Sunday, 30 December 2012

पत्रकारितामा मौलाउँदै गएको पैसाकारिता (Press and journalist)


पत्रकारितामा मौलाउँदै गएको पैसाकारिता 
मुद्दा र उद्देश्यहीन बन्दै गएको नेपालको पत्रकारिता । यहाँका केही पत्रकारहरू व्यापारीको भुमिकामा देखिन थालेका छन् । समाचार सामग्री मात्रै होइन अखबारको अस्थिपंजर ठानिने सम्पादकीयलाई समेत उनीहरूले आफ्नो व्यक्तिगत स्वार्थपूर्तिका साधन बनाउने समेत चुकिरहेका छैनन् । त्यसैले त अन्य मुद्दाहरुलाई छाँयामा पार्ने गरि उनीहरूले महिनौसम्म पनि एउटै विषयवस्तुलाई संपादकीय बनाई रहेका छन् । खासगरि मधेस मुद्दामा क्रियाशिल वा केन्द्रित केही कथित मिडियाहरू एक सुत्रिय मागका रुपमा संचार समावेशिकतालाई अघि बढाएका छन् । नेपालको संचार क्षेत्र र त्योसंग सम्बन्धित संस्थाहरुमा समावेशिकता नरहेको कुरा अब नौलो रहेन । तर पद प्राप्ति र विदेशको भ्रमण टोलीमा आफ्नो सहभागिताकै पत्रकारिता र संपादकीय या प्रेस सामग्री प्रकाशित गरेर संचार क्षेत्रमा समावेशिकरण सम्भव छ त ? यो यक्ष प्रश्नबारे पत्रकारहरुले सोच्नै पर्ने बेला आएको छ । नेता, मन्त्री र पार्टीका कार्यरतालाई कामधेनु गाई बनाएकाहरुले मात्रै यस प्रकारको कार्य गर्न सक्छन् । गाईलाई दूध देउञ्जेल घाँसपात, दिन छाँडेपछि मुंग्रो बर्साउने स्थितिले त्यसता पत्रकारिता गर्नेहरुको गलत मानसिकता र दरिद्र सोचलाई उजागर गरेकै छ । त्यसैले मुलुकलाई वर्तमान जटिल परिस्थितिबाट त्राण दिलाउनका लागि पनि त्यस्ता पत्रकार÷संपादक÷प्रकाशकले पत्रकारिता गर्दा अनुचित हुनेछैन । जातिगत पत्रकारिता छाँड्दै सर्वेतु सुखिनः को भावलाई अनुशरण गर्दै अगाडि बढे पत्रकारहरु देवतुल्य पक्कै हुनेछन् । अमूक मन्त्रिले आफूलाई अमुक निकायमा नियुक्ति गरेन भन्दै अमुक व्यक्तिको खैरो खन्दै हिड्नु कुनैपनि दृष्टिकोणले राम्रो पत्रकारिता मानिदैँन । भनिन्छ, पत्रकारिता जनसंचारको सबैभन्दा सुलभ, सस्तो र सशत्तः साधन हो । नेपोलिन बोनापार्टले पनि भनेका थिए कि चार विरोधी अखबारहरूको मारक क्षमताका अगाडी हजारौं बन्दुकको शक्ति पनि बेकार हुन्छ । यही कुरा भारतका लोकप्रिय कवि अकबर इलाहाबादीले यसरी भनेका थिए, ‘जब तोपको मुकाबिला गर्नु छ भने अखबार निकाल । अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति ज्याफरले पनि पत्रकारितालाई विश्वमा मन्त्र झै उच्चारण गर्ने गरिएको उल्लेख गर्दै भनेका थिए, ‘स्वतन्त्र प्रेसबिना लोकतन्त्र एक पाइला पनि अघि बढ्न सक्तैन ।’ अतः पत्रकारिता लोकतन्त्र र अधिकार प्राप्तिको लडाई लड्नेहरुका लागि प्राणवायु हो । त्यस्तै, पत्रकारिताको मुख्यतः तीन काम हुन्छ– विभिन्न गतिविधिहरूको सूचना दिनु, जनमतलाई अभिव्यत्तः गर्नु र संचित सूचनाहरूका आधारमा जनमत तयार गर्नु । त्यसैले त यसलाई राष्ट्रको तीन स्तम्भहरु ः विधायिका, कार्यपालिका र न्यायपालिकापछि चौथो स्तम्भ भनिएको हो । नेपाली पत्रकारिता कुनै बेला मिशन जर्नलिज्मलाई आफ्नो ध्येय बनाएको थियो भने अहिले विशुद्ध व्यवसायमा परिणत भएको भनिने गरिएको छ । तर केही संचारकर्मीको व्यक्तिगत स्वार्थ, दम्भ र द्रव्य मोह तथा जातिय धङधङतीका कारण पत्रकारिता पेशा बदनाम हुँदै गएको छ । अहिलेका संचारकर्मीहरु संसाधन, सुविधाहरू र ऐशो–आरामलाई बढी रुचाउन थालेका छन् । आफ्नो कामप्रतिको निष्ठा विर्सदै गएका छन् । सही सूचना दिनुको साटो अनाप–सनाप लेखेर अखबारका पन्नाहरु मात्र भर्ने गरेको भान हुन थालेका छन् । केही पत्रकारहरुले आफ्नो हैसियत सरकारी कार्यालयका बाबुसाहेब जस्तो बनाउँदै लगेका छन् या यसका लागि उद्दत देखिएका छन् । सुविधा प्राप्ति, राम्रो जीवनशैली बिताउने अवसरको खोजिले पत्रकारप्रतिको सम्मान जन–जनमा घट्दै गएको छ । बौद्धिक प्रखरता, लेखनप्रतिको इमान्दारिता र अध्ययवसाय जस्तो गुणहरूको क्षयिकरणले पत्रकारिता राम भरोसे चल्ने अवस्थामा पुगेको छ । एक विद्वानले भनेका पनि छन्– पत्रकारहरुको दिमाग प्याशुट जस्तै हुन्छ, उसले त्यो बेला मात्रै काम गर्छ जब खुला हुन्छ । तर जाति र पार्टी भन्दा माथि उठ्नै सकेका छैनन्, नेपालका पत्रकारहरु । यसमा आफूलाई मधेसी पत्रकारिताको मियो थान्ने केही कथित संपादक÷प्रकाशक तथा पत्रकारिताको ‘प’ समेत थाहा नपाएकाहरूको नेतृत्वमा रहेको संचार संस्थाका कारण मधेसीमुलका संचारकर्मी दिनप्रतिदिन बद्नाम बन्दै गएका छन् । यसलाई रोक्न सरोकारवाला सचेत हुनैपर्छ । 
अतः मधेसी लगायतका सबै संचारकर्मीले के बुझ्न जरुरी छ भने रिपोर्टरहरू पत्रकारिता रुपी रथ हुन भने सम्पादनसंग जोडिएका पत्रकार त्यसको लगाम र सारथी । त्यस्तै, रिपोर्टर अखबारका आखाँ, कान र नाक हुन भने सम्पादकहरु पत्रकारको मुटु र दिमाग । पत्रकारहरुको भाषामा पक्कड, आफ्नो कर्तव्य, समाचार बोधको विकास, शब्दहरूको सामना, राम्रो लेख्ने शैलीलगायतको जानकारी बिनै पत्रकारिता गर्नेहरुको भीडका कारण यहाँ धेरै समस्या सिर्जित हुँदै गएका छन् । त्यसैले त अहिले केही संचारकर्मीहरु पत्रकारिता होइन पैसाकारिता र पार्टीकारितामा जुटेका छन् । फलस्वरुप पत्रकारका नाममा समाजमा केही शैतानहरुको जन्म भएको छ, देश, मधेस र समाजमा । 
अन्त्यमा, पत्रकारहरुले पत्रकारितालाई गम्भिर र व्यावहारिक बनाउँदै आफूलाई संस्कारयुक्त बनाउन जरुरी छ । उनीहरुले आफ्नो पत्रकारीय गतिविधिहरुबाट देश र समाजलाई जति योगदान पु¥याएका छन् या पु¥याउनु पर्ने हो, त्यो भन्दा बढी गैर–पत्रकारीय गतिविधि गर्दै हिड्नु उचित होइन । उनीहरुको विवादास्पद गतिविधिहरुले पत्रकारितालाई लान्छनायुक्त उपकरण मात्रै बनाउने छैनन्, मर्यादाहिन, कर्तव्यहीन जमातका रुपमा परिभाषित समेत गर्नेछ, गरेको छ । पछिल्लो समय उनीहरुमा मौलाउँदै गएको बनियागिरी सोचले पाठकलाई मात्रै चिढाएको छैन, पत्रकारितालाई आफ्नो धर्म, कर्म र आस्था ठान्नेहरुलाई हत्तोत्साही समेत बनाउँदै छ । त्यसैले यस्ता कुनैपनि आवाञ्छनीय गतिविधिलाई संचारकर्मीहरुले तत्कालै छाड्नु पर्छ । एक कविले यो भनाई ‘हेर्नमा यो न गोरो छ न कालो, न उससंग बन्दुक छ न भाला । हुन त बेधडक, निर्भिक फकिरजस्तो जीवनमा, कागत र कलमका धनी अखबार बाला हुन् ।’ यो पंक्तिलाई मनन र चिन्तन गर्दै अघि बढे पत्रकारहरुको कमलकै शक्तिबाट देश र समाजमा परिवर्तनलाई कसैले रोक्ने छैन । यसैलाई मधेसी पत्रकारहरुले वर्तमान परिप्रेक्ष्यमा एउटा मिशन बनाएर अघि बढनु पर्छ । जीवनको लक्ष्य आफ्नो समाज र समुदायको उत्थान र अधिकार सम्पन्न बनाउने बनेमा मात्रै सबैको हित हुनेछ ।    

सहमति केँ सुगा रटान ( Madheshi)


सहमति केँ सुगा रटान
 दिनेश यादव
किछु माह एम्हर नेता सभ सँ ‘सहमति’ शब्दक सुगा रटान बड बेसी भँ रहल अछि । एकटा दैनिक रुटिङ जँका ओहीँ लेल शृंखलाबद्ध बैसार मे ओ सभ जुटल छथि । मुद्दा सहमति अखनो दिल्ली दूर बुझा रहल अछि । ध्रुविकृत राजनीतिक माहौल उत्कर्ष मे अछि । सँगैह नानाथरि केँ प्रयोग सेँहो जारी अछि, एतह । फलस्वरुप संविधान निर्माणक प्रक्रिया दिनानुदिन जटिल मात्र नए ओझेल सेँहो बनएत जा रहल अछि । एतह केँ एक नेता दोसर केँ नेतृत्व स्वीकार कएबाक स्थिति मे नए छथि । सबटा अपने–अपने दाब–पेच, तिग्रमबाज मे व्यस्त छथि । एक पक्ष सत्ता प्राप्ति के लेल जी जान सँ लागल अछि त दोसर पक्ष सत्ता बचाबए मेँ प्राणक बाजी लगौने छथि । ताश के किट्टी खेल जँका बनल अछि सत्ता के छिनाझपटी । सहमति बनएबाक बात त नेता लोकनी करैति छथि मुद्दा भित्री मनसाय हुन्का लोकनिक केँ किछु अउर छैक । तेँ देश गम्भिर संकट आ परिस्थिति के मकडजाल मे फसएत जा रहल अछि । एहीँ मेँ नेतृत्वक वेइमानी आ नाकामी, निकम्मापन आ लाचारीपन कम दोषी नए छैक ।
सत्ता केँ खेल ः सत्ता के इर्दगिर्द मथ्थापिच्चि मे मात्र केन्द्रित भँ बैसार राजनीतिक दल सभ के नेता कए रहल छथि । फलस्वरुप हुन्का लोकनिक समक्ष संकट निवारणक लेल राजनीतिक तौर तरिका आ अवसर आब समाप्ती के ओर अछि । राष्ट्रपति महोदय सहमति बने से चाहना रखैत चारि बेरी समयसीमा बढा चुकल अछि । यी समय बिना उपलब्धिविहीन वितल जा रहल अछि । वैशाख मे चुनाव करेबाक बात से हो भँ रहल अछि । मुदा दल सभक ‘सत्ता सर्त’ केँ कारण सहमति मेँ पहुँचह सँ पहिने नेता सभ कहियो मर्खाहा बरद बनि जाएत अछि त कहियो लथार मारैनिहार गाई । तेँ दुन्नुँह केँ बिना नथिने सहमति नए बनत । सुआ आ नाथैवला दोरी दुन्नुह राष्ट्रपति के पास अछि । मुद्दा रस्सा दोसर के हाथ मे भेला के कारण ओह आब निरिह बनैत जा रहल छएन्हि । खाली सहमति केँ लेल समयसीमा बढाबै मे राष्ट्रपति सीमित भँ रहल अछि ।    
आब राजनीतिक दल मे इतर दृष्टिपथ के तलाश जरुरी भँ गेल अछि । कमजोर मानसिकता आ नेतृत्व केँ चुनौति देनिहार युवाजन के अभाव मे राजनीतिक दल केँ नेता अनेरबा साढ बनल अछि, एतेह राजनीतिक क्षरण के मुल कारण मे एहोँ एकटा छि । राजनीतिक संकट के भाँपवाक आ ओकरा निवारण करबाक ‘काउन्टर स्टे«टजी’ बनबैवाला नेता कोनो दल मे अख्खन नए छैक । जोकर आ मजाकिया भुमिका सँ ऊपर नए उठि पाबि रहल छथि नेता सभ । जौँ अपन परम्परागत आ पुरातनवादी सोच आ व्यवहार मे ओ परिवर्तन नहीँ करताह, देश केँ सर्वव्यापक राजनीतिक, आर्थिक आ सामाजिक संकट सँ निकालबाक स्थिति नए रहत । किएक त एतेह, राजनीतिक सडन आ गलन बड बेसी बढल जा रहल अछि , ओकर दुर्गन्ध चाहु दिस फैलि चुकल अछि । आब त राजनीतिक गन्दगी के रोकबाक स्थिति मे जनता नए छैक । तेँ नव रक्षा कबच के खोजि अति जरुरी भँ गेल अछि । आब सत्ता पक्ष आ विपक्ष के शिर्ष नेतागणक हरेक दिन उपलब्धीबिहीन बैसारक लेल बैसार सँ काज नए चलत । अवसरवादी राजनीतिक जाल के चिरैति जनता अपन अधिकारक लेल फेर सँ सडक मे उत्रए पडत ।  
पडोसी के भुमिका ः किन्कोह घर मे जौ झगडा फँसाद ऊठे त पडोसी के बड बेसी भूमिका रही जाएत छैन्हि । बिना कोनो स्वार्थ कँे आँे समस्या समाधान कएबाक प्रयत्न मे तत्काले लगि जाएत छैक । हाँ मसोमातक घर केँ झगडा मेँ किछु दोसर बात रहैति अछि । किएक त, अभिभावक नए रहला सँ लोक जेँ कहलक सेहा भेल, अहीँ मे छिमेकी सेहो किछु फायदा उठेबाक लक्ष्य बना लएत छैक । नेपाल मे अखन एहाँ स्थिति अछि । देश मसोमात बनल अछि , गार्जन कियो नै छथि । तेँ एतह कियो करची चलबैवला त कियो अंगुलि चलेन्हिार भेट रहल छथि । ओ सभ एक–एक कए केँ नेता सभहक धरिया खोएल रहल छैक । देशक संकट गहरा रहल छैक , नेता सभ मस्ति माडि रहल अछि । एतेह भारतीय वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार केँ प्रभात खबर डट कम में लिखल ई बात सान्दर्भिक अछि । ओ लिखने छथि, ‘नेपालक संकट भारत के सेहो संकट थिक । नेपाल के साथ भारत के सुरक्षा आ ट्रान्जिट संधि विश्व के लेल अनुपम अछि । नेपाल जाहिया कोनो राजनीतिक संकट मे फंसल, भारतो के मुश्किल बढ्ले अछि । अतः नेपाल के प्रति भारत अपन जिम्मेवारी सँ नए बैचि सकैत अछि ।’
नेपालक परिस्थिति ः आजु नेपाल मे सब सँ पैघ बात राजनीतिक दल सभ के बीच मे आपसी सहमति आवश्यक अछि । मुद्दा अखनिधरि तेहन आशा केनाए मुश्किल बुझवा मे अवैति अछि । गैर–माओवादी आ माओवादीबीच आरोप प्रत्यारोप के दौड चलि रहल अछि । नेपालक संकट के मुख्य खलनायक अखन नेता सभ के बीच मे एकता कँे कमी अछि, जन–जन एहाँ महशुश कए रहल अछि । जदि नेता सभ मे संकल्पबद्धता, नेक इरादा आ इमान्दारिता कनिको रहैत त परिस्थिति आ अनुभवहीनता राष्ट्र–निर्माण मे बाधा नए बनैत । नेता सभ संविधान निर्माण नए सत्ता के खेल मे डुबल अछि । तेँ राजनीतिक घात–प्रतिघात मे ओ सभ लगल अछि । नेता सभ दिल्ली के मक्का मदिना आ ओतए के नेता सभ के देवता त मानैत अछि मुद्दा निकासक लेल कहियो सहमति बनएबाक पुरजोर पहल नए भँ रहल अछि । भारतीय नेतागण सेहो कतौह न कतौह चुकि रहल अछि । यी एकता विचित्र रवैया जँका देखाए पडि रहल अछि । खास ककेँ संविधानक विवादास्पद मुद्दा पँ मधेसिया, जनजातिय समूह के नेतागण के साथ तीन प्रमुख दल के बीच सहमति नए करा सकल अछि, भारतीय नेता ।
राजनीति मे वाकयुद्ध ः नेता सभ मे ‘जुबानी जंग’ जारी अछि । पार्टी के ‘ट्रैन्ड क्याडर’ सभ केँ नेता लोकनि झुठ बोलु, तेज बोलु और बारम्बार बोलु सिखा रहल अछि । ई बात हुनक चाल, चरित्र आ चेहरा मे स्पष्ट देखा अछि । राज्य के कालकोढरी मे रखबाक आदि बनि रहलअछि नेता सब ।  नेता सभ कस्मेटिक परिवर्तन मे लागल अछि , एक नए दोसर प्रधानमन्त्री के खोजि मे अछि ओह । कार्यकारी प्रमुखक लेल तीन गोटा के विभिन्न दल ‘लञ्चिग’ प्रक्षेपण कएलक अछि, पिछला बेर । कांग्रेस सँ शुशिल कोइराला, माओवादी सं रामबहादुर थापा, मधेसी मोर्चा सँ महन्थ ठाकुर के नाम प्रधानमन्त्री के कुर्सी के लेल लंचिङ्ग भेल अछि ।
सत्तासिन बनबाक प्रवृति आ महात्वाकांक्षा राजनेता मेँ सिद्धान्त आ नैतिकता समाप्त क देलक अछि । एकरा एना के कही सकैत छि जे सत्ता के चस्का आ नशा लोकतन्त्र आ न्याय के सुन्दर प्रवृति केँ मन्द बना चुकल अछि ।
मिथिला क्षेत्र मे पुरान एक कहाबत अछि जे ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ । इ कहावत वर्तमान दौर मे नेपालक राजनीति पे पुर्ण सटिक बैठत । ‘उल्टे चोर कोतवाल के डाटै’ आरोप लगेनिहार केँ सवाल केँ घेरा मे खडा करि दएत अछि । नेपाल मे राजनीति अस्थिरता, अस्तव्यस्ता, दण्डहिनता, भ्रष्टाचारिता आ मानव अधिकार के उलंघता के संकटमोचन कएनिहार अखन धरि कोनो बेटा एही देश मे जन्म लेने अछि से बुझवा मे आबि रहल अछि । एतह के राजनीति कुरुप, कलुसित, गन्दा बनि चुकल अछि । राजनीतिक नास्तिकता के प्रदुषण एतेह दिनानुदिन बढि रहल अछि । नेता सभहक बोली ग्रिन हाउस गैस के उत्सर्जन जका नेपालक राष्ट्रियता, अखण्डता, सार्वभौमिकता नामक राजनीतिक रक्षा कबच के ध्वस्त बना रहल अछि । तेँ एतेह राजनीतिक ताममान बढैति जा रहल अछि ।
नव–नव प्रयोग ः सहमति करब त नेतासभ कहैत अछि मुद्दा राजनीति मे ओ सभ विभिन्न प्रयोग करैति आबि रहल अछि । तेँ नेता लोकनि अपन प्रयोगक लेल पहिले झलनाथ खनाल केँ आ अखन शुशिल कोइराला केँ ‘गिनी पिग’ओ सभ बना रहल अछि । पिछला बेर त मधेसी मोर्चा के तरफ सँ इमान्दार नेता के खोजी के नाम पर महन्थ ठाकुर केँ सेहोँ ओ गिनी पिग बना रहल अछि । ठाकुर जी सेहो ओही प्रयोग के सामग्री बनबाक बडबेसी आतुर देखा रहल अछि । कि साउथ ब्लक आ नेपालक अमूक पार्टी के प्रयोग मे ओ गिनी पिग बनबाक लेल राजनीति कए रहल अछि या मधेसी जनता के अधिकार दिएबाक दिस ओ अग्रसर रहत ? ई एकटा अखन यक्ष प्रश्न मधेसीजन के बीच खडा अछि । राजनीति देश आ जनता के लेल कि अमुक दल आ नेता के स्वार्थसिद्धि के लेल ? हाँ राजनीति के डगर सत्ता के गलियार सँ सेहो जुजरैत अछि । मुद्दा राजनीति मे दशकौं से अधिक समय अपन आस्था, दायित्व आ संस्कार के गिरबी राखि सत्ता के पछा जौ ओ दौडत त नेता के मान, मर्यादा, ईज्जत, सम्मान, प्रतिष्ठा सभ चौपट नए होएत, इ बात ओ बुझतौ बुझि किएक पचा रहल अछि । नेपालक मिथिला भूमि सँ नेतृत्व कएनिहार लोकनी अखन धरि कहियो अपन पगडी के दाव मे नए लगौलक अछि, एकता मोडेल के भूमिका मे ओ सदैव रहल अछि , आदर्श त हुनका लोकनी मे कतेक कतेक छल, ओकर बखान मे विश्वके कोनो डिक्टनरी के शब्द कम पडत । अतः राजनीति अपना लेल नए जनता केँ लेल करी त अति सुन्दर रहत ।
राजनीतिक निकास ः सहमतिय सरकार निर्माणक संभावना आब न्युन होएत जा रहल अछि । तेँं आब बहुमतिय आधार मेँ संविधान निर्माण प्रक्रिया आगा बढाबए पडत । किएक त चुनावी सरकार के नेतृत्व कएबाक लेल धारा ३८(१) मुताबिक राष्ट्रपति के आह्वान असफल भँ गेलाह सँ आब म्याद थपनाए अनुचित अछि । राष्ट्रपति के संविधान के धारा ३८(२) के डगर पकरैत बहुमतीय दिस डेग बढबएटा पडत । मुद्दा अहु मे ओतबे जटिलता छैक । किएक त अखन नए संविधानसभा अछि, नए संसद, तेँ कोन आधार मेँ राष्ट्रपति महोदय आगा बढत ? जौ दलक संख्या के आधार मे बहुमतीय परिपाटी शुरु होएत त एकर बहुते विरोधाभास सेँ हो अछि । व्यक्ति पिच्छे दल आ नेता भेला के कारण समस्या के सम्बन्ध मे जतेक सोचवा आ बोलवा मे आसान अछि ओतवे क्रियान्वयन मे कठिनाई । मुद्दा राष्ट्रपति समक्ष आन विकल्पो त शेष नए बचल अछि । आब संविधान के अक्षर स नए भावना अनुसार चलए वाला बात सेहो उठि रहल अछि । मुद्दा भावना सरकार निर्माण मे मात्र किएक ? संघियता, राज्य के शासकीय स्वरुपसहित के विवादित मुद्दा मे किएक नए ? प्याकेज मे जौ राजनीतिक सहमति होएत देश, मधेस, हिमाल आ पहाड के बासिन्दा केँ बड बेसी राहत भेटत । सहमति मे जौ बाह्र बजेबाक स्थिति मे नेता सभ रहत तेँ जनता हुन्का लोकनि के कहियौ माफ नए करताह । तेँ ‘राति के बाह्र बजे मुन्ना जरुर मिलना राति के बाह्र बजे’ छोडि समय रहिते ठोस समाधानमुलुक निकास अति आवश्यक अछि । बैसार के लेल बैसार छोडि, निष्कर्ष केँ लेल वार्ता सार्थक होए से चहना जन–जन के अछि । छल आ प्रपञ्च छोडि जनता के लेल नेता सभ काज करए त उत्तम रहत ।