Saturday, 24 April 2021

जनगणनामे मैथिली: कियैक आ कोनाक ?

दिनेश यादव
विषय प्रवेश:
मैथिलीके प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक हार्नली आ सर जार्ज ग्रियर्सनसं लके सुनितिकुमार चाटुज्र्या आ उदयनारायण तिवारी धरि पूर्वी (हिन्दी) किंवा बिहारी (हिंदी) अंतर्गत मैथिलीके एकटा बोलीके रुपमे सामिल कएने छलाह (अमरनाथ, २०१७ ) । परन्च किछु लोक एकर विपक्षमे ठाड भेल छलाह । ओसभ मैथिलीके अलग करबाक मांग करैत रहलाह आ अन्ततः २००३ मे भारतमे अटलबिहारी वाजपेयीके सरकार मैथिलीके ओतूहुका संविधानक आठम् अनुसूचीमे शामिल कयैलक । ई पाजा पारक बात थिक । ओतूहुं १७ वर्षमे मैथिली माने किछु जातिके पकेटमे सीमित रहल बात किनकोसं छुपल नई छै । मैथिलीके जन–जनसं जोडबासं बेसी ‘पाग’ के प्रचारमे बेसी जोड दैत संकुचित मानसिकताक इर्दगिर्द सीमित भगेल मैथिली । आब ओते मैथिली राजनीतिक अस्त्र बैनगेल अइछ । तेंया, मैथिलीसं बेसी विभिन्न
स्थानक नामकरण विद्यापतिके नामसं होए, दडिभंगाके एयरपोर्टके नाम विद्यापति होए, पागके सरकारी मान्यता भेटैक (पाग पर हुलाक टिकट जारी भं चुकल अइछ), आदिइत्यादिमे ओझाएल अइछ ओइ कातक मैथिली भाषी । नेपालीय मैथिलीभाषी क्षेत्रमे सेहो कमोबेस ओहे अवस्था अइछ । नेपालमे मैथिली आ मिथिलाके नामपर अनाहकमे पाच गोटके सहादत देला वर्षौ भं चुकल अइछ । मुदा संवैधानिक दाबी आ किछु गोटके सम्मान पुरस्कार, पद, अवसर, सरकारी टकापर चांदी कटाईके आलावा मैथिली भाषीके जोडबाक बात बिल्कुले नई भेल अइछ । सरकारी कामकाजके भाषा आ प्रदेशक नामपर राजनीति अखन खुबे होइछ । लेकिन एहि तरहे राजनीतिसं फराक बहुसंख्यक लोक मैथिली आ मिथिलाके संशय भाव देखए लागल अइछ । कियैक त, विगत २० वर्षक मैथिली आ मिथिलाके नामपर जतेक राजनीतिक भेल वा अभियान चलल, ओकर ‘बाइप्रोडक्ट’ मे जतेक अवसर भेटल–ओसभ सीमित जातिके सीमित व्यक्तिके मात्र भेटल अइछ । सरकारी पुरस्कार, अवसर, मान, पदवी आ पद सभटामे ओहे सीमित व्यक्तिके कब्जा छै । ओ व्यक्तिसभके आलाबा मैथिलीमे आन लोक, जाति, वर्गमे योग्य आ दक्ष जनशक्ति नई छै, से बात किनौह नई अइछ । मात्र मानक मैथिलीके नामपर अब्राह्मण मैथिली भाषीसभ अयोग्य मानल गेल अइछ । बहुसंख्यक मैथिली भाषीके अछूत मानल गेल
अइछ । तेंया ओसभ बहिष्करणक पीडाबोधमे कुंठित होमाक अवस्थासं गुजरि रहल छै । मैथिलीमे अपनाके विद्वान आ लेखक आ महानसाहित्यकार होमाक दाबा करैवाला सभहक किरदानी लज्याबोध अवस्थामे मैथिलीजनके पहुंचा दैत छै । चाहे ओ बच्चाबुच्चीके लेल मैथिली पोथी होए वा मैथिली साहित्य किछु अपवादके छोइड, स्तरीय नई बैन सकल अइछ । पोथीसभले भेटल त्रुटि अक्षम अइछ त साहित्यसभ व्यक्तिवादी प्रवृति, स्व–स्तुति आ सजातिय प्रशंसामे लिन बेसी भेटैछ । अई तरहे एकभगहा मानसिकतासं कि मैथिलीक भविष्य उज्वल भं सकैत अइछ ? एम्हर मैथिली–मैथिली करैत छी आ अवसर एकैहटा जाति, वंश, वर्ग आ समूहके भेटै त कि अन्याय नए भेल ? ओहू पार (भारतमे) अनुसूचीमे समावेश भेलाके बादो मैथिली भाषा राखिके कै गोट अब्राह्मण आइपिएस अफिसर बन्नाहए ? अई पर किछु ब्राह्मणवादी ‘जीन’ के कारक तत्व मानैत छैथ । कि प्रतिभाके जीन निर्धारण करैत छै ? ई कुतर्क भेल । अवसरके बात आइबते अई तरहे कुतर्क सब देनाई शुरु भ जाएत छै,अब्राह्मणके निधेष कएल जाइत छै । एतबे नई ब्राह्मणेत्तरपर मानक मैथिली आ मानकिकरणक आरी चलाओल जाइत छै । जनगणना वा मतदानक समय अबिते ‘मिथिला आ मैथिली’ मे अब्राह्मणके सेहो जोडबाक प्रयास कियैक होमे लागैत छै ? संसारमे साहित्यविद्यामे कुनू प्रतियोगिता परीक्षामे ९९ प्रतिशत अंक आनैवाला एकैह जातिके लोक कियैक भं जाइत छै ? कारण पेपर लिखैवाला आ पेपर जाचैवाला एकैह गोत्र/जातिके होमाक बात देखल गेल छै । एकर पुष्टि नवभारत टाईम्सके दिल्ली संस्करण–२०१७ मे अमरनाथ अपन लेखमार्फत् कएने छैथ । ओ लिखने छैथ–
‘ऐसे अनेक प्रतियोगी मिल जाएंगे जिन्होने बीटेक, बीईए, एमबीए या एमबीबीएस की डिग्री लेकर भी सिविल सर्विस की परीक्षा में मैथिली को अपना विषय बनाया । कारण, एक तो मैथिली का पाठ्यक्रम सीमित है और दूसरे, उन्हे पता होता है कि उनकी उत्तरपुस्तिकाएं जांचने वाले परीक्षक भी मिथिलांचल के ही कोई प्रोफेसर होंगे जिन तक पहुंच न भी हो तो परीक्षक और परीक्षार्थी मे इतनी समझ तो होगी ही कि दोनो मैथिल ब्राह्मण है । पिछले वर्षोके परीक्षा परिणाम का अध्ययन किया जाय तो यह तथ्य उजागर हो जाएका कि मैथिली विषय लेकर परीक्षा देने वाले प्रतियोगी अमूमन सामान्य से अधिक अंक क्यो पाते हैं ? (नवभारत टाईम्स, २०१७)
ई त पाजा ओइपारक एकगोट उदाहरण भेल । मैथिलीके नामपर कोन तरहे एकैह जाति विशेषक लोक फाईदा ल रहल छैथ । नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्रमे सेहो सीमित व्यक्तिके कब्जामे मैथिली छै । मैथिलीके नामपर ओ ब्रह्मलुट मचौने छैथ । ओसभ आनके मैथिलीमे आबै देबाक प्रयास
करबे नई करैत छैथ । पहिने अपने आ नई भेल त आसेपासेके मैथिलीमे अवसर देल जाइत छै । आम मैथिली अभियानी आ अनुसन्धानकर्ताके निषेध कएल जाइत छै । कि मैथिली लिखई आ बाजए, एकैहटा जातिके अबैत अईछ ? जौ मैथिलीसभके छै त पद आ अवसरक लेल प्रतिस्पर्धा कियैक नई ? मन-सुन आ भन-सुनके आधार पर सीमित व्यक्तिके मात्र मैथिलीके नामपर ‘अप लिफ्ट’ कियैक ? गणेश परिक्रमा आ अपनाके देवत्वकरण करैवालाके मात्र अवसर कियैक ? मैथिलीमे ओहेसभ मात्र विद्वान आ लेखक छैथ सेहो त नई छैक ? रेडियो नेपाल आ नेपाल टेलिभिजनसं लके गोरखापत्र, निर्वाचन आयोग आ प्रेस काउन्सिलक मैथिलीमे आचारसंहिता अनुवाद करैवाला होए, सबटामे एकैह जातिके आ ओहे नटरवरलालसभ भेटत । आब विरोध स्वर ‘बोल्ड’ होमे लागल त नयां रणनीति सेहो सुरु भं गेल अइछ । किछु गोटाके ‘सेरोमनियल’ बनाके वा ‘ अन फ्रन्ट फेस’ देखाके लुट मचा रहल छै । जौ एहि लेल मैथिली चाहि त ओई मैथिलीके पक्षमे लोक कियैक लागत ? जई मैथिलीमे मात्र एकल जातिके दबदबा होए, जई मैथिलीमे मात्र संख्याके गणनाके आधारमे सीमित व्यक्ति/जातिके अवसर भेटैक–ओई मैथिलीके पाछा लोक कियैक रहत ? मैथिली भाषी मगही, बज्जिका, अंगिका, पूर्वी थारु, जोलहासहितके पहिनुकवा भाषिका/बोली आब भाषाके मान्यताधरि ओहिना नई पहुंचल छैक । एकरा किछुगोट सरकारी षडयन्त्र कहिके अपन पलडा झाइर रहल छैथ । मुदा अईसं काज नई चलत,आन्तरिक शुद्धिकरण आब अपरिहार्य भए गेल अइछ । मैथिली जौ सभके भाषा कहैत छि त सभके समान हैसियत आ बराबरीके हिस्सेदारी बनबियौन ।
भाषा कियैक:
नेपालमे पहिल बेर विस ००९–०११ के जनगणनामे भाषाके गणना भेल छल । तक्करबाद भाषिक गणना निरन्तर भ रहल अइछ । सुरुमे ४४ टा भाषा देखल गेल छल, २०६८ मे १२३ पर पहुंच गेल । अइ आधार पर सरकारी तथ्यांक अनुसार भाषा आयोगसहित सरकारी निकाय भाषा विकास कार्यक्रम संचालन करैत अइछ । मुदा ई कार्यक्रममे जन–जनके पहुच नै होनाई दुखद थिक । नेपालमे भाषाक संख्या बढ्बाक बहुत रास कारण छै । जाहिमे भाषाक नाम पर किछु गोट अवसरप्रस्त होनाई आ भाषाक ठीकेदारीमे
बहुसंख्यकके तिरस्कार, वहिष्कार केनाई महत्वपूर्ण कारण अइछ । तहिना, नेपालमे भाषिक अपसरणक संभावना बहुत कम छै । खास कके मैथिलीमे वर्षौसं बहुसंख्यकके निषेध कएलाके कारण ओकर भाषिकासब भाषाक रुपमे विकसित भ गेलासं ई सब अपसरणशिल भाषाका रुपमे नई मानल जा सकैत अईछ । ई भाषासब मातृभाषाक रुपमे सेहो मान्यता भेटबाक कारण आधारभूत कक्षामे एकर पढाई होमाक निश्चित मानल जाइत अइछ ।
सामान्यतः मधेसीसभ तीन वा ओइसं बेसी भाषा बोलैवला बहुभाषिक होइछ । एकगोट मातृभाषासंगै नेपाली आ हिन्दी त सभहक साझा गुण थिक । थप अन्य भाषा सेहो निक जका बोइल आ बुइझ सकबाक अवस्थामे छै । नेपालक जनसंख्याक हिसाबसं आधा आवादी मधेस क्षेत्रमे बसोबास करैछ । मुदा सरकारी तथ्यांक किछु फरक अइछ । ०६८ के जनगणनामे ५९ प्रतिशत लोकसभ एकभाषी, ४१ प्रतिशत द्विभाषी छैथ । तहिना ३२ दशमलव ७ प्रतिशतके नेपाली दोसर भाषा रहबाक बात ओइ जनगणनामे छल । नेपालमे ९१ टा मातृभाषा दोसर भाषाक रुपमे प्रयोग भ रहल तथ्यांक अइछ । जन्म लेलाक बाद बच्चा जई भाषामे पहिल बेर बोलैत छै, सामान्यतया ओकरे मातृभाषा मानल जाइत अईछ । व्यक्तिके पहिल भाषा मातृभाषा वा घरमे बोलैवाला भाषा होइत छैक । घर अगलबगल रहल परोसी आ वाल्यकालमे स्याहार करैवाला लोकक भाषा व्यक्तिके पहिले भाषा थिक । भाषा पर कानुनी व्यवस्था व्यवस्था सेहो अइछ । कानून अनुसार–
संविधानके धारा (६) द्वारा मातृभाषाक रुपमे नेपालमे बोलैईवला सभटा भाषाके राष्ट्रभाषा मानल गेल छैक । धारा (७) के उपधारा (२) प्रदेशमे नेपाली भाषाके अतिरिक्त बहुसंख्यकद्वारा मातृभाषाके रुपमे बोलैवाल एक वा एकसं बेसी भाषाके प्रदेश कानून बमोजिम सरकारी कामकाजके भाषा बनाओल जेबाक प्रावधान किटल अइछ । एहा संविधानक धारा (३१) के उपधारा (५) द्वारा मातृभाषामे शिक्षा प्राप्त करबाक अधिकार प्रदान भेल अइछ । तहिना संविधानके धारता (३२) के उपधारा (१) द्वारा प्रत्येक व्यक्ति आ समुदायके अपन भाषाक उपयोग करबाक अधिकार आ उपधारा (३) द्वारा अपन भाषा आ लिपि संरक्षण आ प्रवर्धन करबाक अधिकार प्रदान कएल गेल छैन ।(गोरखापत्र, २०७६)
समस्याके जैड:
विद्वान ज्याकोब्सनके कथन छनि जे समाजमे द्विभाषिक वा बहुभाषिक स्थिति देखाई पडनाई समस्या थिक । मुदा अखन ओकरा नवपीढिक विद्वान लोकनि स्वाभाविक सामाजिक यथार्थके रुपमे ल रहल छैक (अधिकारी, २०६५, पृ.३९) । मैथिलीमे नव विद्वान लोकनिके तर्क मानबाक स्थितिमे किछु वर्ग, समुदाय, जाति आ कथित अगुवासभ तयार नई छैथ । ओसभ अखनो ज्याकोब्सनके लाईनमे गठिया बन्हने छैथ । तें मैथिलीक दुर्दशा देखार आ चिन्हार भ रहल अइछ । नेपाली आ मैथिलीके वरिष्ठ साहित्यकार एवं गीतकार अर्जुनप्रसाद गुप्ता ‘दर्दिला’ के शब्द पइच लैत कहब जे ओ सभ ‘भाषाखौका’ छैथ । विश्वके विभिन्न मुलुकमे अई तरहे लोकसभ भेटैत छैक । तें माचर आ वेण्डे कहने छैथ जे प्रत्येक दुई हप्तामे विश्वसं एकगोट भाषाक लोप भ जाइछ (रिमाल २०७१,पृ.१) विश्वके बहुत रास देश, जतेह बहुभाषिक लोक अत्याधिक रहैत छैक ओतेह बोलल आ प्रयोगमे आबैवला सम्पूर्ण भाषा/भाषिकाके जगेर्ना, उत्थान आ विकाशके नीति लेल गेल अइछ । उदाहरणके रुपमे सोभियत संघमे बहुसंख्यक आ अल्पसंख्यकसभके समान अधिकारक नीति अख्तियार कएल गेल अईछ । ओतेह बहुसंख्यक वा अल्पसंख्यकद्वारा बोलल जाईवला मातृभाषामे शिक्षाक व्यवस्था कयल गेल अइछ आ अपने मातृभाषाक प्रयोग कके
सरकारी सुविधा भोगबाक व्यवस्था छैक । भाषाक आधार पर राज्य ककरो उपर पक्षपात नई होबाक नीति सेहो लेल गेल छैक (बास्तोला ,२०७६) । नेपालमे अई तरहे नीति नई देखल गेल अइछ । समान रुपसं भाषिक अधिकार नई देल गेल छैक । मातृभाषाक नामपर निश्चित व्यक्ति आ अधिकांश एकैह समुदायके लोकके भाषिक अवसर प्रदान कएल जा रहल अइछ । खास कके मैथिलीमे मानकीकरणके नामपर बहुसंख्यकके वहिष्करणमे पाडल गेल छैक । एकर अर्थ बहुसंख्यक लोकमे मैथिलीक जानकार आ विद्वान नई छै से नई, ओसभ पहुंचक घेरासं दूर छैक । आ सीमित व्यक्तिके पृष्ठपोषण राज्यद्वारा भए रहल अइछ । जे भाषिक आयोग वा सरकारी निकाये पदपर आसिन छैथ,तलब भत्ता खाईत छैथ,ओ सभ विभिन्न नामपर परियोजना खडा कके दोहरा सुविधा ल रहल छैथ । आन प्रतिभाके अई क्षेत्रमे अनेबाक लेल कुनू प्रयास नई होइत छैक । ई पैघ दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था थिक । कहबी छैक–बाघक बच्चाके बाघे खाइछ आ ठिकठिकिया(गिरगिट) सेहो कहियोकाल अपने बच्चाके खाइछ । ई अत्यन्त खतरनाक बात थिक, मैथिलीके कथित मानकीकरणवला मैथिली भाषीसभ खा रहल छैथ । कियैक त ओसभ विभिन्न आयोग, नियोग आ समितिमे बैसके बहुसंख्यक मैथिलीजनके भावना, आकांक्षा आ अपेक्षा विपरीत सहि, छाप करैत छैथ आ अपन अंश लैत आम मैथिलीभाषीके चिरहरण करैत छैथ आ अपने म्याके बोलीप्रतिके मोह भंग करबाक परिस्थिति बनाबैत छैथ । अखनो गामघरमे लोकसभ मैथिलीके ‘बभना’ के भाषा आ अपन बोलीके ‘ठेठिया’ भाषा कहैत छैक । जन–जनके भितरमे जकडल अई तरहे मानसिकताके जाधरि धुअल नई जाएत, मैथिलीक समस्या ठामेठाम रहत । हम वर्षौसं मैथिलीमे लिखैत छी, मुदा हमरा मैथिलीके स्वीकार करबाकमे बहुत गोटेके दिक्कत भ रहल छैनि । तें ओसभ कहि दैत छैथ –अहांक मैथिल धाङ्ग आ बुझल नई अइछ । ’ आब प्रश्न ऊठैत अईछ जे हम कुन मैथिलीके लेल वकालत करब आ कियैक करब ? जई भाषामे हम लिखैत छि, ओई भाषाके अभियानीसभ जौ हमर भाषाके स्वीकार नई करत त हम ओकरा भाषाके कियैक पढहब ? अई तरहे बहुत रास जिज्ञासा मोन भित्र रहैत अइछ । मुदा मैथिलीमे भाषिक विविधताके पक्षमे लडनाई आ समग्र मैथिलीके सुरक्षा दुई फराक गप्प थिक । परन्च भाषामे रहल विविधता वा बहुभाषिकाक सुरक्षाक लेल सेहो पहिने भाषाके सुरक्षा केनाई अपरिहार्यता अइछ । मैथिलीके बचेबाक प्रयास सबके पहिले प्राथमिकताक विषय बनबाक चाहि । कुनू जाति वा जातिय–समूहके कुनू भाषाके सांस्थानिक तन्त्र पर नियन्त्रणसं ओ भाषा खराब आ कमजोर नई होइत छैक,मुदा भाषाके नामपर सीमित व्यक्तिके साम्राज्यसं भाषा कमजोर होइत छैक, जन–जनके भाषाप्रतिके मोह भंग होइत छैक । मैथिली करोडों लोकके अभिव्यक्तिके माध्यम थिक त ओई पर मुठीभर जाति/व्यक्तिके कब्जा कियैक ?
भाषाशास्त्री अनुसार विश्वमे सात हजार भाषा बाजल जाइत अइछ । मुदा राज्यद्वारा सहि नीति अख्तियार नई केलाके कारण अईमेसं बहुत भाषा लोपोन्मुख अइछ । विश्व सन्दर्भमे अंग्रेजीके बहुत रास भाषाके संहारक भाषा (किलर लङ्ग्वेज मानल जाइछ । दक्षिण एसियाकेमे हिन्दी आ नेपालमे खसनेपाली भाषाके संहारक भाषा कहल जाइत अइछ । अई सन्दर्भमे मैथिली भाषाके संहारक के ? अई जिज्ञासाके समाधानक प्रयासमे किछु गोटसं सम्पर्क कयलौ । हमर जे हाईपोथेसिस रहैक सेहा निस्कर्ष निकल । विद्वान लोकनि कहलैथ– मैथिलीके संहारक दू समुह अइछ, एक ब्राह्मणवादी सोच रखनिहार आ दोसर काठमाण्डौ केन्द्रित कथित किछु विद्वान । हुनक प्रतिप्रश्न रहैनि–नेपाली भाषाक भाषिकाके रुपमे रहल डोटेली, बझाङी, दार्चुलेली, बैतडेली, अछामी, डडेलधुरी आ दैलेखी अगल भाषा बइन सकैत अईछ, राई समुदायद्वारा बोल जाएवला भाषा वान्तवा, चाम्लिङ, कुलुङ, थुलुङ, खालिङ, पुमा, कोयी, आठपहरिया, दुमीलगायत २५ भाषा जनगणनामे सूचीकृत भए सकैत अईछ, थारुभाषामे पूर्वी थारु आ पश्चिमेली थारु भाषा बैन सकैत अइछ , मैथिलीके भाषिका मानल गेल बज्जिका, अङगिका, मगही भाषाक दर्जा प्राप्त क सकैछ ... यादव भाषा, तेली/सुडीसहितके छुट्टे भाषा कियैक नई बनत ? ’
भाषाक उन्नयनक विधि :
राजनीतिक संक्रमणकालीनक अवस्थाक कारण मैथिली भाषा मारमे पडले अइछ । भाषा नीति आ भाषा योजना सीमित व्यक्तिके कमाउ धन्दाके पृष्ठपोषक बनलाके कारण आओर समस्यामे अइछ । तें मैथिली मातृभाषा पिछरल जा रहल अइछ । भाषिक अवस्थिति आ प्रयोगक अवस्थाके ख्याल करबाक जरुरी अइछ । लोक मैथिलीजनके संवेदनशीलतासं सेहो समस्याके समाधान कए सकैत अइछ । भाषाके अवसर आ रोजगारसं जोडबाक आवश्यक अइछ । मैथिली भाषाके माइट, पाइन, पहिचान, स्थानीय झलक आ जीवन संस्कृतिके बुझेबाक रुपमे लेनाई जरुरी छै । मैथिलीके किछु व्यक्ति, समुदाय आ जातिक लोकसभ एकरा विदेसी भाषा बनेबाक बलधकेल क रहल अइछ । प्रयोग क्षेत्र, भाषिक जनसंख्या आ वक्ताके संस्कृति स्थानीय आ जन–जन अलग रहल पहिरन, भाषाशैली आ संस्कृतिके मैथिलीमे जबजस्र्ती घुसेबाक प्रयासके आब विफल करबाक समय आइब गेल अइछ । लोकजनके मौलिक जीवनशैलीके मैथिलीमे
समटेबाक अनिवार्यता अइछ । भाषाविद्, भाषिक अध्येता, अनुसन्धानकर्ता आ भाषासं प्रेम करैवाला व्यक्ति आ समुदाय समेतके सक्रियतामे मैथिली भाषाके तमान समस्याके निर्मम चिरफार करैत समस्याक समाधान दिशि ध्यान केन्द्रित करबाक अति आवश्यक अइछ । दौडनाई–भगनाईसं पहिने चलए पडत । जे गिरल अइछ, ओ एकबेर उइठके ठाड भएके दौडए लगत से बात नई । भाषाके नाम पर उपेक्षित लोकके एतेह गिरलके संज्ञा देल गेल अइछ । ओकर दौरेबा स पहिने ठाड करैवाला के ? सभटा अपने–अपनेमे केन्द्रित छै । एतेक बाबजुद हमरासभके आशावान रहैत काज करैत रह पडत । ओना त जातीय वर्चस्व कमोवेश हरेक भाषामे छई जे जातिय सामाजिक–आर्थिक रुपसं मजबूत छै ओकर भाषाका सांस्थानिक तन्त्र पर सेहो वर्चस्व होइत छै, मुदा एकर अर्थ ई किन्नौह नई जे आन जातिके वर्षौसं उपेक्षित आ विभेद कएल जाए । किछु लोक वा जातिवादीके ‘ग्राण्ड प्रोजेक्ट’ छैक जे मात्र मैथिलीके संख्या बढैय आ आई नाम पर चांदी कटाई करैत रही । ते मानकिकरणके पर्दा पाछाके लडाई मानि ओसभ ‘जे बजैत छी सेहा मैथिली’ कैह मैथिलीके एकत्वकारी भूमिकाके रुपमे प्रचार क रहल छै । अब्राह्मणमे सेहो नामचीन विद्वान, लेखक आ साहित्यकार मैथिलीमे छैथ , मुदा कम नामवर ब्राह्मणवादी साहित्कार हुनका लोकैनि सं सदखैनि उच्च आ नामचीन मानल जाइछ, कियैक ? अई तरहे मानसिकतावालासभके तर्क रहैत छै–भाषाके परिभाषा संख्याबल तय नई करैत छै ।’ एकर अर्थ बहुमत पर अल्पमतके शासन करबाक अधिकार ‘जन्मजात’ भेटल अइछ । कहल गेल छैक–भाषाक धकधकी ओई भाषामे प्रचलित मुहावरा, लोकगीत, लोकोक्ति, लोकगाथा, लोककथा, लोकसाहित्य, लोकसंगीत, लोक परम्परा आ ऐहन कतेको रीतिरिबाज साह लैत छैक । अई सभमे जन–जनके अभिव्यक्ति मुखरित होइत देखल गेल अइछ । मुदा ओसभ ओझेलमे पाईरके खास जातिके पहिरन, संस्कृति, भाष शैली आदिके मैथिलीके किछु गोट मैथिलीके प्राण माइन लेनाई कि अनुचित नै थिक ? विद्वान फूको कहने छैथ– कुनू भाषा मात्र संवादक माध्यम मात्र नय, परन्तु ओ ओकर हजारों वर्षके इतिहासके सहेजके रखैवाला माध्यम सेहो होइत अइछ । ’
इतिहास सहेजबाक काज एकैह जातिके मात्र कियैक ? मैथिलीके ब्राह्मण आ कायस्थके भाषा मानैयवाला के संख्या बहुत छै , एकर कारण छैक–सरकारी संस्था आ संस्थानसबके तन्त्र पर एकर वर्चस्प । मुदा बिहारक भुतपूूर्व मुख्यमन्त्री आ सर्वाधिक लोकप्रिय नेता कर्पूरी ठाकुर सन १९७७ मे अपन मन्त्रिपरिषद्के तरफस प्रस्ताव पठाके केन्द्रसं मैथिलकिे संविधानमे समावेश करबाक मांग कयने रहैथ (ठाकुर, २०१८) । ई अब्राह्मण छला, मुदा मैथिलीले हुनक स्थान कतेह छैनि । मैथिलीप्रति आनके अस्मिताबोध मानक जातिक लोकसं कम कियैक छैक ? बोलीसं भाषा बनैत छै न कि भाषासं बोली (मिश्र, २०१८) । मैथिली पर आनके विरोध होइते बिडणी बैन जाइवाला लोग अपन सहगोत्री आइबिते बताउमे लैग जाइत छैथ । एक निक उदाहरण डा.पशुपतिनाथ झा भए सकैत अइछ । त्रिभुवन विश्वविद्यालय मैथिली केन्द्रिय विभागके अध्यक्ष डा. पशुपतिनाथ झा नेपालक प्रथम उपराष्ट्रपति परमानन्द झाके सपथ ग्रहण पर भाषा विवादपर कथन रहैनि ‘
हिन्दी भाषा तराईमे सम्पर्क भाषा भेलाके कारण ओईमे सपथ लेबाक विषय विवादक विषय नई अइछ’ (बीबीसी, २६ जुलाई २००८) ।
जनकपुरके रामस्वरुप रामसागर बहुमुखी क्याम्पसमे मैथिली विभागअन्तर्गत ६ गोट विद्यार्थीक लेल ७ गोट प्राध्यापक कार्यरत छइनि । विद्यार्थीसं बेसी प्राध्यापक संख्या बेसी भेलाके बादो मैथिली विभागमे विद्यार्थी पढबाक लेल नई ऐलाके कारण कक्षा सेहो संचालन नई होइत अइछ । विभागके कर्मचारी आ प्राध्यापकके लेल प्रति माह २० लाख टका खर्च भ रहल अइछ (अन्नपूर्णपोस्ट, २०७५) । मैथिलीमे विद्यार्थीके संख्या कियैक घटल अइछ, अई पर चर्चा कतौहू नई होइत अइछ । पुरस्कार आ सम्मान तथा अवसर प्राप्तिके लेल जतेक चर्चा मिडियामे भेल अईछ , एकेडमिक मैथिली पर कर्म चर्चा भेल अइछ । लेखक एवं विद्वान सुरेन्द्र लाभ लिखैत छैथ–
‘...मिथिलाका ब्राह्मण अपनाके ‘मैथिल’ कहबै लगलाह । ब्राह्मणके पर्याय ‘मैथिल’ आ ‘मैथिल’के पर्याय एतह ब्राह्मण भ गेल । बांकी जाति ‘मैथिल’ भितर नइ अटाओल अइछ । मिथिलामे ब्राह्मण शासक सेहो भेल । जाति–विशेषके लेल यी शब्द आओर गोरवान्वित करैवाला भगेल । समाजके सर्माधिक उच्च स्थानमे रहल ब्राह्मण विद्वान, ज्ञाता आ पण्डित भगेल । ‘मैथिल’ शब्दसं सुसज्जित यी वर्ग आओर अहंकारी भगेल । ओ सभ अप्पन मैथिली बोली आ भाषाकशैली सर्वोत्कृष्ट कहै लागल । अपने संस्कृति सबसं पैघ आ सुन्दर । आ अपन पहिरन ‘पाग’के पहिचानके रुपमे स्थापित कयैलक । शेष नागरिकमे उकुसमुसक बढल । ‘मैथिल’ शब्दमे समटल नई गेल जातिसभ आक्रोशित भेल । भाषा आ भेषप्रति असन्तुष्टि व्यक्त करैय लागल । द्वन्द्व एतेक नै बैढि गेल जे मैथिली भाषाके सेहो बहुत लोक अस्वीकार करैय लागल । जनगणनामे मैथिली भाषाक प्रतिशत घटल । भविष्यमे आओर घटत से सम्भावना अइछ । भारतक बिहारमे सेहो मिथिला अइछ । अलग ‘मिथिला राज्य’ के माग सेहो अइछ । मुदा नेतृत्वकर्ता सेहो ब्राह्मण, मैथिलीके लेखक सेहो ब्राह्मण, साहित्यकार सेहो ब्राह्मण, आलोचक सेहो ब्राह्मण, समालोचक सेहो ब्राह्मण, इतिहासकार सेहो ब्राह्मण, अभियानी सेहो ब्राह्मण–सब जगह एकल जातिके प्रभुत्व होमाक कारण कोना सफल होएत ऊ मांग ? ऐतोह ‘मिथिला राज्य’के माग अइछ । पांच गोट सहिद सेहो भेल । बहुत लोक घायल सेहो भेल । मुदा मिथिला राज्यके माग पर सबगोटे अपनत्व ग्रहण नई कए रहल अइछ (नेपाल, २०७७) ।
मैथिलीके बजार नई छै । मैथिलीमे एकल जातिय बर्चस्प हाबी छै । मिथिलाके एकात्मक स्वरुपक विकासक लेल ई बाधक बात थिक । हमर भाषा मैथिली जनसंख्याक आकार, भौगोलिक स्थिति, प्राचीनता आ व्याकरणक दृष्टिकोणसं कोनो भाषासं कम नै लेकिन तैयो हमसभ असहाय किए छी–ई एकटा विचारणीय प्रश्न अइछ । ....दरभंगा–मधुवनीकें मानक बनाके हम केना पुरा मिथिलाके ठीका उठबैक दाबा क सकै छी ? (झा, २०१२) जई भाषाक जनसंख्या करोडसं ऊपर हुअए ओतए कोनो नीक अखबार वा पत्रिका नई होनाई दुखद थिक । हमसभ एक/दुई अंक निकलल पत्रिकाके ईतिहास कै नाक आ छाति फुलेबाक बात माइनके शान देखबैत छि । अखनो किछु पत्रिका छै जे ३०–३५ वर्षसं नियमित प्रकाशनमे अइछ, मुदा ओकरा प्रोमोट करबाक दिशामे कैय गोट मैथिली भाषी अग्रसर छैक ? ओई पत्रिकाक प्रकाशक जातिय विभेदक सिकार अइछ । वर्षौसं पत्रिका प्रशासन होइत छै, मुदा ग्राहक भेटब दुर्लभ अइछ । मैथिलीके नामपर दुकान चलबैलासभ हरेक मोर्चामे आगा छैथ, टका आ अवसर भेटते पहिने अपन परिवार, दियाद आ जाति, बादमे आन गोटके नाम मात्रके समावेश कके झिल्ली झारैत रहैत छैक । अई तरिकासं मैथिली भाषाक अवस्था ऊपर नई उठत । नेपालीमे एकटा कहबी छै–काम गर्ने कालु खाने बेलामे भालु (जे मैथिली पर बास्तविक रुपसं काज क रहल छैथ, ओकरा कोनो मौजर नई छै, जे मैथिलीके भजबैत रहैत छै, ओहे महान बनल छै । मिथिलामे संभ्रान्त वर्गक मैथिली अलग आ आम जनक मैथिली अलग भ गेल छै । एकर उदाहरण सरकारी लगानीमे प्रकाशित होमेबाला पाठ्यपुस्तक होए वा रेडियो÷टेलिभिजन वा गोरखापत्रक मैथिली पृष्ठ होए, सबटामे संभ्रान्त वर्गक मैथिलीके दबदबा अइछ । मैथिलीके अधोगतिके कारण मानक मैथिलीके संरचना आ मानदंड ब्राह्मण आ कायस्थ धरि सीमित होनाईके मानैवाला बहुसंख्यक लोक भेटैत छैक । ताहिमे भोला गिरि ‘विनोद सेहो एक छैथ । ओ लिखैत छैथ, ‘मैथिली शिक्षक ब्राह्मणे–कायस्थ होइत छैथ । जतए कतहु मैथिलीक रोजी–रोजीक जरिया छैक ततए एही दुनू जातिक कब्जा अइछ । एखनहुं मैथिली शिक्षक अथवा लेखक मात्र इएह दुई जातिक हेताह, अन्यक प्रवेश वर्जित अइछ । किएक तं मानक मैथिली एहीठाम तय होइत छैक, शुद्धतावादी मानदंडक निर्णय होइत छैक (पूर्वोत्तर, मैथिली, २०१०) । मैथिली आत्ममुग्धताके चंगुलमे फसल अइछ ।
जनगणना फारममे मैथिली कोनाके :
राष्ट्रिय जनगणना २०७८ के सामुदायिक प्रश्नावली अन्तर्गत खण्ड ‘ख’ के १३ नं. बूंदामे गाउंपालिका/नगरपालिकाके वडास्तरमे मातृभाषासभहक नामसहित जनसंख्या डिक्रिजिङ अर्डर(घटैत क्रम) मे लिखबाक बात उल्लेख छै । ओतेह सभ कियो अपन मातृभाषासहित अन्यभाषाके सेहो जानकारी देबाक अवसर नई छुटाबी (टेबल देखल जाए) ।
तहिना राष्ट्रिय जनगणना २०७८ के मुख्य प्रश्नावली अन्तर्गत व्यक्तिगत खण्डके जनसांख्यिक विवरणके कोलम ८ , ९ आ १० भाषासं सम्बन्धित अइछ । अईमे पुर्खाक भाषा, मातृभाषा आ दोसर बजैवाला भाषाके जानकारी लेबाक/देबाक विषयवस्तु छैक । अहूंमे सावधानी अपनाके अपन सहि विवरण देबाक आवश्यकता छैक (टेबल देखल जाए) । अईमे हमर व्यक्तिगत धारणा–पुर्खाके भाषामे ‘ठेठ मैथिली’, मातृभाषामे ‘लोक–मैथिली’ आ दोसर भाषामे ‘हिन्दी’ लिखबाक चाहीं । मैथिलीसंग ‘ठेठ’ आ ‘लोक’ जोडि देलासं बहुसंख्यकजनके भाषाक प्रतिनिधित्व होइत, अब्राह्मण, अमानकिकरणवला जाति÷समुदायके बोली, भाषिका, शैलीक सरकारीस्तर पर दर्ज होइत । मुदा ई सब मैथिलीए भाषामे जणना होइत । अईसं मैथिलीमे ब्राह्मणवादी मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह सेहो खडा होइत आ मैथिलीके जनसंख्या सेहो कम नई होएत । मैथिली भाषीके आन भाषामे पलायनके रोकबाक ई एकटा पैघ परामर्श सभकियोके लेल भसकैत अइछ । नेपालक राष्ट्रिय जनगणना २०६८ मे मैथिली भाषा दोसर पहिले जका रहल मुदा संख्या वा प्रतिशत (११.६७) मे सीमित भेल छल , ई प्रारम्भिक संकेत छल, जकरा मैथिलीके दाबेदारसभ अनुभव नई करै सकलाह ( कापडि, रामभरोस, २०७६) । आबो समय छै, सुधार होए । ((हमर ई आलेख आंजुर पत्रिकाके मार्च २०२१ मे प्रकाशित अइछ )
सन्दर्भ सामग्री :
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–नवभारत टाईम्स, नई दिल्ली संस्करण, २०१७ जुन ७ , भारत ।
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–कापडि, रामभरोस ‘भ्रमर’ (४ माघ २०७६), मैथिली भाषाको मर्म , काठमाडौं : कान्तिपुर दैनिक ।

2 comments:

  1. समग्र आलेख, जानबाक लेल कईएक टा बात भेंटल। खास क के मैथिली के स्थिति नेपाल के संदर्भ मे

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    1. बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद, कृतज्ञता आ आभार !

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