Friday, 8 June 2018

मिथिला शब्दके अपव्याख्या !

इतिहास विजेता सभ लिखैत छथि, ई कहबी पुराने अछि । मुदा टटका–टटकी सेहो ऐहने अनुभव हमरा भँ रहल अछि । कोनो ऐतिहासिक पहिचान, संस्कृति आ धरोहर सभकें जौ बिना आधारक आ सन्दर्भ सामग्रीक उल्लेख करैत अपना अनुकूलकेँ व्याख्या कयल जाय या कियो करत त बुझियौं ओ कोनो ‘बाद’सँ अभिप्रेरित अछि । सन्दर्भ एक विद्वान पत्रकारक स्टेटस सँ सम्बन्धित अछि । ओ ‘मिथ’ आ ‘इला’ केँ जोडि मिथिलाकें (अ?)व्याख्या केने छथि । ‘मिथ’ आ ‘इला’ पर हुनक तर्क मौलिक जरुर छन्हि, ओ अपन वाक स्वतन्त्रताकेँ उपयोग केलन्हि तेकर सम्मान करी । मुदा हुनक तर्क विभिन्न ऐतिहासिक दस्ताबेज सँ मेल नय खाए छैक । हाँ मिथिलाकेँ किछु कथित पण्डित सभ ऐहने व्याख्या कएने हेताथ त ओ अलग बात भँ सकैत अछि । ओहुना, मिथिलाकेँ इतिहास ‘मिथक’ आ ‘भाषण’ पर बेसी आधारित रहल बात बहुत रास विद्वान सभ कहि आ लिख चुकला अछि । लेखक, विद्वान आ वरिष्ठ पत्रकार सुजित झाजी हमरा लेल सम्मानित लोक छथि, हुनका सँ हमरा कोनो आग्रह या पूर्वाग्रह नए । सामाजिक संजालमेँ आयल हुनक अभिव्यक्ति पर लक्षित हमर ई व्यक्तिगत प्रस्तुति सेहो अछि । अपन अभिव्यक्ति सार्वजनिक कयल जेबाक बाद ओहि पर सकारात्मक बहसक आवश्यकता रही जाएत छैक । हमर अहि बहसकेँ कियो कोनो जाति विशेषक विरोधी केँ रुपमेँ लैत छथि त ओ ओहिकेँ लेल स्वतन्त्र छैथि । अहिमेँ हमर दोस किन्नौह नए । हम मिथिलाकेँ छी, हमर माईकें बोली मैथिली छी, तेँ अहि विषय पर आयल सकारात्मक या नकारात्मक टिप्पणीपर अपन धारणा प्रस्तुत करबाक हक रखैत छी आ हक राखबेटा करब । एतह मित्र सुजितजी केँ स्टेटस आ ‘मिथ’ आ ‘इला’ पर उपलब्ध सामग्री हुबहू रखबाक प्रयास केने छी । अहि विषयपर मैथिली लेखककेँ धारणा हमरा लग उपलब्ध नइ अछि, जौ किनको लग हुए त उपलब्ध करावल जाए, अभारी रहब । एतह देलगेल सामग्री सभमें ‘मिथ’कें अर्थ प्रशस्ति, गुणगान आ ‘इला’क अर्थ बुद्धि आ शक्ति कतौह नए छैक । ‘मिथ’ जखने अंग्रेजी भाषाकेँ माइथ या मिथ केँ समअर्थी भँ जाए त बुझु, ओकर अर्थ बृहत भँ गेल । किएक त जतह कतौह शाब्दिक विवाद उब्जलईये ओत अंग्रेजिया सन्दर्भ सामग्री मध्यस्थकर्ताकेँ रुपमेँ देखल गेल छैक । व्याख्या गलत नइ छैक, ओना अहि सँ किनको घाटा आ नाफा सेहो नय मिलैय बला छय । तहियौँ सत्य आ यथार्थपरक बात एबाक चाही, से मात्र हमर आशय अछि । ओना मनमर्जी व्याख्या करबाक लेल सबगोटेकेँ छुट अछि । इतिहासक लेखक सभ त मनमौजी अपना अनुकूल व्याख्या अतितमेँ केनैहिए रहता आ आब अहा हम सेहो ओही पथमेँ गमन करय लागब त मिथिला आ मैथिलीकेँ कि होयत । ओना अहि सभ सँ उभर उठि सभकेँ जोडि केँ लँ जेबाक बात होयत त उत्तम ।


Sunday, 3 June 2018

मिथिलाबारे मैथिली लेखकबाटै त्रुटि

कान्तिपुरमा २०७५ बैशाख २ गते ‘लोकनायक सलहेस र नया“ वर्ष’ शिर्षकमा प्रकाशित धीरेन्द्र झा प्रेमर्षिको लेखले पाठक माझ विभिन्न भ्रम श्रृजित गरिदिएको छ । आफूलाई मिथिला अभियानी तथा संस्कृतिकविद् भन्न रुचाउने उहा“बाट लेखमा भएका त्रुटिहरु तल उल्लेखित छ । 
१.‘नव वर्षकै दिन मिथिलामा मनाइने जुडशितल...भनिएको छ, तर मिथिलामा बैशाख दुई गते जुडशितल मनाइने परम्परा छ । बैशाख १ गते सतुआइनका रुपमा मनाइन्छ ।
२. ‘बैशाख १ मा फुल्ने गुच्छा आकारको फूल.... भनिएको छ, तर उक्त फुलको नाम आलेखमा कतै उल्लेख गरिएको छैन । एक ठाउँमा ‘वनस्पतिविद्हरुले आर्किडको फूल भन्ने गरेको उक्त फूल फुल्ने रुखलाई स्थानीयले हारमको रुख भन्ने गरेका’ उल्लेख छ । ‘रुख’ को नाम हैन स्थानीय बोलीचालीमा उक्त फूलको नाम पाठकलाई दिन सक्नु पर्छ ।
३. ‘सलहेस फुलबारी नामक वाटिकामा फुल्ने फूल मिथिलाका ‘लोकनायक सलहेस गाथासंग सम्बन्धित’ भनेर उल्लेख गरिएको छ । यहा“ भनिदिऊँ, ‘लोकनायक सलहेस’ र ‘सलहेस गाथा’ दुई फरक कुरा हुन । ‘लोकनायक’ शब्दले पराक्रमी र वीर पुरुष भनेर बुझिन्छ, ‘लोकगाथा’ स्तुतिगानसंग सम्बन्धित हुन्छ, जुन मिथिला क्षेत्रमा मनोरञ्जन सामग्रीका रुपमा बढी प्रयोगमा ल्याइने गरिएको पाइन्छ । पहिले ‘लोकनायक’ त्यसपछि ‘लोकगाथा’ हो । लेखमा ‘लोकनायक’ त भनियो तर त्यो भन्दा पहिले ‘बाटिका’ लाई गाथासंग जोडिएको छ । यो ‘हेरारिकल्ली’ मेल खा“दैन ।
४.लेख लोकगाथामा आधारित छ । त्यसैले यसको बीच–बीचमा सम्बन्धित लोकनायकका ‘गाथा’हरुको साना–साना पंक्तिहरु राखिनु पथ्र्यो,त्यो छैन । सलहेस लोकगाथामार्फत मिथिला क्षेत्र र समाजका थुप्रै विकृति र विसंगीहरु समेत उजागर गराउने परम्परा छ, त्यो परम्परालाई समेटन नसक्नु लेखकको कमजोरी हो । 
५.लेखकले सलहेस फुलबारीलाई शुरुमा स्थानीय(?) लोकआस्थासंग मात्र जोड्न खोजेका छन्, पछि व्यापकता दिन खोज्दा धेरै ठाउँमा चुकेका छन ।  मिथिलाको लोकनायक भनिसकेपछि ‘स्थानीय’ शब्दको प्रयोग गर्दा अन्य स्थानकाहरुको मोह भंग हुन सक्छ । अर्को कुरो ‘सलहेस मात्र सिरहाका हुन’ जस्तो भान पर्ने गरि लेखिएको ‘राजा सलहेससंग सम्बद्ध अधिकांश ऐतिहासिक स्थलहरु सिरहामा पर्छन’ वाक्यले लेखकको मानसिक संकिर्णतालाई पुष्टि गर्छ । 
६. लेखमा दशकौ(?) देखि भव्य(?) मेला लाग्ने गरेको उल्लेख छ । लेखकले ऐतिहासिक स्थलतको वर्णन गरिरहँदा सही तिथिमितिको उल्लेख अनिवार्य हुन्छ । ‘दशकौ’ या ‘भव्य’ जस्ता अमूर्त शब्द र विश्लेषणले वाक्यलाई त लम्ब्याउन सक्ला तर ऐतिहासिक जानकारीहरु ओझेलमा पर्न जान्छ , लेखको यो पनि ठूलो कमजोरी रहयो । 
७.आलेखमा अलिक तल गएर लेखकले ‘लोकनायक’ लाई  मूलतः(?) ‘लोकगाथा नायक’ भनेका रहेछन् । फेरी वास्तविक नाम जयवद्र्धन भनेर सलहेसलाई सातौं–आठौं शताब्दीका ‘महापुरुष’का रुपमा चिनिने गरिएको पनि उल्लेख छ । पढदै अझ तल गएपछि ‘हाल एक खास जातिमा सीमित पारिएको, उक्त जाति दलितमा दरिएको र दलितहरुको समुचित पहु“च शिक्षा तथा अध्ययन–अनुशन्धानका क्षेत्रमा हुन नसकेकाले पनि यिनीबारे खासै ऐतिहासिक अध्ययन हुन नसकेको’ भन्ने आशय अनुचित छ, जातिविशेषलाई प्रश्रय दिनेगरि आएका छन् । आफ्ना ‘लोकनायक’ र ‘लोकदेवता’ बारे अध्ययन गर्नु र संविधानमा मौलिक अधिकार बनिसकेको ‘शिक्षा’ प्राप्त गर्नु दुई फरक कुरा हुन । प्रसंगै नमिल्ने गरि विषयवस्तु लेखमा घुसाइएका छन् ।
८.आलेखमा उल्लेख गरेका इतिहासकार र अन्वेशकहरु मैथिली लोकगाथामा मात्रै केन्द्रित भएकाहरु हुन । इतिहाससंगै सम्बन्धित अन्य विद्याका विद्वानहरुको भनाई तथा सन्दर्भ ग्रन्थहरुलाई पनि समेट्न सकिने प्रशस्तै ठाउ“ थियो , त्यो कुरो खड्किएको छ ।  ‘मनोरञ्जन’ को सामग्री बनाइएको ‘सलहेस नाच’ या अन्य लोकगाथामा मात्रै केन्द्रित हुनेहरुलाई यहा“ स्थान दिनुको प्रमुख कारण तिनीहरु ब्राह्मण र सलहेसलाई ‘अछुत’ बनाएरै हो । लेखकले सजातिय  विद्वानहरुको नाम मात्र उल्लेख गरेका छन् । एक जना गैर–ब्राह्मण रामभरोष कापडी भ्रमरले अघिल्लो साता प्रकाशित पुस्तक या उनलाई पनि उर्दृृृत गरेर लेख्दा राम्रो हुन्थ्यो ।
९.लेखक आफै सलहेस कुन शताब्दीका हुन भन्नेबारे अन्यौलग्रस्त देखिएका छन् । विभिन्न लेखक तथा विद्वानहरुको मत जाहेर गर्दा पनि एउटा निस्कर्षमा पुग्न सकेका छैनन् , हामी जस्ता पाठकलाई झनै अन्यौलता सिर्जना गरिदिएका छन् । त्यसैले उनी आलेखमा पहिले ‘सातौं–आठौ’ं भनेका छन, त्यसपछि ‘पाँचौं–छैटौ’ं शताब्दी भनेका छन । मैथिली भाषाको ‘वर्णरत्नाकर’ लाई समेत उर्दृत गर्दा पनि निस्कर्षमा पुग्न नसकेर ‘चार–पा“च’ शताब्दी भन्नु लेखकको ठूलो कमजोरी देखियो । महेन्द्र मलंगियाको तर्क यदि सहि छ भन्ने त्यसलाई नै मान्दा उपयुक्र्त हुनेथ्यो । आफै पुर्ण विस्वस्थ नभई सकेको विषयवस्तुमा कलम नचलाउ“दा उचित हुन्छ । 
१०.लेखमा सलहेसका नाम सन्दर्भमा विद्वानहरु(?) को मत भनेर उल्लेखित तर्क मात्र ‘शब्दार्थी–विश्लेषण’ संग सम्बन्धित छ । त्यो भौगोलिक, सांस्कृतिक र सामाजिक रुपमा मेल खाने खालको छैन । धिरेन्द्रले मिथिलालाई ‘दोशाँध’मा रहेको राज्य भनेर लेखेका छन, सलहेसलाई मिथिलाका राजा पनि भनेका छन, अनि सलहेससंग सम्बद्ध सिरहा र धनुषाका ऐतिहासिक स्थलको मात्रै चर्चा पनि गरेका छन । सीमा रेखाले छुटयाएको पारी पट्टि रहेको मिथिला तथा सप्तरी, महोत्तरी, सर्लाहीदेखि वाराको सिम्रौनगढसम्मको मिथिला क्षेत्रलाई के भन्ने त ? हो, यहा“ मिथिला राज्य नभनेर उत्तरवर्ती सीमा उल्लेख गरि आफ्नो तर्क राख्न सकिन्थ्यो । लेखक त्यहा“ पनि चुकेका छन् ।
११. ‘सलहेसको गाथागीत तथा नृत्य हेर्न भनेपछि मिथिलाका नरनारिले दिनभरको थकाईलाई चटक्कै बिर्सेर रात छयांगै काटिदिन्छन’ भनेर लेखमा उल्लेख छ । यहाँ ‘रात काटिदिन्छन’ हैन, ‘रात काटिदिन्थे’ हुनु पर्छ । किनभने सलहेस गाथागीत र नाच मिथिलाको गाउँ–गाउँमा हुन छाडेको वर्षौ भईसक्यो । नाचपार्टीहरु भंग भईसके या कालाकारहरु नाच्नै छाडिसके । यहा“ लेखकले झुटको खेति गरेका छन् ।
(नोट ः नागेश्वर यादव ‘नगवा’ (सप्तरी, राजबिराज खर्साल टोल) को यो प्रतिक्रिया कान्तिपुर दैनिकसंगै मेरो मेलमा पनि सम्प्रेषित गरिएको थियो । कान्तिपुरले संवादित अंश प्रकाशित गरेको थियो,शिर्षक अर्कै राखेर )



Friday, 1 June 2018

मिथिलामे ब्राह्मणवाद(I)

काठमाण्डुमे किछु दिन पहिले मिथिला आ मैथिली पर एकटा कार्यक्रमक आयोजन भेल छल । नेपालक प्रथम राष्ट्रपति डा. रामबरण यादवके कार्यक्रमक प्रमुख अतिथि बनाओल गेल रहै । कार्यक्रम विवादरहित नय भँ सकल से बात सामाजिक संजाल सभ मे खुबे चर्चा मे आयल । अपन–अपन इन्ट्रेस्ट अनुसार लोक सभ कार्यक्रमक विषय पर सामाजिक संजाल में प्रतिक्रिया लिखलक । लेकिन अपनाके मैथिली भाषा आ संस्कृति कें सुच्चा अभियानी मानैय बला प्रविणनारायण चौधरी अपन अनलाइनमे जे लिखने छथि, ओईमे विशुद्ध ब्राह्मणवादकेँ पक्षपाति देखबामे आयल अछि । प्रमुख अतिथि डा.यादव पर लिखल गेल हुनकर टिप्पणी दुर्भाग्यपूर्ण अछि । पूर्व महामहिम राष्ट्रपति पर केन्द्रित हुनक प्रहार मिथिला आ मैथिलीके किन्नौह नय जोडत । आलेखमे, हुनक आक्रोशपूर्ण प्रस्तुति गैर–ब्राह्मण पर बेसी देखल गेल अछि । तेँ पूर्व राष्ट्रपतिके मातृभाषाक मौलिकताक ज्ञान नहि रहल पात्रके रुपमेँ ओ प्रस्तुत केने छथि । तहिना नेपालक राजनीतिक विश्लेषक एवं विद्वान प्रदिप गिरीके आलेखमें ‘कथित’ पात्रकें रुपमे उल्लेख केने छथि । हुनके आलेखमे गिरीकेँ उदृत कँके लिखल अछि ‘मैथिली भाषा ब्राह्मण–कायस्थ मे सिमटल छैक, ताहि हेतु मिथिलाक राजनीति गौण छैक’ । इ कडबा सच कोनो मैथिल ब्राह्मणवादीके पचत से असंभव अछि । तेँ एकटा विद्वान कें प्रविणजी ‘कथित’ कहि केँ निचा देखा रहल छथि । ऐतह हम ई कहि दि जे, हम प्रदिप गिरीजी केँ अहि बिचार सँ विल्कुल सहमत छि । ऐहने बिचार वरिष्ठ नेता एवं प्रखर वक्ता रामचन्द्र झा रखलन्हि । झाजी के कहब रहैन्हि, ‘ब्राह्मण–कायस्थक मैथिलीक मानक सही आ अन्य केर गलत छैक’ आलेखमें उदृत केल गेल अछि । ऐहन कडबा सच्च कियो उगैल देत, बहुत दुर्लभ घटना थिक । तइयौ प्रविणजी के लेल रामचन्द्र झाजी ‘रामचन्द्र बाबु’ छथि । यौ श्रीमान्, मिथिला आ मैथिली ओहिना पाछा नय छए, किछु गोटा केँ ऐहने दरिद्र मानसिकता र संकिर्ण विचारक कारण एकर उन्नति अपेक्षाकृत नए भँ पाबि रहल अछि । हाँ, किछु गोटाके रोजीरोटी आ चाँदी कटाई सेहो अहि नामपर भइये रहल अछि । लेकिन अहि सँ मिथिला आ मैथिलीके प्रगति असम्भव आ असम्भव अछि ।
  Caption ::नेपालके राजधानी काठमाण्डुमे ‘चनमा’ नामक विवादास्पद कार्यक्रम पर
 ‘मैथिली जिन्दावाद’ अनलाईनमें मई ३० में प्रकाशित आलेखक एक अंश ।


Wednesday, 23 May 2018

शाक्तिशाली प्रधानमन्त्रीको फितलो प्रदर्शन


Dinesh Yadav
नेपालमा कुनै पनि नेताको भारततर्फको झुकाबलाई ‘लम्पसारवादी’ र भारतीय भूमिकालाई ‘विस्तारवादी’ भनेर टिप्पणी गरिन्छ । यी दुई शब्द भन्दा पृथक शब्द पनि यहाँ प्रयोगमा ल्याइन्छ, त्यो हो ‘धोती’ । मधेसी दलका नेतादेखि कार्यकर्ता र त्यस क्षेत्रका आम नागरिकलाई होच्याएर सम्बोधन गर्ने शब्द पनि हो, यो । मधेसीलाई ‘भारतीय’ नै ठान्नेहरुले प्रयोग गर्ने ‘धोती’ शब्द यहाँका ‘घोर राष्ट्रवादीहरु’ को ठेगो र जनजीव्रोको बोली बन्ने गरेको छ । ‘लम्पसारवादी’ या ‘विस्तारवादी’ भन्ने आरोप लगाउनेहरुको बोली सत्ता समिकरण र कुर्सीका लागि तालमेल भएपछि फेरिने गर्छ । तर, मधेसीलाई ‘धोती’ भन्नेहरुको लबज कहिले फेरिँदैन । फेरी, यी तीन शब्दहरु राजनीतिसंग जोडिएका छन्, जुन निर्वाचनका बेला अलिक चर्को रुपमै उठने या उठाइने गरिन्छ । भारत र भारतीय पक्षधरहरुको विरोध गर्नेहरु थुप्रै पटक सत्तामा पुगेका छन् । सत्ताका लोभीपापीहरुको यो मानसिकता तबसम्म कायम रहन्छ, जबसम्म ‘कुर्सीभोग मुर्हुत’ आउँदैन । त्यसपछि तिनीहरुको विचार, अडान र बडी लंग्वेज समेत फेरिएकै हुन्छ । शायद सत्तामा लामो समयसम्म टिकिराख्नका लागि यसो गरिएको हुनुपर्छ । संसदमा प्रचण्ड बहुमतका साथ हाल सत्तासिन रहेका प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओलीले पनि यी र यस्तै प्रवृति दोहराए । प्रधानमन्त्री बनेपछि पहिलो विदेश भ्रमण ‘दिल्ली दर्शन’ बाट हुने परम्परालाई तोड्न सकेनन । ‘राष्ट्रवादी’ नेताबाट कम्तिमा यसपटक यसमा क्रमभंगताको अपेक्षा आम नेपालीजनमा थियो । एउटै मुलुकमा एकै वर्षमा कुनै देशका दुई जना कार्यकारी प्रमुखको भारतको राजकीय भ्रमण हुनुलाई एउटा संयोग मात्र किमार्थ मान्न सकिन्न । जसले जे भने नि यो एउटा ‘शक्ति पूजा’ कै अंश हो । यसभित्र धेरै कुरा लुकेका छन, हुन सक्छन । ती सबै अगामी दिनहरुमा उजागर हुनेनै छन ।           
प्रधानमन्त्री केपी ओलीको पछिल्लो भारत भ्रमणको खासै मुद्दा थिएन, सबै पुरानै थिए । तर पहिलेको तुलनामा उनको यो भ्रमण भारतले चार महिनाजति ‘नाकाबन्दी’ (मधेसी दलहरुले भने यो आफूहरुले गरेको दाबी गर्छन) गरेपछि भएकोले धेरै महत्वका साथ हेरिएको थियो । फेरी ओलीको पार्टी नेकपा(एमाले) पछिल्लो चुनावमा आफूलाई भारत विरोधीको रुपमा प्रस्तुत हुँदै चुनाव जितेको आमजनको बुझाई पनि छ । भ्रमणका क्रममा भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीसंगको झण्डै एक घन्टा लामो ‘वान इन वान’ भेटपछि ओलीले नेपाल र भारतबीच खासै समस्या नभएको सार्वजनिक गर्नु धेरै अर्थपूर्ण छ । खासगरि नयाँ दिल्लीले ‘दिल खोलेर’ नेपालको संविधानको स्वागत आजको मितिसम्म नगरिसकेको सन्दर्भमा प्रधानमन्त्री ओलीको यो भनाईले ठूलो अर्थ राख्छ । अझ चमत्कारिक रुपमा दिल्ली भ्रमणकै क्रममा आएको उनको यो भनाई ‘असमझदारी पहिले नै सकिएकोले अब विश्वासको आधारमा सम्बन्ध उचाईमा लैजाने हो’ धेरैलाई आश्चर्यमा पारेको छ । सुरक्षा या अन्य सम्बन्धमा नेपालबाट भारतले कुनै चिन्ता लिन नपर्ने विषयमा मोदीलाई ओलीले आश्वस्त पार्ने प्रयास गर्दा गर्दैपनि उताबाट यसको खासै ठोस जबाफी प्रतिक्रिया आउन सकेन । अपेक्षा थियो, यति भनेपछि त नेपालको संविधानको स्वागत भारतले गरि देला कि ? हुनत, यो विषयमा संविधान जारी हुनुअघि, जारी भई सकेपछि र अहिले पनि भारतको ‘रिजर्भेसन’ कायमै रहेको यसले थोर बहुत पुष्टि गर्छ, हुन्छ । किनभने भारतले भन्दै आएको नेपालको समृद्धि, शान्ति र विकासमा उसको ‘सहयोग रहने’ भन्ने भनाईले मात्र अब पुग्दैन , यी त पुरानै कुरा मात्रै हुन । मोदीको नेतृत्वमा भारतमा बनेको हिन्दूवादीको सरकारपछि शुरुका दिनमा केही मधुर सम्बन्ध कायम रहेपनि सार्क मुलुकस्तरीय बैठकपछिका दिनहरुबाट नेपालमा भारत विरोधीहरुको संख्या बढेकै छ । पछिल्लो समय भारतविरोधी भावनाहरु झनै बढ्दै गएका छन्, अझ सीमावर्ती क्षेत्रमा बढी नै देखिन्छ । त्यसैले त ती क्षेत्रमा चीन र युरोपेली युनियनले आफ्ना विभिन्न गतिविधिहरु बढाउदै लगेका छन । चीनले मधेस क्षेत्रमा बाढी पीडितलाई ठूलो रकम सहयोग गर्नु र पश्चिमा मुलुकहरुले पनि तराई–मधेसकै केही लोभीपापी व्यक्तिहरुको नेतृत्वमा रहेको संस्थाहरु मार्फत अर्बौ रुपैयाँ खर्चिनुले मधेस क्षेत्र अब भारतको नियन्त्रण बाहिर गएको दाबी विश्लेषकहरुले गर्छन । कोशीमा तटबन्ध निर्माण गर्ने भारतीय योजना सफल भएमा त्यस क्षेत्रमा नयाँ दिल्लीप्रतिको नकारात्मक भावना झनै बढ्ने निश्चित छ ।
पछिल्लो केही वर्षयता भारतले कोशीमा उच्च बाँध बनाउने कसरत गरिरहेकै मेसोमा ओलीको महत्वाकांक्षी सोच पानीजहाजको सपना पुरा गर्ने भएको छ । कोशीमा तटबन्धले तराईका केही जिल्लाहरुमा उठीबास हुने अवस्था आउन सक्छ । यसको विरोध पहिले देखि नै हुँदै आएको हो । तर प्रम ओलीले यसमा पनि ग्रीन सिंग्लन देखाई दिएपछि भारतलाई सजिलो भएको छ । भ्रमणका क्रममा जलमार्गमा जहाज, वीरगंज काठमाडौं रेलमार्ग र कृषिमा आधुनिकीकरणमा सहयोग गर्ने प्रतिबद्धता भारतले जनाएपनि वर्षौदेखि अलपत्र हुलाकी सडकको निर्माणमा ढिलाईबारे कुनै प्रतिक्रिया उसले नजाउनुले पनि भारत मधेस भन्दा पनि काठमाडौंको नजिक भएको पुष्टि हुन्छ ।
प्रधानमन्त्री ओलीलाई संसदको तीन चौथाई समर्थन छ । यसैलाई आधार बनाएर ओलीले भारतीय व्यापारीहरुलाई नेपालमा लगानीको बातावरण बनिसकेकाले नेपाल आउन आग्रह गरेका छन । तर विदेशी लगानीका लागि नीतिगत निर्णय प्रयाप्त हुँदैन । लगानीका लागि अनुकूल वातावतरण निर्माण जरुरी हुन्छ । यो सरकार बनिसकेपछि पनि बन्द हड्तालको क्रम रोकिएको छैन । यस क्रममा सार्वजनिक गाडी तथा सम्पतिमा समेत क्षति पुर्याउने क्रम जारी छ । खासगरि माओवादीबाट चोइटिएको एउटा समूह अझै नेपालमा चन्दा आतंक र त्रास मचाई नै रहेको छ । भएभरका सबै उद्योग कारखाना बन्द छन, त्यसलाई पुनः सुचारु गर्नुका साटो नयाँलाई मात्र ल्याउने काम ठीक हैन । यसको अर्थ नयाँलाई भित्र्याउनु हुन्न भन्ने हैन । तर, उचित वातावरण त त्यसका लागि चाहियो नि ? त्यस्तै, भारतसंगको बढ्दो व्यापार घाटालाई कम गराउनेबारे भ्रमणमा खासै चासो दिएको पाइएन । ०७३–७४ मा नेपालको व्यापार घाटा ९ खर्ब एघार अर्ब रुपैयाँमध्ये भारतसंग मात्रै ६ खर्ब थियो । चालु आर्थिक वर्षको सात महिनालाई हेर्दा यो झनै बढेको छ । यो अवधिमा व्यापार घाटा ६ खर्ब १३ अर्ब, त्यसमा भारतको हिस्सा ४ खर्ब ५ अर्ब रहेको छ । कोलकात्ता र विशाखाट्टनको लफडाबारेमा पनि ओलीको भ्रमणका क्रममा खासै चासो र स्थान पाएको देखिएन । 
यसैगरि, भारत र भारतीय लगानीका परियोजनाहरु पंचेश्वर, माथिल्लो कर्णाली, हुलाकी राजमार्गलगायतमा पनि प्रधानमन्त्री ओलीको भ्रमणका क्रममा उताबाट ठोस धारणाहरु आउन सकेन । औपचारिकता मात्र पुरा गरेको देखियो । सार्वजनिक वक्तव्यका लागि मात्रै यी विषयहरु आएको जस्तो भान हुन्छ । खासगरि यी परियोजनाहरु सुस्त गतिमा रहेकाले तीव्रता दिने कुरामा भारतीय पक्षको प्रतिबद्धता जोडदार रुपमा आउनु पर्नेथ्यो । अझ पंचेश्वरको डीपीआर नकारात्मक प्रभाव पर्ने गरी बनेकोमा त्यसप्रति पनि यो भ्रमण मौन रहेको देखियो । नेपाल–भारत ऊर्जा व्यापार सम्झौताविरुद्ध भारतले ऐन बनाएरै एकपक्षीय उलंंघन गरेको आरोप नेपाली पक्षले लगाउँदै आएकोमा यसमा पनि खासै धारण उताबाट आउन नसकेको अवस्था रहयो । भारत पक्षले आफूबाहेक तेस्रो पक्षको नेपालको जलविद्युतमा लगानी भएको अवस्थामा खरिद गर्न नसकिने अडान राख्दै एउटा नीति नै बनाएको देखिन्छ , त्यसलाई तोड्न सक्नु पथ्र्यो, यो भ्रमणले । अरुण तेस्रो जलविद्युत परियोजनामा अमेरिकी कम्पनिको विरोध यही बहानामा पहिले पनि भारतीय पक्षले गरिसकेको छ, हाल भारतीय पक्षलाई दिने निर्णयसंगै फेरी त्यसलाई अगाडि बढाउने निर्णय भएको छ । यसमा पनि भारतले आफ्नो शर्त राखेकै छ, त्यो शर्तलाई तोड्न सक्ने गरी नेपाली पक्षले शक्तिको प्रदर्शन अझै गर्न सकेको छैन । भ्रमणमा यो कुरा पनि गम्भिरतापूर्वक उठाउनु पर्ने थियो । यी र यस्तै थुप्रै मुद्दाहरुलाई सशक्त रुपमा उठाउन नसक्नु भ्रमणको ठूलो कमजोरी रहयो । हुनत, यसमा सतही रुपमा केही कुराहरु भएको भन्नेबारे संचार माध्यमहरुमा आएका छन, तर ती सबै प्रयाप्त छैनन । सुगौली सन्धिको विषय पनि पटक–पटक नेपालमा राजनीतिक मुद्दा नै बन्दै आएको छ । नेपाललाई अधोगतितर्फ दोर्याउने उक्त संधिको पुर्नसमिक्षा हुनु पर्ने विषय पनि नेपाली पक्षले उठाउन सकेन । प्रधानमन्त्री ओलीबाट यो मुद्दाको उठान भारतको भ्रमण क्रम हुनेमा नेपालीजन धेरै आशावादी थिए ।
०७२ असोज ३ मा संविधान जारी भएपछि भारतले नाकाबन्दी लगाएयता दुई देशबीचको सम्बन्धमा तिक्तता कायम भएकोमा त्यसलाई कम गर्न केही मलहम लगाउने काम यो भ्रमणले गरेपनि खासै उपलब्धिपूर्ण हुन सकेको देखिएन । भारतले चीन या अन्य मुलुकसंग नेपालको सम्बन्ध प्रगाढ होस भन्ने कुरा कहिले स्वीकार गरेको छैन । यो कुराप्रति भारतको विश्वास नेपालले जित्नै पर्ने देखिन्छ । तर यो विषयमा भारतलाई विश्वस्त पार्ने कुनै कदम चालेको पाइदैन । अझ भारतको जन्मजात शत्रु पाकिस्तानका प्रधानमन्त्रीलाई नेपालमा पछिल्लो समय प्रधानमन्त्री ओलीले स्वागत गरेर उसलाई चिढाएकै छन् । नेपालमा निर्माणाधिन ठूला परियोजनामा भारत र चीनको लगानी धेरै रहेपनि यी दुई मुलुकलाई निस्तेज गरि नेपाल जान नसक्ने जीकिर पनि स्पष्टताका साथ नयाँ दिल्लीको संस्थापन पक्ष समक्ष राख्न नसकिएको अवस्था देखियो ।
भारतले चीनसंगको यातायात तथा पारवहन सम्झौतालाई रुचाएको छैन । जुन सम्झौता केपी शर्मा ओलीकै नेतृत्वमा रहेको सरकारले विगतमा गरेको थियो । नेपालले यसलाई ऐतिहासिक भनिरहँदा भारत यसबाट खुशी भएको देखिदैन । चीनले काठमाडौंलाई रेलमार्गबाटै जोड्ने उद्घोष गरेपछि भारतले पनि त्यस्तै नीति बनाउने उद्घोष गर्यो । हाम्रा दुई छिमेकी मुलुकको लगानी प्रतिस्पर्धाले नेपालको विकास हुने निश्चित छ । तर यसका लागि समदुरी सम्बन्ध आवश्यक पर्छ । कुनै पनि मुलुकप्रतिको थोरै पनि झुकाबले सम्बन्ध चिसिन सक्छ । यसले नेपालको समृद्धि र विकासमा नकारात्मक प्रभाव पार्न सक्छ । विस २०१५ यताकै सबै भन्दा बलियो सरकारको नेतृत्व गरेका ओलीले यी मिहिन कुराहरुको सही विश्लेषणका साथ अघि बढेमा सकारात्मक संकेतहरु देखिनेछ । तर यसो नगरेको अवस्थामा विकास, निर्माण र पूर्वाधारका परियोजनाहरु पहिले झै अलपत्र पर्न सक्ने स्थिति उत्तिकै विद्यमान छ । 
अर्को कुरा, पहिलो पटक नेपालका प्रधानमन्त्रीको भारत भ्रमणमा नेपालको आन्तरिक राजनीतिक मामिलाको विषय छलफल र वक्तव्यमा परेन । विकास, समृद्धि र सुरक्षाकै विषयहरु प्राथमिकतामा रहे । भ्रमणका क्रममा मोतिहारी–अमलेखगंज सीमापार पेट्रोलियम पदार्थ पाइपलाइन विछ्याउने परियोजना र वीरगंजस्थित इन्टिग्रेटेड चेकपोस्टको स्वीच थिचेर उद्घाटन गरिएको छ, अरुण तेस्रोको उद्घाटन पनि थियो तर त्यो हुन सकेन । पहिला दुई परियोजनाहरु निर्माणका चरणमा रहेकै अवस्थामा उद्घाटन गरिएको छ । यसलाई नयाँ उपलब्धि भन्न सकिन्न । त्यस्तै, दुई देशबीचको सम्बन्धलाई समानता, आपसी विश्वास , लाभ र सम्मानका आधारमा नयाँ उचाईमा पुर्याउने प्रतिबद्धता दुवै मुलुकका प्रधानमन्त्रीबाट आउनुलाई ठूलो उपलब्धि मान्न सकिन्न । कुनैपनि दुई देशका प्रमुखबीच भेटवार्ता हुँदा यस्ता विषयहरु साझा रुपमै उठाइनु पुरानै मान्यता हो ।  मात्र समय र सान्दर्भिकता फरक पर्ने कुरा हुन ।
नेपालमा नयाँ संविधानअनुरुप स्थानीय, प्रादेशिक र संसदीय निर्वाचनलाई मोदीले आफनो मन्तव्यमा सकारात्मक रुपमा लिएको देखिएपनि नेपाली संविधानप्रति भने मौन देखिए । उनले सम्बोधनमा नेपाललाई संघीय लोकतान्त्रिक मुलुक भनेर मात्रै उच्चारण गरे । धर्मनिरपेक्षता र गणतन्त्र शब्दहरुको प्रयोगसम्म गरेनन् । युरोपेली युनियनको बढी जोड धर्मनिरपेक्षतामा रहेको छ, मोदी हिन्दूबादी पार्टीको नेता भएरै होला यो शब्दको उच्चारण गर्न उचित नठानेको हुन सक्छ । सैद्धान्तिक रुपमा ओलीको भ्रमण सकारात्मक भएपनि अगामी दिनमा उनको व्यवहार र अवलम्बन गर्ने नीतिले दुई देशबीचको सम्बन्धको स्तरलाई निर्धारण गर्नेनै छ ।
त्यस्तै, नेपालीहरुको आफ्नै पेट्रोलियम टंयाकर र भारतमा नोटबन्दीका कारण नेपालमा थन्किएका एक हजार र पाँच सयका भारु नोटबारे पनि यो भ्रमणमा खासै, कतै चासों राखिएको पाइएन । जन–जनसंग जोडिएका यी र यस्ता मुद्दा भन्दा पनि तेस्रो मुलुकलाई देखाउनकै लागि केही घोषणाहरु भएका छन, समझदारीका कुरा पनि आएका छन् तर ती सबै कति सार्थक र सफल हुने भन्ने कुरा चाही भविष्यको गर्भमै लुकेका छन् ।
अन्त्यमा, मधेसीहरुलाई भारतले नेपाली राजनीतिमा ‘चेक एन्ड ब्यालेन्स’ का रुपमा उपयोग गर्दै आएको कुरो यो भ्रमणले थोर वहुत पुष्टि गरिदिएको छ । भारतले तराई–मधेसलाई यसपाली खासै प्राथमिकतामा राखेको देखिएन । हरेक पटक मधेसको मुद्दा उठाउने भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी यसपाली चाहीँ काठमाडौंको सत्तासंग आफूलाई नजिक रहेको प्रमाणित गर्न खोजे । त्यसैले त पूर्वी मधेस क्षेत्रका बासिन्दाका लागि ‘आत्मघाती’ हुने कोशी तटबन्ध निर्माण गर्ने वातावरण बनाउनमै केन्द्रित रहे । यो तटबन्ध निर्माण भएपछि पूर्वी तराईमा  बाढी निम्तिदै धेरैको उठिबास हुने निश्चित छ । आफ्नो सीमाभित्र भारतले बनाएको तटबन्धले मधेसका धेरै भूमिहरु विगतमा डुवानमा पर्दै आएको तीतो यथार्थ नै हो, त्यसलाई दुवै पक्षले यो भ्रमणमा वेवस्ता गर्दै आ–आफ्नो हित मात्रै सांधेको देखिन्छ । ओलीलाई नेपालमा पानी जहाज भित्र्याउन हतारो छ भने मोदीलाई आफ्नो भूमिलाई बाढीबाट बचाउनका लागि कुनैपनि सर्तमा तटबन्ध निर्माण गर्नुछ । भ्रमण दलमा विभिन्न पार्टीका मधेसी नेताहरुको सहभागीता गराइएपनि तिनीहरुलाई ‘बुख्याचा’ कै भूमिकामा दुवै मुलुकले राखेको देखियो । अतः मधेसी नेताहरुले भारतप्रतिको आफ्नो पुरानो सोच परित्याग गर्दै अघि बढ्नु पर्ने अब तड्कारो भईसक्यो । मधेस भारतको प्राथमिकतामा पहिले पनि थिएन, अझै पनि छैन । उसलाई त केबल काठमाडौंमा आफू अनुकूलको सरकार र मधेसमा ‘रोबोट’ नेताहरु चाहिएको छ । यी दुबै अवस्था नेपालको हितमा छैन ।
(०७५ बैशाख २ मा नेपाली मासिक पत्रिका ‘युवा डटकम’का लागि लेखिएको यो आलेख प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओलीको पछिल्लो भारत भ्रमणमा केन्द्रित छ । डकुमेन्टेसनका लागि यो आफ्नो ब्लगमा राखेको हुँ । )

Monday, 21 May 2018

रामायण सर्किट र राम–राज्य



रामायण सर्किटको घोषणाबाट मैथिल सामन्तहरू खुस छन्.मोदीको भाषणमा मैथिली शब्द प्रयोग भएपछि मैथिल सामन्तहरूमा ऊर्जाको सञ्चार भएको   यो खतरनाक कुरा हो 
रामायण सर्किटभित्र लुकेको रामराज्यको राजनीति बुझ्न वर्चश्वको सिद्धान्तलाई बुझ्न जरुरी वर्चश्व (हेजीमोनी) के हो ? कालिन्स समाजशास्त्रीय शब्दकोशअनुसार हेजीमोनीको अर्थ होएउटा वर्गद्वारा अर्को वर्गमाथि वैचारिक÷सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित गर्नु यस्तो प्रभुत्व सामाजिक संस्था तथा सांस्कृतिक संरचनामा निहित Œवबाट बनावटी सहमति वा सर्वसम्मतिद्वारा स्थापित हुन्छ हेजीमोनी सिद्धान्तको प्रतिपादन इटालीका चिन्तक अन्तोनियो ग्राम्सीले गरेका थिए ग्राम्सीले पँुजीपतिले राज्यसत्ताको प्रयोगबाट शोषित÷शासित समुदायलाई दमन गर्ने सन्दर्भमा परिभाषित गरेका थिए उनको मतअनुसार शोषण, दमन तथा वर्चश्व केवल राजनीतिक मात्र नभएर सांस्कृतिक तथा सामाजिक अभ्यासबाट पनि हुन्छ पुँजीवादी समाजका प्रमुख संस्थाहरू रोमन क्याथोलिक चर्च, न्यायपालिका, शिक्षा व्यवस्था, प्रचार माध्यमबाट यस्तो अभ्यास गरिन्छ ती संस्थाका विचार अभ्यासले आम मानिसलाई प्रभावित पार्छन्, आफ्ना विश्वास स्वीकार गर्न प्रोत्साहित गर्छन् त्यसको प्रत्यक्ष फाइदा शासक वर्गलाई हुन्छ किनभने त्यसले शासक वर्गको शासन सत्तालाई वैधानिकता प्रदान गर्छ। वर्चश्व भौतिक मात्र हुँदैन सामाजिक तथा सांस्कृतिक पनि हुन्छ मूलनिवासी दलित बहुजनको सन्दर्भमा हिन्दुत्वको भौतिक आक्रमण मात्र भएको होइन, सवर्ण विचारधाराबाट पनि हमला भएको देखिन्छ हेजीमोनीको सिद्धान्तलाई रामराज्यको सन्दर्भमा हेर्दा यहाँ पनि सवर्णको शासन शोषित÷शासित दलित बहुजनमाथि सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूपमा लागु भएको देखिन्छ। रामराज्यको नाममा सवर्णहरूले वर्चश्व कसरी स्थापित गरे ? यसका लागि उनीहरूले सजिलो उपाय खोजी गरे। उनीहरूले यस्तो सामाजिक संस्थाको निर्माण गरे, जसबाट आफ्नो विचारधारालाई पनि बल पुग्यो धार्मिक संस्था, सांस्कृतिक संस्था, पुस्तक लेखन, शास्त्र लेखन, विभिन्न स्मृति साहित्यको विकास प्रचार आदिले महत्वपूर्ण भूमिका खेले उदाहरणका लागि, शोषित÷शासित दलित बहुजन मान्ने गर्छन् धर्म सबैका लागि समान हो धर्म पालन गरेर स्वर्गलोक जान सकिन्छ भन्ने विश्वास गर्छन् स्वर्गलोक नामको कुनै स्थान छँदै छैन भन्ने कुराको जानकारी उनीहरूलाई छैन यो विचारधारा कसको हो यो विचारधारा सवर्णको हो उनीहरूले यही विचारधाराबाट दलित बहुजनलाई भ्रमित पारेका छन् उदाहरणका लागि, स्वर्ग जाने अनुष्ठान, पूजापाठमा ब्राह्मणले नै नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह गर्छन् यिनै सामाजिक, सांस्कृतिक धार्मिक प्रक्रियाबाट वर्चश्व कायम गरिएको शिक्षण संस्था, राजनीति रामराज्यमाथि पनि यही विचारधाराको कब्जा सवर्ण विचारधारालाई मूलनिवासी दलित बहुजन आफ्नो जीवन पद्धति मान्छन्। बहुजन सामाजिक मुद्दाका लेखक दयारामराम रामायण का सचमा लेख्छन्, वाल्मीकि रामायणको तथ्यबाट के प्रमाणित हुन्छ भने रामायणको रामको जन्म अयोध्याको धर्तीमा भएको होइन, तर पनि रामको अस्तित्व भारत नेपालको जनमानसमा विद्यमान रामायणको विचारधारा भाग्यवाद, पुनर्जन्म, अन्धविश्वास, पाखण्ड चमत्कारमा आधारित यो विचारधारा हेजीमोनीका रूपमा आमजनको व्यवहारमा परिलक्षित रामायणको रचना रामको समकालीन महर्षि वाल्मीकिद्वारा गरिएको होइन रामायण बुद्धभन्दा पछिको रचना हो इतिहास साक्षी , मधेसको गौरवशाली इतिहासको अन्त्य मौर्य सम्राट् बृहद्रथको सेनापति पुष्यमित्र शुंगबाट भएको हो सेनापति पुष्यमित्र शुंगले पूर्व नियोजित योजनाअनुसार मौर्य सम्राट् बृहद्रथलाई हत्या गर्छन् बौद्ध भिक्षुहरूलाई कत्लेआम गर्न आदेश दिन्छन् चारैतिर भयावह स्थिति छाउँछ यही कालखण्डमा मूलनिवासी दलित बहुजनलाई शिक्षा, सम्पत्ति शस्त्रबाट वञ्चित गरिन्छ यही समयमा उनीहरूलाई चार वर्णव्यवस्थाअन्तर्गत शुद्रका रूपमा चौथो वर्णमा राखेर विभिन्न जातजातिमा विभाजन गरिन्छ वर्ण मूलतः तीन मात्रै थियो, पछि पुष्यमित्र शुंगको कालमा चौथो वर्णका रूपमा विकास गरियो। वर्ण जातव्यवस्थालाई यथावत राखीछाड्न पुष्यमित्र शुंगका छोरा अग्निमित्रले आफ्नो नेतृत्वमा अन्य धर्मग्रन्थसँगै वाल्मीकि रामायणको रचना गर्छन् भयको वातावरणमै भ्रमको सूत्रपात ब्राह्मण धर्मग्रन्थको माध्यमबाट हुन्छ यो भ्रमलाई धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक माध्यमबाट हेजीमोनीलाई स्थापित गरिन्छ भ्रमलाई वर्चश्वमा बदल्न सत्ताको आवश्यकता हुन्छ। सत्तामा स्थापित रहिरहन मूलनिवासी दलित बहुजनलाई स्वर्ग, नरक, पाप, पुण्य मोक्षको मार्गरूपी त्रास दिइरहन्छ।  दयारामका अनुसार पुष्यमित्र शुंगका छोरा अग्निमित्रले जुन बेला मूलनिवासी दलित बहुजनलाई शिक्षाबाट वञ्चित गरेका थिए, दलित बहुजनको कल्याणका नाममारामनामको प्रचारका लागि बौद्ध भिक्षुको रूपधारण गरी सन्त पैदा गरे बौद्ध धर्म सवर्णको घुसपैठकै कारण दुई शाखा हिनयान महायानमा विभाजन भयो दशरथ जातक कथाको रामलाई रामायणको राम घोषणा गरियो राम नामको गुणको दस्तावेज आमजनलाई सत्य लाग्न थाल्यो प्रचार गरियो, राम कथाको श्रवण फलदायी हुन्छ यसको प्रमाण वाल्मीकि रामायणका विभिन्न श्लोकमा पढ्न सकिन्छ रामको जन्म भएको थिएन अवतारका रूपमा अवरण भएको थियो त्यस्तै, विदेह सीताको जन्म देह बाहिरबाट भएको थियो मनुष्यको जन्म मनुष्यको देहबाट हुन्छ तर विदेहको जन्म धर्तीबाट भएको भनिन्छ कतिसम्म भ्रमित बनाइएको रहेछ, सहजै अनुमान गर्न सकिन्छ यसको मूल हतियार धर्मको आडमा सामाजिक तथा सांस्कृतिक वर्चश्व नै हो। राम नामको महिमामण्डन चलिरहोस् भनेर आर्य ब्राह्मण कथा प्रसंगलाई व्यापक रूपमा प्रचार प्रसार गरियो आर्य ब्राह्मणहरूलाई सदैव आफ्नो संस्कृतिप्रति लगाव थियो वाल्मीकि रामायणको भाषा संस्कृत थियो आमजनताले रामको तथाकथित आदर्श मर्यादालाई आत्मसात गराइरहन आफ्नै बीचबाट ब्राह्मण सन्त तुलसीदासलाई अगाडि सारे, जुन बेला कबीर रैदासले रामलाई नकार्ने वा अस्वीकार गर्ने कार्यको सुरुवात गरे आर्य ब्राह्मणले रामायणको रामको अस्तित्व बचाउन रामचरित्र मानसको रचना तुलसीदासबाट गर्न लगाए राम रामायणलाई बचाउन वाल्मीकि रामायणभन्दा तुलसीदासको रामायणको प्रमुख भूमिका , जसलाई रामचरित मानस भनिन्छ यो त्यही शास्त्र हो, जसबाट मूलनिवासी दलित बहुजनमाथि वर्चश्व कायम गरियो यस्तो सवर्ण वर्चश्व मूलनिवासी दलित बहुजनको सहमतिमा टिकेको जुन दिन मूलनिवासी दलित बहुजनले सहमति तोड्छ त्यो दिन सवर्ण वर्चश्व समाप्त हुन्छ।भारतका प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीले वैशाख २९ गते तीर्थयात्रीका रूपमा जनकपुरबाट नेपाल भ्रमण गरे उनलेजय सीयारामको नारा लगाए उनको भ्रमण धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक वर्चश्वको एउटा कडीका रूपमा भएको हो भने कुरा सहजै भन्न सकिन्छ नागरिक अभिनन्दनको क्रममा उनले भने, सीताबिनाको राम अधुरा छन् तर, कथित मर्यादा पुरुषोत्तम (अमर्यादित) रामले सीतालाई गरेको दुव्र्यवहार अपमानको कुनै चर्चा गरेनन्। भ्रमणको क्रममा मोदीलेरामायण सर्किटको घोषणा पनि गरे रामायण सर्किट रामराज्यको एउटा कडी हो रामराज्यको मतलब स्पष्ट रामराज्यमा दलित दलित नै हुन्छ, ब्राह्मणब्राह्मण नै उदाहरणका लागि, रामराज्यरूपी योगीराजमा दलित, मुस्लिममाथिको चरम दमन दैनिक रूपमा पत्रपत्रिका, सामाजिक सञ्जालबाट थाहा पाइन्छ रामराज्यको विधानमा सामाजिक प्राणी सामाजिक शक्तिको मानक फरकफरक हुन्छ मूलनिवासी दलित बहुजन सामाजिक प्राणी हुनेछन् भने सवर्ण सामाजिक तथा राजनीतिक शक्ति हुनेछन् यो विभाजनजय श्री रामको राजनीतिक भाष्यमा स्पष्ट देख्न सकिन्छ रामायण सर्किटको घोषणाबाट मैथिल सामन्तहरू खुस छन् मोदीको भाषणमा मैथिली शब्द प्रयोग भएपछि मैथिल सामन्तहरूमा ऊर्जाको सञ्चार भएको यो खतरनाक कुरा हो  (रजक दलित बहुजन अभियन्ता हुन्
 Source : https://www.nagariknews.com/news/47348/ सोमबार, ०७ जेठ २०७५, ०९ : ११ |

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