूचीं(सार्वजनिकिकरण धिरेन्द्र झाकें फेसबुक बाल पर भेल,जहिमें गएर–मैथिल(?)कें उपस्थिति नगन्य छहि) देख चिन्ता मात्र जाहेर कएलौह । मिथिला आ मैथिलीमें अगुवा सबहक कमी छहिए नहि, त हमरा सनक पछुवा केर कोन काज ? ओना जे पात्र सभ कार्यक्रममें सहभागी अछि ओ सभ ‘दूधक’ धुअल विल्कूल नहि छथि । कियो कमाउँ कमिटीकें इन्चार्ज छथि, कियो मैथिलीकें नाम पर ‘दूकानदारी’ में लागल छथि.....। प्राज्ञसभामें उपकूलपति बनबाक लेल ‘ढेङ्हुन छाबा’ एक कएनिहार, माक्र्सबादक शिक्षा देनिहार, जातिय महिमामण्डित कएनिहार आ ............देख चिन्ता भेल । मनोज जी, मैथिलीमें शुद्धिकरणक आवश्यकता अछि, हमर अभियान मात्र अहि बास्ते अछि । जाहाधरि कार्यक्रमक आयोजनाकें बात अछि, तयारी भँ रहल छहि, सामग्री सभ जुटा रहल छी । मिथिला आ मैथिलीकें नामपर ठगफुसियाहि कएनिहार सभहक जन्मकुण्ली तयार भँ चुकल अछि । किछु आर दिन नटवरलाल सभहक लुटामारी चलए दियौं । अखन हमरा ‘वाचडग’ के भूमिकामें मात्र रह दिए, सुझाबक लेल धन्यवाद, भाय । 

एकरबाद जीवेश झा जी अपन प्रतिक्रिया अंग्रेजीमे देलथि:
Sir, these people r constipated ones. We have seen their fake bravery from the very long. So called High castes, idiots! They r narcissists...if you question their attitude, they would term you anti-Mithila. This is the irony. They favor Mithila over Madhesh. Its their constipated thoughts which divided us along the lines of castes and creeds and we have got a small province of 8 districts against 20. They r non-sense. Mithila is a tool for them to milk money. They r fools.

जीवेश झा पर हमर प्रतिक्रिया:
Jee! It's bitter reality of Mithila and Maithili even Madhes and Madhesi too. Your big little but huge messable analysis are echoes of all Maithili People . Thanks a lot to participations on good innociation of Mithila .

हमर प्रतिक्रिया:
जहि कार्यक्रममें विद्वान वक्ता लोकन्हि ‘मिथिलामें सुच्चा मैथिली भाषी ब्राह्मण–कायस्थ मात्र होमाक प्रचार कएने रहिन्ह’ ओकरा एकटा गोटा मैथिलीकें उप–प्राध्यापक ‘सफल’ कहि रहल छथि....... मैथिलीकें कथित अभियानी सभसँ भरलपुरल ओहि कार्यक्रमक सभागृहमें किनको मूँह सँ अहिकें विरोधमें आबाज नहि निकल रहैय । आ आजुधरि ओ सभ मौने छथि । यौ सरकार, मैथिलीकें दूर्गति ओहिना नहि भेल छहि ?

मनोज झा जी कें प्रतिक्रिया:
हम एखनो कहि रहलछी जे कार्यक्रम भरपुर सफल रहल छल । ओइमे कोनो एहि प्रकारके बात नइ कहलगेल छलै । हँ, मैथिल कहलासँ मात्र किछुजातिके कहब जे बात किछु कथित विद्वान जे कहैत छथि ताहिके फरिछिएवाक प्रयास वक्तासब कएने रहथि ।हमरा इ नीकजकाँ बुझल अछि जे मैथिली कोनो जाति विशेषके जिमदारी नै छै । हँ, अपना-अपना स्वार्थ सिद्धीकलेल अपने हिंसावे व्याख्या कएनिहारके कमी नै छै एहि संसारमे से आहाँ,हमरा आ बहुतोके बुझल छन्हि ।

हमर प्रतिक्रिया :
‘अडहुल’ कें नाम पर ‘मैथिली साहित्य’ कार्यक्रम नहि, खासजाति विशेषक ‘अनुष्ठान’क तयारी भँ रहल बात निचा देल गेल तस्बिर सेहो पुष्टि करैत छहि । पहुना सभकें ‘पाग’ लगेबाक तयारी जोड–सोड सँ चलि रहल छहि । ‘पाग’ मिथिलामें सभकें पहिरन त नहि छी । मैथिली हमरों सरोकारक विषय थिक, तें गलतकें गलत कहनाई अपराध नहि थिक ।


भौतिक शास्त्री एवं वैज्ञानिक विन्देश्वर गोइत जीकें प्रतिक्रिया :
कभी कभी हमको लगता है कि हमलोग कि हमलोग जो मुद्दा नही है उसको मुद्दा बना लेते है वह भी फेस बुक मे।हिन्दु धर्म का अभिसाप जाति प्रथा है।इसके बिरोध मे भगवान बुद्ध ने लडाइ लडी।बुद्ध धर्म को अनेक षडयन्त्र करके भारत से खदेर दिया गया।कुमारिल जो आदि शंकरार्य के सबसे नजदिक थे ने बुद्ध धर्म के बारे के बारे मे झूठ, भ्रामक एबं घिनौना कुप्रचार किया। इसके प्राश्चित स्वरुप कुमारील ने शंकराचार्य के सामने उनके रोकने के बाबजुद आत्मदाह कर लिया।मिथिला के लोग ज्यादा कास्ट कनसस है यह तो जग जाहिर है।अतस् जो पाग आदि९पाग मैथिल ब्राह्मण का डरेस है० का प्रचार करते है उनको अपना काम करने दें।हमलोग पगडी, गमछा का प्रचार करे।दलितों के साथ सदियोंसे जो छुवाछुत जैसा घृणित ब्यबहार किया जा रहा हढ उसके बिरोध मे समाजिक अभियान चलाबे।बहुत सारे मुद्दे है उस मुद्दा पर बहस हों।

हमर प्रतिक्रिया :–

 मिथिलामें ढोलहाराकें काज सभ गोटे बुझनेहि छि । ओ सभ टोल–टोलमें ढोल पिटकें सूचना या हकार दैति छहि । मुदा ढोलहरें सुचना गलति सम्प्रेषित करत त, सुधारक अपरिहार्यता निश्चित होएत छहि । सन्दर्भस् ‘अडहुल’ के चलि अछि । अपनाकें मिथिलाकें एकटा मात्र सुच्चा९रु० मिथिला अभियानी(?) के दाबी कएनिहारक ‘फेसबुक वाल’ मे लिखल सामग्रीकें ‘सट स्क्रिन’ ककें निचा परोस रहल छी । हुनक नाम सर्वव्यापी(?) भेलाकें कारणे ऐतह गौण रखने छी । प्रवुद्ध पाठक आ दर्शकदीर्घाकें पहिचानक जिम्मेबारी दए रहल छी । इ पुरुष जातिय धङधङतीमें ऐतेक ने चूर भँ गेल छन्हि जे अपन स्टेटस में अनाप–सनाप लिख देने छथि । अपन कुल–जातिगत (?) सूची त सार्वजनिक कएने छथि , स्टेटसमें बेमेल आ विवादास्पद शब्दक अविष्कार केने छथि । जेना ‘मिथिलोक’ रु एकर की अर्थ होएत छहि रु सम्भवतः गुगल सर्च आ डिक्सनरीमें सेहो नहि भेटैहिबला इ शब्द थिक । जौ ‘मिथि’ आ ‘लोक’ के अलग–अलग परिभाषा कएल जाहि त, ‘मिथि’ राजा सँ सम्बन्धित आ ‘लोक’ संसार सँ सम्बन्धित बातक पुष्टि होएत छैक । ऐतह इ परिभाषा व्यक्तिगत रुप सँ हमरा असान्दर्भिक बुझमामें आयल अछि । ओना लेखककें अपने विशिट परिभाषा अई विषय पर भँ सकैत अछि , से जानबाक लेल ब्याकुल छि । हमरा बिचार सँ
‘मिथिलाक लोक’ होमाक चाहीं । एकैहटा जातिय वर्चस्प बला ‘साहित्यिक’ जमघट आब हिनका ‘रंगीन’ देखबामें आबि रहल छन्हि । लेखकके मनमस्तिष्कमें जकडल धुर जातियताके कारण ओ ‘रंगअंधता’ कें सिकार भेलाकें पुष्टि होएत छैक । स्टेटसमें लिखल ‘नाचगान–नाटक–आर्केस्टा’ त समझमें आएल अछि, मुदा ‘किदन–कहाँदन खूब देखल जाइ छै’ के अर्थ अनर्थ मात्र नहि ‘सांस्कृतिक– प्रहार’ केन्द्रित सेहो अछि । सरकार, मिथिलामें दशहराकें अवसर पर मैथिली गीतनाद, नटुवा, बजनिया, किर्तनिया, भगैत, लोकगाथा पर आधारित नाच, मुर्तिपुर्जा, ढोलहा, ढोल पिपहीकें श्रवण.....होएत छै, अई मौलिक परम्पराके एकटा जातिय ‘संगोष्टि’ के आयोजनकेंं नाम पर ‘किदन–कहाँदन’ कहि देनाई आपत्तिजनक थिक । स्टेटसके बा“की शब्दावलीरवाक्य हनुमानभक्तकें खोजी आ गणेश परिक्रमा सँ सम्बन्धित पुष्टि होएत अछि ।
‘अडहुल’ कें नामसं प्रचारित कार्यक्रममें मैथिलीक विद्वान प्रमेश्वर कापडि जी कें सेहो न्योता भेटल छन्हि । कार्यक्रममें ‘पाग पहिरन अनुष्ठान’ हेमाक बात प्रचारमें आयल अछि । सर्वश्री कापडि जी
पाँच वर्ख पहिने लिखने छथि–‘....आई किछु लोक कत्तह कहाँ के छोती कुर्ता आ बभनौटी पागकेँ मैथिली संस्कृतिक पहचान सङे जोडैके घृष्टता कए रहलाह अछि....(स्रोतः विदेह मैथिली प्रबन्ध–निबन्ध–समालोचना, विदेह–संदेह १०९अंक ५१–१०००, श्रुति प्रकाशन, संस्करण–२०१२,पृ।४४० । आब देखबाक अछि जे ‘पाग पहिरन अनुष्ठान’ मे ओ सहभागी होएत छथि या नहि रु
मिथिलामें ‘अडहुल’ कें चर्चा चलि रहल अछि । अहिमें भारतीय लेखक एवं विद्वान Dr.Mahendra Narayan Ram जी सेहो न्योतल अछि से प्रचारमें आयल छहि । हुनके किताब सं संत कबीर जी कें दोहा एतह परोसबाक मोन भँ गेल – ‘निगुरा बाभन ना भला, सगुरा भला चमार । देवतन ते कुत्ता भला, नित उठ भौंके द्वार।।....काला बाभन गोरा चमार । केभी न संग उतरिये पार ।।.... (स्रोत:
भारतीय संस्कृतिमें जातीय–जीव, पृ.९१, शब्द प्रकाशन दिल्ली भारत,संस्करण–२०१७० ) 




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