Monday, 1 September 2025

काका’क बात ! (#मैथिली लघुकथा)

अमेरिकामे क्रियाशील संस्था 'एसोसिएसन अप नेपाली तराइयन इन अमेरिका (एएनटीए) अर्थात् 'एन्टा'के 8म् महाधिवेशन तथा 20म् वार्षिकोत्सवके अवसरमे प्रकाशित 'सोभेनियर'मे छपल मैथिली लघुकथा !
रमेशके गामसँ राजधानी ऐला एक सप्ताह भ' गेल रहैक । राजधानी एलाक बादो गामक मुटकुन काका'क मोन ओकरा पड़ैत अछि। गाममे रहैत काल काका संग भेल संवाद आब रमेशके जीवन, परिवार, समाज आ देशक विकास लेल सूत्र जेकाँ बुझाइतछ ।
मुटकुन काका एक दिन मोनक बात बजैत कहलनि, ‘बाबू! तूँ सभ गाम छोड़ि क' बाहर चलि गेलहँ, नीक कएलहँ। एत' त' आब रहबाक स्थिति नहि रहल अछि। किछु कथित अगुआ लोकनि गामकेँ बर्बाद क' देलक अछि । घर-घरमे झगड़ा लगा देलक अछि....!’
मुटकुन काका निरंतर बाजि रहल छलाह। बीचमे रोकि क' रमेश पुछलक, ‘काका! के अगुआ? के-के छथि ओ लोकनि ?’
काका (थोड़ेक कड़क स्वरमे): ‘हैट ! गामक बच्चा-बच्चा जनैत अछि । सभसँ पुछह, कहि देतह। हम बूढ़ा छी, नाम नहि लेब । भित्तोमे कान होइत छै। जँ केओ सुनि देलक त' ओ लोकनि मैदान (खुला दिशा-पिशाबक स्थान), पैनछुवा , चौरचरण (पशु चरबाक स्थान) सब बंद करबाक हुकुम द' देत। फेर हम गरीब...!'
मुटकुन काकाक बात सुनि क' हुनकर मनमे भय देखल जा सकैत छल । रमेशक’ ओह निष्कर्ष छलैक।
रमेश (काकाक काँध पर हाथ राखि क' हुनकर मुंह दिस तकैत): ‘काका ! एहो युगमा अहाँ डराइत छी ?’
काका खिसिआ गेलनि। चारू कात तकैत गमछासँ पगड़ी कसि क' बाँधलनि आ कहलनि, ‘ रमेश बाबू! हम डरायल नहि छी, फालतू झंझटमे पड़' नहि चाहैत छी...। हमरा पर पंचैती बसाय देत से डर अछि । पंचैतीमे खैनी-बिडी, सुपारी जे खर्च करए पडैक छैक…। पंचैतीक नाम पर किछु बेरोजगार लोकक दिन एही तरहेँ कटैत अछि।’
गाममे रोज होइत फालतू पंचैतीक प्रति मुटकुन काकाक आक्रोश सुनि रमेश हुनकर पहिल बात पर ध्यान देबाक प्रयास कएलनि। पुछलनि, ‘काका ! कक्कर-कक्कर घरमे झगड़ा अछि ?’
काका : ‘कहब कठिन अछि, रमेश बाबू। कक्कर-कक्कर नाम कहब...?’ लंबा साँस लैत काका आगाँ कहलनि, ‘रमेश बाबू ! जई घरमे सहोदर भाइ-भाइमे प्रेम होइत अछि, जेठ-बड़केँ सम्मान भेटैत अछि, ओत' भगवानक वास होइत अछि। प्रेम टूटल त' रामायण लिखायल, संपत्ति बाँटल त' महाभारत । मनुष्यक पतन तखन शुरू होइत अछि, जखन ओ अपनाकेँ गिराब' लेल दोसरसँ सलाह लेब शुरू करैत अछि...!’
मुटकुन काका रमेशसँ समय पुछलनि, बिहानक ११ बजल छल। जलखोई करबाक रमेशक आग्रह पर काका कहलनि, ‘स्नान-ध्यानक बादे करब …! ‘ एतेक बाजैत काका पुरनी पोखरी दिस चलि गेलाह। रमेश , काकाके अंतिम बात पर सोचैत सोफा पर बैसल रहल।
- दिनेश यादव (लेखक/पत्रकार/अध्येयता), राजगढ-06, फकिरा, सप्तरी (मधेश प्रदेश)

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