Sunday, 26 January 2025
मैथिलीके मानकीकरण आकि मनमानीकरण ?
मैथिली भाषा-प्रेमी सभक लेल एक टा खुजल चिट्ठी
मानकीकरण आकि मनमानीकरण?
किछु सप्ताह पूर्व मैथिलीक एक टा तथाकथित ‘भाषा-सेवी’क पत्र भेटल जे दरभंगाक एक संस्थाक लेटर हेड पर छल जकर नाम पहिले बेर जानल। पत्रक जवाब लिखनहि रही कि संस्थाक संयोजक केर कॉल आयल आ ओहि बातचीत मे हुनक विद्वताक घमंड तते छल जे ओत’ पत्र पठायब उचित नइँ बुझायल। अस्तु ओहि पत्र केँ वास्तविक भाषा-प्रेमी धरि सोझे पहुँचा रहल छी।
महोदय,
दरभंगा-मधुबनी परिसरक मैथिल दिस सँ, खासक' मैथिली भाषाक चिंता सँ जुड़ल कोनो सांस्थानिक आयोजन समिति दिस सँ, एहन सन कोनो आयोजन मे भाग लेबा लेल साइत पहिल बेर आमंत्रण-पत्र भेटल अछि। मैथिली मे काज करैत आब लगभग पैंतीस साल भ' रहल अछि आ एते साल मे एहन ई पहिल पत्र। तें एहि आकस्मिक सौजन्यता लेल सब सँ पहिने अहाँ सभक प्रति आभार व्यक्त करय चाहब।
एत' मन मे उपजल आशंका सेहो व्यक्त क' दी जे आमंत्रण-पत्र भूल सँ आबि गेल अथवा खानापूर्ति जकाँ?...? एहन सन मारते रास प्रश्न सेहो उठल मन मे जे एकदम निराधार सेहो भ' सकैत अछि। मुदा, एकरा पाछाँ किछु ठोस कारण अछि। प्रायः दरभंगा-मधुबनीक सवर्ण समाजक लोक केँ कोसीक पूब-पछिम आकि दछिन भरक जन-स्वर नइँ अरघैत छनि आ असहमतिक सम्मान करबाक विवेक तँ पता नइँ किएक छत्तीस नदी सँ मथल एहि मिथिला मे बड़ कम भेटै अछि। हम ई लगातार अनुभव करैत रहल छी जे हमर असहमति आ दू-टूक कहबा सँ आहत मैथिली भाषा-साहित्यक अधिकांश संस्था/आयोजनकर्ता परहेज रखै छथि। तें ई पत्र पढ़ि आशंका भेल।
ज्ञातव्य जे मैथिली व्यापक जन-समुदायक भाषा छी, जे अक्षर-ज्ञान धरि सँ वंचित छथि आ विभिन्न तरहें अलग-अलग रूप मे बजैत छथि—एहन सन सब जाति-धर्म, क्षेत्र आ समुदायक सेहो ई भाषा छी। ने कि मात्र मधुबनी-दरभंगा परिसर केर किछु संस्थाजीवी विद्वान, ब्राह्मण-कायस्थ सन कुलीन वर्ग आकि सरकार आ अकादमी सभक पाइ बलें भाषा-विज्ञानी के तमगा पाबि गेल कोनो एहन असहिष्णु व्यक्ति केर जे तथ्यहीन बात पर अपन विद्वता केर ठाठ ठाढ कयने होथि। एहन विद्वान लोकसभ मे सँ अनेक मैथिली केँ संस्कृत जकाँ रूढ़ बना म्युजियम मे राखय चाहैत छथि। एहन लोकसभ ई कखनो ने सोचैत छथि जे ई सलहेसक धीया-पुता कि कोसी मे माछ मारैत बहुरा गोंढ़िनक बेदरा आकि कातक टोल मे गोनरि बनवैत रन्नू सरदारक लोकबेदक सेहो ई भाषा छी। ओना रास बिहारी लाल दास 1915 मे लिखि गेल छथि जे "आधुनिक समय में केवल दरभंगा जिला ही मिथिला का बोधक है परंतु उसमें भी मधुबनी सबडिविजनांतर्गत थाना मधुबनी, खजौली तथा बेनीपट्टी ही मिथिला का परिचय विशेष रूप से देते हैं। इस समय मिथिला का केंद्र मधुबनी माना जाता है। सन् 1877 ई. तक तो दरभंगा तथा मुजफ्फरपूर दोनों जिले संयुक्त होकर जिला तिरहुत के नाम से प्रख्यात थे परंतु 1978 ई. में पृथक-पृथक कर दिये गये।" (‘मिथिला दर्पण’, पृ. सं. 105-06, महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन, दरभंगा, द्वितीय संस्करण 2020) माने ई पंचकोसी मिथिलावादी लोकनिक कल्पित स्वर्ग! कदाचित अहाँ सभक समिति (कार्यदल वा पैनल) मे सेहो बेसी संख्या तेहने लोकक अछि जे भीतर सँ ‘पंचकोसी’ वा सोतिपुरा केँ मिथिला मानैत मैथिली भाषा केँ तत्सम-प्रधान बनौने राख’ चाहैत छथि। एकाध केँ छोड़ि सब पंचकोसी केर कुलीन! एहन वर्ग-समुदायक प्रतिनिधि सभ मिथिला मिहिर के जमाना मे मैथिलीक एक टा ब्राह्मणी रूप तँ गढ़नहि छला आ तकर मारते लोक (हुनक समुदायक) पालन सेहो करै छथि! अहाँक पत्रक भाषा सेहो तकर अनुशरण करैत अछि। आब यदि सर्वसमावेशी रूप निर्धारण के कनेको चिंता रहैत तँ अपन कात-करोट के माने हाशिया परक समाज केँ प्रतिनिधित्व बेसी दैतहुँ। सुभाष चंद्र यादव, तारानन्द वियोगी, जगदीश प्रसाद मण्डल, विभा रानी, रामरिझन यादव, चंद्रकिशोर, आर. के. परार्थी, मुख्तार आलम, बिभा कुमारी, दिनेश यादव, वैद्यनाथी राम, रघुनाथ मुखिया, आचार्य रामानन्द मंडल आदि सन अनेक लोक आ एहन अन्य समुदायक भागीदारी छोड़ि जे एकतरफा निर्णय लेब से कते जनतांत्रिक हैत? ओकाति वला आ सत्ताक करीबी होइवला लग किछु जेबी संस्था रहैत अछि, मुदा तें ओ जे चाहत से नइँ भ' जायत।
आकि अहाँ सभ स्वयं केँ सकल समाजक भाग्यविधाता मानि लेलहुँ?
ज्ञात होअय कि ने जे अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा, सुपौल जिला मे ब्राह्मण-कायस्थ छोड़ि बहुजन समुदाय सँ पैघ संख्या मे लोक अपन भाषा ठेठी, गमार, अंगिका, सूरजापुरी लिखा रहल अछि! सीतामढ़ी-मुजफ्फरपुर के लोक बज़्जिका। पंचकोसी के हठ के चलते एना ने होअय जे एक दिन मैथिली मात्र मधुबनी-दरभंगा परिसर के किछु गाम के भाषा रहि जाय आ अहाँ सभक मनमानी प्रयास सेहो तकर एक टा प्रमुख कारण बनि जाय। एहि सँ बचाव लेल जरूरी जे बहुजन केँ जोड़ू आ सर्वसमावेशी होइ के प्रयास करू।
जनतांत्रिक ढंगें सर्वसमावेशी तरीका सँ मानकीकरण के प्रयास तँ बढ़िया बात, मुदा मानकीकरण के बहाने मनमानीकरण आकि भाषा के संस्कृतकरण होइए तँ से हमरा सन असख्य लोक केँ कोना स्वीकार्य हैत?
महोदय, अहाँ सभ लग जतेक प्रकाशित मिथिलाक इतिहास अछि, ओहि मे वर्तमान कोसी नदीक पूब केर कोनो चर्च नहि अछि, बहुजनक कोनो टा धरोहरिक चर्च नइँ। अहाँक जते शब्द कोष अछि, ओहि मे कोसी पारक शब्द नहि अछि। अहाँ सभक लग तिरहुत आकि दरभंगा राज पर गौरव करबा केर विराट गर्व-बोध अछि, संस्कृत सँ एहन अगाध प्रेम जे मैथिली केँ संस्कृत बनेबा पर कट्टरता के हद धरि अहाँ सभ अड़ल रहैत छी। अहाँ सभक चारू कात जे लोक छथि ओहि मे सँ अधिकांश सब तरहक सत्ता सँ सटल एहन अदृश्य घमण्ड मे रहैत छथि जे दोसर ककरो सुनहि नइँ चाहैत छथि। एहना ठाम संवाद कठिन तँ होइए मुदा असम्भव नइँ।
पैघ चिंताक बात जे एहि समिति के नेतृत्व मे सार्थक संवाद कठिन अछि। तथापि भाषा-चिंता सँ जुड़ल होइ के कारणें हम निश्चित रूप सँ आबितहुँ। एक लेखक-संपादक होइ मात्र केर कारणें नइँ, कोसी क्षेत्रक लोक केर बात ल'क', रन्नू सरदारक लोकबेद आ सलहेसक धीयापुताक बात-चिंता ल'क', मुदा अहाँक आयोजन तिथि पर हम दोसर काज मे व्यस्त रहब। एहि चलतें आयोजन मे भाग लेब सम्भव नइँ हैत।
'उम्मीद' हमरा नजरि मे बड़ महत्त्वपूर्ण शब्द, ई हमरा जीवनक संबल सेहो। तथापि हमरा, एहि परियोजना के कार्यदल मे शामिल अधिकांश नाम जाहि मे सँ किछु के काज सँ अवगत नइँ छी आ जिनका जनै छी ताहि मे सँ दू-तीन गोटे कें अपवाद छोड़ि, शेष केर काज आ गैर-जनतांत्रिक विचार के चलतें संदेह बेसी अछि।
एहन स्थिति मे आयोजन सफल हेबाक उम्मेद बड़ कम अछि; तथापि शुभकामना संग चाहब जे हमर आशंका गलत सिद्ध होइ।
पुनश्च : एत’ हम अपन पूर्व-लिखित एक टा अन्य टिप्पणी संलग्न क’ रहल जे मैथिलीक ‘संस्कृतकरण’ वा तत्सम-प्रधान बनेबाक चिंता सँ जुड़ल अछि—
मैथिली पर नव-नव रूप मे अबैत पुरान संकट
पहिने किछु सवाल :--
1. बहुजन समाज मे प्रचलित मैथिलीक 'विविधतापूर्ण' रूप अहाँ स्वीकार करब आकि मुट्ठी भरि संभ्रांत कुलीन सभक बीच प्रचलित एक टा 'रूढ़ि' जकाँ भ' गेल संस्कृतनिष्ठ रूप ओकरा पर थोपब?
2. संस्कृत सँ प्रेम बेजाय बात नइँ, मुदा तें (संस्कृत-मोह मे पड़ि) मैथिली केँ संस्कृतक अनुगामिनी-दासी बना देब'क प्रयास केँ अहाँ उचित मानब की?
3. सप्रयास 'तद्भव'क जगह 'तत्सम' घुसेड़ब खाहे एहि लेल जे ओकर वर्चस्व 80 प्रतिशत बनल रहय; की ई अहाँ केँ उचित लगैत अछि?
4. लोक सँ काटि भाषा केँ शास्त्रीय बनायब, तथाकथित 'गमार' सँ दूरी रखबा लेल 'पण्डितमुखी' होयब, पंचकोसीक शब्द-संस्कार सँ उच्चारण-व्यवहार धरि सौंसे मैथिला समाज पर थोपब; ई सब कोन तरहक सोच आ मानसिकताक फल थिक?
5. मिथिला मे एक प्रतिशत सँ कम पंचकोसीक सवर्णक जनसंख्या हैत आ ताहू मे सोतिक संख्या बहुत कम, मुदा एहि भाषा पर ओकर वर्चस्व बनौने रखबाक पैघ जतन अहाँ केँ केहेन लगैत अछि?
6. की अहाँ स्त्री आ बहुजन विरोधी लोकोक्ति आ मोहाबरा सँ भरल भाषाक ओहि रूपक ओकालति करब जत' अहीं सन मारते रास लोक केँ हीन बुझल जाइत होअय?
7. सरकारी लाभ लेल जे सभ अंगिका-बज्जिका-सुरजापुरिया क्षेत्र धरि केँ अपन साम्राज्य मानैत रहल, तकरा सभक मुँहें बभनटोलीक पंडीजी सभ सँ बाहरक भाषा केँ 'छोटका लोकक बोली' कि 'राड़क भाषा' कि 'मौगियाही भाषा' कि 'मुसलमानी बोली' कहब की अहाँ केँ अपमानजनक नइँ लगैत अछि? की पचपनियाँक जन्म भाषायी अत्याचार सहबा लेल भेल अछि?
बेगरता :--
'भाषा संकट'क नाम पर एम्हर बहुत चतुराइ सँ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कुलीनतावाद आ पैट्रियरकी (Patriarchy) केर निंघेस छिटबाक नव-नव खेला शुरू भेल अछि। मिथिलाक पंचकोसी मे जनतांत्रिक सोचक अकाल जरूर रहल, मुदा 'ब्रह्मवर्चसी'वला ओहि सोचक खेती खूब होइत रहल जाहि मे बौद्धिक कला कि चतुराइ सँ 'जजमनिका' चलबैत रखबाक षडयंत्र देखाइत अछि। एहन लोक केँ 'विविधता' नइँ सोहाइ छै। 'एकरूपता'क अ'ढ़ मे 'वर्चस्व'क खेला! सत्ता सँ सटि क' रहबाक तेहेन आदति जे स्त्री आकि दलित अस्मिताक सवाल दिस पीठ कयने समय कटि जाय! तहिना मैथिली भाषा आ साहित्य पर एहि बुधियार लोक सभ केँ वर्चस्व चाही अपन दोकानदारी चलबै लेल, भने भाषा नष्ट भ' जाय!...
एहेन-एहेन सोचवला विद्वान सभक मधु मिलायल जहर पीबैत रहब हमरा उचित नइँ लगै अछि तें हम उपरोक्त प्रश्न ल'क' आयल छी जे अहाँ केँ तीत सेहो लागि सकैत अछि।...
आइना :--
'छै' केँ 'छैक'
'छलै' केँ 'छलैक'
'गेलै' केँ 'गेलैक'
'हेतै' केँ 'हेतैक'
'भेलै' केँ 'भेलैक'
'सैह' केँ 'सएह'
'घोड़ा' केँ 'घोरा'
'गौरीनाथ' केँ 'गौड़ीनाथ'
'छलनि' केँ 'छलन्हि'
'कयलनि' केँ 'कयलन्हि'
'नइँ'', 'नै' सन शब्द केँ 'नहि'
एहेन मारते रास उदाहरण अछि। रबड़ जकाँ तिरि क' अनावश्यक रूप सँ भाषा केँ दुरूह, कठिन आ बहुजनक समझ मे नइँ आब'वला बनेबाक कोन काज? संस्कृतक मोह मे विभक्ति केँ सटा क' लिखबाक कोन जरूरति?
चलू, अहाँ ओहिना लिखू! हम सभ तैयो स्वीकारैते आयल छी। मुदा हमरा सभ सन लोक पर तँ अपने-सन लिखै लेल जोर-आजमाइश नइँ करू। बेसी नीक हैत जे हमरो सभक रूप केँ अहाँ सहजता सँ स्वीकार करू। हजार रंगक फूल केँ फुलाइ के मौका भेटबाक चाही। एकरंगा-भाषाक ई आग्रह एक टा स्वस्थ्य विचार नइँ, हिटलरशाही सनक दबाव थिक। हमरा एक्के गाम कोइलख केर भीमनाथ झा कि धूमकेतु आ हरेकृष्ण झाक अलग-अलग भाषा-रूप बुझै मे आ तकर आनंद लै मे दिक्कत नइँ। एक्के गाम लोहना परिसरक अशोक आ शिवशंकर श्रीनिवास बिल्कुल दू तरहक भाषा लिखै छथि आ दुनूक कथा पढ़ब हमरा पसिन अछि। मुदा तें अहाँ एक केँ स्वीकार आ दोसर केँ अस्वीकार करय लेल कहब तँ हम आपत्ति करब। सुभाष चंद्र यादवक पचपनियाँ अहाँ केँ अनसोहाँत, असहज, ठेठ आ गमारक भाषा लागि सकैए, मुदा हमरा बेसी प्रिय अछि। फारबिसगंज, अररिया, बीरपुर आकि मधेपुरा मे बाजल जाइवला मैथिली सुपौल-सहरसा सँ अलग अछि। जे सब कमला पार करैते हनछिन करय लगै छथि, से कोसी-पार आबि की करताह तकर अनुमाने टा लगा सकै छी! एन्ने, ओन्ने, तखनी, बरगाही के सुनैत मातर बेहोश ने भ' जाइ!...
अंत मे आग्रह :--
हे मैथिलीक उपकारी तथाकथित 'विद्वान' सब! अहाँ मैथिलीक बड़ चिंता कयलियै, आब ओकरा बहुजन सँ काटि दै के प्रयास जुनि करू। ताहि सँ नीक जे ओकरा अपन हाल पर छोड़ि दियौ। बहुजन गमार सब, पचपनियाँ सब, ढहलेल-बकलेल मुदा काजुल नवयुवती सभक बलें ई भाषा बचल रहलै, बचल छै आ बचल रहतै। अहाँ सभ सब दिन अपना लेल पुरस्कारक ओरिआओन मे अपसियाँत रहलियै, कोर्स मे अपन रचना सोन्हियेबाक तिकड़म मे ओझरायल रहलियै; आबो सैह करैत रहू महामहोपाध्याय! मैथिली अहाँ बल पर कम, अपन निमुँह-निरक्षर-निर्धन जनक जुबान पर जीवित रहलीह आ एहिना जिबैत रहतीह।
—गौरीनाथ
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गबज
ReplyDeleteवाह ! वाह !! दिलखुश । यथार्थ लिखल । ##पंकज जी, फार्बिसगंज
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