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"बहुत-से मनुष्य-शिक्षित एवं संस्कारी भी-अपने आपको बराबर परखते नहीं। अनेक भूलों और निष्फलताओं का मूल कारण यही अज्ञान है।"
मनोविज्ञान के एक प्रामाणिक ग्रंथ में व्यक्तित्व की लगभग चार सौ अलग-अलग व्याख्याएं लेखक ने एकत्र की हैं। इतनी अधिक हैं इसलिए एक भी अच्छी न होगी, ऐसा अनुमान सहज ही किया जा सकता है परंतु व्यक्तित्व क्या है, इसका विचार तो हर एक को होता ही है।
व्यक्तित्व कोई रूप नहीं, मजबूत शरीर नहीं, लोकप्रियता नहीं, बुद्धिमत्ता भी नहीं।
व्यक्तित्व में मनुष्य की तमाम शक्तियों - शरीर, बुद्धि, आत्मबल, भावना का समावेश होता है। परंतु जैसे कोई चित्र, सिर्फ चित्रपट और अमुक रंगों से बना हुआ नहीं होता, जैसे कोई भव्य इमारत ईंटों का ढेर नहीं, वैसे ही व्यक्तित्व भी हाथ-पैर या भावनाओं का समुच्चय नहीं। इन शक्तियां का हर एक व्यक्ति में विशेष समन्वय मिलता है, विशेष लक्ष्य की ओर वे दौड़ती होती हैं और इसीलिए विशेष व्यवहार भी इसमें से उपजता है। 'विशेष' शब्द पर भार डाला गया है, क्योंकि यह 'विशेषता' उस-उस व्यक्ति का मुख्य लक्षण होता है।
तुमने मोटरकार का कोई बड़ा कारखाना देखा होगा। मोटरें तैयार होकर, एक के बाद एक संधान-स्थल पर आती-जाती हैं। सब एक-समान! एक-सा इंजन, एक-से पहिये, एक-सी ही चॉप, एक-सी बैठक। रंग की भिन्नता; सिर्फ इतना ही फर्क। परंतु मनुष्य कारखाने में तैयार किया गया माल नहीं है। वह तो एक अद्भुत शिल्पी का सृजन है, जिसके कला-नमूनों की आवृत्ति नहीं होती।
जैसे दो मनुष्यों के अंगूठे की छाप एक-जैसी नहीं होती, वैसे ही व्यक्तित्व भी एक समान नहीं होते। दो पैर और दो आंखें, मन और हृदय, भय और प्रेम, भूख और प्यास आदि में समता होने पर भी प्रत्येक मनुष्य एक अलग, अनोखा, अनन्य व्यक्तित्व है। यह अनोखापन उसका महत्व सूचित करता है। दो मनुष्यों के व्यक्तित्व में उतना ही फर्क होता है जितना कारखाने के माल में और कलाकार के सृजन में।
तुममें तुम्हारा अपना व्यक्तिव है, उसी को तुम्हें विकसित करना चाहिए। दूसरों से तुम्हें प्रेरणा मिल सकती है। "इसका यह गुण मैं अपने में ला सकूं तो अच्छा," ऐसे शुभ विचार तुम्हें कई बार सूझेंगे और महान स्त्री-पुरुषों के जीवन चरित पढ़ते हुए, "मैं इसके सदृश बनूंगा" ऐसा संकल्प तुम्हारे हृदय में उठे बिना रहेगा नहीं। यह प्रेरणा बहुत अच्छी है; परंतु याद रखों कि तुम्हारा व्यक्तित्व तुम्हारा ही है, और यह किसी दूसरे से पृथक है। अंधा अनुकरण मरण ही है।
यशवंतराव चव्हाण जब स्कूल में पढ़ते थे, तब एक दिन शिक्षक ने बालकों से पूछा, "तुम क्या बनना चाहते हो?" किसी ने कहा 'तुकाराम।' परंतु यशवंतराव ने जवाब दिया, "मुझे यशवंतराव चव्हाण बनना है।"
निस्संदेह, आखिर तुम्हें 'तुम' ही बनना है।
गांधीजी और जवाहरलाल जी, दोनों अलग-अलग और दोनों महान। हर एक अपना-अपना व्यक्तित्व रखकर ही एक-दूसरे का साथी बना। फलत: देश और दुनिया के लिए इतना शुभ परिणाम आया। प्रत्येक मनुष्य के लिए दुनिया में अपना-अपना स्थान होता है। तुम्हारा भी! और यह अपना स्थान तुम ही ले सकते हो। तुम्हारे सामने तुम्हारा ही जीवन-कार्य पड़ा हुआ है। इसे तुम हर्ष से उठा लोगे, तो तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाएगा।
यदि एक बार यह बात तुम्हारी समझ में आ जाए तो अपने को तुच्छ समझने, हीनता-गं्रथि से पीड़ित होने, या दूसरों से ईष्र्या करने का अवकाश न रहेगा और यह आत्म-अवज्ञा, हीनता की ये भावनाएं और यह ईष्र्या, कितने ही मनुष्यों को जीवन विनष्ट करने की लिए उत्तरदायी हैं!
तुम्हारी अपेक्षा दूसरा होशियार होगा, अमीर होगा, रूपवान होगा। एक-एक वस्तु को लिया जाए, तो हर एक में तुम्हारी अपेक्षा कोई न कोई बेहतर गुण तो निकलेगा ही और यह बात तो हर एक पर लागू होती है। परंतु इन सब वस्तुओं का जो मिश्रण बनता है, वह कुछ विशेष है, वह तुम्हारा ही है और वह तुम्हें समाज में अपना विशेष स्थान दिलाएगा।
नाटक में अलग-अलग पात्र भाग लेते हैं। राजा भी होता है और विदूषक भी। लेकिन इनाम हमेशा राजा को ही मिले, ऐसा होता नहीं। विदूषक अपनी भूमिका राजा की अपेक्षा अच्छे ढंग से अदा करे तो उसे ही इनाम मिलेगा।
व्यक्तित्व की विशेषता से, तुम्हें यह एक महत्वपूर्ण पाठ मिलता है कि दुनिया में तुम्हारा स्थान है और से प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तित्व का उत्साहपूर्वक सर्वागीण विकास करना है। परंतु साथ ही साथ, तुम्हारा एक कर्तव्य उपस्थित होता है, और वह है तुम्हें अपना स्वभाव, अपना मिजाज, अपने संस्कार, अपनी अच्छी-बुरी आदतें, अपने सिद्धांत, अपने आदर्श, अपनी बुद्धि और भावनाएं अर्थात् अपना व्यक्तित्व परख लेना है।
प्रथम ज्ञान है आत्मबोध।
यह किसी सिद्धात्मा का गुरुमंत्र नहीं, परंतु व्यक्तित्व निर्माण का पहला व्यावहारिक नियम है। बहुत से मनुष्य शिक्षित और संस्कारी भी -अपने आपको बराबर परखते नहीं, यह वास्तविकता है। अनेक भूलों और निष्फलताओं का कारण यही अज्ञान है।
कॉलेज में विज्ञान या कला या वाणिज्य विषय चुनते करते समय और उसमें भी अर्थशास्त्र या साहित्य, इंजीनियरिंग या डॉक्टरी चुनते समय, विद्यार्थी की कितनी ही भूलें शिक्षकों को दुखी हृदय से देखनी पड़ती हैं। इन भूलों के अनेक कारण होते हैं, लेकिन उनके मूल में विद्यार्थी का ही - अपनी रुचि, स्वभाव एवं कुशलता विषयक घोर अज्ञानता होती है।
प्रभावशाली जर्मन विद्यार्थी के. एफ. गार्ड्स सत्रह वर्ष की आयु तक निर्णय नहीं कर सका था कि वह भाषाशास्त्री बने या गणितशास्त्री। सौभाग्य से उसी अरसे में, एक रात, उसने समबाहुकोण त्रिभुज की रचना विषयक एक महत्व की शोध की और इस शोध के आनंद में ही गणित विषय को अपनाने का निर्णय किया। ठीक समय के इस निर्णय से उसका वास्तविक जीवन-कार्य उसे मिल गया। उसका सारा दीर्घ जीवन गणित की उच्च सेवा से दीप्त हो उठा और उसके कार्य से गणित के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया।
तुम्हारा स्वभाव कैसा है? किस प्रकार के मित्रों को तुम पसंद करते हो? तुम्हारे संबंध में दूसरे क्या-क्या सोचते हैं? भविष्य के लिए तुम्हारे मन में कौन-कौन सी कल्पनाएं घूमती रहती हैं? "क्या करने से मेरा जीवन सार्थक होगा?" इस प्रश्न का अपने मन से तुम कैसा जवाब दोगे? "मैं भावनाप्रधान हूं, विचारशील हूं या व्यवहारकुशल हूं?" इस विषय में तुम विश्वास-पूर्वक क्या कह सकते हो?
तुम्हारा नाम और पता कोई पूछे, तो तुम तुरंत जवाब देते हो! अगर कोई यह पूछे कि तुम्हारा व्यक्तित्व कैसा है, तो तुम्हारे पास क्या उत्तर है?
जांच-पड़ताल शुरू कर दो।
अपने-आपको परखने लगो। अपना पूर्ण परिचय प्राप्त कर लो!
ऐसा करने से तुम्हारा व्यक्तित्व का चरित्र तुम्हाने मन में आप ही उभर आएगा। प्रेरणा मिलेगी, उत्साह जागेगा और व्यक्तित्व-निर्माण करने का-उसके द्वारा जीवन कार्य सिद्ध करने का सचेत प्रयत्न शुरू हो जाएगा।
ठंडे पहर में आगे न बढ़े, तो धूप के समय हैरान होगे!
(लेखक स्पेन मूल के चिंतक हैं। सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सच्चे इंसान बनो' से साभार)
मनोविज्ञान के एक प्रामाणिक ग्रंथ में व्यक्तित्व की लगभग चार सौ अलग-अलग व्याख्याएं लेखक ने एकत्र की हैं। इतनी अधिक हैं इसलिए एक भी अच्छी न होगी, ऐसा अनुमान सहज ही किया जा सकता है परंतु व्यक्तित्व क्या है, इसका विचार तो हर एक को होता ही है।
व्यक्तित्व कोई रूप नहीं, मजबूत शरीर नहीं, लोकप्रियता नहीं, बुद्धिमत्ता भी नहीं।
व्यक्तित्व में मनुष्य की तमाम शक्तियों - शरीर, बुद्धि, आत्मबल, भावना का समावेश होता है। परंतु जैसे कोई चित्र, सिर्फ चित्रपट और अमुक रंगों से बना हुआ नहीं होता, जैसे कोई भव्य इमारत ईंटों का ढेर नहीं, वैसे ही व्यक्तित्व भी हाथ-पैर या भावनाओं का समुच्चय नहीं। इन शक्तियां का हर एक व्यक्ति में विशेष समन्वय मिलता है, विशेष लक्ष्य की ओर वे दौड़ती होती हैं और इसीलिए विशेष व्यवहार भी इसमें से उपजता है। 'विशेष' शब्द पर भार डाला गया है, क्योंकि यह 'विशेषता' उस-उस व्यक्ति का मुख्य लक्षण होता है।
तुमने मोटरकार का कोई बड़ा कारखाना देखा होगा। मोटरें तैयार होकर, एक के बाद एक संधान-स्थल पर आती-जाती हैं। सब एक-समान! एक-सा इंजन, एक-से पहिये, एक-सी ही चॉप, एक-सी बैठक। रंग की भिन्नता; सिर्फ इतना ही फर्क। परंतु मनुष्य कारखाने में तैयार किया गया माल नहीं है। वह तो एक अद्भुत शिल्पी का सृजन है, जिसके कला-नमूनों की आवृत्ति नहीं होती।
जैसे दो मनुष्यों के अंगूठे की छाप एक-जैसी नहीं होती, वैसे ही व्यक्तित्व भी एक समान नहीं होते। दो पैर और दो आंखें, मन और हृदय, भय और प्रेम, भूख और प्यास आदि में समता होने पर भी प्रत्येक मनुष्य एक अलग, अनोखा, अनन्य व्यक्तित्व है। यह अनोखापन उसका महत्व सूचित करता है। दो मनुष्यों के व्यक्तित्व में उतना ही फर्क होता है जितना कारखाने के माल में और कलाकार के सृजन में।
तुममें तुम्हारा अपना व्यक्तिव है, उसी को तुम्हें विकसित करना चाहिए। दूसरों से तुम्हें प्रेरणा मिल सकती है। "इसका यह गुण मैं अपने में ला सकूं तो अच्छा," ऐसे शुभ विचार तुम्हें कई बार सूझेंगे और महान स्त्री-पुरुषों के जीवन चरित पढ़ते हुए, "मैं इसके सदृश बनूंगा" ऐसा संकल्प तुम्हारे हृदय में उठे बिना रहेगा नहीं। यह प्रेरणा बहुत अच्छी है; परंतु याद रखों कि तुम्हारा व्यक्तित्व तुम्हारा ही है, और यह किसी दूसरे से पृथक है। अंधा अनुकरण मरण ही है।
यशवंतराव चव्हाण जब स्कूल में पढ़ते थे, तब एक दिन शिक्षक ने बालकों से पूछा, "तुम क्या बनना चाहते हो?" किसी ने कहा 'तुकाराम।' परंतु यशवंतराव ने जवाब दिया, "मुझे यशवंतराव चव्हाण बनना है।"
निस्संदेह, आखिर तुम्हें 'तुम' ही बनना है।
गांधीजी और जवाहरलाल जी, दोनों अलग-अलग और दोनों महान। हर एक अपना-अपना व्यक्तित्व रखकर ही एक-दूसरे का साथी बना। फलत: देश और दुनिया के लिए इतना शुभ परिणाम आया। प्रत्येक मनुष्य के लिए दुनिया में अपना-अपना स्थान होता है। तुम्हारा भी! और यह अपना स्थान तुम ही ले सकते हो। तुम्हारे सामने तुम्हारा ही जीवन-कार्य पड़ा हुआ है। इसे तुम हर्ष से उठा लोगे, तो तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाएगा।
यदि एक बार यह बात तुम्हारी समझ में आ जाए तो अपने को तुच्छ समझने, हीनता-गं्रथि से पीड़ित होने, या दूसरों से ईष्र्या करने का अवकाश न रहेगा और यह आत्म-अवज्ञा, हीनता की ये भावनाएं और यह ईष्र्या, कितने ही मनुष्यों को जीवन विनष्ट करने की लिए उत्तरदायी हैं!
तुम्हारी अपेक्षा दूसरा होशियार होगा, अमीर होगा, रूपवान होगा। एक-एक वस्तु को लिया जाए, तो हर एक में तुम्हारी अपेक्षा कोई न कोई बेहतर गुण तो निकलेगा ही और यह बात तो हर एक पर लागू होती है। परंतु इन सब वस्तुओं का जो मिश्रण बनता है, वह कुछ विशेष है, वह तुम्हारा ही है और वह तुम्हें समाज में अपना विशेष स्थान दिलाएगा।
नाटक में अलग-अलग पात्र भाग लेते हैं। राजा भी होता है और विदूषक भी। लेकिन इनाम हमेशा राजा को ही मिले, ऐसा होता नहीं। विदूषक अपनी भूमिका राजा की अपेक्षा अच्छे ढंग से अदा करे तो उसे ही इनाम मिलेगा।
व्यक्तित्व की विशेषता से, तुम्हें यह एक महत्वपूर्ण पाठ मिलता है कि दुनिया में तुम्हारा स्थान है और से प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने व्यक्तित्व का उत्साहपूर्वक सर्वागीण विकास करना है। परंतु साथ ही साथ, तुम्हारा एक कर्तव्य उपस्थित होता है, और वह है तुम्हें अपना स्वभाव, अपना मिजाज, अपने संस्कार, अपनी अच्छी-बुरी आदतें, अपने सिद्धांत, अपने आदर्श, अपनी बुद्धि और भावनाएं अर्थात् अपना व्यक्तित्व परख लेना है।
प्रथम ज्ञान है आत्मबोध।
यह किसी सिद्धात्मा का गुरुमंत्र नहीं, परंतु व्यक्तित्व निर्माण का पहला व्यावहारिक नियम है। बहुत से मनुष्य शिक्षित और संस्कारी भी -अपने आपको बराबर परखते नहीं, यह वास्तविकता है। अनेक भूलों और निष्फलताओं का कारण यही अज्ञान है।
कॉलेज में विज्ञान या कला या वाणिज्य विषय चुनते करते समय और उसमें भी अर्थशास्त्र या साहित्य, इंजीनियरिंग या डॉक्टरी चुनते समय, विद्यार्थी की कितनी ही भूलें शिक्षकों को दुखी हृदय से देखनी पड़ती हैं। इन भूलों के अनेक कारण होते हैं, लेकिन उनके मूल में विद्यार्थी का ही - अपनी रुचि, स्वभाव एवं कुशलता विषयक घोर अज्ञानता होती है।
प्रभावशाली जर्मन विद्यार्थी के. एफ. गार्ड्स सत्रह वर्ष की आयु तक निर्णय नहीं कर सका था कि वह भाषाशास्त्री बने या गणितशास्त्री। सौभाग्य से उसी अरसे में, एक रात, उसने समबाहुकोण त्रिभुज की रचना विषयक एक महत्व की शोध की और इस शोध के आनंद में ही गणित विषय को अपनाने का निर्णय किया। ठीक समय के इस निर्णय से उसका वास्तविक जीवन-कार्य उसे मिल गया। उसका सारा दीर्घ जीवन गणित की उच्च सेवा से दीप्त हो उठा और उसके कार्य से गणित के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया।
तुम्हारा स्वभाव कैसा है? किस प्रकार के मित्रों को तुम पसंद करते हो? तुम्हारे संबंध में दूसरे क्या-क्या सोचते हैं? भविष्य के लिए तुम्हारे मन में कौन-कौन सी कल्पनाएं घूमती रहती हैं? "क्या करने से मेरा जीवन सार्थक होगा?" इस प्रश्न का अपने मन से तुम कैसा जवाब दोगे? "मैं भावनाप्रधान हूं, विचारशील हूं या व्यवहारकुशल हूं?" इस विषय में तुम विश्वास-पूर्वक क्या कह सकते हो?
तुम्हारा नाम और पता कोई पूछे, तो तुम तुरंत जवाब देते हो! अगर कोई यह पूछे कि तुम्हारा व्यक्तित्व कैसा है, तो तुम्हारे पास क्या उत्तर है?
जांच-पड़ताल शुरू कर दो।
अपने-आपको परखने लगो। अपना पूर्ण परिचय प्राप्त कर लो!
ऐसा करने से तुम्हारा व्यक्तित्व का चरित्र तुम्हाने मन में आप ही उभर आएगा। प्रेरणा मिलेगी, उत्साह जागेगा और व्यक्तित्व-निर्माण करने का-उसके द्वारा जीवन कार्य सिद्ध करने का सचेत प्रयत्न शुरू हो जाएगा।
ठंडे पहर में आगे न बढ़े, तो धूप के समय हैरान होगे!
(लेखक स्पेन मूल के चिंतक हैं। सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सच्चे इंसान बनो' से साभार)
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