Wednesday, 25 December 2019

मैथिली भाषामे सरलीकरणक अपरिहार्यता

  
मैथिली कथित ‘मानक जाति’कँे मानकिकरणसँ चलि रहल अछि । प्रत्यक्ष रुपसँ एकतर्फी ओहि मानकिकरणकेँ आमजनपर थोपरल जा रहल अछि । मातृभाषामे शिक्षाक नामपर कथित लेखकद्वारा लिखल गेल असान्दर्भिक, अवैज्ञानिक आ त्रुटिपूर्ण पाठ्यपुस्तक आ पाठयसामग्रीसभ बालमनोविज्ञानपर नकारात्मक प्रभाव छोडि रहल छैक । 


दिनेश यादव(Dinesh Yadav)

विषय प्रवेश :
देश–विदेशमे सामाजिक आ सांस्कृतिक जागरणक नव परिच्छेद आरम्भ भए चुकल अछि । नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्र सेहो अहिसँ कोनाकेँ अछूत रहि सकैत अछि । जन–सामान्य अपन–अपन भाषा, अधिभाषा, उपभाषा आ बोलीकेँ मान्यताक लेल आतुर देखमामे आबि रहल अछि । ओ शासन, शिक्षा, उद्योग, वाणिज्य, मनोरञ्जनसहित भाषामे सेहो कोनो दशामें अपन सहज अधिकार छोडबाक मनस्थितिमे नहि छहि । ‘पाटल’ कें जनवरी (१९५४) अङ्कमे लेखक रामविलासकँे एकटा लेख ‘मैथिली और हिन्दी÷नागार्जुन’ शीर्षकमे प्रकाशित छैक । ओ लिखैत छथि, ‘मैथिली कोनो भाषा नहि, एकटा बोली मात्र थिक ’(गद्यकोश डट ओआरजी) । ६५ वर्ष पहिले लिखल
आलेख अखनो समयसान्दर्भिक बुझाइत अछि । किछु सहरीबाबु आ परियोजना चलौनिहारसभहक कारण मैथिली ठामेठाम अछि । हमरा बिचारसँ मैथिलीके आब बोलीक रुपमे आगा बढैयबाक अपरिहार्यता भए गेल अछि । भाषाक रुपमे बढौलाहसँ नेपालक दोसर सबसँ बेसी बजैवला भाषा रहितो एकर दूर्दशा ककरोसँ छुपल नहि अछि । तेँ एकरा बोलीकेँ रुपमे आगा बढाउ, मैथिली चोटीपर जरुर पहुँचत ।  
हरेक भाषाक अपने नमनीयता आ स्वीकार्यता होएत छैक । सभमे हजारोंकेँ जुबान आ जिभक मिठास समेटल गेल रहैत छैक, तेँ ओ समृद्ध, सर्वव्यापी आ सर्वस्वीकार्य रहैत छैक । मुदा मैथिलीमे ई गुण दुर्लभ अछि, नहि भेटैत छैक । भेटबो करत त ओहिमे पोलिस कयल मात्र, जे सबकेँ पढय आ लिखयकेँ सुगमतासँ बड दूर रहैत छैक । खास ककेँ मैथिलीकेँ अपन संकुचित आ निर्धारित आकार देबाक लेल किछु गोटा सदखनि तयार रहैत छथि । ओ रहताह सहरमे आ बात करता गामकें । मैथिली सबसँ बेसी बजैयवला जनसंख्या अखनो गामघरमे रहैत छथि । मुदा ओकरासभहकेँ वाईपास करैत मैथिलीकेँ मानकीकरणक बिन्दू निर्धारण कएल जाइत अछि आ कएल सेहो गेल अछि । ऐतह ई कहै दि जे मैथिलीकेँ मानकीकरण अवश्य चाही, मुदा ओहीमे ग्राम्य बोली आ टोनक प्राथमिकता आ बहुल्यता रहबाकँे चाही । 
 सरल मैथिलीक फ्याक्टर:
मैथिलीभाषी क्षेत्रमे भाषाक अन्तिम निर्णय नहि शासक वर्गक इच्छा पर होएत आ नहि नोकरी–पेशा आ बुद्धिजीवि वर्गकेँ फतवासँ होएत । सहरी क्षेत्रमे बसोबास करैवला लोकसभसँं सेहो मैथिलीकेँ विषयपर निर्णय लेबाक सक्षम किमार्थ नहि भए सकैत अछि । ऐतह सोभियत भूमिपर भाषा समस्यापर भेल विवादक चर्चा समचिनी बुझाइत अछि । ओतह भाषाक विवाद भेलाक बाद
स्तालिन कहने रहैथ, ‘सीमित लोकक भाषाकेँ आधारमानि जर्जिया प्रदेशक भाषा–समस्याक हल असम्भव अछि, भाषाक समस्या किसान करत जे जमिनसँ जुडल छथि आ देशसँ संपृक्त अछि, आ अहि समस्याकँे समाधानबाद अनुगमन श्रमिकसभ करताह । ’ स्तालिनक ई कथन नेपालक सन्दर्भमे लागू होए । किसान–मजदूरक सरल भाषिका, भाषा, बोली, शैली आ लय मैथिलीकँे पाठयपुस्तक, पाठ्यसामग्री, साहित्य, आख्यानसहितमे समावेश होए । किएक तँ मैथिलीकँे सरलीकृत नहि बनाकँे ई जनभाषा नहि बनि सकैत अछि । किछु गोटामे कुट–कुट आ रग–रग भरल संकिर्णतावाद, जातिबाद, अपनत्ववाद, परिवारवाद, पत्निवाद, काकावाद, भावोवाद, भतिजावाद, भाञ्जावाद, कार्टेलिङवाद, गुटवाद, समूहवादकेँ तोडबाक अवस्था आब आबि गेल अछि ।  मैथिलीकेँ कवि आ कथाकार ब्राह्मण आ मुंशिसभकेँ पण्तिताऊ मैथिलीकँे छोडिकेँ बहुजन समाजक सरल मैथिलीदिस उन्मुख होमाक लेल सविनय आग्रह अछि । मैथिली क्षेत्रक आमजनसभ किएक कहि रहल छथि जे ‘मैथिली हमर नहि, ई आनक भाषा थिक ।’ अहिपर गम्भिर भँ सोचय पडत । 
मैथिली कथित ‘मानक जाति’कँे मानकिकरणसँ चलि रहल अछि । प्रत्यक्ष रुपसँ एकतर्फी ओहि मानकिकरणकेँ आमजनपर थोपरल जा रहल अछि । मातृभाषामे शिक्षाक नामपर कथित लेखकद्वारा लिखल गेल असान्दर्भिक, अवैज्ञानिक आ त्रुटिपूर्ण पाठ्यपुस्तक आ पाठयसामग्रीसभ बालमनोविज्ञानपर नकारात्मक प्रभाव छोडि रहल छैक । जे बच्चा मैथिली मातृभाषामे शिक्षा लए
रहल छहि, ओ स्कूल आ घरक भाषा बीचक कठीन द्वन्द्वमे दोलन कए रहत छहि । घरक बोली आ शैली एकटा आ पढाईके भाषाशैलीमे फरकपन होइते समस्या स्वभाविक अछि । किछु गोटा अपन हित आ स्थार्थकँे प्राथमिकतामे रखलाक कारण समस्या गम्भिर बनल अछि । बालसामग्री वा बालसाहित्यकेँ लेखनमे भाषाक सरलताक विशेष महत्व होयत अछि, जे बच्चाक कोमल मनपर सृजनात्मक प्रभाव पारैत छहि । मनोरञ्जन आ ज्ञानवर्धकसंगैह तथ्य सभकँे सीधा संप्रेषणीय बनेबाक चेष्टा होमाक चाही, भाषाक सरलताकँे ध्यान देबाक चाही, बाल साहित्यमे । आमसाहित्यमे साहित्यकार अपने स्तरकँे अनुसार लिखैत छथि आ पाठक ओकर व्याख्या अपने अनुसार करैत छथि । बालकक लेल लिखैयवला पुस्तक/साहित्यमे बालमनपर केन्द्रित भए भाषा आ शैलीमें सुगम बोधगम्यतापर ध्यान देल जाइत छैक । मुदा नेपालक प्राथमिक कक्षामे लागू भेल पाठ्यपुस्तकसभमे बालमनोविज्ञानक धज्जी उडाओल गेल बात अध्ययनके क्रममे देखारमे आयल अछि । 
मैथिलीकेें कठिन शब्द :
मैथिलीमे बिना कर्ता, कर्म, लिङ आ बचनकेँ मैथिलीक क्रियापद वाक्यबोध कराबैयवला शब्दसभ बड बेसी भेटैत छहि । उदाहरण देखू– मारलिअइन, मारलहुन, मारलथिन, मारलकइन, मारलथुन, मारलह, मारलक, मारलए, मारलही......। हिन्दीमे मात्र ‘मारा’ आ नेपालीमे ‘पिटे, पिट्यो वा पिटियो’ लिखलासँ भए जाइत अछि । तेँ मैथिली कठिन अछि । ओना किछु लोक मैथिलीमे कठिन
कर्ता आ कर्मकँे विशेषताक रुपमे प्रसंशा करैत छथि । मुदा आमजनकेँ लेल ई मैथिलीप्रतिकेँ विकर्षणक कारण बनि सकैत अछि ।  तेहेन नहि होए, ताहिलेल कठिन शब्दक प्रयोग ग्राम्यजनकेँ ध्यानमेँ राखैत होए । जन सामान्यके प्राकृत जीभ पर जटिल पण्डिताऊ शब्दावलीसभहक कील नहि ठोकल जाए । क्लिस्ट शब्दक एकटा अउर उदाहरण देखू–अंग्रेजीक एक सरल वाक्य ‘हि वेन्ट’ के मैथिलीमे प्रसंग अनुसार अनुपाल सात रुपमे कएल जाए सकैत अछि (ओ गेल, ओ गेलैक, ओ गेलहु, ओ गेलनि, ओ गेलाह, ओ गेलथिन आ ओ गेलथुन )। 
बोलीचालीमे मैथिली मुदा जौ ई पाठयसामग्रीकँे स्वरुपमे अबैत अछि त ‘आनक’ भाषा बनि जाइत छैक । प्रतिनिधिमूलक उदाहरण देखू– मैथिलीभाषी क्षेत्रमे सबसँ बेसी लोकक कण्ठ आ जिभसँ बोलल जाइत अछि, ‘बाबु गौ तु कतह गेल रही ? या बाबु तुँ कतह गेल छलह (बोलीचालीमें), लिखित रुपमे– ‘बाबु अपने कतेह गेल छलौहए ?’ अहि तहरे बोलाई आ लिखाईमे फरक अछि, भेटत । जौ लिखित रुममे तिसरा वाक्यकेँ सहि मानब तहन उपरका दूई शैलीक प्रयोग करैवलासभहकलेल समस्या नय भेल ? ओ सब जे बजैत छथि सेहा लिखता, लेकिन ओकर मान्यता जौ ‘मानकिकरण’केँ पक्षपाति सभ नय देताह त ओकरासभहक बोली कोनाकेँ मैथिली भेल ? मैथिलीप्रति अपनत्व कोनाकेँ रहतै ? आम मैथिलीजन सभहक ई एकटा गम्भिर आ यथार्थपरक प्रह्न सदखनि उइठ रहल छहि जे ‘हम जे बजैत छी ओहे लिखाए ।’ कोनो भी भाषाक मानकिकरणमे सबसँ बेसी बजैवला आ प्रयोग होमेवला शब्द, बोली, लय, तर्ज, भाषिकाकेँ प्रमाणिक आ बैधता मानल जाइत छहि । अहिमे शब्द विन्याससँ लकेँ वाक्य विन्यासधरि सर्वव्यापी मान्यताक प्रयोग होयत अछि । मुदा मैथिलीमे ई नहि भेटत, किएक ?
मैथिलीमे किछु ऐहनो शब्द अछि , बोलैत कालक उच्चारण आ लिखैत कालक शैली फरक भए जाइत अछि । उदाहरण देखू– ‘नय’ कँे ‘नहि’, ‘ऐछ’ केँ ‘अछि’, ‘मिलय’ केँ ‘मिलैत’, ‘छैथ’ के ‘छथि’, ‘अल्ता’ के ‘अलता’, ‘पिलौ’ के ‘पीलहूँ’, ‘क्लास’ के ‘किलास’......लिखत जाइत अछि । तहिना ‘ काटे’ के ‘काटए’, ‘घुरबै’ के ‘घुराबए’, ‘सबकोय’ केँ ‘सभकेओ’ , ‘चिन्हाउ’ केँ
‘चिन्हवाउ’, ‘क्लास’ केँ ‘किलास’, ‘उनैटक’ केँ ‘उनटिक’, ‘विवाह’ केँ ‘विआह’,‘चिन्ह’ केँ ‘चीन्हि’, ‘देलकै’ केँ ‘देलकैक’....लिखल भेटैत छय । एहि तहरकेँ शब्द सभके संग्रहित ककेँ मैथिली भाषाकँे बोलीक रुपमे स्वीकार्यता बढेनाय उचित अछि । मैथिलीमे विविधता अपरिहार्यता भए गेल अछि । 
‘उ’ आ ‘ऊ’ के प्रयोगमे नेपाली आ मैथिलीमे फरक देखल गेल अछि । उदाहरण देखू–निर्देशनात्मक शब्दावलीसभ– ‘करू’, ‘बुझू’, ‘लिखू’, ‘भरू’.....मे दीर्घिकार(बढका) अछि । ‘बताउ’, ‘देआउ’, ‘बनाउ’, ‘मिलाउ’......आदि निर्देशनात्मक शब्दसभमें ‘ह्रस्व’(छोटका) कियैक ? अहिसँ भाषा अउर जटिल बनि जाइत अछि । देखल कि गेल अछि जे लेखक सभ नेपाली आ हिन्दी दुनू शैलीक प्रयोग केलाक कारण मैथिलीके क्लिस्टता पैघ भँ गेल छैक । नेपालीमे निर्देशनात्मक शब्दसभमेँ ‘ऊ’ केँ प्रयोग भेल अछि । ‘बताऊ’, ‘देखाऊ’, ‘मिलाऊ’.......लिखल जाइत छैक । उदाहरण ः मैथिलीमे– ‘जोडा मिलाउ’, नेपालीमे –‘जोडा मिलाऊ’ ... लिखल भेटैत अछि । अनाहकँे मैथिलीमे मौलिकता खोजबाक बलजोरि किएक ? मैथिलीमे ऐहन शब्दक पाछामे ‘उ’ लिखबाक उद्देश्य कि ? जहाधरि नेपालीय मैथिलीकेँ बात छहि, नेपाली राष्ट्रिय भाषा भेलाक कारण ‘ऊ’ के प्रयोग करब त पढैय आ लिखैय लेल सहज आ सरल होएत । किएक त नेपालमे नेपाली भाषा त पढैय पडत ।  
हिन्दीक प्रभाव आ प्रयोग : 
मैथिली आन भाषासभकेँ आगन्तुक शब्दसँ भरलपुरल अछि । खास ककेँ शब्द चयनमेँ हिन्दी भाषा÷शैलीकँे प्रभाव बेसी देखल गेल अछि । तहूूमे नेपालीय मैथिली भाषी क्षेत्रमे बजैवला लोकक बोली/शब्द/भाषिकासँ बेसी मधुवनी आ दरिभंगावला सम्भ्रान्त जाति ‘इलिट क्लास’क लोकक बोली, शैली आ तर्जकेँ प्राथमिकता देल जाइत अछि । आम मैथिलीजन सुगमता आ सहजतापूर्वक पढैय आ लिखैय ताहि उद्देश्यसँ लिखल नय भेटैत अछि । सामान्य शब्दकेँ सेहो एतेक ने क्लिस्ट बना दैत छैक जे अंग्रेजी आ संस्कृति सन भाषासँ बेसी भैरगर बैन जाइत अछि  । मैथिली देवनागरीमे लिखब प्रचलित अछि । हमरा बिचारसँ एहाँ उचित माध्यम भँ सकैत अछि । मुदा मैथिली भाषाक लेखन शैली, शब्दक उच्चारण हिन्दीमे करब अनुचित । मैथिली अभियानी सभ हिन्दी भाषाकेँ धुर विरोध त करैत छथि मुदा लेखन शैलीमे ओकरे अनुशरण करैत छथि । प्रतिनिधिमूलक उदाहरण देखू– हिन्दीमे ‘कँे’, ‘द्वारा’ आ ‘मे’ शब्दमे नहि जोडाइत अछि । मैथिलीमे बहुतो लेखक सभ ओहे शैली अपनेने छथि । हिन्दी खडी बोली अछि तेँ वाक्यक अन्त्यमे पूर्णविराम (।) लिखैत छहि, मैथिलीमे वाक्यक अन्तमे बिन्दू (.) किएक नहि लिखल जाए ? कमसँ कम अन्तर्राष्ट्रिय शैलीक महशुस त सबगोटाकेँ होएत । 
मैथिलीमे ‘नहि’ आ हिन्दीमे ‘नहीं’, अहिमे लेखनशैली मात्र फरक छहि, उच्चारणक दृष्टिसँ ब्राह्मण आ ब्राह्मणेत्तरमे फरक भए सकैत अछि , गइर मैथिलीभाषी त एकरा हिन्दीएवला उच्चारण करैत भेटत । ताहिलेल ‘नहि’केँे बदलामें ‘नय’ लिखलासँ होएत । मैथिलीकेँ जौ भाषा मानल जाए त ‘फोनिटिक्स वा उच्चारणशास्त्रक प्रयोग होए । जौ मैथिली ‘बोली’ छी त जन–जनके जिभकँे एहिमे समावेश कियैक नहि ? हमर अपन तर्क अछि जे मैथिली भाषा नहि बोली थिक । भाषाक रुप संकुचित आ बोलैयवला सभ सीमित होइत छैक आ भेटैत अछि । भाषा व्याकरणपर आधारित लिखल आ बोलल जाइत अछि । स्वरयन्त्र ओकर उच्चारणक आधार होएत अछि । मैथिलीमे भाषाक रुपमे ब्राह्मण आ कायस्थ(कर्ण) जातिक बोलीकेँ सुच्चा मैथिली मानल गेल अछि, मानल जाइत अछि । ई एकटा तीत यथार्थ बनल अछि । ई दू जाति बाहेककेँ लोकसभकेँ बोली आ भाषिकाक शैलीमे कोनो सरकारी दस्ताबेज नय भेटैक छहि । भेटबो करैत अछि त रुपान्तरित ढाँचामे मात्र । मोहन भारद्वाजक ‘डाक–दृष्टि’ एकर एकटा प्रतिनिधिमूलक निक उदाहरण भए सकैत अछि । ओ ब्राह्मणेत्तर छलाहए, हुन भाषाक शैलीके मानकीकरण जबरजस्ती कएल गेल भेटैत छैक । अहि तरहे मानसिकताक कारणे मैथिली पाछा अछि । जाधरि मैथिलीमे आमजन नहि जुडत, मैथिली ठेङहुनिया कतबो दैत रहत ,आगा नहि बैढ सकत । मैथिलीकेँ बोलीकँे रुपमे लकेँ आगा बढब आ अहिकँे लेल सर्वमान्य ‘मानक’ निर्धारण करब त मैथिली वृहत्त आ व्यापक बनत । किएक त , मैथिलीकँे बोलीमे गामघरक स्वाद आ आमजनक जीभक बेसी प्रतिनिधित्व होएत छहि
। ‘बोली’केँ मानकिकरणक माध्यम बनाओल जाए । अहिसँ मैथिलीमे लोकक अपनत्व बढत, व्यापकता आयत, मैथिली सभकेँ छियैक से संचार होएत । मैथिली बाजैयवला क्षेत्रकँे विभिन्न स्थान पर मैथिलीक कठिन आ उच्चारण करबामे समस्या देखल गेल शब्द सभकेँ छनौटक लेल वृहत्त सम्मेलन या गोस्टि कराकेँ निरकौल निकालल जा सकैत अछि । 
तहिना अधिकांश पुस्तकसभमे अंग्रेजी शब्दक मैथिली उच्चारण आ लिखाई हिन्दी भाषामे कयल जाइत अछि । अंग्रेजीकेँ ई उदाहरण : ‘ब्लैकबोर्ड’, ‘टैग’, ‘एंटीभाइरस’, ‘फौरेनर्स, लैंग्वेजेज, कैलेण्डर....हिन्दीमे लिखल जाइत अछि । नेपाली क्रमशः ‘ब्ल्याकबोर्ड’ , ‘ट्याग’, ‘एन्टिभाइरस’, ‘फोरेनर्स’, ‘ल्याङ्वेजज’, क्यालेण्डर लिखाएत अछि । 
मैथिलीकेँ अपन सुच्चा जनवोली रहितौ ‘केतारि’ आ ‘मुँहदूसी’ के बदलामे क्रमशः ‘ऊखि’ आ ‘उल्लू’ प्रयोग भेल अछि (हमर मैथिली पोथी,२०५४–६४) । ई दुनू हिन्दी शब्द अछि ।  ‘मैथिलीक सुच्चा (शुद्ध) शब्द फिलस्टीनक हिब्रुई भाषासँ सेहो आयल अछि । मुदा अपन मौलिक भाषाक प्रयोग पाठ्यपुस्तक सभमे नहि भेटैक छैक । श्रीश चौधरी सोलहटा हिब्रुई शब्दक उदाहरण देलनि अछि जे मैथिलीमे थोडेक अन्तरसंग प्रयुक्त अछि । शीत (ठंढा), मीत (मित्र), फोला (फोडा), कीन (खरीदब) प्रभृति शब्द मूलतः हिब्रुई भाषाक अछि (फोरेनर्स एण्ड फोरेन ल्याङ्गवेजेज इन इन्डिया, पृ.७८)
 मैथिली सरलकृत बनेबाक प्रयास:

सन २००८ अक्टोबर १५ मे ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मैथिलीके सरलकृतसंगैह मानक निर्धारणक प्रयास कएने रहैक । पत्रिका किछू बिन्दूसभ सार्वजनिक सेहो कएने रहैक । मैथिली अकादमी, पटना आ नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनिद्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त २०३ टा बिन्दूपर मनन कए निर्णय लेबाक लेल पत्रिका आग्रह कयने रहैक । ओहिमे जनबोली केर किछु शब्दवाली सेहो राखल गेल छलैह । उदाहरण– ‘दरबज्जा’ या ‘दरबाजा’, ‘तोँ’ या ‘तू’ँ, ‘बरदी’ या ‘बर्दी’, ‘गरमी’ या ‘गर्मी’, ‘कतहू’ या ‘कहीं’, ‘उमरिगर’ कि ‘उमरगर’, ‘धोल’÷‘धोअल’ या ‘धोएल’, ‘शिकाइत’ या ‘शिकायत’, ‘निन्न’ या ‘निन्द’, ‘बिनु’ या ‘बिन’, ‘छह’ या ‘छ’ , ‘गेलाह’ या  ‘गएलाह’ , ‘देलखिन्ह’/‘देलकिन्ह’ या ‘देलखिन’, ‘देखलन्हि’/‘देखलनि’ या ‘देखलैन्ह’......विदेह पत्रिकासँ रैंडमली लेलगेल ई बिन्दूसभकँे आ कतेक लागू कएलक वा भेल से जानकारीमे नहि आयल अछि । व्यक्ति आ प्रकाशकपिच्छे लिखाई शैली फराक–फराक भेटैत छैक । भाषाशास्त्री लोकनिकेँ सुझाब जनबोलीकँे पक्षपाति नहि भए सकत कहि विरोध सेहो भए रहल अछि । विरोध करैवलासभ कहैत छथि जे बोलीक आधारपर मैथिली भाषा लिखल जाए । मुदा कथित ‘मानक जाति’वलासभ से असम्भव बात कहैत अपन अनुकूल लिख रहल छथि । जिदियाहासभहक लेल भाषाक विद्वान एवं लेखिका शेफालिका वर्माके ई कथन मननयोग्य भए सकैत अछि । नवभारत टाईम्समे ओ अपन ब्लगमे लिखैत छथु, ‘मैथिली भाषा कोनो सरल सुबोध भाषा नहि थिक जे अनजान आदमी सेहो समैझ आ पैढ सकत । एकर व्याकरण, मुहावरा बहुत क्लिस्ट होइत अछि ’(नवभारत टाइम्स, ७ जुन २०१७) । मैथिलीमे कोनो तरहे क्लिस्टताकेँ अन्त होमाक माग जोडतोडसँ भए रहल अछि । अहिपर मैथिलीक विद्वान लोकनिके ठोस निर्णय आ बिन्दू सार्वजनिक होए , से अपेक्षा बहुतोकेँ छनि ।  
पाठ्यपुस्तकँे जटिलता आ एकरुपताकेँ अभाव :
एकैहटा लेखकसभ सम्मिलित भए लिखल पाठ्यपुस्तकमे सेहो एकरुपता नहि भेटैत छैक । ‘हमर मैथिली पोथी’ नामक पाठ्यपुस्तकमे एकैह क्लासमे सेहो फरक–फरक रुपमे लिखल गेल भेटैत अछि । दोसर क्लासक मैथिली पोथीमे पृष्ठ ५१ मे ‘मनुक्ख’ आ पृष्ठ ५८ मे ‘मनुक्ख’ लिखल गेल अछि । पहिल क्लासक पाठ्यपुस्तकमेँ ‘छत्ता’(पृ.१०) आ दोसर क्लासक किताबमे ‘छाता’ (पृ.४१) लिखल अछि । प्राथमिक कक्षाकेँ विद्यार्थीसभकेँ लेल लिखलगेल पुस्तकमेँ ओहोमे सरकारीस्तरके पुस्तक आ मैथिली अभियानीके अभिमान कएनिहारक लेखनीमे जौ एकरुपता नहि छैक त आनाक बात छोडि दिऔह । एकैहटा शब्दक दू तरहे प्रयोगकेँ ई दूटा प्रतिनिधिमूलक उदाहरण मात्र थिक । बच्चासभकँे पढबैयवला किताबमे एहि तहरे देखल जाइत अछि त आन पाठ्यपुस्तकक कि हाल होएत ? ऐतबी नहि पाठ्यपुस्तक लेखनकँे सिद्धान्त अनुसार पुस्तककँे लेखक अपन रचना समावेश नहि करैत छथि । मुदा मैथिली पोथीमे महान लेखकसभ पहिने अपने रचनासँ पाठ शुरु कएने छथि । ओहूँमे एकटा लेखक महाशय अपन दूटाधरि कविता छपने छथि । बालमनोविज्ञानमेँ फरकशैली, फरक प्रस्तुतिक लेल उत्सुकता बेसी रहैत छैक, एकैहटा व्यक्तिकेँ नामसँ जौ एकसँ बेसी सामग्री भेटत तँ बच्चासभहक मानसिकता केहेन तरहे होएत ? पाठ्यपुस्तक जेहन महत्वपूर्ण सामग्रीमे बालमनोविज्ञानक धज्जी उडाओल गेल छैक । अहि आलेखमे सबटा समेटबाक लेल स्तम्भकार असमर्थ छथि । एकटा उदाहरण दए अहि विषयक विश्राम देव । देखू –दोसर किलासक हमर मैथिली पोथीके पाठ १६ मे ‘सफाई’ शीर्षकमे धीरेन्द्र प्रेमर्षिक कविता छापल छनि । कविताक विषयवस्तु एकटा छैक आ अभ्यासक लेल राखल गेल सामग्री(अभ्यास २) फरक छहि । पाठ्यपुस्तकमे राखल गेल पाठकेँ विशिष्ट उद्देश्य प्राप्तिक लेल पाठसँ सम्बन्धित प्रश्न वा अभ्यास राखल जाइत अछि । ऐतह पाठमे उल्लेख नहि भेल शब्दसभ ‘धरि’,‘दिस’,‘तक’ आ ‘फेर’ के प्रयोग करबाक अभ्यास देल गेल अछि । विषयवस्तुसँ सम्बन्धित प्रश्न नहि छैक त ओ पाठ्यपुस्तक अति खराब सूचिमे राखल जाइत अछि । अभ्यासमेँ बेमेल सामग्री अछि । कक्षा १ कँे किताबमे पाप–पुण्यके अमूर्त बात ‘ऋषि–मुनिजनके काजसँ पाप पडाइछ समाजसँ’, वालमनौविज्ञानविरुद्धमे बालिकाके दुर्घटनादिस उत्प्रेरित करैवला सामग्री ‘ घरक चारपर बैसल कौआ, पकड दौगल छोटका बौआ’ आ ‘धनुष–वाण जे चलबैए, वीर–धुरन्धर कहबैए’...सेहो प्रकाशित अछि । अवोध बालबालिकाक लेल अहिसँ बढिके अन्याय आर कि भए सकैत अछि ? अहि तरहे पाठ्यपुस्तक मैथिली क्षेत्रमे पठाओल जाइत अछि । आब कहूँ ऐहन पाठुयसामग्री लोक कियैक पढौताह ? आलेखमे जतेक सामग्री उदृत कएने छी सभटा प्रतिनिधिमूलक मात्र थिक ।   
लेखकपिच्छे फरक शैली:
अधिकांश अंग्रेजी शब्दक मैथिली उच्चारण आ लिखाई हिन्दी भाषामे कयल जाइत अछि । अंग्रेजीकेँ ‘ब्लैकबोर्ड’ आ ‘टैग’ एकर उदाहरण अछि । अंग्रेजिए शब्द लिखब त ‘ब्ल्याकबोर्ड’ आ ‘ट्याग’ कियैक नहि लिखल जाए ? अहिसँ नेपालीय मैथिलीभाषीकँे सेहो सहजता होएत । नेपाली लेखकक पुस्तकमे ‘केँ’, ‘मे’, ‘सँ’ के जोडिकेँ मैथिलीमे वाक्य लिखल गेल अछि, जे नेपालीय मैथिली भाषीके लेल बेसी सहज अछि  । 
मुदा भारतीय लेखकक पुस्तकमे विरोधाभाष देखल गेल अछि । मोहन भारद्वाजकेँ पुस्तक ‘डाक–दृष्टि’ ई अक्षर सब नहि जोडल गेल छैक (डाक दृष्टि, पृ.६८–६९, २०१२) । विश्द्ध हिन्दी शैलीमे लिखल गेल अछि ।  

डा.महेन्द्रनारायण रामकेँ पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति मे जातीय–जीवन’ मे सेहो हिन्दी शैली अपनाओल गेल छैक । मुदा अहि पुस्तकमे एकरुपता नहि दे खमामे अबैत अछि (पृ.१२७) । नेपाली लेखकक सब नेपाली शैलीमे लिखल भेटैत छैक ।
 
नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानद्वारा प्रकाशित ‘आडन’ मे बृषेश चन्द्र लालक ‘झरोखासँ’ मे ई शैली भेटैत अछि जेना–देहकेँ, दिमागकें, गर्वसँ, अनुभूतिमे...लिखल छैक (सट स्क्रिन, पृ.६९)

मैथिली लेखक एवं साहित्यकार रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ के ‘एंटीवायरस’ कथा संग्रहमे सेहो नेपाली शैली अपनाएल गेल अछि । मुदा अंग्रेजी शब्द सबहक उच्चारणमे हिन्दी शैली अवलम्बन कयल गेल अछि , अहि बातक उदाहरणक रुपमे पुस्तकक शीर्षक ‘एंटीवायरस’ के लेल जा सकैत अछि । नेपाली उच्चारणमे ‘एन्टिभाइरस’ होमाक चाहिं । एहि कथा संग्रहक एकटा विशेषता ई जे पुस्तक भारतमेँ छपलोके बाद वाक्य विन्यांशमे नेपाली शैली भेटैत छैक (देखूःसट स्क्रिन, पृ.७३) ।  

पुस्तकक एकटा विशेषता चाहिँ अधिकांश हिन्दी मुदा उच्चारणमेँ हिन्दीके प्रभाव कियैक ? ओहि पारक मैथिलीमे लिखबाक शैली कनिक भिन्न देखल देल अछि । मुदा उच्चारकमे हिन्दीकेँ प्रभाव बहुत अछि । 
सयपत्रीमे प्रकाशित एहि स्तम्भकारक अनुशंधानमुलक आलेखमे नेपालीय आ भारतीय दुनू लेखकक प्रभाव भेटत । दुनू पारक सामग्रीके अध्ययनक प्रभाव आ मान्युटली अहिके लेल कोनो तरहे मापदण्ड नहि भेलासँ एहेन तरह लिखल गेल अछि । ओहुना खास ककेँ ब्राह्मणेत्तर जातिकेँ लिखल मैथिली मे अहि तरहे समस्या देखल गेल अछि । चाहे ओ डा. महेन्द्रके होए या आन कोनो गोटेके । ताहिलेल मैथिलीमे एकटा शैली पुस्तिका अपरिहार्य भँ गेल अछि । विद्वान लोकनि से आग्रह जे सर्वमान्य शैली सार्वजनिक होए । अपने –अपने तरहे शैली अनुचित अछि । हाँ शैली बनबति समय आमजनक लेल सहज, सुगम आ सरल होए, ताहि पर ध्यान होए । ब्राहम्णेत्तर जातिके एकटा अपन तरहे शैली छैक (देखू स्क्रिन सट, सयपत्री, २०७५)


मैथिलीके सरलीकरणक उपाय:

मैथिली शब्दावलीके जहाधरि भए सकेँ नेपालीकेँ लेल तय भेल शब्दावलीक नदजीक रखनाय दूरदृष्टिक बात होएत । अंग्रेजी शब्दक उच्चारण आ मैथिलीसँ मिलैयवला शब्दसभकेँ नेपाली शैलीमे अपनाओल जेबाक चाही । कियैक त हरेक शब्दक लेल भाषावैज्ञानिकसँ पुइछके निश्चित नहि कयल जा सकैत अछि । अहिसँ नेपालीमे चलि चुकल शब्दकँे उपयोग होएत आ मैथिलीके ‘रि–इन्भेन्टिङ द ह्वील’ मे अनावश्यक समय आ श्रमकेँ अपव्यस नहि करए पडत ।   जहाधरि सम्भव होए नेपाली शब्दक प्रयोग कएल जाए । यदि नेपाली उच्चारण आ मैथिली उच्चारणमे फरकपन होए त नेपाली शब्दक मैथिली फोनेटिक्सके मुताबिक ध्वनि–परिवर्तन कएल जाए सकैत अछि । अवधी, ब्रज, मैथिली आदिमे ‘श’ आ ‘ष’ के उच्चारण ‘स’ जका होइत अछि । निर्देश, सदिश, परिवेश आदिकेँ स्थानपर निर्देस, परिवेस आदि लिखल जाए । विभिन्न अंग्रेजी शब्दक उच्चारण नेपालीशैलीमे होए (‘कैलेण्डर’केँ जगह ‘क्यालेण्डर’, ‘ब्लैकबोर्ड’कँे जगह  ‘ब्ल्याकबोर्ड’ प्रयोग कएल जाए । मैथिली–नेपालीमें परसर्ग–उपसर्गमे फरक भ“ सकैत अछि । अहि मामिलामे नेपाली संस्कृतकेँ बेसी निकट छहि, ओहुना मैथिलीमे दरिभंगिया आ मधुबनीया“ छाप बेसी छैय । ओ छाप आममैथिलीजनककेँ लेल पानि पिया रहल अछि, नय पैढ सकैत अछि नय बोलि सकैत अछि । तेँ नेपालीय शैली अपनाओल जाए । अहिस“ मैथिलीमे मौलिकता आ सर्वव्यापकता सेहो बढत । नेपाली शब्द नहि होए त अंग्रेजीकँे शब्दसभकेँ ध्वनि परिवर्तन ककें चलायल जा सकैत अछि । गामघरस“ लकेँ बजारधरि, झोपडपट्टिसँ लकेँ महलधरि प्रयोगमे (सुनाई आ बोलाईमें) आबैयवला शब्द, शैली आ स्वरकेँ उपयोग मैथिलीके सरलीकरणक सूत्र भए सकैत अछि ।   
सारांश : हरेक भाषाक अपने नमनीयता आ स्वीकार्यता होएत छैक । सभमे हजारोंकेँ जुबान आ जिभक मिठास समेटल गेल रहैत छैक, तेँ ओ समृद्ध, सर्वव्यापी आ सर्वस्वीकार्य रहैत छैक । मुदा मैथिलीमे ई गुण दुर्लभ अछि, नहि भेटैत छैक । स्तालिन कहने रहैथ, ‘सीमित लोकक भाषाकेँ आधारमानि जर्जिया प्रदेशक भाषा–समस्याक हल असम्भव अछि, भाषाक समस्या किसान करत जे जमिनसँ जुडल छथि आ देशसँ संपृक्त अछि, आ अहि समस्याकँे समाधानबाद अनुगमन श्रमिकसभ करत । ’ स्तालिनक ई कथन नेपालक सन्दर्भमे लागू होए । किसान–मजदूरक सरल भाषिका, भाषा, बोली, शैली आ लय मैथिलीकँे पाठयपुस्तक, पाठ्यसामग्री, साहित्य, आख्यानसहितमे समावेश होए । किएक तँ मैथिलीकँे सरलीकृत नहि बनाकँे ई जनभाषा नहि बनि सकैत अछि ।(२०७६कात्र्तिक २६, रामभरोस कापडिजीके पत्रिकाक लेल लिखल गेल आलेख)
सन्दर्भ सामग्री:
  1. हमर मैथिली पोथी, पहिल किलास, नेपाल सरकार, शिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालय,पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर, २०५४–६४ ।
  2. हमर मैथिली पोथी, दोसर किलास, नेपाल सरकार, शिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालय,पाठ्यक्रम विकास केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर, २०५७–६७ ।
  3. मेरा नेपाली :कथा ५, नेपाल सरकार, शिक्षा मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर, २०५३–७० ।
  4. बृषेशचन्द्र लाल :आङन, झरोखासँ, कथा,  नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान,कमलादी–काठमाडौं, पृ.६९, अङ्क ८, वर्ष १०, विस २०७५ ।
  5. रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’ : एंटीवायरस,नवारम्भ, पटना : ६३, एम.आई.जी. हनुमान नगर, भारत, सन् २०१९ ।
  6. डा.महेन्द्रनारायण राम :भारतीय संस्कृति मे जातीय जीवन, शब्द प्रकाशन, नई दिल्ली, सन २०१७ ।
  7. मोहन भारद्वाज : डाक–दृष्टि, मैथिली लोक रंग, शकरपुर दिल्ली, भारत , सन् २०१२ ।
  8. दिनेश यादव :सयपत्री, ‘मैथिली भाषा आ साहित्य : समस्या आ समाधान’,नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान,कमलादी, काठमाडौं, विस २०७५ ।
  9. श्रीश चौधरी :भारत में विदेशी लोग एवं विदेशी भाषाएँ, राजकमल प्रकाशन, भारत, २०१८ । 
  10. गद्य कोश डट ओआरजी÷जीके÷मैथिली और हिन्दी/नागार्जुन 
  11. विदेह :प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ,पृ.९९–१०६  १५ अक्टोबर २००८
  12. शेफालिका वर्मा : ब्लग्स डट नभभारतटाइम्स डट इन्डियाटाईम्स डट कम, ७ जुन २०१७ ।













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