Wednesday, 25 December 2019

मैथिली भाषामे सरलीकरणक अपरिहार्यता

  
मैथिली कथित ‘मानक जाति’कँे मानकिकरणसँ चलि रहल अछि । प्रत्यक्ष रुपसँ एकतर्फी ओहि मानकिकरणकेँ आमजनपर थोपरल जा रहल अछि । मातृभाषामे शिक्षाक नामपर कथित लेखकद्वारा लिखल गेल असान्दर्भिक, अवैज्ञानिक आ त्रुटिपूर्ण पाठ्यपुस्तक आ पाठयसामग्रीसभ बालमनोविज्ञानपर नकारात्मक प्रभाव छोडि रहल छैक । 


दिनेश यादव(Dinesh Yadav)

विषय प्रवेश :
देश–विदेशमे सामाजिक आ सांस्कृतिक जागरणक नव परिच्छेद आरम्भ भए चुकल अछि । नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र सेहो अहिसँ कोनाकेँ अछूत रहि सकैत अछि । जन–सामान्य अपन–अपन भाषा, अधिभाषा, उपभाषा आ बोलीकेँ मान्यताक लेल आतुर देखमामे आबि रहल अछि । ओ शासन, शिक्षा, उद्योग, वाणिज्य, मनोरञ्जनसहित भाषामे सेहो कोनो दशामें अपन सहज अधिकार छोडबाक मनस्थितिमे नहि छहि । ‘पाटल’ कें जनवरी (१९५४) अङ्कमे लेखक रामविलासकँे एकटा लेख ‘मैथिली और हिन्दी÷नागार्जुन’ शीर्षकमे प्रकाशित छैक । ओ लिखैत छथि, ‘मैथिली कोनो भाषा नहि, एकटा बोली मात्र थिक ’(गद्यकोश डट ओआरजी) । ६५ वर्ष पहिले लिखल
आलेख अखनो समयसान्दर्भिक बुझाइत अछि । किछु सहरीबाबु आ परियोजना चलौनिहारसभहक कारण मैथिली ठामेठाम अछि । हमरा बिचारसँ मैथिलीके आब बोलीक रुपमे आगा बढैयबाक अपरिहार्यता भए गेल अछि । भाषाक रुपमे बढौलाहसँ नेपालक दोसर सबसँ बेसी बजैवला भाषा रहितो एकर दूर्दशा ककरोसँ छुपल नहि अछि । तेँ एकरा बोलीकेँ रुपमे आगा बढाउ, मैथिली चोटीपर जरुर पहुँचत ।  
हरेक भाषाक अपने नमनीयता आ स्वीकार्यता होएत छैक । सभमे हजारोंकेँ जुबान आ जिभक मिठास समेटल गेल रहैत छैक, तेँ ओ समृद्ध, सर्वव्यापी आ सर्वस्वीकार्य रहैत छैक । मुदा मैथिलीमे ई गुण दुर्लभ अछि, नहि भेटैत छैक । भेटबो करत त ओहिमे पोलिस कयल मात्र, जे सबकेँ पढय आ लिखयकेँ सुगमतासँ बड दूर रहैत छैक । खास ककेँ मैथिलीकेँ अपन संकुचित आ निर्धारित आकार देबाक लेल किछु गोटा सदखनि तयार रहैत छथि । ओ रहताह सहरमे आ बात करता गामकें । मैथिली सबसँ बेसी बजैयवला जनसंख्या अखनो गामघरमे रहैत छथि । मुदा ओकरासभहकेँ वाईपास करैत मैथिलीकेँ मानकीकरणक बिन्दू निर्धारण कएल जाइत अछि आ कएल सेहो गेल अछि । ऐतह ई कहै दि जे मैथिलीकेँ मानकीकरण अवश्य चाही, मुदा ओहीमे ग्राम्य बोली आ टोनक प्राथमिकता आ बहुल्यता रहबाकँे चाही । 
 सरल मैथिलीक फ्याक्टर:
मैथिलीभाषी क्षेत्रमे भाषाक अन्तिम निर्णय नहि शासक वर्गक इच्छा पर होएत आ नहि नोकरी–पेशा आ बुद्धिजीवि वर्गकेँ फतवासँ होएत । सहरी क्षेत्रमे बसोबास करैवला लोकसभसँं सेहो मैथिलीकेँ विषयपर निर्णय लेबाक सक्षम किमार्थ नहि भए सकैत अछि । ऐतह सोभियत भूमिपर भाषा समस्यापर भेल विवादक चर्चा समचिनी बुझाइत अछि । ओतह भाषाक विवाद भेलाक बाद
स्तालिन कहने रहैथ, ‘सीमित लोकक भाषाकेँ आधारमानि जर्जिया प्रदेशक भाषा–समस्याक हल असम्भव अछि, भाषाक समस्या किसान करत जे जमिनसँ जुडल छथि आ देशसँ संपृक्त अछि, आ अहि समस्याकँे समाधानबाद अनुगमन श्रमिकसभ करताह । ’ स्तालिनक ई कथन नेपालक सन्दर्भमे लागू होए । किसान–मजदूरक सरल भाषिका, भाषा, बोली, शैली आ लय मैथिलीकँे पाठयपुस्तक, पाठ्यसामग्री, साहित्य, आख्यानसहितमे समावेश होए । किएक तँ मैथिलीकँे सरलीकृत नहि बनाकँे ई जनभाषा नहि बनि सकैत अछि । किछु गोटामे कुट–कुट आ रग–रग भरल संकिर्णतावाद, जातिबाद, अपनत्ववाद, परिवारवाद, पत्निवाद, काकावाद, भावोवाद, भतिजावाद, भाञ्जावाद, कार्टेलिङवाद, गुटवाद, समूहवादकेँ तोडबाक अवस्था आब आबि गेल अछि ।  मैथिलीकेँ कवि आ कथाकार ब्राह्मण आ मुंशिसभकेँ पण्तिताऊ मैथिलीकँे छोडिकेँ बहुजन समाजक सरल मैथिलीदिस उन्मुख होमाक लेल सविनय आग्रह अछि । मैथिली क्षेत्रक आमजनसभ किएक कहि रहल छथि जे ‘मैथिली हमर नहि, ई आनक भाषा थिक ।’ अहिपर गम्भिर भँ सोचय पडत । 
मैथिली कथित ‘मानक जाति’कँे मानकिकरणसँ चलि रहल अछि । प्रत्यक्ष रुपसँ एकतर्फी ओहि मानकिकरणकेँ आमजनपर थोपरल जा रहल अछि । मातृभाषामे शिक्षाक नामपर कथित लेखकद्वारा लिखल गेल असान्दर्भिक, अवैज्ञानिक आ त्रुटिपूर्ण पाठ्यपुस्तक आ पाठयसामग्रीसभ बालमनोविज्ञानपर नकारात्मक प्रभाव छोडि रहल छैक । जे बच्चा मैथिली मातृभाषामे शिक्षा लए
रहल छहि, ओ स्कूल आ घरक भाषा बीचक कठीन द्वन्द्वमे दोलन कए रहत छहि । घरक बोली आ शैली एकटा आ पढाईके भाषाशैलीमे फरकपन होइते समस्या स्वभाविक अछि । किछु गोटा अपन हित आ स्थार्थकँे प्राथमिकतामे रखलाक कारण समस्या गम्भिर बनल अछि । बालसामग्री वा बालसाहित्यकेँ लेखनमे भाषाक सरलताक विशेष महत्व होयत अछि, जे बच्चाक कोमल मनपर सृजनात्मक प्रभाव पारैत छहि । मनोरञ्जन आ ज्ञानवर्धकसंगैह तथ्य सभकँे सीधा संप्रेषणीय बनेबाक चेष्टा होमाक चाही, भाषाक सरलताकँे ध्यान देबाक चाही, बाल साहित्यमे । आमसाहित्यमे साहित्यकार अपने स्तरकँे अनुसार लिखैत छथि आ पाठक ओकर व्याख्या अपने अनुसार करैत छथि । बालकक लेल लिखैयवला पुस्तक/साहित्यमे बालमनपर केन्द्रित भए भाषा आ शैलीमें सुगम बोधगम्यतापर ध्यान देल जाइत छैक । मुदा नेपालक प्राथमिक कक्षामे लागू भेल पाठ्यपुस्तकसभमे बालमनोविज्ञानक धज्जी उडाओल गेल बात अध्ययनके क्रममे देखारमे आयल अछि । 
मैथिलीकेें कठिन शब्द :
मैथिलीमे बिना कर्ता, कर्म, लिङ आ बचनकेँ मैथिलीक क्रियापद वाक्यबोध कराबैयवला शब्दसभ बड बेसी भेटैत छहि । उदाहरण देखू– मारलिअइन, मारलहुन, मारलथिन, मारलकइन, मारलथुन, मारलह, मारलक, मारलए, मारलही......। हिन्दीमे मात्र ‘मारा’ आ नेपालीमे ‘पिटे, पिट्यो वा पिटियो’ लिखलासँ भए जाइत अछि । तेँ मैथिली कठिन अछि । ओना किछु लोक मैथिलीमे कठिन
कर्ता आ कर्मकँे विशेषताक रुपमे प्रसंशा करैत छथि । मुदा आमजनकेँ लेल ई मैथिलीप्रतिकेँ विकर्षणक कारण बनि सकैत अछि ।  तेहेन नहि होए, ताहिलेल कठिन शब्दक प्रयोग ग्राम्यजनकेँ ध्यानमेँ राखैत होए । जन सामान्यके प्राकृत जीभ पर जटिल पण्डिताऊ शब्दावलीसभहक कील नहि ठोकल जाए । क्लिस्ट शब्दक एकटा अउर उदाहरण देखू–अंग्रेजीक एक सरल वाक्य ‘हि वेन्ट’ के मैथिलीमे प्रसंग अनुसार अनुपाल सात रुपमे कएल जाए सकैत अछि (ओ गेल, ओ गेलैक, ओ गेलहु, ओ गेलनि, ओ गेलाह, ओ गेलथिन आ ओ गेलथुन )। 
बोलीचालीमे मैथिली मुदा जौ ई पाठयसामग्रीकँे स्वरुपमे अबैत अछि त ‘आनक’ भाषा बनि जाइत छैक । प्रतिनिधिमूलक उदाहरण देखू– मैथिलीभाषी क्षेत्रमे सबसँ बेसी लोकक कण्ठ आ जिभसँ बोलल जाइत अछि, ‘बाबु गौ तु कतह गेल रही ? या बाबु तुँ कतह गेल छलह (बोलीचालीमें), लिखित रुपमे– ‘बाबु अपने कतेह गेल छलौहए ?’ अहि तहरे बोलाई आ लिखाईमे फरक अछि, भेटत । जौ लिखित रुममे तिसरा वाक्यकेँ सहि मानब तहन उपरका दूई शैलीक प्रयोग करैवलासभहकलेल समस्या नय भेल ? ओ सब जे बजैत छथि सेहा लिखता, लेकिन ओकर मान्यता जौ ‘मानकिकरण’केँ पक्षपाति सभ नय देताह त ओकरासभहक बोली कोनाकेँ मैथिली भेल ? मैथिलीप्रति अपनत्व कोनाकेँ रहतै ? आम मैथिलीजन सभहक ई एकटा गम्भिर आ यथार्थपरक प्रह्न सदखनि उइठ रहल छहि जे ‘हम जे बजैत छी ओहे लिखाए ।’ कोनो भी भाषाक मानकिकरणमे सबसँ बेसी बजैवला आ प्रयोग होमेवला शब्द, बोली, लय, तर्ज, भाषिकाकेँ प्रमाणिक आ बैधता मानल जाइत छहि । अहिमे शब्द विन्याससँ लकेँ वाक्य विन्यासधरि सर्वव्यापी मान्यताक प्रयोग होयत अछि । मुदा मैथिलीमे ई नहि भेटत, किएक ?
मैथिलीमे किछु ऐहनो शब्द अछि , बोलैत कालक उच्चारण आ लिखैत कालक शैली फरक भए जाइत अछि । उदाहरण देखू– ‘नय’ कँे ‘नहि’, ‘ऐछ’ केँ ‘अछि’, ‘मिलय’ केँ ‘मिलैत’, ‘छैथ’ के ‘छथि’, ‘अल्ता’ के ‘अलता’, ‘पिलौ’ के ‘पीलहूँ’, ‘क्लास’ के ‘किलास’......लिखत जाइत अछि । तहिना ‘ काटे’ के ‘काटए’, ‘घुरबै’ के ‘घुराबए’, ‘सबकोय’ केँ ‘सभकेओ’ , ‘चिन्हाउ’ केँ
‘चिन्हवाउ’, ‘क्लास’ केँ ‘किलास’, ‘उनैटक’ केँ ‘उनटिक’, ‘विवाह’ केँ ‘विआह’,‘चिन्ह’ केँ ‘चीन्हि’, ‘देलकै’ केँ ‘देलकैक’....लिखल भेटैत छय । एहि तहरकेँ शब्द सभके संग्रहित ककेँ मैथिली भाषाकँे बोलीक रुपमे स्वीकार्यता बढेनाय उचित अछि । मैथिलीमे विविधता अपरिहार्यता भए गेल अछि । 
‘उ’ आ ‘ऊ’ के प्रयोगमे नेपाली आ मैथिलीमे फरक देखल गेल अछि । उदाहरण देखू–निर्देशनात्मक शब्दावलीसभ– ‘करू’, ‘बुझू’, ‘लिखू’, ‘भरू’.....मे दीर्घिकार(बढका) अछि । ‘बताउ’, ‘देआउ’, ‘बनाउ’, ‘मिलाउ’......आदि निर्देशनात्मक शब्दसभमें ‘ह्रस्व’(छोटका) कियैक ? अहिसँ भाषा अउर जटिल बनि जाइत अछि । देखल कि गेल अछि जे लेखक सभ नेपाली आ हिन्दी दुनू शैलीक प्रयोग केलाक कारण मैथिलीके क्लिस्टता पैघ भँ गेल छैक । नेपालीमे निर्देशनात्मक शब्दसभमेँ ‘ऊ’ केँ प्रयोग भेल अछि । ‘बताऊ’, ‘देखाऊ’, ‘मिलाऊ’.......लिखल जाइत छैक । उदाहरण ः मैथिलीमे– ‘जोडा मिलाउ’, नेपालीमे –‘जोडा मिलाऊ’ ... लिखल भेटैत अछि । अनाहकँे मैथिलीमे मौलिकता खोजबाक बलजोरि किएक ? मैथिलीमे ऐहन शब्दक पाछामे ‘उ’ लिखबाक उद्देश्य कि ? जहाधरि नेपालीय मैथिलीकेँ बात छहि, नेपाली राष्ट्रिय भाषा भेलाक कारण ‘ऊ’ के प्रयोग करब त पढैय आ लिखैय लेल सहज आ सरल होएत । किएक त नेपालमे नेपाली भाषा त पढैय पडत ।  
हिन्दीक प्रभाव आ प्रयोग : 
मैथिली आन भाषासभकेँ आगन्तुक शब्दसँ भरलपुरल अछि । खास ककेँ शब्द चयनमेँ हिन्दी भाषा÷शैलीकँे प्रभाव बेसी देखल गेल अछि । तहूूमे नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्रमे बजैवला लोकक बोली/शब्द/भाषिकासँ बेसी मधुवनी आ दरिभंगावला सम्भ्रान्त जाति ‘इलिट क्लास’क लोकक बोली, शैली आ तर्जकेँ प्राथमिकता देल जाइत अछि । आम मैथिलीजन सुगमता आ सहजतापूर्वक पढैय आ लिखैय ताहि उद्देश्यसँ लिखल नय भेटैत अछि । सामान्य शब्दकेँ सेहो एतेक ने क्लिस्ट बना दैत छैक जे अंग्रेजी आ संस्कृति सन भाषासँ बेसी भैरगर बैन जाइत अछि  । मैथिली देवनागरीमे लिखब प्रचलित अछि । हमरा बिचारसँ एहाँ उचित माध्यम भँ सकैत अछि । मुदा मैथिली भाषाक लेखन शैली, शब्दक उच्चारण हिन्दीमे करब अनुचित । मैथिली अभियानी सभ हिन्दी भाषाकेँ धुर विरोध त करैत छथि मुदा लेखन शैलीमे ओकरे अनुशरण करैत छथि । प्रतिनिधिमूलक उदाहरण देखू– हिन्दीमे ‘कँे’, ‘द्वारा’ आ ‘मे’ शब्दमे नहि जोडाइत अछि । मैथिलीमे बहुतो लेखक सभ ओहे शैली अपनेने छथि । हिन्दी खडी बोली अछि तेँ वाक्यक अन्त्यमे पूर्णविराम (।) लिखैत छहि, मैथिलीमे वाक्यक अन्तमे बिन्दू (.) किएक नहि लिखल जाए ? कमसँ कम अन्तर्राष्ट्रिय शैलीक महशुस त सबगोटाकेँ होएत । 
मैथिलीमे ‘नहि’ आ हिन्दीमे ‘नहीं’, अहिमे लेखनशैली मात्र फरक छहि, उच्चारणक दृष्टिसँ ब्राह्मण आ ब्राह्मणेत्तरमे फरक भए सकैत अछि , गइर मैथिलीभाषी त एकरा हिन्दीएवला उच्चारण करैत भेटत । ताहिलेल ‘नहि’केँे बदलामें ‘नय’ लिखलासँ होएत । मैथिलीकेँ जौ भाषा मानल जाए त ‘फोनिटिक्स वा उच्चारणशास्त्रक प्रयोग होए । जौ मैथिली ‘बोली’ छी त जन–जनके जिभकँे एहिमे समावेश कियैक नहि ? हमर अपन तर्क अछि जे मैथिली भाषा नहि बोली थिक । भाषाक रुप संकुचित आ बोलैयवला सभ सीमित होइत छैक आ भेटैत अछि । भाषा व्याकरणपर आधारित लिखल आ बोलल जाइत अछि । स्वरयन्त्र ओकर उच्चारणक आधार होएत अछि । मैथिलीमे भाषाक रुपमे ब्राह्मण आ कायस्थ(कर्ण) जातिक बोलीकेँ सुच्चा मैथिली मानल गेल अछि, मानल जाइत अछि । ई एकटा तीत यथार्थ बनल अछि । ई दू जाति बाहेककेँ लोकसभकेँ बोली आ भाषिकाक शैलीमे कोनो सरकारी दस्ताबेज नय भेटैक छहि । भेटबो करैत अछि त रुपान्तरित ढाँचामे मात्र । मोहन भारद्वाजक ‘डाक–दृष्टि’ एकर एकटा प्रतिनिधिमूलक निक उदाहरण भए सकैत अछि । ओ ब्राह्मणेत्तर छलाहए, हुन भाषाक शैलीके मानकीकरण जबरजस्ती कएल गेल भेटैत छैक । अहि तरहे मानसिकताक कारणे मैथिली पाछा अछि । जाधरि मैथिलीमे आमजन नहि जुडत, मैथिली ठेङहुनिया कतबो दैत रहत ,आगा नहि बैढ सकत । मैथिलीकेँ बोलीकँे रुपमे लकेँ आगा बढब आ अहिकँे लेल सर्वमान्य ‘मानक’ निर्धारण करब त मैथिली वृहत्त आ व्यापक बनत । किएक त , मैथिलीकँे बोलीमे गामघरक स्वाद आ आमजनक जीभक बेसी प्रतिनिधित्व होएत छहि
। ‘बोली’केँ मानकिकरणक माध्यम बनाओल जाए । अहिसँ मैथिलीमे लोकक अपनत्व बढत, व्यापकता आयत, मैथिली सभकेँ छियैक से संचार होएत । मैथिली बाजैयवला क्षेत्रकँे विभिन्न स्थान पर मैथिलीक कठिन आ उच्चारण करबामे समस्या देखल गेल शब्द सभकेँ छनौटक लेल वृहत्त सम्मेलन या गोस्टि कराकेँ निरकौल निकालल जा सकैत अछि । 
तहिना अधिकांश पुस्तकसभमे अंग्रेजी शब्दक मैथिली उच्चारण आ लिखाई हिन्दी भाषामे कयल जाइत अछि । अंग्रेजीकेँ ई उदाहरण : ‘ब्लैकबोर्ड’, ‘टैग’, ‘एंटीभाइरस’, ‘फौरेनर्स, लैंग्वेजेज, कैलेण्डर....हिन्दीमे लिखल जाइत अछि । नेपाली क्रमशः ‘ब्ल्याकबोर्ड’ , ‘ट्याग’, ‘एन्टिभाइरस’, ‘फोरेनर्स’, ‘ल्याङ्वेजज’, क्यालेण्डर लिखाएत अछि । 
मैथिलीकेँ अपन सुच्चा जनवोली रहितौ ‘केतारि’ आ ‘मुँहदूसी’ के बदलामे क्रमशः ‘ऊखि’ आ ‘उल्लू’ प्रयोग भेल अछि (हमर मैथिली पोथी,२०५४–६४) । ई दुनू हिन्दी शब्द अछि ।  ‘मैथिलीक सुच्चा (शुद्ध) शब्द फिलस्टीनक हिब्रुई भाषासँ सेहो आयल अछि । मुदा अपन मौलिक भाषाक प्रयोग पाठ्यपुस्तक सभमे नहि भेटैक छैक । श्रीश चौधरी सोलहटा हिब्रुई शब्दक उदाहरण देलनि अछि जे मैथिलीमे थोडेक अन्तरसंग प्रयुक्त अछि । शीत (ठंढा), मीत (मित्र), फोला (फोडा), कीन (खरीदब) प्रभृति शब्द मूलतः हिब्रुई भाषाक अछि (फोरेनर्स एण्ड फोरेन ल्याङ्गवेजेज इन इन्डिया, पृ.७८)
 मैथिली सरलकृत बनेबाक प्रयास:

सन २००८ अक्टोबर १५ मे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिलीके सरलकृतसंगैह मानक निर्धारणक प्रयास कएने रहैक । पत्रिका किछू बिन्दूसभ सार्वजनिक सेहो कएने रहैक । मैथिली अकादमी, पटना आ नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनिद्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त २०३ टा बिन्दूपर मनन कए निर्णय लेबाक लेल पत्रिका आग्रह कयने रहैक । ओहिमे जनबोली केर किछु शब्दवाली सेहो राखल गेल छलैह । उदाहरण– ‘दरबज्जा’ या ‘दरबाजा’, ‘तोँ’ या ‘तू’ँ, ‘बरदी’ या ‘बर्दी’, ‘गरमी’ या ‘गर्मी’, ‘कतहू’ या ‘कहीं’, ‘उमरिगर’ कि ‘उमरगर’, ‘धोल’÷‘धोअल’ या ‘धोएल’, ‘शिकाइत’ या ‘शिकायत’, ‘निन्न’ या ‘निन्द’, ‘बिनु’ या ‘बिन’, ‘छह’ या ‘छ’ , ‘गेलाह’ या  ‘गएलाह’ , ‘देलखिन्ह’/‘देलकिन्ह’ या ‘देलखिन’, ‘देखलन्हि’/‘देखलनि’ या ‘देखलैन्ह’......विदेह पत्रिकासँ रैंडमली लेलगेल ई बिन्दूसभकँे आ कतेक लागू कएलक वा भेल से जानकारीमे नहि आयल अछि । व्यक्ति आ प्रकाशकपिच्छे लिखाई शैली फराक–फराक भेटैत छैक । भाषाशास्त्री लोकनिकेँ सुझाब जनबोलीकँे पक्षपाति नहि भए सकत कहि विरोध सेहो भए रहल अछि । विरोध करैवलासभ कहैत छथि जे बोलीक आधारपर मैथिली भाषा लिखल जाए । मुदा कथित ‘मानक जाति’वलासभ से असम्भव बात कहैत अपन अनुकूल लिख रहल छथि । जिदियाहासभहक लेल भाषाक विद्वान एवं लेखिका शेफालिका वर्माके ई कथन मननयोग्य भए सकैत अछि । नवभारत टाईम्समे ओ अपन ब्लगमे लिखैत छथु, ‘मैथिली भाषा कोनो सरल सुबोध भाषा नहि थिक जे अनजान आदमी सेहो समैझ आ पैढ सकत । एकर व्याकरण, मुहावरा बहुत क्लिस्ट होइत अछि ’(नवभारत टाइम्स, ७ जुन २०१७) । मैथिलीमे कोनो तरहे क्लिस्टताकेँ अन्त होमाक माग जोडतोडसँ भए रहल अछि । अहिपर मैथिलीक विद्वान लोकनिके ठोस निर्णय आ बिन्दू सार्वजनिक होए , से अपेक्षा बहुतोकेँ छनि ।  
पाठ्यपुस्तकँे जटिलता आ एकरुपताकेँ अभाव :
एकैहटा लेखकसभ सम्मिलित भए लिखल पाठ्यपुस्तकमे सेहो एकरुपता नहि भेटैत छैक । ‘हमर मैथिली पोथी’ नामक पाठ्यपुस्तकमे एकैह क्लासमे सेहो फरक–फरक रुपमे लिखल गेल भेटैत अछि । दोसर क्लासक मैथिली पोथीमे पृष्ठ ५१ मे ‘मनुक्ख’ आ पृष्ठ ५८ मे ‘मनुक्ख’ लिखल गेल अछि । पहिल क्लासक पाठ्यपुस्तकमेँ ‘छत्ता’(पृ.१०) आ दोसर क्लासक किताबमे ‘छाता’ (पृ.४१) लिखल अछि । प्राथमिक कक्षाकेँ विद्यार्थीसभकेँ लेल लिखलगेल पुस्तकमेँ ओहोमे सरकारीस्तरके पुस्तक आ मैथिली अभियानीके अभिमान कएनिहारक लेखनीमे जौ एकरुपता नहि छैक त आनाक बात छोडि दिऔह । एकैहटा शब्दक दू तरहे प्रयोगकेँ ई दूटा प्रतिनिधिमूलक उदाहरण मात्र थिक । बच्चासभकँे पढबैयवला किताबमे एहि तहरे देखल जाइत अछि त आन पाठ्यपुस्तकक कि हाल होएत ? ऐतबी नहि पाठ्यपुस्तक लेखनकँे सिद्धान्त अनुसार पुस्तककँे लेखक अपन रचना समावेश नहि करैत छथि । मुदा मैथिली पोथीमे महान लेखकसभ पहिने अपने रचनासँ पाठ शुरु कएने छथि । ओहूँमे एकटा लेखक महाशय अपन दूटाधरि कविता छपने छथि । बालमनोविज्ञानमेँ फरकशैली, फरक प्रस्तुतिक लेल उत्सुकता बेसी रहैत छैक, एकैहटा व्यक्तिकेँ नामसँ जौ एकसँ बेसी सामग्री भेटत तँ बच्चासभहक मानसिकता केहेन तरहे होएत ? पाठ्यपुस्तक जेहन महत्वपूर्ण सामग्रीमे बालमनोविज्ञानक धज्जी उडाओल गेल छैक । अहि आलेखमे सबटा समेटबाक लेल स्तम्भकार असमर्थ छथि । एकटा उदाहरण दए अहि विषयक विश्राम देव । देखू –दोसर किलासक हमर मैथिली पोथीके पाठ १६ मे ‘सफाई’ शीर्षकमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिक कविता छापल छनि । कविताक विषयवस्तु एकटा छैक आ अभ्यासक लेल राखल गेल सामग्री(अभ्यास २) फरक छहि । पाठ्यपुस्तकमे राखल गेल पाठकेँ विशिष्ट उद्देश्य प्राप्तिक लेल पाठसँ सम्बन्धित प्रश्न वा अभ्यास राखल जाइत अछि । ऐतह पाठमे उल्लेख नहि भेल शब्दसभ ‘धरि’,‘दिस’,‘तक’ आ ‘फेर’ के प्रयोग करबाक अभ्यास देल गेल अछि । विषयवस्तुसँ सम्बन्धित प्रश्न नहि छैक त ओ पाठ्यपुस्तक अति खराब सूचिमे राखल जाइत अछि । अभ्यासमेँ बेमेल सामग्री अछि । कक्षा १ कँे किताबमे पाप–पुण्यके अमूर्त बात ‘ऋषि–मुनिजनके काजसँ पाप पडाइछ समाजसँ’, वालमनौविज्ञानविरुद्धमे बालिकाके दुर्घटनादिस उत्प्रेरित करैवला सामग्री ‘ घरक चारपर बैसल कौआ, पकड दौगल छोटका बौआ’ आ ‘धनुष–वाण जे चलबैए, वीर–धुरन्धर कहबैए’...सेहो प्रकाशित अछि । अवोध बालबालिकाक लेल अहिसँ बढिके अन्याय आर कि भए सकैत अछि ? अहि तरहे पाठ्यपुस्तक मैथिली क्षेत्रमे पठाओल जाइत अछि । आब कहूँ ऐहन पाठुयसामग्री लोक कियैक पढौताह ? आलेखमे जतेक सामग्री उदृत कएने छी सभटा प्रतिनिधिमूलक मात्र थिक ।   
लेखकपिच्छे फरक शैली:
अधिकांश अंग्रेजी शब्दक मैथिली उच्चारण आ लिखाई हिन्दी भाषामे कयल जाइत अछि । अंग्रेजीकेँ ‘ब्लैकबोर्ड’ आ ‘टैग’ एकर उदाहरण अछि । अंग्रेजिए शब्द लिखब त ‘ब्ल्याकबोर्ड’ आ ‘ट्याग’ कियैक नहि लिखल जाए ? अहिसँ नेपालीय मैथिलीभाषीकँे सेहो सहजता होएत । नेपाली लेखकक पुस्तकमे ‘केँ’, ‘मे’, ‘सँ’ के जोडिकेँ मैथिलीमे वाक्य लिखल गेल अछि, जे नेपालीय मैथिली भाषीके लेल बेसी सहज अछि  । 
मुदा भारतीय लेखकक पुस्तकमे विरोधाभाष देखल गेल अछि । मोहन भारद्वाजकेँ पुस्तक ‘डाक–दृष्टि’ ई अक्षर सब नहि जोडल गेल छैक (डाक दृष्टि, पृ.६८–६९, २०१२) । विश्द्ध हिन्दी शैलीमे लिखल गेल अछि ।  

डा.महेन्द्रनारायण रामकेँ पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति मे जातीय–जीवन’ मे सेहो हिन्दी शैली अपनाओल गेल छैक । मुदा अहि पुस्तकमे एकरुपता नहि दे खमामे अबैत अछि (पृ.१२७) । नेपाली लेखकक सब नेपाली शैलीमे लिखल भेटैत छैक ।
 
नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानद्वारा प्रकाशित ‘आडन’ मे बृषेश चन्द्र लालक ‘झरोखासँ’ मे ई शैली भेटैत अछि जेना–देहकेँ, दिमागकें, गर्वसँ, अनुभूतिमे...लिखल छैक (सट स्क्रिन, पृ.६९)

मैथिली लेखक एवं साहित्यकार रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ के ‘एंटीवायरस’ कथा संग्रहमे सेहो नेपाली शैली अपनाएल गेल अछि । मुदा अंग्रेजी शब्द सबहक उच्चारणमे हिन्दी शैली अवलम्बन कयल गेल अछि , अहि बातक उदाहरणक रुपमे पुस्तकक शीर्षक ‘एंटीवायरस’ के लेल जा सकैत अछि । नेपाली उच्चारणमे ‘एन्टिभाइरस’ होमाक चाहिं । एहि कथा संग्रहक एकटा विशेषता ई जे पुस्तक भारतमेँ छपलोके बाद वाक्य विन्यांशमे नेपाली शैली भेटैत छैक (देखूःसट स्क्रिन, पृ.७३) ।  

पुस्तकक एकटा विशेषता चाहिँ अधिकांश हिन्दी मुदा उच्चारणमेँ हिन्दीके प्रभाव कियैक ? ओहि पारक मैथिलीमे लिखबाक शैली कनिक भिन्न देखल देल अछि । मुदा उच्चारकमे हिन्दीकेँ प्रभाव बहुत अछि । 
सयपत्रीमे प्रकाशित एहि स्तम्भकारक अनुशंधानमुलक आलेखमे नेपालीय आ भारतीय दुनू लेखकक प्रभाव भेटत । दुनू पारक सामग्रीके अध्ययनक प्रभाव आ मान्युटली अहिके लेल कोनो तरहे मापदण्ड नहि भेलासँ एहेन तरह लिखल गेल अछि । ओहुना खास ककेँ ब्राह्मणेत्तर जातिकेँ लिखल मैथिली मे अहि तरहे समस्या देखल गेल अछि । चाहे ओ डा. महेन्द्रके होए या आन कोनो गोटेके । ताहिलेल मैथिलीमे एकटा शैली पुस्तिका अपरिहार्य भँ गेल अछि । विद्वान लोकनि से आग्रह जे सर्वमान्य शैली सार्वजनिक होए । अपने –अपने तरहे शैली अनुचित अछि । हाँ शैली बनबति समय आमजनक लेल सहज, सुगम आ सरल होए, ताहि पर ध्यान होए । ब्राहम्णेत्तर जातिके एकटा अपन तरहे शैली छैक (देखू स्क्रिन सट, सयपत्री, २०७५)


मैथिलीके सरलीकरणक उपाय:

मैथिली शब्दावलीके जहाधरि भए सकेँ नेपालीकेँ लेल तय भेल शब्दावलीक नदजीक रखनाय दूरदृष्टिक बात होएत । अंग्रेजी शब्दक उच्चारण आ मैथिलीसँ मिलैयवला शब्दसभकेँ नेपाली शैलीमे अपनाओल जेबाक चाही । कियैक त हरेक शब्दक लेल भाषावैज्ञानिकसँ पुइछके निश्चित नहि कयल जा सकैत अछि । अहिसँ नेपालीमे चलि चुकल शब्दकँे उपयोग होएत आ मैथिलीके ‘रि–इन्भेन्टिङ द ह्वील’ मे अनावश्यक समय आ श्रमकेँ अपव्यस नहि करए पडत ।   जहाधरि सम्भव होए नेपाली शब्दक प्रयोग कएल जाए । यदि नेपाली उच्चारण आ मैथिली उच्चारणमे फरकपन होए त नेपाली शब्दक मैथिली फोनेटिक्सके मुताबिक ध्वनि–परिवर्तन कएल जाए सकैत अछि । अवधी, ब्रज, मैथिली आदिमे ‘श’ आ ‘ष’ के उच्चारण ‘स’ जका होइत अछि । निर्देश, सदिश, परिवेश आदिकेँ स्थानपर निर्देस, परिवेस आदि लिखल जाए । विभिन्न अंग्रेजी शब्दक उच्चारण नेपालीशैलीमे होए (‘कैलेण्डर’केँ जगह ‘क्यालेण्डर’, ‘ब्लैकबोर्ड’कँे जगह  ‘ब्ल्याकबोर्ड’ प्रयोग कएल जाए । मैथिली–नेपालीमें परसर्ग–उपसर्गमे फरक भ“ सकैत अछि । अहि मामिलामे नेपाली संस्कृतकेँ बेसी निकट छहि, ओहुना मैथिलीमे दरिभंगिया आ मधुबनीया“ छाप बेसी छैय । ओ छाप आममैथिलीजनककेँ लेल पानि पिया रहल अछि, नय पैढ सकैत अछि नय बोलि सकैत अछि । तेँ नेपालीय शैली अपनाओल जाए । अहिस“ मैथिलीमे मौलिकता आ सर्वव्यापकता सेहो बढत । नेपाली शब्द नहि होए त अंग्रेजीकँे शब्दसभकेँ ध्वनि परिवर्तन ककें चलायल जा सकैत अछि । गामघरस“ लकेँ बजारधरि, झोपडपट्टिसँ लकेँ महलधरि प्रयोगमे (सुनाई आ बोलाईमें) आबैयवला शब्द, शैली आ स्वरकेँ उपयोग मैथिलीके सरलीकरणक सूत्र भए सकैत अछि ।   
सारांश : हरेक भाषाक अपने नमनीयता आ स्वीकार्यता होएत छैक । सभमे हजारोंकेँ जुबान आ जिभक मिठास समेटल गेल रहैत छैक, तेँ ओ समृद्ध, सर्वव्यापी आ सर्वस्वीकार्य रहैत छैक । मुदा मैथिलीमे ई गुण दुर्लभ अछि, नहि भेटैत छैक । स्तालिन कहने रहैथ, ‘सीमित लोकक भाषाकेँ आधारमानि जर्जिया प्रदेशक भाषा–समस्याक हल असम्भव अछि, भाषाक समस्या किसान करत जे जमिनसँ जुडल छथि आ देशसँ संपृक्त अछि, आ अहि समस्याकँे समाधानबाद अनुगमन श्रमिकसभ करत । ’ स्तालिनक ई कथन नेपालक सन्दर्भमे लागू होए । किसान–मजदूरक सरल भाषिका, भाषा, बोली, शैली आ लय मैथिलीकँे पाठयपुस्तक, पाठ्यसामग्री, साहित्य, आख्यानसहितमे समावेश होए । किएक तँ मैथिलीकँे सरलीकृत नहि बनाकँे ई जनभाषा नहि बनि सकैत अछि ।(२०७६कात्र्तिक २६, रामभरोस कापडिजीके पत्रिकाक लेल लिखल गेल आलेख)
सन्दर्भ सामग्री:
  1. हमर मैथिली पोथी, पहिल किलास, नेपाल सरकार, शिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालय,पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर, २०५४–६४ ।
  2. हमर मैथिली पोथी, दोसर किलास, नेपाल सरकार, शिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालय,पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर, २०५७–६७ ।
  3. मेरा नेपाली :कथा ५, नेपाल सरकार, शिक्षा मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर, २०५३–७० ।
  4. बृषेशचन्द्र लाल :आङन, झरोखासँ, कथा,  नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान,कमलादी–काठमाडौं, पृ.६९, अङ्क ८, वर्ष १०, विस २०७५ ।
  5. रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ : एंटीवायरस,नवारम्भ, पटना : ६३, एम.आई.जी. हनुमान नगर, भारत, सन् २०१९ ।
  6. डा.महेन्द्रनारायण राम :भारतीय संस्कृति मे जातीय जीवन, शब्द प्रकाशन, नई दिल्ली, सन २०१७ ।
  7. मोहन भारद्वाज : डाक–दृष्टि, मैथिली लोक रंग, शकरपुर दिल्ली, भारत , सन् २०१२ ।
  8. दिनेश यादव :सयपत्री, ‘मैथिली भाषा आ साहित्य : समस्या आ समाधान’,नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान,कमलादी, काठमाडौं, विस २०७५ ।
  9. श्रीश चौधरी :भारत में विदेशी लोग एवं विदेशी भाषाएँ, राजकमल प्रकाशन, भारत, २०१८ । 
  10. गद्य कोश डट ओआरजी÷जीके÷मैथिली और हिन्दी/नागार्जुन 
  11. विदेह :प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ,पृ.९९–१०६  १५ अक्टोबर २००८
  12. शेफालिका वर्मा : ब्लग्स डट नभभारतटाइम्स डट इन्डियाटाईम्स डट कम, ७ जुन २०१७ ।













Friday, 20 September 2019

मैथिली मानक की सच्चाई

हिन्दी भाषा 

नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र में वर्षौ से भाषा के मानक पर विवाद रहा हैं । इस विवाद का समाधान किए बेगर कथित ‘मानक जाति (उच्च जाति)’ की भाषिका, शैली, लब्ज, तर्ज, लेखनी और उच्चारण को ‘मैथिलीभाषी बहुसंख्यक निम्न जाति’ पर थोपारा जा रहा हैं । नेपाल में नेपाली के बाद दूसरे सब से अधिक बोली जानेबाली भाषा है मैथिली । सरकारी आँकडोें के मुताबिक कूल आबादी के ११ दशमलव ०७ फिसदी लोगों की यह भाषा हैं । खास करके पूर्वी और मध्य तराई–मधेस के कुछ हिस्सो मे यह विभिन्न भाषिका के रुप मे बोली जाती हैं । परन्तु वहाँ कथित उच्च जाति के बाहेक अन्य के बोली/भाषिका को ‘शुद्ध मैथिली’ की मान्यता नही है । भारत बिहार मधुवनी के पाँच कोष बृत मे रहने बाला उच्च जाति (ब्राह्मण सहित के तीन जातिय समूह) का ‘मैथिली बोली’ को अघोषित रुप से नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र मे विभिन्न माध्यमों के द्वारा मानक के तौर पर प्रचार में लाया जा रहा हैं । नेपाल सरकार भी इस प्रचार शैली की पृष्ठपोषक बनि हुईं हैं । इसके ठोस प्रमाण सरकारी संचार माध्यम भी हैं । गोरखापत्र मे मैथिली पृष्ठ, रेडियो नेपाल में मैथिली समाचार (अभि बन्द हैं), नेपाल टेलिभिजन मे मैथिली कार्यक्रम और प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित होनेबाली पत्रिका सहित के सरकारी अनुदान मे संंचालित संचार माध्यम ० दशमलव ८३ फिसदी आवादी की भाषिका को प्रचार कर रही हैं । विद्यालयस्तरीय मैथिली मातृभाषा की पाठ्यपुस्तक और पाठ्यसामग्री भी उसी अभियान के दूसरे रुप हैं । इसिलिए तो इन सभी मे कथित ‘मानक जाति’ के लोगो को ही जिम्मेवारी दिई गई हैं औ दिई जाती रही हैं । अन्य बहुसंख्यक जाति के लोगों को अघोषित रुप से बन्देज है या वहिष्कार किया गया हैं । अपनी वास्तविक चोली बदल कर पद, अवसर और सुविधा पाने के लिए बेचैन कुछ स्वार्थी लोक उसी अभियान के पृष्ठपोषक बने हुए हैं । और ब्राह्मणवादी के पद्चिन्ह पर चल्ने को वह अपने को ज्यादा सुरक्षित और आराम महशुश करता हैं । 
एक अध्ययनके मुताबिक खास करके ब्राह्मणवादीयों की कब्जा में सभी सरकारी संचार माध्यम है ।  इन माध्यमों मे उच्च जातिय समूह के कायस्थ और राजपूत समुदाय समेत को दरकिनार करते हुए, सिर्फ ब्राह्मणवादी की हालिमुहाली देखने को मिलती हैं । यहाँ कुछ अपवाद को छोडकर नीजि क्षेत्र सहित के बात करें तो कमोवेश सतप्रतिशत की आँकडा पार कर सकती हैं, जिसमे ब्राह्मणवादी की एकतर्फी दबदबा हैं । वह लोक प्रतिभाशाली है, इसिलिए इस आँकडे मे उनका योगदान है, ऐसी बात नही । यह सब ब्राह्मणवादीयो की कलुषित मानसिकता के ही उपज और देन है,कहने मे किसी को संकोच नही होनी चाहिए । कथित ‘मानक मैथिली’ भाषा थोपरने की संकीर्ण लालसा और दबंग सोच का ही यह परिणाम हैं । सरकारी पत्रिका गोरखापत्र में कुछ वर्ष पहले मैथिली पृष्ठ के संयोजक से गैर–ब्राह्मण को वैसे ही नही हटाया गया था । इस बारे मे गोरखापत्र के एक पूर्व कार्यकारी सम्पादक महोदय ने इस स्तम्भकार को बारबार कह चुके है, ‘मैथिली भाषाके मानक गोरखापत्र के द्वारा समाप्त किया जा रहा है कहते हुए ब्राह्मणवादी लोक सम्बन्धित निकाय में डेलिगेसन लेकर के गए थे और अन्तर्गोत्वा गोरखापत्र से उसे खडेर दिया गया , उस पृष्ठ से दरकिनार किया गया । ’ गोरखापत्र के ही वह पत्रकार सिरहा के हैं, जहाँ सब से अधिक मैथिली भाषा बोली जाति है । यह तो एक प्रतिनिधिमूलक उदाहरण भर हैं । ब्राह्मणवादी कहते तो है, ‘अहाँ जे बजैत छ, ओहे मैथिली (आप जो बोलते है, वही मैथिली)’ । परन्तु यह सिर्फ नारा में सिमट सी गई है, व्यवहार मे यह कही भी नही दिखती हैं । इतना ही नही ब्राहमणवादी लोक ‘कथित मैथिली मानक’ के नाम पर कुछ कठपुतलिया भी खडे करते हैं । उसके माध्यम से भी अपना उल्लू सिधा करने मे लगे रहते हैं । बडी दुःख की बात हैं स्तुतिगान और गणेश परिक्रमा मे रमने बाले कुछ लोक आसानी से उनके कठपुतलिया बन जाते हैं । और मैथिली भाषी बहुजन समाज के लोगों की भाषिका और बोली को बलि की बेदी पर चढा देतें हैं । आम मैथिलीजन की जिव्हा के मिठासपूर्ण और माँ की गरिमामय बोली की गला घोंटने की अभिन्न अंग वह बन जाने हैं । 

नेपाल संघियता मे जाने के बाद बना प्रदेश मे सब से अधिक भाषा विवाद प्रदेश २ मे देखा गया हैं । इसके बहुत से कारणों मे ब्राह्मणवाद भी एक हैं । वहाँ की कूल आवादी मे ४५ दशमलव १८ फिसदी लोगों की मातृभाषा मैथिली हैं । बाँकी ५४ दशमलव ८२ फिसदी भोजपुरी, बज्जिका, मगही, थारु, उर्दू, नेपालीसहित के भाषाभाषी की हैं । तथ्यांक विभाग और त्रिभूवन विश्वविद्यालय केन्द्रिय समाजशास्त्र और मानवशास्त्र विभाग के ‘ सोसल इन्क्लुजन एटलस अफ नेपाल(भाग १ और २)’ के मुताबिक सप्तरी मे तीन चौथाई (७९ दशमलव १४ फिसदी) से अधिक लोगों की मातृभाषा मैथिली हैं । इसमें शून्य फिसदी से कम जनसंख्या बाले ‘मैथिली भाषी उच्च जाति’ के भाषिकाको कथित मानक के रुप मे प्रचार किया जा रहा हैं । जिला मे बाँकी १० दशमलव ४० फिसदी थारु, ४ दशमलव ११ फिसदी नेपाली और ३ दशमलव ८३ फिसदी उर्दू भाषी हैं । सिरहा मे ८५ दशमलव ८२ फिसदी, धनुषा मे ८५ दशमलव ७८, महोत्तरी मे ८० दशमलव ५८, सर्लाही मे ४९ दशमलव ०२, रौटहट मे ३, बारा मे ३ दशमलव ८२ और पर्सा मे ५ दशमलव १० फिसदी लोक मैथिली बोलते है । इन सभी जिलों मे भी मैथिली ब्राह्मणवादीयों की आबादी शून्य फिसदी से भी बहुत कम हैं । परन्तु उसके ही लेखनी, बोली, शैली, भाषिका अन्य बहुसंख्यक मैथिली भाषी को मानने के लिए बाध्य किया जा रहा हैं । 

दूसरे प्रमाणों के रुप में नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित सामग्रीयों को भी लिई जा सकती है । यह स्तम्भकार के एक अध्ययन के मुताबिक प्रतिष्ठान के अधिकांश प्रकाशित सामग्री मे मैथिली ‘मानक जाति’ के ही कब्जा हैं । प्रकाशनों मे उसी जाति के लोगो की रचनाएं और आलेखों की ढेर लगी हुई हैं । जमिनी और ग्रामिण लोगोंको उस मे  निस्तेज किया गया हैं । यहाँ मैथिली पत्रिका के २०७६ अंक ८ को उदाहरण के तौर पर लिया गया हैं । पत्रिका मे कूल ३० सामग्री प्रकाशित हैं । जिसमे २० रचना÷आलेख (६६.६७ फिसदी) उच्च जाति के लोगों का ही हैं । बहुसंख्यक मैथिलीभाषी जाति के सिर्फ ८ रचना÷आलेख (२६.६६ फिसदी) और २ अन्य जाति के द्वारा लिखा गया सामग्री समावेश किया गया है, जो सिर्फ ६.६७ फिसदी हैं(तालिका देखें)


पत्रिका मे बहुमत जाति के आवादी बाले लोगोको खास करके दलित, मुसलमान और जनजाति को वहिष्कृत किया गया हैं । पत्रिका में मानक थोपने की भग्मग्दूर प्रयास किई गई है । आङन पत्रिकाके भाषा स्तम्भ में ‘एक राष्ट्र–एक भाषा नीति’ की आलोचनाए की गई हैं । मैथिली मे मानक जाति के भाषिका लागू करनेकी  बात जोरदार रुप से उठाया गया हैं । इसिलिए तो उस स्तम्भ मे बहुसंख्यक मैथिली भाषी के  प्रसंग आते ही लेखक महोदय अनुत्तरित हो जाते है और ‘प्रश्नवाचक चिन्ह’ रखते हुए आगे निकल जाते हैं (आङन २०७६ः२२ः२९ः३०) । प्रज्ञा प्रतिष्ठान के इस वार्षिक पत्रिका मे मैथिली अभियानयानी के रुप मे एक गैर ब्राह्मणका छोडकर बाँकी सभी उच्च जातिको उस सर्वमान से नाबाजा गया हैं । उसके मानक भाषिकाको लाधने का काम किया गया हैं । सब से अचम्भित बात तो यह हैं सम्पादकीय मे एक ब्लग साइटको विवादास्पद मानक जैसे सम्वेदनशिल विषय मे विज्ञापन के शैली मे प्रयोग मे लगा गया हैं । ब्लगको आथिकारिक तौर पर सरकारी मान्यता नेपाल मे कही नही है , उसको सरकारी पत्रिकाले प्रचार मे लाया हैं । पत्रिका मे एक लेखक महोदय ने मानक मैथिली और मानक जातिके नाम पर सत्यनारायण भगवान की कथा, विद्यापति पर्व, मैट्रिमोनियल साइट, मैथिली मसाज थेरैपी को आधार बनाकर तथ्यहीन बात और सप्रमाणित विषय को उजागर करन की कुचेष्टा किया गया मिलता हैं । अल्पसंख्यके भाषिका को बहुसंख्यक वा बहुजन के भाषिका बाले पर थोपना बन्द हो । 
-दिनेश यादव 
(काठमाण्डू से प्रकाशित होनेवाली हिन्दी मासिक पत्रिका ‘द पब्लिक’ के लिउ ५ सेप्टेम्बर २०१९ (२०७६ भादव १९) मे लिखी गई यह आलेख । )


Thursday, 19 September 2019

वर्णाश्रम

हिन्दी पुस्तक 

  • रामधारी सिंह दिवाकर

पंडित वचेश्वर झा की प्रसन्नता की ओर-छोर नहीं था। हाथ में एक हज़ार रुपए का मनीऑर्डर फॉर्म लिए वे स्वयं में समा नहीं रहे थे। मनीऑर्डर की जो कटिंग डाकिए ने उन्हें दी थी उसमें उनके पुत्र गुणानन्द का आह्लादित और आश्वस्त करता एक वाक्य यह भी था-‘माँ भगवती की कृपा से अब प्रतिमाह मनीऑर्डर भेजता रहूँगा।...’
युग-युग जिओ ! सुपुत्र ! युग युग जिओ ! शतायु भव !....शक्ति के परमोपासक पंडित वचेश्वर झा दालान की ‘ओलती’ के नीचे खड़े देवी भगवती के ध्यान में लीन हो गए-
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽ स्तुते।।....
उनके उन्मीलित नेत्रों के समक्ष जैसे साक्षात् भगवती ही अवतरित हो गई थीं। शुभ और मंगल-कामना के श्लोक वे गुनगुनाते रहे-
करोतु सा : शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:।।....
उनकी ध्यान मुद्रा तब टूटी, जब वैशाख महीने के तीसरे पहर की तपती धूप छिन्न-भिन्न छप्पर की राह आकर उनके गंजे सिर पर ऊधम मचाने लगी। उन्होंने दालान की छप्पर देखी और मुस्कराए। सहसा उन्हें सुखद विभ्रम-सा हुआ कि फूस की यह गिरने-गिरने को हो आई दालान सीमेंट-कंक्रीट के पक्के मकान में बदल गई है।
दहलीज लाँघते हुए वे अंदर आँगन में गए। पंडिताइन ओसारे पर बैठी चावल की खुद्दियों में से कंकण बीन रही थी। माँ की बगल में बैठी पुत्री कलावती मूँज की डाली-मउनी बीनने में व्यस्त थी। छोटी पुत्री लीलावती अंदर खाट पर लेटी हुई थी।
पंडित वचेश्वर झा चुपचाप ओसारे की छाँह में जाकर खड़े हो गए और उद्ग्रीव-से होकर इस प्रकार ध्यानस्थ हो गए, जैसे अपर लोक की अंतर्यात्रा कर रहे हों। विचलित और चकित पंडिताइन सूप में खुद्दियों को ज्यों का त्यों छोड़ पति को देखने लगी, क्या हो गया इनको ? कलावती भी मूँज और टेकुनी हाथों में लिए आश्चर्यित अपने पिता को देखने लगी। स्वयं में इस तरह निमग्न पिता कभी दिखे नहीं। क्या हो गया इनको ?


घबराई हुई-सी पंडिताइन पति के पास आई और उनको झकझोरती हुई बोली, ‘‘क्या बात है ? बोलते क्यों नहीं ?’’ पंडितजी के चेहरे पर अपूर्व आभा-सी थी। दाहिनी मुट्ठी खोलते हुए उन्होंने आंतरिक प्रसन्नता से रूँधी आवाज में कहा, ‘‘देखो....गुणानंद ने रुपए भेजे हैं- पूरे एक हजार और यह भी लिखा है कि देवी माँ की कृपा से प्रतिमाह रुपए भेजता रहूँगा।’’

‘‘तो नौकरी हो गई गुणानंद की।’’ पंडिताइन का बीमार चेहरा एकाएक खिल उठा।
पंडितजी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘हुई ही समझो। वैसे अभी स्थायी नहीं हुई है, लेकिन हो ही जाएगी। सब देवी भगवती की कृपा है।’’
प्रसन्न्ता से भरी पंडिताइन की धँसी आँखों में दुर्दिन की अंतिम विदाई का भाव उभर आया, ‘‘हाँ, सब माँ भगवती की कृपा है। दीजिए रुपए। याद नहीं, कब देखे थे एक हजार रुपए। दीजिए, पहले गौरी को अर्पित कर पूजा-अर्चना कर आऊँ।’’ प्रसन्न मुख पंडितजी ने एक हजार रुपए पंडिताइन के हाथ में रख दिए। पंडिताइन ने हँसती हुई आँखों में कुछ देर रुपयों को निहारा और कलावती को देती हुई बोली, ‘‘हाथ-मुँह धोकर आती हूँ।’’
कुएँ पर हाथ-मुँह धोकर लौटती पंडिताइन देवी मैया के भजन गुनागुना रही थी। कुछ ही देर बाद पूजा-घर में भगवती की प्रार्थना के स्वर गूँज उठे-
जय अंबे गौरी, मैया जब अंबे गौरी।
तुमको निसदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवजी।

कोटिक चन्द्र दिवाकर ....’
पंडित वचेश्वर झा ओसारे पर खड़े सोचते रहे-सब देवी भगवती की कृपा है, लेकिन इस कृपा का माध्यम तो बना है बिलट महतों का बेटा अगमलाल। क्यों न बिलट महतो को अभी इसी समय धन्यवाद दे आऊँ ! उन्हीं की पैरवी से अगमलाल ने नौकरी दिलाई गुणानंद को। बाप की पैरवी न होती तो लाल-जैसा ‘चलती’ वाला अफसर गरीब ब्राह्मण को नौकरी दिलाता ? चपरासी की नौकरी हुई तो क्या, यह नौकरी भी कहाँ मिलती है ! कितने तो बी.ए., एम.ए. वर्षों से सड़क नाप रहे हैं। फिर संस्कृत की मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण गुणानंद को दूसरी नौकरी क्या मिल सकती थी ? कुछ भी है, है तो सरकारी नौकरी।
नहीं, बिलट महतो को धन्यवाद दे ही आना चाहिए। जजमान हैं। शूद्र हैं तो क्या, हैं भले आदमी ! बेचारे अपने ‘खर्चे’ से गुणानंद को पटना ले गए। अपने बेटे के पास रख दिया। पौने दो साल गुणानंद ने अगमलाल का ‘अन्न-पानी’ खाया है। कम बड़ी बात है यह ?

पुरोहिती की गगनवृत्ति पर जीवन-यापन करने वाले पंडित वचेश्वर झा ने जीवन में पहली बार शूद्र बिलट महतो के प्रति कृतज्ञता का अनुभव किया।
सोलकन टोले के बिलट महतो पुश्तैनी जजमान ठहरे पंडित वचेश्वर झा के। बिलट महतो ने अपने पुरोहित को यथोचित सम्मान देने में कभी कोर-कोताही नहीं की, इस बदले युग में नहीं, जब टोले के पढ़ुआ लड़के ब्राह्मणों को लेकर तरह-तरह की जली-कटी बातें करते हैं। ‘हरनी-खगनी’ ‘बर-बेगरता’ जब भी पंडितजी ने अपने जजमान से कुछ माँगा है, बिलट महतो बिना बहाना बनाए देते रहे हैं।
इस सबके बावजूद पंडित वचेश्वर झा ने अपने ब्राह्मण होने की श्रेष्ठता को सदा सुरक्षित रखा है। जजमान की भक्ति और श्रद्धा अपनी जगह ठीक है, मगर बिलट महतो हैं तो सोलकन। हाँ, पानी चलता है उनका। अछूत नहीं हैं। उनकी रसोई का कच्चा खाना तो खैर नहीं खाया जा सकता, मगर व्रत-अनुष्ठान आदि में भर छाँक दही-चूड़ा खाकर सीधा-पानी, दान-दक्षिणा लेकर पंडितजी सहर्ष घर लौटते रहे हैं।
हालाँकि पंडितजी को अब यह प्रतीत होने लगा है कि इस जजमानी से जीवन-यापन होने वाला नहीं है। दुष्कर वृत्ति होती जा रही है पुरोहिती। सोलकनों में कठपिंगल पढ़ने वाले नवतुरिया लोगों के कारण अब धर्म-कर्म के प्रति पहले वाली आस्था नहीं रही। धर्म-कर्म, व्रत-अनुष्ठान, दान-दक्षिणा सवर्ण जजमानों के परिवारों में ही कुछ आस्था रह गई है, लेकिन इलाके में सवर्ण जजमान हैं ही कितने ? फिर एक वे ही तो पुरोहिती करने वाले नहीं हैं ? बभन टोली में पांच-छह घर इसी वृत्ति पर जीते हैं। किसी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। खैर, यह तो ब्रह्माजी का ही शाप है- पौरोहित्य कर्म करने वाले सात्त्विक ब्राह्मण को कभी संपत्ति नहीं रहेगी।
संपत्ति है भी कहाँ पंडित वचेश्वर झा को ! डेढ़ एकड़ जमीन है। आधी एकड़ जमीन जो पिछवाड़े में है, वह तो परती ही पड़ी रहती है। एक ‘बंसबिट्टी’ है उसमें बस। ‘अगवार-पिछुआर’ के लिए तो वह जरूरी ही है। बाकी एक एकड़ जमीन तो बटाई पर ही लगी है। साल-भर में कुछ अनाज पानी आ गया तो आ गया, बाकी बटाईदार की मर्जी। पंडितजी तो कभी देखने भी नहीं जाते कि जमीन में क्या लगाया है बटाईदार ने !
पंडित वचेश्वर झा बिलट महतो को धन्यवाद देने सोलकन टोली की तरफ चले तो भीतरी आह्लाद के बावजूद कुछ यादें भी थीं-विगत अपराध-भाव से जुड़ी यादें ! सोच रहे थे-किस मुँह से कृतज्ञता ज्ञापित करेंगे वे ?
बबुआन टोले में स्थित सरकारी स्कूल में बिलट महतो ने जब अगमलाल का नाम लिखाया था, तब पंडित वचेश्वर झा ने व्यंग्य करते हुए अपने जजमान बिलट महतो से कहा था, ‘‘हौ बिलटू !...अरे, अगमलाल का नाम लिखा दिया है स्कूल में। पढ़ा-लिखाकर हाकिम बनाएगा क्या बेटे को ?’’
बिलट महतो मार खाए मन को दबाते हुए बोले थे, ‘‘नहीं पंडितजी, हाकिम-हुक्काम क्या बनेंगे हमारे बच्चे। बस, थोड़ी ‘बिद्दा’ आ जाए।’’
....हालाँकि बहुत दिन हो गए इस बात को-पच्चीस वर्ष से भी अधिक। याद भी नहीं होगा बिलट महतो को....लेकिन क्या सच में उनको याद नहीं होगा ?
पंडित वचेश्वर झा को अच्छी तरह याद है-जब स्कूल के एक हरिजन शिक्षक के प्रयास से सोलकन टोली के ही नहीं, चमार टोली के भी कुछ लड़के स्कूल में आने लगे थे तो कैसी खलबली-सी मची थी बभन टोली और बबुआन टोली में ! उन्होंने तो अपनी आँखों से देखा था। अपने ही टोले के कुछ लड़के अगमलाल को सड़क पर घेरकर तंग करते थे, ‘‘रौ अगमा !...अरे, सारे कुत्ते काशी चले जाएँगे तो हड्डियाँ कौन चाटेगा रे ? राड़-सोलकन सब पढ़बे करेंगे ?’’
याद है पंडितजी को। स्कूल के हेड पंडितजी ने जब गाँव में सूचना दी कि अगमलाल वर्ग में प्रथम स्थान पाता है तो चिढ़ाने वालों की हँसी बंद हो गई थी। शिक्षकों में दो छोड़ बाकी सब तो ब्राह्मण ही थे। चाहते तो अगमलाल को वर्ग में प्रथम स्थान नहीं भी दे सकता था। बभन टोली या बबुआन टोली के किसी लड़के को प्रथम स्थान दे देते, लेकिन शायद वह युग ही कुछ दूसरा था।
और जब मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में अगमलाल ने मेरिट लिस्ट में पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो ‘पिल्ही चमकी’ बभन टोली या बबुआन टोली के लोगों की। कैथ टोली के लड़के तो परीक्षा-फल में ठीक—ठाक रहे, लेकिन बबुआन टोली और बभन टोली के कुछ लड़के द्वितीय श्रेणी में निकले और कुछ खींच-खाँचकर पास हुए। आधे से ज्यादा अनुत्तीर्ण । ऐसे अनुत्तीर्ण लड़कों ने बापों या अभिभावकों से पिटाई भी खाई, ‘‘साले, दिन-भर हीरोपनी करते रहेंगे। छोंड़ी सबके पीछे बेहाल रहेंगे। फेल नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ? देखो तो बिलट महतो के बेटे अगमलाल को ! साला सोलकन होकर जिले में फस्ट आया है।...’’
बेटे के परीक्षा फल से बल मिला बिलट महतो को। स्कॉलरशिप भी मिली थी अगमलाल को। फिर बिलट महतो की अच्छी खेती-बाड़ी थी। सपरिवार मजदूर की तरह लगे रहते थे खेती में। किसी से पेंचा-उधार लेते नहीं थे।
अगमलाल को शहर भेज दिया पढ़ने के लिए। आई.ए. बी.ए. और एम.ए. की परीक्षाओं में भी अगमलाल ने अच्छे अंकों से उत्तीर्णता पाई। बी.पी.एस.पी. की प्रतियोगिता परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर जब अगमलाल को अफसरी मिली तो बभन टोली और बबुआन टोली में पहली बार हाय-तोबा मची। कैथ टोली के लोग तो दवात-पूजा वाली जाति के ठहरे। कहीं न कहीं, किसी न किसी नौकरी में लग ही जाते हैं, बभन टोली और बबुआन टोली से तो अब तक या तो सेना में लोग गए या शिक्षक, क्लर्क सिपाही वगैरह बने। अफसर तो कोई निकला ही नहीं इन दोनों टोलों से।
सबसे तीव्र प्रक्रिया बभन टोली में हुई। अन्तत: पंडितों ने यही सोचकर मन को संतोष दिलाया कि चलो, अगमलाल जैसे दो चार शूद्र अफसर बन भी गए तो कौन-सा पहाड़ ढह जाएगा ? राज तो ब्राह्मणों का ही है। सभी क्षेत्रों में नीचे से ऊपर तक तो ब्राह्मण ही ब्राह्मण हैं। फिर हमारी चाहे पुरोहिती वृत्ति ही क्यों न हो, हैं तो हम ब्राह्मण देवता ! सारे सामाजिक-धार्मिक विधि-निषेध तो हम ब्राह्मणों से ही सुनिश्चित होते हैं। अगमलाल चाहे कितना भी बड़ा अफसर बन जाए, रहेगा तो शूद्र ही। ब्राह्मण अनपढ़ भी रहे तो क्या, पूजनीय ही रहता है। भक्त शिरोमणि तुलसीदास की उक्ति को झुठला सकता है कोई ?
पूजिय विप्र सील गुन हीना।
नहीं सूद्र गुन ग्यान प्रवीना।..
लेकिन ये सारी बातें मन को सांत्वना तो देती थीं, मस्तिष्क को समझा नहीं पाती थीं। जिस दिन जीप लेकर अगमलाल बभन टोली के रास्ते से अपने घर आया, उस दिन सोलकन टोली में कीर्तन-भजन और भोज-भात के आयोजन हुए और बभन टोली-बबुआन टोली में चुप्पी छाई रही।
 -दीवाकर रामधारी सिंह । २००४। नयाँ दिल्ली– किताबघर प्रकाशन ।  _

खुम्च्याईँदै आरक्षण













 ‘सेवा छान्न पाउने व्यक्तिको अधिकार हो’ भन्ने आबाज चारैतिर गुञ्जिन थालेपछि नेपालका सत्ताजाति र राज्य संचालकले आरक्षणको मागलाई स्वीकार्य गरेको हो, अब आयोग उल्टो दिसातर्फ लागेको हो कि भन्ने महशुश धेरैले गर्न थालेका छन् । संविधानमै भएको व्यवस्था उल्टयाउने प्रयास हुनु दुखद छ । अझ संविधानको प्रस्तावनामै समानुपातिक समावेशिकताको सुनिश्चिताको प्रतिबद्धता व्यक्त गरिएको छ । त्यसलाई निमोठने प्रयास कतैबाट भयो या भईरहेको छ भने रोक्नु पर्छ । 

दिनेश यादव 




नेपालमा ०५० को दशकसम्म प्राविधिक र शिक्षकबाहेक अन्य सरकारी सेवामा मधेसीको प्रवेश न्यून रहेको कुरो सर्वविदितै छ । निजामती सेवाका कर्मचारीलाई मात्र त्यस्ताका प्रमाणपत्रहरुको प्रतिलिपी एटेस्टेट (प्रमाणित गर्ने) अधिकार थियो । फलस्वरुप सरकारी कलेजमा प्रवेशदेखि अन्य कुनै सरकारी प्रयोजनका लागि आवश्यक पर्ने प्रमाणपत्रहरुको प्रतिलिपि एटेस्टेट गर्न त्यसताकाका मधेसीले धेरै सास्ती खेपे । अहिले भने त्यो समस्या पूर्ण रुपमा समाधान नभएपनि केही सरलीकरण चाही भएको छ । सरकारले नै सीमित प्रयोजनबाहेक धेरैमा यो परिपाटीको अन्त्य गरेको छ । स्वयं व्यक्तिलाई जिम्मेवार बनाउन आफ्ना प्रमाणपत्रहरुलाई स्वप्रमाणित गर्ने प्रचलन धेरै ठाउँमा लागू भएको देखिन्छ । ‘सक्कल बमोजिम नक्कल ठीक छ’ भन्दै आफ्नो हस्ताक्षर धस्काउने चलन शायद त्यसैको परिणाम हो । यद्यपी, जुन ठाउँमा सरकारी अधिकृतको हस्ताक्षर गरिएको प्रतिलिपी अनिवार्य छ, त्यहाँ अझै पनि मधेसीलाई समस्यै छ । तर मधेसीलगायतका समुदाय अधिकृत बनेपछि केही सहजता भने महशुश गरिदैछ ।

वर्षौसम्म शून्यकै हाराहारीमा रहेको निजामती सेवामा मधेसीको प्रवेश र उपस्थिति पछिल्लो समय बाक्लिदै गएको थियो । त्यसको प्रमुख कारण समानुपातिक आरक्षणको व्यवस्था नै थियो, हो । ०६४ यता धेरै मधेसी, जनजाति लगायतका समुदाय निजामती सेवामा सजिलै प्रवेश पाएका छन् । लोकसेवा आयोगको ०७२ सम्मको आठ वर्ष अवधिमा १८ सय २२ जना मधेसीले आयोग पास गरेका थिए । त्यो क्रम वर्षेनी बढदै थियो । तर अब त्यसलाई संकुचित बनाउने प्रपञ्च रचिँदैछ । यसको सिकार सिंगो मधेसी मात्रै होइन, आरक्षणको क्याटगरीमा परेका समुदाय समेत हुने निश्चित छ । आयोगको तथ्यांक अनुसार ०६४–७२ सम्मको अवधिमा आदिवासी/जनजातिका २३ सय ४९ जना, दलितका ७ सय ४९, पिछडिएको क्षेत्रबाट २ सय ८५ जनाले लोकसेवा परीक्षा पास गरि निजामती सेवामा प्रवेश गरिसकेका छन् । ती समुदायले पाएको यो सफलता आरक्षणकै बलमा भएको निस्कर्षमा पुग्न कसैलाई गाह्रो नपर्ला । आरक्षणको फाइदा अन्य समुदायलाई पनि उत्तिकै भएकै छ । निजामती सेवामा समावेशीतर्फ सिफारिस गरिएका कर्मचारी संख्या तालिकामा हेर्न सकिन्छ । आरक्षणबाट लक्षित समूहहरु महिला, आदिवासी/जनजाति, मधेसी , दलित, अपाङ्गता भएका व्यक्ति र पिछडिएका क्षेत्रलगायत लाभान्वित भइरहेकै थिए । तर, सतप्रतिशतमा कब्जा जमाउनेहरुले यसलाई अंश खोसेको रुपमा लिइरहेका छन् । अब चाही त्यसलाई रोक्ने प्रयास शुरु भएको जस्तो भान हुन थालेको छ । त्यसैको ठोस प्रमाणका रुपमा लोकसेवा आयोगले पछिल्लो समय स्थानीय तहका लागि गरेको विज्ञापनलाई लिन सकिन्छ । 


आरक्षणमाथि नै ग्रहण लाग्ने गरि गरिएको विज्ञापनले धेरैलाई चिन्तित तुल्याएको छ । ‘सेवा छान्न पाउने व्यक्तिको अधिकार हो’ भन्ने आबाज चारैतिर गुञ्जिन थालेपछि नेपालका सत्ताजाति र राज्य संचालकले आरक्षणको मागलाई स्वीकार्य गरेको हो, अब आयोग उल्टो दिसातर्फ लागेको हो कि भन्ने महशुश धेरैले गर्न थालेका छन् । संविधानमै भएको व्यवस्था उल्टयाउने प्रयास हुनु दुखद छ । अझ संविधानको प्रस्तावनामै समानुपातिक समावेशिकताको सुनिश्चिताको प्रतिबद्धता व्यक्त गरिएको छ । त्यसलाई निमोठने प्रयास कतैबाट भयो या भईरहेको छ भने रोक्नु पर्छ । नेपाली संविधानको धारा ३८(४), ४०(१),४२(१) र २८५ ले महिला, दलित, मधेसी , थारु, जनजाति, मुस्लिम, पिछडा वर्गसहित राज्यका निकायहरुमा समावेशी समानुपातिक रुपमा सहभागी हुन पाउने हकको ग्यारेन्टी गरेको छ । सरकारी सेवाको गठनबारे धारा २८५ (२) मा ‘संघीय निजामती सेवा लगायत सबै संघीय सरकारी सेवामा प्रतियोगितात्मक परीक्षाद्वारा पदपूर्ति गर्दा संघीय कानुन बमोजिम खुला र समानुपातिक समावेशी
सिद्धान्तका आकार हुनेछ भन्ने पनि उल्लेख छ । संविधानमा समानुपातिक समावेशिकतालाई प्रष्ट रुपमा व्यख्या गरेको अवस्थामा सेवाका लागि योग्य व्यक्तिको छनौेट गर्ने जिम्मा पाएको निकायका पदाधिकारीले बदमासी गर्न थालेको छन् । उसले आफनै अनुकूलको व्याख्या गर्दै विज्ञापन गरेपछि आन्दोलन शुरु भएको छ । यसो त, निजामती सेवा ऐन, २०४९(दोस्रो संशोधन, २०६४) अनुसार ५५ प्रतिशत खुला र ४५ प्रतिशत आरक्षणबाट पदपूर्ति गर्नुपर्ने कानुनी व्यस्था छ । यसै ऐनमा आरक्षित ४५ प्रतिशतलाई शतप्रतिशत मानेर महिलालाई ३३, आदिवासी जनजातिलाई २७, मधेसीलाई २२, दलितलाई ९, अपाङ्गता भएकालाई ५ र पिछडिएको क्षेत्रलाई ४ प्रतिशत सिट आरक्षित गरिएका छन् । 

तर, लोक सेवा आयोगले संघीयताको मूल मर्म र समानुपातिक समावेशी सिद्धान्त विपरित गरेको पछिल्लो विज्ञापनले राज्यबाट वर्षौसम्म विभेदमा पारिएका समुदायलाई आन्दोलनमा उत्रन बाध्य भएका हुन । उनीहरुले सेवा आयोगको असमावेशी विरुद्ध विरोध प्रदर्शन गरिरहेका छन् । ‘आरक्षण बचाऔं’ आन्दोलनमा आदिवासी जनजाति, मधेसी, दलित, मुस्लिम, अल्पसंख्यक सबै होमिएका छन् । चर्का नारा पनि दिइरहेकै छन् । तर कहि कतै सुनुवाई भएको छैन । मधेस केन्द्रीत दलहरु यो आन्दोलनमा औपचारिक रुपमा प्रतिक्रिया नजनाएपनि कार्यकर्ताहरु भने सक्रिय देखिन्छ । विभिन्न जातिय संघ/संगठनसंग कार्यगत एकता गर्दै अगाडि बढ्ने मुडमा आन्दोलनरत पक्षहरु छन् । यसका लागि उनीहरुले लुई कोसरको सिद्धान्तलाई समेत अगाडि सारेका छन् । कोसरका अनुसार सामान्य समयमा विभिन्न समुदायका आआफ्नै प्राथमिकता हुने गरेपनि विषम परिस्थितिमा आफ्ना विशिष्ट प्राथमिकतालाई विर्सेर सामुहिक प्राथमिकताको लागि सामूहिक शत्रूविरुद्ध एबै एकजूट हुनुपर्छ ।
नेपालमा अहिले त्यस्तै अवस्थाको सिर्जना भएको भान सर्वत्र हुने थालेको छ । राज्यले आफूहरुको अधिकारलाई कुन्ठित पारेको भन्दै बालुवाटार घेराउसम्मको आन्दोलन गरे । त्यहा दमन भयो । तर पनि आन्दोलनकारीले हार मानेको संकेत देखिदैन । आरक्षणको पक्षमा सक्रिय रहेकामध्ये काशिन्द्र कबिरले आफ्नो फेसबुक पेजमा लेखेका छन्, ‘ आरक्षणको अपहरणको विरुद्धमा लडौं, कानुनी राज्य र समावेशी लोकतन्त्रको विरुद्ध लडौं । ’ उनले यो आन्दोलनाई समावेशी समानुपातिक प्रतिनिधित्व र समाजिक न्यायका लागि लडाई भनेका छन् । पहिचान, आत्मसम्मान र स्वाभिमानको लागि यो आन्दोलनमा सबैलाई साथ दिन आग्रह समेत गर्दै आएका छन् । अर्का आन्दोलनकारी रकम चामलिङले फेसबुक वाल मार्फत नै आन्दोलनमा जनहभागिताको महत्व उल्लेख गरेका छन । उनले लेखेका छन् , ‘ शान्तिपूर्ण आन्दोलनमा शक्ति प्रदर्शन भनेको जनसहभागिता नै हो ।’

उत्पीडन  र विभेदमा परेका जनताको भारी मत पाएर जितेकाहरु सिंहदरबार पुगेपछि साच्चिकै सिंहको भूमिकामा देखिन थालेका छन् । उनीहरुले नियुक्त गरेकाहरुले एक पछि अर्को गर्दै विभेदमा परेका वा पारिएकाहरुको अधिकारलाई कुन्ठित बनाउँदै लगेको आरोप धेरैको छ । आन्दोलन चर्किएकै बेला मधेसी आयोगले विवादास्पद अभिव्यक्ति दिएको भन्दै आलोचना भईरहेको छ । जनकपुरका संचारकर्मी किशोर गुरु आफ्नो वालमा आयोगमाथि व्यंग्य गर्दै लेखेका छन्, ‘ मधेसी जनताको हित हुने कुनै कार्य नगरेपनि तीन महिनामै ३ करोड खर्च गरेको मधेसी आयोगले लोक सेवाको विज्ञापन ऐनबमोजिम भएको भनेको छ । जुन लोक सेवाको विज्ञापन सच्याउन माग गर्दै मधेसी, थारु, जनजाति र मुस्लिम आन्दोलन गर्दैछ ।’ ‘आरक्षण बचाऔं’ अभियान शुरु भएको धेरैपछि साउन २२ मा प्रदेश २ का एक जना सांसदले यसबारे प्रदेश सरकारको धारणा माग गरे । संघीय सरकारले असमावेशी तरिकाले निकालेको लोकसेवाको विज्ञापनबारे प्रदेशमा सत्तारुढ रहेको राष्ट्रिय
जनता पार्टी(राजपा) का सांसद विदेश्वर यादवले संघीय सरकारले समावेशी आरक्षण कटौति गरिएको सन्दर्भमा प्रदेश सरकारको धारणा माग गरेका थिए । त्यसअघि आयोजित एक कार्यक्रममा साउन १९ मा राजपा र समाजवादी पार्टी (सपा) ले आन्दोलनमा जाने बताएका थिए । तर त्यसपछि कुनै पनि प्रतिक्रिया यसबारे नआएको गुनासो आरक्षण बचाउ अभियानमा लागेकाहरुले बताएका छन् ।


अगस्ट ३ मा आरक्षण बचाऔं अभियानमा लागेका एक मधेसी अगुवाले लेखेका छन् ,‘अहिलेको लोकसेवाको असंवैधानिक असमावेशी विज्ञापन संविधानको मूल मर्मको बर्खिलापमा रहेको छ । यसबाट पुष्टि भएको छ कि नेपालमा अहिले पनि लोकतन्त्रमा परिकल्पना गरिएको जस्तो कानुनको शासन नभएर कानुनद्वारा शासनको अभ्यास भैरहेको छ । राजतन्त्रमा औपचारिक रुपमा राजा कानुनमाथि हुन्थ्ये तर अहिले अनौपचारिक रुपमा


एकल जातिय स्वार्थ संविधान र कानुन भन्दा माथि छ । यसमा राज्यको सबै निकायको अघोषित अनौपचारिक सहमति रहेको देखिन्छ ।’ विभेदमा परेका समूदायका मानिसको यो सेवामा चार्मिङ बढ्दै गएपछि मधेसीलगायत अन्य समुदायपनि यता आकर्षित हुनु थाले । तर यो सेवामा नेपालका खस ब्राहम्ण, क्षेत्रीलगायतको बचस्र्पले गर्दा अन्य समुदायको प्रवेश निषेध नै गरिएको जस्तो भान जो कोहीलाई पनि पर्ने गथ्र्यो । हुनपनि हो, यसका लागि हुने गरेको लिखित परीक्षामा मधेसीहरु सफल भएपनि अन्तर्वार्तामा फालिने गरेको गुनासो धेरैको मुखबाट सुनिने गरिएकै थियो । ती तिता अनुभव सुनाउनेहरु तराई–मधेसमा अझै पनि भेटिने गरेकै छन् । पछि निजामती सेवामा मधेसीलगायतका समुदायको प्रवेश सुनिश्चतताको माग उठ्न थाल्यो । अन्य मुलुकमा जस्तै यो सेवामा प्रवेश गर्नेहरुका लागि आरक्षणको माग गरियो । धेरै संषर्घ भए, अनाहकमा धेरैले बलिदान समेत दिनुपर्यो ।

आयोगले पछिल्लो समय गरेको विज्ञापनको थप घट संख्याले उसको नियतमाथि शंका गर्ने ठाउँ दिन्छ (आरक्षित सिट बाँडफाँटमा भएको असंगति उल्लेख गरिएको तालिका हेर्नुस) । तालिका अनुसार विज्ञापनबाट सबैभन्दा बढी घाटा मधेसी, त्यसपछि आदिवासी/जनजाति,दलित , अपाङ्गता भएका व्यक्ति र पिछपिडएको क्षेत्र पर्छन । महिलालाई केही भएपनि फाइदा छ । विज्ञापनमा ऐन अनुसार छुट्टाउनु पर्ने संख्या ९०७ भएकोमा ७६ वटा मात्रै सिटको व्यवस्था गरिएको छ । अर्थात ८ सय ३१ जना आरक्षित सेवाबाट बञ्चित हुने अवस्थामा छन् । त्यस्तै, दलितका लागि ३७१ वटा हुनुपर्नेमा ३० र पिछडिएको क्षेत्रमा १६५ मा दुई जनाका लागि मात्रै विज्ञापन गरिएको छ । यो विज्ञापनमा तुलनात्मक रुपमा महिला र आदिवासीको सिट संख्या केही हदसम्म सन्तोषजनक भएपनि समग्रमा परिणाम निराशाजनक नै छन् ।


अन्त्यमा, संविधानको समानुपातिक समावेशिता र निजामती सेवा ऐन २०४९(दोस्रो संशोधन) अनुसार आरक्षित सिट नछुटयाई विज्ञापन गरिएकोले सच्चाउन आवश्यक छ । सरकारी सेवामा प्रवेशका लागि आरक्षणको फाइदा, लक्षित समुदाय भन्दा धनी , टाठा–बाठा र स्रोत साधनमा पहुँच भएकाहरुले नै बढी पाएको भन्ने कुरो पनि आएको छ । यसमा विमर्श गर्न सकिन्छ तर यसैलाई बहाना बनाएर आरक्षणलाई रोक्न पाईन्न । आरक्षण पाउने महिला, आदिवासी जनजाति, मधेसी, दलित, सीमान्तकृत आर्थिक र सामाजिक रुपमा पछाडि परेका हुनुपर्ने व्यवस्था कानुनमै पनि छ । त्यो कसरी छुट्टायने भन्ने नखुलाइँदा ती समुदायभित्रका प्रभावशाली वर्गले फाईदा उठाईरहेको चाही पक्का हो । तर यो समस्याको समाधान सिट कटौति सक्तैन ।  (काठमाडौंबाट प्रकाशित हुने युवा डट कम मासिकका लागि ०७६ भदौं ९ मा लेखिएको आलेख)