Sunday, 30 December 2012

पत्रकारितामा मौलाउँदै गएको पैसाकारिता (Press and journalist)


पत्रकारितामा मौलाउँदै गएको पैसाकारिता 
मुद्दा र उद्देश्यहीन बन्दै गएको नेपालको पत्रकारिता । यहाँका केही पत्रकारहरू व्यापारीको भुमिकामा देखिन थालेका छन् । समाचार सामग्री मात्रै होइन अखबारको अस्थिपंजर ठानिने सम्पादकीयलाई समेत उनीहरूले आफ्नो व्यक्तिगत स्वार्थपूर्तिका साधन बनाउने समेत चुकिरहेका छैनन् । त्यसैले त अन्य मुद्दाहरुलाई छाँयामा पार्ने गरि उनीहरूले महिनौसम्म पनि एउटै विषयवस्तुलाई संपादकीय बनाई रहेका छन् । खासगरि मधेस मुद्दामा क्रियाशिल वा केन्द्रित केही कथित मिडियाहरू एक सुत्रिय मागका रुपमा संचार समावेशिकतालाई अघि बढाएका छन् । नेपालको संचार क्षेत्र र त्योसंग सम्बन्धित संस्थाहरुमा समावेशिकता नरहेको कुरा अब नौलो रहेन । तर पद प्राप्ति र विदेशको भ्रमण टोलीमा आफ्नो सहभागिताकै पत्रकारिता र संपादकीय या प्रेस सामग्री प्रकाशित गरेर संचार क्षेत्रमा समावेशिकरण सम्भव छ त ? यो यक्ष प्रश्नबारे पत्रकारहरुले सोच्नै पर्ने बेला आएको छ । नेता, मन्त्री र पार्टीका कार्यरतालाई कामधेनु गाई बनाएकाहरुले मात्रै यस प्रकारको कार्य गर्न सक्छन् । गाईलाई दूध देउञ्जेल घाँसपात, दिन छाँडेपछि मुंग्रो बर्साउने स्थितिले त्यसता पत्रकारिता गर्नेहरुको गलत मानसिकता र दरिद्र सोचलाई उजागर गरेकै छ । त्यसैले मुलुकलाई वर्तमान जटिल परिस्थितिबाट त्राण दिलाउनका लागि पनि त्यस्ता पत्रकार÷संपादक÷प्रकाशकले पत्रकारिता गर्दा अनुचित हुनेछैन । जातिगत पत्रकारिता छाँड्दै सर्वेतु सुखिनः को भावलाई अनुशरण गर्दै अगाडि बढे पत्रकारहरु देवतुल्य पक्कै हुनेछन् । अमूक मन्त्रिले आफूलाई अमुक निकायमा नियुक्ति गरेन भन्दै अमुक व्यक्तिको खैरो खन्दै हिड्नु कुनैपनि दृष्टिकोणले राम्रो पत्रकारिता मानिदैँन । भनिन्छ, पत्रकारिता जनसंचारको सबैभन्दा सुलभ, सस्तो र सशत्तः साधन हो । नेपोलिन बोनापार्टले पनि भनेका थिए कि चार विरोधी अखबारहरूको मारक क्षमताका अगाडी हजारौं बन्दुकको शक्ति पनि बेकार हुन्छ । यही कुरा भारतका लोकप्रिय कवि अकबर इलाहाबादीले यसरी भनेका थिए, ‘जब तोपको मुकाबिला गर्नु छ भने अखबार निकाल । अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति ज्याफरले पनि पत्रकारितालाई विश्वमा मन्त्र झै उच्चारण गर्ने गरिएको उल्लेख गर्दै भनेका थिए, ‘स्वतन्त्र प्रेसबिना लोकतन्त्र एक पाइला पनि अघि बढ्न सक्तैन ।’ अतः पत्रकारिता लोकतन्त्र र अधिकार प्राप्तिको लडाई लड्नेहरुका लागि प्राणवायु हो । त्यस्तै, पत्रकारिताको मुख्यतः तीन काम हुन्छ– विभिन्न गतिविधिहरूको सूचना दिनु, जनमतलाई अभिव्यत्तः गर्नु र संचित सूचनाहरूका आधारमा जनमत तयार गर्नु । त्यसैले त यसलाई राष्ट्रको तीन स्तम्भहरु ः विधायिका, कार्यपालिका र न्यायपालिकापछि चौथो स्तम्भ भनिएको हो । नेपाली पत्रकारिता कुनै बेला मिशन जर्नलिज्मलाई आफ्नो ध्येय बनाएको थियो भने अहिले विशुद्ध व्यवसायमा परिणत भएको भनिने गरिएको छ । तर केही संचारकर्मीको व्यक्तिगत स्वार्थ, दम्भ र द्रव्य मोह तथा जातिय धङधङतीका कारण पत्रकारिता पेशा बदनाम हुँदै गएको छ । अहिलेका संचारकर्मीहरु संसाधन, सुविधाहरू र ऐशो–आरामलाई बढी रुचाउन थालेका छन् । आफ्नो कामप्रतिको निष्ठा विर्सदै गएका छन् । सही सूचना दिनुको साटो अनाप–सनाप लेखेर अखबारका पन्नाहरु मात्र भर्ने गरेको भान हुन थालेका छन् । केही पत्रकारहरुले आफ्नो हैसियत सरकारी कार्यालयका बाबुसाहेब जस्तो बनाउँदै लगेका छन् या यसका लागि उद्दत देखिएका छन् । सुविधा प्राप्ति, राम्रो जीवनशैली बिताउने अवसरको खोजिले पत्रकारप्रतिको सम्मान जन–जनमा घट्दै गएको छ । बौद्धिक प्रखरता, लेखनप्रतिको इमान्दारिता र अध्ययवसाय जस्तो गुणहरूको क्षयिकरणले पत्रकारिता राम भरोसे चल्ने अवस्थामा पुगेको छ । एक विद्वानले भनेका पनि छन्– पत्रकारहरुको दिमाग प्याशुट जस्तै हुन्छ, उसले त्यो बेला मात्रै काम गर्छ जब खुला हुन्छ । तर जाति र पार्टी भन्दा माथि उठ्नै सकेका छैनन्, नेपालका पत्रकारहरु । यसमा आफूलाई मधेसी पत्रकारिताको मियो थान्ने केही कथित संपादक÷प्रकाशक तथा पत्रकारिताको ‘प’ समेत थाहा नपाएकाहरूको नेतृत्वमा रहेको संचार संस्थाका कारण मधेसीमुलका संचारकर्मी दिनप्रतिदिन बद्नाम बन्दै गएका छन् । यसलाई रोक्न सरोकारवाला सचेत हुनैपर्छ । 
अतः मधेसी लगायतका सबै संचारकर्मीले के बुझ्न जरुरी छ भने रिपोर्टरहरू पत्रकारिता रुपी रथ हुन भने सम्पादनसंग जोडिएका पत्रकार त्यसको लगाम र सारथी । त्यस्तै, रिपोर्टर अखबारका आखाँ, कान र नाक हुन भने सम्पादकहरु पत्रकारको मुटु र दिमाग । पत्रकारहरुको भाषामा पक्कड, आफ्नो कर्तव्य, समाचार बोधको विकास, शब्दहरूको सामना, राम्रो लेख्ने शैलीलगायतको जानकारी बिनै पत्रकारिता गर्नेहरुको भीडका कारण यहाँ धेरै समस्या सिर्जित हुँदै गएका छन् । त्यसैले त अहिले केही संचारकर्मीहरु पत्रकारिता होइन पैसाकारिता र पार्टीकारितामा जुटेका छन् । फलस्वरुप पत्रकारका नाममा समाजमा केही शैतानहरुको जन्म भएको छ, देश, मधेस र समाजमा । 
अन्त्यमा, पत्रकारहरुले पत्रकारितालाई गम्भिर र व्यावहारिक बनाउँदै आफूलाई संस्कारयुक्त बनाउन जरुरी छ । उनीहरुले आफ्नो पत्रकारीय गतिविधिहरुबाट देश र समाजलाई जति योगदान पु¥याएका छन् या पु¥याउनु पर्ने हो, त्यो भन्दा बढी गैर–पत्रकारीय गतिविधि गर्दै हिड्नु उचित होइन । उनीहरुको विवादास्पद गतिविधिहरुले पत्रकारितालाई लान्छनायुक्त उपकरण मात्रै बनाउने छैनन्, मर्यादाहिन, कर्तव्यहीन जमातका रुपमा परिभाषित समेत गर्नेछ, गरेको छ । पछिल्लो समय उनीहरुमा मौलाउँदै गएको बनियागिरी सोचले पाठकलाई मात्रै चिढाएको छैन, पत्रकारितालाई आफ्नो धर्म, कर्म र आस्था ठान्नेहरुलाई हत्तोत्साही समेत बनाउँदै छ । त्यसैले यस्ता कुनैपनि आवाञ्छनीय गतिविधिलाई संचारकर्मीहरुले तत्कालै छाड्नु पर्छ । एक कविले यो भनाई ‘हेर्नमा यो न गोरो छ न कालो, न उससंग बन्दुक छ न भाला । हुन त बेधडक, निर्भिक फकिरजस्तो जीवनमा, कागत र कलमका धनी अखबार बाला हुन् ।’ यो पंक्तिलाई मनन र चिन्तन गर्दै अघि बढे पत्रकारहरुको कमलकै शक्तिबाट देश र समाजमा परिवर्तनलाई कसैले रोक्ने छैन । यसैलाई मधेसी पत्रकारहरुले वर्तमान परिप्रेक्ष्यमा एउटा मिशन बनाएर अघि बढनु पर्छ । जीवनको लक्ष्य आफ्नो समाज र समुदायको उत्थान र अधिकार सम्पन्न बनाउने बनेमा मात्रै सबैको हित हुनेछ ।    

सहमति केँ सुगा रटान ( Madheshi)


सहमति केँ सुगा रटान
 दिनेश यादव
किछु माह एम्हर नेता सभ सँ ‘सहमति’ शब्दक सुगा रटान बड बेसी भँ रहल अछि । एकटा दैनिक रुटिङ जँका ओहीँ लेल शृंखलाबद्ध बैसार मे ओ सभ जुटल छथि । मुद्दा सहमति अखनो दिल्ली दूर बुझा रहल अछि । ध्रुविकृत राजनीतिक माहौल उत्कर्ष मे अछि । सँगैह नानाथरि केँ प्रयोग सेँहो जारी अछि, एतह । फलस्वरुप संविधान निर्माणक प्रक्रिया दिनानुदिन जटिल मात्र नए ओझेल सेँहो बनएत जा रहल अछि । एतह केँ एक नेता दोसर केँ नेतृत्व स्वीकार कएबाक स्थिति मे नए छथि । सबटा अपने–अपने दाब–पेच, तिग्रमबाज मे व्यस्त छथि । एक पक्ष सत्ता प्राप्ति के लेल जी जान सँ लागल अछि त दोसर पक्ष सत्ता बचाबए मेँ प्राणक बाजी लगौने छथि । ताश के किट्टी खेल जँका बनल अछि सत्ता के छिनाझपटी । सहमति बनएबाक बात त नेता लोकनी करैति छथि मुद्दा भित्री मनसाय हुन्का लोकनिक केँ किछु अउर छैक । तेँ देश गम्भिर संकट आ परिस्थिति के मकडजाल मे फसएत जा रहल अछि । एहीँ मेँ नेतृत्वक वेइमानी आ नाकामी, निकम्मापन आ लाचारीपन कम दोषी नए छैक ।
सत्ता केँ खेल ः सत्ता के इर्दगिर्द मथ्थापिच्चि मे मात्र केन्द्रित भँ बैसार राजनीतिक दल सभ के नेता कए रहल छथि । फलस्वरुप हुन्का लोकनिक समक्ष संकट निवारणक लेल राजनीतिक तौर तरिका आ अवसर आब समाप्ती के ओर अछि । राष्ट्रपति महोदय सहमति बने से चाहना रखैत चारि बेरी समयसीमा बढा चुकल अछि । यी समय बिना उपलब्धिविहीन वितल जा रहल अछि । वैशाख मे चुनाव करेबाक बात से हो भँ रहल अछि । मुदा दल सभक ‘सत्ता सर्त’ केँ कारण सहमति मेँ पहुँचह सँ पहिने नेता सभ कहियो मर्खाहा बरद बनि जाएत अछि त कहियो लथार मारैनिहार गाई । तेँ दुन्नुँह केँ बिना नथिने सहमति नए बनत । सुआ आ नाथैवला दोरी दुन्नुह राष्ट्रपति के पास अछि । मुद्दा रस्सा दोसर के हाथ मे भेला के कारण ओह आब निरिह बनैत जा रहल छएन्हि । खाली सहमति केँ लेल समयसीमा बढाबै मे राष्ट्रपति सीमित भँ रहल अछि ।    
आब राजनीतिक दल मे इतर दृष्टिपथ के तलाश जरुरी भँ गेल अछि । कमजोर मानसिकता आ नेतृत्व केँ चुनौति देनिहार युवाजन के अभाव मे राजनीतिक दल केँ नेता अनेरबा साढ बनल अछि, एतेह राजनीतिक क्षरण के मुल कारण मे एहोँ एकटा छि । राजनीतिक संकट के भाँपवाक आ ओकरा निवारण करबाक ‘काउन्टर स्टे«टजी’ बनबैवाला नेता कोनो दल मे अख्खन नए छैक । जोकर आ मजाकिया भुमिका सँ ऊपर नए उठि पाबि रहल छथि नेता सभ । जौँ अपन परम्परागत आ पुरातनवादी सोच आ व्यवहार मे ओ परिवर्तन नहीँ करताह, देश केँ सर्वव्यापक राजनीतिक, आर्थिक आ सामाजिक संकट सँ निकालबाक स्थिति नए रहत । किएक त एतेह, राजनीतिक सडन आ गलन बड बेसी बढल जा रहल अछि , ओकर दुर्गन्ध चाहु दिस फैलि चुकल अछि । आब त राजनीतिक गन्दगी के रोकबाक स्थिति मे जनता नए छैक । तेँ नव रक्षा कबच के खोजि अति जरुरी भँ गेल अछि । आब सत्ता पक्ष आ विपक्ष के शिर्ष नेतागणक हरेक दिन उपलब्धीबिहीन बैसारक लेल बैसार सँ काज नए चलत । अवसरवादी राजनीतिक जाल के चिरैति जनता अपन अधिकारक लेल फेर सँ सडक मे उत्रए पडत ।  
पडोसी के भुमिका ः किन्कोह घर मे जौ झगडा फँसाद ऊठे त पडोसी के बड बेसी भूमिका रही जाएत छैन्हि । बिना कोनो स्वार्थ कँे आँे समस्या समाधान कएबाक प्रयत्न मे तत्काले लगि जाएत छैक । हाँ मसोमातक घर केँ झगडा मेँ किछु दोसर बात रहैति अछि । किएक त, अभिभावक नए रहला सँ लोक जेँ कहलक सेहा भेल, अहीँ मे छिमेकी सेहो किछु फायदा उठेबाक लक्ष्य बना लएत छैक । नेपाल मे अखन एहाँ स्थिति अछि । देश मसोमात बनल अछि , गार्जन कियो नै छथि । तेँ एतह कियो करची चलबैवला त कियो अंगुलि चलेन्हिार भेट रहल छथि । ओ सभ एक–एक कए केँ नेता सभहक धरिया खोएल रहल छैक । देशक संकट गहरा रहल छैक , नेता सभ मस्ति माडि रहल अछि । एतेह भारतीय वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार केँ प्रभात खबर डट कम में लिखल ई बात सान्दर्भिक अछि । ओ लिखने छथि, ‘नेपालक संकट भारत के सेहो संकट थिक । नेपाल के साथ भारत के सुरक्षा आ ट्रान्जिट संधि विश्व के लेल अनुपम अछि । नेपाल जाहिया कोनो राजनीतिक संकट मे फंसल, भारतो के मुश्किल बढ्ले अछि । अतः नेपाल के प्रति भारत अपन जिम्मेवारी सँ नए बैचि सकैत अछि ।’
नेपालक परिस्थिति ः आजु नेपाल मे सब सँ पैघ बात राजनीतिक दल सभ के बीच मे आपसी सहमति आवश्यक अछि । मुद्दा अखनिधरि तेहन आशा केनाए मुश्किल बुझवा मे अवैति अछि । गैर–माओवादी आ माओवादीबीच आरोप प्रत्यारोप के दौड चलि रहल अछि । नेपालक संकट के मुख्य खलनायक अखन नेता सभ के बीच मे एकता कँे कमी अछि, जन–जन एहाँ महशुश कए रहल अछि । जदि नेता सभ मे संकल्पबद्धता, नेक इरादा आ इमान्दारिता कनिको रहैत त परिस्थिति आ अनुभवहीनता राष्ट्र–निर्माण मे बाधा नए बनैत । नेता सभ संविधान निर्माण नए सत्ता के खेल मे डुबल अछि । तेँ राजनीतिक घात–प्रतिघात मे ओ सभ लगल अछि । नेता सभ दिल्ली के मक्का मदिना आ ओतए के नेता सभ के देवता त मानैत अछि मुद्दा निकासक लेल कहियो सहमति बनएबाक पुरजोर पहल नए भँ रहल अछि । भारतीय नेतागण सेहो कतौह न कतौह चुकि रहल अछि । यी एकता विचित्र रवैया जँका देखाए पडि रहल अछि । खास ककेँ संविधानक विवादास्पद मुद्दा पँ मधेसिया, जनजातिय समूह के नेतागण के साथ तीन प्रमुख दल के बीच सहमति नए करा सकल अछि, भारतीय नेता ।
राजनीति मे वाकयुद्ध ः नेता सभ मे ‘जुबानी जंग’ जारी अछि । पार्टी के ‘ट्रैन्ड क्याडर’ सभ केँ नेता लोकनि झुठ बोलु, तेज बोलु और बारम्बार बोलु सिखा रहल अछि । ई बात हुनक चाल, चरित्र आ चेहरा मे स्पष्ट देखा अछि । राज्य के कालकोढरी मे रखबाक आदि बनि रहलअछि नेता सब ।  नेता सभ कस्मेटिक परिवर्तन मे लागल अछि , एक नए दोसर प्रधानमन्त्री के खोजि मे अछि ओह । कार्यकारी प्रमुखक लेल तीन गोटा के विभिन्न दल ‘लञ्चिग’ प्रक्षेपण कएलक अछि, पिछला बेर । कांग्रेस सँ शुशिल कोइराला, माओवादी सं रामबहादुर थापा, मधेसी मोर्चा सँ महन्थ ठाकुर के नाम प्रधानमन्त्री के कुर्सी के लेल लंचिङ्ग भेल अछि ।
सत्तासिन बनबाक प्रवृति आ महात्वाकांक्षा राजनेता मेँ सिद्धान्त आ नैतिकता समाप्त क देलक अछि । एकरा एना के कही सकैत छि जे सत्ता के चस्का आ नशा लोकतन्त्र आ न्याय के सुन्दर प्रवृति केँ मन्द बना चुकल अछि ।
मिथिला क्षेत्र मे पुरान एक कहाबत अछि जे ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ । इ कहावत वर्तमान दौर मे नेपालक राजनीति पे पुर्ण सटिक बैठत । ‘उल्टे चोर कोतवाल के डाटै’ आरोप लगेनिहार केँ सवाल केँ घेरा मे खडा करि दएत अछि । नेपाल मे राजनीति अस्थिरता, अस्तव्यस्ता, दण्डहिनता, भ्रष्टाचारिता आ मानव अधिकार के उलंघता के संकटमोचन कएनिहार अखन धरि कोनो बेटा एही देश मे जन्म लेने अछि से बुझवा मे आबि रहल अछि । एतह के राजनीति कुरुप, कलुसित, गन्दा बनि चुकल अछि । राजनीतिक नास्तिकता के प्रदुषण एतेह दिनानुदिन बढि रहल अछि । नेता सभहक बोली ग्रिन हाउस गैस के उत्सर्जन जका नेपालक राष्ट्रियता, अखण्डता, सार्वभौमिकता नामक राजनीतिक रक्षा कबच के ध्वस्त बना रहल अछि । तेँ एतेह राजनीतिक ताममान बढैति जा रहल अछि ।
नव–नव प्रयोग ः सहमति करब त नेतासभ कहैत अछि मुद्दा राजनीति मे ओ सभ विभिन्न प्रयोग करैति आबि रहल अछि । तेँ नेता लोकनि अपन प्रयोगक लेल पहिले झलनाथ खनाल केँ आ अखन शुशिल कोइराला केँ ‘गिनी पिग’ओ सभ बना रहल अछि । पिछला बेर त मधेसी मोर्चा के तरफ सँ इमान्दार नेता के खोजी के नाम पर महन्थ ठाकुर केँ सेहोँ ओ गिनी पिग बना रहल अछि । ठाकुर जी सेहो ओही प्रयोग के सामग्री बनबाक बडबेसी आतुर देखा रहल अछि । कि साउथ ब्लक आ नेपालक अमूक पार्टी के प्रयोग मे ओ गिनी पिग बनबाक लेल राजनीति कए रहल अछि या मधेसी जनता के अधिकार दिएबाक दिस ओ अग्रसर रहत ? ई एकटा अखन यक्ष प्रश्न मधेसीजन के बीच खडा अछि । राजनीति देश आ जनता के लेल कि अमुक दल आ नेता के स्वार्थसिद्धि के लेल ? हाँ राजनीति के डगर सत्ता के गलियार सँ सेहो जुजरैत अछि । मुद्दा राजनीति मे दशकौं से अधिक समय अपन आस्था, दायित्व आ संस्कार के गिरबी राखि सत्ता के पछा जौ ओ दौडत त नेता के मान, मर्यादा, ईज्जत, सम्मान, प्रतिष्ठा सभ चौपट नए होएत, इ बात ओ बुझतौ बुझि किएक पचा रहल अछि । नेपालक मिथिला भूमि सँ नेतृत्व कएनिहार लोकनी अखन धरि कहियो अपन पगडी के दाव मे नए लगौलक अछि, एकता मोडेल के भूमिका मे ओ सदैव रहल अछि , आदर्श त हुनका लोकनी मे कतेक कतेक छल, ओकर बखान मे विश्वके कोनो डिक्टनरी के शब्द कम पडत । अतः राजनीति अपना लेल नए जनता केँ लेल करी त अति सुन्दर रहत ।
राजनीतिक निकास ः सहमतिय सरकार निर्माणक संभावना आब न्युन होएत जा रहल अछि । तेँं आब बहुमतिय आधार मेँ संविधान निर्माण प्रक्रिया आगा बढाबए पडत । किएक त चुनावी सरकार के नेतृत्व कएबाक लेल धारा ३८(१) मुताबिक राष्ट्रपति के आह्वान असफल भँ गेलाह सँ आब म्याद थपनाए अनुचित अछि । राष्ट्रपति के संविधान के धारा ३८(२) के डगर पकरैत बहुमतीय दिस डेग बढबएटा पडत । मुद्दा अहु मे ओतबे जटिलता छैक । किएक त अखन नए संविधानसभा अछि, नए संसद, तेँ कोन आधार मेँ राष्ट्रपति महोदय आगा बढत ? जौ दलक संख्या के आधार मे बहुमतीय परिपाटी शुरु होएत त एकर बहुते विरोधाभास सेँ हो अछि । व्यक्ति पिच्छे दल आ नेता भेला के कारण समस्या के सम्बन्ध मे जतेक सोचवा आ बोलवा मे आसान अछि ओतवे क्रियान्वयन मे कठिनाई । मुद्दा राष्ट्रपति समक्ष आन विकल्पो त शेष नए बचल अछि । आब संविधान के अक्षर स नए भावना अनुसार चलए वाला बात सेहो उठि रहल अछि । मुद्दा भावना सरकार निर्माण मे मात्र किएक ? संघियता, राज्य के शासकीय स्वरुपसहित के विवादित मुद्दा मे किएक नए ? प्याकेज मे जौ राजनीतिक सहमति होएत देश, मधेस, हिमाल आ पहाड के बासिन्दा केँ बड बेसी राहत भेटत । सहमति मे जौ बाह्र बजेबाक स्थिति मे नेता सभ रहत तेँ जनता हुन्का लोकनि के कहियौ माफ नए करताह । तेँ ‘राति के बाह्र बजे मुन्ना जरुर मिलना राति के बाह्र बजे’ छोडि समय रहिते ठोस समाधानमुलुक निकास अति आवश्यक अछि । बैसार के लेल बैसार छोडि, निष्कर्ष केँ लेल वार्ता सार्थक होए से चहना जन–जन के अछि । छल आ प्रपञ्च छोडि जनता के लेल नेता सभ काज करए त उत्तम रहत ।

Thursday, 13 September 2012

नेता आगा जनता पाछा


 नेता आगा जनता पाछा
देश आ मधेस आब अप्पन स्थिति आ दिशा मे बहुत पैघ एवं क्रान्तिकारी बदलाब के चाहना रखने अछि । ओतह के जनता खुद्रा मे नए होलसेल मे अपन अधिकारक सुनिश्चिता चाहैत अछि । किछु माह पहिलधरि संविधानसभा छल त आशा आ भरोसा से हो छल , मुदा आब त ओहो नए रही गेल । ऐहन स्थिति मे जनता जनार्दन निराश आ कुन्ठित त बनले अछि , नेतासभ पर स भरोसा आ विश्वास सेहो उठि गेल अछि । जनता सभ कह लागल अछि, ‘ परिवर्तनक लेल उत्कर्ष बलिदान आब अक्षम नेतृत्व÷नेता के कारण मटियामेट भ गेल , उपलब्धि शून्य मे पहूँच गेल ......। ’ हुनका लोकनि के इ प्रतिनिधिमुलक आक्रोश उचित मात्र नए सान्दर्भिक थिक । खास ककेँ पुरातनवादी सोच आ परम्परावादी मानसिकता के जंंजिर मे जकड्ल आ बा“धल एतेह के नेता लोकनी के कारण इ स्थिति आएल अछि । मुद्दा अखनो देरि नए भेल अछि । जौ पवित्र उदेश्य आ लक्ष्य के साथ प्रयास कएल जाय त स्थिति साकारात्मक भ सकैत अछि । लेकिन एही अभियान मे युवा के सक्रिय भूमिका जरुरी अछि । किछु युवाजन जागरुक भँ एही दिश विडा उठावा मे प्रयासरत छैक, जे एकटा सकारात्मक सन्देश संचार क रहल अछि ।
पहिले सत्ता के लेल मोर्चा आब अधिकार के लेल एकता के बात सेहो ओही सन्दर्भ मे शुरु भेल अछि । किछु युवा सभ के एही अभियान मे जुडनाए ओकरे पुष्टि करैत अछि । किएत राष्ट्रिय सहमति के नाम पर चारि वरिष धरि भेल झुठमुठ के नाटक सँ सिर्जित संकट सँ मुक्ति चाहैत अछि, जनता । सत्ता, भत्ता आ कुर्सी मे जकैडि के आब अधिकार नए भेटत , से बात जनता सभ आब निक जका बुझि गेल अछि । स्वार्र्थी नेता सँ देश के लोकतान्त्रिक दशा मे परिवर्तन किन्नौह नए भँ सकैत अछि । ताहीलेल उच्च सोच आ महान जोश के साथ देशक राजनीति के सही दिसा देबाक बात आब जरुरी भय गेल । शुरुआत फेर शून्य सँ कर पडत । किएक तँ जनता केँ स्वाभिमान, देश केँ स्वाधिनता आ भूगोल के स्वतन्त्रता पर खग्रास ग्रहण लगेनिहार नेता लोकनी सँ आब काम नए चलत । असल नेतृत्वक खोजी जरुरी भँ गेल , ओ नेतृत्व युवा करैति से चाहना जन–जन के अछि ।
बहुत पहिने अंग्रेजी साहित्य मेँ कतौह हम पढ्ने छलौह कि सत्ताधारी होनाए के मतलब एक जनाना होनाए जेहेन बात अछि । यदि देश आ भूगोल, राज्यसत्ता आ नेतृत्वपर जौ अहाँ अपन उपस्थिति एहसास कर चाहैत छि तँ जनता के सबटा लालसा ओतेह गिरबी लगि जायत अछि । देशक नेता आब ‘नेटा’ बनि चुकल अछि । ‘नेटा’ के जौ साफसुधरा नए करब त ओ मुखडे बिगाडि देत । अख्खन देशक मुखडा विगरल अछि , ‘नेटा’ के कारणे । सत्ता के मद मे ओ सब एनाके चुर अछि जे ओ कुर्सी छोडबाक बात केनाए बहुत दूर छोडि देने अछि । ठग सभहक झुण्ड बना के ओ देश के लुटि रहल अछि , जनता के बन्धक बना के छद्मभेद मे विभिन्न नाम सँ राष्ट्रक सम्पति पर डकैति डालि रहल अछि । जौ हुन्का सभहक बस चले त स्कूलक विद्यार्थी जका सभ के मुर्गी बना केँ उपर सँ लाल कैर्ची बर्साव मे सेहो ओ सभ पछा नए रहत से बुझा रहल अछि । खास ककेँ मधेसिया नेतृत्व, नेता आ कार्यकर्ता सभ के मनोभाव, मनोगति आ मनोविज्ञान अख्खन ऐहने बनल अछि , एही मामिला मे सत्ताधारी आ प्रतिपक्षक भूमिका एके खेत केँ मुरैह जका देखा रहल अछि । हाँ फरक एतबे अछि जेँ प्रतिपक्ष सत्ता केँ लेल भुखाएल अछि तँ सत्ताधारी धनार्जनक लेल बकुलम ध्यायनम् मे अछि ।
जौ मधेस पर केन्द्रित भँ बात करी तँ मधेसी नेता सभ नेतृत्व हकवाक स्थिति मे अखनौधरि नए पहुँचल अछि । पंचायतकाल मे राजा के गुलामी, प्रथम जनआन्दोलनके वाद हासिल प्रजातन्त्र मे कांग्रेस, एमाले के आज्ञापालक के भूमिका मे ओ रहल छल । २०६३÷०६४ के जनआन्दोलन आ मधेस विद्रोह के सफलताक बाद ओ सभ विदेशी शक्ति के भक्त बनि बैसल अछि । तेँ मधेसी लोकतान्त्रिक मोर्चा के नाम पर ओ सब सत्ताधारी बनि मालदार मन्त्रालय मे कब्जा जमोने अछि । देश÷मधेस मे घनघोर अन्हरिया राति मे चन्द्रमा के दर्शन दुर्लभ जका भ चुकल अछि । कियो दिनकर बनत से सपनो मे नए सोचु । एकरा एना के कहियो जे देश बहुत गहिरगर खाडि मे गिर चुकल अछि । अहाँ हमरा बीच के लोक आब इँ नए मानत जे नेता के अवसर आ पद नए भेटलैह । पिछला किछु वर्ष सँ मधेसी नेतासभ सदैब निर्णाय भूमिका मे रहल, मुद्दा हात लागि शुन्य के स्थिति अछि , इँ बहुत पैघ दुर्भाग्य थिक । उपप्रधान एवं गृहमन्त्री विजयकुमार गच्छदार, भौतिक योजना तथा निर्माण मन्त्री ह्रदयेश त्रिपाठी, सूचनामन्त्री राजकिशोर यादव, उद्योगमन्त्री अनिलकुमार झा, सिंचाई मन्त्री महेन्द्रराय यादवलगायत के कार्यकाल मे कतेक एहन मौका आयल जख्खन ओ अन्तरआत्माके आबाज स निर्णय लेबा मे चुकल अछि । ओही स्थिति मे समुच्चा देश के दशा और दिशा के ओ ठीक क सकैत छल । मुद्दा हुनका सभ के अपने पद के लायक योग्यता पर शंका रहल हेता । ताही लेल ओ सभ ओएहा केलक जे हुनका सभहक पाछा के ‘आला कमान’ विदेशी शक्ति ओकरा कहलक । लाज भ रहल अछि ऐहन ‘मौगा’ नेता सभ स , जे महत्वपूर्ण पद पे सुशोभित होइतो मोमक गुडिया बनि बैसल रहल, बैसल छथि ।  पद आ कुर्सी मे चिप्कल अछि । और बचल खुचल अहंकार के नशा मे चूर भ सबटा बन्टाधार करबा मे आतुर अछि । यदि इ बात नए रहैत त मधेसक मूलभूत मुद्दा सभ के आजुधरि किएक सम्बोधन नए भेल ? संविधानसभा आ मन्त्री परिषद् मे अच्छा खासा उपस्थिति भेला के बाबजूद किएक संंविधानसभा के विगटन कएल गेल ? किएक देशक राजनीति के अस्थिरता दिश धकेल देलक ओ सब ?
यदि इ बात सभ नए रहैत त कामचलाउ सरकार आजुधरि किएक सत्ता छोडबाक स्थिति मे नए पहुँचल अछि ? मधेसी सभ के नागरिकता, सैनिक भर्ना, समावेशिक विधेयक सभ आजुधरि किएक मूर्तरुप नए लेलक ? किएक मधेसक किसान सभ के हक अधिकारक दिश काज नए ओ केलक ? रक्षामन्त्री मधेसी , मुदा सेना मे मधेसी के पहूँच आजुधरि सम्मानजनक किएक नए भेल ? किएक अपनो मन्त्रालय स सेना मे मधेसिया के सम्मानजनक उपस्थिति करबाक दिशा मे ओ सक्षम नए भेलाह ? पिछला बेर मुख्य सचिव पद मे किएक मधेस क्षेत्रक प्रतिनिधि उमाकान्त झा के नियुक्ति नए दिआ सकल ? तराई–मधेस मे कृषि क्षेत्र मे लगनिहार सभ के उत्थान आ प्रगति के दिस एकोटा कारगर निर्णय ओ सब किएक नए क सकल ? निर्माण आ विकास, उद्योग आ स्वास्थ्य क्षेत्र मे ओ सभ मधेस के अग्रस्थान मे किएक नए पहुँचेबाक कार्य केलक ? निर्माण तथा यतायात मन्त्री मधेसी मुदा समग्र मधेस मे निर्माण लगभग नए के बराबर अछि । उद्योग मन्त्री मधेसी मुदा मधेस क्षेत्र स उद्योग विस्थापित भ रहल अछि । सिंचाई मन्त्री मधेसी , मुदा सिंचाइ क्षेत्र मे मधेस पाछा ..........ः?  ऐहने बहुतो प्रश्न सभ के ढेरी स एहा बुझवा मे अबैति अछि जे ओ सब सत्ता मे पहुँचबाक लेल मात्र ललायित छल आ अखनो अछि । ओही लेल ओ मोर्चा बनबैत अछि मुद्दा सत्तासिन भेला के बाद मुद्दा सभ बिसरी जाएत अछि । अखन मधेस मे एकेटा पार्टी के बात एकटा सत्ताधारी दल क रहल अछि । जौ अलग–अलग पार्टी छैक त विचारो पृथ्थक रहतै ने । फेर कोनो के एकता भ सकैति अछि , इ बात बुझितौ बुझि पचा के किछु नेता आगा बढि रहल अछि । हमरा बिचार स इ त सकारात्मक बात थिक मुद्दा एकता सम्भवक विल्कुले नए अछि । हमरा क्षमा करब , जौ ऐहने ‘मौगा’ नेता आ ‘अक्षम’ मधेसी मन्त्री सभहक सिट सुरक्षित करबाक लेल जौ एकता आ मोर्चा होएत त पहिले के स्थिति ठीक छल कमसे कम सभ नेपाली एक छल , कतौह मधेसी, पहाडी , हिमाली बाला बात नए , आब मौगाा मधेसी नेतासभ के कारण जनता के धैर्यता के बाँध टुटि गेल अछि , व्यक्तिगत गुणदोष के बजाय सारा मधेसी पड जे अख्खन दोसारोपण भ रहल अछि इ सब मधेसक मौगासभहक कारणे ।
कोनो देश आ समाज के विकासक के लेल साढे चारि बरिष कम समय नए होयत छैक । मुदा ओ बहुमुल्य समय बर्बाद केलक नेता सभ । ताही कारणेँ अखनो मधेसी परनिर्भर अछि , दोसर के आगा हाथ पसारबाक स्थिति मे अछि । एही के लेल जिम्मेबार के ? हम आ हमर सरकार ? एही विषय मे कियो जनता नए बोलत । किएत एही के ले जनता सेहो ओतबे जिम्मेबार अछि । मुद्दा अहा हम असानी स कहि दैति छि जे सरकार आ सरकार मे बैसवाला सभ दोषी अछि । लेकिन विकास कार्यसभ मे जतेक भूमिका सरकार के रहैत अछि ओतबे जनता के । अधिकार के लडाई आजुधरि नेता नए जनता लडैत रहल , इतिहास साक्षी अछि । नेता के नेतृत्व चाही , जनता के अधिकार भाड मे जाए । विल्कुले मतलब नए रही जाएत अछि नेता सभ के सत्ता मे पहुँचला के बाद, जन–जन के मुद्दा ।
जनता करत त कि करत ?  अप्पन अधिकार के रक्षा हेतु धरना, प्रदर्शन करैत अछि, अनसन मे बैसैत अछि , आन्दोलन करैत अछि त माग पुरा केनाए के बदलता पुलिसक लाठी बजरैत अछि ? धरनास्थल मे बम फुटैत अछि, पुसिसक गोली ठिका ठिका के मथा , छाति आ पेट जेहन सम्बेदनशिल अंग के चोथराभोटरी निकाएल  दैत अछि  । गृहमन्त्री मधेसी अछि मुदा निर्दोष मधेस के हत्या अखनो नए बन्द भ सकल अछि । एही विषय पर जौ गहनता के साथ विचार करब त,  एकर दोषी हमसभ खुद छि , किएत हमरे चुनलाहा भ्रष्ट आ तानाशाही सभ सरकार मे अछि । मुद्दा अख्खन त निर्वाचित प्रतिनिधियो नए छैक । एहन स्थिति मे जनता के परेशानी अउर बढि जाएत अछि ।  एकटा हिन्दी कवि जी के इ कथनी सान्दर्भिक अछि ः हमे फ्रिक ये नही कि देश कैसे चल रहा है, ‘हमे फ्रिक इस बात कि है कि कही ये यूही ना चलता रहे ’
अन्त्य मे, देश के भ्रष्टाचार मुक्त , तकनीकी युक्त , आधुनिक कृषि प्रणाली, सब के पहूँच मे स्वाथ्य आ शिक्षा , सब के मानवअधिकार के ग्यारेन्टी संगैह आर्थिक विषमता के दूर करैत सम्पन्न राष्ट“ बनेबाक दिस अग्रसर होनाए सबगोटा के अन्तिम ध्येय आब बनबाक चाही ।
कि एतके विपक्ष अपन कर्तव्य आ कार्य सफलतापूर्वक क रहल अछि , शायद नए । ओहो सभ कोनो चालाक नढिया (स्यार) जका ताक पे अछि कि कहिया कौवा के मूह स सत्ता रुपी रोटी छुटत आ ओही पर ओ काबिज  भ जाए ? सत्ता त आबैत जाति रहैवाला बात थिक । लोकतन्त्र मे सत्ता ककरो बपौती नए अछि । इ बात के बुझैत सबगोटा के आगा बढ पड्त । तबे अधिकार भेटत । आब संविधानसभा के चुनाव नए संसदीय चुनाव दिस नेता सभ के अग्रसर होमे पडत । तब्बे जा के एही देशक तमान नागरिक के मुलभूत अधिकार भेटत । तबे देश आ मधेसक दशा और दिशा मे परिवर्तन होयत ।
समाप्त  

Tuesday, 11 September 2012

मधेस - विकिपीडिया

मधेस - विकिपीडिया

मिथिला बनल ‘बाभनक गाम’


मिथिला बनल ‘बाभनक गाम’

...........प्राचीनकाल सँ मिथिलाक समाज पूर्णतः ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर आधारित रहल अछि । चाहे कोनो ब्राह्मण दरिद्र छिम्मडि किएक नइँ होथि, श्रेष्ठतावादी फोबिया मे कनको कम नहि । हुनक कुलीनतावादी कट्टताक आख्यान हमसभ हरिमोहन झा आ यात्री जीक साहित्य मे पढि सकैत छी । निःसन्देश मैथिली साहित्य मे ब्राह्मण जातिक भीतर जमकल कट्टरता, जडता आ विद्रूपता केँ देखार करबाक प्रारम्भि काज हरिमोहन झा आ यात्रीक लेखन द्वारा संभल भेल, मुदा हिनको लोकनिक साहित्य मे सामाजक सभ वर्गक प्रतिनिधित्व संभव नइँ भ’सकल । हरिमोहन झा आ यात्री जीक कथा साहित्य मुख्य रुप सँ ब्राह्मण–सुधारक साहित्य थिक, जाहि मे आन जाति अथवा वर्गक उपस्थिति मात्र परिवेशगत अछि । ईहो सत्य, जे जँ ब्राह्मण सुधरि जाथि तँ ओहि सुधारक प्रभाव सामाज पर पडबे टा करत । मुदा , ई सुधार केत संभव भेल से खोजक विषय थिक । सोलहवीं शताब्दीक बाद वर्णव्यवस्थावादी तुलसी दासक पदक तँ जमिक’प्रचार–प्रसार भेल, मुदा कबीर आ रैदासक वाणी केँ मिथिलाक प्रभु जाति मुख्यधारा मे नइँ आब’देलक । बीसवीं शताब्दीक नवजारणक दौर मे मिथिला मे कोनो सामाजिक सुधारक नइँ भ’ सकल । मिथिलाक बाहर जे समाज सुधार आन्दोलन राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, ज्योतिबा फुले, पंडिता रमा बाई अथवा अन्य सुधारक द्वारा चलाओल गेल तकर हबो धरि मिथिलाक सीमा मे नइँ पैसि सकल, आ तकरे परिणाम भेल जे ‘बाभनक गाम’ क अपन खोल मे बन्द पडल रहल । ओना वर्तमान मे बाहरी दुनियाक सम्पर्क मे अयलाक बाद एहि जडता मे थोडेक फर्क आबि रहल अछि , मुदा ‘बाभनक गाम’ जडता मे एखनो यथेष्ट परिवर्तन अथवा सुधार संभव नइँ भ’सकल । बहुत पहिने जार्ज ग्रियर्सन मैथिल ब्राह्मणक एहि जडता पर टिप्पणी करैत लिनने रहिथि जे ‘दुनिया बदलि गेल, मुदा मैथिल समाजक धार्मिक ओ सामाजिक कट्टरता आ रुढिवादिता मे कोनो अन्तर नइँ आयल ।’ प्रश्न अछि जे एकैसम शताब्दी मे आइ एहि समाजक कट्टरता मे कतेक परिवर्तन संभल मेल अछि ? एहि लेखक उद्देश्यय तारानन्द वियोगीक कविता ‘बाभनक गाम’, बुद्धक दुख’ समय सभ केँ मिलाओत’, आ ‘आगू मैथिलीक बाट नहि’ कविताक माध्यममे मिथिलाक एहि सामाजिक परिवर्तनक पडताल करब थिक । ‘बाभनक गाम’ कविताक शुरुआत आ अन्त निम्न पंक्ति सँ होइत अछि ः
पधारि रहल अछि गर्दमगोल मचौने
एकैसम शताब्दी
आ कनैए बाभनक गाम’
उपरोक्त पंक्ति आ ग्रीयर्सनक उक्ति मे लगभग सौ वर्ष सँ अधिक समयक अन्तर रहितो कोनो असमानता नइँ अछि । ‘बाभनक गाम’ कविता एकैसम शताब्दीक मुहान पर (१९९९ ई.) मे रचल गेल छल । एकैसम शताब्दी दुनिया भरी मे जत’ आधुनिकता आ बदलावक प्रतीक बनल , ओतहिए मिथिलाक ‘बाभनक गाम’ कानि रहलि अछि जे कतहुँ ई बदलावक बसात ओकरा गाम मे ने पसि जाय । ब्राह्मणवादी व्यवस्था मिथिलाक बहुत जडि तक घुसल अछि तेँ ओकरा भीतर कोनो बदलावक गुंजाइश बहुत मुश्किल, ओना नवतुरिया वर्गक छिटफुट हस्तक्षेप अवश्य देखा पडैत अछि, मुदा से हाशिए पर अछि ।.............
स्रोत ः अंतिका, अक्टूबर, २०११–मार्च, २०१२, पृष्ठ ४३–४४, लेखक ःश्रीधरम, लेख शिर्षक ः ब्राह्मणवादक सभ्यता समीक्षा ।

लोकतन्त्रबाट गायब हुँदै ‘लोक’


लोकतन्त्रबाट गायब हुँदै ‘लोक’

केही समययता नेपालको राजनीतिमा देखिएको उथल–पुथल, विकृति–संगति र आरोप–प्रत्यारोपलाई लोकतन्त्रका लागि राम्रो संकेत मान्न सकिन्न । लोकतन्त्र, जहाँ जनताको सहभागिता सुनिश्चित गर्न जनताद्वारा चुनिएका प्रतिनिधिहरुलाई केही अधिकार दिइएको हुन्छ, जसबाट शासन व्यवस्था सुचारु रहोस । तर सत्ताको नशा यस्तो चढेको छ कि सत्ताधिशहरु आफूलाई स्वयंभू ठानेर जनतालाई लुटिरहेका छन्, लुछिरहेका छन् । मँहगाई चरम उत्कर्षमा छ, सुरक्षा व्यवस्था तहस–नहस छ, तर सत्ताधिशहरु सत्ता छाड्ने नामै लिइरहेका छैनन् । त्यसमा पनि कामचलाउ सरकारको आयु कति दिनसम्मका लागि हो, त्यो टुंगो नहुनुले अन्यौलता बढेको बढ्यै छ । जनता निराश छन्, कुन्ठित भएर उनीहरुलाई बाच्न विवस पारिएको छ ।  भ्रष्टाचारीहरुमाथि लगाम कस्नुको साटो सरकारबाट उनीहरुलाई पोषण र बचाउ गरिदैछ । समस्याहरुको एउटा चाङनै खडा भएको छ, मुलुकमा । यदि यस्तै रहने हो भने हाम्रो देश निकट भविष्यमा लामो समयसम्म यी समस्याहरुबाट त्राण पाउने छाँट छैन । लोकतन्त्रमा यदि जनताको अधिकारहरुको वेवास्ता गरिए यो बुझ्न कसैलाई समस्या हुदैन कि लोकतन्त्र कति स्वस्थ छ । हाम्रो मुलुकमा लोकतन्त्र मरणासन्न अवस्थामा पुग्नुका केही कारणहरु हुन् ः–
  • शून्य अवस्थामा कार्यपालिका पुग्नु र कामचलाउ सरकारको आयु लम्बिदै जानु
  • वर्तमान सरकारले तत्कालिन समस्याहरुलाई गम्भिरतापूर्वक बुझ्न नसक्नु
  • नेपालमा गिर्दो सामाजिक नैतिक स्तर
  • संविधान निर्माणका लागि खासै प्रयासको थालनी नहुनु 
  • सत्ता र मात्र सत्ताका लागि नेताहरुबीच हानथाप हुनु
  • मुलुक १० जना नेताहरुको कब्जामा पर्नु
  • भाषणका लागि भाषणमा मात्र नेताहरु सीमित हुनु.........   


Monday, 20 August 2012

मुख्य पृष्ठ

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मालपोत कर्मचारीको दादागिरी


मालपोत कर्मचारीको दादागिरी

तराई-मधेसमा सरकारी कर्मचारीहरुले दादागिरी गर्ने रोग पुरानै हो । त्यसमा पनि भ्रष्टाचार गर्ने कर्मचारीहरुको त कुरै नगरे हुन्छ । उनीहरुले आफ्नो कृकृत्यहरुलाई धाकछोप गर्न अनेक शैलीहरु विगतमा नअप्नाएका होइन । पछिल्लो समय पनि कर्मचारीहरुले त्यस्तै गरेका छन् । खासगरि भ्रष्टाचारको थलोको रुपमा विकसित मालपोत कार्यलायमा कर्मचारीहरुको दादागिरी नौलो कुरा होइन । बारामा त्यस्तै भएको छ । किर्ते गरेको आरोपमा प्रहरीले मालपोतका दुई कर्मचारीलाई पक्राउ गरेर मुद्दा चलाउने तयारी गरेपछि त्यसको विरोधमा साउन ३१ गते मालपोत दिनभर ठप्प पारियो । किर्ते गरी जग्गा पास गराएकालाई सघाएको आरोपमा प्रहरीले साउन ३१ गते कार्यालयका कर्मचारी रामनारायण कुर्मी र सुरेन्द्र पराजुलीलाई पक्राउ गरी मुद्दा चलाउने तया गरेको थियो । पक्राउ कर्मचारीसहित छ जनामाथि प्रहरीले किर्ते सरकारी छाप दस्तखत मुद्दा चलाउने चलाउनेपछि त्यसलाई रोक्न कर्मचारीहरु विरोधमा उत्रेका हुन् ।
महेशपुर ६ की मोतिस अतिथिन -मृत्यु भइसकेकी) का नाममा रहेको सोही गाविसको वडा ३ र ४ को झन्डै १ करोड पर्ने ३२ कट्ठा जग्गा नक्कली जग्गाधनी र कागजात तयार गरी किर्ते गर्नेलाई ती दुई कर्मचारीले नियतवश सघाएकाले उनीहरूलाई पक्राउ गरिएको प्रहरीको दाबी छ । अभियोग ठहर भएपछि बिगो बराबरको जरिवाना र २ वर्षसम्म्ा कैद सजायको कानुनी व्यवस्था छ ।
उता सर्वसाधारण पनि त्यसको प्रतिकारमा उत्रेका छन् । ग्ाौचरणको ऐलानी पर्ती जग्गालाई नम्बरी बनाएको भन्दै त्यसलाई खारेजको माग राखेर गाउँलेले नापी र मालपोत अधिकारीविरुद्ध कलैयामा प्रदर्शन गरे ।
भारतीय सीमासित जोडिएका बेनौली, बगही र हर्दियाको सीमामा पर्ने २२ बिघा खोलाछेउको जग्गा गाउँकै १५ जनाले मालपोतबाट आफ्नो नाममा छुट भनेर दर्ता गराएपछि हर्दियाका स्थानीय बासिन्दा विरोध प्रदर्शनमा उत्रेका हुन् । सयौंको संख्यामा आएका गाउँलेको समूहले प्लेकार्ड बोक्दै कलैया नगरसहित जिल्ला प्रशासन, मालपोत र नापी कार्यालयमा पुगेर प्रदर्शन गरे ।
मालपोत र नापी कार्यालयका कर्मचारीको मिलेमतोमा उक्त जग्गा अजबलाल महतो, हरदेव सहनी, दामोदर महतो, सुकदेव सहनी, रामानन्द सहनी, महेन्द्र सहनीलगायत १५ जनाले आफ्ना नाममा नम्बरी दर्ता गराएकोमा विरोध भएको हो । 

आफन्तबाट बालिका बलत्कृत




आफन्तबाट बालिका बलत्कृत

नेपालमा यौन पिपासुहरूको संख्या बढ्दो छ । यौन दुष्कर्मीहरू आफ्नै अवोध छोरीसंग समेत जबरजस्ती गरेको पाइएको छ । बर्दियामा एक बुबाले आफ्नै नौ वषर्ीया छोरीलाई बलात्कार गरे । ३१ वषर्ीय बाबु डम्बरबहादुर विकले उक्त कुकृत्य गरेकोमा अहिले उनी प्रहरीको खोरमा छन् । बानियाभार-७ स्थित खुरखुरे फाँटाका विकले घरमा श्रीमति नभएको मौका छोपी छोरीलाई जबरजस्ती करणी गरेकै अवस्थामा स्थानीय बासिन्दाले पक्राउ गरी प्रहरीलाई बुझाए । स्थानीय प्रहरीका अनुसार विकले दिउँसो घरमा जबरजस्ती गदैगर्दा छोरीले हारगुहार गरेको सुनेपछि छिमेकीहरु घटनास्थल पुगेका थिए । करिब दुई वर्षदेखि विककी पत्नी रोजगाका लागि कुवेत गएकीले आफ्नो यौन तृष्णा मेटाउन डम्बरबहादुरले छोरीलाई समेत बााकी राखेनन् । 
विकले तीन/चार पटक जबरजस्ती करणी गरेको बयान पीडित बालिकाले प्रहरीलाई दिएकी छन् । बुवाको डरले कसैसँग जबरजस्ती करणीबारे कुरा गर्न नसकेको तिनले बताइन । विकलाई बालिका जबरजस्ती करणी र हाडनातासम्बन्धी महलअन्तर्गत कारबाही चलाएको छ । बर्दिया प्रहरीका अनुसार गत साउनदेखि असार मसान्तसम्म करिब २४ वटा बलात्कारका मुद्दा दायर भएको छ । उक्त अवधिमा सबैभन्दा बढी बर्दियाको मोतीपुर गाविसमा चारवटा जबरजस्ती करणीका मुद्दा दायर भएका थिए ।
त्यस्तै, सिन्धुलीको ककुरठाकुर-८ मा साउनको दोस्रो साता ६५ वषर्ीय एक वृद्धले नौ वषर्ीया बालिकालाई बलात्कार गरेको घटना सार्वजनिक भएका छन् । पीडित बालिका र उनका बुबा उपचारका लागि आर्थिक सहयोग माग्न सिन्धुली सदरमुकाम आउँदा यो घटना सार्वजनिक भएको हो । दिउँसो घरमा कोही नभएको बेलामा तामाङ थरका ती वृद्धले साउन ११ गते बालिकालाई बलात्कार गरेको पीडित पक्षले बताए । पीडक तामाङ भने हाल भारत भागेको पीडितले बतायो । यसैगरि, मकवानपुरमा चकलेटको लोभ देखाएर एक वृद्धले बालिका बलात्कार गरेको समाचार प्रकासका आएको छ । मकवानपुरको राईगाउँ २ का ७१ वषर्ीय ढोलबहादुर राईले १३ वषर्ीया बालिकालाई २८ गते  बलात्कार गरेको प्रहरीले जनायो । भंैसी चराउन गएको बेला वृद्धले चकलेट दिएर फकाई बलात्कार गरेको पीडितले प्रहरी समक्ष बताइन । बलात्कार गरेको पीडितले काकालाई बताएपछि घटना सार्वजनिक भएको थियो । पीडितका आफन्तको उजुरीका आधारमा इलाका प्रहरी कार्यालय फापरवारीले वृद्धलाई साउन २९ गते पक्राउ गरी कानुनी कारबाहीका निम्ति जिल्ल्ाा प्रहरीमा पठाइएको छ ।

आफन्तबाट बालिका बलत्कृत

आफन्तबाट बालिका बलत्कृत

GuruKul Music Club

GuruKul Music Club

RajKumar Lekhi Tharu

मोर्चा र एकताको औचित्य

मोर्चा र एकताको औचित्य

Friday, 3 August 2012

मधेसी दल 1


मधेसी दल

१.    मधेसी जनअधिकार फोरम (लोकतान्त्रिक)
२.    मधेसी जनअधिकार फोरम (गणतान्त्रिक)
३.    मधेसी जनअधिकार फोरम नेपाल
४.    तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी
५.    तराई मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी नेपाल
६.     राष्ट्रिय मधेस समाजवादी पार्टी
७.     सद्भावना पार्टी
८.     संघीय सद्भावना 
९.     राष्ट्रिय सद्भावना
१०.    नेपाल सद्भावना पार्टी (आनन्ददेवी) सरिता गिरी समूह
११.    नेपाल सद्भावना पार्टी (आनन्ददेवी) श्यासुन्दर गुप्ता समूह
१२.    नेपाल सद्भावना पार्टी (आनन्ददेवी) खुशीलाल मण्डल समूह 
१३.    सद्भावना पार्टी (गजेन्द्रवादी)
१४.    मधेस क्रान्ति फोरम

Tuesday, 17 July 2012

संविधानसभाको हत्यामा ‘बाहुनवादी चक्रव्यू’

संविधानसभाको हत्यामा ‘बाहुनवादी चक्रव्यू’
राजा महेन्द्र र वीरेन्द्रको तानाशाही पंचायती शासनकालको नेपाल होस या ‘महामानव’ वीपी कोइरालाको प्रजातान्त्रिक नेपाल । ‘लौह पुरुष’ गणेशमान सिंह र ‘सन्त नेता’ कृष्णप्रसाद भट्टराईको नेपाल होस् या लामो समयसम्म प्रधानमन्त्री पदमा विराजमान रहेका नेपाली कांग्रेसका नेता गिरिजाप्रसाद कोइरालाको नेपाल । कम्युनिष्ट नेता मनमोहन अधिकारी, माधवकुमार नेपाल र झलनाथ खनालको नेपाल होस या हजारौ निरीह नेपालीहरूको हत्यापछि प्रधानमन्त्री पदमाथि कब्जा जमाउने माओवादी नेता पुष्पकमल दाहाल र बाबुराम भट्टराइको नेपाल । यी सबै ‘महान (?) हस्तिहरूको कार्यकालमा, ‘राजगद्दी’ र ‘शासन’ हत्याउने मुद्दामा समय–समयमा मदभेद् भएकै छन् । सरकारहरू बने , ढले र तत्कालीन ‘सत्ताभोगी’– ‘भत्ताभोगी’ नेताहरूमा लेन–देनबारे विवाद भएकै थिए , सहमतिहरू पनि भए, अनि त्यो टुट्ने क्रम पनि जारीनै रहे । यहा“सम्म कि उनीहरूमा मतभेदसंगै घृणित मनभेद समेत सिर्जित भयो । तर, एउटै वाक्यमा भन्ने हो भने ‘हिन्दी, हिन्दुस्तान र हिन्दुस्तानीहरूसँग मिल्दोजूल्दो अनुहार र बेटी–रोटीको सम्बन्ध भएका देशका आधा भन्दा बढी आबादी भएका ‘हिन्दीभाषी मधेसीहरू’ को मुद्दाहरुमा भने कुनैपनि मतभेद र मनभेद न कहिले उनीहरुमा सिर्जित हुने स्थिति आयो न त सहमति जुटाउनका लागि एउटा वर्गविशेषको कांग्रेस–कम्युनिष्ट–राजाबादी नेताहरुलाई कुनै कसरतनै गर्नु प¥यो । उक्त तीनै मुद्दामा शासक वर्गका नेताहरूलाई न बैठकका लागि बैठक डाक्नु प¥यो, न त ‘पाँच तारे होटलहरु वा रिसोर्ट’ मा गफहरु गर्ने नाटक मञ्चननै गर्नु प¥यो । राजादेखि राजनीतिक नेताहरूसम्म यी मुद्दाहरुमा ‘सदाबहार सहमति’ कायम रहँदै आएको छ र उनीहरु आफ्नो यो अडानमा कायम रहँदै आएका छन् कि ः
–हिन्दी नेपालको भाषा होइन
–हिन्दुस्तान, नेपाललाई हड्प्पन चाहन्छ,
–नेपालका ‘मधेसी’ नेपाली नभएर हिन्दुस्तानी हुन तथा मारवाडी र मधेसीका रुपमा हिन्दुस्तानले नै नेपाललाई शोषण गरिरहेको छ, लुटिरहेको छ ।
नेपालको राजा र राजदरबारको दूध–पानीमा पालिएर हुर्किएका एक वर्गविशेषका शासकहरूको यही खोचकै परिणामले ‘गोरखा राजाहरू’ को २५० वर्षसम्मको शासनकालमा मधेसीहरूलाई दरबारको छेउछाउ कुचो लगाउन र गोरखा सिपाहीहरुको घोडाको लिद्दी फ्याक्ने कामका लागि समेत पत्याइउन । किनभने गोरखा राजाहरुको मन–मस्तिष्कमा यो कुराको आक्रोस थियो कि ‘काठमाडौं उपत्यकाका मल्ल राजाहरूको सेनामा १२ सय ‘तिरहुतिया–सिपाही’ तैनाथ थिए , जसले गोरखाका राजा पृथ्वीनारायण शाहद्वारा काठमाडौंमाथि गरिएको आक्रमणको प्रतिरोध गरेका थिए । नेपालको राणा शासकहरूले पनि आफ्नो १०४ वर्षको शासनकालमा मधेसीहरूलाई धेरै टाढा राखेका थिए । यहाँसम्म कि सन् १९५० मा स्थापित तथाकथित प्रजातन्त्रमा पनि मधेसीहरूलाई सेना–प्रहरीसहित कुनैपनि राजकाजमा छिर्न दिइएन । राजा, राजदरबार र नेपाली प्रजातन्त्रका स्वघोषित ठेकेदार र शासकहरूको मनको कलुषित भावना समय–समयमा विस्फोट भएकै थियो, त्यो क्रम जारी छ । यसै कडीमा, राजा महेन्द्रले ‘आफ्ना पालतू’ तीन जना पढे–लेखेका मधेसीलाई अगाडी सारेर ‘हिन्दी’ को पठन–पाठनमा रोक लगाए । सन् १९६५ को जून–जुलाईको महिना थियो, जबमा अमेरिकी सहयोगबाट निर्मित पाठ्यक्रमहरुदेखि हिन्दीलाई संधै–संधैका लागि विदा गरियो । साथै राजदरबार र केही पण्डित–पुजारीहरू तथा सेना सिपाहीहरूको परिवारको ‘बोलचालको भाषा’ लाई ‘नेपाली’ नाम दिँदै सरकारी कामकाजको भाषा र राष्ट्रभाषासम्मको दर्जा प्रदान गरियो । जबकी, त्यसअघि तराई क्षेत्रका सबै स्कूलहरु तथा राजधानीका शिक्षण संस्थानहरुमा समेत हिन्दी पढाई हुने गर्थो । त्यसताका नेपालको परीक्षाहरू बिहारको पटना विश्वविद्यालय अन्तर्गत संचालित थियो , माध्यम चाहीँ हिन्दी वा अंग्रेजी थिए । सन् १९६० मा राजा महेन्द्रद्वारा ‘वीपी कोइराला–प्रजातन्त्र’ को हत्यापछि स्थापित ३० वर्षे पञ्चायती शासन र सन् १९९० मा पुर्नस्थापित बहुदलीय–संसदीय प्रणालीदेखि आजसम्म पनि हिन्दी पुनः स्थापित हुन सकेको छैन र त्यसको निषेध अझैपनि जारी छ ।
पुनस्थार्पित संसदीय प्रणालीका प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित कृष्णप्रसाद भट्टराईले ‘नवभारत टाइम्स’ लाई दिएको पहिलो अन्तर्वार्तामा भनेका थिए कि ‘नेपालमा हिन्दीले तराई क्षेत्रका मैथिली, भोजपुरी , थारु र अवधी भाषाभाषीहरुलाई मात्रै जोड्दैन दुर्गम–पहाड–हिमालका बासिन्दाहरुलाई पनि तराई क्षेत्रसंग जोड्दछ । किनभने, पहाडी समुदाय जब कामको खोजी क्रममा तराई छिर्छन त्यस बेला उनीहरु टुटे–फुटेका हिन्दीमै बोल्ने प्रयास गर्छन् । यति मात्रै होइन, हिन्दी भाषाकै माध्यमले छिमेकी मित्र राष्ट्र भारतसंग आत्मिय सम्बन्ध थप प्रगाढ हुन सक्छ । ’ नेपालका सन्त नेताको यो महान वाणीलाई उनकै कांग्रेसका चेलाहरूले सम्मानित गरेनन् । फलस्वरुप नेपालमा हिन्दी आज पनि आफ्नो प्राण÷प्रतिष्ठा बचाउन संघर्षरत छ । तर, यहाँ एउटा सन्तोषको कुरो के छ भने विगत दुई–तीन दशकमा भएको ‘मिडिया क्रान्तिका कारण नेपालको दूर्गम क्षेत्रहरुदेखि राजधानी र सहरी क्षेत्रहरुमा बाल–बृद्ध मात्रैले हिन्दी बुझ्ने–बोल्ने गर्दैनन्, नेपालका झण्डै सय एफएम रेडियो स्टेशन, चौबिसै घन्टा आफ्नो मधुर हिन्दी फिल्मी गीतहरु, भजनहरु र पप संगीतहरु मार्फत हिन्दीलाई नेपालको जन–जनसम्म पु¥याउन आफ्नो महत्वपूर्ण सहयोग र योगदान गरिरहेकै छन् । के, नेपालका एक वर्गविशेषका शासक यसको जबाब दिन सक्लान कि ‘भारतको विभिन्न शहरहरुमा नोकरी–चाकडी गरिरहेका झण्डै ८७ लाख नेपाली कुन भाषामा बोल्छन् ?
यस्तै जहाँसम्म हिन्दुस्तान–भारतको सबाल छ , पूर्व राजा महेन्द्रद्वारा निर्धारित त्यो ‘मापदण्ड ’ लागु गर्न पूर्व राजा वीरेन्द्र र ज्ञानेन्द्रदेखि पंचायतवादी, कांग्रेस, कम्युनिष्ट र माओवादीहरू समेत कहिले पछाडि परेनन्, जसमा ‘चीनको मंगलस्तुति÷आरती गर्ने’ र भारतप्रति घृणा फैलाउनेहरुलाई ‘प्रखर राष्ट्रवादी’ का रुपमा सम्मानित गरिँदै आएको छ । जबकी, ‘बेटी–रोटीको सम्बन्धमा बाँधिएको हिन्दुस्तान (इण्डिया) प्रति सकारात्मक सोच राख्ने, नेपालको विकासमा हिन्दुस्तानी सहयोगप्रति कृतज्ञताको भाव राख्ने तथा स्नेह–सद्भाव व्यक्त गर्नेहरुलाई ‘नेपालको राष्ट्रघाती’ मानिदै आएको छ । हुनत यदि नेपालका शासकहरुद्वारा स्वतन्त्र भारतका प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरुदेखि भारतीय राष्ट्रपति डा.जाकिर हुसैन, राष्ट्रपति डा.वीवी गिरी, प्रधानमन्त्री इन्दिरा गान्धी, प्रधानमन्त्री राजीव गान्धी र भारतीय संसदका स्पीकर गुरुदयाल सिंह ढिल्लो र बलराम जाखडसम्मका नेताहरु तथा कूटनीतिज्ञहरूलाई गरिएको घोर अपमानहरुको फेहरिस्त बनाइयो भने ती कथाहरुले सयौं पृष्ठ भरिन सक्छन् ।
केही वर्षअघि मात्रै नेपाली कांग्रेसका नेता तथा प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइरालाको कार्यकालमा चितवन जिल्लाको एउटा ‘ल्याटरप्याडी’ पत्रिकाद्वारा फैलाइएको अफवाहको लहरमा सयौं भारतीय, माडवारी र मधेसी, राजधानीका सडकहरुमा दिन–दहाडै पिटिए, कुटिए । उनीहरुको निवास स्थलहरुमा हमला समेत गरिए । विल्कुलै निराधार आरोप यो थियो कि भारतीय सिने–कलाकार ऋतिक रोशनले नेपालका बारेमा अपमानपूर्ण टिप्पणी गरेका छन् र भनेका छन कि ‘ उनलाई नेपाल मन पर्दैन ’ । हालैका दिनहरुलाई पनि गहनताका साथ बुझ्न प्रयास गरिने हो भने नेपालका पूर्व प्रधानमन्त्री तथा माओवादी अध्यक्ष पुष्पकमल दाहालले भारतको राष्ट्रियताको प्रतिक अशोक चक्र र भारतकै राष्ट्रिय तिरंगा झण्डालाई एउटा जुतामा देखाउँदै ठूल्ठूला पोस्टर बनाउन लगाएका थिए, अनि त्यसलाई मुलुकभर टाँसियो पनि । तिनै माओवादीहरूले भारतीय सहयोगबाट निर्मित स्कूल भवन उद्घाट्न समारोहमा सहभागी हुन विशिष्ट अतिथिका रुपमा पुगेका तत्कालिन भारतीय राजदूत राकेश सूदमाथि जुत्ता फ्याक्न समेत लगाए । हालैको एउटा पछिल्लो घटनापनि त्यस्तै आश्चर्यजनक छ , जसमा नेपालको सीमा नगर वीरगंजस्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावासमा कार्यरत एक जना ‘डिप्लोम्याट’ एसडी मेहतामाथि एउटा अखबारद्वारा यो आरोप लगाइयो कि उनले एउटा रात्रीभोजका क्रममा ‘नेपालका मधेसीहरु’ लाई उक्साउने आपत्तिजनक अभिव्यक्ति’ दिए । यो आशयको समाचार प्रकाशित भएलगतै भारतीय राजदूतावासले यसको जोरदार खण्डन पनि ग¥यो । त्यसपछि भारत सरकारका विदेश मन्त्रालयले पनि उक्त आरोपलाई अस्वीकार गर्दै त्यसलाई निराधार बताएको थियो । यति मात्रै होइन उक्त भोजका आयोजकहरुले पनि उक्त समाचारको संयुक्त रुपमा खण्डन गरेका थिए । सबैभन्दा पहिले नेपालको परराष्ट्र मन्त्रालयले ‘भारतीय राजदूत जयन्त प्रसादलाई आफ्नो कार्यालयमा ‘सम्मन’ ग¥यो (औपचारिक रुपमा बोलाएर), स्पष्टिकरण माग्यो । जबाफमा भारतीय राजदूतले त्यहाँ पनि उक्त खबरलाई निराधार भन्दै त्यसको खण्डन गरेका थिए । यिनै सबै प्रतिक्रियालाई भारतद्वारा औपचारिक रुपमा पुरा गरेपछि पनि भनिन्छ कि ‘नेपालको प्रधानमन्त्री निवासमा हिन्दुस्तानविरुद्ध एउटा अभियान चलाइयो कि ‘किन , ‘मिस्टर मेहता’ लाई ‘आवाञ्छनीय कूटनीतिज्ञ’ घोषित गरेर नेपालबाट देशनिकाल नगर्ने ? जानकारीमा आयो कि प्रधानमन्त्री निवासमै ‘देशनिकाला’ गर्न सहमति जुटाउनका लागि तैयार गरिएको पत्रमा हस्ताक्षर गर्न भनियो । स्रोतका अनुसार एक जना परिपक्व नेताका रुपमा परिचित नेपाली कांग्रेस सभापति पंडित सुशील कोइराला, एकीकृत नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) अध्यक्ष पंडित झलनाथ खनाल र माओवादी  अध्यक्ष पंडित पुष्पकमल दाहालसम्मले त्यसमा हस्ताक्षर गरे । तर, मामला त तब बिग्रियो जब पत्रलाई सरकारमा सहभागी मधेसी जनअधिकार फोरम (लोकतान्त्रिक) का अध्यक्ष तथा गृहमन्त्री विजयकुमार गच्छदारलाई हस्ताक्षर गर्न पठाइयो , उनले त्यो सहमति पत्रमा हस्ताक्षर गर्न अस्वीकार गरे । सुशिल कोइराला जस्ता परिपक्क नेताले एउटा अखबारी खबरका आधारमा भारतीय डिप्लोम्याटलाई देशनिकाला गर्नका लागि तयार गरिएको सहमति पत्रमा हस्ताक्षर गरे । हुनत यसमा आश्चर्य मान्नु पर्दैन । किनभने वास्तविकता त यही थियो कि ‘भारत विरोधी भावनाहरुबाट ग्रस्त’ ती सबै नेताहरुको त्यो बौखलाहट थियो , जुन उक्त निराधार घटनाबाट छताछुल्ल हुन पुग्यो । सबैभन्दा ठूलो आश्चर्यको कुरो त यो छ कि त्यो जघन्य षडयन्त्र त्यहाँ रचियो (प्रधानमन्त्री निवास) जहाँ ‘भारतीय राजदूत जयन्तप्रसादका ‘परम विश्वासी र इच्छाएका ’ व्यक्ति भनिएका डा. बाबूराम भट्टराई जस्ता अति परिपक्व (?) माओवादी नेता, प्रधामन्त्रीको उच्चासनमा विराजमान छन् ।
अब मधेसीहरूको विषयमा कुरा गरौं । मधेसीहरुप्रति नेपालका एक वर्ग विशेष, जातिविशेषका शासकहरु तिनै सोचका परिणाम थियो कि राजा वीरेन्द्रले सन् १९७४–७५ मा ‘दरबार पालित पंचहरु’ र ‘मण्डले गुण्डा’ द्वारा ‘नेपाल–भारत सांस्कृतिक केन्द्र’ मा तोडफोड गराएका थिए र त्यसलगतै राजधानीको गल्लीहरूमा फलफूल र सागसब्जी बेचेर जिविकोपार्जन गर्दै आएका ठूलो संख्यामा मधेसीहरुलाई यो भन्दै खुला ट्रकहरुमा कोचेर सीमापारको भारतीय नगर रक्सौलमा पठाइएको थियो कि ‘उनीहरु सबै हिन्दुस्तानी हुन्’। यसप्रति भारतीय सीमासंग जोडिएका तराई क्षेत्रका केही जागरुक मधेसी बुद्धिजीवी एवं राजनीतिक नेता सचेत अवश्य भए तर शासकको तानाशाहीका कारण उक्त कारवाहीको विरोधमा ‘चूँ’ गर्न समेत साहस जुटाउन सकेनन् । मधेसीहरुलाई त सबैभन्दा ठूलो झट्का त तब लाग्यो जब राजा वीरेन्द्रको शासनद्वारा डा. हर्कबहादुर गुरुङको नेतृत्वमा सन् १९८३ मा एउटा ‘बसाई–सराई’ आयोग गठन गरेर , त्यसको रिपोर्टमा तराईका भूमिपुत्र ‘मधेसी’ लाई ‘भारतीय’ भएको स्पष्ट संकेत गरेको थियो । तानाशाही पंचायती शासकको यो षडयन्त्रको पर्दाफाश गर्न र संभावित ‘देश निकाला’ को स्थितिबाट मुक्ति पाउनका लागि ‘नेपाल सद्भावना परिषद्’ नामक एउटा गैर–राजनीतिक संगठनको जन्म भयो । र वयोवृद्ध मधेसी नेता बाबा रामजन्म तिवारी र नेपाली कांग्रेस नेता गजेन्द्रनारायण सिंहको नेतृत्वमा आफ्नो अधिकारका लागि मधेसीहरुले संघर्ष शुरु गरे । त्यसैको परिणामले सन् १९९० को जनआन्दोलनपछि निर्मित संविधानद्वारा स्थापित बहुदलीय संसदीय प्रणाली अन्तर्गत गराइएको सन् १९९१ को निर्वाचनमा नेपाल सद्भावना परिषद्ले ‘नेपाल सद्भावना पार्टी’ को रुप लियो, जुन आज च्याउ झै राजनीतिक पसलका रुपमा फैलिदै गइरहेका छन् । जे होस, विभाजित ‘सद्भावना पार्टीहरु’ संगै आज  अन्य मधेसी नेतृत्वको पार्टीहरुद्वारा राजसत्तामा मधेसीहरुको समानुपातिक हिस्सेदारीका लागि संघर्ष जारी छ । लक्ष्य टाढा छैन, किनभने विभाजित मधेसी पार्टीहरुबीच मधेस र मधेसीहरुको अधिकारको मागमा कुनै विवाद छैन । हुन त यो स्वयंसिद्ध छ कि ‘खेतहरुमा सुखेका धानको विरुवाबाट जमीनमा झरेका ‘धानको दानाहरु’ बाट उब्जेको विरुवाहरुमा पनि धाननै फल्नेछन, मकै–गहूँ कदापि होइन ।
आशा थियो कि लगभन १५–२० हजार निर्दोष र निरीह देशवासीहरुको नृशंस हत्यापछि नेपालको प्रधानमन्त्रीको गद्दीमा विराजमान भएका पण्डित पुष्पकमल दाहाल र पण्डित बाबुराम भट्टराईको ‘माओवादी शासन’ मा लगभग अढाई वर्षसम्म गुलामीको जीवन बाँचिरहेका देशको आधा भन्दा बढी आवादी ‘मधेसीहरुको भूगोल, भाषा र संस्कृतिको आधारमा’ आफ्नो पहिचानको प्रदेश अथवा प्रान्त प्राप्त हुनेछ, जसमा उनीहरुले आफ्ना बुजुर्गहरु, विद्वानहरु र राजनीतिज्ञहरुको सहयोगले विकासको गतिलाई तीव्र पार्न सक्नेछन् । मधेसबाट विदेशमा पलायन भईरहेको युवाशक्तिलाई आफ्नै प्रान्तमा रोक्न सकिनेछ र प्रान्तको विकासमा उनीहरुलाई उपयोग गर्न सकिनेछ । उनीहरुको आफ्नो सुरक्षा व्यवस्था हुनेछ तथा उनीहरु सेना र प्रहरी सेवादेखि देशका अन्य सेवाहरुमा समेत आफ्नो समुचित स्थान पाउनेछन् ।
तर, सबै गुड गोबर हुन पुगेको छ । मधेस आन्दोलनको सबैभन्दा ठूलो उपलब्धि ‘संघीय राज्य’ को कल्पना साकार हुन सकेन । दुई वर्षका लागि निर्वाचित ६०१ सदस्यीय संविधानसभाले संविधान निर्माणका लागि चार वर्षको समय लिएपनि संविधान बनाउन सकेन र संविधानसभा आत्महत्या गर्न विवस भयौ । हालसम्म प्रकाशित संविधान निर्माण सम्बन्धि अभिलेखहरुबाट त यो स्पष्ट भई सकेको छ कि ‘अन्त्यमा संघीयताको सवालमै किचलो सिर्जित भयौ र जेठ १४ (२८ मे) को अर्धरात्रीमा देशलाई अस्तव्यस्त राजनीतिको भवरमा छाडेर, संविधानसभाले सत्ताभोगी–भत्ताभोगी निकृष्ट चरित्रका विलासी नेताहरु र जनताबाट अलविदा भएर गयो । संविधानसभाद्वारा गठित आयोगका सदस्य तथा नेवार विद्वान प्रो. कृष्ण हाथेछुलाई मान्ने हो भने यसको कारण मात्र ‘बाहुनबाद’ थियो । सरकारमा सहभागी एउटा घटक दलका नेताको यो भनाईमा दम थियौ कि ‘प्रान्तहरुको संरचना वा संविधानसभा राज्य व्यवस्था समितिको रिपोर्टको आधारमा गरियोस् या संविधानसभाद्वारा गठित आयोगद्वारा गरिएको सिफारिहरुको आधारमा होस् । राजनीतिकशास्त्रका ज्ञाता प्रो.हाथेछुका अनुसार संविधानसभा राज्य समितिको रिपोर्टका आधारमा यदि राज्यहरुको गठन भए , सिफारिशमा परेका १४ प्रान्तहरुमध्ये १० प्रान्त ‘बाहुन–क्षेत्री’ बहुल हुनेथ्यो र चार आदिवासी–जनजाति–मधेसी–थारु बहुल बन्नेथ्यो । यसै प्रकार यदि आयोगको सिफारिसहरुको आधारमा १० प्रान्त ‘बाहुन–क्षेत्री’ बहुल हुनथ्यो जसध्ये ९ प्रान्त आदिवासी –जनजाति–मधेसी–थारु बहुल बन्ने थियो र मात्र एउटा प्रान्त चाहीँ ‘बाहुन–क्षेत्री–बहुल’ हुनेथ्यो ।
तर यो सहन सक्ने कुरै भएन, किनभने राजा र राजदरबारको छायाँमा झण्डै ढाई सय वर्षयता सत्तामा हाबी ‘बाहुन–क्षेत्री’ जातिका नेताहरुलाई । फलस्वरुप, नेपाली कांग्रेसका सभापति पंडित सुशील कोइराला, नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (एमाले) अध्यक्ष पंडित झलनाथ खनाल र एमाओवादी अध्यक्ष पंडित पुष्पकमलले बन्द कोठामा मिलीभगत गरेर एकाएक एउटा सिफारिस प्रकाशित गरे । यदि त्यो सिफारिसका आधारमा राज्यको गठन भएको भए ११ प्रान्तहरुमध्येबाट १० ‘बाहुन–क्षेत्री–बहुल प्रान्त बन्नेथ्यो र देशको लगभग ८०–८५ प्रतिशत आवादी भएका ‘आदिवासी–जनजाति–मधेसी–थारु बहुल’ एउटा मात्रै प्रान्त हुनेथ्यो । फलस्वरुप तेस्रो विकल्पलाई मान्न माओवादी सरकारमा सहभागी मधेसी मोर्चाका नेताहरुले अस्वीकार गर्दै भनेका थिए ‘नेपालको अन्तरिम संविधानमा संघीय राज्य’ को प्रावधान राखिनु मधेस आन्दोलनको ऐतिहासिक उपलब्धि हो , जुन आन्दोलनका क्रममा झण्डै पाँच दर्जन मधेसी आन्दोलनकारीले आफ्नो ज्यानको आहुति दिनु परेको थियो , उनीहरुलाई प्रहरीले गोली ठोकेका थिए । मधेसी नेताहरु पहिलेको तुलनामा सचेत थिए– किनभने ‘संघीय शासन’ को घोषणा गर्ने माओवादी, एमाले र नेपाली कांग्रेससम्मले, मिलीभगत गरेर अन्तरिम संविधानको मूल ड्राप्टबाट ‘संघीयताको प्रावधान समेटिएको पृष्ठलाई झिक्न लगाएका थिए’ र यदि त्यसको विरोधमा मधेस आन्दोलन नभएको भए ‘त्यसै वेलै संघीयतायुक्त संविधानको निर्माणको माग संधै–संधैका लागि बन्द भईसक्थ्यो । यो प्रश्न उठेको छ –के संविधानसभाको हत्या ‘बाहुनवादी चक्रव्यूह मा भयो ’?
संविधानसभाको स्वतः अवसानले यो प्रमाणित गरेको छ कि ‘चौथो मुद्दा अर्थात् ‘हिन्दुस्तानीहरुलाई नाक–नक्शबाट मिल्दोजुल्दो ‘ हिन्दीभाषी’ मधेशीहरुको मामिलामा कांग्रेस, कम्युनिष्ट, माओवादी, राजावादी तथा अन्य शासक जातिहरुको नेतृत्व भएको पार्टीहरुमा यो कुरामा सहमति र एकजुटता अघोषित रुपमा कायम भएको छ कि ‘नेपालमा भूगोल, भाषा र संस्कृतिका आधारमा ‘संघ राज्यहरुको स्थापना कुनै पनि हालतमा हुन नपाओस् ।
तर पछिल्लो समय यो हिन्दीभाषी मधेसीहरुका लागि मात्रै होइन । पहाड–पर्वतका भूमिपुत्र आदिवासी, जनजाति, थारु, दलित र राजधानीका मूल भूमिपुत्र ‘नेवार जाति’ का मानिसले पनि मधेसीहरुसंग आफ्नो इतिहास, भूगोल, भाषा र संस्कृतिका आधारमा संघीय राज्यको मागका लागि संघर्ष गर्न कमर कसेका छन् । विस २००७ साल इस १९५० मा नेपालमा राणाशासनको अन्यपछि राजा एवं राजदरबारको छायाँमा देशका ८०–८५ प्रतिशत आदिवासी, जनजाति, मधेसी आवादीमाथि एकछत्र राज्य कायम गर्दै  आइरहेका ‘अल्पमत बाहुन–क्षेत्र–नेताहरु र शासकहरु’ को ‘फुटाउ र शासन गर’ को षडयन्त्रकारी नीतिहरुको विरोधमा पहाड–पर्वतका मूल निवासीहरुदेखि तराईका मधेसी, थारु एवं राजधानीका नेवार जातिका नेता एउटै मञ्चमा आई पुगेका छन् । देशका प्रमुख पार्टीहरुमा वर्षौदेखि कार्यरत आदिवासी जनजाति, नेवार, थारु र मधेसी नेताहरुले ‘संघीयता’ को सवालमा आफ्ना पार्टीबाट स्पष्ट धारणाको माग गरेका छन् र आफ्नै पार्टीको केन्द्रीय समिति बैठक वहिष्कार गर्न समेत शुरु गरिसकेका छन् । उनीहरुले राजधानीको खुलामञ्चमा आयोजित विशाल संयुक्त जनसभामा ‘बाहुन–क्षेत्री’ जातिहरुका नेताहरुले गरेको षडयन्त्रको खुल्मखुल्ला विरोध गर्न शुरु गरेका छन र राज्यसत्ताको  हरेक क्षेत्रमा आफ्नो समानुपातिक हिस्सेदारी पाउन संघर्षको घोषणा पनि ।
यी तथ्यहरुको आलोकमा मुलुकका ‘बाहुन–क्षेत्री विरोधी ’तापक्रम’ लाई हेर्दा यस्तो लाग्दछ कि नेपालको शासन सत्तामाथि हालीमुहाली बनाएका ‘बाहुन–क्षेत्री’ नेताहरु, अधिकारीहरु तथा विदेशी डलर’ बाट संचालित गैर–सरकारी संघ–संस्थाहरुको गिद्दे दृष्टि लगाएर बसेका ‘बाहुन–क्षेत्री’ दादाहरुको सम्मत आई सकेको छ, अब उनीहरुको खैरियत छैन । अब हेर्नुछ ‘बाहुन–क्षेत्री नेतृत्वलाई यो भष्मभूत गर्ने तापक्रमको भान हुन्छ या हुदैन तथा समय रहँदै उनीहरु आफ्नो कुत्सित कार्यहरुबाट पाठ लिन्छन या लिँदैनन् ?
यो कुरोमा सच्चाई छ कि नेपालका सबै ‘बाहुन–क्षेत्री’ जातिहरुका मानिस, नेता अथवा अधिकारीहरू अधिकार सम्पन्न छैनन , सबै बाहुन क्षेत्री सुःखी सम्पन्न छैनन् । तर यो तीतो यथार्थनै हो कि नेपाली शासनमाथि दशकौदेखि काँचुली फेर्दै बसेका नेताहरु र अधिकारीहरुमा लगभग ९०–९५ प्रतिशत संख्या बाहुन–क्षेत्री, दुई जातिहरुकै छ । आज नेपाली कांग्रेस, एमाले तथा सत्तासीन एमाओवादीका अध्यक्ष क्रमशः सुशील कोइराला, झलनाथ खनाल र पुष्पकमल दाहाल, सबै पहाडी ब्राह्मण, अर्थात बाहुन जातिका हुन । जबकि एमाओवादी टुटेर बनेको नेकपा (माओवादी) का अध्यक्ष मोहन वैद्य किरण (मोहन प्रसाद पोखरेल ) पनि बाहुननै हुन । त्यस्तै नेकपा (माले) का अध्यक्ष सीपी मैनाली पनि बाहुनै हुन । यसैगरि यी सबै पार्टीहरुमा केन्द्रिय अथवा जिल्ला समितिहरुको महत्वपूर्ण पदहरुमा ‘अधिकांश बाहुन जाति’ कै नेताहरुको बहुमत छ ।
दोलखा तामाङ एकता समाजका अध्यक्ष तथा बौद्ध धर्म संरक्षण सरोकार समन्वय, नेपालका प्रवक्ता अमरदीप मोक्तानले स्पष्ट चेतावनी दिएका छन् कि ‘नेपालका बाहुन बाजे’ यति धूर्त र चतुर छन कि अब उनीहरुले बौद्ध धर्मका मठहरुमा समेत कब्जा जमाउन थालेका छन् । यसैको परिणाम हो कि लगभग १७ हजार निर्दोष नेपालीहरुको हत्या गराउने एमाओवादीका अध्यक्ष पुष्पकमलले भगवान गौतम बुद्धको जन्मस्थल लुम्बिनीमाथि पनि आफ्नो दाबी गरेका छन् र त्यसको विकासको नाममा झण्डै सात सय अर्ब चिनियाँ सहयोग, झ्वाम पार्ने प्रयासमा छन् । जबकि सच्चाई यो हो कि माओवादी दाहालको बुद्धधर्मसंग टाढा–टाढासम्म कुनै सम्बन्ध छैन । त्यसैले नेपालका सबै बौद्धमार्गीहरु र संगठनहरुले पुष्पकमलको उक्त दुष्प्रयासको कडा विरोध गरे र यसको जानकारी लुम्बिनी विकासमा सहयोग गर्ने चीन (हङकङ) को संस्था एपेकलाई मात्रै दिएन युनीडोसहित विश्वभरीका बौद्ध संघ–संस्था–संगठनलाई पनि दाहालको सडयन्त्रबारे लिखित रुपमा जानकारी प्रेषित गर्न भ्याए । 
मोक्तान भन्छन कि पुष्पकमल हिजोआज आफ्नो तुलना सम्राट अशोकसंग गर्न थालेका छन् , जबकी सच्चाई यो हो कि झण्डै १७ करोड रुपैयाँको आलीशान भवन र करोडौ रुपैयाँको विलासी गाडीहरुको भोगविलास गर्ने दाहाल यस्तो भनेर नेपाली जनताको आँखामा दिउँसै छारो हालिरहेका छन् । सत्यता त यो हो कि विलासितापूर्ण जीवन विताउने दाहाल हालका दिनहरुमा यो सोचेर अति चिन्तित छन कि यदि उनको ‘पार्टी अध्यक्ष अथवा लम्बिनी विकासको गद्दी खोस्यो भने १७ हजार मानिसलाई जुन जनयुद्धको नाममा मृत्यु वरण गर्न बाध्य पारे, तिनीहरुका आक्रोशित भाई–बन्धु पुष्पकमल साहेबसंग कस्तो व्यवहार गर्लान ? मोक्तानका अनुसार जनयुद्ध ताका मारिएका मानिसमा लगभग साढे आठ हजार त तामाङ जातिकै थिए ।