Thursday, 13 September 2012

नेता आगा जनता पाछा


 नेता आगा जनता पाछा
देश आ मधेस आब अप्पन स्थिति आ दिशा मे बहुत पैघ एवं क्रान्तिकारी बदलाब के चाहना रखने अछि । ओतह के जनता खुद्रा मे नए होलसेल मे अपन अधिकारक सुनिश्चिता चाहैत अछि । किछु माह पहिलधरि संविधानसभा छल त आशा आ भरोसा से हो छल , मुदा आब त ओहो नए रही गेल । ऐहन स्थिति मे जनता जनार्दन निराश आ कुन्ठित त बनले अछि , नेतासभ पर स भरोसा आ विश्वास सेहो उठि गेल अछि । जनता सभ कह लागल अछि, ‘ परिवर्तनक लेल उत्कर्ष बलिदान आब अक्षम नेतृत्व÷नेता के कारण मटियामेट भ गेल , उपलब्धि शून्य मे पहूँच गेल ......। ’ हुनका लोकनि के इ प्रतिनिधिमुलक आक्रोश उचित मात्र नए सान्दर्भिक थिक । खास ककेँ पुरातनवादी सोच आ परम्परावादी मानसिकता के जंंजिर मे जकड्ल आ बा“धल एतेह के नेता लोकनी के कारण इ स्थिति आएल अछि । मुद्दा अखनो देरि नए भेल अछि । जौ पवित्र उदेश्य आ लक्ष्य के साथ प्रयास कएल जाय त स्थिति साकारात्मक भ सकैत अछि । लेकिन एही अभियान मे युवा के सक्रिय भूमिका जरुरी अछि । किछु युवाजन जागरुक भँ एही दिश विडा उठावा मे प्रयासरत छैक, जे एकटा सकारात्मक सन्देश संचार क रहल अछि ।
पहिले सत्ता के लेल मोर्चा आब अधिकार के लेल एकता के बात सेहो ओही सन्दर्भ मे शुरु भेल अछि । किछु युवा सभ के एही अभियान मे जुडनाए ओकरे पुष्टि करैत अछि । किएत राष्ट्रिय सहमति के नाम पर चारि वरिष धरि भेल झुठमुठ के नाटक सँ सिर्जित संकट सँ मुक्ति चाहैत अछि, जनता । सत्ता, भत्ता आ कुर्सी मे जकैडि के आब अधिकार नए भेटत , से बात जनता सभ आब निक जका बुझि गेल अछि । स्वार्र्थी नेता सँ देश के लोकतान्त्रिक दशा मे परिवर्तन किन्नौह नए भँ सकैत अछि । ताहीलेल उच्च सोच आ महान जोश के साथ देशक राजनीति के सही दिसा देबाक बात आब जरुरी भय गेल । शुरुआत फेर शून्य सँ कर पडत । किएक तँ जनता केँ स्वाभिमान, देश केँ स्वाधिनता आ भूगोल के स्वतन्त्रता पर खग्रास ग्रहण लगेनिहार नेता लोकनी सँ आब काम नए चलत । असल नेतृत्वक खोजी जरुरी भँ गेल , ओ नेतृत्व युवा करैति से चाहना जन–जन के अछि ।
बहुत पहिने अंग्रेजी साहित्य मेँ कतौह हम पढ्ने छलौह कि सत्ताधारी होनाए के मतलब एक जनाना होनाए जेहेन बात अछि । यदि देश आ भूगोल, राज्यसत्ता आ नेतृत्वपर जौ अहाँ अपन उपस्थिति एहसास कर चाहैत छि तँ जनता के सबटा लालसा ओतेह गिरबी लगि जायत अछि । देशक नेता आब ‘नेटा’ बनि चुकल अछि । ‘नेटा’ के जौ साफसुधरा नए करब त ओ मुखडे बिगाडि देत । अख्खन देशक मुखडा विगरल अछि , ‘नेटा’ के कारणे । सत्ता के मद मे ओ सब एनाके चुर अछि जे ओ कुर्सी छोडबाक बात केनाए बहुत दूर छोडि देने अछि । ठग सभहक झुण्ड बना के ओ देश के लुटि रहल अछि , जनता के बन्धक बना के छद्मभेद मे विभिन्न नाम सँ राष्ट्रक सम्पति पर डकैति डालि रहल अछि । जौ हुन्का सभहक बस चले त स्कूलक विद्यार्थी जका सभ के मुर्गी बना केँ उपर सँ लाल कैर्ची बर्साव मे सेहो ओ सभ पछा नए रहत से बुझा रहल अछि । खास ककेँ मधेसिया नेतृत्व, नेता आ कार्यकर्ता सभ के मनोभाव, मनोगति आ मनोविज्ञान अख्खन ऐहने बनल अछि , एही मामिला मे सत्ताधारी आ प्रतिपक्षक भूमिका एके खेत केँ मुरैह जका देखा रहल अछि । हाँ फरक एतबे अछि जेँ प्रतिपक्ष सत्ता केँ लेल भुखाएल अछि तँ सत्ताधारी धनार्जनक लेल बकुलम ध्यायनम् मे अछि ।
जौ मधेस पर केन्द्रित भँ बात करी तँ मधेसी नेता सभ नेतृत्व हकवाक स्थिति मे अखनौधरि नए पहुँचल अछि । पंचायतकाल मे राजा के गुलामी, प्रथम जनआन्दोलनके वाद हासिल प्रजातन्त्र मे कांग्रेस, एमाले के आज्ञापालक के भूमिका मे ओ रहल छल । २०६३÷०६४ के जनआन्दोलन आ मधेस विद्रोह के सफलताक बाद ओ सभ विदेशी शक्ति के भक्त बनि बैसल अछि । तेँ मधेसी लोकतान्त्रिक मोर्चा के नाम पर ओ सब सत्ताधारी बनि मालदार मन्त्रालय मे कब्जा जमोने अछि । देश÷मधेस मे घनघोर अन्हरिया राति मे चन्द्रमा के दर्शन दुर्लभ जका भ चुकल अछि । कियो दिनकर बनत से सपनो मे नए सोचु । एकरा एना के कहियो जे देश बहुत गहिरगर खाडि मे गिर चुकल अछि । अहाँ हमरा बीच के लोक आब इँ नए मानत जे नेता के अवसर आ पद नए भेटलैह । पिछला किछु वर्ष सँ मधेसी नेतासभ सदैब निर्णाय भूमिका मे रहल, मुद्दा हात लागि शुन्य के स्थिति अछि , इँ बहुत पैघ दुर्भाग्य थिक । उपप्रधान एवं गृहमन्त्री विजयकुमार गच्छदार, भौतिक योजना तथा निर्माण मन्त्री ह्रदयेश त्रिपाठी, सूचनामन्त्री राजकिशोर यादव, उद्योगमन्त्री अनिलकुमार झा, सिंचाई मन्त्री महेन्द्रराय यादवलगायत के कार्यकाल मे कतेक एहन मौका आयल जख्खन ओ अन्तरआत्माके आबाज स निर्णय लेबा मे चुकल अछि । ओही स्थिति मे समुच्चा देश के दशा और दिशा के ओ ठीक क सकैत छल । मुद्दा हुनका सभ के अपने पद के लायक योग्यता पर शंका रहल हेता । ताही लेल ओ सभ ओएहा केलक जे हुनका सभहक पाछा के ‘आला कमान’ विदेशी शक्ति ओकरा कहलक । लाज भ रहल अछि ऐहन ‘मौगा’ नेता सभ स , जे महत्वपूर्ण पद पे सुशोभित होइतो मोमक गुडिया बनि बैसल रहल, बैसल छथि ।  पद आ कुर्सी मे चिप्कल अछि । और बचल खुचल अहंकार के नशा मे चूर भ सबटा बन्टाधार करबा मे आतुर अछि । यदि इ बात नए रहैत त मधेसक मूलभूत मुद्दा सभ के आजुधरि किएक सम्बोधन नए भेल ? संविधानसभा आ मन्त्री परिषद् मे अच्छा खासा उपस्थिति भेला के बाबजूद किएक संंविधानसभा के विगटन कएल गेल ? किएक देशक राजनीति के अस्थिरता दिश धकेल देलक ओ सब ?
यदि इ बात सभ नए रहैत त कामचलाउ सरकार आजुधरि किएक सत्ता छोडबाक स्थिति मे नए पहुँचल अछि ? मधेसी सभ के नागरिकता, सैनिक भर्ना, समावेशिक विधेयक सभ आजुधरि किएक मूर्तरुप नए लेलक ? किएक मधेसक किसान सभ के हक अधिकारक दिश काज नए ओ केलक ? रक्षामन्त्री मधेसी , मुदा सेना मे मधेसी के पहूँच आजुधरि सम्मानजनक किएक नए भेल ? किएक अपनो मन्त्रालय स सेना मे मधेसिया के सम्मानजनक उपस्थिति करबाक दिशा मे ओ सक्षम नए भेलाह ? पिछला बेर मुख्य सचिव पद मे किएक मधेस क्षेत्रक प्रतिनिधि उमाकान्त झा के नियुक्ति नए दिआ सकल ? तराई–मधेस मे कृषि क्षेत्र मे लगनिहार सभ के उत्थान आ प्रगति के दिस एकोटा कारगर निर्णय ओ सब किएक नए क सकल ? निर्माण आ विकास, उद्योग आ स्वास्थ्य क्षेत्र मे ओ सभ मधेस के अग्रस्थान मे किएक नए पहुँचेबाक कार्य केलक ? निर्माण तथा यतायात मन्त्री मधेसी मुदा समग्र मधेस मे निर्माण लगभग नए के बराबर अछि । उद्योग मन्त्री मधेसी मुदा मधेस क्षेत्र स उद्योग विस्थापित भ रहल अछि । सिंचाई मन्त्री मधेसी , मुदा सिंचाइ क्षेत्र मे मधेस पाछा ..........ः?  ऐहने बहुतो प्रश्न सभ के ढेरी स एहा बुझवा मे अबैति अछि जे ओ सब सत्ता मे पहुँचबाक लेल मात्र ललायित छल आ अखनो अछि । ओही लेल ओ मोर्चा बनबैत अछि मुद्दा सत्तासिन भेला के बाद मुद्दा सभ बिसरी जाएत अछि । अखन मधेस मे एकेटा पार्टी के बात एकटा सत्ताधारी दल क रहल अछि । जौ अलग–अलग पार्टी छैक त विचारो पृथ्थक रहतै ने । फेर कोनो के एकता भ सकैति अछि , इ बात बुझितौ बुझि पचा के किछु नेता आगा बढि रहल अछि । हमरा बिचार स इ त सकारात्मक बात थिक मुद्दा एकता सम्भवक विल्कुले नए अछि । हमरा क्षमा करब , जौ ऐहने ‘मौगा’ नेता आ ‘अक्षम’ मधेसी मन्त्री सभहक सिट सुरक्षित करबाक लेल जौ एकता आ मोर्चा होएत त पहिले के स्थिति ठीक छल कमसे कम सभ नेपाली एक छल , कतौह मधेसी, पहाडी , हिमाली बाला बात नए , आब मौगाा मधेसी नेतासभ के कारण जनता के धैर्यता के बाँध टुटि गेल अछि , व्यक्तिगत गुणदोष के बजाय सारा मधेसी पड जे अख्खन दोसारोपण भ रहल अछि इ सब मधेसक मौगासभहक कारणे ।
कोनो देश आ समाज के विकासक के लेल साढे चारि बरिष कम समय नए होयत छैक । मुदा ओ बहुमुल्य समय बर्बाद केलक नेता सभ । ताही कारणेँ अखनो मधेसी परनिर्भर अछि , दोसर के आगा हाथ पसारबाक स्थिति मे अछि । एही के लेल जिम्मेबार के ? हम आ हमर सरकार ? एही विषय मे कियो जनता नए बोलत । किएत एही के ले जनता सेहो ओतबे जिम्मेबार अछि । मुद्दा अहा हम असानी स कहि दैति छि जे सरकार आ सरकार मे बैसवाला सभ दोषी अछि । लेकिन विकास कार्यसभ मे जतेक भूमिका सरकार के रहैत अछि ओतबे जनता के । अधिकार के लडाई आजुधरि नेता नए जनता लडैत रहल , इतिहास साक्षी अछि । नेता के नेतृत्व चाही , जनता के अधिकार भाड मे जाए । विल्कुले मतलब नए रही जाएत अछि नेता सभ के सत्ता मे पहुँचला के बाद, जन–जन के मुद्दा ।
जनता करत त कि करत ?  अप्पन अधिकार के रक्षा हेतु धरना, प्रदर्शन करैत अछि, अनसन मे बैसैत अछि , आन्दोलन करैत अछि त माग पुरा केनाए के बदलता पुलिसक लाठी बजरैत अछि ? धरनास्थल मे बम फुटैत अछि, पुसिसक गोली ठिका ठिका के मथा , छाति आ पेट जेहन सम्बेदनशिल अंग के चोथराभोटरी निकाएल  दैत अछि  । गृहमन्त्री मधेसी अछि मुदा निर्दोष मधेस के हत्या अखनो नए बन्द भ सकल अछि । एही विषय पर जौ गहनता के साथ विचार करब त,  एकर दोषी हमसभ खुद छि , किएत हमरे चुनलाहा भ्रष्ट आ तानाशाही सभ सरकार मे अछि । मुद्दा अख्खन त निर्वाचित प्रतिनिधियो नए छैक । एहन स्थिति मे जनता के परेशानी अउर बढि जाएत अछि ।  एकटा हिन्दी कवि जी के इ कथनी सान्दर्भिक अछि ः हमे फ्रिक ये नही कि देश कैसे चल रहा है, ‘हमे फ्रिक इस बात कि है कि कही ये यूही ना चलता रहे ’
अन्त्य मे, देश के भ्रष्टाचार मुक्त , तकनीकी युक्त , आधुनिक कृषि प्रणाली, सब के पहूँच मे स्वाथ्य आ शिक्षा , सब के मानवअधिकार के ग्यारेन्टी संगैह आर्थिक विषमता के दूर करैत सम्पन्न राष्ट“ बनेबाक दिस अग्रसर होनाए सबगोटा के अन्तिम ध्येय आब बनबाक चाही ।
कि एतके विपक्ष अपन कर्तव्य आ कार्य सफलतापूर्वक क रहल अछि , शायद नए । ओहो सभ कोनो चालाक नढिया (स्यार) जका ताक पे अछि कि कहिया कौवा के मूह स सत्ता रुपी रोटी छुटत आ ओही पर ओ काबिज  भ जाए ? सत्ता त आबैत जाति रहैवाला बात थिक । लोकतन्त्र मे सत्ता ककरो बपौती नए अछि । इ बात के बुझैत सबगोटा के आगा बढ पड्त । तबे अधिकार भेटत । आब संविधानसभा के चुनाव नए संसदीय चुनाव दिस नेता सभ के अग्रसर होमे पडत । तब्बे जा के एही देशक तमान नागरिक के मुलभूत अधिकार भेटत । तबे देश आ मधेसक दशा और दिशा मे परिवर्तन होयत ।
समाप्त  

Tuesday, 11 September 2012

मधेस - विकिपीडिया

मधेस - विकिपीडिया

मिथिला बनल ‘बाभनक गाम’


मिथिला बनल ‘बाभनक गाम’

...........प्राचीनकाल सँ मिथिलाक समाज पूर्णतः ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर आधारित रहल अछि । चाहे कोनो ब्राह्मण दरिद्र छिम्मडि किएक नइँ होथि, श्रेष्ठतावादी फोबिया मे कनको कम नहि । हुनक कुलीनतावादी कट्टताक आख्यान हमसभ हरिमोहन झा आ यात्री जीक साहित्य मे पढि सकैत छी । निःसन्देश मैथिली साहित्य मे ब्राह्मण जातिक भीतर जमकल कट्टरता, जडता आ विद्रूपता केँ देखार करबाक प्रारम्भि काज हरिमोहन झा आ यात्रीक लेखन द्वारा संभल भेल, मुदा हिनको लोकनिक साहित्य मे सामाजक सभ वर्गक प्रतिनिधित्व संभव नइँ भ’सकल । हरिमोहन झा आ यात्री जीक कथा साहित्य मुख्य रुप सँ ब्राह्मण–सुधारक साहित्य थिक, जाहि मे आन जाति अथवा वर्गक उपस्थिति मात्र परिवेशगत अछि । ईहो सत्य, जे जँ ब्राह्मण सुधरि जाथि तँ ओहि सुधारक प्रभाव सामाज पर पडबे टा करत । मुदा , ई सुधार केत संभव भेल से खोजक विषय थिक । सोलहवीं शताब्दीक बाद वर्णव्यवस्थावादी तुलसी दासक पदक तँ जमिक’प्रचार–प्रसार भेल, मुदा कबीर आ रैदासक वाणी केँ मिथिलाक प्रभु जाति मुख्यधारा मे नइँ आब’देलक । बीसवीं शताब्दीक नवजारणक दौर मे मिथिला मे कोनो सामाजिक सुधारक नइँ भ’ सकल । मिथिलाक बाहर जे समाज सुधार आन्दोलन राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, ज्योतिबा फुले, पंडिता रमा बाई अथवा अन्य सुधारक द्वारा चलाओल गेल तकर हबो धरि मिथिलाक सीमा मे नइँ पैसि सकल, आ तकरे परिणाम भेल जे ‘बाभनक गाम’ क अपन खोल मे बन्द पडल रहल । ओना वर्तमान मे बाहरी दुनियाक सम्पर्क मे अयलाक बाद एहि जडता मे थोडेक फर्क आबि रहल अछि , मुदा ‘बाभनक गाम’ जडता मे एखनो यथेष्ट परिवर्तन अथवा सुधार संभव नइँ भ’सकल । बहुत पहिने जार्ज ग्रियर्सन मैथिल ब्राह्मणक एहि जडता पर टिप्पणी करैत लिनने रहिथि जे ‘दुनिया बदलि गेल, मुदा मैथिल समाजक धार्मिक ओ सामाजिक कट्टरता आ रुढिवादिता मे कोनो अन्तर नइँ आयल ।’ प्रश्न अछि जे एकैसम शताब्दी मे आइ एहि समाजक कट्टरता मे कतेक परिवर्तन संभल मेल अछि ? एहि लेखक उद्देश्यय तारानन्द वियोगीक कविता ‘बाभनक गाम’, बुद्धक दुख’ समय सभ केँ मिलाओत’, आ ‘आगू मैथिलीक बाट नहि’ कविताक माध्यममे मिथिलाक एहि सामाजिक परिवर्तनक पडताल करब थिक । ‘बाभनक गाम’ कविताक शुरुआत आ अन्त निम्न पंक्ति सँ होइत अछि ः
पधारि रहल अछि गर्दमगोल मचौने
एकैसम शताब्दी
आ कनैए बाभनक गाम’
उपरोक्त पंक्ति आ ग्रीयर्सनक उक्ति मे लगभग सौ वर्ष सँ अधिक समयक अन्तर रहितो कोनो असमानता नइँ अछि । ‘बाभनक गाम’ कविता एकैसम शताब्दीक मुहान पर (१९९९ ई.) मे रचल गेल छल । एकैसम शताब्दी दुनिया भरी मे जत’ आधुनिकता आ बदलावक प्रतीक बनल , ओतहिए मिथिलाक ‘बाभनक गाम’ कानि रहलि अछि जे कतहुँ ई बदलावक बसात ओकरा गाम मे ने पसि जाय । ब्राह्मणवादी व्यवस्था मिथिलाक बहुत जडि तक घुसल अछि तेँ ओकरा भीतर कोनो बदलावक गुंजाइश बहुत मुश्किल, ओना नवतुरिया वर्गक छिटफुट हस्तक्षेप अवश्य देखा पडैत अछि, मुदा से हाशिए पर अछि ।.............
स्रोत ः अंतिका, अक्टूबर, २०११–मार्च, २०१२, पृष्ठ ४३–४४, लेखक ःश्रीधरम, लेख शिर्षक ः ब्राह्मणवादक सभ्यता समीक्षा ।

लोकतन्त्रबाट गायब हुँदै ‘लोक’


लोकतन्त्रबाट गायब हुँदै ‘लोक’

केही समययता नेपालको राजनीतिमा देखिएको उथल–पुथल, विकृति–संगति र आरोप–प्रत्यारोपलाई लोकतन्त्रका लागि राम्रो संकेत मान्न सकिन्न । लोकतन्त्र, जहाँ जनताको सहभागिता सुनिश्चित गर्न जनताद्वारा चुनिएका प्रतिनिधिहरुलाई केही अधिकार दिइएको हुन्छ, जसबाट शासन व्यवस्था सुचारु रहोस । तर सत्ताको नशा यस्तो चढेको छ कि सत्ताधिशहरु आफूलाई स्वयंभू ठानेर जनतालाई लुटिरहेका छन्, लुछिरहेका छन् । मँहगाई चरम उत्कर्षमा छ, सुरक्षा व्यवस्था तहस–नहस छ, तर सत्ताधिशहरु सत्ता छाड्ने नामै लिइरहेका छैनन् । त्यसमा पनि कामचलाउ सरकारको आयु कति दिनसम्मका लागि हो, त्यो टुंगो नहुनुले अन्यौलता बढेको बढ्यै छ । जनता निराश छन्, कुन्ठित भएर उनीहरुलाई बाच्न विवस पारिएको छ ।  भ्रष्टाचारीहरुमाथि लगाम कस्नुको साटो सरकारबाट उनीहरुलाई पोषण र बचाउ गरिदैछ । समस्याहरुको एउटा चाङनै खडा भएको छ, मुलुकमा । यदि यस्तै रहने हो भने हाम्रो देश निकट भविष्यमा लामो समयसम्म यी समस्याहरुबाट त्राण पाउने छाँट छैन । लोकतन्त्रमा यदि जनताको अधिकारहरुको वेवास्ता गरिए यो बुझ्न कसैलाई समस्या हुदैन कि लोकतन्त्र कति स्वस्थ छ । हाम्रो मुलुकमा लोकतन्त्र मरणासन्न अवस्थामा पुग्नुका केही कारणहरु हुन् ः–
  • शून्य अवस्थामा कार्यपालिका पुग्नु र कामचलाउ सरकारको आयु लम्बिदै जानु
  • वर्तमान सरकारले तत्कालिन समस्याहरुलाई गम्भिरतापूर्वक बुझ्न नसक्नु
  • नेपालमा गिर्दो सामाजिक नैतिक स्तर
  • संविधान निर्माणका लागि खासै प्रयासको थालनी नहुनु 
  • सत्ता र मात्र सत्ताका लागि नेताहरुबीच हानथाप हुनु
  • मुलुक १० जना नेताहरुको कब्जामा पर्नु
  • भाषणका लागि भाषणमा मात्र नेताहरु सीमित हुनु.........