Tuesday, 24 April 2018

मैथिली दिवस कहिया ?

कोनो भी महत्वपूर्ण ‘दिवस’ वर्ष में एकैह बेर होएत छैक आ मनाओल सेहो जाएत छैक । विश्वभरि ऐहा मान्यता आ परम्परा छए । मुदा #मिथिला में एकैहटा ‘दिवस’ फरक–फरक तिथि में मनाउल जेबाक बात देखबा में आएल अछि । हमर खोजी ऐही बातक पुष्टि करति अछि । जतबे अगुवा आ संस्था, ओतबे  ‘दिवस’ । वाह #मिथिला आ वाह मिथिला कें कथित अभियानी ।
ऐही वर्षक जानकी नवमी (२४ अप्रिल २०१८) के किछु गोटा ‘मैथिली दिवस’ कें नाम पर प्रचारवाजी मे जुट छइथ । फेसबुक में ‘हँकार पत्र’ छापि कें ओ स्वघोषित रुप सँ एही प्रचार में लागल छइथ । एकरा प्रोमोट कएनिहार सभ मिथिला केँ एलिट क्लास कें लोक सभ थिकैह । अगुवा सभ त अइछे, किछु नटवरलाल सभ सेहो ऐही अभियान मे लागल अछि । ओ सभ अपन–अपन बधाई साटफेर कँ रहल अछि । खुशी बँटनाए कोनो बेजाए बात नए , मुद्दा जे मोन लागल सेहा करी, कनिक अनुचित आ अशोभनिय बात भेल । ‘मिथिला जिन्दाबाद’ मे प्रविणनारायण चौधरी जनवरी ८ के ‘मैथिली दिवस’ के पाठ्य सामग्री परोसने छइथ(८ जनवरी २०१७ के अंक) । ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के खबर सेहो जनवरी ८ के ‘मैथिली दिवस’ कें मान्यता देने छैक(७ जनवरी २०१७ के अंक) । दैनिक जागरण में ‘मैथिली दिवस २२ डिसेम्बर’ के लिखने अछि(१८ डिसेम्बर २०१२ कें अंक) । ऐही में दुटा समाचार ‘भारतीय संविधानक
८म् अनुसूची मे मैथिली भाषा केँ शामिल करबाक घोषणा भारतीय राज–पत्र(गजेट) मे प्रकाशित कैल गेल बात सँ सम्बिन्धित अछि । दैनिक जागरण कें समाचार में मैथिली दिवसक सन्दर्भ उल्लेख नए छैक । आब बुझहू, पाजा ओइ पार जनवरी ८ आ डिसेम्बर २२ केँ ‘मैथिली दिवस’ ? पाजा ऐही पार जानकी नवमी कें ‘मैथिली दिवस’ ? नेपाल मे ऐकरे स्थापित करबाक कसम किछु गोटे खेने छइथ, त्याँ ऐही दिवस के ‘हंकार पत्र’ सोसल मिडिया में अन्धुने शेयर माडि रहल छइथ, लाइक पाबि रहल छइथ । ई पड पैघ दुर्भाग्य रहलइये मिथिला के, बिना बुझ्ने लोक सभ भेडिया धसान बनि जाएत छइथ ।
हमर प्रश्न, ‘मैथिली दिवस’ किएक आ कहिया ?’ आ ‘किनका केल ?’ । पहिले ई फरिछाऊ तहने कोनो दिवसक गप्प करी त उचित भँ सकैए आ होइत । जानकी मिथिला केँ मात्र नए रहि गेली , ओ विश्वव्यापी भँ गेली अछि । हिन्दू केँ आस्था केँ केन्द्र बिन्दू से त छन्हिए । जानकी केँ ‘मैथिली दिवस’ केँ घेरा में नए बान्हल जाए, से हमर
अनुरोध । जौ ई पराक्रम कियो करत या करि रहल छइथ, संकिर्ण मानसिकता के उपज मात्र ई भँ सकैत अए । ऐही सँ मिथिला आ मैथिली के कल्याण नए होइत । मिथिला केँ पहिचान आमजन कें विमर्श से होमाँक चाहीँ । जन–जन केँ विमर्श आ मान्यता बिना कोनो पहिरन, शैली, भाषा, सम्पदा, संस्कृति, रहन–सहन,
भेष, भूषा के प्रचार खास जाति विशेषक गुरुत्व कें अधिनस्थ भँ के होएत , त ओ दीर्घकालिन किमार्थ नए भँ सकैत अछि । ‘जर्बजस्ती में बुद्धियारी गुम भँ जाएत छैक, से बात त मिथिला में प्रचलित छए ने यौ । अपन मिथिला के अधोगति सँ बचिबैत सुन्दर, शान्त आ वैभवशाली बनेबाक लेल सभ गोटे जुटि ।